संदेश

September, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

हिन्दी व्यंग्य में अनोखा प्रयोग : व्यंग्य की जुगलबंदी

हिंदी साहित्य में व्यंग्य को लेकर बहुत ज्यादा प्रयोग देखने को नहीं  मिलते है और  जो  अभी तक हुए है उनका भी सही से मूल्याकन नहीं हो पाया है . लेकिन  फिर भी व्यंग्यकारों  ने से एक अनोखा प्रयोग किया - व्यंग्य की जुगलबंदी .इससे पहले इस प्रकार की जुगलबंदी ईश्वर शर्मा और लतीफ़ घोघी के द्वारा की जा चुकी थी. यह जुगलबन्दी व्यंग्य के क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग था। लतीफ घोंघी और ईश्वर शर्मा ने व्यंग्य के नियमित स्तम्भ के रूप में एक ही विषय पर व्यंग्य लिखे। उनको अमृत सन्देश, रायपुर और अमर उजाला बरेली-आगरा अख़बारों ने प्रकाशित किया। बाद में 1987 में सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली ने इस जुगलबन्दी को छापा।इसबार व्यंग्य की जुगलबंदी के तहत चार लेखको अनूप शुक्ल,  निर्मल गुप्ता, रवि रतलामी और एम्.एम्. चन्द्रा ने  एक  साथ  जुगलबंदी की.इस जुगलबंदी  को एक साथ आप के सामने प्रस्तुत कर रहे ताकि इस प्रयोग  के बारे में एक सही मूल्याकन हो सके) पहली जुगलबंदी - अनूप शुक्ल : मोबाइलआज की दुनिया मोबाइलमय है। समाज सेवा के नाम पर सरकारें बनाने के काम से लेकर अपराध का धंधा करने वाले माफ़िया लोग मोबाइल पर इस कदर आश्रित हैं कि …

कहानी - तेज़ाब - विनीता शुक्ला

चित्र
-- अदालत की कार्यवाई शुरू होने वाली थी. मयंक पाल की आँखें भर आईं. रह रहकर उन्हें वो दृश्य याद आ रहा था- जब उनके कलेजे का टुकड़ा, उनकी बिटिया नीना अधजली हालत में अस्पताल लाई गयी थी. नीना को उसके वहशी पति किशोर ने मिट्टी का तेल डालकर जला दिया था. उनकी इच्छा के विरुद्ध प्रेम विवाह करके, जब वो किशोर के साथ चली गयी, तब भी वे उतना आहत नहीं हुए थे, जितना उसकी दुर्दशा को देखकर. नीना ने तड़प तड़पकर उनके सामने ही दम तोड़ दिया और वह कुछ न कर सके. सुना था कि किशोर के घरवाले नोटों से भरी थैली लेकर घूम रहे थे, न्यायाधीश को शीशे में उतारने की गरज से. पाल ने एक ठंडी सांस ली. कभी वे भी एक संपन्न परिवार के वारिस हुआ करते थे. अब जब समय ने तेवर बदल लिए हैं, सब कुछ बदल गया है उनके लिए! ना जाने भाग्य का फैसला क्या हो! जीवन के इस मोड़ पर वह बिलकुल अकेले पड़ गए हैं. पत्नी बरसों पहले परलोक सिधार चुकी थी. अपना कहने को एक बेटा जरूर है; पर वो तो बीबी के पल्लू से ही बंधा रहता है. फिर मयंक पाल की इस लड़ाई में उन्हें हौसला देने वाला भला कौन था? वे सोच में डूबे थे कि घोषणा हुई, “माननीया जज साहिबा पधार रही हैं.” मयंक न…

कहानी - फिर एक बार - विनीता शुक्ला

चित्र
फैक्ट्री का सालाना जलसा होना था. तीन ही सप्ताह बच रहे थे. कायापलट जरूरी हो गया; बाउंड्री और फर्श की मरम्मत और कहीं कहीं रंग- रोगन भी. आखिर मंत्री महोदय को आना था. दरोदीवार को मुनासिब निखार चाहिए. अधिकाँश कार्यक्रम, वहीं प्रेक्षागृह में होने थे. उधर का सूरतेहाल भी दुरुस्त करना था. ए. सी. और माइक के पेंच कसे जाने थे. युद्धस्तर पर काम चलने लगा; ओवरसियर राघव को सांस तक लेने की फुर्सत नहीं. ऐसे में, नुक्कड़- नाटक वालों का कहर... लाउडस्पीकर पर कानफोडू, नाटकीय सम्वाद!! प्रवेश- द्वार पर आये दिन, उनका जमावड़ा रहता. अर्दली बोल रहा था- यह मजदूरों को भड़काने की साज़िश है. नुक्कड़- नाटिका के ज्यादातर विषय, समाजवाद के इर्द गिर्द घूमते. एक दिन तो हद हो गयी. कोई जनाना आवाज़ चीख चीखकर कह रही थी, “बोलो कितना और खटेंगे– रोटी के झमेले में?? होम करेंगे सपने कब तक - बेगारी के चूल्हे में?! लाल क्रांति का समय आ गया... फिर एक बार!” वह डायलाग सुनकर, राघव को वाकई, किसी षड्यंत्र की बू आने लगी थी. उसने मन में सोच लिया, ‘ अब जो हो, इन बन्दों को धमकाकर, यहाँ से खदेड़ना होगा- किसी भी युक्ति से. चाहे अराजकता का आरोप लगाकर,…

कहानी - अनुत्तरित प्रश्न - विनीता शुक्ला

चित्र
वह तथाकथित जिम सीलन से भरा था. जमीन पर बिछा, टाट के बोरे जैसा कारपेट, हवाओं में रेडियो मिर्ची के सुरों की धमक और यहाँ वहां उड़ने वाले पसीने के भभके. कसरत- वर्जिश वाला यह औरतों का स्लॉट था. थुलथुल देह वाली स्त्रियाँ, ट्रेडमिलों और एक्सरसाइजिंग साइकलों पर जुटीं- दौड़तीं, हांफतीं, साँसें भरतीं. स्पीडोमीटर के ग्राफ, उनकी ‘पुअर परफॉरमेंस’ की चुगली करते हुए! सुनन्दा ने बौखलाहट में, कमरे का मुआइना किया. ‘टारगेट’ पूरा करने को, जूझती महिलायें...परस्पर मशीन और बदन के नट- बोल्टों की जुगलबन्दी ... असाध्य करतब...चित्र- विचित्र मुद्राओं में अटकती, लटकती, मटकती बालाएं! ट्विस्टर पर कमर फिरकनी सी नचातीं, नटी की तरह बैलेंसिंग बीम पर, पैर जमातीं या फिर रोइंग- मशीन पर, जोर- आजमाइश करतीं. सुनन्दा ने बोतल का पानी, एक ही सांस में गटक लिया. माथे पर उभर आयी पसीने की बूंदों को नैपकिन से पोंछा. बिना कुछ किये ही, उनका ये हाल था. सहसा फ्लोर एक्सरसाइज कर रही युवती का ध्यान, उनकी तरफ खिंचा. वह फौरन उठ खड़ी हुई और सुनन्दा से पूछा, “आप न्यू- मेम्बर हैं?” उन्होंने बिन बोले ही, अपना परिचय- पत्र, उसकी तरफ बढ़ा दिया. वह औचक…

बाल कहानी - सूजी-पोपो और जन्मदिन की पार्टी - उपासना बेहार

चित्र
घूंधराले वालों वाली सूजी एक प्यारी सी बच्ची थी. वह कक्षा 4 में पढ़ती थी. एक दिन सूजी अपने दोस्त अकबर के घर गई तो देखा कि उसके हाथ में सफेद रुई जैसे बिल्ली के 2 छोटे बच्चे हैं. बच्चे बहुत ही सुंदर और नाजुक थे, इतने छोटे बिल्ली के बच्चों को उसने पहली बार देखा था. “ कितने प्यारे बच्चे हैं, काश मेरे पास भी ये होते” सूजी दुखी हो कर बोली. अकबर ने कहा “इनमें से एक बच्चा तुम रख सकती हो, ये तुम्हारे जन्मदिन का गिफ्ट है”. कुछ दिनों बाद ही सूजी का जन्मदिन आने वाला था. “सच में, मैं अभी घर जा कर मां को इसे दिखाती हूँ”. सूजी खुशी से चहक उठी और बिल्ली के बच्चे को लेकर घर की ओर दौड़ लगा दी. “मम्मी देखो अकबर ने मुझे जन्मदिन में क्या गिफ्ट दिया है”. मम्मी ने उसके हाथ में सफेद छोटा सा बिल्ली का बच्चा देखा. सूजी ने खुश होते हुए कहा “मम्मी हम इसका नाम पोपो रखेगें”. मम्मी ने तुरंत पोपो के लिए एक बक्से में कपड़े और रुई लगा कर घर बना दिया और उसे सूजी के कमरे में रख दिया. सूजी पोपो के साथ खेलने में लग गई. शाम में सूजी ने अपने दोस्तों को पोपो से मिलवाया. सूजी के जन्मदिन को एक दिन बाकी था, मम्मी ने उससे कहा कि …

हास्य कविता - एक तरफ़ा प्यार - सूर्यकुमार पांडेय

चित्र
सूर्यकुमार पांडेय की हास्य कविता -"एकतरफ़ा प्यार" इक चाँदनी-सी लड़की, स्मार्ट दिख रही है  वह दूर देश से ख़त 'इन्बॉक्स' लिख रही है। उससे नहीं मिला मैं, मुझसे नहीं मिली वह  मैं जानता नहीं हूँ, किस बाग़ की लिली वह। ख़ुशबू  हरेक अक्षर में  गीत भर रही है पर एक ख़त वो कइयों को टैग कर रही है ।  जिस-जिस को ख़त मिला, वह उन सबको अपनी लगती  आकांक्षा मिलन की हर हृदय में सुलगती। है शशिमुखी, सभी का तम दूर कर रही है  वह चाँदनी सभी के आँगन में भर रही है । यह मानता हूँ, चेहरा लाखों में एक उसका  यूँ भाव से है सच्ची, पर चित्र 'फेक'उसका । कुछ ग़लत लिख गया तो अब एंड कर ही देगी  यह भी पता है, मुझको  'अनफ़्रेन्ड' कर ही देगी। इक चाँदनी-सी चाहत से, हाय! डर रहा हूँ वह 'फेक' है या 'रीयल', मैं प्यार कर रहा हूँ। oo

सुशील शर्मा के हाइकु

चित्र
हाइकू -24
गौरैया
सुशील शर्मा चोंच में दाना
उठा उड़ी गोरैया
चुगाती चूजे।कब आओगी
गौरैया मेरे द्वार
दाना चुगने।पेड़ पर है
तिनकों का घोंसला
गौरैया नहीं।नन्ही गौरैया
फुदक फुदक कर
दाना चुगती।मुन्ने के सिर
फुदक रहा चूजा
प्रेम बंधन।अंजुरी भर
प्रेममयी गोरैया
स्नेहिल स्पर्श।
----हाइकू -16विविधसुशील कुमार शर्मा1. नीली सी आँखेकौन कहेगा इन्हेंकत्लोगारत।2. तुझ से इश्कनहीं था शौक मेरामज़बूरी थी।3. यादों के बक्सेसहेजे चंद पल मुलाकातों के।4. तुमसे कभीमुलाकात न हुईख्वाब था टूटा।5. तुम दूर थेलेकिन जुदा न थेअब फासले।6. खूबसूरततेरा चेहरा न थातेरी सादगी।7. सोता शहरअंदाज है गजबगूंगे बहरे।8.उरी घटनाख़ौलता मेरा खूनजबाब मौन।9.नापाकी नक्शामिटा दो जमीन सेजुमले छोड़ो।11.सैनिक लाशेंमांग रहीं इंसाफबोलो तो साब।हाइकू -17कवि और कवितासुशील कुमार शर्मा1. कवि सपेराभावों की पिटारीशब्दों के सांप।2. कवि ह्रदयजैसे जल कमलशुद्ध निर्लेप।3. कवि का कर्मनव जीवन संचारउच्च विचार।4. कवि का मनप्रेम से परिपूर्णशाश्वत दृष्टी।5. पहुंचे कविजहाँ न जाये रविअतुलनीय।6. कवि का कामसत्य परिभाषितमन झंकृत।7.महान कविअहंकार से परेशिशु सदृश्य।8 .कवि की कृतिसौंदर्य अनुभ…

लघु कथाः वफादारी / गिरधारी राम

चित्र
एक कूड़ा बिनने वाला लड़का कोई चौदह-पंद्रह साल का होगा मैले-कुचले, फटे कपड़े पहन रखा था। शाम के समय कूड़ेदान के आस-पास कूड़ा बिन रहा था। उसके पास एक बोरी में कूड़ा इक्कठा हुए था ( उपयोगी कूड़े जैसे प्लास्टिक, लोहा, पेपर, या टूटी-फूटी चीजें जिसको रिसायकिल किया जा सके) और कुछ अभी ढूँढ रहा था तभी उसको आठ-दस की संख्या में कुत्ते उसको घेर लिए और जोर-जोर से भौंकने लगे, लगता था कि उस लड़के को अभी कुत्ते काट ही लेंगे चोर समझ कर। वह लड़का रुक गया और घबराकर जोर-जोर से आवाज देने लगाः सुमित..........सुमित........सुमित......! तुम कहाँ हो.............? अभी भी कुत्ते उसे घेरे हुए थे और उस लड़के को या उसके समान को नोचने वाले ही थे, फिर एक बार वह लड़का और जोर-जोर से आवाज देने लगाः सुमित.........सुमित............सुमित.............! लड़के की आवाज सुनकर एक सफेद रंग का कुत्ता उन कुत्तों के पीछे से दुम हिलाता हुआ उस लड़के के पास पहुँच गया, वह लड़का कुत्ते को पुचकारने लगा और निर्भीक हो गया, तभी बाकी के कुत्ते वहाँ से दूर खिसक गये। वह लड़का उस सुमित (कुत्ता) से बात कर रहा था और सुमित से बोलाः देखा सुमित ये स…

सूर्यकुमार पांडेय की हास्य बाल कविताएँ

चित्र
1 बछड़ा बोला गाय से- दूध नहीं पीना मुझको काम चलेगा चाय से। 2 बिल्ली बोली शेर से- सही समय पर आओ स्कूल क्यों आते हो देर से? 3 बंदर बोला भेड़ से- अगर कहा मामा मुझको कूद पड़ूँगा पेड़ से। 4 हाथी बोला ऊँट से- प्यास बुझाऊँ मैं कैसे पानी की दो घूँट से? 5 लौकी बोली भिंडी से- जाती हो तो जाओ घर फिर लौट न आना मंडी से। 6 आलू बोला गोभी से- ज़रा बता दो, कपड़े तुम धुलवाती हो किस धोबी से! 7 मिर्ची बोली सेम से- झगड़े छोड़ें अब हम-तुम रहें साथ में प्रेम से। 8 बैंगन बोला प्याज़ से- इतना महँगा अगर बिके  खुट्टी  अपनी आज से।

सफ़ेद दाग़ / कहानी / क़ैस जौनपुरी

चित्र
क़ैस जौनपुरी qaisjaunpuri@gmail.com +91 9004781786 09:05am, 17 June 2016 कहानी सफ़ेद दाग़इला बड़ी देर से बस के आने का इन्तज़ार कर रही थी. काफ़ी लम्बे इन्तज़ार के बाद जब बस आई, तो इला भीड़ के साथ बस में चढ़ तो गई, लेकिन बैठने के लिए उसे सीट नहीं मिली. उसने भीड़ से खचा-खच भरी हुई बस से उतर जाना चाहा, ये सोचकर कि, “अगली बस से चलूँगी.” लेकिन इससे पहले कि वो भीड़ को चीरकर उतर पाती, बस चल दी थी. अब उसे खड़े-खड़े ही सफ़र करना था. वैसे तो उसे बस में खड़े रहने में कोई दिक़्क़त नहीं होती थी, क्योंकि अब तो उसे इसकी आदत हो चुकी थी. लेकिन आज उसकी तबियत कुछ ख़राब थी, इसलिए उससे खड़े नहीं रहा जा रहा था. वो बैठना चाहती थी, लेकिन बस पूरी भरी हुई थी. बस में एक के बाद एक, और इसी तरह से ढेर सारे लोग चढ़ते जा रहे थे, कण्डकर टिकट काटता जा रहा था, और भीड़ को देखकर इला की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. फिर वही हुआ, जो वो नहीं चाहती थी. उसे ऐसा लगा कि, “अब मुझे उल्टी हो जाएगी. भरी बस में लोग मुझे उल्टी करते हुए देखेंगे, तो क्या सोचेंगे?” ये सवाल उसके मन को अच्छा नहीं लग रहा था. इसलिए वो नहीं चाहती थी कि कोई उसकी तरफ़ देखे या उसके ऊपर ध्…

गुरुत्व (व्यंग्य-कविता)-प्रदीप कुमार साह

चित्र
गुरुत्व (व्यंग्य-कविता)-प्रदीप कुमार साह (psah2698@gmail.com)जब निष्कपट निज कर्म करो तब बनो स्वभिमानी.मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.दो शब्द कहूँ-कुछ भी न कहूँ, खुद हो उत्तम ज्ञानी.यत्न करो-अपना गुरुत्व पुनः प्राप्त करो, आँख में भर लो पानी.मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.ईश्वर ने तुम्हें दी कीर्ति, आशीष मिला कि तू बन ज्ञानी.कबीर दोहे ने 'सदैव देव के आगे रहना' वह मान भी दिलाया ही.अंकित किया गुरु-महत्व ग्रन्थों ने, अब छोड़ो नादानी.पर उलझ गए इस रूप में क्यों, खुद ही को समझ पड़े अति दानी?मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.बच्चे माता से नवजीवन पाते औ पिता से सदैव सुरक्षा.बहु विधि बहुत सुख बरसे, पर सब तज आते पाने कुछ शिक्षा.भाई-बंधु का असीमित सहारा, पर क्यों मांगे वह भिक्षा?कुछ शर्म करो, निष्कपट निज कर्म करो,दो उसको उसकी दीक्षा.मत बनो इतना अभिमानी, शर्म करो कि-आँख में भर लो पानी.देव साधक का संशय हरते औ महिमामंडित गुरु का करते,प्रथम गुरु हैं माता-पिता ही, पर स्वयं ही वह क्यों समझाते-कि जीवन में कुछ करना है तो, सदैव शिक्षक का सम्…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.