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October 2016
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लेखक के द्वारा लिखी कहानी से परदे पर उतरनेवाली फिल्म तक की प्रक्रिया बहुत लंबी है। यह प्रक्रिया विविध चरणों, आयामों और संस्कारों से अपने मकाम तक पहुंचती है। एक लाईन में बनी फिल्म की कहानी या यूं कहे कि दो-तीन पन्नों में लेखक द्वारा लिखी कहानी को फिल्म में रूपांतरित करना एक प्रकार की खूबसूरत कला है। इस रूपांतर से न केवल लेखक चौकता है बल्कि फिल्म के साथ जुड़ा हर शख्स चौकता है। टूकड़ों-टूकड़ों में बनी फिल्म जब एक साथ जुड़ती है तो एक कहानी का रूप धारण करती है। फिल्मों का इस तरह जुड़ना दर्शकों के दिलों-दिमाग पर राज करता है। लेखक से लिखी कहानी केवल शब्दों के माध्यम से बयान होती है परंतु फिल्म आधुनिक तकनीक के सहारे से ताकतवर और प्रभावी बनती है। "सिनेमा ने परंपरागत कला रूपों के कई पक्षों और उपलब्धियों को आत्मसात कर लिया है – मसलन आधुनिक उपन्यास की तरह यह मनुष्य की भौतिक क्रियाओं को उसके अंतर्मन से जोड़ता है, पेटिंग की तरह संयोजन करता है और छाया तथा प्रकाश की अंतर्क्रियाओं को आंकता है। रंगमंच, साहित्य, चित्रकला, संगीत की सभी सौंदर्यमूलक विशेषताओं और उनकी मौलिकता से सिनेमा आगे निकल गया है। इसका सीधा कारण यह है कि सिनेमा में साहित्य (पटकथा, गीत), चित्रकला (एनीमेटेज कार्टून, बैकड्रॉप्स), चाक्षुष कलाएं और रंगमंच का अनुभव, (अभिनेता, अभिनेत्रियां) और ध्वनिशास्त्र (संवाद, संगीत) आदि शामिल हैं। आधुनिक तकनीक की उपलब्धियों का सीधा लाभ सिनेमा लेता है।" (संदर्भ विकिपिड़िया) यहां हमारा उद्देश्य सिनेमा निर्मिति का संक्षिप्त परिचय करवाना है और इस परिचय के दौरान फिल्म निर्माण के चरण और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यहां हमारा उद्देश्य फिल्म निर्माण की प्रक्रिया किस प्रकार घटित होती है और उसकी प्रमुख सीढ़ियां कौनसी है, इस पर प्रकाश डालना है। इसकी कई छोटी-बड़ी सीढ़ियां है परंतु यहां उसमें से प्रमुख सत्रह सीढ़ियों का संक्षेप में एक क्रम के तहत विवरण है।

1. एक वाक्य की कहानी (One line story)

फिल्म निर्माताओं के सामने कोई व्यक्ति इसी रूप में कहानी को लेकर जाता है। लेखक की कहानी पांच पन्ने की दस पन्ने की या इससे भी बड़ी हो सकती है। कोई उपन्यास या नाटक भी हो सकता है। विषय की विविधता के हिसाब से उसकी लंबाई हो सकती है। परंतु किसी निर्माता को मौखिक तौर पर बताते वक्त उसे कुछ वाक्यों में बयान करना पड़ता है इसे एक वाक्य की कहानी या One line story कहा जाता है। दूसरे शब्दों में इसे आयड़िया या चमकता विचारसूत्र भी कहा जाता है।

2. पूर्ण कहानी बनाने की प्रक्रिया

विचार-सूत्र या एक वाक्य की कहानी को विकसित कर एक पूरी कहानी बनाई जाती है। निर्माता इस कहानी का चयन और आवश्यक परिवर्तन करता है और सबकी स्वीकृति के लिए रखा जाता है। इसे फिल्‍म की कथा कह सकते हैं।

3. पात्रों का चुनाव

कहानी स्वीकृत हो जाने पर उसके अनुकूल मुख्य पात्रों (Hero & Heroines) के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होती है। निर्माता-निर्देशक जिन पात्रों पर मुहर लगाते हैं उनके अनुमति की भी जरूरत होती है, अतः पात्रों के पास कहानी पढ़ने और स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। कभी-कभार सबको इकठ्ठा बुलाकर कहानी का मौखिक वाचन होता है। अर्थात् पात्रों के चुनाव के बाद उनकी स्वीकृति प्राप्त होना भी अत्यंत आवश्यक होता है।

4. पटकथा निर्माण

फिल्‍म की कथा को पटकथा में ढाले बिना फिल्‍म निर्माण बड़ा जटिल होता है। पटकथा लेखक या निर्देशक द्वारा कहानी की पटकथा सिनेमा के फिल्‍मांकन के अनुरूप तैयार की जाती है। पटकथा एक नहीं अनेक होती हैं जिसमें कॅमरा परसन और अभिनेताओं समेत सभी जरूरी लोगों के लिए आवश्‍यकता के अनुरूप पटकथाएं तैयार की जाती हैं। पटकथा लिखने के बजाय या फिर उस पर हू-बहू चलने के बजाय वह लगातार बदलती रहती है।

5. संवाद लेखन

पटकथा की तैयारी के साथ-साथ संवाद लेखक का आगमन होता है तथा निर्देशक की सलाह से दृश्‍यों का ध्‍वनिकरण (Spoken Expression) करना तथा इससे जरूरी काट-छांट संभव हो जाती है और इससे पटकथा का नाटकीय विधान तन जाता है, उसमें कसाव पैदा होता है। पटकथा में स्‍पेसीफिक्स यानी समय, जगह और इनड़ोर तथा आउटड़ोर जैसी सूचनाएं होती है।

6. बजट बनाना

निर्माता द्वारा बजट (Budgeting) पर बातचीत तथा बजट के अनुरूप पटकथा का समायोजन एवं बदलाव जरूरी होता है। वास्‍तव में देखें तो बजट पटकथा पर दबाव बनाता है जिसके चलते पटकथा से कई दृश्‍य काट-छांट दिए जाते हैं।

7. फाइनेंसर और वितरक

फाइनेंसर और वितरक इसी दौरान स्‍टोरी सुनने आ जाते हैं। साथ ही वे तय करते हैं कि फिल्‍म में कितने गीत-नृत्‍य होंगे। इन दोनों की भूमिका कई बार निर्देशक की परिकल्‍पना को भी प्रभावित करने लगती है। अभिनेताओं के चयन में हेर-फेर भी इनके चलते कई बार करना पड़ता है।

8. संगीत और गीत

इसी दौरान संगीत निर्देशक के साथ पूरी तकनीकी यूनिट से संपर्क किया जाता है और संगीत और गीत रिकार्डिंग के काम के लिए समझौता (Contract) साइन कर लिया जाता है। कोरियोग्राफी की भूमिका भी जबर्दस्‍त होती है। गीत-नृत्‍य की शूटिंग अलग से की जाती है।

9. शूटिंग, लोकेशन्स और स्टूड़ियो

अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की सुविधा के अनुसार शूटिंग की तारीखों और लोकेशन्‍स या स्‍टूड़ियों का निश्‍चय किया जाता है। स्‍टूड़ियो की शूटिंग एक समय सबसे महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी लेकिन समानांतर फिल्‍मकारों ने इससे बाहर निकलकर वास्तविक लोकेशन्‍स पर ही फिल्‍मांकन को तवज्‍जोह दी। इसमें रुपयों के लागत (Flow of Money) का भी ध्‍यान रखना पड़ता है। फिल्‍म कैसे और कहां और कितने समय तक शूट की जाएगी यह बहुत कुछ धन की उपलब्‍धता पर भी निर्भर करता है।

10. दृश्य संपादन

शूट की गई फिल्‍म के गैर तराशे अंशों को रशेस कहते हैं। इससे कहानी की क्रमिकता की पहचान की जा सकती है। संपादक तैयार Rushes को देखते हैं और अन्‍य फिल्‍मी हिस्‍सों से मिलान कर उनका संपादन कर लेते हैं। संपादक फिल्‍मों के रफ कट तैयार कर शूटिंग के दौरान निर्देशक को दिखाते चलते हैं और जरूरी बदलावों को उसी समय नोट कर लिया जाता है। फाइनेंसर और डिस्ट्रीब्‍यूटर को ये Rushes दिखाए जाते हैं जिसके आधार पर उनसे आगे पैसा लिया जा सके।

11. लिप-सिंक

अधिकांश एक्‍टर सेट पर ही अपनी रिहर्सल करते हैं और संवादों को वहीं दुहराते हैं। संवादों को बाद में अलग से डब किया जाता है, जिससे शूटिंग के दौरान सिर्फ लिप-सिंक की जरूरत होती है।

12. पार्श्व संगीत और पार्श्व ध्वनियों का रिकॉर्डिंग

संगीत कंपोजर को पूरी फिल्‍म दिखाकर उसका संगीत रिकॉर्ड करवा लिया जाता है। साथ ही, वह पार्श्‍व ध्‍वनियों का भी अभिलेखन (रिकॉर्ड) कर लेता है।

13. डबिंग

संपादक सारी पार्श्‍व ध्‍‍वनियों, संवादों और विशेष ध्‍वनि प्रभावों को फिल्‍म के साथ जोड़ देता है। यह प्रकिया डबिंग कहलाती है। संवादों को डब करने के लिए हीरो और हीरोइन समेत सह अभिनेताओं को कई बार स्‍टूड़ियो आना पड़ता है। डबिंग पूरी होने पर इसे दृश्‍य फिल्‍म के साथ तकनीकी दक्षता से जोड़ दिया जाता है।

14. सेंशर बोर्ड

फिल्‍म सेंशर बोर्ड के पास प्रमाणपत्र लेने हेतु भेजी जाती है और सेंशर द्वारा सुझाए बदलावों को संपादक, निर्देशक की अनुमति से समाहित कर लेता है।

15. रि-रिकॉर्डिंग

पूरी फिल्‍म का पुनर्अभिलेखन (रि-रिकॉर्डिंग) होता है। इस बीच गीतों और टी.वी. शो तथा ट्रेलर आदि के जरिए फिल्‍म दर्शकों में जिज्ञासा जगा चुकी होती है।

16. प्रिंट रिलिज

कर्इ रिलिज प्रिंट तैयार किया जाते हैं। वितरकों को समझौते के अनुसार ये प्रिंट उपलब्‍ध कराए जाते हैं।

17. प्रदर्शन

प्रेस के लिए प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं। इससे प्रिंट मीड़िया में भी फिल्‍म की समीक्षाएं आनी प्रारंभ हो जाती हैं और फिल्‍म दर्शकों को खीचनें में कामयाब होती है। अन्‍य अनेक स्‍तरों मसलन पोस्‍टर आदि द्वारा भी व्‍यापक प्रचार-प्रसार अभियान चलाया जाता है और सिनेमा थिएटरों में फिल्‍म प्रदर्शित कर दी जाती है। (-संदर्भ, डॉ. रामप्रकाश द्विवेदी, फिल्म निर्माण की प्रक्रिया )

सारांश

सिनेमा निर्माण और संघर्ष हमेशा जारी रहता है। यह संघर्ष सिनेमा से जुड़े हर शख्स की जिंदगी का हिस्सा होता है। सिनेमा निर्माताओं के हाथों में सिनेमा निर्माण करना, उसका प्रचार-प्रसार एवं प्रमोशन करना होता है, लेकिन उस सिनेमा की सफलता-असफलता दर्शकों पर निर्भर होती है। अतः फिल्म निर्माण क्षेत्र में केवल निर्मिति करना निर्माण करनेवाले का कार्य है। अगर निर्मिति में त्रूटियां रहेगी, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत और संगीत में कमजोरियां रहेगी तो इसका असर फिल्म की कमाई पर होता ही है, साथ ही फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति के भविष्य पर भी इसका असर पड़ता है। जिस तरह कोई लेखक किसी उपन्यास या कहानी का निर्माण करता है वैसे ही फिल्म का निर्माण भी होता है। कहानी पहले से लिखी होती है परंतु उस कहानी को फिल्म के भीतर बाजार और दर्शक के हिसाब से ढालना लंबी प्रक्रिया है। इस प्रक्रियां में कई लोग कई कलाओं के साथ जुड़ जाते हैं। इनका समायोजन और मिलाप करना फिल्म निर्मिति क्षेत्र का कौशल माना जाता है।

मूलतः फिल्म निर्मिति का क्षेत्र जितना आसान लगता है उतना आसान नहीं है। सफल फिल्म निर्माण के लिए अच्छे प्लॅनिंग की जरूरत होती है। अपने फिल्म के लिए कौनसे दर्शक आ सकते हैं, उनकी मनोरंजन को लेकर मांगे कौनसी हैं? उनके सपनें और अपेक्षाएं क्या हैं? फिल्म निर्माण से सृजनात्मक मांग कितनी की जा रही है? निर्देशक और निर्माता का तालमेल कितना है? फिल्म का बजट कितना है? जिस फिल्म को बना रहे हैं वह बाजार में टिकेगी या नहीं? उसकी मार्केटिंग पॉलिसी क्या होगी? आदि बातों का ध्यान निर्माताओं को रखना पड़ता है। दुघर्टना का बीमा होता है परंतु फिल्मों के असफल होने का बीमा नहीं होता है, अतः इस बात को ध्यान में रखें तो फिल्म निर्माण बड़ी जोखिम का कार्य होता है। घरों-घरों में आसानी से उपलब्ध टी. वी. मनोरंजन भी फिल्म निर्माण के लिए चुनौती दे रहा है। किसी भी फिल्म के रिलिज होते ही आधुनिक तकनीकों के चलते उसकी पायरसी भी आम बात बन चुकी है जो निर्माण क्षेत्र का नुकसान कर रही है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.

  2. विकिपिड़िया ई-स्रोत

  3. सिनेमा के चार अध्याय – डॉ. टी. शशिधरन्, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014.

  4. हिंदी सिनेमा का सच – (सं.) मृत्युंजय, समकालीन सृजन, कलकत्ता, अंक 17, 1997.

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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मिलकर दीप जलाएँ

आओ मिलकर

दीप जलाएँ,

ऐसा दीप कि जिसमें डूबे

अंधकार मानव के मन का।

अपनी सुकर रश्मियों से जो

स्नात करे संपूर्ण विश्व को

आलोकित जग के आँगन में

शापग्रस्त पीढ़ी मुस्काए,

मनु की यह संतान मनों से

भेद-भाव का पाप मिटाए।

द्वेष-दंभ-पाखंड

दिशाओं में ऐसा विष घोल रहे हैं,

अपने फूल चमन, तरु अपने,

अपना उपवन अपने सपने,

अंतर में अंतर पैदा कर

संघर्षों की भाषा के स्वर

ऐसे मिलकर बोल रहे हैं,

जैसे हों संघर्ष सत्य

शाश्वत अविनाशी

और इन्हीं को अपनाकर सब

जीवन को जी लेंगे सुख से

मुक्ति प्राप्त कर लेंगे दुख से,

बारूदी नगरी के वासी

बुद्धिविलासी

मानव को फिर से समझाएँ,

आओ मिलकर दीप जलाएँ।

कर्मशक्ति का तरुवर

आलस की धरती पर

सूख गया है,

वैभव की हरियाली

कैसे मिल सकती है

चमन छोडक़र भाग गए तो

फिर बतलाओ

ख़ुशहाली की यह फुलवारी

खिल सकती है?

कर्मठता अभिशप्त भाग्य का

मैल काटकर

मेल कराती सुख-निधियों से,

और तप्त जीवन की

रेतीली राहों को

रसभीने झरनों से भरती,

थके हुए पाँवों की पीड़ा

हरती अपने ही हाथों से,

याद करें अपने गौरव को

कर्म-धर्म का चक्र चलाएँ,

आओ मिलकर दीप जलाएँ।

एटम-जैट-सुपरसॉनिक के

इस कलियुग में

दूरी का परिमाप सिमटकर

पास आ गया,

तन की पहुँच क़रीब हुई जब

मन की दूरी बढ़ती जाती

प्यार-स्नेह-अपनत्व मनुजता

प्रेम-सरलता श्रद्धा-ममता,

घटती जाती हृदय-कोष से,

मिटती जाती चंदन की पावन सुगंध,

मादकता गुलाब की,

सरसों का उल्लास

सुकोमलता जूही की,

खेत उगे कीकर के

सरकंडे भनियाते,

आओ फिर से वासंती खेती उपजाएँ

आओ फिर से दीप जलाएँ।

 

डा. गिरिराजशरण अग्रवाल

बी 203 पार्क व्यू सिटी-2

सोहना रोड, गुडगाँव

07838090732

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दीपावली की शुभकामनायें

धन की देवि !

महालक्ष्मी का पर्व

दीपों का साथ

इस बार शौर्य का हाथ

सीमाओं पर सजगता

और निरन्तर

सुरक्षा का आभास

पाक की नापाकियत

से हरपल सावधान करता

देश सबसे पहले

का सन्देश देता

आगया

नन्हा सा दीप

बने सभी के पथ का प्रदीप

हर तरह के तमस को हरने को

जल उठें सुदीप

दिल का दिल से

हो सच्चा नाता

हर सांस से निकले

जय भारत माता

जय भारत शत्रु त्राता

इसी भाव से

दिल के हर भाग से

आप सभी को

अनन्त शुभकामनायें

कोटिशः मंगल कामनायें !!

 

शशांक मिश्र भारती

– संपादक देवसुधा, हिंदी सदन बड़ागांव शाहजहाँपुर उप्र

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दीवाली गीत

 

वैभव का श्रृंगार कर
माँ लक्ष्मी चली पग-पग
दीप जले जगमग-जगमग --------

अन्न धन सम्पन्नता
साथ चली अपार
थोड़ा सा कृपा से
चल पड़े व्यापार
खुशियों की माला पिरो
जगजननी हुई दग-दग
दीप जले जगमग-जगमग ----------

दुर्जन का दुर्ग तोड़
माँ भक्तो का पुकार सुन
निशाचर दरिद्र भाग खड़े
माँ का हुंकार सुन
गणपति गणनायक चले
आज संग-संग
दीप जले जगमग-जगमग -----------

अक्षय चन्द्र ललाट शोभित
ग्रह नक्षत्र चहुंओर
राकेश रौशन हो जाए
जपत भए माँ भोर
कृपा से हो गर्भित
चाहे ले कोई ठग
दीप जले जगमग-जगमग -------------

------ राकेश रौशन
मनेर  (बलवन टोला ) पोस्ट आॅफिस मनेर
पटना - 801108

मो:9504094811

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*ज्योतिर्मय हो दीवाली*

हम सब की पावन ज्योतिर्मय हो दीवाली।
सब कड़वाहट पी लें हम हो मन खाली।

जो भी कष्ट दिए तुमने मैंने सब माफ़ किये।
जो भी बातें बुरी लगी हों कर देना दिल से ख़ाली।

देश और विश्व कल्याण की बातें हम सब करते हैं।
आस पड़ोस के रिश्तों में क्यों खींचा करते हम पाली।

इस दीवाली पर हम सब मिल कर प्रण करते।
तेरे घर मेरा दीपक हो मेरे घर तेरी हो थाली।

प्रेम के दीपक जलें ख़ुशियों के बंदनवार सजें।
विश्वासों की उज्ज्वल ज्योति हम सब ने मन में पाली।

*(सभी प्रिय जनों को दीपावली की मंगल कामनाएं)*

सुशील शर्मा

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दीपावली शुभकामनाएँ

पर्व है पुरुषार्थ का
दीप के दिव्यार्थ का
देहरी पर दीप एक जलता रहे
अंधकार से युद्ध यह चलता रहे
हारेगी हर बार अंधियारे की घोर-कालिमा
जीतेगी जगमग उजियारे की स्वर्ण-लालिमा

झिलमिल रोशनी में निवेदित अविरल शुभकामना
आस्था के आलोक में आदरयुक्त मंगल भावना!!!

आपके परिवार को दीपावली की शुभकामनाएं !

May your life be full of lights of all shades ! 

--

फूलदीप कुमार

संपादक डी आर डी ओ समाचार तथा प्रोद्योगिकी विशेष

रक्षा वैज्ञानिक सूचना तथा प्रलेखन केंद्र (डेसीडॉक) , 

रक्षा अनुसन्धान तथा विकास संगठन (डी आर डी ओ ) ,

दिल्ली-110054

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चलो, दिवाली आज मनायें

हर आँगन में उजियारा हो, तिमिर मिटे संसार का।

चलो, दिवाली आज मनायें, दीया जलाकर प्यार का।

सपने हो मन में अनंत के, हो अनंत की अभिलाषा।

मन अनंत का ही भूखा हो, मन अनंत का हो प्यासा।

कोई भी उपयोग नहीं, सूने वीणा के तार का ।

चलो, दिवाली आज मनायें, दीया जलाकर प्यार का।

इन दीयों से दूर न होगा, अन्तर्मन का अंधियारा।

इनसे प्रकट न हो पायेगी, मन में ज्योतिर्मय धारा।

प्रादुर्भूत न हो पायेगा, शाश्वत स्वर ओमकार का।

चलो, दिवाली आज मनायें, दीया जलाकर प्यार का।

अपने लिए जीयें लेकिन औरों का भी कुछ ध्यान धरें।

दीन-हीन, असहाय, उपेक्षित, लोगों की कुछ मदद करें।

यदि मन से मन मिला नहीं, फिर क्या मतलब त्योहार का ? 

चलो, दिवाली आज मनायें, दीया जलाकर प्यार का।

 

आचार्य बलवन्त,

 विभागाध्यक्ष हिंदी

कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीस

450,ओ.टी.सी.रोड,कॉटनपेट,बेंगलूर-560053

मो. 91-9844558064

Email- balwant.acharya@gmail.com

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दोहे रमेश के  दिवाली पर

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संग शारदा मातु के, लक्ष्मी और गणेश !

दीवाली को पूजते, इनको सभी 'रमेश !!

सर पर है दीपावली, सजे हुवे बाज़ार !

मांगे बच्चो की कई ,मगर जेब लाचार !!

बच्चों की फरमाइशें, लगे टूटने ख्वाब !

फुलझडियों के दाम भी,वाजिब नहीं जनाब !!

दिल जल रहा गरीब का, काँप रहे हैं हाथ !

कैसे दीपक अब जले , बिना तेल के साथ !!

बढ़ती नहीं पगार है, बढ़ जाते है भाव !

दिल के दिल में रह गये , बच्चों के सब चाव!!

कैसे अब अपने जलें, दीवाली के दीप !

काहे की दीपावली , तुम जो नहीं समीप !!

दुनिया में सब से बड़ा, मै ही लगूँ गरीब !

दीवाली पे इस दफा, तुम जो नहीं करीब !!

दीवाली में कौन अब , बाँटेगा उपहार !

तुम जब नहीं समीप तो, काहे का त्यौहार !!

आतिशबाजी का नहीं, करो दिखावा यार !

दीपों का त्यौहार है,….. सबको दें उपहार !

पैसा भी पूरा लगे ,........ गंदा हो परिवेश !

आतिशबाजी से हुआ,किसका भला "रमेश" !!

आपा बुरी बलाय है, करो न इसका गर्व !

सभी मनाओ साथ में , दीवाली का पर्व !

हाथ हवाओं सहज ,.. मैंने आज मिलाय !

सबसे बड़ी मुंडेर पर, दीपक दिया जलाय !!

रमेश शर्मा

९७०२९४४७४४

rameshsharma_१२३@yahoo.com.

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दीपावली

2 बाल गीत

(1)

दीपों का त्योहार है आया

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जगमग ज्योति चमके,

अंदर बाहर गलियों में।

ढोल ढमाके-ढमके

गली गांव हर कोने में।।

कोई फोड़े एटम बम,

कोई अनार चलाए।

फूटे फटाके फटफट,

दूर हटे सब झटपट।।

 

(2)

खुशियों का संसार सजाया,

घर आँगन रंगों से रंगाया।

बच्चों के मन को हरसाया,

दीपों का त्योहार है आया।।

ढेरों खुशियाँ लाई दीपवाली,

खिल बतासे लाई दीपावाली।

जगमग करती आई दीपावाली,

सबके मन को भाई दीपावाली।।

 

कैलाश मंडलोंई

पता : मु. पो.-रायबिड़पुरा तहसील व जिला- खरगोन (म.प्र.)

पिनकोड न.451439

मोबाईल नम्बर-9575419049

ईमेल ID-kelashmandloi@gmail.com

कैलाश मंडलोंई

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वचन मत देना

सरजू भइया खुद तो भगवान को प्यारे हो गए पर जाते-जाते जीवन सुरक्षित करने के नाम पर अपनी बेटी सरस्वती का जीवन नर्क बना गये साथ ही अपने लँगोटिया यार के बेटे का भी। सरजू के लँगोटिया यार यानी रामबरन। रामबरन एकलौते बेटे लल्लन के एक सीधे-साधे पिता थे। उधर सरजू की भी एकलौती बेटी थी सरस्वती। सरजू और रामबरन की बचपन से ही बड़ी गहरी दोस्ती थी। दोनों मध्यम वर्गीय परिवारों से थे। इंटर तक की पढ़ाई दोनों ने साथ-साथ की थी पर आगे चल कर समय और परिस्थितियों ने दोनों को दूर कर दिया था। रास्ते की दूरियाँ तो हुईं पर दोनों के दिल सदा एक दूसरे के समीप ही रहे। जवानी की देहलीज पर खड़े, हँसते खेलते सरजू के परिवार पर अचानक गाज गिर पड़ी। सरस्वती पांच साल की भी पूरी नहीं हुई थी कि उसकी माता का स्वर्गवास हो गया। सरजू की आयु अभी मात्र तीस वर्ष ही थी। समाज के चलन, दुनियादारी और छोटी बच्ची के लालन-पालन का हवाला दे कर सरजू पर बहुतों ने दबाव बनाया पर सरजू ने किसी की नहीं सुनी। दूसरा विवाह करके सरस्वती को सौतेली माँ के आँचल में डालना किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया। सरजू ने बेटी को माँ-बाप दोनों का प्यार दे कर बड़े नाज़ों से पाला था। सरस्वती पच्चीस वर्ष की हुई तो सरजू ने उसके लिए वर की तलाश प्रारम्भ कर दी थी पर विधि का विधान कुछ ओर ही था। अनायास सरजू बीमार हो गये। बहुत दवा-इलाज, दुआ-तावीज़ सब कुछ किया गया पर बीमारी पकड़ में नहीं आयी और फिर जब पकड़ में आयी तो क्षय रोग में तब्दील हो चुकी थी। आख़िरी स्टेज पर थी। केस बहुत बिगड़ चुका था कोई इलाज नहीं था। अतः दिन गिनने के सिवाय कुछ बचा ही नहीं था।

रामबरन अपने परिवार में पूरी तरह सुखी थे। कपड़े का व्यवसाय बढ़िया चल रहा था। पिता व्यवसाय चलाते थे पुत्र लल्लन एक शुगर मिल में मैनेजर के पद पर कार्यरत था। तनख्वाह तगड़ी थी। मिल मालिक एक ऊँची हैसियत वाले व्यक्ति थे। उनके और भी कई तरह के कारोबार थे। दो सन्तानें थीं एक बेटा और एक बेटी। दुर्भाग्य से बेटा मानसिक रूप से अस्वस्थ्य था। बेटी ही उनके सारे कारोबार में देख-रेख करती व हाथ बंटाती थी। लल्लन एक मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था। इसीलिए मालिक की उस पर विशेष कृपा रहती थी और......और उनकी बेटी अंजना की भी। वह दिन-पर-दिन लल्लन के क़रीब आती जा रही थी। उसका साथ पाने के लिए तरह-तरह के बहाने वह तलाशती रहती थी ; कभी हिसाब-किताब देखने-समझने के बहाने, कभी जाँच-पड़ताल करने के नाम पर किसी व्यापारी दौरे पर जाने के बहाने। बस उसकी निकटता पाना चाहती रहती थी वह। ऐसा नहीं कि लल्लन आकर्षित नहीं था लेकिन वह बहुत सोच-विचार और सूझ-बूझ वाला इंसान था वह नहीं चाहता था कि उसका आकर्षण उसके लिये एक दिन दर्द की गाँठ बन जाये। दोनों परिवारों में हैसियत के आधार पर ज़मीन आसमान का सा अन्तर था। सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा था कि एक दिन सरजू का फोन रामबरन के पास आया। उसने अपनी बीमारी का हवाला देते हुए बड़ी ही मायूसी से उसे अपने पास बुलाया था। रामबरन बेटे को साथ लिए जो पहली बस मिली उसी से गोरखपुर के लिए रवाना हो गए।

सरजू ठठरी सी देह लिए बिस्तर पर पड़े हुए थे। शरीर निर्जीव सा हो रहा था। उसकी कराह रामबरन के ह्रदय में तीर सी चुभी जा रही थी। हर खांसी में खून आ रहा था। उलटी भी खून भरी हो रही थी। रामबरन समझ गए कि ये इनकी आखिरी घड़ी है। लेकिन जाने से पहले सरजू क्या कर जायेगा इसका रामबरन को भला कहाँ पता था ! आधी रात के समय यकायक सरस्वती की चीख से बगल के कमरे में सोये रामबरन और लल्लन जाग पड़े और दौड़े हुए उनके कमरे में पहुँचे तो सरजू को खून की उल्टी हो रही थी। आँखों से बहती जलधारा को आँचल से पोछती हुई सरस्वती एक प्लास्टिक का टब उनके सामने लगाये हुए थी। रामबरन ने टब उसके हाथों से ले लिया। लल्लन सरजू की पीठ सहला रहा था। उलटी कर चुकने के बाद उन्हें कुल्ला करवा कर जब लिटाया गया तो वे कुछ बेहतर महसूस कर रहे थे। रामबरन सब जानते समझते हुए भी झूठा आश्वासन देते हुए बोले ----

          'घबराओ नहीं सरजू भइया ! अब तुम ठीक हो जाओगे। गन्दा खून निकल गया। थोड़े दिन की दवा में तुम चलने फिरने लायक तो हो ही जाओगे।'

सरजू खुद समझदार था मुस्कुरा कर बोला ----'भइया रामबरन ! हमारे दिन तो पूरे हो गए हैं। जाने का कोई दुःख भी नहीं है पर सरस्वती का कुछ नहीं हो पाया आत्मा में यही तड़प बनी रहेगी।'

रामबरन ने सरजू का सिर सहलाते हुए भरे गले से कहा ----'काहे भइया ! काहे आत्मा को कष्ट देते हो उसका चाचा तो है न !'

बस रामबरन का इतना कहना था कि सरजू ने उनका हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोले ---'सच कह रहे हो भइया ! मेरे बाद तुम्हीं तो हो जो इसके सिर पर हाथ रक्खोगे।' पल भर ठहर कर पुनः बोले---'मुझे एक वचन दे सको तो मै आसानी से इस दुनियाँ से जा सकूँगा।'

रामबरन भला क्या जानते थे कि यही एक वचन उनके परिवार की पूरी रूपरेखा ही बदल डालेगा; उन्होंने सरजू के सिर पर हाथ फेरते हुए बड़े अपनत्व के साथ कहा ---'अरे कहो न भइया ! इतनी दुविधा में क्यों पड़े हो। क्या हमारा तुम्हारा कुछ बांटा है ?'

          'मेरी बेटी को किसी अच्छे घर की बहू बनवा देना।' कह कर अपने गमछे में मुंह छुपा कर सुबक पड़े थे सरजू।

उधर रामबरन बिना आगा-पीछा सोचे पूरी तरह भावना में बह गए ---'हाँ ! हाँ सरजू भैया ! उसकी चिंता आप न करो  उसे तो मैं अपने ही घर की बहू बना लूँगा।'

अपनी ही धुन में,  दोस्त के प्यार में डूबे हुए रामबरन इतनी बड़ी बात बात कह तो गए पर दूसरे ही पल उनकी नज़र पास खड़े बेटे पर पड़ी जिसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। पिता की दृष्टि अपने चेहरे पर पड़ते ही वह तुरन्त कमरे से बाहर निकल गया। पीछे ही रामबरन भी बाहर निकले पर अभी वे लल्लन से कुछ बात करते-कहते कि सरस्वती की आवाज़ से वापस सरजू के पलंग की ओर दौड़ आये; सरस्वती बार-बार ---'बाबू जी ! बाबू

जी !! कुछ बोलते क्यों नहीं, कुछ तो बोलिये।' बोले जा रही थी पर बाबू जी होते तब तो बोलते वह तो इस संसार को छोड़ कर कहीं बहुत दूर जा चुके थे।

रामबरन और लल्लन सरस्वती को साथ लिये जब अपने घर पहूँचे तो रामबरन की पत्नी सुलभा कुछ अचम्भित तो हुई पर बोली कुछ नहीं। थोड़ा सुस्ताने और पानी-वानी पी चुकने के बाद जब लल्लन अपनी ड्यटी पर चला गया तो पति-पत्नी की आपस में बातचीत हुई। सत्य से अवगत होने पर सुलभा आश्चर्यचकित रह गयी। उसे लगा उसके ऊपर कोई बड़ा पहाड़ गिर पड़ा है। सरस्वती एक बहुत ही साधारण रूपरंग की लड़की थी। जबकि सुलभा ने अपनी बहू के रूप में जिस रूपवती कन्या की कल्पना की थी वह बिलकुल ही अलग थी। सरस्वती उनके बनाये उस अनुमानित फ्रेम में कहीं से भी नहीं समां पा रही थी। लेकिन जो होना था वह तो हो ही चुका था। पत्नी और पुत्र की अनिच्छा के बावजूद रामबरन को सरजू को दिया हुआ वचन तो निभाना ही था। अपनी बात तो रखनी ही थी आख़िर ऊपर जा कर भी तो उन्हें कुछ जवाब देना था।

लल्लन अपनी छुट्टियों का काम निपटाने में लगा हुआ था कि चपरासी ने आ कर अंजना मैडम का बुलावा सुना दिया। अंजना ने बिना किसी भूमिका के कहा ----'ऐसा है मैनेजर साब ! काली पहाड़ी वाली मिल के मजदूरों ने हड़ताल कर दी है। हमें वहाँ चलना पड़ेगा।' फिर यकायक लल्लन के चेहरे को पढ़ती हुई सी बोली ---'क्या बात है मैनेजर साब ! आप कुछ परेशान से लग रहे हैं; सब ठीक तो है न ! कोई दिक्क़त हो तो बताइये।'

          'नहीं ! नहीं मैडम कोई बात नहीं, सब ठीक ही तो है।' लल्लन  नींद से जागा और निरर्थक सहज होने का प्रयास करते हुए बोला।

          'गुड ! तो चलिए; गाड़ी तैयार है।'  मुस्कुराते हुए अंजना अपना पर्स उठा कर दरवाज़े की ओर बढ़ गयी।

लल्लन मरे मन से अपनी नौकरी कर रहा था क्योंकि नौकरी तो करनी ही थी। इधर रामबरन जल्दी-से-जल्दी लल्लन और सरस्वती को पक्के बंधन में बांध देना चाह रहे थे। क्योंकि एक कुँवारी लड़की का इस तरह घर में रहना चर्चा का विषय बन सकता था अतः रामबरन ने कुछ ही दिनों में ठीक-ठाक घडी-मुहूर्त देख कर दस-पांच नज़दीकी लोगों के बीच लल्लन और सरस्वती का विवाह कर दिया। लल्लन के लिए ये बड़ी परीक्षा की घड़ी थी। लल्लन ने पहली रात ही सरस्वती को साफ-साफ कह  दिया कि 'उसने ये शादी पिता जी का मन रखने के लिए ही की है। तुम इस घर की बहू बन कर रह सकती हो लेकिन मैं तुम्हें पत्नी का स्थान कभी नहीं दे सकूंगा। क्योंकि ये रिश्ता बिना मेरी इच्छा जाने-पूछे मुझ पर थोपा गया है।' सरस्वती बहुत रोयी-कल्पी लेकिन कुछ भी बदला नहीं। वह बेचारी बिना गुनाह की सजा भुगतने के लिए तैयार हो चुकी थी। जो सामने था उसे ही अपनी नियति मान लेने के सिवाय और कोई उपाय ही नहीं था उसके पास। कुछ कहती भी तो किससे उसकी सुनने वाला था ही कौन। सासू माँ से तो कुछ कह ही नहीं सकती थी। वे अपने पति के सामने तो सरस्वती से बड़ा ही लाड़ दिखातीं पर उनके पीठ पीछे जो न कह दें वही कम था। और बेटे के सामने तो ऐसे-ऐसे ऐब निकालतीं कि कहीं भूले भटके भी लल्लन के दिल में उसके लिए प्रेम पैदा न हो जाये। उनका हर पल सरस्वती को घर से निकालने के लिए नये-नये बहाने खोजने में बीतता था। माँ-बेटे की नज़र तो बस अंजना और उसके धन पर ही लगी हुई थी। बेचारी सरस्वती ले-दे के रामबरन की बहू बन कर रह गयी थी। वे बेचारे उसको समझाते ---'बेटी थोड़ा धैर्य से काम लो, धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा दरअसल अचानक उस पर ये ज़िम्मेदारी आन पड़ी है न, इसी से वह नार्मल नहीं हो पा रहा है। अभी वह शादी के लिए तैयार नहीं था। लेकिन तुम मत घबराओ जल्दी ही वह अपनी ज़िम्मेदारियों को समंझने लगेगा।' 

सरस्वती का जीवन एक नौकरानी से भी बुरी स्थिति में बीत रहा था रामबरन और लल्लन सुबह के निकले शाम ढले घर वापस लौटते थे। सरस्वती दिन भर खटती रहती मैले कीचट कपड़ों में लिपटी हुई घर का सारा काम करती। साँझ ढले सासू माँ बड़े प्यार भरे शब्दों में कहतीं ----'अरे बहू ज़रा कपड़े-लत्ते का तो ध्यान रखा करो दिन भर का थका-हारा पति घर आएगा तो तुम्हारी ऐसी हालत देख कर क्या खुश होगा ! नया-नया ब्याह हुआ है थोड़ा बन-संवर कर रहा करो।' ऐसा ही वह अक्सर किसी न किसी रूप में किया करती थी। कभी-कभी सरस्वती को सासू माँ की बातें मायावी सी लगा करतीं लेकिन वह उसके शब्द जाल को भला क्या समझ पाती। नतीजा यह कि  वह उसमे ही फंसती चली गयी।

लल्लन जब घर आता तो सुलभा उसे सीधे अपने कमरे में बुला लेती और साथ ही बहू को चाय-जलपान आदि वहीँ पहुँचाने के लिए हुक्म भी दे देतीं। और फिर बेटे को अकेला पा कर अपने तेज़-तीखे तीर चलाने शुरू कर देतीं ----'अरे बेटा ! ना जाने तुम्हारे पिता जी को क्या हो गया था जो ऐसी लड़की उठा कर ले आये। न रूप न रंग, न गुण न ढंग। घर के काम-काज में तो इसका रत्ती भर भी दिल नहीं लगता है और जो कुछ करती भी है वह भी उल्टा-पुल्टा, बेढ़ंगेपन से। मैं तो मर ही जाती हूँ खटते-खटते। ये महारानी जी तो सुबह से नहा-धो कर सिगार-पटार करके, सजधज के इधर-से-उधर टहलती रहती है।' फिर पल भर रुक कर बेटे के और क़रीब सरक कर जैसे कोई गुप्त बात कहने जा रही हों ---'और हाँ ! यहाँ तो ये किसी को जानती-पहचानती भी नहीं है फिर पता नहीं क्यों बार-बार बाहर झांकती रहती है कभी दरवाज़े से, कभी खिड़की से। और फिर अगर कहीं छत पर चढ़ गयी तब तो उतरने का नाम ही नहीं लेती है जब तक कि बुलाओ नहीं। मैं खाना बना कर जब खाने के लिए बुलाती हूँ तब जा कर कहीं नीचे आती है और जब खाना खा कर सोती है तो तेरे आने से पहले ही उठती है।'  

लल्लन झल्ला उठता और कहता ---'माँ ! मुझे क्यों उसकी रामकहानी सुनाती रहती हो। तुम जानो तुम्हारा काम जाने।'

सुलभा फिर भी बाज़ न आती ---'अरे  बेटा ! मैं क्या करूँ ये तो तुम्हारे पिता जी की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी जो यह खोटा सिक्का उठा कर ले आये। अरे किसी का कल्याण ही करना था तो कोई और घर तलाश लेते अपना ही घर मिला था उन्हें तबाह करने के लिए !' और फिर लगभग गिड़गिड़ाते हुए बेटे की बांह पकड़ कर कहती ----'अब तो बेटा तुझे ही कुछ करना पड़ेगा इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिये।'           

इसी तरह सरस्वती से पिंड छुड़ाने के रास्ते तलाशने में लगी रहती थी सुलभा। समय बीतता गया। और फिर एक दिन मंदिर से लौटते वक़्त सुलभा ने लल्लन को अंजना के संग कार में देख लिया था। शाम ढले लल्लन घर आया तो सुलभा ने उसके बारे में पूछा तो लल्लन ने जो सच था माँ को बता दिया। पर सुलभा की आँखों में उन दोनों का कार में बैठने का तरीका गड़ा हुआ था। उसने तिरछी नज़रों से देखते हुए बेटे से प्रश्न किया ---'बस इतना ही ?' 

लल्लन ने यों तो माँ को और कुछ नहीं बताया पर तब से ही सुलभा ने लल्लन को पूरी तरह अंजना की बाँहों में ढकेलने की योजना बनानी शुरू कर दी थी। यों लल्लन इतना भी हृदयहीन नहीं था। वह समझता था कि सरस्वती बेक़सूर है पर दूसरी तरफ उसका भी तो कोई क़ुसूर नहीं था जो बिना उसकी राय जाने पिता जी ने उसके जीवन का इतना बड़ा फैसला कर डाला ! अपने को बहुत समझाता पर इस इतनी बड़ी काया में जो नन्हा सा मन है वह बार-बार हावी हो ही जाता था। अपने को बहुत समझाने के बावजूद लल्लन सरस्वती को अपना न सका बल्कि विवाह के बाद अपनी ओर बढ़ती अंजना की ओर स्वयं उसके भी क़दम कुछ तेज़ी से बढ़ने लग गये थे। अंजना ने खुश तो होना ही था उसकी इतने दिन की मेहनत रंग ला रही थी किन्तु उसे आश्चर्य भी कम नहीं था कि सदा कटा-कटा रहने वाला ये लल्लन इतना सहज कैसे हो गया ! अब लल्लन उसके साथ कहीं आने-जाने में कतराता या आना-कानी नहीं करता था। कार में चलते वक़्त सुनीति के लाख कहने पर भी उसके बगल की सीट पर न बैठ कर आगे ड्राइवर के बगल वाली सीट पर ही बैठता था। लेकिन अब ऐसा नहीं था। इधर जब कभी भी ऐसा मौका आया अंजना के एक बार कहने पर ही वह बड़ी सहजता से उसके साथ पीछे वाली सीट पर बैठ जाता था। बहुत सोचने के बाद भी अंजना किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पा रही थी। उसे लल्लन के विवाह का भी पता था लेकिन बातचीत के दौरान लल्लन ने विवाह से कभी कोई क्षुब्धता भी ज़ाहिर नहीं की थी। इसीलिए वह बड़े असमंजस में थी। लेकिन वह लल्लन से अपने आपको दूर भी नहीं रख पा रही थी। उधर सुलभा की हर हरकत लल्लन और अंजना की प्रेमाग्नि को हवा दे ही रही थी। वह समय-समय पर उस अग्नि में घी डालती ही रहती थी। कभी बेटे से अंजना को घर लिवा लाने को कहती। कभी वह स्वयं आ पहुँचती तो खूब जम कर चाय-नाश्ता कराती साथ-साथ उसके सम्मान मे, उसके गुणों के बखान में खूब बढ़ चढ़ के बोलती। सरस्वती को बुरा तो लगता पर वह शांत बनी रहती फिर जब उसका पति ही उसका नहीं था तो भला ऐतराज़ करती भी क्यों ! सुलभा अक्सर लल्लन को अंजना के साथ अधिक-से-अधिक समय बिताने का मौका दिया करती थी। आग और घी को जानबूझ कर एक जगह इकट्ठा करने का जुगाड़ किया करती थी। सरस्वती से कभी सीधे मुंह बात न करने वाली सुलभा अंजना की उपस्थिति में बड़े प्यार से कहती ----'चल बहू ! ज़रा मोड़ से कुछ सब्ज़ी ही ले आयें। अकेले तो मुझसे झोला उठा कर चला नहीं जायेगा।'   

इस तरह लल्लन और अंजना को एकान्त देने के लिए कभी डॉक्टर के यहाँ तो कभी मंदिर और कुछ नहीं तो पडोसी के घर चली जाती; साथ ही बहू को ले जाना कभी भूलती नहीं थी। उसके ये हथकण्डे बढ़ते ही जा रहे थे लेकिन अति हर चीज़ की बुरी कही गयी है। यहाँ भी कुछ वैसा ही घटित हो गया। माना कि लल्लन ने सरस्वती को अपनी पत्नी नहीं माना था पर ब्याह तो उसका उसके साथ हुआ ही था। माना कि उसकी सुहागरात नहीं मनी थी पर वह सुहागन तो थी ही। यही कारण था कि एक दिन उस पर सुहाग का भूत सवार हो ही गया। उसने लल्लन के घर लौटने पर बड़े दबे शब्दों में प्रश्न किया ----'मेरी क्या गलती है ?'

          'ग़लती ? कैसी ग़लती ?' प्रश्न के बदले में लल्लन ने एक रूखा सा प्रश्न उछाल दिया उसकी तरफ।

         'यही कि मैं खुद तो आपके घर चली नहीं आयी हूँ। जो हुआ जब सब आपकी जानकारी में हुआ तो आप मना भी तो कर सकते थे।' सरस्वती उस दिन पूरे रौद्र रूप में आ चुकी थी----'बाबू जी की नज़रों में अच्छा बनने के चक्कर में मेरी क्यों ज़िन्दगी दाँव पर लगायी आपने। इससे तो अच्छा था आप लोग मुझे वहीँ छोड़ आये होते। किसी-न-किसी तरह जीवन काट लेती। एक ही दुःख होता कि मेरा कोई नहीं है पर सब के होते हुए अकेली होने की पीड़ा तो न झेलनी पड़ती।' और सरस्वती का इतने दिनों का बंधा हुआ बाँध टूट ही गया, वह वहीँ धरती पर बैठ कर फूट-फूट कर रो पड़ी।           लल्लन जो अभी तक सब कुछ सुन रहा था बिना कुछ बोले बस पैर पटकता हुआ बाहर चला गया। सुलभा जो अभी तक मूक दर्शक बनी सब देख-सुन रही थी बेटे के जाते ही घायल शेरनी की तरह पंजे झाड़ कर बिफर पड़ी -----'अरे तो अब क्या बिगड़ गया है। अब  चली जा न ! तेरा बाप जाते समय घर थोड़ी साथ ले गया है। लल्लन के बाबू जी को अभी तक कोई ग्राहक भी तो नहीं मिला है।' पल भर ठहर कर फिर  आँखें मटका कर बोली ----'और मिलेगा भी क्यों जिस घर में टी.बी. जैसी बीमारी से किसी आदमी की मौत हुई हो उसे कोई खरीदेगा ही क्यों ! क्या उसे अपना परिवार प्यारा नहीं होगा।'

          'चोप्प रहो लल्लन की माँ ! बहुत बोल चुकीं।' रामबरन जो अभी तक दरवाज़े के पीछे से सब सुन रहे थे चौखट में दाखिल होते हुए बोले।

रामबरन आगे कुछ बोलते उससे पहले ही ----'बाबू जी ! मुझे पापा के घर पहुँचा दीजिये।' कहते हुए सरस्वती उनके पैरों पर गिर पड़ी।

रामबरन भावुक हो उठे। उन्होंने सजल नेत्रों से सरस्वती को उठाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले -----'बस ! बस बेटी शांत हो जा; मैं अभी जिन्दा हूँ। मेरे जीते जी तुझे कुछ भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।'

          'है ! है बाबू जी ! चिंता करने की ज़रूरत तो है ही। मैं आपकी बेटी बन कर भी तो आपके घर में रह सकती थी। आपके घर का रख रखाव करती आपकी और अम्मा जी की सेवा करती; अभी भी तो वही कर रही हूँ। क्या इसके लिए बहू का रूप धारण करना ज़रूरी था बाबू जी ?'

सरस्वती की समूची आंतरिक पीड़ा उस दिन मुखर हो उठी थी। ऐसे वक़्त में रामबरन ही उसके एकमात्र आधार थे। उस दिन उसने वह सब कुछ कह डाला जो इतने दिनों से उसके ह्रदय में कांटे की तरह चुभ रहा था। रामबरन अवाक् से सब सुन रहे थे। उन्हें आश्चर्य था कि सरस्वती इतना कुछ अपने अन्तर में दबा कर कैसे रख पायी। इससे भी बड़ा आश्चर्य इस बात का था उन्हें कि एक ही घर में रहते हुए वे इन सभी बातों से अनभिज्ञ कैसे

रहे ! उनकी क्रोध से भरी दृष्टि जब सुलभा की और उठी तो वह यकायक कांप उठी। बहू पर बरसती ससुर की ममता ने उसे कोई बड़ा षड्यंत्र करने की योजना बनाने पर मजबूर कर दिया था। रामबरन ने उस समय सरस्वती को तो किसी तरह शान्त कर दिया लेकिन उनके स्वयं के अन्तर में अशान्ति का एक बहुत बड़ा बवंडर उठ खड़ा हुआ था। उन्हें सरस्वती की चिन्ता सताने लगी थी। उसका भविष्य सुरक्षित करना अब उन्हें आवश्यक लगने लगा था। बेटे से कुछ भी कहना उन्होंने उचित नहीं समझा लेकिन मन-ही-मन उन्होंने एक योजना बना ली थी। उन्होंने सरजू का मकान बेचने के प्रयास तेज़ कर दिये। उनका विचार था कि सरजू का मकान चालीस से पचास लाख के बीच बिक जायेगा और वे उस पूरी रक़म को सरस्वती के नाम से बैंक में जमा कर देंगे तो लल्लन और सुलभा की भावना उसके प्रति अवश्य ही बदल जायेगी। लेकिन वैसा कुछ भी होता इससे पहले सुलभा अपनी योजना में सफल हो गयी। उसे तो बस अंजना और उसकी दौलत ही दिखाई पड़ रही थी। अभी तक तो वह सरस्वती को तंग कर के घर से भगा देने की योजना ही बनाया करती थी पर ससुर की बहू के प्रति इतनी प्रगाढ़ प्रीति देख कर उसे लगा हल्की योजना से काम नहीं चलेगा इस काम में सफलता के लिए कोई ठोस क़दम उठाना पड़ेगा। और फिर जैसा कि युगों होता आ रहा है कि 'औरत ही औरत की दुश्मन होती है' वही यहाँ भी हो गया सुलभा ने अपने मस्तिष्क में एक ब्रह्मास्त्र योजना बना डाली। बहुत सोच-विचार के बाद उसे एक सूत्र मिल ही गया। सरस्वती के विवाह के कुछ दिनों बाद सरजू का कोई दूर के रिश्ते का भतीजा अर्जुन कहीं से अता-पता खोज-खाज के रामबरन के घर आ पहुँचा था। बस, सुलभा को बैठे-बिठाये एक सूत्र मिल गया।

          'अरे बहू ! तुम्हारा भाई जो एक बार आया था.. .' थोड़ा रुक कर कुछ सोचती सी.. .'क्या तो नाम था उसका ?   हाँ ! हाँ अर्जुन।  फिर कभी नहीं आया। कोई खबर-वबर है उसकी ? कहाँ है ?' बड़े प्यार भरे लहजे में सुलभा ने

सरस्वती से पूछा।

सरस्वती को आश्चर्य तो हुआ। पर प्यार और अपनेपन की प्यास में डूबी वह बेचारी उनकी कुटिलता की सीमा किस हद तक जा सकती है इसका तनिक भी अनुमान नहीं लगा पायी और उनके प्रेमपगे शब्दों के जाल में फंसती हुई बोली ----'नहीं अम्मा जी ! मुझे तो कोई ख़बर नहीं है।' साधारण सा उत्तर था उसका।

          'लल्लन को फोन नंबर तो दे गया था शायद, तुम्हीं फोन कर लेतीं।' दुखी सा चेहरा बनाते हुए आगे बोलीं ----'बेचारा ! बे माँ का बच्चा ! अपनों से हाल-ख़बर होती रहे तो इंसान को ढाढ़स रहता है। '

और सरस्वती फंस गयी सासू माँ के बिछाये हुए जाल में। उसे क्या पता था कि मीठी छुरी की तेज़ धार पर उसने अपना पाँव रख दिया है। अर्जुन से फोन पर हाल-चाल हुआ तो सासू माँ ने कहा कि 'उसे कहो न कभी इधर भी घूम जाया करे।'

फतेहपुर से कानपुर भला दूर ही कितना था ! अर्जुन का आना-जाना चालू हुआ तो सुलभा के मीठे बोलों और सरस्वती के बनाये स्वादिष्ट भोजन व अपनेपन ने उसे ऐसा बाँधा कि उसका आना-जाना बढ़ता ही चला गया। बहन का घर उसे अपना ही घर लगने लगा था। सरस्वती को भी अच्छा लागता कि उसके जीवन के मनहूस दायरे में कोई अपना तो मिला जो निश्छल निष्कपट भाव से दो बातें करता है। सासू माँ के अतिशय प्रेमजाल में फंसी भला वह क्या जनती थी कि पूरी बिसात उसे ही बरबाद करने के लिए बिछाई गयी है। अर्जुन अक्सर शनिवार-रविवार को ही आता था। होनी भी अपना काम कैसे कर डालती है भला कब कोई जान पाया है। पहले तो वह ग़लत व्यक्ति का साथ देती ही देखी गयी है भले ही बाद में उसे करनी का फल भोगना ही पड़े। एक शनिवार को कुछ ऐसा ही घटित हो गया। सुलभा लगभग हर शनिवार को किसी न किसी बहाने से घर से टल जाने का प्रयास करती थी ताकि कोई छोटा सा भी मौका हाथ लग जाये तो उसका काम बन जाये। उस दिन वह सुबह-सुबह कहीं प्रवचन सुनने का कह कर घर से निकल गयी।  सरस्वती को पिछले दो दिन से हल्का-हल्का बुखार रह रहा था। सुलभा के जाने के बाद उसने किसी तरह घर के काम-काज निपटा कर अपनी दवा खायी और जा कर अपने बिस्तर पर लेट गयी। थकावट और बुखार के कारण टूटा हुआ शरीर, लेटते ही उसकी आँख लग गयी। नींद अभी गहरायी भी नहीं थी कि कालबेल बज उठी कमज़ोर         शरीर, कच्ची नींद, उठते ही उसे चक्कर आ गया और दरवाज़े के पास पहुँचते-पहुँचते वह गिर गयी, सिर दीवार से जा लगा और उसकी चीख निकल गयी। दरवाज़े पर खड़े अर्जुन के कानों में उसकी चीख पड़ी तो वह भी घबड़ा गया और बोला ----'क्या हुआ दीदी ?' 

सरस्वती ने किसी तरह खड़े हो कर दरवाज़ा तो खोल दिया पर खड़े होते ही उसे पुनः ज़ोरदार चक्कर आया और वह बेहोश हो गयी। फिर उसकी आँख खुली तो वह अस्पताल में थी। अर्जुन, रामबरन और सुलभा भी वहीँ मौजूद थे। रामबरन उसके सिरहाने बैठे उसका सिर सहला रहे थे, उसे होश में आया देख कर बोले ----'अब कैसी हो बेटी ?'               सुलभा एक किनारे कुर्सी पर बैठी हुई थी चेहरा तमतमाया हुआ सा था, तभी पास खड़े अर्जुन पर उसकी नज़र पड़ी और उसे याद आया कि दरवाज़ा खोलने से पहले उसने अर्जुन की आवाज़ सुनी थी। अर्जुन ने ज्यों ही पास जाकर पूछा ----'अब कैसी हो दीदी ?'

बस, फूस में लगी आग की तरह उबल ही तो पड़ी सुलभा ----'चलो बस करो ये दीदी दीदा का नाटक। बहुत धूल झोंक चुके हम सब की आँखों में भाई-बहन का नाटक कर के। बेचारा लल्लन जाने कैसे इतने दिन से बर्दाश्त कर रहा है ये सब। और आज तो हद ही हो गयी; घर पर हम सब अड़चन थे न, इसीलिये चोट का बहाना बना कर अस्पताल ही उठा लाया कि यहाँ तो एकान्त मिलेगा ही।' 

रामबरन भौंचक्के थे। पत्नी के इस रूप की तो उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। उधर अर्जुन बेचारा पानी-पानी हुआ जा रहा था। जिस सरस्वती को वह बचपन से बड़ी बहन की तरह मानता चला आया था उसी को ले कर इतना घृणित आरोप ! अब अपनी सफाई में वह बोले भी तो क्या ! चुपचाप रामबरन के सामने सिर झुकाये खड़ा हुआ था। तभी रामबरन की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, उसके सिर पर हाथ रख कर उन्होंने कहा था ----'तुम्हें दुःखी होने की ज़रूरत नहीं है बेटा।' फिर पत्नी को लाल आँखों से घूरते हुए बोले ----'मैं इस सब के पीछे की पूरी कहानी को अच्छी तरह जनता हूँ।'

तड़प कर सुलभा वार्ड के बाहर निकल गयी और सीधे घर चली आयी। घर आ कर देखा तो लल्लन आ चुका था। यों तो उसे सरस्वती से उसे कोई लगाव नहीं था पर उसे घर में न देखकर पूछना तो बनता ही था। बस, फिर क्या था सुलभा की तो पाँचों उँगलियाँ घी में थीं। बेटे को भरपूर समझाया लेकिन बिना किसी पक्के सबूत को हाथ में लिए कोई बात दमदार तो हो न पाती इसलिए सुलभा ने अपने आपको और भी नीचे गिराने में कमी नहीं की। सरस्वती को सभी रिपोर्टस् आने तक अस्पताल में रुकना था। यहीं सुलभा ने अपनी गुट्टी फिट कर ली। सरस्वती की रिपोर्ट्स के साथ सुलभा सरस्वती को भी अस्पताल से ले आई थीं। रिपोर्ट के अनुसार वह गर्भवती थी और वही कारण उसके चक्कर और बेहोशी का भी था। सरस्वती के सिर पर तो पहाड़ ही टूट पड़ा था क्योंकि उसके अनुसार तो यह सरासर झूठ था। उधर लल्लन पर इस ब्रह्मास्त्र ने अपना कमाल दिखा ही दिया। उसने तत्काल सरस्वती को घर से निकाल देने की घोषणा कर दी। बेचारे रामबरन पूरे विश्वास के साथ, सम्पूर्ण घटनाचक्र को एक षडयंत्र मानते हुए भी न कुछ  कर पाये, न बोल पाये और हार कर सरस्वती को साथ ले कर गोरखपुर चले गये। आख़िर सरस्वती उनकी ज़िम्मेदारी थी। सरजू के घर का ताला एक बार फिर खुल गया। सरस्वती बी.ए. पास थी उसने बी.एड. भी किया हुआ था। रामबरन ने उससे कई जगह आवेदन दिलवा दिये और तत्काल उसके रहन-सहन की व्यवस्था भी कर दी। रामबरन घर वापस लौट आये। उनकी वापसी पर माँ-बेटे दोनों ने उनसे कोई सवाल नहीं किया न उन्होंने ही अपनी तरफ से कुछ कहा। घर का वातवरण तनावपूर्ण था। आवश्यक बातों के अलावा आपस में कोई बातचीत नहीं होती थी उधर सरस्वती गोरखपुर में रहते हुए भी पूर्णतः रामबरन के ही संरक्षण में थी जिसकी ख़बर सुलभा और लल्लन को कानों-कान नहीं थी। हर काली रात के बाद सुखद भोर का आगमन होता ही है सरस्वती की भी भगवांन ने सुन ली और जल्दी ही उसे एक जूनियर हाईस्कूल में नौकरी मिल गयी। रामबरन ने चैन की सांस ली। सरस्वती के जीवन की गाड़ी चल निकली पर फिर भी रामबरन उसका पूरा ध्यान रखते थे। उनका हाथ उसके सिर पर बराबर बना ही रहा क्योंकि उसे तो उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी मान ही लिया था। सुलभा अपनी योजना को मूर्त रूप देने में लगी हुई थी जिसके लिए लल्लन का सरस्वती से तलाक होना ज़रूरी था इसलिए वह लल्लन पर तलाक के लिए बराबर दबाव बना रही थी उसकी मंशा थी कि जल्दी-से-जल्दी तलाक हो जाये तो अंजना भारी-भरकम दहेज़ के साथ उनके घर बहू बन कर आ जाये पर लल्लन था कि किसी न किसी बहाने से टाल जाता था। सुलभा कुछ समझ नहीं पा रही थी की आख़िर मामला क्या है। चोर की दाढ़ी में तिनका वाली हालत हो रही थी उसकी। उसे संदेह हो रहा था कि कहीं लल्लन को असलियत का पता तो नहीं चल गया ! कुछ हद तक उसका संदेह सही भी था क्योंकि भले ही लल्लन ने उसे पत्नी रूप में स्वीकार नहीं किया था पर उसे चरित्रहीन मानने के लिये भी उसका मन तैयार नहीं था। यही कारण था कि वह इस पूरे घटनाक्रम में खुद को किसी-न-किसी रूप मे दोषी मान ही रहा था। और जोश में आ कर उठाये गए क़दम ने उसे हीनभावना से जकड़ लिया था। साथ ही उसे अपनी नौकरी पर भी काले बादल मंडराते नज़र आ रहे थे। अंजना का खिंचाव यकायक लल्लन से एक पोस्ट नीचे काम करने वाले राजेश की ओर बढ़ता दिखाई पड़ रहा था। इतना ही होता तो भी गनीमत थी। लल्लन मैनेजर था, प्रमोशन की कगार पर खड़ा हुआ था पर प्रमोशन लिस्ट निकली तो एक तो उसमें लल्लन का नाम नदारद था उल्टा राजेश को पदोन्नत करके सीनियर मैनेजर बना दिया गया था। न चाहते हुए भी लल्लन ने मिल मालिक श्यामनन्दन जी से अपनी फरियाद सुनायी। फ़रियाद के जवाब में उसे टके भर का जवाब मिला -----'भई ये सब तो अंजना मैडम का डिपार्टमेंट है। अपने काम में दखलंदाज़ी उसे कतई पसंद नहीं है इसी से मैं उसके किये पर कुछ बोलता नहीं हूँ।'

मुंहलगा होने के कारण लल्लन ने कहा ----'सर ! मैं इतना पुराना कर्मचारी हूँ, मुझसे जूनियर को मेरे ऊपर बैठाना क्या जायज़ है ?"

          'देखो लल्लन ! ये जायज़-नाजायज़ तो मुझे मत बताओ।' उनकी भाषा में कुछ तल्ख़ी आ गयी थी जिसे लल्लन ने स्पष्ट अनुभव किया----'ये सब जांचना-परखना तो  अंजना मैडम की अपनी सूझ-बूझ का कमाल है। माना की तुम एक अच्छे कर्मचारी रहे हो लेकिन इसका ये तो मतलब नहीं है कि कोई और तुमसे ज्यादा लायक और क़ाबिल हो ही नहीं सकता है। उसकी पारखी दृष्टि कभी ग़लत निर्णय नहीं ले सकती।' फिर पल भर ठहर कर बोले ----'वैसे तुम्हारी जगह तो बरक़रार है ही उस पर तो कोई आंच नहीं न आयी है। फिर क्यों परेशान हो ! जाओ मस्त रहो।'

लल्लन चुपचाप वहां से चला आया। सब कुछ साफ़ था आगे कुछ कहने-सुनने के लिये बचा नहीं था। लल्लन तब से अनमना सा रहने लगा था। अंजना का रुख़ बदल ही चुका था। अपने व्यवहार के बदलाव को वह छिपाना तो चाहती थी पर सच्चाई भला कहीं छिप सकती थी ! लल्लन को आभास हो चुका था कि उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ चुकी है। उसने अन्य कई जगहों पर नौकरी के लिए आवेदन भी डाल दिए थे। लल्लन की मानसिक अवस्था बड़ी अजीब सी हो गयी थी वह न किसी से कुछ कहता था, न ही हँसता बोलता था। बस अपने आप में ही घुटता रहता था। एक ओर रोज़ी-रोटी की चिंता तो दूसरी तरफ पत्नी के प्रति किये गये अन्याय को ले कर अपराधबोध की भावना से ग्रसित अपने ह्रदय की व्यथा कहता भी तो किससे ! पूरे परिवार का माहौल तनावपूर्ण चल रहा था कि एक दिन तो वह हो गया जिसकी कल्पना किसी ने स्वप्न में भी नहीं की थी।

रामबरन और लल्लन एक परिचित की बीमार पत्नी को देखने उसी अस्पताल में जा पहुंचे जहाँ सरस्वती भर्ती की गयी थी। कहते हैं कि सत्य कभी हारता नहीं है और झूठ कभी फलदायी नहीं होता है। रामबरन को वहां की एक नर्स ने देखते ही पहचान लिया और एकदम से पूछ बैठी ----'आप सरस्वती पिता हैं न ?' उसकी वाणी में बेचैनी और सुकून एक साथ ही झलक उठे थे।

           'हाँ वह मेरी बहू है।' रामबरन ने सिर हिलाते हुए उत्तर दिया।

          'कैसी हैं सरस्वती जी ?' कुछ संदिग्ध सा स्वर था नर्स का और साथ ही आगे बोली ----'मुझे आपसे कुछ कहना है।'

           'हाँ ! हाँ बेटी कहो न !' 

दाहिने बांये पैनी दृष्टि से देखते हुए नर्स ने बड़े आहिस्ते से कहा ----'यहाँ नहीं। आइये।' कहते हुए नर्स गलियारे के थोड़े एकान्त स्थान की ओर बढ़ गयी। लल्लन भी साथ-साथ आगे बढ़ा तो अपरिचित होने के कारण नर्स ने उसे साथ आने से मना कर दिया। एकान्त में पहुँच कर नर्स ने जिस सत्य से पर्दा उठाया उसने रामबरन के दिमाग़ में तूफ़ान मचा दिया।

          'बाबू जी ! मैं छटपटा कर रह गयी थी कुछ बोल नहीं पायी थी उस समय। सरस्वती जी दो दिन यहाँ भर्ती रहीं। आप तो पहले ही दिन आये थे जब टेस्ट वग़ैरह हो रहे थे। दूसरे दिन तो माता जी ही आई थीं और एक नहीं दो-तीन बार वे यहाँ आयीं डॉक्टर मिश्रा से मिलने। फिर रिपोर्ट तैयार होने के बाद डॉक्टर मिश्रा ने सरस्वती जी के रूम में आकर उन्हें ----'माता जी बधाई हो ! आप दादी बनने वाली हैं ' कहते हुए रिपोर्ट थमा दी थी। रिपोर्ट में चक्कर और बेहोशी का कारण प्रिग्नेंसी दिखाया गया था। रिपोर्ट देखते ही सरस्वती जी बड़ी ज़ोर से चीखी थीं ----'नहीं s s s s । ये झूठ है।' उनकी चीख सुन कर सारा स्टाफ दौड़ते हुए उनके कमरे में पहुँच गया था। पर डॉ. मिश्रा ने सबको डांटते हुए वहां से भगा दिया। इसके बाद माता जी ने उन्हें घसीटते हुए बिस्तर से उतारा और ले कर चली गयीं।' पल भर रुक कर नर्स ने आगे कहा----'यहाँ क़रीब-क़रीब सबको असलियत का पता लग गया था क्योंकि डॉ. मिश्रा से जिस समय माता जी बातें कर रही थीं एक वार्ड ब्वॉय किसी काम से उनके कमरे में पहुँच गया था। उनके वार्तालाप के कुछ अंश उसके कानों तक भी पहुँच गये थे साथ ही नोटों की गड्डी थमाते हुए साक्षात् उसकी आँखों ने देख लिया था। उसकी तो उसी दिन नौकरी चली गई बिना नॉक किये केबिन में घुसने के जुर्म में।' इतना कह कर नर्स हौले से मुस्कुरा दी और फिर आगे कहा उसने ----'वह भी कम नहीं था जाते-जाते पूरे स्टाफ को सच्चाई बता कर ही गया। दरअसल डॉ. मिश्रा तो बहुत पहले से ऐसे कामों के लिए मशहूर थे। पैथोलॉजी वाले एक रिपोर्ट तो बना ही चुके थे जब उन्हें दूसरी रिपोर्ट बनाने को कहा गया तो वहाँ से भी बात लीक हुई। डॉ.मिश्रा को जब कुछ ख़तरा महसूस हुस तो उन्होंने पूरे स्टाफ को अपने कमरे में बुलाया और टाइट करते हुए कहा कि बात अगर अस्पताल से बाहर गयी तो किसी की नौकरी नहीं बचेगी, साथ ही निकाले गए वार्ड ब्वॉय का हवाला भी दिया। और फिर आप समझ सकते हैं रोज़ी-रोटी के डर ने सभी के मुंह पर ताला जड़ दिया। आपका पता-ठिकाना सब रजिस्टर से ग़ायब कर दिया गया था। इसलिए जिन एक दो लोगों के मन में आप तक पहुँचने की इच्छा थी भी उनका कोई बस नहीं चला। लेकिन आज आपको देख कर मैं अपने आपको रोक नहीं पायी सच कहने से। सरस्वती जी के बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम पर माता जी के उस दिन के तेवर देख कर इतना तो हम लोग समझ ही गए थे कि उनके साथ उन्होंने कुछ अच्छा तो नहीं ही किया होगा।' 

सच से पर्दा उठ चुका था। लल्लन को जब सच्चाई का पता लगा तो उसे अपनी छोटी सोच के कारण स्वयं से घृणा हो गई। अंजना का भूत तो उतर ही चुका था उस पर से। घर आ कर पिता और पुत्र दोनों ने सुलभा को खूब खरी-खोटी सुनाई और तत्काल सरस्वती को लाने के लिए  दोनों ही गोरखपुर रवाना हो गए।

सुबह का वक़्त था सरस्वती विद्यालय जाने के लिए तैयार हो रही थी। दरवाज़े पर दस्तक सुन कर उसने दरवाज़ा खोला, सामने बाबू जी को देख कर उसने झट से चरणस्पर्श कर प्रणाम किया पर उनकी आड़ में खड़े लल्लन को देख कर उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। अपने संस्कारों का मान रखते हुए उसने पति के भी चरणस्पर्श किये तो उसकी शालीनता देख कर रामबरन का ह्रदय भर आया। जलपान आदि के बाद थोड़ा व्यवस्थित हो कर बैठने पर अपने आने का कारण स्पष्ट करते हुए रामबरन एक प्रकार से बहू से क्षमा ही मांग बैठे ----'बेटी ! मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई मैं सरजू भइया को दिया हुआ वचन ठीक से नहीं निभा पाया पर मुझे भूल सुधारने का मौका तो तुम्हें देना ही पड़ेगा।' कहते हुए उससे साथ चलने के लिए कहा तो अब तक चुप बैठा लल्लन भी अपने आपको रोक न सका ----'मुझे पछतावा है कि मैं माँ के कहने में चलता रहा, उनकी धन की भूख के आगे सामने रखें हीरे को पहचान न सका।' फिर गिड़गिड़ाता हुआ सा बोला ----'प्लीज़ ! मुझे माफ़ कर दो  घर वापस चलो।'

पिता-पुत्र का अनुमान था कि इतनी अनुनय-विनय के बाद सरस्वती ख़ुशी-ख़ुशी उनके साथ चली आयेगी। पर वे ग़लत थे। सरस्वती ने कड़े शब्दों में वापस जाने से साफ़-साफ़ इंकार कर दिया----'बाबू जी ! अब वापस तो मैं उस घर में नहीं जाऊँगी। आपका मैं सम्मान करती हूँ। आप मेरे पिता तुल्य हैं, सदा रहेंगे भी और ------' लल्लन की और इशारा करके -----'और ये सदा मेरे पति रहेंगे मेरी आख़िरी सांस तक। हाँ ! ये मेरे साथ रहना चाहें तो यहाँ आकर रह सकते हैं। मैं जैसी भी हूँ अब यहीं ठीक हूँ। '

रामबरन और लल्लन का मुंह खुले का खुला रह गया। रामबरन खुश थे कि आज सरस्वती को कष्टों ने इतना साहसी और दृढ़ बना दिया है जो कि उनकी सोच के परे था। सरजू को दिया हुआ वचन भी आज सही मायने में पूरा हो गया था।

समाप्त

मधुरिमा प्रसाद

मो. न. 09935140682     

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ये कैसा मजाक

मुझे अच्छी तरह याद है, दो साल पहले 31 मार्च की शाम मुझे एक कॉल आया,” हेलो अमित! मैं....... दीपशिखा बोल रही हूँ.......।“

मैं एकदम चिंतित हो गया। वह रो रही थी। मैं कुछ बोलता उस से पहले ही वह बोल उठी,”तुम जल्दी से 12 नंबर की बस पकड़ कर वृन्दावन गार्डन पहुँच जाओ.....जरूर आना...शायद हमारी अंतिम मुलाकात हो”।

मैंने आव देखा न ताव। सीधे घर से भागा। मेरा भाग्य मेरे साथ था। बस तुरंत मिल गई। लगभग एक घंटे के सफ़र के बाद मैं वृन्दावन गार्डन में था। मैं यह सोच कर परेशान था कि दीपशिखा का क्या हाल होगा? मैंने उसे गार्डन में ढूंढा। लेकिन वह नहीं मिली। अचानक मेरा मोबाइल बज उठा। मैं हेलो ही बोल सका था कि उसने कहा,”हेलो अमित! मैं बड़ी मुसीबत में हूँ। तुम अभी होटल ग्रीनसिटी के बाहर मुझे मिलो। कॉल फिर कट गया। शायद संकट की घड़ी थी। मैं फिर से बस पकड़ कर होटल ग्रीनसिटी पहुँच गया। वहां कोई नहीं था। इस बार मोबाइल की घंटी बजते ही मैं बोल उठा,” दीपशिखा! आखिर तुम हो कहाँ?”

चुप रहो।“

ये आवाज़ किसी आदमी की थी। मेरे हाथ पाँव तक फूल गए। वह बोला,”अगर पुलिस को खबर दी तो बहुत बुरा होगा। तुम्हारी प्रेमिका हमारे कब्जे में है। अब जल्दी से होटल चंद्रविहार पहुँच जाओ।“

मैं पसीने से तरबतर था। रोंगटे तक खड़े हो गए थे। रात के 8 बज रहे थे। मैंने हिम्मत की और आधे घंटे बाद होटल चन्द्रविहार के बाहर खड़ा था। गार्ड ने मुझसे पूछा,”आपका नाम अमित है?”

मैंने हां में सर हिलाया।

आपको मैडम अंदर बुला रही है।“

अंदर जाकर देखा तो मेरा दिमाग चकरा गया। मेरे चार दोस्त और दीपशिखा जोर जोर से चिल्ला रहे थे,”अप्रैल फूल!”

मेरी आँखें गुस्से से लाल हो गई। मैंने दीपशिखा को बहुत बुरी तरह डांटा और पैर पटकते हुए वहां से लौट आया। मैंने चार दिनों तक उस से बात नहीं की। पाँचवें दिन वह घर आ धमकी। उसने रोते हुए मुझसे माफ़ी मांगी। सच कहूँ, वो रोते हुए भी बहुत खूबसूरत लग रही थी। मैं बस उसके चेहरे को देखता रह गया।

पिछला एक अप्रैल आने से पहले मैं सारी तैयारी कर चुका था। उसे अप्रैल फूल बनाने के विचार मात्र से मैं रोमांचित था। मैंने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर उसे अप्रैल फूल बनाने की पूरी तैयारी कर ली। मैंने 29 मार्च को ही कॉल करके कह दिया था कि मैं शहर से बाहर जा रहा हूँ। दो दिन बाद वापिस आऊँगा। योजनानुसार मैंने दोस्तों को कह दिया कि एक अप्रैल को उसे कह देना कि अमित दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया है।

एक अप्रैल की दोपहर को मेरे दोस्त का कॉल आया। उसने बताया कि दीपशिखा को वो सब कुछ बता दिया गया है जिसकी स्क्रिप्ट मैं दो दिन पहले ही लिख चुका था। मैं खुश था और ये जानने को उत्सुक था कि उसकी प्रतिक्रिया क्या रही। मेरे दोस्त के अनुसार दीपशिखा मुझे मिलने अस्पताल की ओर रवाना हो चुकी थी। पिछली साल उसने मेरी जो हालत की थी, उसका बदला लेकर मैं अत्यंत प्रसन्न था। लगभग दो घंटे बाद मेरे दोस्त का वापिस कॉल आया। बोला,”अमित! मजाक महंगा पड़ा। दीपशिखा अस्पताल में है। तुम्हें देखने जब अस्पताल जा रही थी, रास्ते में दुर्घटना हो गई। गंभीर रूप से घायल है वो। “

मैं हंस पड़ा और बोला,” देखो! तुम मुझे समझते क्या हो? मैं तुम्हारी बातों में आने वाला नहीं हूँ। इस ग्रुप को छोड़कर उसमें कैसे शामिल हो गए?” ये कहते ही मैंने कॉल काट दिया। मैं सोच रहा था कि मेरा दोस्त दीपशिखा की बातों में आ गया होगा। इसलिए मुझे दीपशिखा के घायल होने की खबर झूठी लग रही थी(वास्तव में मैं यहीं दुआ कर रहा था कि यह एक अफवाह साबित हो)। पर मैं ख़ुद को नहीं रोक सका। मैं सीधे अस्पताल पहुँच गया।

ख़ुदा शायद मेरी दुआ सुनने को तैयार नहीं था। मेरा प्यार मजाक के अंधड़ में उड़ गया। डॉक्टर हाथ झटक चुके थे। दीपशिखा के माँ बाप का रो-रो कर बुरा हाल था। दीप की शिखा बुझ चुकी थी। मैं इस का गुनहगार था। मजाक इतना महंगा पड़ेगा मैं सोच भी नहीं सकता था। आंसू आँखों में ही रह गए, जुबां अटक गई और मैं बेहोश हो गया। जब तक होश आया, दीपशिखा अग्नि में विलीन हो चुकी थी। मेरा प्यार एक हलके मजाक में खो गया। आज भी अप्रैल के पहले दिन मैं 12 नंबर की बस पकड़ता हूँ। वृन्दावन गार्डन पहुंचता हूँ फिर होटल ग्रीनसिटी। मुझे पता है वह इन दोनों जगहों पर नहीं मिलेगी। वह होटल चंद्रविहार में मेरा इंतजार कर रही होगी। मैं चंद्रविहार होटल जाता हूँ और आंसुओं से भरी आँखों से मैं गार्ड की तरफ देखता हूँ, शायद वह आकर मुझसे कहेगा,”आपका नाम अमित है? मैडम आपको अंदर बुला रही है।“

पर नहीं....यह संभव नहीं है और मैं पागलों की तरह वहां रोने लगता हूँ। अभी तक उसी होटल के सामने खड़ा हूँ, शायद मेरा प्यार मुझे बुला दे.....शायद......

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परिचय -

साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं यथा, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, अहा! जिंदगी, कादम्बिनी , बाल भास्कर आदि में रचनाएं प्रकाशित।

अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत।

पता :

विनोद कुमार दवे

206

बड़ी ब्रह्मपुरी

मुकाम पोस्ट=भाटून्द

तहसील =बाली

जिला= पाली

राजस्थान

306707

मोबाइल=9166280718

ईमेल = davevinod14@gmail.com

तमसोमा ज्योतिर्गमय :- प्रकाश पर्व दीपावली

सुशील कुमार शर्मा

असत्य से सत्य की ओर ,अंधकार से प्रकाश की ओर , अज्ञान से ज्ञान की ओर एवं मृत्यु से जीवन की ओर बढ़ने का प्रयास दीपावली है।कार्तिक मास की अमावस्या को मनाये जाने वाले इस पर्व से भले ही तमाम पौराणिक संदर्भ व किंवदंतियां जुड़ी हों लेकिन इसकी मूल अवधारणा अंधेरे पर उजाले की ही जीत है।  देशकाल-परिस्थितियों के अनुरूप फसलों से भंडार भरते हुए एवं  वर्षा ऋतु की खट्टी-मीठी यादों के बाद ठंड की दस्तक के साथ  मनुष्य के अंदर नया उत्साह भरने के लिए दीपावली का त्यौहार आता है।

ईश्वर का चेतन रूप दीपावली है :- ईश्वर का चेतन रूप दीपमाला में प्रज्वलित होकर हम सबके ह्रदय में विराजमान होता है। त्यौहार हमारे इतिहास, अर्थशास्त्र, धर्म, संस्कृति, और परंपरा का प्रतिबिम्ब है। ये सब हमारे जीवन का हिस्सा है, दीपावली की हमारे परंपरा में खास भूमिका है और उसके पीछे गहरा दर्शन भी है स्वस्तिक बनाया जाना, शुभ-लाभ लिखा जाना, दीपक प्रत्येक घर-खेत में जलाया जाना, पुराने सिक्के और कलश ---ये सब पूजा के लिए अहम् है यह सब प्रकृति पूजा एवं उस श्रोत के प्रति आभार ब्यक्त करना है जिससे हमारा चेतन जुड़ा हुआ है।जिस प्रकार एक जलता हुआ दीया अनेक बुझे हुए दीयों को प्रज्ज्वलित कर सकता है ठीक उसी प्रकार ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित किसी भी मनुष्य की आत्मा दूसरी आत्माओं को भी आध्यात्मिक प्रकाश से प्रज्ज्वलित कर एक सभ्य एवं समृद्ध समाज का निर्माण कर सकती है। दीपक और मनुष्य के बीच बहुत साम्य है। दोनों मिटटी के बने होते हैं। दोनों चेतना से प्रज्वलित होते है। दीपक जलता है तो आलोक बिखेरता है चारों ओर उजाला फैलाता है। मनुष्य प्रदीप्त होता है तो समाज और राष्ट्र में उजाला फैलाता है।  दीपक उजाला करके अँधेरे  रुपी नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करता है तथा मनुष्य अपने उज्जवल कार्यों से समाज और राष्ट्र के अंतस में फैले अज्ञान को दूर करता है।

दीपावली आध्यात्मिक अंधकार को आंतरिक प्रकाश से नष्ट करने का त्यौहार है। ईश्वर ने हमें जन्म दिया है ताकि हम अपने आप को संस्कारित कर सकें स्वयं को एवं समाज को कुरीतियों एवं अपसंस्कारों से मुक्त कर सकें मनुष्य जीवन की सार्थकता अपने संस्कारों को व्यक्तित्व के विकास में लगाकर समाज एवं राष्ट्र की सेवा करना है। मनुष्य जीवन संघर्ष से कठनाइयों पर विजय कर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए है। दीपावली का पर्व इन संस्कारों की दीपमाला है जो संघर्षो की घनघोर अँधेरी रात्रि में हमें अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

दीपाली मिलन का त्यौहार है। एक ऐसा सामूहिक पर्व जिसमे एक दूसरे के साथ खुशियां बांटी जाती हैं। दीपावली से जीवन में गति आती है। जीवन सकारात्मकता की ओर मुड़ता है नए उत्साह का संचार होता है। इस पर्व से आपसी उमंग ,प्रेम  ,सद्भाव ,आनंद एवं उल्लास का वातावरण व्यक्ति एवं समाज में फैलता है।

दीपावली की पुराणोक्त मान्यताएं :-दीपावली मूलतः यक्षों का त्यौहार माना जाता है। इस दिन यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ माँ लक्ष्मी की पूजन करते है ऐसी मान्यता है की राजा कुबेर अपने धन समृद्धि को अक्षुण्य रखने के लिए माता लक्ष्मी की पूजन करते है। एक पौराणिक कथा के अनुसार विष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए। श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध इसी दिन किया था। रामचन्द्रजी के वनवास से लौटने के बाद अयोध्या वासियों ने दीप प्रज्वलित करके खुशिया मनाई थीं तब से यह त्यौहार मनाया जाता है। विष्णु भगवन ने इसी दिन राजा बलि से देवताओं एवं लक्ष्मीजी को स्वतंत्र कराया था। दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरी‍ का पूजन किया जाता है। इस दिन वैदिक देवता यमराज का पूजन भी किया जाता है। नरक चतुर्दशी को माँ धूमावती जो की अलक्ष्मी का प्रतीक है उनकी पूजा करके विदाई दी जाती है। दीपावली के दिन धन और ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी का पूजन विधान पूर्वक किया जाता है। दीपाली के अगले दिन गोवर्धनपूजा की जाती है इस दिन भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के कोप से बचाया था। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ़ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं।

भारत के विभिन्न राज्यों की दीपावली की परम्पराएँ :-भारत के विभिन्न राज्यों में अलग अलग परम्पराओं से दीपावली मनाई जाती है। केरल में कुछ आदिवासी जातियां भगवन राम के जन्मदिवस के रूप में दीपावली मानती है। गुजरात में नमक को लक्ष्मी का रूप मान कर लोग इस दिन नमक की पूजा करके अपना व्यवसाय प्रारम्भ करते हैं। राजस्थान में दीपावली के दिन रात में बिल्ली का स्वागत किया जाता है। ऐसी मान्यता है की अगर इस दिन बिल्ली घर में आकर खीर खा जाती है तो साल भर घर में लक्ष्मी की आगमन होता है। पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा में दीपावली के दिन काली पूजा की जाती है। बुंदेलखंड एवं महाकौशल प्रदेश में माँ लक्ष्मी की पूजन के साथ गोवर्धन पूजन वनदेवी पूजन मढ़ई के रूप में किया जाता है।

दीपावली कुछ अपनाने कुछ त्यागने का पर्व :-दीपावली पर अपने घर के साथ साथ अपने मन की भी सफाई करें। साल भर के जितने अहंकार ,द्वेष, ईर्षा मन में समाये हैं उन्हें घर के कचरे के साथ बाहर फेंक कर अपने मन को स्वच्छ उज्जवल धवल कर लें ,उसे दीप मालाओं की तरह चमकाने दें। अपने पर्यावरण को गंदगी से मुक्त करें ,घर के साथ साथ अपने आसपास के वातावरण को साफ रख कर स्वच्छ भारत मिशन में अपना योगदान देवें। गरीब ,अपंग एवं वृद्धजनों के साथ बैठ कर उनके मन के निराशा के अंधेरों को प्रकाश के दीपक में परिवर्तित करने का प्रयास करें। पटाखों से वातावरण प्रदूषित होता है एवं आर्थिक हानि भी होती है अतः पटाखे न छोड़ें एवं उतनी राशि की मिठाई लेकर गरीब बच्चों में बाँट दें। अलक्ष्मी के आने से घर में दरिद्रता आती है जुआं के पैसे अलक्ष्मी का रूप होते हैं आप हारें या जीतें दोनों स्थितियों में आप अलक्ष्मी के शिकार बनेगें। दीपावली संबंधों को बेहतर करने का त्यौहार है इस बहाने  संबंधों को सजीव करने का महत्वपूर्ण अवसर मिलता है।  इस त्योहार की सकारात्मक ऊर्जा  है जो आम और खास का भेदभाव नहीं करती। सही मायनो में खुशी का संपन्नता व विपन्नता से सीधा रिश्ता है भी नहीं। एक मन:स्थिति है। कोई करोड़पति भी खुश नहीं है तो कोई फकीरी में मस्त है।  दीपावली के दौरान देर रात व सुबह बाजारों में फेंके गये सामान और दीपावली के बाद पटाखों का कचरा बीनकर खुशी हासिल करने वाले लोग भी इस त्योहार का आनंद लेते हैं।

मढ़ई :-"भौजी पटियां पारियो हो गई मढ़ई की बेर " ये लोक गीत दीपाली के अवसर पर महाकौशल क्षेत्र के हर बच्चे की जुबान पर होता है। महाकौशल एवं बुंदेलखंड में दीपावली का त्यौहार मढ़ई के बिना अधूरा माना जाता है। कार्तिक शुक्ल पक्ष दौज से चतुर्दशी तक महाकौशल क्षेत्र के हर गांव में मढ़ई मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें ग्वालदेव एवं वनदेवी की पूजा होती है। ग्वालदेव ढालों पर सवारी करतें हैं।इसमें गांव मुहल्लों में मेले लगते है  मढ़ई मेले गोंडवाना की सांस्कृतिक एवं सामाजिक समरसता  के प्रकाश स्तम्भ है जो आज भी दीपावली पर ग्रामीण क्षेत्रों में जगमगाते हैं। ये  मढ़ई  मेले  प्रकृति के प्रति प्रेम ,अपनत्व , सामाजिक मेलमिलाप एवं ग्रामीण व्यवसाय के सच्चे संवाहक हैं।

  इस प्रकाश पर्व को मनाने की सार्थकता तभी है जब हम इस त्योहार के मर्म को पहचानें।हम सभी के प्रयास यही हों कि दीपावली के माध्यम से सामाजिक समरसता पैदा की जा सके, आपसी विद्वेष को दूर किया जाये, बुराइयों को मिटाया जाये, खुशियों को बाँटा जाए।  इस परंपरा को बाजारवाद का पर्याय न बनने दें। व्यक्तिवादी सोच के बजाय सामाजिक समरसता की धारा बहाएं। खुशी मनाएं, खुशियां बांटें। त्योहार की मूल अवधारणा के अनुरूप भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतिम छोर तक धन का प्रवाह होने दें। यानी दीये बनाने वाले कुम्हार, गांव-कस्बे के हलवाई, दीये की बाती बनाने वाले व्यक्ति का भी ध्यान रखें। यानी गरीब के चक्र से मुक्ति की चाह रखने वाले तबके का भी ध्यान रखें। उस सामान का उपयोग करें जो भारतीय परंपरा, संस्कृति व बाजार का अंतिम घटक है। आयातित बिजली के दीये वह रोशनी कदापि नहीं दे सकते जो भारतीय माटी के बने दीपक दे सकते हैं। इनसे किसी के जीवन का अंधियारा भी दूर होता है।

आप भी दीवाली पर पटाखे फोड़ें, रौशनी करें किन्तु साथ ही याद रखें कि हमारे किसी कदम से हमारे समाज को नुकसान न हो. यदि हम एक कदम भी इस ओर बढ़ा पाते हैं तो फिर जगमग दीपावली का वास्तविक आनन्द उठा सकते हैं। आप सभी को दीपावली की अनंत शुभकामनाएं।  

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स्मरण शक्ति बढ़ाने के अनुभूत उपाय

जिवन में सफ़लता प्राप्त करने के लिये अच्छी स्मरणशक्ति होना जरूरी होता है। कहा जा सकता है कि बुद्धि, स्मृति जितनी अधिक हो जीवन में सफ़लता की संभावना उतनी अधिक बढ़ जाती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार हम सबके पास लगभग १०० करोड़ स्नायुकोष होते हैं। किन्तु हम काम केवल चार-पाँच करोड़ कोषों से लेते हैं। शेष सब प्रसुप्त अवस्था में होते हैं। जिनके १० करोड़ स्मृतिकोष काम करने लगते हैं वे आईन्स्टीन या न्यूटन बन जाते हैं। इन कोषों के जागने या क्रियाशील हो जाने पर बुद्ध, नानक, महावीर, तुलसी, कबीर बन सकता है। व्यास, नारद, पतंजली य श्री राम बन सकते हैं। सारे स्मृतिकोषों के जागृत हो जाने पर तो शायद सोलह कला सम्पूर्ण श्री कृष्ण बना जा सकता है।

हर व्यक्ति का जन्म इस सम्भावना के साथ होता है कि वह इसी जन्म में अपने सारे स्नायुकोषों को जगाकर स्वयं ईश्वर हो जाय, ईश्वर के समकक्ष हो जाय या उनके साथ साथ एकाकार हो जाय। शायद यही मुक्ति है, मोक्ष है, निर्वाण है, मानव जीवन की सार्थकता है, जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

आधुनिक विज्ञान तो यह कमाल अभी तक नहीं कर पाया पर हमारे पूर्वजों ने ऐसे उपाय खोजे थे जिनसे स्मरणशक्ति को असाधारण रूप से बढाया जा सकता है। योग, प्राणायाम, साधना, औषधियों, मंत्रों या ध्वनी तरंगों, यंत्रों तथा शक्तिपात अर्थात सिद्ध पुरुषों की कृपा से स्मरणशक्ति बढ़ाई जा सकती है ; सुप्त स्नायुकोषों को जगाया जा सकता है। अतिमानवीय क्षमताओं को जागृत किया जा सकता है।

कम आयु में, विद्यार्थी जीवन में सफ़लता बहुत अधिक मिलसकती है पर आयु बढ़ने के साथ यह क्षमता घटती चली जाती है। वास्तव में हमारी प्रजनन शक्ति की उर्जा से ही यह चमत्कार सम्भव है। इसलिये शुक्र की रक्षा करना, संयम पूर्ण जीवन, चरित्र रक्षा करना जरूरी है। तभी तो हमारे पूर्वजों ने २५ वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का नियम बनाया होगा। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी संयम पूर्ण जिवन जीने के अनगिनत आदर्श भारतीय समाज में हैं।

पश्चिमी समाज के प्रभाव से हमारे समाज में भोगपूर्ण जीवनशैली को जितना अधिक बढ़ावा मिला है उतना अधिक हमारी युवा पीढ़ी, हमारे विद्यार्थियों का मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य खराब हुअा है।

अतः संयम व ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए निम्न उपायों को करने से स्मरणशक्ति बढ़ाने में बहुत सफ़लता मिलेगी।

# ॐ का उच्चारण पाँच मिनट या इससे अधिक समय तक प्रतिदिन करने से पाँच- सात दिन में ही स्मरण शक्ति बढ़ने लगती है। सभी रोगों में लाभ होगा। ॐ का उच्चारण करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिये।

कमर सीधी रखें। प्रातः या दिन में पूर्व दिशा की ओर तथा सायं काल या रात को उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठना अच्छा है। किसी कारण यह सम्भव न हो तो भी लाभ होगा।

ॐ का उच्चारण तीन भागों में होता है। अ, ऊ और म् । तीनों का उच्चारण मिलाकर क्रमशः करें। ॐ के प्रारम्भ में अ बोलते समय ध्यान नाभि व उसके नीचे रखें। ॐ के मध्य में ऊ का उच्चारण करते समय ध्यान छाती के मध्य में रखें। अंत में म् का उच्चारण करते समय ध्यान भृकुटी के मध्य में रहे तो परिणाम और अच्छे होंगे।

सुविधा हो तो शुद्ध ऊनी आसन या कुशा के आसन पर बैठें। सूती दरी या कपड़ा चल सकता है। आसन के बिना भी काम चल सकता है पर फ़ोम, नायलोन, कैशमीलोन, डैफ़ोडिल, सन्थैटिक कपड़े के आसन का प्रयोग न करें। फ़ोम की गद्दी पर मोटा सूती या ऊनी वस्त्र बिछा कर काम चलाया जा सकता है।

भोजन करने के कुछ बाद ॐ तो बोल सकते हैं पर भोजन के बाद डेढ़ - दो घण्टे तक ध्यन लगाने से बचें। वैसे ॐ का उच्चारण किसी समय भी, लम्बा या छोटा कैसा भी कर सकते हैं। प्रातः व रात को सोने से पहले मध्यम आवाज में नियमित रूप से करना उत्तम होगा। कुछ देर गहरी आवाज के साथ और फ़िर मानसिक जाप करें।

अमेरीका के चिकित्सा विज्ञानी प्रो. जे. मोर्गन ने साढ़े चार हज़ार असाध्य रोगियों का इलाज ॐ से करने पर प्रयोग किया था। उन्हें आश्चर्यजनक सफ़लता मिली थी। तबसे वे ॐ से रोगियों का इलाज कर रहे हैं। एम्स़ की डा. मंजरी त्रिपाठी व उनके एक और वरिष्ठ चिकित्सक के अनुसार ॐ के उच्चारण से हृदय रोग, उच्च रक्तचाप आदि अनेक रोगों में लाभ मिलता है।

नासा की खोज के अनुसार सूर्य से अनेक प्रकार की तरंगों, ऊर्जा, गैसों के अतिरिक्त विशेष प्रकार की ध्वनि भी प्रसारित होती है। वह विशेष ध्वनि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ है।

ॐ तथा गायत्री मंत्र के जाप से स्मरणशक्ति बढ़ने के अतिरिक्त बुरी आदतों से छुटकारा पाने व चरित्र निर्माण में भी भारी सहायता मिलती है।

# आहार का भी ध्यान रखना जरूरी है। तामसिक, बासी, अपवित्र, चरित्रहीन का बनाया व स्पर्श किया भोजन करने से बुरे विचार ही आते रहेंगे। तभी भारत में भोजन बनाने व खाने में पवित्रता व सफ़ाई को बहुत महत्व दिया जाता था। भोजन को जाति व छूआछूत से जोड़कर देखने की विकृति कब और कैसे आ गयी, यह तो पता नहीं चलता पर वास्तव में आहार की पवित्रता का प्रभाव हमारे मन व तन पर गहरा होता है, इसे हमारे पूर्वज अच्छी तरह से जानते व समझते थे। तभी तो संसार का एकमात्र देश भारत है जहाँ भोजन को बनाने व खाने के लिये शुद्धता व पवित्रता के विशेष नियम प्रचलित हुए। कच्ची- पक्की रसोई की परम्परा उसी का एकरूप है।

# एक विशेष बात यह भी ध्यान देने की है कि एल्यूमीनियम के पात्रों, फ़ाईल आदि के प्रयोग से स्नायुकोष और लाल रक्तकण नष्ट होने लगते हैं। अतः इनके प्रयोग से बचें। मैलामाईन, नानब्रेकेबल, प्लास्टिक के बने बर्तन भी हमारे लीवर, किडनी, स्मरणशक्ति व पाचनतंत्र को खराब करते हैं। थर्मोकोल , प्लास्टिक व पेपर कपों से कैंसर होने की चेतावनी अनेक चिकित्सा वैज्ञानिक दे चुके हैं। इसलिये इनसे बचने का प्रयास करें।

# स्वदेशी गाय का शुद्ध घी लाकर रखें। प्रातः और रात को सोने से पहले पाँव के तलुऔं में इस घी से ५-५ मिनेट मालिश करें, नाभी, गुदाचक्र, नाक व आँखों में लगाएं। आँखों से कुछ देर पानी बहेगा व कुछ देर तक कुछ धुंधला दिखाई देगा।

स्मरण शक्ति बढ़ेगी और पुराना सर दर्द व माईग्रेन तक अनेकों का इससे ठीक होता हमने देखा है। अबतक हजारों रोगियों पर इसका सफ़ल प्रयोग हम कर चुके हैं।

घी नकली हुआ तो नुकसान होगा।

ऐच ऐफ़ या जर्सी आदि विदेशी गोवंश का घी भी हानिकारक है, अनेकों शोधपत्रों से यह सिद्ध हो चुका है। अतः घी स्वदेशी गोवंश का हो जो दही जमाकर विधिवत बना हो।

घी की पहचान के लिये एक चम्मच घी बिना गर्म किये खायें। यदि सुखद लगे, पेट, मुंह या गले में कष्ट न हो तो घी ठीक होगा अन्यथा खराब होगा या नकली होगा।

मरोड़, दस्त, ज्वर, मासिकधर्म होने पर नाभी में घी न लगायें।

घी के स्थान पर शुद्ध बादामरोगन, सरसों के तेल, कड़वी खुमानी के तेल का प्रयोग कर सकते हैं। पर रिफ़ाईंड या नकली या हैक्ज़ेन से निकाले गये तेल का प्रयोग हनिकारक है। कड़वी खुमानी के तेल का प्रयोग गर्मियों में न करें।

इस प्रयोग से स्मरणशक्ति बढ़ने व सर दर्द ठीक होने के इलावा आँखें सुन्दर बनेंगी, सूखी खाँसी ठीक हो सकती है। पेट में गैस कम बनेगी व पाचन सुधरेगा, शरीर के अनेक रोगों में लाभ मिलेगा।

# हमारी सभी शक्तियों का मूल स्रोत हमारा शुक्र या रज है। इसी शक्ति से संतान का निर्माण होता है और इसी से हमारी गुप्त व सुप्त शक्तियों को जगाना संम्भव है। पुरुषों की इस प्रजनन शक्ति या ऊर्जा स्रोत को शुक्र या वीर्य कहा जाता है तथा स्त्रियों में यह रज के रूप में स्थित है।

आधुनिक चिकित्सकों को पता नहीं कैसे यह भ्रम हो गया है कि इस शक्ति को नष्ट करने से कोई हानि नहीं होती, लाभ होता है। जबकि विश्व के सुप्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सा विज्ञानियों की खोज के अनुसार लेसीथीनम नामक इस पदार्थ से ही हमारे मस्तिष्क, पेशियों, अस्थियों व मज्जा का निर्माण हुआ है। इसके नष्ट होने पर बुद्धी, बल, सुन्दरता, स्वास्थ्य, प्रसन्नता सब नष्ट हो जाते हैं। अतः चरित्र की रक्षा के बिना किसी भी उपाय से स्मरणशक्ति की न तो रक्षा की जा सकती है और न ही स्मरणशक्ति बढ़ाई जा सकती है।

इस विषय कि सविस्तार जानकारी पाने के लिये इंटरनैट पर निम्न ई-पत्रिका पर निम्न लेख पढ़िये………

गूगल सर्च मे देखें pravakta.com इसमें लेखक सूचि में डा.राजेश कपूर के ऊपर क्लिक करेंगे तो लेखों की तीन पृष्ठ की सूचि सामने आयेगी। उन लेखों में चुनें “ब्रह्मचर्य की अद्भुत ऊर्जा” या दूसरा लेख देखें “कामवासना की अद्भुत ऊर्ज”

# यदि किन्ही भूलों के कारण आप अपनी ऊर्जा या शक्ति को गंवा चुके हों तो अब संभल जायें। गायत्रीमंत्र व ॐ का जाप करें, सात्विक भोजन करें और उस खोई शक्ति को फ़िर से पाने के लिये यह प्रयोग करें …………

सूखा आ़वला १०० ग्राम, शतावरी ५० ग्राम व कूजा मिश्री २०० ग्राम लाकर कूट-पीसकर मिलादें और काँच की शीशी या जार में रखें। प्रातः व सायं इसके २-२ चम्मच पानी से लें। सर्दियों में गर्म पानी के साथ लें। भोजन या जलपान एक - आध घण्टे बाद लें पर दूध, खीर, बर्फ़ी, खोया या मावा एक, डेढ़ घण्टे तक न लेना अच्छा है।

शुक्र, वीर्य बनेगा, बल बढ़ेगा, कमजोर दिल का कंम्पन, प्रदर रोग, स्वप्नदोष, पुरानी कब्ज, ऐसीडिटी व गैस आदि रोग ठीक होने लगेंगे। युवाओं के सफ़ेद होते बाल छः मास में काले, लम्बे व चमकीले हो जायेंगे। चेहरे पर लाली, सुन्दरता आने लगेगी। बूढ़ों की झुर्रियाँ मिटने लगती हैं।

पर काफी, चाय, फास्ट फूड, कोल्ड ड्रिंक, अण्डा या कोई भी नशे तथा गलत आदतें हों तो वे त्यागनी होंगी; तभी बात बनेगी। आदतें सुधारने में प्राणायाम व व्यायाम भी बहुत सहायक सिद्ध होते हैं।

# स्मरणशक्ति व स्वास्थ्य की रक्षा के लिये सब प्रकार के बोतल बन्द व पैकिट बन्द आहार तथा सब प्रकार का फास्ट फ़ूड बाधक है। ये सब हमारे स्वास्थ्य को बुरीतरह से नष्ट कर देते हैं। वास्तव में इनमें मोनोसोडियम ग्लुटामेट, डाईमिथाईल पालीसिलाक्सीन, बुटाईल हाईड्रोक्वीनोन (TBHQ), कैल्शियम सल्फ़ेट, कैल्शियमप्रोपियोनेट, सोडियम प्रोपियोनेट, अमोनियम क्लोराईड व अनेकों परमिटिड सुगंध तथा रंगआदि अनेक हानिकारक रासायनिक पदार्थ होते हैं।

मोनोसोडियम हमारे स्नायु कोषों को उत्तेजित करके नष्ट कर देता है। फ़लस्वरूप हमारी याद करने, समझने, सीखने की क्षमता निरंतर घटती चली जाती है। यही काण है जो कि फास्ट फ़ूड खाने वाले युवक- युवतियों के चेहरे व आँखें निस्तेज नजरआने लगते हैं। पढ़ने में वे निरंतर पिछड़ते जाते हैं। इन रसायनों से लीवर,किडनी, हृदय, तिल्ली आदि सभी अंग खराब होने लगते हैं।आलस व मोटापा बढ़ता जाता है। मधुमेह के रोगी बहुत बड़ी संख्या में इसी कारण बढ़ रहे हैं।

अतः स्मरणशक्ति व स्वास्थ्य की रक्षा के लिये हमें ये जंक आहार छोड़ना होगा।

पर यह इतना आसान नहीं है। ये ऐमऐसजी एक ऐडिक्शन है। अफ़ीम की तरह इसका नशा होता है। इसलिये इसे छोड़ने में काफ़ी मेहनत की जरूरत होगी। पीपल वृक्ष की छाल मुंह में रखकर चूसते रहने से काफ़ी सहायता मिलेगी। नशे छुड़वाने में यह बहुत लाभकारी है।

# किसी अच्छे शिक्षक से योग व प्राणायाम सीख कर नियमित अभ्यास करें। आहार व विचार सही होने पर शारीरिक व मानसिक क्षमतायें निरंतर बढ़ती जायेंगी।

# अकरकरा के फ़ूल, बच, कुलंजन ५०-५० ग्राम को कूट, छानकर कूजा मिश्री १५० ग्राम मिलाकर एक - एक चम्मच दिन में ३ बार चूसें। कुछ ही दिन में स्मृति बढ़ती नजर आयेगी। बतलाये गये परहेज याद रखें। आम, अमचूर, इमली आदि खटाई दवा के प्रयोग काल में न लें। आम या अमचूर का खट्टा पुरुषों के शुक्र को नष्ट करता है। इस प्रयोग से स्वर मधुर भी होगा। गाने वालों के लिये यह बहुत अच्छ है।

# लड़कियों व महिलाओं को लिये कुछ विशेष प्रयास करने होंगे। उनके शैम्पू व सौंदर्य प्रसाधनों में एक हजार से अधिक विषैले रासायनिक पदार्थ हैं। जिनके कारण उनके बाल, सुंदरता, स्वास्थ्य, बुद्धि व प्रसन्नता बरबाद हो रहे हैं। इन्हीं के कारण गर्भपात व बाँझपन तेजी से बढ़ रहा है। ये रसायन महिलाओं के प्रजनन तंत्र को भी रोगी व दुर्बल बना रहे हैं। इसलिये इन्हें बन्द करके अपने सौंदर्य प्रसाधन व अपना साबुन बनायें। (इसके लिये प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करनी होगी।)

# याद रखने की एक खास बात यह है कि हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं। हमारे विचारों के अनुसार हमारी अन्तःस्रावी ग्रंथियाँ या ऐन्डोक्राईन ग्लैंड हार्मोन स्राव छोड़ते हैं। उन रसों के प्रकार के अनुसार हमारा शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य बनता है। तभी कहा है कि हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं।

जरा विचार करें कि हम क्या सोचते हैं ? ध्यान देंगे तो पता चलेगा कि हम जो देखते, सुनते और पढ़ते हैं वही सब हम जाने या अनजाने में सोचते हैं। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे हम वही बनते चले जाते हैं जो हम सोचते है।

सोच को बदले बिना, ऊँची सोच के बिना हम बड़े नहीं बन सकते। और सोच को बदलने के लिये देखना होगा कि हम क्या देखते, पढ़ते व सुनते हैं। बुरे चित्र, बुरे दृष्य, हिंसा, बलात्कार, षड़यंत्र देखकर कोई भला आदमी कैसे बन सकता है ? हम व हमारे बच्चे टीवी, इंटरनैट पर हजारों हिंसा, बलात्कार, नग्नता, अश्लीलता, असभ्यता व छल-कपट के दृष्य देखते हैं। अखबारों व पत्रिकाओं में भी वही अश्लीलता, हिंसा व अपराध पढ़ते है़। यह सब कचरा भीतर डालते रहकर अच्छे व्यक्ती, विद्यार्थी का निर्माण कैसे सम्भव है ? मन की भूमि में विष बीज बोकर हम उत्तम फ़ल पाने की नासमझी किये जा रहे हैं। अच्छा देखें, सुने, पढ़ेंगे तो अच्छा सोचने लगेंगे। तब अच्छे हार्मोन बनने लगेंगे और हम तन व मन से स्वस्थ बनेंगे। इसलिये अच्छे चित्र कमरे में लगायें, अच्छी पुस्तकें पढ़ें, अच्छा सुनें और अच्छे लोगों की संगति करें। तब सबकुछ अपने आप अच्छा होने लगेगा।

पीजीआई चण्डीगढ़ के कार्डिऐलोजिस्ट प्रो. यशपाल शर्मा की खोज के अनुसार झूठ, फरेब करने से मस्तिष्क में इस प्रकार के हार्मोन बनने लगते हैं जिनसे कैंसर होने की सम्भावना होती है। उनकी खोज यह भी कहती है कि माता व पिता तनाव मुक्त व निर्भय हों तो उनकी संतान छः फुट कद की व खूब स्वस्थ होगी। फ़िर चाहे माता व पिता पाँच या साढ़े पाँच फुट के ही क्यों न हों।

इतना गहरा प्रभाव होता है हम पर हमारी सोच, हमारे विचारों का। तो स्वस्थ, सुन्दर, शक्तिशाली, बुद्धिमान बनना है ; दिव्य शक्तियों का स्वामी बनना है तो सबसे पहले हम अपने विचारों को बदलें। उसके लिये सही देखें, सही पढ़ें,सही सुनें और सही आहार लें। तब हम अपनी दिव्य व सुप्त शक्तियों को जगाने की साधना में हम सफ़ल हो सकेंगे और इसी जीवन में बहुत बड़े, बहुत महान बनकर अपना व सारे समाज का कल्याण कर सकेंगे।

आप अपने सुझाव, प्रश्न आदि निम्न पते पर भेज सकते हैं।

शुभाकाँक्षी,

वैद्य राजेश कपूर, व्हट्सऐप 7831840226 ,

ई मेल : dr.rk.solan@gmail.com

क्या है 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ?

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मित्रो !

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' , छंद शास्त्र और साहित्य-क्षेत्र में मेरा एक अभिनव प्रयोग है | इस छंद की रचना करते हुए मैंने इसे १६-१६ मात्राओं के ६ चरणों में बाँधा है, जिसके हर चरण में ८ मात्राओं के उपरांत सामान्यतः (कुछ अपवादों को छोडकर ) आयी 'यति' इसे गति प्रदान करती है | पूरे छंद के ६ चरणों में ९६ मात्राओं का समावेश किया गया है |

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' की एक विशेषता यह भी है कि इसके प्रथम चरण के प्रारम्भिक 'कुछ शब्द' इसी छंद के अंतिम चरण के अंत में पुनः प्रकट होते हैं | या इसका प्रथम चरण पलटी खाकर छंद का अंतिम चरण भी बन सकता है |

छंद की दूसरी विशेषता यह है कि इस छंद के प्रत्येक चरण के 'कुछ अंतिम शब्द ' उससे आगे आने वाले चरण के प्रारम्भ में शोभायमान होकर चरण के कथ्य को ओजस बनाते हैं | शब्दों के इस प्रकार के दुहराव का यह क्रम सम्पूर्ण छंद के हर चरण में परिलक्षित होता है | इस प्रकार यह छंद 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' बन जाता है |

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में मेरा उपनाम 'राज ' हो सकता है बहुत से पाठकों के लिये एतराज का विषय बन जाए या किसी को इसमें मेरा अहंकार नज़र आये | इसके लिये विचार-विमर्श के सारे रास्ते खुले हैं |

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' पर आपकी प्रतिक्रियाओं का मकरंद इसे ओजस बनाने में सहायक सिद्ध होगा | ------रमेशराज

रमेशराज के 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में 5 बालगीत

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में बालगीत-1

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" जल-संकट हो, अगर कटे वन

अगर कटे वन, सूखे सावन

सूखे सावन, सूखे भादों

सूखे भादों, खिले न सरसों

खिले न सरसों, रेत प्रकट हो

रेत प्रकट हो, जल-संकट हो | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में बालगीत-2

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मत मरुथल को और बढ़ा तू

और बढ़ा तू मत गर्मी-लू,

मत गर्मी-लू, पेड़ बचा रे

पेड़ बचा रे, वृक्ष लगा रे,

वृक्ष लगा रे, तब ही जन्नत

तब ही जन्नत, तरु काटे मत |

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में बालगीत-3

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नटखट बन्दर छत के ऊपर

छत के ऊपर , झांके घर - घर

झांके घर - घर , कहाँ माल है ?

कहाँ माल है ? कहाँ दाल है ?

कहाँ दाल है ? मैं खाऊँ झट

मैं खाऊँ झट , सोचे नटखट | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में बालगीत-4

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" बबलू जी जब कुछ तुतलाकर

तुतलाकर बल खा इठलाकर ,

इठलाकर थोड़ा मुस्काते

मुस्काते या बात बनाते ,

बात बनाते तो हंसते सब

सब संग होते बबलू जी जब |

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में बालगीत-5

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" फूल - फूल पर तितली रानी

तितली रानी लगे सुहानी ,

लगे सुहानी इसे न पकड़ो

इसे न पकड़ो, ये जाती रो ,

ये जाती रो खेत - कूल पर

खेत - कूल पर फूल - फूल पर |

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में बालगीत-6

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" बढ़ा प्रदूषण , खूब कटें वन

खूब कटें वन , धुंआ - धुँआ घन

धुंआ - धुँआ घन , जाल सड़क के

जाल सड़क के , मरुथल पसरे

मरुथल पसरे , तपता कण - कण

तपता कण - कण , बढ़ा प्रदूषण | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में बालगीत-7

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" बस्ता भारी लेकर बच्चा

लेकर बच्चा , सन्ग नाश्ता

सन्ग नाश्ता , पढ़ने जाये

पढ़ने जाये , पढ़ ना पाये

पढ़ ना पाये पुस्तक सारी

पुस्तक सारी , बस्ता भारी | "

(रमेशराज )

रमेशराज के 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में प्रणय गीत

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'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में प्रणय गीत-1

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जब वो बोले मिसरी घोले

मिसरी घोले हौले-हौले

हौले-हौले प्रिय मुसकाये

प्रिय मुसकाये मन को भाये

मन को भाये, मादक चितवन

मादक चितवन, अति चंचल मन

अति चंचल मन प्यार टटोले

प्यार टटोले जब वो बोले |

+रमेशराज

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में प्रणय गीत -2

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वे मुसकाते तम में आये

तम में आये, भाव जगाये

भाव जगाये मिलन-प्रीति का

मिलन-प्रीति का, रति-सुनीति का

रति-सुनीति का, दीप जलाये

दीप जलाये हम मुसकाये |

+रमेशराज

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में प्रणय गीत -3

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" पल-पल उसकी चंचल आँखें

चंचल आँखें, बादल आँखें

आँखें हरिणी जैसी सुंदर

सुंदर-सुंदर संकेतों पर

संकेतों पर मन हो चंचल

मन हो चंचल, यारो पल-पल | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में प्रणय गीत-4

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" पल-पल उससे मिलने को मन

मिलने को मन, पागल-सा बन

पागल-सा बन, उसे पुकारे

उसे पुकारे, प्रियतम आ रे !

प्रियतम आ रे, तब आये कल

तब आये कल, जब हों रति-पल | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-3

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मैना बेटी , बेटी कोयल

बेटी कोयल , बेटी सत्फल ,

बेटी सत्फल , क्रोध न जाने

क्रोध न जाने , बातें माने ,

बातें माने मात-पिता की

मात-पिता की मैना बेटी |

+रमेशराज

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-4

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दिन अच्छे सुन बच्चे आये

आये लेकर बढ़े किराये ,

बढ़े किराए , डीजल मंहगा

डीजल मंहगा , हर फल मंहगा ,

हर फल मंहगा समझे बच्चे

बच्चे मान इन्हें दिन अच्छे |

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-5

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दिन अच्छे आये हैं कैसे

कैसे जियें बताओ ऐसे ,

ऐसे ही यदि बढ़ीं कीमतें

बढ़ीं कीमतें , बढ़ीं आफ़तें,

बढ़ीं आफ़तें , बनकर डाइन

आये हैं कैसे अच्छे दिन !!

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-6

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खेले नेता कैसी होली

कैसी होली , दाग़े गोली

दाग़े गोली वोटों वाली

वोटों वाली , नोटों वाली

नोटों वाली रँग की वर्षा

कैसी होली खेले नेता ?

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-7

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कवि की कविता में खल बोले

खल बोले , विष जैसा घोले

घोले सहमति में कड़वाहट

कड़वाहट से आये संकट

संकट में साँसें जन-जन की

जन की पीड़ा रही न कवि की |

+रमेशराज

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-8

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आम आदमी जाग रहा है

जाग रहा है , भाग रहा है

भाग रहा है खल के पीछे

खल के पीछे , मुट्ठी भींचे

मुट्ठी भींचे, बन चिगारी

बन चिंगारी , आम आदमी |

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-9

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नेता के हाथों में कट्टा

कट्टा , घर डालर का चट्टा

चट्टा लगा बने जनसेवक

जनसेवक पर चील बाज वक

चील बाज वक सा ही कुनबा

कुनबा के संग हंसता नेता |

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-10

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गन्ना खट्टा राजनीति का

राजनीति का , छद्म प्रीति का

छद्म प्रीति का खेल-तमाशा

खेल-तमाशा करता नेता

नेता धमकाता ले कट्टा

राजनीति का गन्ना खट्टा |

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-11

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आँखें पुरनम, बहुत दुखी हम

बहुत दुखी हम , कहीं खड़े यम

कहीं खड़े यम , कहीं फटें बम

कहीं फटें बम , चीखें-मातम

चीखें-मातम , अब ग़म ही ग़म

अब ग़म ही ग़म , चीखें-मातम |

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-12

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हम रावण-से , कौरव-दल से

कौरव-दल से , दिखते खल से

दिखते खल से , लूटें सीता

लूटें सीता , लिये पलीता

लिये पलीता , फूंकें हर दम

हर दम दुश्मन नारी के हम |

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-13

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खल ललकारे , पल-पल मारे

पल-पल मारे , जो हत्यारे

जो हत्यारे , चुन-चुन बीने

चुन-चुन बीने, जो दुःख दीने

जो दुःख दीने, उन्हें सँहारे

वीर वही जो खल ललकारे |

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-14

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कवि की कविता में खल बोले

खल बोले, विष जैसा घोले

घोले सहमति में कड़वाहट

कड़वाहट से आये संकट

संकट में साँसें जन-जन की

जन की पीड़ा रही न कवि की |

--रमेशराज --

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-15

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" पीड़ा भारी, जन-जन के मन

मन के भीतर, सिसकन-सुबकन

सिसकन-सुबकन, दे ये सिस्टम

सिस्टम के यम, लूटें हरदम

हरदम खल दें, मात करारी

मात करारी, पीड़ा भारी || "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-16

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" बस्ती-बस्ती, अब दबंग रे

अब दबंग रे, करें तंग रे

करें तंग रे, तानें चाकू

तानें चाकू, दिखें हलाकू

दिखें हलाकू, जानें सस्ती

जानें सस्ती, बस्ती-बस्ती | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-17

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" शासन का ये कैसा बादल ?

बादल बढ़ा रहा है मरुथल,

मरुथल निगल गया खुशहाली

खुशहाली से जन-जन खाली,

खाली झोली मिले न राशन

राशन लूट ले गया शासन | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-18

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" अजब व्यवस्था, हालत खस्ता

हालत खस्ता, दिखे न रस्ता,

दिखे न रस्ता, लुटता जन-जन

जन-जन का दुःख लखे शासन,

शासन मूक-वधिर हलमस्ता

हलमस्ता की अजब व्यवस्था ! "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-19

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" नेता बोले, वोट हमें दो

वोट हमें दो, नोट हमें दो

नोट हमें दो, तर जाओगे

तर जाओगे, सब पाओगे

सब पाओगे, रम-रसगोले

रम-रसगोले, नेता बोले | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-22

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" लूटें जन की खुशियाँ सब दल

दल-दल में हैं, अब खल ही खल,

अब खल ही खल, अति उत्पाती

अति उत्पाती, अति आघाती,

अति आघाती जन को कूटें

जन को कूटें, खुशियाँ लूटें | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-23

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"छल के माला, सच को ठोकर

ठोकर मारे पल-पल जोकर,

जोकर जिसकी कायम सत्ता

सत्ता जो शकुनी का पत्ता,

पत्ता चल करता सब काला

काला डाले छल के माला | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-24

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"आँखें पुरनम, बहुत दुखी हम

बहुत दुखी हम, कहीं खड़े यम,

कहीं खड़े यम, कहीं फटें बम

कहीं फटें बम, चीखें-मातम,

चीखें-मातम, अब ग़म ही ग़म

अब ग़म ही ग़म, आँखें पुरनम | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-25

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"हरजाई था नारी का प्रिय

प्रिय ने बना लिया उसको तिय

तिय के संग पिय ने धोखा कर

धोखा कर लाया कोठे पर

कोठे पर इज्जत लुटवाई

लुटवाई इज्जत हरजाई | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-26

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"लाठी गोली कर्फ्यू दंगा

कर्फ्यू दंगा, जले तिरंगा

जले तिरंगा, काश्मीर में

काश्मीर में, नैन नीर में

नैन नीर में, पाक ठिठोली

पाक ठिठोली, लाठी गोली | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-27

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" स्वच्छ न पानी, बिजली संकट

बिजली संकट, राम-राम रट

राम-राम रट, जीवन बीते

जीवन बीते, बड़े फजीते

बड़े फजीते, दुखद कहानी

दुखद कहानी, स्वच्छ न पानी | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-28

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चाकू तनते, अब क्या हो हल

अब क्या हो हल, मानव पागल

मानव पागल, जाति-धर्म में

जाति-धर्म में, घृणा-कर्म में

घृणा-कर्म में, हैवाँ बनते

हैवाँ बनते, चाकू तनते | "

(रमेशराज )

'नव कुंडलिया 'राज' छंद'-34

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" आज़ादी के सपने खोये

सपने खोये , जन - जन रोये ,

जन - जन रोये , अब क्या होगा ?

अब क्या होगा , क्रूर दरोगा !

क्रूर दरोगा संग खादी के

सपने खोये आज़ादी के |

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" बादल सुख के , कहीं न बरसें

कहीं न बरसें, क्या जन हर्षें ?

क्या जन हर्षें, बस दुःख ही दुःख

बस दुःख ही दुःख, अति मलीन मुख,

अति मलीन मुख, उलझन पल-पल

उलझन पल-पल, दुःख दें बादल |

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" सत्ता का मद आज बोलता

आज बोलता , जहर घोलता

जहर घोलता , जन जीवन में

जन जीवन में , जल में वन में

जल में वन में , नेता के पद

नेता के पद, सत्ता का मद | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" माँगे रिश्वत बाबू - अफसर

बाबू - अफसर , भारी जन पर ,

भारी जन पर , नित गुर्राए

नित गुर्राए , काम न आये

काम न आये , देखो जुर्रत

देखो जुर्रत , माँगे रिश्वत | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" सत्ता का मद आज बोलता

आज बोलता , जहर घोलता

जहर घोलता , जन जीवन में

जन जीवन में , जल में वन में

जल में वन में , नेता के पद

नेता के पद, सत्ता का मद | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

--------------------------------------

" सत्ता का मद आज बोलता

आज बोलता , जहर घोलता

जहर घोलता , जन जीवन में

जन जीवन में , जल में वन में

जल में वन में , नेता के पद

नेता के पद, सत्ता का मद | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" तोड़े छत्ता, शहद निचोड़े

शहद निचोड़े , कम्बल ओढ़े

कम्बल ओढ़े , धुंआ करे नित

धुंआ करे नित , हो आनन्दित

हो आनन्दित , जिसकी सत्ता

जिसकी सत्ता , तोड़े छत्ता | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

-----------------------------------

" नेताजी के रूप निराले

रूप निराले , मद को पाले

मद को पाले , तनिक न डरते

तनिक न डरते , फायर करते

फायर करते , काम न नीके

काम न नीके , नेताजी के | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

-----------------------------------

" ब्रह्मराक्षस कैंची छोड़ें

कैंची छोड़ें , चाकू छोड़ें ,

चाकू छोड़ें , सिलें पेट जब

सिलें पेट जब , होता यह तब -

होता यह तब , झट पड़ता पस

बने डॉक्टर , ब्रह्मराक्षस | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

-----------------------------------

" जन को खाएं , मौज उड़ायें

मौज उड़ायें , ईद मनाएं

ईद मनाएं नेता - अफसर

नेता - अफसर , धन - परमेश्वर

धन - परमेश्वर अति मुस्काएं

अति मुस्काएं , जन को खाएं | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

-------------------------------------

" रात घनी है , दीप जला तू

दीप जला तू , क्या समझा तू ?

क्या समझा तू ? साजिश गहरी

साजिश गहरी , सोये प्रहरी

सोये प्रहरी , रति लुटनी है

रति लुटनी है , रात घनी है | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" मत जा प्यारे , अफवाहों पर

अफवाहों पर , इन राहों पर

इन राहों पर , वोट - सियासत

वोट - सियासत , छल का अमृत

छल का अमृत जन - संहारे

जन - संहारे , मत जा प्यारे | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" जिसको हम सब , मानें सूरज

मानें सूरज , तेज रहा तज

तेज रहा तज , इसे भाय तम

इसे भाय तम , अब तो हर दम

हर दम इसके तम में सिसको

सिसको , सूरज मानो जिसको | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" जेठ मास को , बोल न सावन

बोल न सावन , बता कहाँ घन ?

बता कहाँ घन ? बस लू ही लू

बस लू ही लू , कोयल - सा तू

कोयल - सा तू अधर रास को

अधर रास को , जेठ मास को | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" तेज गया अब तेजपाल का

तेजपाल का , धर्म - डाल का

धर्म - डाल का फूल सुगन्धित

फूल सुगन्धित बदबू में नित

बदबू में नित बापू का सब

बापू का सब तेज गया अब | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" आग सरीखे हर विचार को

हर विचार को , हर अँगार को

हर अँगार को और हवा दो

और हवा दो , क्रान्ति बना दो

क्रान्ति बना दो , बन लो तीखे

बन लो तीखे , आग सरीखे | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" आज क्रान्ति का राग जरूरी

राग जरूरी , आग जरूरी ,

आग जरूरी , गमगीं मत हो

गमगीं मत हो , भर हिम्मत को ,

भर हिम्मत को , खल से टकरा

राग जरूरी आज क्रान्ति का | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" नयी सभ्यता आयी ऐसी

आयी ऐसी , कैसी - कैसी ?

कैसी - कैसी चमक सुहानी !

जेठ संग भागे द्वौरानी

द्वौरानी ने त्यागी लज्जा

लज्जाहीना नयी सभ्यता | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" हरदम अब तो सत्ता के यम

यम गम देते चीखें मातम ,

मातम से हम उबरें कैसे

कैसे हल निकलेंगे ऐसे ?

ऐसे में बदलो ये सिस्टम

सिस्टम लूट रहा है हरदम | "

(रमेश राज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" धन पशुओं को पुष्ट करें सब

पुष्ट करें सब ये नेता अब

ये नेता अब , जन को लूटें

जन को लूटें , मारें - कूटें

मारें - कूटें अति निर्बल जो

पुष्ट करें सब धन पशुओं को | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" घर के ऊपर छान न छप्पर

छान न छप्पर , वर्षा का डर

वर्षा का डर , धूप जलाए

धूप जलाए , ' होरी ' अक्सर

' होरी ' अक्सर , ताने चादर

ताने चादर , घर के ऊपर | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" कैसा योगी , नारी रोगी !

नारी रोगी , मिलन - वियोगी !

मिलन - वियोगी , धन को साधे !

धन को साधे , राधे - राधे !

राधे - राधे रटता भोगी

रटता भोगी , कैसा योगी ? "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" इतना वर दो मात शारदे !

मात शारदे , हाथ न फैले

हाथ न फैले , कभी भीख को

कभी भीख को , अब इतना दो

अब इतना दो , दूं जग - भर को

दूं जग - भर को , इतना वर दो | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" हत्यारा अब मुस्काता है

मुस्काता है , तम लाता है

तम लाता है , देता मातम

देता मातम , जब हँसता यम

यम फूलों - सम लगता प्यारा

प्यारा - प्यारा अब हत्यारा | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" आओ प्यारो ग़म को मारो

ग़म को मारो , तम को मारो

तम को मारो , चलो नूर तक

चलो नूर तक , दूर - दूर तक

दूर - दूर तक , रश्मि उभारो

रश्मि उभारो , आओ प्यारो | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" कबिरा - सूर संत ज्यों नरसी

नरसी , मीरा , दादू , तुलसी

तुलसी जैसे अब बगुला - सम

अब बगुला - सम , मीन तकें यम

यम का धर्म सिर्फ अब ' धन ला '

' धन ला ' बोले मीरा - कबिरा | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" जनता चुनती जाति - रंग को

जाति - रंग को , अति दबंग को

अति दबंग को जीत मिले जब

जीत मिले जब , मद में हो तब

मद में हो तब , नादिर बनता

नादिर बनता , कटती जनता | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" सदविचार सदनीति यही अब

अब बन डाकू हम सबके सब

हम सबके सब कुण्डल छीनें

कुण्डल छीनें , मारें मीनें

मारें मीनें कर ऊंचा कद

कद को भोग - विचार बना सद | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" कर परिवर्तन , बहुत जरूरी

बहुत जरूरी , दुःख से दूरी

दुःख से दूरी तब होगी हल

तब होगी हल , चुनें वही दल

चुनें वही दल, खुश हो जन - जन

खुश हो जन - जन , कर परिवर्तन | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" तम का घेरा , नहीं सवेरा

नहीं सवेरा , सिर्फ अँधेरा

सिर्फ अँधेरा , चहुँ दिश दंगे

चहुँ दिश दंगे , भूखे - नंगे

भूखे - नंगे , यम का डेरा

यम का डेरा , तम का घेरा | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" खूनी पंजे , फंद - शिकंजे

फंद - शिकंजे , छुरी - तमंचे

छुरी - तमंचे , लेकर कट्टा

लेकर कट्टा , दीखें नेता

दीखें नेता मति के अन्धे

अन्धे के हैं खूनी पंजे | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" जन के बदले नेता को ले

नेता को ले , कवि अब बोले

कवि अब बोले , खल की भाषा

खल की भाषा में है कविता

कविता में विष ही विष अर्जन

विष अर्जन को आतुर कवि - मन | "

[रमेशराज ]

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" जन के बदले नेता को ले

नेता को ले , कवि अब बोले

कवि अब बोले , खल की भाषा

खल की भाषा में है कविता

कविता में विष ही विष अर्जन

विष अर्जन को आतुर कवि - मन | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" सब कुछ मंहगा बोले नथुआ

बोले नथुआ , ये लो बथुआ

बथुआ भी अब भाव पिचासी

भाव पिचासी , चाल सियासी

चाल सियासी , चुन्नी - लहंगा

चुन्नी - लहंगा , सब कुछ मंहगा | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" ओ री मैना ओ री मैना

मेरी बेटी ! मेरी बहना !

मेरी बहना ! जाल बिछाये

जाल बिछाये, खल मुस्काये

खल मुस्काये , बच के रहना

बच के रहना , ओ री मैना ! "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" देशभक्त की लीला न्यारी

लीला न्यारी , कर तैयारी

कर तैयारी , लूट मचाये

लूट मचाये , जन को खाये

जन को खाये , प्यास रक्त की

प्यास रक्त की , देशभक्त की | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" सद विरोध पर पल - पल हमले

हमले किये असुर ने - खल ने

खल ने चाही वही व्यवस्था

वही व्यवस्था , दीन अवस्था

दीन अवस्था में हो हर स्वर

स्वर पर चोटें सद विरोध पर | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" इस सिस्टम पर चोट किये जा

चोट किये जा , वीर बढ़े जा

वीर बढ़े जा , ला परिवर्तन

ला परिवर्तन , दुखी बहुत जन

दुखी बहुत जन , मातम घर - घर

चोट किये जा इस सिस्टम पर | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

" वीर वही है लड़े दीन-हित

लड़े दीन-हित , तुरत करे चित ,

तुरत करे चित , उस दुश्मन को

उस दुश्मन को , दुःख दे जन को ,

जन को सुख हो , नीति यही है

लड़े दीन-हित , वीर वही है | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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"सौदागर हैं ये इज्जत के

ये इज्जत के , धन-दौलत के

धन-दौलत के , नत नारी के

नत नारी के , ' कुर्सी के

कुर्सी पर ये ज्यों अजगर हैं

ज्यों अजगर हैं , सौदागर हैं | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" सपने खोये आज़ादी के

आज़ादी के , उस खादी के

उस खादी के , जंग लड़ी जो

जंग लड़ी जो , सत्य - जड़ी जो

जो थी ओजस , तम को ढोए

आज़ादी के सपने खोये | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" जाति-धरम के लेकर नारे

लेकर नारे , अब हत्यारे

अब हत्यारे , जन को बाँटें

जन को बाँटें , मारें-काटें

काटें जन को वंशज यम के

लेकर नारे जाति-धरम के | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" घर लूटा घर के चोरों ने

चोरों ने, आदमखोरों ने

आदमखोरों ने सज खादी

खादी सँग पायी आज़ादी

आज़ादी में गुंडे बनकर

करते ताण्डव आकर घर-घर | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" अजब रंग है आज सियासी

आज सियासी , बारहमासी

बारहमासी व्यभिचारों की

व्यभिचारों की , व्यापारों की

व्यापारों की , सेक्स सन्ग है !

सेक्स सन्ग है !, अजब रन्ग है | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" नेता चाहे , चकलाघर हों

चकलाघर हों , सब लोफर हों

सब लोफर हों , लोकतंत्र में

लोकतंत्र में , इसी मन्त्र में

इसी मन्त्र में , चले व्यवस्था

चले व्यवस्था , चाहे नेता | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" पांच साल के बाद मदारी

बाद मदारी, कर तैयारी

कर तैयारी , करे तमाशा

करे तमाशा , बन्दर नाचे

बन्दर नाचे , कर-कर वादे

कर-कर वादे , पांच साल के | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" राजा ने की यही व्यवस्था

यही व्यवस्था, यौवन सस्ता

सस्ता ब्लू फिल्मों का सौदा

सौदा ऐसा जिसमें नेता

नेता चाहे नव शहजादी

यही व्यवस्था राजा ने की | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" बनता ज्ञानी , अति अज्ञानी

अज्ञानी की यही कहानी

यही कहानी, है बड़बोला

है बड़बोला, केवल तोला

केवल तोला, टन-सा तनता

टन-सा तनता , ज्ञानी बनता | "

(रमेशराज )

|| 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ||

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" कवि की कविता में खल बोले

खल बोले विष जैसा घोले

घोले सहमति में कड़वाहट

कड़वाहट से आये संकट

संकट में साँसें जन-जन की

जन की पीड़ा रही न कवि की | "

(रमेशराज )

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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ-२०२००१

मो.-९६३४५५१६३०

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