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प्राची - जुलाई 2016 / कबीर और सामाजिक सरोकार / डॉ. शगुन अग्रवाल

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शोध आलेख कबीर और सामाजिक सरोकारडॉ. शगुन अग्रवालबीर, मध्ययुगीन हिंदी निर्गुण काव्यधारा के प्रवर्तक संत कवि के रूप में प्रख्यात हैं. संत काव्य का मूल सरोकार था 'सामान्य मानव हित साधन'. तत्कालीन विषय- राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितयों को देखते हुए तमाम विषमताओं, विडम्बनाओं और कुरूतियों को चुनौती देनेवाला यह सामाजिक प्रतिरोध का काव्य है जो हर तरह के भेदभाव से ऊपर उठकर मानव मात्र के लिए बराबरी तथा न्याय की मांग करता है. संत काव्य अपनी सहजता, सरलता, जीवन दर्शन की गंभीरता के कारण अत्यंत प्रभावशाली है. संतों की मानवतावादी दृष्टि के मूल में स्वतंत्र चिंतन, स्वानुभव और आचरित सत्य प्रमुख थे. प्रायः सभी संत कवि सदगृहस्थ थे और उनका व्यवसाय धर्मोपदेशक का नहीं था. जीविका के लिए प्रायः सभी संत अपने पारम्परिक व्यवसायों से जुड़े थे. कबीर जुलाहे थे और उनकी रचनाओं में कपडे बुनने के व्यवसाय का वर्णन है. वस्तुतः आस्तिकता, सच्चरित्रता, परदुःख-कातरता, करुणा, प्रेम, भक्ति और विनय ही संतों के आर्दश थे. कबीर का मूल स्वर विद्रोह का है. वे एक प्रखर स्पष्ट वक्ता, निरभिमानी, साहसी, तेजस्वी …

प्राची - जुलाई 2016 / वृक्षारोपण होने न होने के बीच / दिनेश बैस

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यहां वहां की वृक्षारोपण होने न होने के बीचदिनेश बैस'दिल हूम-हूम करे' और न जाने क्या-क्या करे. 'आज मदाहोष हुआ जाये रे, मेरा मन-मेरा मन.' यह जुलाई का महीना होता ही कुछ ऐसा है कि दिल बेकाबू होने लगता है. दिल मचलने लगता है और अनेक मामलों में दहलने भी लगता है. मई और जून की गर्मी के गर्म तवे पर पानी की कुछ खेपें बरस जाती हैं, छन्न से. शहर के नदी-तालाब भले ही तरस रहे हों भरने के लिये. मगर नालियां आवारा लड़कियों की तरह उमड़ने लगती हैं. साल भर सफाई के लिये तरसती नालियों की जवानी सड़कों पर उछलने लगती हैं. सड़कों के गड्ढे उफनने लगते हैं. मच्छर उनमें अवतार लेने लगते हैं. शहर हरा-भरा सा लगने लगता है. महसूस होता है कि शहर में स्वीमिंग पूल्स की संस्कृति विकसित हो गई है. वे पूल्स भले ही आदमियों के लिये न हों मेंढकों के लिये हों. मेंढकी समाज को छूट रहती है कि वे उनमें टू पीस बिकनी में गोते लगायें या वैसे ही डूबती उतराती रहें. आखिर मेंढक समाज को भी सनी लियोनी प्रेरणादायक ही लगती हैं. उनके एक संकेत पर वे अपने चरित्र का सर्वस्व त्यागने के लिये तत्पर रहते हैं. आदमी चाहे तो उन गड्ढों के सहयोग स…

प्राची - जुलाई 2016 / साक्षात्कार - सुभाष चंदर

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साक्षात्कार"व्यंग्य बहुत समर्पण मांगता है, यह आसान विधा नहीं है"(सुभाष चंदर से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत के अंश) सुभाष चंदर हिन्दी के वरिष्ठ रचनाकार हैं. व्यंग्य कथाओं के क्षेत्र में विशेष रूप से ख्याति अर्जित करने वाले इस व्यंग्यकार ने निबंध और उपन्यास के अलावा व्यंग्यालोचना पर भी महत्वपूर्ण काम किया है. ''हिन्दी व्यंग्य का इतिहास'' जैसा विशाल ग्रन्थ इसका प्रमाण है. उनके खाते में जहां व्यंग्य की ग्यारह पुस्तकें हैं, वहीं कुल पुस्तकों की संख्या इकतालीस तक पहुंच गयी है. इस पुस्तक में विलान, राजभाषा, बाल साहित्य, जीवनी आदि अनेक विविध विषयों की कृतियां शामिल हैं. इसके अलावा उन्होंने टी.वी. एवं रेडियो के लिए अस्सी धारावाहिक भी लिखे हैं. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय पुरस्कार, भारत सरकार, डॉ. मेघनाथ साहा पुरस्कार, शरद जोशी पुरस्कार, अट्टहास पुरस्कार, सर्जना पुरस्कार जैसे अनेक पुरस्कार उन्हें मिल चुके है. हाल ही में उन्हें व्यंग्य का सर्वोच्च पुरस्कार 'व्यंग्य श्री' प्राप्त हुआ है. उनसे व्यंग्य और समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर डॉ. भावना शुक्ल की एक बेबाक बातचीत…

प्राची - जुलाई 2016 / काव्य जगत

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काव्य जगतअभिनव अरूण की दो ग़ज़लेंएकइश्क न हो तो ये जहां भी क्या.
गुलिस्तां क्या है कहकशां भी क्या.पीर पिछले जनम के आशिक थे ,
यूं खुदा होता मेहरबां भी क्या.औघड़ी फांक ले मसानों की,
देख फिर जीस्त का गुमां भी क्या.बेल बूटे खिले हैं खंडर में,
खूब पुरखों का है निशां भी क्या.खुशबू लोबान की हवा में है,
अब अगर खत्म हो धुआं भी क्या.मां का आंचल जहां वहीँ जन्नत,
इस जमीं पर है आसमां भी क्या.खूब चर्चा में है वेलेन्टाइन,
इश्क तेरी सजी दुकां भी क्या.उनकी नजरें हुईं जिगर के पार,
तीर को चाहिए कमां भी क्या.मुझको शहरे गजल घुमा लायी,
खूब उर्दू जुबां जुबां भी क्या.यूं लगे है खुदा बुलाता है,
इन मीनारों से है अजां भी क्या.
दोअक्षरों में खुदा दिखाई दे.
अब मुझे ऐसी रोशनाई दे.बाप के हौसलों का दे बिस्तर,
मां के आशीष की रजाई दे.हाथ खोलूं तो बस दुआ मांगूं,
सिर्फ इतनी मुझे कमाई दे.रोशनी हर चिराग में भर दूं,
कोई ऐसी दियासलाई दे.मां के हाथों का स्वाद हो जिसमें,
ले ले सबकुछ वही मिठाई दे.धूप तो शहर वाली दे दी है,
गांव वाली बरफ मलाई दे.बेटियों को दे खूब आजादी,
साथ थोड़ी उन्हें हयाई दे.तल्ख लहजा तमाम लोगों को,
मीर दे मीर की रुबाई दे.दर्द हो…

प्राची - 2016 / व्यंग्य / एक सड़ी हुई बिल्ली / राधाकृष्ण

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व्यंग्य एक सड़ी हुई बिल्लीराधाकृष्णहां चारों ओर ईमानदारी, तत्परता और हित-कामनाएं बहुत हैं. पड़ोसियां से भी अच्छे संबंध बनाए जा रहे हैं. आज सवेरे उठकर देखा कि कोई पड़ोसी अपने घर से मरी हुई बिल्ली लाकर मेरे दरवाजे पर डाल गया है. सबसे पहले उसे नौकरानी ने देखा और नाम-भौं सिकोड़ती हुई आकर बोली, 'मैं झाड़ू-बुहारू कर सकती हैं, मगर बिल्ली फेंकने का काम मेरा नहीं हैं.' पत्नी से पूछने पर भी इस बात की सच्चाई साबित हुई. नौकरानी की ड्यूटी चार्ट में कहीं भी मरी हुई बिल्ली को फेंकने का काम सम्मिलित नहीं था. मरी हुई बिल्ली कौन फेंके? उसकी लाश से बड़ी बुरी बास आ रही थी. मैंने पत्नी से कहा कि क्या हर्ज है, तुम्हीं उठाकर फेंक दो और डिटोल से हाथ धो लो. इस पर वे तमक गयीं और कहने लगीं, 'वाह जी, बड़े आए हैं कहां के हुक्म चलानेवाले! मेरे पिताजी ने मुझे तुम्हारे यहां इसलिए नहीं भेजा है कि मैं सड़ी-गली बिल्ली उठाती फिरूं और फेंकती चलूं. कायस्थ की लड़की हूं, कोई डोमिन नहीं हूं.' तब मैं स्वयं फेंकने को तैयार हो गया, मगर इस पर भी आपत्ति उठायी गयी. मुझसे बतलाया गया कि मेरी जाति भी कायस्थ ही है. अतएव मुझ…

प्राची - जुलाई 2016 / एक गधे की वापसी / धारावाहिक हास्य व्यंग्य उपन्यास / कृश्न चंदर

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हास्य-व्यंग्य धारावाहिक उपन्यासएक गधे की वापसीकृश्न चन्दरतीसरी किस्तः सम्मिलित होना महालक्ष्मी की रेस में घोड़ों के साथ, और मजाक करना देखकर गधे को लोगों का, और बयान घुड़दौड़ के आर्श्चयजनक परिणाम का...रुस्तम सेठ घनी मूंछों वाले आदमी और डॉक्टर को एक ओर ले गया. दोनों में देर तक कुछ खुसर-पुसर होती रही. उसके पश्चात् डॉक्टर और घनी मूंछों वाला आदमी दोनों कहीं चले गए और सेठ खेमजी को लेकर खुशी से मुस्कराता हुआ मेरे पास आया और बोला- ''सब ठीक हो गया है. कल से तुमको महालक्ष्मी के रेसकोर्स अस्तबल में भेज दिया जाएगा.'' ''महालक्ष्मी के रेसकोर्स में! क्यों?'' ''वहां एक मास पश्चात् तुम्हें क्रिसमस कपवाली रेस की प्रतियोगिता में सम्मिलित किया जाएगा.'' ''मैं...?...एक गधा होकर घोड़ों की रेस में भाग लूंगा?'' मैंने आश्चर्य से कहा, ''आप लोगों की अक्ल तो ठीक है? आज तक कहीं कोई गधा किसी घोड़े से तेज दौड़ा है?'' रुस्तम सेठ ने मुस्कराकर कहा, ''तुम्हारा पीछा किया था और तुम पुलिस की जीप और दूसरी तीव्र गति वाली गाड़ियों से भी ते…

प्राची - जुलाई 2016 / राधो काका / कहानी / तरुण कु. सोनी तन्वीर

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कहानी तरुण कु. सोनी तन्वीर बेटे, उस दिन जब मैं तुम्हारे यहां शहर आया था, तब एक कमजोर बुड्ढा और बेबस बाप बन कर आया था. अपने ही पुत्र से मदद की आषा लेकर, लेकिन बेटे तुमने मुझे जीवन के इस मोड़ पर भी मुझे जीने का सही रास्ता बता दिया. तुमने मेरे अन्दर के स्वाभिमान और खुद्दारी को जगा दिया. तुम्हारे ससुर के षब्दों से ज्यादा मुझे बेटे तुम्हारी खामोषी और तुम्हारा व्यवहार चोट कर गया था, इसलिए मैं तुमसे बिना मिले ही सुबह वापस लौट आया. मैंने तुम्हारे ही दिए रुपये अपने पसीने की कमाई के दस रुपये के साथ तुम्हें वापिस लौटा दिए. आज तेरा भेजा मनी आर्डर भी लौटा दिया. बेटे मुझे क्षमा करना. बेटे तेरे दिए 500 रुपये तेरे ससुर की कमाई के थे. उन पर मेरा कोई अधिकार नहीं था. सो मैंने उसे अपनी खुषी से अपने पोते को दे दिए.राधो काका तरुण कु. सोनी तन्वीर 25 बरस पहले राधो काका की बीवी नैना काकी स्वर्ग सिधार गई थी, तब से काका गांव में अकेले ही रहते हैं. बेटा बरसों पहले शहर कमाने गया तो वही रच बस गया. शादी भी कर ली और अपने ससुर करोड़पति सेठ गंगा प्रसाद का घर दामाद भी बन गया. करोड़ों की सम्पति का मालिक. शुरू-शुरू में बेट…

प्राची - जुलाई 2016 / आशंकाओं के नागपाश / कहानी / कुंवर प्रेमिल

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कहानी डॉ. कुंवर प्रेमिल इस 'तो' के आगे उसका दिमाग घूम गया...उसे होश तब आया जब किसी की नरम-नरम नाजुक अंगुलियां उसके पैर दबा रही थीं. यह उसकी नववधू ही थी. पुत्र जतिन उसका माथा सहला रहा था, यह वह जान गई थी.''अरे, मेरे पैर क्यों छुए बहू, अभी देवी-देवताओं की पूजा कहां हुई है? यह तो अपशकुन हो गया है.'' वह बीमार किंतु सधे स्वर में अपनी बहू से मुखातिब हुई थी.नामः डॉ. कुंवरपाल सिंह भाटी जन्मः 31 मार्च, 1947 प्रकाशनः देश की सभी जानी-मानी पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन, लघुकथा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य, अनियतकालीन ककुभ का लंबे समय तक संपादन, प्रतिनिधि लघुकथायें वार्षिकी का नियमित रूप से संपादन/प्रकाशन पुस्तक प्रकाशनः चिनम्मा, अनुवांशिकी, पांचवां बूढ़ा, आशंकाओं के नागपाश, प्रदक्षिणा, अंततः, आम आदमी नीम आदमी, कुंवर प्रेमिल की 61 लघुकथायें, शैलपर्ण की शैला आदि पुस्तकों का प्रकाशन. लघुकथा संग्रह 'हंसीराम हंसा' शीघ्र प्रकाश्य. पुरस्कार/सम्मानः अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित प्रसारणः जबलपुर, छतरपुर आकाशवाणी से कहानियां एवं कवितायें प्रसारित स…

प्राची - जुलाई 2016 / नुटू मोख्तार का सवाल / ताराशंकर बंद्योपाध्याय

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बंगला कहानी अंत में उन्होंने लिखा था-'आज एक बात कहूंगा, नाराज मत होइयेगा. एक दिन आपने कहा था, लक्ष्मी जी को लोगों के सिर पर पैर रखकर रौंदते हुए चलने की आदत है. उनके चरणों को आपने रास्ते की धूल में उतारने की बात कही थी. लेकिन आपने तो उन चरणों को खींच कर अपने ही माथे पर रख लिया. आप लज्जित न हों, ये चरण कमल हैं ही इतने लुभावने कि अपने सर पर रखे बिना चैन ही नहीं मिलता. क्या आपके सर पर भी देवी जी के रजत रथ के उपयुक्त रास्ता तैयार हो गया है! समझे या नहीं, गंजापन आया है, या नहीं!'नुटू मोख्तार का सवाल ताराशंकर बंद्योपाध्याय न्द्रप्रस्थ में राजसूर्य यज्ञ के समारोह के समय ही कुरूक्षेत्र के युद्ध की भूमिका तैयार हुई थी. त्रेता में लंकाकाण्ड की भूमिका भी रामचन्द्र के युवराज्याभिषेक समारोह में बनी थी. फूल की पंखुड़ियों के अदंर जिस तरह कीड़ा छुपा रहता है, उसी तरह किसी-किसी समारोह के आनन्द-उत्सव की ओट में भावी अशांति की संभावना छिपी रहती है. कंकणा ग्राम में भी एक ऐसी ही घटना हो गई. कंकणा ग्राम के रईस निवासियों के दान व सहायता से एक खैराती दवाखाने की स्थापना हुई. उसी के उद्घाटन अनुष्ठान के समा…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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