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June 2016
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सम्राट् ने एक महल बनाने की आशा दी-अपने वैभव के अनुरूप, अपूर्व सुख और सुखमा की सीमा ।

देश-भर के बड़े-बड़े स्थपतियों का दिमाग उसी का नक्शा तैयार करने में भिड़ गया । नक्शा तैयार हुआ । उसे देखकर सम्राट् फड़क उठे; उनके गर्व को बड़ी मधुर गुदगुदी हुई । जिस समय उस महल की तैयारी का चित्र उनके मनोनेत्र के सामने खड़ा हुआ, संसार के बड़े से बडे प्रासाद निर्माता नरेन्द्र-- आर्यावर्त्त, मिस्र, काबुल, चीन, पारस, ग्रीस, रोम आदि के, तुच्छ मालूम हुए, क्योंकि उन्होंने भव्यता और चारुता का जो प्रदर्शन किया था वह इसके आगे कुछ भी न था ।

जिन मदों से सम्राट् मत्त हो रहे थे आज उनमें एक और बढ़ा ।

जिस भाग्यवान स्थपति की कल्पना ने इस भवन की उद्भावना की थी उसके तो पैर ही जमीन पर न पड़ते थे । सातवें आसमान की उड़ान में उसे अपनी इस कृति के सिवा अन्य कोई वस्तु दीख ही नहीं पड़ती थी ।

अस्तु ।

संसार-भर की एक-से-एक मूल्यवान और दुर्लभ सामग्रियाँ एकत्र की गईं और वह प्रासाद बनने लगा । लाखों वास्तुकार, लाखों शिल्पी काम करने लगे ।

नीहार भी उन्हीं में से था । संगतराशों की एक टोली का वह मुखिया था और उसके काम से उसके प्रधान सदैव सन्तुष्ट रहते थे । किन्तु वह अपने काम से सन्तुष्ट न था । उसमें कल्पना थी । जो नक्शे उसे पत्थरों में तराशने को दिये जाते उनमें हेर-फेर और घटाव-बढ़ाव की' जो भी आवश्यकता सुरुचि को अभीष्ट होती,' उसे तुरन्त भास जाती । परन्तु उसका कर्त्तव्य था केवल आज्ञापालन, अत: यह आज्ञापालन वह अपनी उमंग को कुचल-कुचल कर किया करता । पत्थर गढ़ते समय टाँकी से उड़ा हुआ छींटा उसकी आखों में उतना न कसकता जितना उन नक्शों की कुघरता ।

इतना ही नहीं, उस सारे महल की कल्पना ही उसे वास्तु के मूल पुरुष, मय असुर की गठरी सी मालूम होती और उस स्थान पर पहुँचते ही उसे ऊजड् भयाबनेपन, और बदनुमापन की ऐसी प्रतीति होती कि वह सिहर उठता, मन में कहता-अच्छा बड़ा खड़ा किया जा रहा है, क्या ढकोसला है! और, उसकी कल्पना एक दूसरा ही कोमल स्वप्न देखने लगती ।

धीरे-धीरे यह चर्चा महाराज के कानों तक पहुँची कि नीहार अपने घर में एक महल बना रहा है-एक छोटा-सा नमूना । लोग राजप्रासाद के और इसके सौन्दर्य की तुलना करने लगे हैं कि वह इसके आगे कुछ भी नहीं; इसकी चारुता और कौशल अपूर्व है । नगर भर में इसकी चर्चा थी ।

अधीश्वर की भावना को चोट लगी । जिस मूर्ति की वह उपासना कर रहे थे उस पर जैसे किसी ने आघात किया हो । परन्तु वे ज्वलन प्रकृति के न थे, उनके हृदय में उसे देखने की इच्छा जाग उठी ।

उनके हृदय में कला का जो राजस प्रेम था, वह उन्हें प्रेरित करने लगा । क्योंकि उनसे कहा गया था कि जिस समय वह काम करने लगता है, मग्न हो जाता है, कहाँ क्या हो रहा है, इसकी खबर ही नहीं रह जाती । इसके चारों ओर देखने वालों की भीड़ लगी रहती है । किन्तु, इससे क्या! वह ज्यों का त्यों अपने विनोद में लगा रहता है । वे इस तल्लीनता को देखने के लिये उत्सुक हो उठे-अपने को रोक न सके ।

एक दिन वे चुपचाप नीहार के यहां पहुँचे । दर्शक-समूह सम्राट् को देखकर खडबडाया; किन्तु उनके एक इंगित से सब जहाँ के तहाँ शान्त हो गए । चुपचाप सम्मान-पूर्वक उन्हें रास्ता दे दिया ।

कलावंत की उस तन्मयता, उस लगन, उस समाधि के देखने में मनुष्य स्वयं तमाशा बन जाता था । महाराज भी वैसे ही रह गए । जिस प्रकार अचेतन यंत्र, चेतन बनकर काम करने लगता है, उसी प्रकार यह चेतन, अचेतन यंत्र होकर, अपनी धुन: में लगा हुआ था उसकी कामना के प्राबल्य ने चेतन-अचेतन .का भेद मिटा दिया था-तभी न वह पत्थर में जान डाल सकता था ।

सम्राट् का स्वप्न विकीर्ण हो गया, जैसे गुलाब की पंखडियाँ अलग- अलग होकर उड़-पुड़ जाती हैं । जिस प्रकार शुक्ति में रजत का भ्रम उसी समय तक रहता है जब तक वास्तविक सामने नहीं आ जाता, उसी प्रकार प्रासाद के सम्बन्ध में वे जिस कला-आभास से अभिभूत हो उठे थे, यह प्रकृति कला दीख पड़ते ही, वह जाने कहां विलीन हो गया ।

विजृम्भा की मूर्ति बने सम्राट् उसे देख रहे थे कि नीहार क्षण के लिए किसी कारण अपनी उस निद्रा से जागृत हुआ । उसकी दृष्टि उन पर पड़ी--

उस समय उसके हृदय में बड़ा हर्ष हुआ' । उसने अपने इस निरुद्देश्य निर्माण का फल-सा पा लिया और वह सम्राट् के चरणों में भक्ति भाव से नत हुआ ।

सम्राट् ने उसे उठा कर अपने उन्मुक्त हृदय से लगा लिया । कह उठे- वाह! यहाँ तो पत्थर एक स्निग्ध-हृदय से एकतानता करके मोम बन गया है । नीहार! तू धन्य है । निस्सन्देह किसी शाप-वश पृथ्वी पर आया है, तभी तो यह वैजयन्त प्रासाद यहाँ निर्मित हुआ है ।

'नरेन्द्र! आप ही यह, रहस्य जानें'-विनीत शिल्पी ने अपनी लघुता व्यक्त करके कहा ।

'तो अब इसका निर्माण इसके रूप-सरूप के अनुसार होने दो-वह राजभवन न बन कर यही बनेगा ।''

'जो आज्ञा-,कह कर वह पुन: नत हुआ ।

महाराज ने महास्थपति को बुलाने की आज्ञा दी ।

हरकारे दौडे और बात कहते वह महाराज के सामने उपस्थित किया गया । नीहार की कृति पर उसकी निगाह पड़ी, साथ ही मुँह बिचक गया । महाराज ने उस ओर इशारा करके कहां--देखो!

महास्थपति नम्र होकर देखने लगा, किन्तु चेहरे पर की शिकन ज्यों की त्यों कायम रही ।

?

सम्राट् ने पूछा-क्यों कैसा है?

'कैसे कहूँ ?'

'क्यों, संकोच क्या है

'यह देव को पसन्द आ चुका है । '

'तो उससे क्या हुआ-सम्राट ने साहस बंधाते हुँ कहा -तुम अपनी स्पष्ट राय दो ।

'एक खिलवाड़ है!' नाक सिकोड़ कर उसने कहा-

'तभी तो इतना आकर्षक है । '

'किन्तु निरर्थक तो है, स्वामी!'

'नहीं । रहस्यमय कह सकते हो । निरर्थक तो कोई वस्तु नहीं । जिसे हम नहीं समझ पाते., उसे निरर्थक कह बैठते हैं । '

'हाँ भगवन्! किन्तु यदि वही रहस्य दुरूह हो जाता है तो व्यर्थ अवश्य हो जाता है-चाहै निरर्थक न हो ।'

'किन्तु यहाँ तो उसका गुड़ हो जाना आवश्यक था । वही तो कला है!'

सेवक की समझ में यह न आया!'

'सुनो! केवल सौन्दर्य की अभिव्यक्ति तो इसके निर्माता का उद्देश्य हुई नहीं । उसे तो एक वास्तु निवास-स्थान की रचना करनी थी, किसी सम्राट की पद-मर्यादा के अनुरूप । अतएव ऐसे भवन के लिए जितने अलंकार की अपेक्षा थी उस की इसमें तनिक भी कसर नहीं । किन्तु वहीं तक बस । उससे एक रेखा भी अधिक नहीं, क्योंकि घर तो घर, चाहे कुटी हो वा राज-महल, उसका प्रधान उपयोग तो यही है न कि उसमें-जीवन बसेरा ले-पक्षी अपना नीड़ भी तो इसी सिद्धान्त पर बनाता है, वह मृग-मरीचिका की तड़क-भड़क वाला पिंजरा नहीं बनाता जो जीवन को बंदी करके ग्रस लेता है । तुम्हारे और उसके कौशल में भी यही अन्तर है । केवल बाहरी आकर्षण होना ही कला. नहीं । उसका रूप प्रसंग के अनुकूल होना ही उसकी चारुता है ।'

'नाथ, अपने नन्हेपन के कारण यह ऐसा जान पड़ता है ।' नम्रता दिखाते हुए उसने सीख दी ।

अजी, यह न कहो! विशालता तो ऐसी वस्तु है कि वह बहुतेरे दोषों को दाब लेती है । यही नमूना जब पूरे पैमाने पर बनेगा तो और खिल उठेगा। तो भी - उन्होंने हंसकर कहा-'यदि तुम्हारे जान, यह अपने नन्हेपन के कारण ही इतना रुचिर है तो मंगाओ अपना महल वाला, वह नन्हा नमूना । .दोनों की सामने रखकर तुलना हो जाय ।'

महास्थपति से इसका कोई उत्तर न बना, क्योंकि अब वह जान गया था कि महाराज में जो निगाहदारी ऊंघ रही थी, उसे कला की इस प्रकृत वस्तु ने पूर्णत: जगा दिया है, अत: वे मेरी आलोचना के पोलेपन को भली- भांति समझ रहे हैं । इस कथोपकथन के बीच-बीच में वह महाराज की निगाह बचाकर क्षुब्ध दृष्टि से नीहार को भी देखता जाता था । किन्तु अब उस की वह दृष्टि नीहार पर नहीं पड़ रही थी--अब नत होकर पृथ्वी से करुणा की याचना कर रही थी ।

यह दशा देखकर नीहार से न रहा गया--महाराज से उसने कुछ निवेदन करने की आज्ञा ली ।

उसने बड़ी शिष्टता से कहा--देव वे आचार्य हैं, मैं उनकी चरण-धूलि के समान भी नहीं । उनकी और मेरी कृति की तुलना न्याय नहीं हूँ--मल्लयुद्ध में बराबर के जोड़े छोड़े जाते हैं ।

'परन्तु यह तो प्रतिभा की तुलना है जो अपने विकास से छोटे को भी बड़े के बराबर बैठा देती है ।' महाराज ने गम्भीर होकर कहा, और महास्थपति को देखने लगे ।

किंतु, नीहार दृढ़ता से बोला-इस प्रसंग में तो एक और सूक्ष्म विचार है, तथा वही इसका मूल कारण है । यदि श्रीमान् उसे सुन लेंगे तो यही आदेश देंगे कि इन दोनों रचनाओं की तुलना उचित नहीं ।'

'वह क्या ?' महाराज ने उत्सुकता से पूछा ।

'यही कि,-कलावन्त के मुंह पर मुसकान थी, किन्तु इस प्रसंग से नहीं, वही जो उस पर सहज खेला करती थी-यह कल्पना 'स्वान्तःसुखाय' से उपजी है, और वह 'हुकम पाई' उपजाई गई है । दैव कोई फर्माइश मुझे भी दें तो मेरी कलई आप ही खुल जाय!'

'बस, बस अपने महास्थपति को तो तुमने परास्त किया ही था, अपने महाराज को भी हरा दिया!' प्रसन्नता से गद्‌गद् सम्राट् ने कहा ।

उसके लिए, उसकी आखों में स्नेह झलक रहा था और महास्थपति की दृष्टि में आसीस-केवल आसीस ही नहीं वन्दना भी उमड़ी पड़ती थी ।

1 जून डॉक्टर्स डे पर विशेष

चिकित्सा समर्पण और त्याग का पेशा

आजीविका चलाने के लिए मनुष्य अनेक प्रकार के सेवा के क्षेत्रों को अपना कर्म बनाता रहा है, ऐसे ही सेवा के क्षेत्र में शामिल चिकित्सकीय पेशा सबसे अलग और सबसे महत्वपूर्ण माना जा सकता है। आजीविका के साधनों में शामिल अनेक साधनों को मानवीय दृष्टिकोण से बड़ा ही संवेदनशील कहा जा सकता है। डाक्टर का पेशा भी ऐसा ही संवेदनशील पेशा है, जिसका प्रत्यक्ष संबंध मनुष्य की भावनाओं के साथ ही उसकी सांसों से जुड़ा होता है। हम चिकित्सकीय पेशे ही पवित्र मानवीय संवेदनाओं से युक्त, प्राण दान और जीवनरक्षा की दृष्टि से ईश्वर के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कार्य मान सकते है। यह भी सत्य है कि अनेक बार डाक्टर की सेवा या उसका कार्य ईश्वर की तरह ही दिखाई पड़ता है। कारण यह कि ईश्वर द्वारा हमें जीवन देकर इस धरती पर भेज तो दिया जाता है, किंतु उसके बाद हमारे जीवन की बागडोर उम्र के हर पायदान पर डाक्टर के कंधों पर ही निर्भर होती है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि एक डाक्टर का व्यवसाय बड़ा ही पवित्र होता है। पूर्व में इसे एक सेवा के रूप में लिया जाता था। कमाई के लिए इसे चुनना तो अब की नई सोच की कही जा सकती है।

सुबह, शाम और रात एक सामान

दुनिया भर में रोजी रोटी कमाने के अनगिनत साधन उपलब्ध है। हर साधन धन ऊपार्जन का छोटा बड़ा हिस्सा माना जा सकता है। एक बात सभी धनोपार्जन के साधन में सामान रूप से पाई जाती है और वह है काम के घंटे। फिर वह चाहे एक उद्योगपति से संबंधित हो या एक सामान्य रूप से दुकान चलाने वाले की बात हो। नौकरशाही का क्षेत्र हो, अथवा प्रशासनिक रूप से अपने-अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने वालों का ओहदा हो। सभी एक निश्चित समय के बाद आराम तथा परिवार का साथ जरूर चाहते है। एक डाक्टर का ही पेशा ऐसा है जो ईश्वर के बनाये चौबीस घंटों में हमेशा सेवा के लिए उपलब्ध होता है। यह अलग बात है कि अब बदली परिस्थितियों में चिकित्सकों ने भी अपनी समय सारणी तय कर ली है। बावजूद इसके शासकीय अस्पतालों से लेकर निजी नर्सिंग होम में चौबीस घंटे जरूरत मंद मरीजों को अपनी सेवा देने चिकित्सक बिरादरी उपस्थित रहती ही है। रात 9-10 बजे के बाद हमें आवश्यक वस्तुओं की जरूरत पडऩे पर हमें दूसरे दिन के सबेरे का इंतजार करना पड़ता है, जबकि रात के किसी भी पहर में हमारी अथवा परिजनों अथवा आसपास पड़ोस में किसी का स्वास्थ्य खराब होने पर तुरंत चिकित्सक की सेवा प्राप्त होती है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि एक चिकित्सक के लिए सुबह कब होती है और कब दोपहर ढलते हुए शाम तक पहुंच जाती है, फिर धीरे धीरे रात का अंधेरा कब छा जाता है, यह चिकित्सक के जीवन में कोई मायने नहीं रखता।

सुरक्षा की जरूरत महसूस की जा रही

अपने सेवा क्षेत्र के साथ सदैव मानवीय सेवा को लक्ष्य बनाने वाले चिकित्सकों को वर्तमान समय में सुरक्षा की गारंटी दी जानी चाहिए। देखा जाए तो गांव के देश भारत वर्ष में ग्रामीण क्षेत्र आज भी चिकित्सा सुविधा से वंचित ही है। ऐसी परिस्थिति में ग्रामीणों द्वारा बीमारी की दशा में अपने गांव में ही ऐसे लोगों से इलाज कराने की विवशता झेलनी पड़ रही है, जो चिकित्सा शास्त्र की प्रारंभिक शिक्षा से भी अछूते है। सर्दी, खांसी, बुखार में सामान्य रूप से इलाज कराने वाले ऐसे ही लोग खुद को चिकित्सक बताते हुए ग्रामीणों का इलाज तब तक करते है, जब तक कि वे मरणासनन न हो जाए। स्थिति दयनीय होने के बाद उन्हें शहरों अथवा जिला मुख्यालय के अस्पताल में भेज दिया जाता है। मर्ज बढ़ जाने के कारण इलाज के दौरान मौत हो जाने से बड़े अस्पतालों में सेवारत या निजी नर्सिंग होम के काबिल डाक्टरों को ग्रामीणों और अन्य लोगों के आक्रोश का शिकार होना पड़ता है। यहां तक की उन्हें जान तक की खतरा उत्पन्न हो जाता है, जबकि उनके हाथ में कुछ भी नहीं होता है, कि वे मरीज को बचाने कुछ कर सके। ऐसी स्थिति से चिकित्सकों को बचाने प्रशासनिक स्तर पर पहल अब जरूरी लगने लगी है, ताकि चिकित्सक बिना किसी भय के अपने कर्तव्य का पालन कर सकें।

मानवीय संवेदना और हमदर्दी जरूरी

हम जहां चिकित्सकों को भगवान के रूप में पाते है, वहीं कुछ ऐसे भी चिकित्सकों की कमी नहीं, जो धनोपार्जन की भूख को कम नहीं कर पा रहे है। ऐसे ही लोगों से यह सेवा बदनाम होने लगी है। मरीजों को भय दिखाकर अवैध रूप से मोटी रकम वसूलना और संवेदनाओं को कोई महत्व न देने वाले ऐसे चिकित्सकों के वर्ग से ही समर्पण भाव वाले चिकित्सक आहत होते रहे हैं। अब बड़े शहरों से लेकर छोटे छोटे शहरों में ऐसे मामले सामने आने लगे है, जिनमें डाक्टर अथवा अस्पताल का शुल्क न देने पर शव को ही रोक लिया जाता है। यह एक ऐसा बर्ताव है, जो मानवीय संवेदना और हमदर्दी का गला ही घोंट कर रख देता है। चिकित्सक के व्यवसाय में मानवीय संवेदनाओं का अलग स्थान है। रोगी को दवा के साथ साथ दुलार एवं स्नेह ही भी जरूरत होती है। हमदर्दी का संबंध मन और हृदय से होता है। जब हृदय को उचित खुराक मिलती है, तो शरीर जल्द ही स्वस्थता की ओर बढऩे लगता है। धन के साथ धर्म का अनुसरण करते हुए एक चिकित्सक अपने रोगी की बेहतर सेवा कर सकता है। यह पूरे विश्वास से कहा जा सकता है कि जिस दिन से चिकित्सक मानवीय संवेदना को अपने पेशे में शामिल कर लेंगे उनका मान सम्मान ईश्वर से भी अधिक होने लगेगा।

पेशे को लेकर बढ़ रही चिंता

पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री डा. बिधान चंद्र राय जिनके पुण्य स्मरण में डाक्टर्स दिवस मनाया जाता है, उनकी डाक्टर छवि को धूमिल करने वाले कुछ चिकित्सकों की कार्यप्रणाली से आज के वरिष्ठ और समर्पित चिकित्सकों की चिंताएं बढऩे लगी है। एक चिकित्सक का कहना है कि डाक्टर होना सिर्फ एक काम नहीं बल्कि चुनौतीपूर्ण वचनबद्धता है। उनका यह भी कहना है कि युवा डाक्टर्स को डाक्टर बिधानचंद्र राय की तरह जवाबदारी पूरी करते हुए डाक्टर होने पर गर्व का अनुभव करना चाहिए। एक अन्य चिकित्सक का यह भी मानना है कि डाक्टर्स दिवस एक आयेाजन मात्र नहीं, यह विचार करने का दिन है, कि हम अन्य सामान्य लोगों के जीवन में क्या महत्व रखते हैं। वर्तमान में चिकित्सक पुराने सम्मान को प्राप्त करने संघर्ष करते दिख रहे हैं। कारण यह कि दूषित समय में समर्पण भावना कहीं न कहीं कम हुई है। चिकित्सकीय पेशे में ईमानदारी का वहन चिकित्सकों का एक वर्ग विशेष ही कर पा रहा है। इस बात को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है कि चिकित्सक की एक छोटी सी भूल भी रोगी की जान ले सकती है। इस बात को युवा चिकित्सकों को नहीं भूलना चाहिए कि जब वे अपने चिकित्सकीय जीवन की शुरूआत करते है, तो उनके मन में नैतिकता और जरूरतमंदों की मदद का जज्बा होता है, जिसकी वे प्रतिज्ञा लेते है। बावजूद इसके कुछ लोग पथ भ्रमित होकर अनैतिकता की राह पर चलते हुए पूरे चिकित्सा जगत को बदनामी की राह में झोंक देते है। डाक्टर्स डे चिकित्सकों के लिए एक मौका लेकर आता है कि वे अपने अंतर्मन में झांके, अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को पहचाने, और इतना महान सेवा कार्य को भगवान के प्रतिनिधि रूप में वह स्थान दिलाए जो ईश्वर का होता है। मैं अपने इस लेख के माध्यम से चिकित्सकों को कोई नसीहत देने का मंसूबा न रखते हुए पूरे आदर सम्मान के साथ सभी चिकित्सकों को हार्दिक शुभकामनाएं देना चाहता हूं।

प्रस्तुतकर्ता

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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भारतीय समाज में तिलक, जनेऊ एवं शिखा को धर्म से जोडकर ब्राह्मण वर्ग द्वारा आध्यात्म को परिभाषित करने का प्रयास किया गया है । अत: इनकी प्रासंगिकता पर विचार कर धर्म एवं आध्यात्म पर विचार करेंगे। इस विषय पर सोचने पूर्व हमें भलीभाँति यह समझना होगा कि मानव समाज एक एवं अविभाज्य है । इसको विभेद करने की खिची गई समस्त रेखाएँ अप्राकृतिक एवं कृत्रिम हैं।

तिलक लालाट पर खिचकर व्यक्ति अपनी भक्ति को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करता है। तिलक के प्रति अंध श्रृद्धा रखने वालों ने इसका विज्ञान भी सृजित कर दिया है। वे तिलक की महत्ता को मानसिक स्वास्थ्य से जोडते हैं । यदि ऐसा है तो तिलक को चिकित्सा विभाग में भेजना उचित रहेगा। ताकि उपयुक्त रोगी को ही चिकित्सा मिले। आमजन इस बोझ को लेकर नहीं घूमें। मानसिक तनाव को दूर करने के लिए बने मरहम के समान तिलक का उपयोग है तो तिलक को धर्म का चौला ओढाना निर्थक हैं । तिलक के मुख्यतः दो रूप प्रचलित है। प्रथम सम्पूर्ण ललाट को किसी विशेष लेप से लेपना। इस अक्षत: स्वास्थ्य विज्ञान से जोड़ा गया है। यह मस्तिष्क को अल्पकालिक ठण्डक अहसास कराने व्यतिरेक कुछ भी स्थायी चिकित्सा नहीं है। इसके संदर्भ बनाया गया विज्ञान निरर्थक हैं। तिलक दूसरा रूप भृकुटी पर टीका एवं टीकी के रूप में व्याप्त है। तिलक का यह रूप सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं तांत्रिक परम्परा के रुप में व्याप्त है। एक बात स्पष्ट रूप से स्वीकार करनी होगी कि तिलक कभी वैश्विक परम्परा नहीं रही है। यह मात्र क्षेमितय परम्परा हैं। एक अन्य बात भी सुस्पष्ट है कि तिलक, जनेऊ एवं शिखा का आध्यात्मिक जगत में फूटी कौडी भी मूल्य नहीं है। मात्र तांत्रिक साधक कापालिक साधना के वक्त रक्त सदृश्य लाल तिलक शीश पर धारण कर अंधेरी रात को जाते थे। उसी से कालांतर में युद्ध भूमि में जाने वाला योद्धा तिलक धारण करने लगा । उत्तरोत्तर युग राजनैतिक जगत राजा के पद ग्रहण के रुप में राजतिलक की परंपरा प्रारंभ हुई। सामाजिक जगत में दुल्ले राजा सदृश्य रूप में पेश करने के लिए तिलक की परंपरा का विकास हुआ। परंपरा का बनना एवं बिगड़ना काल परिस्थितियों पर निर्भर करती है। लेकिन तिलक को धारण कर पवित्र अपवित्र एवं पुण्यात्मा एवं पापात्मा की खिची गई रेखाओं ने समाज में पाखंड को जन्म दिया। आज मस्तिष्क पर खिची गई। तिलक रेखाएँ धर्म का प्रतीक कम पाखंड का प्रतीक अधिक बना हुआ है। तिलक को भृकुटी पर धारण कर शिव के तीसरे नेत्र से जोड़कर भी दिखाया जाता है। शिव का तीसरा नेत्र भूत, वर्तमान एवं भविष्य की अभिव्यक्ति है या अन्य रूप तीसरा नेत्र ज्ञान है। शेष दिखावा मात्र है। यौगिक जगत आज्ञा चक्र में मन के अधिष्ठान के रुप में इसे आध्यात्मिकता के प्रवेश द्वारा के रुप में अंगीकार किया गया है। आध्यात्म अन्त: जगत की वस्तु है । इसे बाहर प्रदर्शित करना भीतर के ज्ञान शून्य को प्रकट करता है। अत: तर्क एवं युक्ति से स्पष्ट हो जाता है कि तिलक का धर्म एवं विज्ञान से कोई संबंध नहीं है। इसे धर्म के प्रतीक के रुप धारण करना व्यर्थ है।

जनेऊ ब्राह्मण वर्ग द्वारा उपनयन संस्कार के रुप में तीन व छ: धागों के धारण किए गए सूत्र का नाम है। जनेऊ धारण कर्ता लघु शंका के वक्त एक कान के एवं दीर्घ शंका के वक्त दोनों कान को लपेट कर मल- मूत्र का त्याग करते थे। कतिपय इसके मोहशील मानुष मल-मूत्र त्याग एवं कर्ण की तंत्रिका का वैज्ञानिक संबंध जोड़ते सुने गए । यह विज्ञान मात्र काल्पनिक है इसका यथार्थ से दूर - दूर तक का रिश्ता नहीं है। शिकारी युग चर्म धारण करने के अहंकार को संस्कार की ओट में धारण कर पवित्रता का अहंकार ले गुम रहे ब्राह्मण मात्र यह भार वहन कर रहे हैं। इस सूत्र ने पवित्रता व अपवित्रता के नाम पर भारतीय समाज में बहुत अधिक भेद सृष्ट किया है। इस भेद ने भारतीय समाज में अस्पर्शयता कलंकित इतिहास भी सृर्जित करवाया है। इस बोझ को अब मानवता अधिक दिनों तक वहन नहीं कर सकती है। भेदभाव की इस काल्पनिक रेखा को उखाड फेंकने में ही मानवता का कल्याण निहत है । कुछ लोग प्राचीनता के मोह में अंधे होकर जनेऊ को धर्म ध्वज समझ बैठे है। उन्हें अपनी बुद्धि को ऋग्वेद के नासदीय सुक्त का अध्ययन कर बाह्य सूत्र उपादेय हीनता के विषय में अपने ज्ञान की पिपासा को शांत कर इसे त्यागने में आगे आना चाहिए। एक दृष्टांत ब्राह्मण मत के प्रखर वक्ता आचार्य शंकर की दण्डी स्वामी परंपरा की ओर ध्यान आकृष्ट कर कहना चाहूंगा कि इस वर्ग सन्यासी को दण्डी स्वामी बनने से पूर्व जनेऊ का त्याग करना होता है। तत्पश्चात ही वह शंकराचार्य बन सकता है। जिसे मत का दर्पण ही जनेऊ विहीन दिखता है वह वर्ग जनेऊ का बोझ लेकर घूमना युक्ति हीन है। जिस प्रकार आध्यात्मिक जगत में तिलक का मूल्य नहीं ठीक उसी प्रकार जनेऊ का भी मूल्य नहीं है।

शिखा ब्राह्मण की पहचान बनी हुई है तो इसने ब्राह्मण को मानवीय गुणों से दूर ले जाकर पटका है। भारतीय समाज में केश को लेकर तीन मुख्य परंपरा का वर्णन है। पंचकेशी, पंचभद्र व त्रिणकेशिता। शरीर के विशेष अंगों बालों काटने नहीं काटने के संदर्भ में यह परंपरा है। इसका विज्ञान हमें आनन्द साहित्य में मिलता है। शिखा का इन किसी भी परंपरा से दूर -दूर का कोई रक्त संबंध नहीं है। यह ब्राह्मणों की खोपड़ी की तूणीर से निकला ऐसा बाण हैं स्वयं का वध कर रहा है। शिखा एवं ब्रह्म तालु को ज्ञान की सरिता बहाने धारा के रुप में चित्रित करने का प्रयास किया गया है। ज्ञान अन्त: जगत की वस्तु है। इसका शिखा से कोई संबंध है। यदि ऐसा होता तो अल्बर्ट आइंस्टीनी सहित प्राचीन भारतीय ऋषि परंपरा शिखा से कोई संबंध नहीं रखती है। शिखाधारी ब्राह्मणों की श्रेणी कर्मकांड युग में जन्म हुआ। यह पंरम्परा बोध युग समकालीन है। इसे ज्ञान विज्ञान से संबंधित करना मूर्खता है। शिखा ने समाज में अंधविश्वास को जन्म दिया है। यह भेद भाव स्पष्ट परिचय है। इसकी समाज में कोई उपादेयता नहीं है। यह पाखण्ड के साम्राज्य सम्पदा है। इस हटाना ही शुभंकर हैं।

शास्त्र में कहा है कि "जन्मना जायेते शूद्र, संस्कारात् द्विज उच्येते, वेद पाठात् भवेत् विप्र, ब्रह्म जानाति ब्राह्मण" अर्थात जन्म से सभी मनुष्य शूद्र हैं। संस्कार से ही वह अन्य श्रेणी में जा सकता है । भारतीय समाज में संस्कार के तीन अर्थ प्रचलित है। प्रथम ब्राह्मण वर्ग द्वारा विशेष विधि किया जाने वाला कर्मकांड को सोलह संस्कार नाम दिया गया है। अन्य अर्थ में संस्कार शब्द का सद्गुणों को कहा जाता है। संस्कार का तीसरा अर्थ अधिशेष कर्म का प्रतिफल है। संस्कार शब्द में सु एवं कु पूर्वक जुडने से अच्छा एवं बुरा अर्थ निकलता है। तो व्यक्ति अपने संस्कार अर्थात कर्म से ही शूद्र से ऊपर एवं नीचे उतर सकता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि शूद्र का अर्थ मलेच्छ या नीच नहीं है। वह तो कर्म या गुण की स्थिरावस्था का नाम है। अर्थात यह स्व: से कर्म नहीं करने की अवस्था। जैसे ही स्वैच्छिक कर्म करने लगता है तो बुरे कर्म की बदौलत मनुष्य शूद्र से नीचे शैतान, हैवान एवं पिशाच बन सकता है तो अच्छे कर्म की बदौलत साधु(सज्जन), देव, ईश्वर एवं भगवान बन सकता है। वर्ण व्यवस्था से उक्त श्लोक का कोई संबंध नहीं है। वेद अध्ययन अध्यापन करने लगते ही वह विप्र नाम से जाना जाता हे। वेद का अर्थ ज्ञान - विज्ञान है । इस मात्र किसी मत विशेष के शास्त्र तक सीमित रखना वेद शब्द के साथ न्याय नहीं है। प्राचीन काल में विद्वानों द्वारा खोजे गये सर्वमान्य तथ्य को वेदों में संकलित किया गया । ज्ञान की श्रेणियों के आधार पर इसे तीन भाग में विभाजित किया गया । कालांतर में तीनों को संगीत मय अंश अलग कर सामवेद की रचना की गई थी। सृष्टि के आरम्भ से अभी तक खोजे गया ज्ञान वेद हैं । ज्ञान सतत चलने वाली प्रक्रिया का नाम है। इसलिए वेदों को प्रारंभ में लिपि बद्ध नहीं किया गया था। अत: वेद अध्ययन यानी ज्ञान अर्जित करने के लिए किसी प्रकार की शिखा, जनेऊ एवं तिलक की आवश्यकता नहीं है। ऋग्वेद का नासदीय सुक्त तो ज्ञान की सूक्ष्म विधा आत्म के अर्जन के लिए जनेऊ के त्याग की सलाह देता है। ब्रह्म अर्थात परमतत्त्व को जानने एवं प्राप्त करने के अभ्यासी को ब्राह्मण कहा गया है। कबीर, रैदास सहित सभी ईश्वर प्राप्त करने वाले ब्राह्मण है। अत: धर्म, कर्म एवं मर्म को समझने एवं समझाने के लिए तिलक, जनेऊ एवं शिखा की आवश्यकता नहीं है। भक्ति की राह भी इनका फूटी कौड़ी भी मूल्य नहीं है।

संपर्क

आनन्द किरण (करण सिंह) शिवतलावEmail-- anandkiran1971@gmai.com karansinghshivtalv@gmail.com

Address -- C/o- Raju bhai Genmal , J.D. Complex, Gandhi Chock, Jalore (Rajasthan)

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अनुभव
आज ही मुझे अपनी नौकरी के लिए जाना था। मैं बड़ी उत्साहित थी क्योंकि मैं घर के साथ बाहर की दुनिया में भी कदम रखने वाली थी। बचपन से ही मैं ऐसी महिलाओं के प्रति आकर्षित थी जिन्होंने अपने घर-परिवार के साथ-साथ घर के बाहर भी अपनी एक पहचान बनाई| उनके बारे में पढ़कर-सुनकर न जाने मेरे मन में भी ऐसी भावना कब जाग गई मुझे पता ही न चला। पुरुष सत्ता में स्त्री का वर्चस्व भला क्या मायने रखता। मेरी ससुराल में मेरे साथ भी यही रवैया था| धीरे-धीरे ही सहीं लेकिन मैंने अपने ससुराल के लोगों की सोच को बदला और इस शर्त के साथ कि नौकरी के साथ-साथ घर की जो जिम्मेदारियां मेरी है उसका निर्वाह मुझे करना है| मुझे तो एक पहचान बनानी थी या यूँ कहूँ कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना और चुनौतियों से रूबरू होने हेतु मैं शर्तों को स्वीकार कर खुले आसमान में निकल पड़ी।
आज मेरा मेरे कार्यालय में पहला दिन| हम सारे लगभग २० -२५ लोग। सभी ने मेरा बहुत अच्छे से स्वागत किया मुझे भी बड़ा अच्छा लगा जैसे ये सारे लोग मुझसे बहुत प्रेम करते है। मेरा व्याहारिक ज्ञान शून्य था। मैं अपने भावों को जो मैं महसूस करती बता देती थी। काफी दिनों तक मुझे ये पता ही नहीं चला कि मैं इन सारे लोगों में अकेली हूँ, क्योंकि इन २०-२५ लोगों के आपस में समूह बने हुए थे और वे मेरे पीठ पीछे मेरा मजाक उड़ाते थे। मैं अपने दिए काम को बढ़िया तरीके से समाप्त करती किन्तु इसका सेहरा कोई और अपने सर पर बांध लेता। मजेदार बात तो यह होती कि इन बातों से मैं अनभिज्ञ रहती।
खैर मैं काम को ज्यादा महत्त्व देती थी। ये सारी बातें कि "काम मेरा और शाबाशी किसी और को" मिल रही है, मुझे इन बातों से फर्क नहीं पड़ता था। मेरा मानना है यदि फूल में खुश्बू है तो वह फैलेगी ही। मेरा भ्रम तो बादमे टूटा कि आज का जमाना तो नकली फूलों का है खुश्बू फैलाने के लिए इन नकली फूलों पर सुगंध का छिड़काव करना पड़ेगा।
अपने मुँह से अपनी प्रशंसा करें मुझमें इसकी बड़ी कमी है। मेरे लिए काम ही पूजा है चाहे मुझे कोई देखे या न देखे मैं अपना काम निबटाने में विश्वास रखती थी, और मेरे सहकर्मी काम कम और अपनी प्रशंसा करने में बड़े माहिर थे। समय आगे सरकता और मैं सिर्फ़ अपने काम में डूबी रहती। बढ़ोतरी होती लेकिन मुझे मेरे परिश्रम से कम ही आँका जाता।
घर में इस अतिरिक्त आय के आने से घर में जरूरतें बढ़ चुकी थी। इन आवश्यकताओं को समेटना कठिन था। नौकरी छोड़ना भी मुश्किल था। कई बार प्रयत्न किया कि इस नौकरी से त्यागपत्र देकर कोई नई नौकरी में जाऊं, किन्तु इस नौकरी से छूटना मुश्किल था क्योंकि नौकरी की शर्तें थी और और इन शर्तों को पूरा कर सोचती कि अब नौकरी बदल लूँगी यहाँ तब तक कोई और जाल बुन जाता। धीरे-धीरे मैं भी आदि होने लगी। किन्तु मेरा व्यवहारिक ज्ञान वही का वही था। इस व्यवहारिक ज्ञान के न होने से मैं हमेशा खिन्न रहने लगी। इसका प्रभाव मेरे काम पर और मेरी सेहत दोनों पर हो रहा था। मुझे अपने आपको खुश रखने के लिए कुछ करना था, लेकिन क्या ? कैसे ?

मैंने सोचा बहुत सोचा आखिर फैसला ये लिया कि मुझे भी अपनी प्रशंसा करना सीखना होगा। किन्तु किसी भी आदत को आप यूँ ही नहीं अपना सकते इसके लिए आपको बहुत मेहनत करनी पड़ती है। मुझे इस आदत को अपने में शामिल करना बहुत कठिन लगा लेकिन मैं कोशिश करने लगी। आदत न होने के कारण जब कभी मैं ऐसा कृत्य करती अन्दर से मैं खुश न हो पाती और ये भाव मेरे चेहरे पर आ जाते मेरी जबान मेरा साथ न देती। ये स्थिति मेरे लिए और दुष्कर हो जाती। चारों ओर से लोग मेरी खिल्ली उड़ाने लगे। वे समूह मेरे सामने ही मेरी नक़ल करते मैं कुछ न कर पाती। खैर मैंने स्वयं को पहले की भांति कर लिया। लेकिन बीच-बीच में कुछ सहकर्मियों के साथ मुझे काम दिया जाता था। वे मेरे सहकर्मी काम तो मुझसे करवाते थे किन्तु उसका जिक्र नहीं करते थे और यही कारण था कि मेरी छवि और भी धूमिल होती जा रही थी और तरक्की तो नहीं के बराबर। कई बार मैं सोचती थी कि "बॉस" को मेरी मेहनत दिखाई नहीं देती। क्या वो भी सिर्फ़ अपनी तारीफ का भूखा,जो उसकी चापलूसी करता वो अच्छा और जिसमें चापलूसी का गुण न हो उसकी कोई कद्र या तरक्की नहीं।
जब मैं कोई कविता,कहानी या कोई सुविचार सुनती या पढ़ती जहाँ ये कह जाता है कि "लगन व् परिश्रम करने पर आपकी तरक्की निश्चित होगी "| मैं यहाँ इस बात को बदलना चाहूंगी कि "यदि आप चापलूसी कर सकते हो तो आप तरक्की पर तरक्की करते चले जाओगे।" ये मेरा अनुभव है कि बहुत कम भाग्यशाली होते है जिसे अपनी मेहनत का फल मिलता है। यदि आप झूठ नहीं बोल सकते,आप में दया है, दूसरों के दुःख से आप दुखी हो जाते हो तो ............ भगवान ही आपका रखवाला होगा क्योंकि आज के जमाने में यदि ये नैतिक गुण है तो आप का इस दुनिया में भावनात्मक शोषण होता रहेगा और आप अकेलेपन के शिकार हो जाओगे। आज की माँग है व्यवहारिक ज्ञान। इस ज्ञान से आप तरक्की प्राप्त कर सकते हो,आपके सामाजिक संबंध बढ़ते है भले ही झूठे हो किन्तु कार्यालयों में कार्य करते हुए आपको इस ज्ञान की आवश्यकता होती है।
मैंने इस बार पक्का निर्णय ले लिया। मैं अब अपने आपको और धोखा नहीं दूंगी। मैंने घर के बढे हुए खर्चों का अवलोकन किया। बाहर जानकारी ली| यहाँ पर मैं काफी शालीन से कार्य कर रही थी इसलिए वेतन यहाँ का हर साल की बढ़ोतरी से थोडा-थोडा कर बढ़ गया था। इतना वेतन मुझे बाहर नहीं मिल रहा था। लेकिन निर्णय तो लेना था,पैसा या मन की शान्ति। मैंने शांति चुनना पसंद किया। मैंने अपने कार्यालय की शर्तों के मुताबिक मेरा काम व समय को ध्यान में रखकर त्यागपत्र दे दिया और अपने लिए एक स्वस्थ वातावरण वाला कार्य खोजने लगी।
समाप्त

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1.  (चोरी करना पाप है )

चूहे चाचा उठा रखे थे

सिर पे सारा मुहल्ला

जाने कौन चुरा ले गया था

उनका प्यारा बल्ला

बिना बल्ले के वे कैसे

क्रिकेट खेलने जाते

अपनी टीम को प्रतिद्वन्दी से

बोलो कैसे जिताते ?

कोतवाल बंदर ने छानबीन कर

केस तुरत सुलझाई

चोरी के बल्ले के संग

बिल्ली पकड़ी आई

नंदनवन के सभी जानवर

बिल्ली को फटकार लगाए

चोरी करना पाप है बच्चोँ

तुमको हम समझाएँ


2.(चुहिया रानी )

चुहिया रानी पहने के लहंगा

पहुँच गई स्कूल

जल्दी -जल्दी मेँ वह पेँसिल

घर पे आई भूल

टीचर भालूजी ने अंग्रेजी के

कुछ शब्द लिखने को बोला

यह सुनकर चुहिया जी को

झट से आ गया रोना

चुहिया जी का रोना सुनकर

भालूजी   गुस्साए

क्योँ रोती हो ? मुझे बताओ

मोटी छड़ी दिखाए

चुहिया रानी ने रो - रोकर

सारा हाल सुनाया

फिर न होगी गलती ऐसी

भालू को ये विश्वास दिलाया

चुहिया जी की बातेँ सुनकर

भालूजी   मुस्काए

अच्छे बच्चे कभी न रोते

चुहिया को समझाए

स्कूल जाने से पहले वह अब

बैग अपना चेक करती है

फिर शाला मेँ जाकर

खूब मजे से पढ़ती है


3.(धूर्त गीदड़)

नंदनवन मेँ रहता था

गीदड़ एक सयाना

चोर -उचक्कोँ से था उसका

रिश्ता बहुत पुराना

माथे पर राख लगाकर वह

गेरुआ वस्त्र पहनकर चलता था

भोले -भाले जानवरोँ को

साधु बनके छलता था

उतर गया चेहरे पर से मुखौटा

खुल गया सारा भेद

बंदर को अगवा करने के जुर्म मेँ

उसको हो गई जेल .


4. (जंगल मेँ कवि सम्मेलन )

जंगल मेँ एकबार शेर ने

कविसम्मेलन करवाया

बड़े -प्रतिष्ठित कवियोँ को

काव्यपाठ हेतु बुलवाया

बारी -बारी से सबने

कविता खूब सुनाई

बिल्ली मौसी ने भी

ताली खूब बजाई


[रचनाकार - सागर यादव 'जख्मी ' नरायनपुर ,बदलापुर ,जौनपुर ,उत्तर प्रदेश -222125) 

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वो


ज़िन्दगी के हर पहर में,
वो जुझती सी औरत,
कौन?
मुँह अंधेरे उठकर,
काम में लगती,
कभी बच्चों, तो कभी पति को तकती,
हर दम दबी-घुटी,
सबकी फरमाईशें पूरी करती,
फिर भी सवालों के घेरे में घिरी,
एक साथ कई काम निबटाती,
बिंदी माथे से उतर कर
कभी कोहनी पर या गाल पर आ जाती,
बाल संवर नहीं पाते,
पर काम पूरे ही नहीं होते,
बैठकर ठहाके लगाता
आँगन में पूरा परिवार,
लाँघते ही आँगन तिरछी सी
मुस्कान बिखेर जाती,
फिर जुट जाती, इस हिसाब में,
कौन मेहमान आने वाले हैं?
किसको क्या लेना-देना है,
सत्तो ताई बीमार है पूछने जाना है,
पटवारी के घर पोता हुआ, बधाई देनी है,
मशीन से हाथ चला
कोशिश करती पूरे काम,
ये कौन, इक मालकिन, उस बड़े घर की,
जो कहलाती महज़ इक सकुशल,
घरेलू महिला।
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वो नन्हा


पहन के बस्ता,
टाँग के बोतल,
स्कूल की चमकीली वर्दी में,
ठुमक-ठुमक कर वो पग भरता,
आया घर से पहली बार,
बहुत समझाया सबने उसको,
जा रहा वो भी शाला आज,
उतर गोद से पहन रहा वो,
ज़िम्मेदारी का है ताज।
जैसे ही स्कूल वो आया,
हमने उसे कमरा दिखलाया,
मैडम को था, हाथ थमाया,
नन्हें ने फिर शोर मचाया।
जोर से पकड़ा उसने मुझको,
नहीं रहूँगा, मैं कभी यहाँ,
ये सब तो घर में नहीं हैं
जाऊँ हो मौज मस्ती जहाँ,
उसके रुदन से, डब-डब आँखों से,
मेरा मन भी था भर आया,
छुड़ा कर हाथ, थमा शिक्षा के
मन्दिर में, मैं छोड़ के आया।
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माँ की वो संदूकड़ी


साल भर इन्तज़ार रहता,
मायके जाने का,
छुट्टियाँ होते ही, कुछ दिन
घर के काम-काज से चुराकर,
और भाई-बहनों संग प्रोग्राम
बनाकर, पहुँच ही जाते,
हम माँ के घर,
अपने गाँव में।

घर का कोना-कोना निहारती
दिखती माँ
समेटती छोटी-छोटी चीजें
हम सबको देने के लिये।
बटोरती कुछ सिक्के भी
बाँध लेती चुन्नी के कोने में,
आते ही गली से कोई भी आवाज़,
पुकारती बच्चों को, देती
अंटी से खोल कुछ पैसे, भागते
बच्चे, लाते सामान, खाते और
खिलखिलाते।

दिन बीत जाते, हम भी सामान बांधते,
देख हमें, माँ निकालती अपनी बरसों
पुरानी संदूकड़ी, जिसमें बाँधकर रखे हैं
हम सबके जोड़े, पुड़ियों में बंधे पैसे
मुन्ने के कंगन, गुड़िया की पायल।

एक-एक को पुकार कर देती,
खुश होती, बस दुआएँ देती,
मिलने जाते हम भी दूसरे कमरों में
वहाँ रहती है हमारी भाभियाँ

सामने वाले घर में दो चाचियाँ,
देखते ही हमको इक बनावटी मुस्कान,
पर्स से निकाल वो एक आध शगुन,
का नोट, कितना भारी लगता उन्हें,
दस बार अलमारी खोलती-बंद करतीं,
फिर कह देतीं, ‘‘तेरे लायक कोई कपड़ा
ही नहीं अलमारी में, सब..............’’

सोचती मैं कितनी अमीर है मेरी
माँ की वो जंग खाई पुरानी संदूकड़ी,
इन चमचमाती अलमारियों से
जिनमें से इक रूमाल भी नहीं
झाँकता लड़की को देने के लिए।

- शबनम शर्मा
अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर,
हि.प्र. - 173021

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हमारी सारी जीवनपद्धति अब पराश्रित हो गई है। हमारा प्रत्येक कर्म औरों पर आश्रित हो गया है।  हम खुद क्या हैं,  हमारे लिए क्या बेहतर है, हमारी तरक्की के लिए हमें क्या करना चाहिए, हम क्यों पैदा हुए और कहाँ जाना है ?  इन सबके बारे में हमें खुद को पता नहीं।

लेकिन इतना सब कुछ पता है कि हमें ऎसा क्या करना चाहिए कि औरों को अच्छा लगे, हमारी छवि बेहतर दिखे और हमारे अवगुण, दरिद्रता, बीमारियां, लुच्चापन-टुच्चापन आदि सब ढका रहे और जो हमें देखे वह खूबसूरत कहे, जो हमारे सम्पर्क में आए वह हमें बड़ा आदमी मानें तथा जमाने भर में हम औरों के मुकाबले कुछ अलग ही नहीं वरन उनसे बढ़कर दिखें-दिखाएं। चाहे इसके लिए हमें कुछ भी क्यों न करना पड़े।

आजकल हम सभी की जिन्दगी, स्वभाव और लोक व्यवहार के निर्णायक हम खुद नहीं रहे। चौबीसों घण्टों हम इसी प्रयास में लगे रहते हैं कि दूसरे लोग हमें अच्छा मानें, समझें और  हमें महान होने का हर क्षण अहसास कराते रहें।

कभी महानता, प्रतिष्ठा और लोकप्रियता हमारे कामों, आदर्श व्यवहार तथा लोक कल्याण की धाराओं से मापी जाती थी। पर आज इसके पैमाने बदल गए हैंं। आज औरों के सामने अपना रौब झाड़ने, अपने प्रभुत्व एवं प्रभाव के सार्वजनीन प्रकटीकरण और अपने आपको सर्वोच्च, श्रेष्ठ एवं अन्यतम जतवाने के लिए तरह-तरह के स्वाँग रचने-रचवाने तक सीमित होकर रह गया है।

हमारा अपना खुद का मौलिक व्यक्तित्व चाहे कुछ न हो, खुद में प्रतिभा और हुनर का ग्राफ जीरो हो लेकिन दूसरों के सामने हम अपने आपको ऎसे पेश करते हैं जैसे कि दुनिया में हमारे मुकाबले और कोई इतना वर्चस्वी या बुद्धिजीवी हो ही नहीं सकता।

और इस महानता को सिद्ध करने के लिए हम जो-जो हथकण्डे अपनाते हैं उन्हीं ने मानवता की बुनियाद को कमजोर कर दिया है। इन हालातों ने इंसान को मूल्यहीनता और सिद्धान्तहीनता की विचित्र स्थिति में ला खड़ा कर दिया है।

आज हम उस चौराहे, सर्कल और दौराहे-तिराहे पर खड़े हैं जहाँ हम केवल खड़े रहने भर के लिए लोगों की दया, कृपा और करुणा के आकांक्षी हैं। हमें इसी में मजा आता है कि हम जहाँ खड़े हुए हैं, जिस किसी के साथ खड़े हुए हैं वहाँ खूब सारे लोगों की भीड़ हमें देखती है, आगे बढ़ जाती है और हम इसे ही लोेकप्रियता मानकर इतने आत्ममुग्ध हो गए हैं कि हम यह तक भूल गए हैं कि हम क्या हैं और हमें क्या करना है, किस तरफ जाना है।

यह हमें तब याद आता है कि जब ऊपर जाने का वक्त आता है और तब तक हमारे लिए बहुत देर हो चुकी होती है। हम इसी नादानी, नासमझी और मूर्खता के पछतावे के साथ बिना इच्छा के देह त्याग देते हैं और अतृप्त आत्माओं की उस असंख्य भीड़ में शामिल हो जाते हैं जो हमारी ही तरह लोकप्रियता के भ्रमों में जीती हुई ही मरकर भूत-पलीतों की श्रेणी में आ गई।

इन्हीं अतृप्त आत्माओं के प्रवेश के कारण अच्छे-अच्छे संजीदा और समझदार लोग भी इन्हीं धाराओं में आकर सब कुछ गँवा बैठे और अपना मौलिक अस्तित्व खो दिया।

हमारी महानता अब छोटे-छोटे कामों में नज़र आने लगी है। मसलन कोई सा काम हो, हममें सिविक सेंस रहा ही नहीं। नियम विरूद्ध वाहन पार्किंग कर देना, चौराहों पर लाल बत्ती के बावजूद गुजर जाना, हेलमेट होते हुए भी बिना पहने दुपहिया वाहन चलाना और रोक-टोक होने पर अपनी ही तरह के किसी न किसी आका का नाम लेकर भाग छूटना, कानून तोड़कर रौब जमाना, पद का दुरुपयोग, टोल टेक्स नाकों पर पैसों से बचने के लिए अवैध रूप से पट्टी या रौबदार पद-नाम का इस्तेमाल, दुकान-घरों की हदों को नाजायज रूप से आगे बढ़ाकर जम जाना, अपनी औकात और मूल हैसियत से ज्यादा संसाधनों और सुविधाओं का उपभोग करने के लिए जद्दोजहद करना, अपने अधिकारों की सीमाओं से आगे जाकर स्वार्थ के काम करना, जगह-जगह मुफ्तखोरी, ठहरने के स्थानों का मुफ्त में इस्तेमाल करना, अपने आपको ऊँचा दिखाने के लिए योग्यतम उच्च लोगों का नीचा दिखाना आदि बहुत से कारनामे हैं जिनसे आज का आदमी अपने आपको महान और प्रभावशाली के रूप में स्थापित करने के लिए ताजिन्दगी प्रयत्नशील रहता है।

सारी इंसानियत छोड़कर दुनिया का सब कुछ मुफ्त में पा जाने और मर्यादाओं-अनुशासन के जानबूझकर उल्लंघन करने का जो शगल आजकल दिखाई दे रहा है उसने मानवता को शर्मसार तो किया ही है, हमारी मलीन मनोवृत्ति और जानवरी व आसुरी स्वभाव को भी अच्छी तरह चरितार्थ किया है।

उन सभी स्वनामधन्य और प्रभावशाली लोगों के इस हुनर को दाद दी जानी चाहिए जिसकी वजह से ज्ञान, बुद्धि, हुनर और किसी भी तरह की प्रतिभाओं से शून्य होने के बावजूद ये लोग कमा खा रहे हैं और अपनी चवन्नियां चला रहे हैं। खोटे सिक्कों का चल निकलना और चला देना भी अपने आप में एक हुनर है जिसे नकारा नहीं जा सकता।

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बीमारियों का मूल कारण बैक्टीरिया, कीटाणुओं का संक्रमण और अंग-उपांगों की किसी भी प्रकार की खामी होने से कहीं अधिक है मन और मस्तिष्क की हलचलें।

अधिकांश लोग साध्य-असाध्य बीमारियों से त्रस्त रहते हैं या शारीरिक अस्वस्थता के कारण परेशानी का अनुभव करते रहते हैं।  इनमें से कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश मामलों में बीमारियों के सारे ही मूल कारण हमारे दिल और दिमाग से जुड़े हुए हैं।

असंयम, जीवनचर्याहीन कर्म और मर्यादाहीनता के साथ ही इंसान के दिल और दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते और आकार पाने को उतावले बने रहने वाले विचार इंसान को उद्विग्न बना डालते हैं।

हम अपनी बीमारियों की तह में जाकर गंभीरता और ईमानदारी से सोचे तो साफ-साफ सामने आएगा कि जिन लोगों के जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य आदि षट् विकारों के साथ ही आधुनिक विकिरणदायी उपकरणों का अति प्रयोग होता है वे ही बीमार अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं।

कुछ लोग पूर्वजन्मार्जित पापों और किसी न किसी प्रारब्ध को भोगने के लिए जन्म लेते हैं और इनका क्षय हो जाने पर वापस चले जाते हैं। बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए औषधियों और परहेज के साथ ही यदि हम इन बीमारियों की जड़ों को समाप्त करने की कोशिश करें तो रोगों से जल्दी छुटकारा पाया जा सकता है। 

हमारा चित्त जितना अधिक स्थिर, शांत, निर्वेग और मस्त होता है उतनी इंसानी शक्तियां अधिक जागृत और नियमित रहती हैं तथा अपने-अपने काम आसानी से करती रहती हैं लेकिन जैसे ही शरीर, मन या मस्तिष्क अपनी मर्यादा रेखाओं को लांघ कर कुछ ऎसा करने की कोशिश करता है जो अमर्यादित आचरण की श्रेणी मेें आता है तब शरीर संचालन के सारे समीकरण गड़बड़ाने लगते हैं।

जो विषय या व्यवहार इंसान की मर्यादा या अनुशासन के उल्लंघन की श्रेणी में आते हैं,  संस्कारहीनता माने जाते हैं, उस अवस्था में अंग-उपांग और नाड़ी तंत्र इसका आरंभिक विरोध करते हुए शरीर-मन और मस्तिष्क को संतुलित बनाए रखने के प्रयत्न करते  हैं लेकिन जब इंसान अपनी मलीनताओं, स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति के लिए मर्यादा, संस्कार और अनुशासन को त्याग देता है, मलीन समझौते करने लग जाता है अथवा अपने दिमाग में फालतू के विचारों और आशंकाओं के भण्डार जमा करने की बुरी आदत पाल लेता है तब शरीर की ज्ञानेन्दि्रयां और कर्मेन्दि्रयां भी बगावत पर तुल आती हैं और विवश होकर अपना अनुशासन छोड़ देती हैं और यहीं से शुरू होता है इंसान की बीमारियों का खेल।

भगवान ने जो शरीर दिया है उसका हिसाब से उपयोग किया जाए, जगत के कल्याण में लगाया जाए तभी तक यह काम का बना रहता है अन्यथा शरीर इंसान का साथ छोड़ देना शुरू कर देता है।

शरीर चाहता है कि उसके सभी अवयवों का समुचित उपयोग होता रहे और कोई सा विचार या कर्म ऎसा विजातीय न हो जो इंसानी स्वभाव के अनुकूल न हो। इस दृष्टि  से जो लोग आत्मा की आवाज को गंभीरता से सुनते हैं और उसी के अनुरूप जीवन व्यवहार को ढाल लिया करते हैं वे दीर्घायु और यश दोनों ही प्राप्त करते हैं।

पर आजकल इंसान के लिए न विचार प्रधान रहे हैं, न संस्कार या सिद्धान्त। इस स्थिति में  इंसान अब समझौतावादी होता चला जा रहा है। उसके लिए काम, पदार्थ और इच्छापूर्ति ही सब कुछ होती जा रही है, बाकी सब कुछ गौण या महत्वहीन। और यही कारण है कि इन मानसिक विकारों का स्थूल रूप हमारे शरीर का क्षरण करने लगा है।

शरीर की तमाम बीमारियां पहले विचार का धरातल पाती हैं। यह धरातल सकारात्मक और कल्याणकारी होने पर न कोई संशय होता है न भावी अनिष्ट की आशंका, बल्कि जो कुछ कर्म होता है या किया जाता है उसके फल के प्रति निश्चिन्त या उदासीन रहने के कारण कोई भी ऎसा अवसर उपस्थित नहीं होता कि जिसके कारण से चित्त में खिन्नता, अप्रसन्नता या उद्विग्नता का कोई भाव आए जो शरीर के किसी भी अंग की उत्तेजना को यकायक कम-ज्यादा कर डाले।

चित्त जब शांत हो, मस्तिष्क विकारों से मुक्त हो तभी शरीर अपनी सहज स्वाभाविक गति और ऊर्जा से काम करता है। इसमें जरा सी भी कमीबेशी आ जाने पर इसका सीधा असर हृदय की धड़कन से लेकर शरीर के तमाम अंगों पर पड़ता है और ऎसी तीव्र रसायनिक  क्रिया होती है जो अंगों को शिथिल या क्षति-विक्षत करने के लिए काफी होती है।

अनावश्यक विचारों, षड़यंत्रों, नकारात्मक भावों, राग-द्वेष, ईष्र्या, क्रोध, उद्विग्नता, अधीरता, अशांति और असन्तोष आदि के होते हुए कोई भी इंसान अपने आप को स्वस्थ बनाए नहीं रख सकता है चाहे वह अपनी शरीर रक्षा के लिए लाख उपाय क्यों न कर ले।

किसी भी तरह की बीमारी हो, उसे अपने शरीर से बाहर निकाल फेंकने के लिए यह जरूरी है कि हम अपनी आदतों, व्यवहार और सोच में बदलाव लाएं और ईमानदारी से इस बात का चिन्तन करें कि ऎसी कौनसी बातें, विषय या लोग हैं जिनके कारण से हमारा चित्त एकदम अशांत हो जाता है, हमारे भीतर असन्तोष का हवाई भँवर रह-रहकर हिलोरे लेने लगता है,  हमारी शांति गायब हो जाती है।

चित्त को उद्विग्न, अशांत और असंतोषी बनाने वाले सारे विषयों को एक-एक कर छोड़ते चले जाएं। इस तरह बीमारी की जड़ पर प्रहार करते जाएं। इससे हमारे शरीर की कोई सी बीमारी हो, वह आधार खो देगी।

यह भी शाश्वत सत्य है कि जिसकी बुनियाद खत्म हो जाती है उसका अस्तित्व भी समाप्त हो ही जाता है। अपने आपको दिव्य बनाने की कोशिश करें, विकारों को त्यागें, स्वभाव बदलें और सभी प्रकार की अपेक्षाओं व ऎषणाओं से मुक्ति पाने का प्रयास करें।

ज्यों-ज्यों हम सांसारिक विकारों को छोड़ते चले जाएंगे, त्यों-त्यों हम मानसिक और शारीरिक सभी प्रकार की बीमारियों से मुक्ति का अहसास करने लगेंगे। बीमारियों के सूक्ष्म विज्ञान को समझने की आवश्यकता है तभी हम पूर्ण आरोग्य का स्वप्न पूरा कर सकते हैं।

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जाने कब से बोलते और सुनते आए हैं - अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काज, दास मलूका कह गए सबके दाता राम। मलूकदास को इस मामले में त्रिकालज्ञ ही मानना होगा क्योंकि उन्होंने के आज के वर्तमान को अपने समय में ही देख लिया था।

उस समय ऎसे लोग जरूर रहे होंगे लेकिन उनकी संख्या उतनी नहीं होगी जितनी आज है।  उन्होंने तो केवल अजगर और पंछियों के लिए ही यह कहा था लेकिन आज के हालातों को देखें तो यह सूची इतनी लम्बी हो चली है कि कहाँ से आरंभ करें और कहाँ अंत, इसकी सूझ ही किसी को नहीं पड़े।

सूझ पड़ भी जाए तो इसका निर्णय करना किसी के बस में नहीं है कि किसे सम्मानजनक ढंग से क्रम में आगे रखे और किसे पीछे क्योंकि यहाँ हर कोई वीआईपी होकर आगे ही आगे रहना चाहता है चाहे कोई सा मामला हो। किसी को थोड़ा सा पीछे कर दो तो पीछे ही पड़ जाए।

दया, करुणा और कृपा हमारे देश की वह थाती है जिसने युगों-युगों से लोगों को पाला है और इसे धर्म समझ कर पुण्य पाया है।  आज के माहौल में हर तरफ भीड़ का मंजर है जिसमें से कई सारे लोगों के बारे में कहा जाता है कि ये दूसरों की दया और कृपा पर पल रहे हैं वरना इनमें इतनी औकात ही नहीं है कि खुद के बूते जी सकें।

इसी प्रकार बहुत से लोगों के बारे में यह भी कहा जाता है कि इन्हें हम पाल ही रहें हैं। वैसे पालना शब्द श्रेष्ठ पालक के लिए होता है लेकिन यहां इसका अर्थ है उन लोगों से जो पराश्रित होकर पल रहे हैं और दूसरों की दया, करुणा तथा कृपा पाकर अपने आपको पाल रहे हैं।

पशुओं को पालने वाले भी खूब हैं लेकिन पशुओं से इन पलने-पलवाने वाले लोगों की तुलना करना पशुओं के साथ अन्याय होगा क्योंकि पशु बुद्धिहीन हैं इसलिए उनमें ज्ञान, विवेक और दृष्टि का अभाव है लेकिन जो लोग पल रहे हैं, जिन्हें किसी न किसी के द्वारा पाला जा रहा है वे बुद्धिहीन नहीं हैं, उनमें ज्ञान या विवेक की कोई कमी नहीं है बल्कि ये लोग सब कुछ जानते-बूझते हुए भी कुछ करना नहीं चाहते हैं इसलिए इन्हें पशुओं से श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है।

पशुओं से इनकी तुलना बेमानी भी है क्योंकि पशुओं से मनचाहा काम कराया जा सकता है, हर पशु किसी न किसी रूप में उपयोगी है। यहां तक की पशुओं का शरीर, मल-मूत्र तक काम किसी न किसी उपयोग का होता है लेकिन इन लोगों का कुछ भी काम नहीं आता, न ये किसी काम के हैं। बल्कि हकीकत यह है कि ये लोग समाज और देश से लेकर धरती तक के लिए भारस्वरूप ही हैं।

पलने वालों की भी कोई कमी नहीं है और पालने वालों की भी। हर तरफ दोनों ही किस्मों के लोग हैं। इनमें भी ढेरों ऎसे मिल जाएंगे जिनके बारे में लोग दुःखी होकर यही कहा करते हैं कि पालना पड़ रहा है इनको, न पालें तो कहां जाएं।

इंसानी जीवट और जीवनीशक्ति का इतना अधिक ह्रास हो गया है कि लोग अपने सामथ्र्य, क्षमताओं, हुनर और बौद्धिक कौशल को विस्मृत कर पलने को आतुर हैं। दूसरों की दया पर जिन्दा रहना  अपने आप में इंसान का अपमान है।

पुरुषार्थहीन, दरिद्री और निकम्मे लोग ही औरों की कृपा पर जिन्दा रहा करते हैं अन्यथा जिनमेंं दम-खम होता है, इंसान होने का ज़ज़्बा रहता है वे लोग स्वाभिमान और पुरुषार्थ के साथ जिन्दा रहते हैं। उन्हें न किसी की दया या कृपा चाहिए होती है और न किसी की सिफारिश या अभयदान। 

जो पल रहे हैं वे भी खुश हैं और मजबूरी में जो पाल रहे हैं वे भी किसी से कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हैं।  भगवान सबका ध्यान रखता है और सबके लिए व्यवस्था करता है। बोलो मलूकदास महाराज की जय।

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आपने कहा है

संपादकीय का रंग

मैं कई वर्षो से प्राची पढ़ रहा हूं. कविता, कहानी, समीक्षा, आलेख का अपना अलग रंग है. परंतु संपादकीय इस पत्रिका की जान है. हर बार संपादकीय एक अलग रंग में नजर आ रही है. मार्च अंक में ‘देश के गद्दार’ संपादकीय में वास्तविक चित्रण किया है. हो सकता है, संपादकीय को पढ़कर समाज में कोई परिवर्तन आ जाये. मई अंक में ‘पाप और पुण्य’ को बहुत ही सुगठित रूप से वर्णित किया है. संपादकीय के माध्यम से जो संदेश पाठकों तक जाता है, वह सराहनीय है.

प्रेम नारायण शुक्ल, नई दिल्ली

प्राची की प्रगति

प्राची प्रगति पर है. इसके पत्र अपनी एक अलग छाप छोड़ते हैं. प्रभात दुबे जी के पत्रों की एक अलग पहचान है.आपने व्यंग्य का कालम बनाया, बहुत अच्छा लगा. कहानियां मार्च, अप्रैल के अंक की एक ही बैठक में पढ़ डालीं. अभी कल ही मई अंक हाथ आया. सरसरी तौर पर पढ़ा. संपादकीय का तो क्या कहना. अशोक अंजुम के दोहे बहुत बढ़िया हैं.साक्षात्कार शुरू किया, अच्छी शुरुआत है.

प्राची दिन दूनी उन्नति करे, यही मनोकामना है. संपादक और संपादक मंडल को बधाई.

उर्मिला शर्मा, बहादुरगढ़ (हरियाणा)

पठनीय एवं स्मरणीय संपादकीय

प्राची का मई, 1016 अंक मिला. संपादकीय में पठनीय एवं स्मरणीय विचारों को जानकर प्रसन्नता हुई. आपके सद्प्रयास एवं मनोयोग के फलस्वरूप पत्रिका के स्तर में उत्तरोत्तर विकास और प्रगति दृष्टिगोचर हो रही है. आप पुराने लेखकों के साथ नए लेखकों को भी पत्रिका में स्थान देते हैं, यह एक सराहनीय कार्य है. प्राची का कथा साहित्य अद्भुत है. कवितायें रोचक होती हैं. प्राची के संपादकीय विभाग को मेरी ओर से बधाई!

जीतेन्द्र कुमार, बहराइच (उ.प्र.)

मेरा दृष्टिकोण

‘‘आखिर हम हैं क्या’’ में लेखक ने भारतीय समाज का जो चित्र खींचा है, वह कड़वी सच्चाई है और इसे हम एक कड़वी दवा के समान पीते जा रहे हैं, फिर भी समाज में कोई सुधार दृष्टिगत नहीं हो रहा है. सामाजिक पतन जारी है. भारतीय समाज का व्यक्ति और कितना नीचे गिरेगा, क्या इसकी कोई सीमा है? कहा नहीं जा सकता. परन्तु इतना सच है कि अगर व्यक्ति और समाज नहीं सुधरेगा, तो इसे इतिहास में एक आदर्श समाज का स्थान कभी प्राप्त नहीं होगा. ऐसा मेरा मानना है.

पत्रिका में प्रकाशित कहानियां, गीत, गजल और कवितायें हमेशा की तरह पठनीय हैं. मेरी शुभकामनायें.

सुधांशु शर्मा, प्रतापगढ़ (उ.प्र.)

संस्कृति की जानकारी देते रहें

प्राची का मई, 2016 अंक प्राप्त हुआ. बहुत समय बाद एक पौराणिक कहानी पढ़ने को मिली. यह मेरी काफी समय से मांग थी, आपने उसे पूरा किया. हार्दिक धन्यवाद! आधुनिक पीढ़ी अपनी परम्पराओं और पुरातन संस्कृति से दूर जा रही है, यह एक दुःखद विषय है; परन्तु प्राची जैसी साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पत्रिकाएं अपनी विरासत को जीवित रखे हुए हैं. इससे आशा बंधती है कि हमारे समाज का जो पतन हो रहा है, वह कभी-न-कभी रुकेगा अवश्य, परन्तु यह कहां जाकर रुकेगा, यह आधुनिक पीढ़ी के हाथों में है. आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें अपने धर्म और संस्कृति की कितनी जानकारी हम दे पाते हैं. समय-समय पर पत्रिका में अपने पौराणिक ग्रंथों के बारे में या उनमें दिए गए आख्यानों को प्रकाशित करते रहें.

इसके अतिरिक्त पत्रिका का नयनाभिराम आवरण पृष्ठ देखकर मन प्रसन्न हो गया. ऐसा लगा, जैसे जेठ की तपती दोपहरी में वर्षा की दो ठंडी बूंदें तन-बदन को सिहरा गयी हों. बधाई!

के. राज आर्य, लाजपत नगर, नई दिल्ली

कहानियां मील का पत्थर

प्राची का नवीनतम अंक प्राप्त हुआ. इस अंक में पुरानी और नई रचनायें पढ़कर मन प्रसन्न हो गया. प्राची में हिन्दी साहित्य की प्रत्येक विधा की सोंधी खुशबू बिखरी हुई है. सच्चे मानो में आप साहित्य की सेवा कर रहे हैं. सभी कहानियां अच्छी हैं और हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर साबित होंगी. काव्य जगत में प्रकाशित पद्य रचनाएं उत्तम कोटि की हैं. आपका चयन सुंदर है. इधर व्यंग्य रचनाओं की संख्या में वृद्धि हुई है. इससे लगता है आप समाज के प्रति एक सार्थक दृष्टिकोण रखते हैं.

प्राची एक सुंदर और उत्तम पत्रिका है. इसकी दीर्घायु के लिए मेरी शुभकामनाएं.

राजीव सिंह, सिंगरौली (म.प्र.)

रोचक और ज्ञानवर्धक अंक

प्राची का मई, 2016 अंक अभी-अभी मिला है. कुछ रचनाओं का अवलोकन किया है. प्राची के प्रत्येक अंक में कोई न कोई साहित्यिक आलेख रहता है. पिछले दो-तीन अंकों से आप पुराने साक्षात्कार दे रहे हैं, जो साहित्य की धरोहर हैं. यह साक्षात्कार केवल पाठकों के लिए ही नहीं, नए लेखकों के लिए भी जानकारी से परिपूर्ण हैं. यह दुर्लभ साहित्यिक साक्षात्कार हैं, जो अन्य पत्र-पत्रिकाओं में उपलब्ध नहीं होते. पाठकों के समक्ष इन्हें लाकर आप एक महती कार्य कर रहे हैं.

देखा गया है कि वर्तमान हिन्दी लेखकों में पठन-पाठन के प्रति रुचि लगभग नहीं के बराबर है. ये अपनी रचनओं के अतिरिक्त किसी और की रचना नहीं पढ़ते. जबकि लेखकों के लिए यह परम आवश्यक है. इससे जहां उन्हें यह जानकारी मिलती है कि वर्तमान हिन्दी साहित्य का रुझान कैसा है, वहीं पुराने लेखकों की रचनाओं से हमें यह ज्ञात होता है कि दशकों पूर्व किस प्रकार का साहित्य लिखा जा रहा था. इस मायने में आप एक अच्छा कार्य कर रहे हैं. प्राची के माध्यम से आप पुरानी और धरोहर कहानियां, लेख और साक्षात्कार पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं. आप इतनी उपयोगी रचनाओं को ढूंढ़-ढूंढ़कर पत्रिका में स्थान दे रहे हैं, इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद!

विजय प्रताप वर्मा, इलाहाबाद (उ.प्र.)

(इस बार एक भी पत्र ऐसा प्राप्त नहीं हुआ, जिसे सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जा सके.)

वे मूल्य फिर लौटेंगे

बोरिस पॉस्तरनाक

ब मैं ‘डॉ. जिवागो’ लिख रहा था तो मेरे मन में एक बोझ था कि वे अपने समकालीनों के प्रति देनदार हैं. जैसे-जैसे उपन्यास आगे बढ़ता रहा, यह देनदारी की अनुभूति मेरे ऊपर हावी होती चली गयी. इतने सालों तक गीत लिखने और अनुवाद करने के बाद मुझे लगा कि उस युग के बारे में अपना बयान देना भी मेरा कर्तव्य है जो काफी पहले बीत गया है, पर छाया रूप में आज भी हमारे ऊपर छाया हुआ है. समय अपना दबाव डाल रहा था. मैं ‘डॉक्टर जिवागो’ में रूस के उन वर्षों के सुन्दर और संवेदनशील पहलू का लिपिबद्ध करके उसका सम्मान करना चाहता था. वे दिन तो लौटकर आयेंगे नहीं, और न हमारे दादा-परदादा ही लौटेंगे, पर भविष्य के ऐश्वर्य में मैं देखता हूं कि उन्हीं के मूल्य फिर लौटेंगे. मुझे उनका ही वर्णन करना है. मैं नहीं जानता कि ‘डॉक्टर जिवागो’ एक उपन्यास के रूप में सफल रहा है, पर इसकी सारी कमजोरियों के बावजूद, मैं महसूस करता हूं कि यह मेरी प्रारंभिक कविताओं की अपेक्षा अधिक मूल्यवान है. यह मेरी युवावस्था की कृतियों की अपेक्षा अधिक समृद्ध और अधिक मानवीय है.

साहित्य समाचार

मंजिल ग्रुप का अनूठा आयोजन

आगराः रामस्वरूप कॉलोनी आगरा में ‘‘मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच (भारतवर्ष) द्वारा एक अनोखे साहित्यिक रचना पाठ का आयोजन किया गया. जिसमें आगरा के डॉ. शेष पाल सिंह ‘‘शेष’’, डॉ. ओम प्रकाश दीक्षित ‘‘सूर्य’’ श्रीमती श्रुति सिन्हा, डॉ. राजकुमार सिंह (सभी आगरा) डॉ. शशि मंगल (जयपुर) तथा सुधीर सिंह सुधाकर (दिल्ली) ने अपनी रचना की जगह दूसरों की रचना मंच से पढ़ी तथा ‘‘रचना सहृदयता सम्मान’’ भी प्राप्त किया.

डॉ. शशि मंगल की अध्यक्षता तथा श्री राकेश कुमार के मुख्य आतिथ्य में इस अनोखे कार्यक्रम की खास बात यह रही कि 5000 श्रोताओं के ग्रीन कार्ड के आधार पर दिल्ली से आए मंच के राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने आगरा के लघुकथाकार को अंग-वस्त्रम्, मेडलों तथा कई प्रशस्ति पत्र (भारतवर्ष के अन्य सभी शाखाओं द्वारा भेजे गए प्रदान किए.)

श्री किशनलाल शर्मा जी को जब सम्मानित किया जा रहा था तब उनकी पुत्रवधु संगीता शर्मा ने सरस्वती वंदना भी की जो कि उनकी रचना नहीं थी. वयोवृद्ध चांद देवी जी ने मंचासीन अतिथियों को अपने हाथों से सम्मान पत्र प्रदान किया तथा अपना आशीर्वाद भी दिया. इस मंच (एमजीएसएम) की खास बात यह है कि श्रोताओं की ग्रीन कार्ड के आधार पर मंच रचनाकार को उसके शहर में जाकर सम्मानित करती है.

श्रोता समूह में आर.के. भारद्वाज, के.सी. चतुर्वेदी, हरिओम शर्मा, राजकुमार शर्मा, किशन सिंह, सतपाल यादव तथा रामवीर शर्मा महिला श्रोता भी उपस्थित रहे.

कार्यक्रम का मंच संचालन श्रुति सिन्हा ने किया. सभी वक्ताओं ने मंच के अनोखेपन की प्रशंसा की श्रोता को जमकर रचनाकार को (जिन्हें श्रोता न देखे न उनकी रचना सुनी) कार्ड प्रदान किए.

प्रस्तुति पुष्पेंद्र सिंह, आगरा

वैचारिक कवि गोष्ठी सम्पन्न

मीरजापुरः 24.3.2016 को सायं होली के अवसर पर नगर के वरिष्ठ साहित्यकार भवेशचंद्र जायसवाल के अनगढ़ रोड पर स्थित श्रीकृष्णपुरम् कालोनी में आवास पर एक वैचारिक काव्य गोष्ठी वरिष्ठ कवि प्रभूनारायण श्रीवास्तव की अध्यक्षता में आयोजित की गयी. इस गोष्ठी में नगर के प्रमुख वैचारिक कवि एवं प्रबुद्ध श्रोता उपस्थित थे.

वाणी वंदना के पश्चात् इलाहाबाद बैंक के पूर्व वरिष्ठ प्रबंधक केदारनाथ सविता ने अपनी वैचारिक कविताओं का पाठ किया- ‘‘सुख है एक नर्तकी, जो आज बूढ़ी हो चुकी.’’

‘‘आज’’ दैनिक समाचार पत्र इलाहाबाद संस्करण के पूर्व उप संपादक भोलानाथ कुशवाहा, जिनके अंतिका प्रकाशन से लगातार तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, ने अपनी नई कविता का पाठ किया- ‘‘वर्षों से बनाने के प्रयास में हूं एक चित्र आदमी का, वह कहीं ठीक-ठीक ओरिजनल नहीं मिला.’’

ए.जी. ऑफिस उत्तर प्रदेश इलाहाबाद से सेवानिवृत्त भवेशचंद्र जायसवाल जिनके चार काव्य संग्रह व एक बाल कथा संग्रह और एक बाल एकांकी प्रकाशित हो चुके हैं, ने अपनी सद्यः प्रकाशित समकालीन कविताओं का पाठ किया. तत्पश्चात् उन्होंने होली विषयक दोहे सुनाये- ‘‘बोल, बतकही, मसखरी हवा फुलाए गाल, रंगों भरे कपोल पर फागुन मले गुलाल. सपनों की फुलवारियां, रंगों की बौछार, मिसरी-सा नीका लगे, फागुन का त्यौहार.’’

आदर्श इंटर कॉलेज, बिसुन्दरपुर के पूर्व प्रधानाचार्य बृजदेव पांडेय जो नई कविता में व्यंग्य का मिश्रण करने के लिए प्रसिद्ध है, ने सुनाया- ‘‘मोटापा कम करने के लिए दवा खाने की क्या जरूरत है, एक बार चूम कर देखो, सारा मोटापा झार कर रख दूंगा. क्या सूगर-सूगर चिल्लाते हो, समाज में ऐसी कड़वाहट भर दूंगा, जिंदगी की मिठास चली जाएगी.’’

सबसे अंत में गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे जी.डी. बिनानी स्नाकोत्तर महाविद्यालय, मीरजापुर के अंग्रेजी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रभु नारायन श्रीवास्तव ने विचारोत्तेजक कविता पढ़कर सबको चुप करा दिया. लोग वाह् करना भूल गये. आह भर कर रह गये. उन्होंने पढ़ा- ‘‘पानी जब मुट्ठी बांध लेता है तब बन जाता है बर्फ, असंवेदनशील इतना कि भूल जाता है बहना. अपने आप में सिमट कर बड़ा कठोर हो जाता है, ऐसा पानी भी किस काम का जो बह न सके रगों में.’’

प्रस्तुतिः केदारनाथ ‘सविता’, मीरजापुर

हिंदी ब्लॉगिंग ने पूरे किये 13 साल, 21 अप्रैल को बना था हिंदी का पहला ब्लाग

न्यू मीडिया के इस दौर में ब्लॉगिंग लोगों के लिए अपनी बात कहने का सशक्त माध्यम बन चुका है. राजनीति की दुनिया से लेकर फिल्म जगत, साहित्य से लेकर कला और संस्कृति से जुड़े तमाम नाम ब्लॉगिंग से जुडे हुए हैं. आज ब्लॉग सिर्फ जानकारी देने का माध्यम नहीं, बल्कि संवाद, प्रतिसंवाद, सूचना विचार और अभिव्यक्ति का भी सशक्त ग्लोबल मंच है.

यद्यपि ब्लॉगिंग का आरंभ 1999 से माना जाता है पर हिंदी में ब्लॉगिंग का आरम्भ वर्ष 2003 में हुआ. आजमगढ को जहां साहित्य, शिक्षा, संस्कृति, कला का गढ माना जाता है, वही ब्लॉगिंग के क्षेत्र में भी यहां तमाम उपलब्धियां दर्ज हैं. आजमगढ़ के तहबरपुर क्षेत्र निवासी चर्चित हिंदी ब्लॉगर एवं भारतीय डाक सेवा में निदेशक कृष्ण कुमार यादव बताते हैं कि पूर्णतया हिन्दी में ब्लॉगिंग आरंभ करने का श्रेय आलोक को जाता है, जिन्होंने 21 अप्रैल 2003 को हिंदी के प्रथम ब्लॉग ‘नौ दो ग्यारह’ से इसका आगाज किया. सार्क देशों के सर्वोच्च ‘परिकल्पना ब्लॉगिंग सार्क शिखर सम्मान’ से सम्मानित एवं नेपाल, भूटान और श्रीलंका सहित तमाम देशों में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मेलन में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले श्री यादव जहां अपने साहित्यिक रचनाधर्मिता हेतु ‘शब्द-सृजन की ओर’ब्लॉग लिखते हैं, वहीं डाक विभाग को लेकर ‘डाकिया डाक लाया’ नामक उनका ब्लॉग भी चर्चित है.

वर्ष 2015 में हिन्दी का सबसे लोकप्रिय ब्लॉग ‘शब्द-शिखर’  को चुना गया और इसकी माडरेटर आकांक्षा यादव को हिन्दी में ब्लॉग लिखने वाली शुरुआती महिलाओं में गिना जाता है. ब्लॉगर दम्पति कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव को ‘दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दम्पति’, ‘परिकल्पना ब्लॉगिंग सार्क शिखर सम्मान’ के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा नवम्बर, 2012 में ‘‘न्यू मीडिया एवं ब्लॉगिंग’’ में उत्कृष्टता के लिए ‘‘अवध सम्मान’’ से भी विभूषित किया जा चुका है. इस दंपती ने वर्ष 2008 में ब्लॉग जगत में कदम रखा और विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लॉग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लॉगिंग की तरफ प्रवृत्त किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लॉगिंग को भी नये आयाम दिये. नारी सम्बन्धी मुद्दों पर प्रखरता से लिखने वाली आकांक्षा यादव का मानना है कि न्यू मीडिया के रूप में उभरी ब्लॉगिंग ने नारी-मन की आकांक्षाओं को मुक्ताकाश दे दिया है. आज 80,000 से भी ज्यादा हिंदी ब्लॉग में लगभग एक तिहाई ब्लॉग महिलाओं द्वारा लिखे जा रहे हैं.

ब्लॉगर दम्पति यादव की 9 वर्षीया सुपुत्री अक्षिता (पाखी) को भारत की सबसे कम उम्र की ब्लॉगर माना जाता है. अक्षिता की प्रतिभा को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2011 में उसे ‘राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ से सम्मानित किया, वहीं पिछले वर्ष अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्री लंका में उसे ‘परिकल्पना कनिष्ठ सार्क ब्लॉगर सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया. इसके ‘पाखी की दुनिया’ब्लॉग को 100 से ज्यादा देशों में देखा-पढा जाता है और लगभग 450 पोस्ट वाले इस ब्लॉग को 260 से ज्यादा लोग नियमित अनुसरण करते हैं.

हिंदी ब्लॉगिंग की दशा और दिशा पर पुस्तक लिख रहे चर्चित ब्लॉगर कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि, आज हिन्दी ब्लॉगिंग में हर कुछ उपलब्ध है, जो आप देखना चाहते हैं. हर ब्लॉग का अपना अलग जायका है. यहां खबरें हैं, सूचनाएं हैं, विमर्श हैं, आरोप-प्रत्यारोप हैं और हर किसी का अपना सोचने का नजरिया है. तेरह सालों के सफर में हिंदी ब्लागिंग ने एक लम्बा मुकाम तय किया है. आज हर आयु-वर्ग के लोग इसमें सक्रिय हैं, शर्त सिर्फ इतनी है कि की-बोर्ड पर अंगुलियां चलाने का हुनर हो.

प्रस्तुतिः कृष्ण कुमार यादव, जोधपुर

संस्कृति

सिंहस्थ महाकुंभ 2016 उज्जैन

(संक्षिप्त विवेचन)

डॉ. प्रभु चौधरी

भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश में क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जैन (विजय की नगरी) स्थित है. यह भारत के पवित्रतम शहरों तथा मोक्ष प्राप्त करने के लिए पौराणिक मान्यता प्राप्त सात पवित्रा या सप्त पुरियों (मोक्ष की नगरी) में से एक माना जाता है. मोक्षदायिनी अन्य पुरियां (नगर) है- अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी (वाराणसी), कांचीपुरम् और द्वारका. पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव ने उज्जैन में ही दानव त्रिपुर का वध किया था. 22 अप्रैल से 21 मई 2016 के बीच उज्जैन के प्राचीन और ऐतिहासिक शहर में कुंभ आयोजन शुरू होंगे. सिंहस्थ कुंभ उज्जैन का महान स्नान पर्व है. यह पर्व बारह वर्षों के अंतराल से मनाया जाता है. जब बृहस्पति सिंह राशि में होता है, उस समय सिंहस्थ कुंभ का पर्व मनाया जाता है.

पवित्रा क्षिप्रा नदी में पुण्य स्नान का महात्म्य चैत्र मास की पूर्णिमा से प्रारंभ हो जाता है और वैशाख मास की पूर्णिमा के अंतिम स्नान तक भिन्न-भिन्न तिथियों में सम्पन्न होता है. उज्जैन के प्रसिद्ध कुंभ महापर्व के लिए पारम्परिक रूप से दस योग महत्वपूर्ण माने जाते हैं.

पूरे देश में चार स्थानों पर कुंभ का आयोजन किया जाता है- प्रयाग, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन. उज्जैन में लगने वाले कुंभ मेलों को सिंहस्थ के नाम से पुकारा जाता है. जब मेष राशि में सूर्य और सिंह राशि में गुरू आ जाता है, तब उस समय उज्जैन में महाकुंभ मेले का आयोजन किया जाता है, जिसे सिंहस्थ के नाम से देशभर में कहा जाता है.

सिंहस्थ महाकुंभ के आयोजन की प्राचीन परम्परा है. इसके आयोजन के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. समुद्र मंथन में प्राप्त अमृत की बूंदें छलकते समय जिन राशियों में सूर्य, चंद्र, गुरू की स्थिति के विशिष्ट योग होते हैं, वहीं कुंभ पर्व का इन राशियों में गृहों के संयोग पर ही आयोजन किया जाता है. अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, गुरू और चंद्रमा के विशेष प्रयत्न रहे थे. इसी कारण इन ग्रहों का विशेष महत्व रहता है और इन्हीं गृहों की उन विशिष्ट स्थितियों में कुंभ का पर्व मनाने की परंपरा चली आ

रही है.

प्रत्येक स्थान पर बाहर वर्षों का क्रम एक समान है अमृत-कुंभ के लिए स्वर्ग की गणना से बारह दिन तक संघर्ष हुआ था जो धरती के लोगों के लिए बारह वर्ष होते हैं. उज्जैन के पर्व के लिए सिंह राशि पर बृहस्पति, मेष में सूर्य, तुला राशि का चंद्र आदि ग्रह योग माने जाते हैं.

महान सांस्कृतिक परम्पराओं के साथ-साथ उज्जैन की गणना पवित्रा सप्तपुरियों में की जाती है. महाकालेश्वर मंदिर और पाावन क्षिप्रा ने युगों-युगों से असंख्य लोगों को उज्जैन यात्रा के लिए आकर्षित किया. सिंहस्थ महापर्व पर लाखों की संख्या में तीर्थ यात्री और भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के साधु-संत पूरे भारत का एक संक्षिप्त रूप उज्जैन में स्थापित कर देते हैं, जिसे देखकर सहज ही यह जाना जा सकता है कि यह महान राष्ट्र किन अदृश्य प्रेरणाओं की शक्ति से एक सूत्र में बंधा हुआ है.

उज्जैन धार्मिक आस्थाओं और परंपरा के सम्मेलन का एक अनूठा शहर जो कि न केवल अपितु समस्त संसार की धार्मिक आस्थाओं का केन्द्र कहा जा सकता है. यह वह पवित्र नगरी है जहां 84 महादेव, सात सागर, 9 नारायण, शक्तिपीठ के साथ विश्व में 12 ज्योतिर्लिंग में से एक राजाधिराज महाकालेश्वर विराजमान हैं. यह वह पावन नगरी है जिसमें गीता जैसे महान् ग्रंथ के उद्घोषक श्रीकृष्ण स्वयं शिक्षा लेने आए. अपने पैरों की धूल से पाषाणों को भी जीवित कर देने वाले प्रभु श्रीराम स्वयं अपने पिता का तर्पण करने क्षिप्रा तट पर आए. यही वह स्थान है जो कि रामघाट कहलाता है. इस प्रकार विश्व के एकमात्र राजा जिसने कि संपूर्ण भारतवर्ष के प्रत्येक नागरिक को कर्ज मुक्त दिया. वह महान् शासक विक्रमादित्य उज्जैन की ही पावन भूमि पर जन्म पावन सलिला मुक्तिदायिनी मां क्षिप्रा यही पर प्रवाहित होती है एवं विश्व का सबसे बड़ा महापर्व महाकुंभ/सिंहस्थ मेला विश्व के विभिन्न स्थान में से एक उज्जैन नगर में लगता है. इस नगरी का महात्म्य वर्णन करना उतना ही कठिन है जितना कि आकाश में तारागणों की गिनती करना.

विद्वानों के अनुसार सिंह राशि पर बृहस्पति के होने तथा मेष राशि पर सूर्य के होने पर सिंहस्थ होता है. स्कन्द पुराण के अनुसारः-

सिंह राशि गते जीवे मेष स्थेच दिवाकरे तुला राशि गतश्चन्द्रे स्वाति नक्षत्रा संयुते. सिद्धि योगे समायाते पंचात्मा योग कारका एवं योगे समायाते स्नान दाना दिका क्रिया...

एक दूसरा उदाहरण है-

मेष राशिगते सूर्ये सिंह राश्यां बृहस्पतौ।

अवन्तिकायां भवेत्कुंभः सदा मुक्ति प्रदायकः।।

उज्जैन का सिंहस्थ पर्व में स्नान का विशेष महत्व है, इसका कारण है दस योग जैसे- (1) वैशाख पक्ष (2) शुक्ल पक्ष (3) पूर्णिमा (4) मेष राशि पर सूर्य का होना (5) सिंह राशि पर बृहस्पति का होना (6) चन्द्र का तुला राशि पर होना (7) स्वाति नक्षत्र (8) व्यतिपात योग (9) सोमवार (10) स्थान उज्जैन. श्री देशमुख के अनुसार उज्जैन में सिंहस्थ स्नान के उक्त दस कारण हैं.

विष्णु पुराण, श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार समुद्र मन्थन के समय धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए. देव-दानव के संघर्ष में यह अमृत चार स्थानों पर गिरा- हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन.

उज्जैन का महत्व अन्य तीर्थों से तिलभर अधिक माना जाता है. स्कन्द पुराण के आवन्त्य खण्ड में अवन्ती अर्थात् उज्जैन का विस्तृत वर्णन है. श्री महाकालेश्वर जहां स्थित हैं उस स्थान को महाकाल वन कहते हैं. कुरूक्षेत्र तीनों लोकों में उत्तम कहा जाता है. कुरूक्षेत्र से दस गुना पुण्यमयी काशीपुरी मानी गयी है और काशी से भी दस गुना महाकाल वन है. इस वन में भगवान महाकाल का निवास है. भगवान महाकाल के पीछे रुद्र सरोवर जहां कभी कमल खिलते थे. भगवान महाकाल बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं. दूसरे किनारे पर देवी हरसिद्धि का निवास है. बावन शक्तिपीठों में एक देवी हरसिद्धि है. देवी के ठीक पीछे पतित पावनी क्षिप्रा नदी बहती है. स्कन्ध पुराण के अनुसार वैकुण्ठ में इसका नाम क्षिप्रा है. देवलोक में ज्वरघ्नी यम द्वार में पापघ्नी पाताल में अमृत सम्भवा के नाम से प्रसिद्ध है. यह नदी साक्षात् कामधेनु से प्रकट हुई है और भगवान वराह के शरीर से उत्पन्न हुई है. वैशाख मास में क्षिप्रा नदी में स्नान का विशेष महत्व है. बारह वर्ष में सिंहस्थ पर्व वैशाख मास में ही आता है. उज्जैन मंदिरों की नगरी है.

सिंहस्थ महापर्व धार्मिक व आध्यात्मिक चेतना का महापर्व है. धार्मिक जागृति द्वारा मानवता, त्याग, सेवा, उपकार, प्रेम, सदाचरण, अनुशासन, अहिंसा, सत्संग, भक्ति-भाव अध्ययन-चिंतन परम शक्ति में विश्वास और सन्मार्ग आदि आदर्श गुणों को स्थापित करने वाला पर्व है. हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन की पावन सरिताओं के तट पर कुंभ महापर्व में भारतवासियों की आत्मा, आस्था, विश्वास और संस्कृति का शंखनाद करती है. उज्जैन और नासिक का कुंभ मनाये जाने के कारण सिंहस्थ कहलाते हैं. बारह वर्ष बाद फिर आने वाले कुंभ के माध्यम से उज्जैन के क्षिप्रा तट पर एक लघु भारत उभरता है.

‘कुंभा नभति नान्यथा’

विशिष्ट योग में सूर्य, चन्द्र एवं गुरू की स्थिति से हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में ज्योतिष के मान से ग्रहों की स्थिति के अनुसार कुंभ पर्व माने जाने का उल्लेख विष्णु पुराण में भी मिलता है. उज्जैन में सिंहस्थ महापर्व के संदर्भ में सिंहस्थ महात्म्य में इस प्रकार का प्रमाण मिलता है.

कुशस्थली तीर्थवरम देवानामपिदुर्लभ में

माधवे धवले पक्षे सिंहे जीवेत्वजे रवौं

तुला राशौ निशाना थे स्वतिभे पूर्णिमा

तीर्थों व्यतिपाते तु संप्राप्ते चन्द्रवासरसमयतें

एतेन दश महायोगा+स्नानामुक्तिः फलप्रदों

(1) अवन्तिका नगरी (2) वैशाख मास (3) शुक्ल पक्ष (4) सिंह राशि में गुरू (5) तुला राशि में चन्द्र (6) स्वाति नक्षत्र (7) पूर्णिमा तिथि (8) व्यातिपात (9) सोमवार आदि ये दस पुण्य प्रद योग होने पर क्षिप्रा नदी में सिंहस्थ पर्व में स्नान करने पर मोक्ष प्राप्ति होती है.

गऊघाट से लेकर मंगलनाथ तक विशाल घाटों की श्रृंखला, अनेक नये सेतु, रामघाट पर लाल पत्थर, नई-नई सड़कें, चौड़े मार्ग, प्रकाश की उत्तम व्यवस्था, क्षिप्रा-नर्मदा लिंक योजना, मंगलनाथ, महाकालेश्वर, रुद्र सागर, त्रिवेणी आदि का जीर्णोद्धार आदि अनेक योजनाओं पर कार्य हुए हैं और हो रहे हैं. केन्द्र एवं मध्यप्रदेश शासन ने दिल खोलकर पैसा खर्च किया है. उज्जैन का यह सिंहस्थ पर्व आश्चर्यजनक एवं अद्भुत आयोजन है.

सम्पर्कः 15, स्टेशन मार्ग, महिदपुर रोड, उज्जैन (म.प्र.)

‘पत्रकारिता तब ‘मिशन’ थी, अब एक संजीदा सवाल

डॉ. मधुर नज्मी

मयवेत्ता, युगचेता कबीर की साखी की यह पंक्ति ‘हम घर जास्या आपणां, लिया मुराड़ा हाथ’ उन पर भी लागू होती है जो पत्रकारिता को ‘मिशन’ पवित्र धर्म समझते हैं. प्रजातांत्रिक समय में पत्रकारिता के नैतिक मूल्य परिवर्तित और परिवर्धित हुए हैं. इसी का परिणाम है ‘पीत पत्रकारिता’ अथवा ‘ब्लैकमेलिंग’ वाया पत्रकारिता. तकरीबन चालीस साल पहले प्रेस लगाना लाभप्रद व्यवसाय था. छपायी से माकूल आमदनी न होने पर प्रेस का मालिक 4 या 8 पृष्ठीय स्थानीय समाचार-पत्र निकालना प्रारंभ कर देता था जो आय-वृद्धि का अचूक निशाना-नुस्खा साबित होता था. एक पुरानी घटना का उल्लेख करना एतद् संदर्भ में मुनासिब समझता हूं. रामजी लाल एक सज्जन ने इधर-उधर से कर्ज लेकर, जुगाड़ से एक प्रिटिंग प्रेस खोला, लेकिन नगर में पहले से नामी-गरामी प्रेस थे. छपाई से प्रेस का खर्च और रोटी-दाल खटाई में पढ़ते देखकर रामजी लाल ने 4 पृष्ठीय साप्ताहिक पत्र ‘विस्फोट’ का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया जिसमें किसी न किसी सरकारी दफ्तर के रिश्वतखोर कर्मचारी और राशन-सीमेण्ट आदि को ब्लैक से बेचने वाले व्यापारी को ‘टारगेट’ बनाया जाता और पत्र में ‘सेंसेशनल हेडिंग’ होती थी ‘पेट्रोल में मिलावट’. मेरे मित्र ने जर जुगाड़ करके सीमेण्ट की एजेंसी ली थी. सीमेण्ट उन दिनों किल्लत के कारण आपूर्ति अधिकारी द्वारा निर्गत ‘परमिट’ से मिलती थी या फिर ब्लैक से. सीमेण्ट तीस प्रतिशत परमिट से और सत्तर प्रतिशत ब्लैक से बिकती थी. मैं उनकी दुकान में बैठा चाय-पान और गपशप कर रहा था. वो मेरे बचपन के मित्र थे. अचानक ‘विस्फोट’ का रोल किया, पिछला अंक हाथ में दबाए, ढीला खद्दर का पाजामा और घुटने तक का जामा कुर्त्ता, पांवों में ‘टायर सोल’ की चप्पलें पहने रामजी लाल दुकान में हाजिर हुए. मुझको और लाला को राम-राम करके खाली कुर्सी पर बैठ गये. थोड़ी देर बाद लाला से बोले, ‘‘बिन्देश्वरी जी! मेरे पास बड़ी शिकायतें आ रही हैं कि आप सीमेण्ट ब्लैक में बेच रहे हैं. कहो तो आगामी अंक में तुम्हारा नम्बर लगा दूं?’’ लाला, तैश में आकर गाली देने लगे. कहा ‘‘चल निकल दुकान से. तू कल्लू कुजड़े का लौंडा जो सब्जी बेचता था, मुझे धमका रहा है. अब हरामखोर सीमेण्ट ब्लैक कर रहा हूं तो चोरी-छिपे थोड़ा ही कर रहा हूं. सरे-आम डंके की चोट पर कर रहा हं. सबका हिस्सा समय से ऊपर पहुंच रहा है.’’ रामजी लाल खिसियानी हंसी-हंसते हुए मिन्नते हुए कहा, ‘‘अरे चाचा जी! आप बुरा मान गये, आप तो घर के आदमी हैं, लाओ दस रुपये तो दे दो.’’ लाला ने हंसकर उसे दो का लाल नोट थमाते हुए कहा जा, ‘‘अठन्नी का बीड़ी का बण्डल ले ले और अठन्नी की मलाईदार दाय पी ले और एक रुपये में बच्चों के लिए कोई चीज ले लो. शनीचर को आ जाया कर, दो रुपये तेरे भी सही. रामजी लाला ने दो रुपये की नोट जेब में रख ली और खुश-ब-खुश दुकान से निकल लिए.’’

‘पीत पत्रकारिता’ आज भी अपने तेवर में जिन्दा है. सिर्फ ‘मीडिया’ ‘मीडियम और स्टैर्ण्ड’ तब्दील हुआ है. खुफिया कैमरे से, रिश्वतखोर अधिकारी, अय्याश नेता, नम्बर दो के व्यापारी का ‘स्टिंग ऑपरेशन करो, फोटो दिखाओ, मोटी रकम मांगो, फिर औने-पौने में सौदा पटा लो, नहीं तो किसी टी.वी. चैनल पर दिखा दो.’ आजादी के बाद जब राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक नैतिक मूल्य बदल गये तो पत्रकारिता इसका असर कैसे नहीं पड़ता?

आजादी से पूर्व पत्रकारिता एक ‘पायस मिशन’ के रूप में थी. अत्याचारी ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों का खुल्लम खुल्ला कलम के तलवार से साहसपूर्ण विरोध और जनता में क्रान्ति और विद्रोह का जज्बा जगाना, जनता को अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध संगठित करना, पत्रकारों और पत्र संपादकों का अभीष्ट था. संपादकों और पत्रकारों के लिये ही संदर्भित कबीर की ‘साखी’ का शीर्षक सार्थक सिद्ध होता है. जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी कहते हैं, ‘‘पुराने जमाने में जब भारत स्वतंत्र नहीं हुआ था, हिन्दी के पत्रों में जन-भावना प्रखरता के साथ प्रकट होती थी...परन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता की व्यवस्था ऐसी है कि उसमें एक ही अहंकार लिए जाता है कि मेरी कोठी कितनी बड़ी है, मेरी कार कितनी लम्बी है, मेरा वेतन कितना है आदि-आदि और इसके लिये जो मालिकों के मालिक हैं, उन्हें खुश रखां, उनकी खुशामद करो क्योंकि उसी से धन प्राप्त होगा, पद प्राप्त होगा, प्राप्त होगा तो बना रहेगा. शेष सब अनित्य है, उसकी चिन्ता मत करो (उत्तर प्रदेश पत्रिका मार्च अप्रैल 1976 ..61) 1907 से 1910 तक इलाहाबाद से ‘स्वराज’ हिन्दी साप्ताहिक प्रकाशित हुआ. ढाई वर्षों में मात्र 75 अंक प्रकाशित हुए वह भी विभिन्न संपादकों के अधीन पत्र की स्थापना रायजादा शान्ति नारायण भटनागर ने की थी. एक शासन-विरोधी कविता लिखने के अपराध में पकड़े गये. साढ़े तीन वर्ष का सश्रम कारावास तथा एक हजार रु. जुर्माने का दण्ड दिया गया. नया प्रेस स्थापित होने पर इंग्लैण्ड से लौटे होती लाल वर्मा ‘स्वराज’ के संपादक बने. वर्मा ‘स्वराज’ के कुछ ही अंक सम्पादित कर पाये थे एक संपादकीय के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें दस साल की सजा दी गयी. उनके बाद बाबू लाल हरि संपादक बने. किंतु 11 अंकों के प्रकाशन के बाद उन पर भी ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया और उन्हें इक्कीस वर्ष की देश निकालने की सजा दी गयी. लाहौर से प्रकाशित होने वाले एक पत्र के निर्भीक संपादक रामसेवक, ‘स्वराज’ का संपादन करने तुरन्त इलाहाबाद पहुंचे. पत्र का ‘डिक्लेरेशन’ जमा करते समय उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. तत्कालीन कलेक्टर ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा, ‘‘अब कौन शहजादा है जो इस मुगल सिंहासन पर बैठेगा. उसके यह कहने पर नन्द गोपाल ‘डिक्लेरेशन’ लेकर आगे आये और-उन्होंने ‘डिक्लेरेशन’ दााखिल किया और ‘स्वराज’ पुनः प्रकाशित होने लगा. पत्र के मात्र 12 अंक ही निकले थे कि वह भी गिरफ्तार कर लिये गये और उन्हें 30 वर्षों का देश निकाला दे दिया गया. पत्र के संपादक के लिये ‘मुगल सिंहासन’ पर बैठने के लिए होड़ लगी थी. पत्रकारिता के मैदान में कुर्बान होने वाले इस जज्बे को सलाम. न्याय मूर्ति आनन्द नारायण मुल्ला का निस्वार्थ शेर ऐसे कलाकारों को सलाम करता है जो देश की आजादी के लिये शहीद होने का जज्बा रखते थे-

‘‘खून-शहीद से भी है कीमत में कुछ सेरा-

फनकार के कलम की सिपाही की एक बूंद’’

नन्द गोपाल के बाद सम्पादक का महा-दायित्व संभाला जड्डाराम कपूर ने. वह दक्षिण-पूर्वी एशिया से धन कमाकर इलाहाबाद लौटे थे. परिवार के लोगों ने समझा कि अब वह सुविधाओं से सम्पन्न-जीवन-सुख चैन से व्यतीत करेंगे. लड्डाराम के पूर्व जितने संपादक थे, कुंवारे थे और पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त थे. जड्डाराम विवाहित थे. संपादक बनने पर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था, ‘‘मैं तुम्हें तहे-दिल से प्यार करता हूं लेकिन देश से जितना प्यार करता हूं उस प्यार से तुम्हारे प्यार का कोई मुकाबला नहीं.’’ जड्डाराम कपूर को ‘स्वराज’ के संपादक के नाते 30 वर्ष की सजा हुई और उन्हें यह सजा काटनी थी अंडमान की काल कोठी में. कपूर साहिब ने शहादत का वही जज्बा था जो आगे चलकर भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद जैसे क्रांन्तिकारियों की रगों में था. उन्होंने जेलर के सामने सर झुकाने से मना कर दिया. इसके लिये छह महीने उनकी सजा बढ़ा दी गयी. उन्हें अमानुषिक यातनाएं दी गयीं.

आठवीं बार संपादक बने पण्डित अमीर चन्द बंबवाल. वह ‘स्वराज’ के आखिरी सम्पादक थे. उन्हें ‘डिक्लेरेशन’ के साथ दो हजार की धन-राशि जमा करने को कहा गया. 1910 में यह पुनः प्रकाशित हुआ, किन्तु 4 अंकों के बाद इसकी जमानत जब्त कर ली गयी. पण्डित अमीर चन्द जी को भी गिरफ्तार कर लिया गया. श्री पुरुषोत्तम दास टंडन उनके वकील थे. उनकी जोरदार पैरवी के चलते उन्हें मात्र एक साल की सजा दी गयी. उनकी गिरफ्तारी का वारंट निकला. किन्तु वे फरार हो गये. 1910 में एक प्रदर्शन देखते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें भी लम्बी सजा दी गयी. इसके बाद ‘स्वराज’ पुनः प्रकाशित न हो सका.

‘पत्रकारिता’ से जुड़ी ये स्थितियां आज के पत्रकारों और पत्रकारिता से मुखातिब हैं. आज के संपादक संवर्ग को उन स्थितियों का भी आकलन-मूल्यांकन विवेक के स्तर पर करके पत्रकारिता के मिशनरी भाव को विचार में रखकर लेखन और पत्रकारिता की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिये. ‘स्वराज’ में संपादक पद हेतु एक विज्ञापन उस समय निकला था. ‘‘स्वराज अखबार के लिये एक संपादक चाहिये, जिसे दो सूखी रोटियां एक गिलास पानी और हर सम्पादकीय लेख पर 10 साल की सजा मिलेगी.’’ इस शर्त पर भी ‘स्वराज’ के लिये जान-माल कुर्बान करने वाले शहीद किस्म के क्रान्तिकारी संपादक मिलते रहे. क्या बदली परिस्थिति में भी ‘स्वराज’ जैसा पत्र और पत्रकारिता का जज्बा कहीं है? उत्तर सिर्फ नहीं में ही है. ऐसे में एक अज्ञात शायर का शेर याद आता है जो कलमकारों की वैचारिक अस्मिता की भी स्वरित करता हैः

‘लिये फिरती है बुलबुल चोंच में गुल-

शहीदे-नाज की तुर्बत कहां है?’

 

सम्पर्कः ‘काव्यमुखी साहित्य-अकादमी’

गोहना मुहम्मदाबाद, जिला-मऊ (उ.प्र.)-276403

मोः 9369973494

आलेख

भूमण्डलीकरण के द्वन्द्व में पिसती ग्रामीण अर्थव्यवस्था

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राम शिव मूर्ति यादव

‘गरीबी बनाम अमीरी’ एवं ग्रामीण बनाम शहरी की बहस बड़ी पुरानी है. सभ्यता के आरम्भ में यह गैप उतना नहीं होगा, जितना समकालीन समाज में. कार्ल मार्क्स ने भी वर्ग-संघर्ष की अपनी परिभाषा प्रभु और सर्वहारा वर्ग या शोशक और शोशित के आधार पर ही दी. भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत हजारों वर्ष से गांवों का देश रहा है. ग्राम्य व्यवस्था व राज्य व्यवस्था का यहां अद्भुत तादातम्य देखने को मिलता है. भारतीय ग्राम्य व्यवस्था पर कभी राजनीति हावी नहीं रही, इसलिए वह स्वायत्त रूप से चलती रही है. वक्त के साथ अनेक थपेड़ों ने भारतीय संस्कृति पर हमला किया पर ग्राम्य व्यवस्था ने हजारों वर्षों से इस संस्कृति की रक्षा की. तभी तो भाश ने अपनी कविता में लिखा कि भारत नाम दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम पर नहीं बल्कि उन भूमिपुत्रों के नाम पर पड़ा है, जो आज भी सूरज की परछाइयों से समय मापते हैं. शहरों का विकास भी ग्राम्य व्यवस्था के फलने-फूलने पर ही हुआ पर ही हुआ पर आजादी पश्चात गांव व शहर के बीच का अन्तराल बढ़ता गया. गांवों की कीमत पर शहर फलने-फूलने लगे और नतीजन गांव गरीबों का जमावड़ा हो गया और शहर अमीरों का. इसी के साथ ‘इण्डिया’ बनाम भारत का मुहावरा चल निकला.

हमारा देश प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर है और हमारे युवा मानव संसाधन के क्षेत्र में अमेरिका-ब्रिटेन जैसे विकसित देशों तक अपनी सफलता की पताका फहरा रहे हैं, फिर भी आम आदमी उपेक्षित हैं. गांवों के कल्याण के लिए तमाम योजनाएं बनाई गई, पर राजनैतिक-प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में वे अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सकीं. 1962 में लोकसभा में गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ सिंह गहमरी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में व्याप्त गरीबी की दास्तान सुनाते हुए कहा कि वहां गरीब गोबर से अनाज का दाना निकाल कर खाने को मजबूर हैं, नेहरू की आंखें भी छलक आयी थीं. शायद इसी विडम्बना पर कविवर धूमिल ने लिखा था-‘‘भाषा में भदेस हूं, कायर इतना कि उत्तर प्रदेश हूं.’’ प्रधानमंत्री रहते हुए राजीव गांधी ने भी स्वीकारा था कि केंद्र से भेजे गए एक रुपए में से मात्र 10 पैसा ही अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है. स्पष्ट है कि सारा धन भ्रष्टाचार के नाले में जा रहा है. आजादी पश्चात सरकारों की प्राथमिकता में शहरों का ही विकास रहा. गांवों की कीमत पर शहरों को हर तरह की सुख-सुविधाओं से भरपूर करना एक तरह का आन्तरिक उपनिवेशवाद ही कहा जायेगा, जिसने तमाम समस्याओं को जन्म दिया. भूमण्डलीकरण के बहाने तमाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियां गांवों तक पहुंच रही हैं और परम्परागत कृषि व्यवस्था पर चोट कर रही हैं. जो किसान अपनी आजीविका के लिए कृषि कार्य करता था, उसे परम्परागत खेती छोड़कर बागवानी और अन्य नकदी फसलों की खेती करने के लिए लालच दिया जा रहा है. दूसरों के लिए ठेके पर खेती की इस प्रवृत्ति को बढ़ाने के कारण गेहूं की पैदावार लक्ष्य से पीछे खिसकने लगी और नतीजन विदेशों से गेहूं का आयात हो रहा है. किसानों को अपनी मनपसन्द फसल उगाने की बजाय रिटेल स्टोरों में बेचने के लिए उत्पाद पैदा करने को कहा जा रहा है. लहलहाती फसल चौपट हो जाती है तो किसानों की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता. विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर कम दामों में किसानों की जमीन लेकर एक तरह से उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया जा राह है. स्पष्ट है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए किसान नागरिक नहीं उपभोक्ता है.

भूमण्डलीकरण के इस दौर में ‘कल्याणकारी राज्य’ की अवधारणा गौण होती गई. गांवों में बसने वाले किसानों, मजदूरों शिल्पकारों को सरकार ने उनके भाग्य पर छोड़ दिया. बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी के बीच जैसे-जैसे अमीरी-गरीबी का फासला बढ़ता गया, वैसे किसानों की आत्महत्या, भुखमरी से मौत और सामाजिक विषमता जैसी प्रवृत्तियां बढ़ती गई. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो देश में वर्ष 2002 तक औसतन हर 30 मिनट में एक किसान ने आत्महत्या की. वर्ष 2005 में 17131, वर्ष 2006 में 17060 तो 1997 से 2006 के बीच कुल 78737 किसानों ने आत्महत्या की. तस्वीर का सबसे दुखद पहले तो यह है कि ज्यादातर आत्महत्या करने वाले किसान समृद्ध प्रान्तों के हैं. अकेले महाराष्ट्र ने वर्ष 1995 से अब तक 36428 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. विकास मंत्रालय की ही एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग दो करोड़ लोग जमीन से बेदखल किये जा चुके हैं और इनमें से मात्र 54 लाख लोगों को ही पुर्नस्थापित किया गया है. ‘स्पेशल इकॉनामिक जोन’ किस प्रकार ‘स्पेशल एलिमिनेशन जोन’ में तब्दील हो रहे हैं, वह महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेष, कर्नाटक, मध्यप्रदेष और छत्तीसगढ़ जैसे ‘सेज’ राज्यों में किसानों की आत्महत्या में 6.2 फीसदी की वृद्धि स्वयमेव दर्शाती है.

सबसे बड़ा अन्तर्विरोध तो यह है कि सरकार आर्थिक समृद्धि के गीत गा रही है जबकि देश का एक बड़ा तबका इस समृद्धि से कोसों दूर है. सबको विकास की एक ही लाठी से हांकने के कारण जो अमीर हैं वे अमीर हो रहे हैं, और गरीब दिनों-ब-दिन गरीब हो रहा है. आधुनिक परिवेश में आर्थिक विकास की बात करने पर भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का चित्र दिमाग में आता है. संसद ले लेकर सड़कों तक जी.डी.पी. व शेयर-सेंसेक्स के बहाने आर्थिक विकास की धूम मची है और मीडिया भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है. जिस देश के संविधान में लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना की गई हो, वहां सामाजिक विकास की बात गौण हो गई है. सरकार यह भूल रही हे कि पूंजीवाद, समाजवाद या अन्य कोई वाद मात्र साधन है, साध्य नहीं. साध्य तो समग्र समाज के विकास में निहित है, न कि एक सीमित भाग के विकास में. यहां तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ. अमर्त्य सेन ने भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में इंगित किया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवाज जैसी आधारभूत सामाजिक आवश्यकताओं के अभाव में उदारीकरण का कोई अर्थ नहीं है...आर्थिक विकास में जहां पूजीपतियों, उद्योगपतियों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों अर्थात राष्ट्र के मुट्ठी पर लोगों को लाभ होता है, वहीं भारत का बहुसंख्यक वर्ग इससे वंचित रह जाता है या नगण्य लाभ ही उठा पाता है. इस प्रकार ट्रिंकल डाउन का सिद्धान्त फेल हो जाता है. अतः सामाजिक विकास जो कि बहुसंख्यक वर्ग की आधारभूत आवश्यकताओं के पूरी होने पर निर्भर हैं, के अभाव में राष्ट्र का समग्र और बहुमुखी विकास संभव नहीं है. एक तरफ गरीब व्यक्ति अपनी गरीबी से परेशान है तो दूसरी तरफ देश में करोड़पतियों-अरबपतियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है. तमाम कम्पनियों पर करोड़ों रुपये से अधिक का आयकर बकाया है तो इन्हीं पूंजीपतियों पर बैंकों का भी करोड़ों रुपये शेष हैं. डॉ. अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्री ने स्पष्ट इंगित किया है कि समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि समान वितरण की है. आर्थिक विकास में पूंजी और संसाधनों का केंन्द्रीकरण होता है जो कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के खिलाफ है. फिर भी तमाम सरकारें सामाजिक विकास के मार्ग में अवरोध पैदा करती रहती है. जिस देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या नगरीय सुविधाओं से दूर हो, एक तिहाई जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे हो, लगभग 35 प्रतिशत जनसंख्या अशिक्षित हो, जहां गरीबी के चलते करोड़ों बच्चे खेलने-कूदने की उम्र में बालश्रम में झोंक दिये जाते हों, जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में हर साल हजारों किसान फसल चौपट होने पर आत्महत्या कर लेते हों, जहां बेरोजगारी सुरक्षा की तरह मुंह बाये खड़ी हो- वहां शिक्षा को मंहगा किया जा रहा है, सार्वजनिक संस्थानों को औने-पौने दामों में बेचकर निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, सरकारी नौकरियां खत्म की जा रही हैं, सब्सिडी दिनों-ब-दिन घटायी जा रही है, निश्चिततः यह राष्ट्र के विकास के लिए शुभ संकेत नहीं है.

सरकार द्वारा जारी नेशनल सैम्पल सर्वे आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट पर गौर करें तो शहरी बनाम ग्रामीण का द्वन्द खुलकर सामने आता है. इसके अनुसार अभी भी ग्रामीण आबादी का पांचवां हिस्सा (लगभग 14 करोड़) मात्र 12 रुपये रोजाना में जीवन जीने को अभिशप्त हैं. 10 फीसदी ग्रामीणों के पास अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए सालाना 365 रुपये भी नहीं जुड़ते. गांवों का पाचवां हिस्सा मिट्टी से बनी दीवारों और छतों के नीचे रहने को विवश हैं तो 31 फीसदी ग्रामीण बमुश्किल छत या दीवार में से किसी एक को पक्का करने का इन्तजाम कर पायें हैं. उत्पादकता के बावजूद गांव वाले 251-400 रुपये में भोजन का काम चला रहे हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में भोजन पर 451-500 रुपये मासिक खर्च किये जा रहे हैं. इससे बड़ी विसंगति और क्या हो सकती है कि ग्रामीणों की आय का

आधा से ज्यादा हिस्सा अर्थात 1 रुपये में 53 पैसे भोजन जुटाने पर खर्च हो रहा है जबकि शहरी बाबू लोग कमाई अधिक होने के बावजूद मात्र 40 पैसे खर्च कर रहे हैं. सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करे और ग्रामीणों के नाम पर सब्सिडी जारी करे, पर असलियत कुछ और ही है. तमाम सब्सिडी के बावजूद रसोई गैस मात्र 9 फीसदी ग्रामीणों के नसीब में हैं, तीन चौथाई ग्रामीण आबादी अभी भी गोबर व सूखी लकड़ी पर निर्भर है. 42 फीसदी ग्रामीण बिजली पर सब्सिडी के बावजूद अंधेरा दूर करने हेतु केरोसिन पर निर्भर हैं. शहरी बनाम ग्रामीण का सबसे ज्वलंत उदाहरण उनकी व्यय शक्ति है. शहरी भारत जहां हर माह 1171 रुपये खर्च कर रहा है. वहीं ग्रामीण भारत मात्र 625 रुपये. यह स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती. ऐसे में आर्थिक विकास के साथ-साथ आर्थिक विषमता की चौड़ी होती खाई को भी पाटना जरूरी है क्योंकि करोड़ों लोगों को फटेहाल रख कर राष्ट्र की समृद्धि का सपना नहीं देखा जा सकता. राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ सर्वेक्षण के आंकड़े गवाह हैं कि दुनिया की सबसे विशाल खेती व राशन प्रणाली की इतनी मजबूत व्यवस्था होने के बावजूद आज देश में 53 फीसदी वयस्क और तीन वर्ष से कम उम्र के 46 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. हालात यह है कि नेपाल, बांगलादेश व अफ्रीकी राष्ट्र भी इस मामले में हम से बेहतर हैं. एक तरफ इस बात पर जश्न कि भारत के मुम्बई स्टाक एक्सचेंज व नेशनल स्टाक एक्सचेंज दुनिया के शीर्श बारह शेयर बाजारों में शुमार हो चुके हैं, और वर्ष 2007 में भारत में करोड़पतियों की संख्या बीते वर्ष के एक लाख से बढ़कर 1,23,000 हो गई हैं, जो कि दुनिया में सर्वाधिक वृद्धि है, दूसरी तरफ उपरोक्त दर्शायी गई स्थिति स्वयमेव भूमण्डलीकरण व उदारीकरण के अन्तर्द्वन्द को स्पष्ट कर रही है. स्वतंत्रता की स्वर्णजयंती की पूर्व संध्या पर अपने उद्बोधन में तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायण के शब्द हमें समाज का चेहरा दिखाते हैं- ‘‘उदारीकरण से उपजी विषमता यूं ही बढ़ती रही और धन का अश्लील प्रदर्शन जारी रहा तो समाज में सिर्फ अशांति फैलेगी. उथल-पुथल की इस आंधी में सिर्फ गरीब की झोपड़ी ही नहीं उड़ेगी, अमीरों की आलीशान कोठियां भी उजड़ जाएंगी.’’

अमेरिका के चर्चित विचारक नोम चोमस्की ने भी हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में भारत में बढ़ते द्वन्द पर खुलकर चर्चा की है. चोमस्की का स्पष्ट मानना है कि भारत में जिस प्रकार के विकास से आर्थिक दर में वृद्धि हुयी है, उसका भारत की अधिकांश जनसंख्या से कोई सीधा वास्ता नहीं दिखता. यही कारण है कि भारत सकल घरेलू उत्पाद के मामले में जहां पूरे विश्व में चतुर्थ स्थान पर है, वहीं मानव विकास के अन्तर्राष्ट्रीय मानदण्डों मलसन, दीर्घायु और स्वस्थ जीवन, शिक्षा, जीवन स्तर इत्यादि के आधार पर विश्व में 126 में नम्बर पर है. आम जनता की आर्थिक स्थिति पर गौर करें तो भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के 54 सर्वधिक गरीब देशों में गिना जाता है. संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट की मानें तो जैसे-जैसे भारत की विकास दर में वृद्धि हुयी है, वैसे-वैसे यहां मानव विकास का स्तर गिरा है. आज 0-5 वर्ष की आयुवर्ग के भारतीय बच्चों में से लगभग 50 फीसदी कुपोषित हैं तथा प्रति 1000 हजार नवजात बच्चों में 60 फीसदी से ज्यादा पहले वर्ष में ही काल-कवलित हो जाते हैं. स्पष्ट है कि ऊपरी तौर पर भारत में विकास का जो रूप दिखायी दे रहा है, उसका सुख मुट्ठी भर लोग ही उठा रहे हैं, जबकि समाज का निचला स्तर इस विकास से कोसों दूर हैं.

अब समय आ गया है कि गरीब, किसान, मजदूर, दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्गों में व्यापक चेतना तथा जागरूकता पैदा की जाय जिससे वे अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सरकारों को बाध्य कर सकें. याद कीजिए 1789 में पेरिस में हुई पहली राज्य क्रान्ति, जहां लोग राजा से रोटी मांगने के लिए 18 कि.मी. दूर वर्साय तक पहुंच गये थे. अमेरिका में अश्वेतों के लिए ऐतिहासिक मार्च कर मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1963 में सफलता अर्जित की तो भारत में गांधी जी ने जनादेश यात्राओं के दम पर अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया. इस परम्परा को समय-समय पर आजमाया गया. 2 अक्टूबर 2007 को ग्वालियर से चलकर 18 राज्यों के लगभग 27000 भूमिहीन किसानों ने जब दिल्ली में बैठे हुक्मरानों को अपनी आवाज सुनाने के लिए तीन हफ्ते 400 कि.मी. लम्बा अहिंसक मार्च करते हुए 28 अक्टूबर को दिल्ली के रामलीला ग्राउण्ड पर प्रवेश किया, तो ऐसा लगा जैसे ये अपने ही देश में बेगाने हैं. जमीन, जल और जंगल पर अपने अधिकारों की मांग कर रहे इन वंचितों के पास अपने दमन की अद्भुत दास्तान है. वस्तुतः सामन्तवादी समाज और पूंजीवादी व्यवस्था के लोकतांत्रिक मूल्यों से टकराव का दुष्परिणाम छोटे किसानों, मजदूरों, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को ही प्रायः भुगतना पड़ा है. यह इस बात का भी पारिचायक है कि 9 प्रतिशत से ज्यादा की आर्थिक विकास दर और सेसेक्स की उंचाइयों के साथ विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देखने से पहले सामन्तवादी मूल्यों में जकड़े समाज की मुक्ति का मार्ग भी ढूंढ़ना होगा. स्वयं रिजर्व बैंक के तत्कालीन गर्वनर वाई.पी. रेड्डी ने चेतावनी दी थी कि 9 प्रतिशत सालाना की विकास दर भारत के खेतिहर और गैर-खेतिहर परिवारों के बीच मौजूद विषमता को आगे बढ़ा देगी.

आज जरूरत है कि राष्ट्र की वास्तविक समस्याओं को उनके मूल परिप्रेक्ष्य में देखा जाय. ग्रामीण व शहरी वर्ग के अंतर को कम किया जाय. ग्रामीणों की कीमत पर शहरी क्षेत्र का विकास और गरीबी की कीमत पर अमीरी का जश्न तमाम आर्थिक विकास के बावजूद राष्ट्र को रसाताल में ही ले जायेगा. कभी हिन्दू विकास दर कही जाने वाली 4 प्रतिशत की भारतीय अर्थव्यवस्था आज 9 प्रतिशत पर खड़ी है पर सरकार की गलत नीतियों के चलते द्वन्द बढ़ता ही जा रहा है पर व्यवस्था के पहरुये आंख व कान बन्द कर सोये पड़े हैं. आम लोगों का उनकी जरूरतों की तरफ से ध्यान हटाने में लिए वे सदैव नाना प्रकार के स्वांग रचते रहते हैं. कभी मन्दिर-मस्जिद, कभी राष्ट्रगान, कभी साम्प्रदायिकता, कभी कश्मीर तो कभी आतंकवाद की बात उठाकर लोगों को गुमराह किया जाता है जिससे मूल मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं. जरूरत है कि सबके साथ समान व्यवहार किया जाये, सबको समान अवसर प्रदान किया जायें और जो वर्ग सदियों से दमित-शोषित रहा है उसे संविधान में प्रदत्त विशेष अवसर और अधिकार देकर आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया जाये, तभी इस देश में अमीरी-गरीबी की खाई कम होगी, इण्डिया बनाम भारत का द्वन्द खत्म होगा, सामाजिक न्याय व सामाजिक लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त होगा और भारत एक समृद्ध राष्ट्र के रूप में विश्व के मानचित्र पर अपना अग्रणी स्थान बना सकेगा.

सम्पर्कः स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी (सेवानिवृत्त)

तहबरपुर, पो-टीकापुर, आजमगढ़ (उ.प्र.)-276208

शोध आलेख

पुराख्यान तथा मिथकीय काव्यभूमि - ‘‘कनुप्रिया’’

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डॉ. सीमा शाहजी

वि धर्मवीर भारती ने पुराख्यान तथा मिथकों पर आधारित सशक्त कविताएं और काव्य प्रबंध लिखे हैं. उन्होंने पुराख्यानों और मिथकों पर जहां बहुत ही सामयिक यथार्थ और युगोचित रूप में प्रयोग किया है, वहीं उसके कोमल रूप को भी दर्शाया है. कवि ने कृष्ण काव्य परम्परा का निर्वाह करते हुए ‘‘कनुप्रिया’’ के माध्यम से युगीन संदर्भों का विश्लेषण प्रस्तुत किया है. परम्परित राधा कृष्ण की जोड़ी को, उनकी प्रणय गाथा, राधा के प्रणव भाव को इस कृति का आधार बनाया है. मिथकीय कथा वस्तु में नायिका की सम्वेदन भरी बेचैनी और छटपटाहट है. कथा के सूत्र तो पुराख्यान के हैं, परन्तु अपनी निजी मिथकीय काव्य सृष्टि पर

राधा को रूपायित किया है.

‘‘कनुप्रिया की कविता अधिकतर अप्रकट या ओट में छिपी हुई पौराणिक गाथा ही है, यद्यपि उसका प्रभाव अधिकतर विशिष्ट अर्थदीप्ति के साथ अप्रतिहत है, पर प्रत्यक्ष रूप से वह बिम्बों प्रतीकों और स्मृति प्रसंगों की कविता है.’’

जैसा कि स्पष्ट है राधा का उल्लेख भागवत पुराण में आया है इसके पश्चात सुर ने भी राधा को अपने काव्य का आधार बनाया. इसके पहले जयदेव ने अपने काव्य में राधा को स्थान दिया था. रीतिकाल में राधा का अलग ही प्रेमिका के रूप में वर्णन मिलता है. कनुप्रिया राधा के प्रणयील भावों के माध्यम से जीवन को समझने का प्रयत्न है. इसमें कवि ने क्षणवादी धारणाओं को नवीन भावभूमि में प्रतिष्ठित किया है. भारतीजी के अनुसार ‘‘ऐसे भी क्षण होते हैं जब हमें लगता है कि यह सब जो उद्धेग है. महत्व उसका है जो हमारे अन्दर साक्षात होता है- चरम तन्मयता का क्षण जो एक स्तर पर सारे बाह्य इतिहास की प्रक्रिया से ज्यादा मूल्यवान सिद्ध हुआ है. जो क्षण हमें सीपी की तरह खोल गया है, इस तरह कि समस्त बाह्य अतीत, वर्तमान और भविष्य सिमटकर उस क्षण में पुंजीभूत हो गया है और हम, हम नही रहे...’’(2)

कवि भारती ने राधा के परम्परित रूप के साथ साथ उसे आधुनिक नारी के रूप में भी चित्रित किया है. ये वैष्णव परकीया भी है. काम कलाओं में निपुण राधा नागरी भी है. सृजन संगिनी भी है. कृष्ण के सारे संकल्प राधा से जुड़कर ही सार्थकता पा सकते हैं अन्यथा नहीं. वे राधा के चरित्र को बड़ी सहजता और भावुकता से हमारे सामने रखते हैं.

‘‘कि मैं बावली लड़की हूं न

जो पानी भरने जाती है

तो भरे हुए घड़े में

अपनी चंचल आंखों की छाया देखकर

उन्हें कुलेल करती हुई चटुल मछलियां समझकर

बार बार पानी ढुलका देती है.’’(3)

राधा की इस मुद्रा का चित्रात्मक वर्णन हमें कवि नन्ददास के साहित्य में पहले भी मिलता है. वह कृष्ण प्रेम में बावली हो गयी है. बाजार में, गलियों में श्याम-श्याम पुकारती घूमती है. कवि नन्ददास की पंक्तियां कुछ यूं कहती हैं.

‘‘बड़ी बेर बीती जबै, तब सुधि आई नैक स्याम! स्याम! करिबे लगी एक ही बार जु द्वेव बदती ज्यों बावरी....’’(4)

कभी राधा के आंचल में कृष्ण दुबक गए हैं या कभी कृष्ण के अंक में आधा छिपी हुई है, दोनों को एक रूप माना गया है अतः कनुप्रिया का यह कहना काफी सहज लगता है कि-

‘‘तुम छोटे से शिशु हो

असहाय/वर्षा में भीग भीग कर

मेरे आंचल में दुबके हुए’’ (5)

कल्पना संयोजन, काव्यभूमि का भाव राधा के चरित्र को मिथकीय फलक पर उदघाटित करते हुए विभिन्न आयामों के साथ चित्रित हुए हैं. कवि भारती ने कृष्ण को भी एक सम्पूर्ण चरित्र के रूप में प्रतुत किया है वह सभी गुणों से युक्त है. उन्हें पुराणों में ‘‘सोलह कला सम्पूर्ण’’ कहा गया है. वे राजा है...गोपाल है...योगी है...भोगी है...कामी है...संयमी है...सहज है...चतुर भी. एक ओर तो बाल लीला का मुग्ध रूप है तो दूसरी और गीता का

धर्म उपदेशक रूप भी.

कनुप्रिया पुराकथा की दृष्टि और मूल्यान्धता से भिन्न और अंधायुग की प्राश्निक समस्या के परिणाम से भिन्न उस बिंदु से प्रारम्भ की कथा है जिसमें समस्याओं का निदान नहीं, बल्कि प्रश्नों का सिलसिला है. कनुप्रिया को अंधायुग की पूरक कृति के रूप में देखा जा सकता है.

‘‘कनुप्रिया में नर नारी के सम्बन्ध, पुरुष और प्रकृति के

सम्बन्ध, कवि और कविता के सम्बन्ध प्रेम और समाज के सम्बन्ध इन सभी समस्याओं का भावात्मक संश्लेषण प्रस्तुत किया गया है.

कनुप्रिया में हमें दो केन्द्र बिंदु मिलते है...‘‘क्षण और सहज’’. कनुप्रिया कृष्ण की प्रिया है. उसमें शौर्य सुलभ मनःस्थितियां विद्यमान हैं. जो विवेक से अधिक तन्मयता, इतिहास की उपलब्धियों से

अधिक सहज जीवन में सार्थकता पाती है...(6)

कनुप्रिया में राधा का मुखौटा जड़ नहीं ह,ै गतिशील है. शुरू से अंत तक कवि ने राधा को अपना स्वर दिया है. ‘‘पूर्व राग’’ के पांचों गीत कवि की विषयगत सम्वेदना को प्रकट करते हैं. प्रतीक्षारत छायादार अशोक वृक्ष जो कनुप्रिया की प्रतीक्षा में कई जन्मों से पुष्पहीन खड़े हैं. राधा के असीम सौन्दर्य, नारी सुलभ लज्जा एवं पुलक का सूक्ष्म चित्र हुआ है. कनु का प्रेम आत्मा का प्रेम है, समर्पण का प्रेम है. इन गीतों में राधा के प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति है. राधा के प्रेम में निश्छल भावनाओं की स्थिति है. प्रकृति के कण कण में कनु की छवि देखना, यमुना में नहाते समय कृष्ण को निहारना, गृहकार्य से अलसाकर कदम्ब की छांह में शिथिल अनमनी पड़ी रहना- जैसे अनेक भाव प्रेषण चित्रण इन गीतों में झिलमिलाए हैं. ‘‘मंजरी परिणय’’ में वह अतीत की मनःस्थितियों के द्वारा कवि के रोमानी भावबोध को हमारे सामने रखती है. प्रश्नाकुलता और निजता के द्वंद कृति के शुरू में कही गई भूमिका की याद दिलाते हैं. ‘‘सृष्टि-संकल्प’’ में आकर कवि सीधे तौर पर अपनी दृष्टि को प्रकट करता है. राधा का मानसिक उद्वेलन वस्तुतः कवि का ही द्वंद है. ‘‘इतिहास खण्ड’’ में फैंटेसी का प्रयोग हुआ है. वर्तमान को समझने के लिए वह स्थितियों को निजी राग द्वेष के साथ व्यक्त करती है. कनु की प्रिया जिसके हृदय में प्रतिक्षण कनु ही व्याप्त रहता है, ऐसी कनुप्रिया सम्पूर्ण रचना में छाई हुई है.

कवि भारती की राधा को कभी कनु अपना अन्तरंग सखा लगता है तो कभी रक्षक, कभी लीला बन्धु कभी आराध्य और कभी लक्ष्य. ऐसा प्रतीत होता है कि सरिता के समान उमड़ घुमड़ कर प्रिय सांवले समुद्र के पास आई उसने धारण भी किया, फिर भी सदा अबूझे से बने रहे .

‘‘विलीन कर लिया

फिर भी आकुल बने रहे

मेरे सांवले समुन्द्र तुम

आखिर मेरे हो कौन ?’’(7)

‘‘हाथ मुझी पर रख मेरी बाहों से

इतिहास तुम्हें ले गया...’’(8)

राधा का नारी सुलभ अभिव्यक्ति भाव भरा अभिव्यंजना का वर्णन अपनी सम्पूर्ण गरिमा, समग्रता, प्रेम निष्ठा के साथ गेयता की लयबद्धता के साथ प्रस्तुत हुआ है. भारती जी ने कनुप्रिया को पुराख्यान का आधार मानकर लिखा है. लेकिन पुराख्यान का इसमें इतना ही योग है कि राधा को भागवतपुराण से ग्रहण किया है. उसके बाद उसके वर्णन में कल्पना और मिथक का सहारा लेकर पूरी कथा को नये संदर्भों, नए आयामों से मंडित किया है. पूरी कथा राधा के आधार पर चलती है, परन्तु वह प्रश्नों के माध्यम से आधुनिक नारी की मानसिकता को अभिव्यंजित करती है. अस्तित्व की समस्या, युद्ध की समस्या को मानवीकरण के रूप में उठाया है.

कृष्ण (कनु)

भारती जी ने कृष्ण (कनु) का व्यक्तित्व युग पुरुष के रूप में स्थापित किया है. कनु अपने युग का सचेत व्यक्ति है जो एक ओर तो अपने जीवन के राग विरागों के प्रति भी उन्मुख और ईमानदार है दूसरी ओर युगधारा के वेग से भी अंसपृक्त नहीं है...(9)

कनुप्रिया में कृष्ण के दो रूप हमारे सामने उभरते हैं- पहला रूप चिरन्तन प्रेमी के रूप में जो अडिग, निर्लिप्त, वीतराग और निश्चल प्रतीत होता है, दूसरा रूप उनका लीला भूमि छोड़कर युद्धभूमि में उतरना है.

कृष्ण का प्रेम अद्भत है, जों वासनाओं से परे लोकोत्तर आदर्शो पर टिका है-

‘‘सुनो ! तुम्हारे अधर,

तुम्हारी पलकें

तुम्हारी बाहें

तुम्हारे चरण

तुम्हारे अंग प्रत्यंग

तुम्हारी सारी चंपकवर्णी देह

मात्र पगडंडिया हैं,

जो चरम साक्षात्कार के क्षणों में

रहती ही नहीं रीत-रीत जाती है.’’(10)

यही राधा और कनु का विशिष्ट नाता है और कवि की अद्भुत सृष्टि पाठक को चमत्कृत करती है.

कृष्ण का राधा के पांवों में महावर सजाना, उसकी क्वांरी उजली मांग को आम्रबीर से भरना उसके अलौकिक भाव, मन को छू लेते हैु.

‘‘यह सारे संसार से पृथक पद्धति का

जो तुम्हारा प्यार है न

इसकी भाषा समझ पाना क्या इतना सरल है.’’(11)

कृष्ण को कवि ने आधुनिक मानव के रूप में प्रतिष्ठित किया है, जिसे वर्तमान जगत में युद्ध संघर्ष से व्याप्त विषमताओं से जूझना पड़ता है. कृष्ण के युद्धरत चरित्र को समझने में राधा अपने को असमर्थ पाती है.

कनु का धर्मोपदेश रूप जिसमें कर्म- स्वकर्म-न्याय-अन्याय-

धर्म-अधर्म सम्बन्धी अपने निर्णय की घोषणा करना चाहते हैं. कृष्ण ने इतिहास की निर्मित चिंता में राधा को भुला दिया प्रेम के कोमलतम क्षणों को राष्ट्र के निर्माण में लगा दिया, राधा के शब्दों में-

‘‘कौन था वह

जिसके चरम साक्षात्कार का एक गहरा क्षण

सारे इतिहास से बड़ा था, सशक्त था.’’(12)

भारतीजी की कनुप्रिया के दोनों पात्र- कनु और कनुप्रिया अभी तक के कृष्ण काव्य परम्परा में चित्रित राधा कृष्ण से अलग हैं. वे अपनी प्रेम विह्वलता के साथ साथ युगांतकारी जीवन मूल्यों की रक्षा करने में समर्थ सिद्ध होते हैं.

राधा के मिथक पर आधारित भारतीजी की इस कृति में मिथकीय काव्यभूमि राधा की वैयक्तिक पीड़ा का भाव बोध कराती है. पुराख्यान के माध्यम से नवीन तथ्यों और युगोचितता को सफल रूप में प्रस्तुत करती है.

कनुप्रिया के विषय में डॉ. रामजी तिवारी लिखते है ‘‘राधा कृष्ण के प्रेमपूर्ण भाव संवेदन’’ के माध्यम से स्त्री पुरुष सम्बन्धों को आधुनिकता के धरातल पर आंकलित करने के साथ प्रकृति और पुरुष के सनातन सम्बन्धों का भी संकेत किया है...युद्ध के कुशल संचालक गीताज्ञान के व्याख्याता, योगेश्वर कृष्ण आत्यन्तिक रूप से हताश होकर राधा के कंधे का सहारा लेते हैं. युद्ध किसी समस्या का समाधान नही है. इस शाश्वत सत्य से भारती हमें साक्षात्कार कराते हैं. आज के मानसिक संत्रास, विक्षोभ, विद्रूप और बिखराव के समाधान के लिए युद्ध नहीं, प्रेम का आश्रय चाहिए. राधा मानवीयता की संजीवनी, शक्ति की प्रतीक रूप में चित्रित की गई है, जो आज विकृत सम्बन्धों के लिए विश्वसनीय समाधान प्रस्तुत करती है.

कवि ने कनुप्रिया में पुराख्यान को आधार बना कर मिथक के बिम्बों की हीर कनियों को इस तरह जड़ कर आभायित किया है कि वे अपनी चमक से चमत्कृत तो करते ही हैं, साथ ही भारतीजी को अपनी काव्य कृति कनुप्रिया में भावनाओं संवेदनाओं को आत्मीय तादात्म्य से पाठक के अंतस में अंकित कर...एक नया अध्याय रचकर...मानवीय संसार के लिए चिन्तन की भावभूमि का ठोस धरातल सृजित कर लेते हैं.

सन्दर्भ ग्रन्थः

1. नयी कविता और पौराणिक गाथा- डॉ. रामस्वार्थ सिंह, पृष्ठ 141,

2. कनुप्रिया- धर्मवीर भारती, भूमिका से

3. कनुप्रिया- धर्मवीर भारती, पृष्ठ 28,

4. हिंदी साहित्य में राधा- श्री भारती, पृष्ठ 326

5. कनुप्रिया- धर्मवीर भारती, पृष्ठ 35

6. डॉ. लक्ष्मणदत्त गौतम (सम्पा.) डॉ. रमेश कुंतल मेघ- धर्मवीर भारती का लेख, पृष्ठ 188

7. कनुप्रिया- धर्मवीर भारती, पृष्ठ 40

8. कनुप्रिया- धर्मवीर भारती, पृष्ठ 60

9. नयी कविता की नाट्यमुखी भूमिका- डॉ. हुकमचंद- राजपाल, पृष्ठ 179

10. कनुप्रिया- धर्मवीर भारती, पृष्ठ 29

11. कनुप्रिया- धर्मवीर भारती, पृष्ठ 33

12. कनुप्रिया- धर्मवीर भारती, पृष्ठ 62

 

सम्पर्कः 325 महात्मा गांधी मार्ग, थांदला

जिला-झाबुआ (म.प्र.)

यहां वहां की

गड्ढों का सीक्रेट

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दिनेश बैस

भारतीय फैशन शास्त्र में जून का महीना गड्ढों के नाम समर्पित होता है. कार्यालयों के, वित्तीय संस्थानों के गये साल के गड्ढे मार्च के महीने में जस्टीफाइड कर लिये जाते हैं. यों तो सफल खिलाड़ी पूरे साल इतने संतुलित ढंग से खेलते हैं कि मार्च में अधिक कुछ करने के लिये नहीं रह जाता है. एक कृत्रिम कार्यालयी तनाव के अतिरिक्त. वह जनता के संक्रमण से स्वयं को सुरक्षित रखने में सहायक होता है- भई, अभी तो ईयर एण्ड चल रहा है. बहुत काम है. बाद में मिलिये- फिर भी कहीं कुछ लोचा रह जाता है तो उसे सब मिल कर सम्हाल लेते हैं- साथी हाथ बढ़ाना- यहां मानवीय दयाभाव काम आता है- अब आदमी ही आदमी के काम नहीं आयेगा तो कौन आयेगा. आज वे गड्ढे में गिर रहे हैं. उन्हें गड्ढे से निकालना हमारा कर्तव्य है; ताकि कल अपन गिरने लगें तो अपन को खींच कर निकालने वाला भी तो कोई हो. कहा गया है कि सब मिल कर एक-एक बांस लगायें तो कैसा भी तम्बू हो, खड़ा हो ही जाता है.

अप्रैल का महीना, कुछ पूछिये मत. अरे दादा रे, कुछ चैन लेने दोगे? देख रहे हैं कि अभी-अभी मार्च गुजरा है. आप जानते हैं, कितना टेंशन रहता है. कुछ सांस तो लेने दीजिये. पहली तारीख होते ही चले आये. अभी तो प्रैक्टिकली पिछला साल ही चल रहा है. दस दिन बाद मिलिये तब ऑफिस में अप्रैल लगेगा- साहब सांस लेने के लिये स्मार्ट फोन पर कुछ मानसिक सुख देने वाले दृश्यों में उलझे हुये हैं.

मई लगते-लगते छुट्टी अप्लाई होने लगती हैं- बहुत बोर हो चुके हैं, यार. इस नौकरी ने तो बिल्कुल चूस लिया है. एल टी सी ड्यू हैं. अभी ले लें. नहीं, पहाड़ों पर नहीं जायेंगे. बेबी तो बहुत मचल रही है लेकिन वाइफ ने साफ मना कर दिया है. कहती हैं कि पहाड़ों का क्या भरोसा. कब धसकने लगें. साउथ या राजस्थान सर्किट का इरादा है. गर्मी है लेकिन ऑफ सीजन का लाभ मिलेगा- आदमी कितना भी कमा ले, मध्यवर्गीय मानसिकता पांवों में कीचड़ की तरह चिपकी रहती है. सेल और ऑफ सीजन के माया मोह ग्रस्त कर ही लेते हैं. देस की मांटी से जुड़े हैं न. वह कल्चर कैसे छूटेगा. संस्कृति की प्रेरणा है कि मुफ्त में गंदगी मिल रही हो तो उसे भी ले लो. फिर यू नो, बीकानेर में ससुराल भी है. सालियां वगैरह भी आ रही हैं. बच्चे मौसी से मिलने के लिये मचल रहे हैं- एक आंख अजाने ही दब जाती है- यह कुछ उस नियम के अंतर्गत होता है कि मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है- इस पूरे कर्मकांड में अंतर्निहित अर्थ है कि सरकारी खर्च पर पर्यटन प्रोत्साहन के नाम पर ससुराल प्रवास में रहना है. भारतीय मानुस को प्रोत्साहित किया जाये तो कफन से भी कमीशन की जुगाड़ कर ले. लोग भ्रम निकाल दें. पृथ्वी वीरों से खाली हो सकती है लेकिन यह वीर वसुंधरा नहीं-

जून हड़बड़ा कर जागने का मौसम होता है- कब तक यों हाथों पर हाथ रखे बैठे रहोगे- मन कचोटने लगता है- इतना वेतन लेते हैं. यह देश की जनता की गढ़ाई कमाई से मिलता है. कुछ तो काम करो. क्या हुआ जो सड़ी गर्मी पड़ रही है. कुछ न कुछ तो पड़ेगा ही. गर्मी जायेगी तो बरसात होने लगेगी. बरसात नहीं होगी तो सूखा पड़ेगा. पड़ने के डर से कब तक एसी जोतते रहोगे? चलो, कुछ करो- आत्मा ललकारती है.

कुछ करने के लिये साहब ने कमर कस ली है. करने के नाम पर मीटिंग बुला ली गई है. अंडाकार टेबिल के एक सिरे पर ऊंची सी कुर्सी पर साहब विराजमान हैं. वातावरण आध्यात्मिक सा हो उठा है. टेबिल के चारों ओर बैठे अधीनस्थ भक्ति भाव से साहब को निहार रहे हैं- सारी कृपा वहीं अटकी है- ठेकेदार ने व्यवस्था की है. सब श्रध्दापूर्वक चिप्स कुतर रहे हैं. चिप्स के बाद कोल्ड- यह हाजमे के लिये अच्छा होता है- साहब बता रहे हैं-

-क्या चल रहा है- साहब समाधि से बाहर आते हैं.

-सर, गड्ढों का नया टारगिट आ गया है- पी ए सूचना दे रहा है- पिछले साल से डेढ़ गुना अधिक गड्ढे खुदवाने हैं. जुलाई के पहले सप्ताह से ही वृक्षारोपण शुरू हो जायेगा.

-हुं- साहब अपने होने का प्रमाण दे रहे हैं- एनी हाउ टारगिट तो अचीव करना ही होगा- साहब चिंतित नहीं हैं. बस, निर्णय लिया है.

-सर कैसे होगा टारगिट...पूरा-फण्ड्स नहीं बढ़ाये हैं. पिछला काम ही ऑडिट में फंसा है. पी ए बता रहा है.

-वह सेट राइट हो जायेगा- पी आर ओ सूचना दे रहा है- ऑडिट ऑफीसर की बेटी एक्टीवा के लिये मचल रही है. बड़ी सुंदर है बेचारी-

-कौन...? बेटी या एक्टीवा- साहब की आंखें कामुक हो रही हैं.

-हा-हा-हा- वातावरण ठहाकों से भर गया है. जो कुढ़ रहे रहे हैं वे पकड़े जाने के डर से और जोर से हंस रहे हैं. साहब की लम्पटता को विनोद प्रियता प्रमाणित किया जा रहा है.

-एनी वे, टारगिट कैसे पूरा होगा- साहब मुद्दे पर लौट आये हैं- खनूजा, क्या कह रहे हो तुम?

खनूजा कार्यदायी कम्पनी का मैनेजर है. ऐसी परिस्थितियां कैसे मैनेज की जानी हैं, वह जानता है. आत्मविश्वास से योजना पर प्रकाश डाल रहा है- सर फॉरचुनेटली पांच साल के लिये गड्ढे खोदने का काम हमारी कम्पनी को ही मिला है. इसलिये डिपार्टमेंटल कोऑपरेशन मिले तो अधिक परेशानी नहीं होगी. बस, आपको थोड़ा एकाउण्ट और ऑडिट को हैंडिल करना होगा- खनूजा विस्तार से बता रहा है- और हां एमर्जेंसी में मीडिया को भी देखना होगा.

साहब आश्वस्त हो रहे हैं- करोगे कैसे?

-सर, पिछली साल गड्ढे खोदे गये थे- खनूजा सीक्रेट बता रहा था- पानी नहीं बरसा. लक्ष्य के अनुसार पेड़ नहीं लगाये गये. बड़ी संख्या में गड्ढे पेड़ विहीन रह गये. उन्हें भरने के लिये फण्ड रिलीज हुआ था. गड्ढे नहीं भरे गये. वह गड्ढे हमारे स्टॉक में हैं. उन्हें इस साल के गड्ढों में जोड़ देंगे तो हमारा टारगिट पूरा हो जायेगा.

-दैट्स ओ के- साहब सभा विसर्जित कर रहे हैं- तालियां-तालियां-तालियां- जो जन जहां से आये हैं सो तहं प्रयाण कर रहे हैं. सबके चेहरों पर अद्भुत संतुष्टि है- खनूजा बहुत प्रौफेशनल है. सबके हितों की रक्षा करता है.

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