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फिल्म निर्माण की प्रक्रिया - डॉ. विजय शिंदे

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लेखक के द्वारा लिखी कहानी से परदे पर उतरनेवाली फिल्म तक की प्रक्रिया बहुत लंबी है। यह प्रक्रिया विविध चरणों, आयामों और संस्कारों से अपने मकाम तक पहुंचती है। एक लाईन में बनी फिल्म की कहानी या यूं कहे कि दो-तीन पन्नों में लेखक द्वारा लिखी कहानी को फिल्म में रूपांतरित करना एक प्रकार की खूबसूरत कला है। इस रूपांतर से न केवल लेखक चौकता है बल्कि फिल्म के साथ जुड़ा हर शख्स चौकता है। टूकड़ों-टूकड़ों में बनी फिल्म जब एक साथ जुड़ती है तो एक कहानी का रूप धारण करती है। फिल्मों का इस तरह जुड़ना दर्शकों के दिलों-दिमाग पर राज करता है। लेखक से लिखी कहानी केवल शब्दों के माध्यम से बयान होती है परंतु फिल्म आधुनिक तकनीक के सहारे से ताकतवर और प्रभावी बनती है। "सिनेमा ने परंपरागत कला रूपों के कई पक्षों और उपलब्धियों को आत्मसात कर लिया है – मसलन आधुनिक उपन्यास की तरह यह मनुष्य की भौतिक क्रियाओं को उसके अंतर्मन से जोड़ता है, पेटिंग की तरह संयोजन करता है और छाया तथा प्रकाश की अंतर्क्रियाओं को आंकता है। रंगमंच, साहित्य, चित्रकला, संगीत की सभी सौंदर्यमूलक विशेषताओं और उनकी मौलिकता से सिनेमा आगे निकल गया है। इसका…

दीपावली की कविताएँ

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मिलकर दीप जलाएँआओ मिलकर दीप जलाएँ, ऐसा दीप कि जिसमें डूबे अंधकार मानव के मन का। अपनी सुकर रश्मियों से जो स्नात करे संपूर्ण विश्व को आलोकित जग के आँगन में शापग्रस्त पीढ़ी मुस्काए, मनु की यह संतान मनों से भेद-भाव का पाप मिटाए। द्वेष-दंभ-पाखंड दिशाओं में ऐसा विष घोल रहे हैं, अपने फूल चमन, तरु अपने, अपना उपवन अपने सपने, अंतर में अंतर पैदा कर संघर्षों की भाषा के स्वर ऐसे मिलकर बोल रहे हैं, जैसे हों संघर्ष सत्य शाश्वत अविनाशी और इन्हीं को अपनाकर सब जीवन को जी लेंगे सुख से मुक्ति प्राप्त कर लेंगे दुख से, बारूदी नगरी के वासी बुद्धिविलासी मानव को फिर से समझाएँ, आओ मिलकर दीप जलाएँ। कर्मशक्ति का तरुवर आलस की धरती पर सूख गया है, वैभव की हरियाली कैसे मिल सकती है चमन छोडक़र भाग गए तो फिर बतलाओ ख़ुशहाली की यह फुलवारी खिल सकती है? कर्मठता अभिशप्त भाग्य का मैल काटकर मेल कराती सुख-निधियों से, और तप्त जीवन की रेतीली राहों को रसभीने झरनों से भरती, थके हुए पाँवों की पीड़ा हरती अपने ही हाथों से, याद करें अपने गौरव को कर्म-धर्म का चक्र चलाएँ, आओ मिलकर दीप जलाएँ। एटम-जैट-सुपरसॉनिक के इस कलियुग में दूरी का पर…

वचन मत देना - कहानी - मधुरिमा प्रसाद

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वचन मत देना सरजू भइया खुद तो भगवान को प्यारे हो गए पर जाते-जाते जीवन सुरक्षित करने के नाम पर अपनी बेटी सरस्वती का जीवन नर्क बना गये साथ ही अपने लँगोटिया यार के बेटे का भी। सरजू के लँगोटिया यार यानी रामबरन। रामबरन एकलौते बेटे लल्लन के एक सीधे-साधे पिता थे। उधर सरजू की भी एकलौती बेटी थी सरस्वती। सरजू और रामबरन की बचपन से ही बड़ी गहरी दोस्ती थी। दोनों मध्यम वर्गीय परिवारों से थे। इंटर तक की पढ़ाई दोनों ने साथ-साथ की थी पर आगे चल कर समय और परिस्थितियों ने दोनों को दूर कर दिया था। रास्ते की दूरियाँ तो हुईं पर दोनों के दिल सदा एक दूसरे के समीप ही रहे। जवानी की देहलीज पर खड़े, हँसते खेलते सरजू के परिवार पर अचानक गाज गिर पड़ी। सरस्वती पांच साल की भी पूरी नहीं हुई थी कि उसकी माता का स्वर्गवास हो गया। सरजू की आयु अभी मात्र तीस वर्ष ही थी। समाज के चलन, दुनियादारी और छोटी बच्ची के लालन-पालन का हवाला दे कर सरजू पर बहुतों ने दबाव बनाया पर सरजू ने किसी की नहीं सुनी। दूसरा विवाह करके सरस्वती को सौतेली माँ के आँचल में डालना किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया। सरजू ने बेटी को माँ-बाप दोनों का प्यार दे कर …

ये कैसा मजाक - कहानी - विनोद कुमार दवे

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येकैसामजाकमुझेअच्छीतरहयादहै, दोसालपहले31 मार्चकीशाममुझेएककॉलआया,” हेलो अमित! मैं....... दीपशिखा बोल रही हूँ.......।“ मैं एकदम चिंतित हो गया। वह रो रही थी। मैं कुछ बोलता उस से पहले ही वह बोल उठी,”तुम जल्दी से 12 नंबर की बस पकड़ कर वृन्दावन गार्डन पहुँच जाओ.....जरूर आना...शायद हमारी अंतिम मुलाकात हो”। मैंने आव देखा न ताव। सीधे घर से भागा। मेरा भाग्य मेरे साथ था। बस तुरंत मिल गई। लगभग एक घंटे के सफ़र के बाद मैं वृन्दावन गार्डन में था। मैं यह सोच कर परेशान था कि दीपशिखा का क्या हाल होगा? मैंने उसे गार्डन में ढूंढा। लेकिन वह नहीं मिली। अचानक मेरा मोबाइल बज उठा। मैं हेलो ही बोल सका था कि उसने कहा,”हेलो अमित! मैं बड़ी मुसीबत में हूँ। तुम अभी होटल ग्रीनसिटी के बाहर मुझे मिलो। कॉल फिर कट गया। शायद संकट की घड़ी थी। मैं फिर से बस पकड़ कर होटल ग्रीनसिटी पहुँच गया। वहां कोई नहीं था। इस बार मोबाइल की घंटी बजते ही मैं बोल उठा,” दीपशिखा! आखिर तुम हो कहाँ?” चुप रहो।“ ये आवाज़ किसी आदमी की थी। मेरे हाथ पाँव तक फूल गए। वह बोला,”अगर पुलिस को खबर दी तो बहुत बुरा होगा। तुम्हारी प्रेमिका हमारे कब्जे में है। अब ज…

तमसोमा ज्योतिर्गमय :-प्रकाश पर्व दीपावली - सुशील कुमार शर्मा

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तमसोमा ज्योतिर्गमय :- प्रकाश पर्व दीपावली सुशील कुमार शर्मा असत्य से सत्य की ओर ,अंधकार से प्रकाश की ओर , अज्ञान से ज्ञान की ओर एवं मृत्यु से जीवन की ओर बढ़ने का प्रयास दीपावली है।कार्तिक मास की अमावस्या को मनाये जाने वाले इस पर्व से भले ही तमाम पौराणिक संदर्भ व किंवदंतियां जुड़ी हों लेकिन इसकी मूल अवधारणा अंधेरे पर उजाले की ही जीत है।  देशकाल-परिस्थितियों के अनुरूप फसलों से भंडार भरते हुए एवं  वर्षा ऋतु की खट्टी-मीठी यादों के बाद ठंड की दस्तक के साथ  मनुष्य के अंदर नया उत्साह भरने के लिए दीपावली का त्यौहार आता है। ईश्वर का चेतन रूप दीपावली है :- ईश्वर का चेतन रूप दीपमाला में प्रज्वलित होकर हम सबके ह्रदय में विराजमान होता है। त्यौहार हमारे इतिहास, अर्थशास्त्र, धर्म, संस्कृति, और परंपरा का प्रतिबिम्ब है। ये सब हमारे जीवन का हिस्सा है, दीपावली की हमारे परंपरा में खास भूमिका है और उसके पीछे गहरा दर्शन भी है स्वस्तिक बनाया जाना, शुभ-लाभ लिखा जाना, दीपक प्रत्येक घर-खेत में जलाया जाना, पुराने सिक्के और कलश ---ये सब पूजा के लिए अहम् है यह सब प्रकृति पूजा एवं उस श्रोत के प्रति आभार ब्यक्त क…

स्मरण शक्ति बढ़ाने के अनुभूत उपाय - वैद्य राजेश कपूर

स्मरण शक्ति बढ़ाने के अनुभूत उपाय जिवन में सफ़लता प्राप्त करने के लिये अच्छी स्मरणशक्ति होना जरूरी होता है। कहा जा सकता है कि बुद्धि, स्मृति जितनी अधिक हो जीवन में सफ़लता की संभावना उतनी अधिक बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार हम सबके पास लगभग १०० करोड़ स्नायुकोष होते हैं। किन्तु हम काम केवल चार-पाँच करोड़ कोषों से लेते हैं। शेष सब प्रसुप्त अवस्था में होते हैं। जिनके १० करोड़ स्मृतिकोष काम करने लगते हैं वे आईन्स्टीन या न्यूटन बन जाते हैं। इन कोषों के जागने या क्रियाशील हो जाने पर बुद्ध, नानक, महावीर, तुलसी, कबीर बन सकता है। व्यास, नारद, पतंजली य श्री राम बन सकते हैं। सारे स्मृतिकोषों के जागृत हो जाने पर तो शायद सोलह कला सम्पूर्ण श्री कृष्ण बना जा सकता है। हर व्यक्ति का जन्म इस सम्भावना के साथ होता है कि वह इसी जन्म में अपने सारे स्नायुकोषों को जगाकर स्वयं ईश्वर हो जाय, ईश्वर के समकक्ष हो जाय या उनके साथ साथ एकाकार हो जाय। शायद यही मुक्ति है, मोक्ष है, निर्वाण है, मानव जीवन की सार्थकता है, जीवन का अंतिम लक्ष्य है। आधुनिक विज्ञान तो यह कमाल अभी तक नहीं कर पाया पर हमारे पूर्वजों ने ऐसे…

रमेशराज के 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में 5 बालगीत

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क्या है 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' ?-----------------------------------------मित्रो!'नव कुंडलिया 'राज' छंद' , छंद शास्त्र और साहित्य-क्षेत्र में मेरा एक अभिनव प्रयोग है | इस छंद की रचना करते हुए मैंने इसे १६-१६ मात्राओं के ६ चरणों में बाँधा है, जिसके हर चरण में ८ मात्राओं के उपरांत सामान्यतः (कुछ अपवादों को छोडकर ) आयी 'यति' इसे गति प्रदान करती है | पूरे छंद के ६ चरणों में ९६ मात्राओं का समावेश किया गया है |'नव कुंडलिया 'राज' छंद' की एक विशेषता यह भी है कि इसके प्रथम चरण के प्रारम्भिक 'कुछ शब्द' इसी छंद के अंतिम चरण के अंत में पुनः प्रकट होते हैं |या इसका प्रथम चरण पलटी खाकर छंद का अंतिम चरण भी बन सकता है|छंद की दूसरी विशेषता यह है कि इस छंद के प्रत्येक चरण के 'कुछ अंतिम शब्द ' उससे आगे आने वाले चरण के प्रारम्भ में शोभायमान होकर चरण के कथ्य को ओजस बनाते हैं | शब्दों के इस प्रकार के दुहराव का यह क्रम सम्पूर्ण छंद के हर चरण में परिलक्षित होता है | इस प्रकार यह छंद 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' बन जाता है | &#…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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