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December 2016
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शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र 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नव वर्ष तुम्हारा मंगलमय, सुखप्रद, सार्थक हो शुभ आना

प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘

प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर
मो. 9425484452


नव वर्ष तुम्हारा कालचक्र  तो निर्धारित करता आना
पर आकर के जग के ऑगन को तुम खुशियों से भर जाना।
पीडित हैं सब आतंकवाद से दुख से भारी सबके मन
बीते वर्षो सी विपदायें तुम आकर फिर मत दोहराना।

देखे हैं जग ने कई दुर्दिन, सब देश दुखी हैं पीडा से
मुसका सकने के अवसर दे नई सुविधायें दे हर्षाना।
देना सुबुद्धि का वह प्रकाश  जो मिटा सके सब अॅंधियारा
नासमझों को देकर सुबुद्धि ममता का मतलब समझाना।

है स्वार्थ जाल में जकडे सब, अकडे फिरते करने मन का
अपने मत के हैं हठी अधिक, पसरा पागलपन मनमाना।
कुछ की अनुचित नादानी से, बहुतों के घर वीरान हुये
दिगभ्रमित मूढमति लोगों को हिलमिल कर रहना सिखलाना।

आये और गये तो साल कई, पर पा न सके सब जन उमंग
गति रही सदा इस जीवन की खाना पीना औं मर जाना।
देकर विचार शुभ उन्नति के, नव मौसम लाकर के अनुपम
भाईचारे का मंत्र सिखा, हर मन को पुलकित कर जाना।

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मिटती आई है लड़ भिड़कर यह दुनियॉ ओछी चालों से
सुख शांति की पावन प्रीति बढा दुख-दर्द को दूर भगा जाना।
इस जग के हर घर, हर जन को अपनी यादों से भर जाना
नव वर्ष तुम्हारा मंगलमय, सुखप्रद, सार्थक हो शुभ आना।
 
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सुशील शर्मा


नव वर्ष -पुरानी यादें नए दायित्व

कैलेंडर से उतरता वर्ष।
दे रहा है मन को हर्ष ।
कुछ विस्मृत सी यादें ।
कुछ चीखती फरियादें ।
काले धन पर चोट है ।
आज भी बिकता वोट है ।
नोट बंदी का ऐलान है ।
लाइन में खड़ा इंसान है ।
आतंकियों से फाइट है ।
सीमा पार सर्जीकल स्ट्राइक है ।


जेनयू की शर्म है ।
नीच होते कर्म है ।
पाकिस्तान की फ़ांस है ।
चीन की अटकी साँस है ।
पक्ष कटिबद्ध है ।
विपक्ष अवरुद्ध है ।
परिजनों की पीर है ।
मन बहुत अधीर है ।
कहीं ख़ुशी कहीं गम है ।


हँसते हुए भी आँखे नम है ।
चुनौतियों का चक्कर है ।
ख़ुशी और गम में टक्कर है ।
रोती सिसकती संवेदना है ।
मन में घुटती वेदना है ।
समाज का ध्रुवीकरण है ।
दिखावे का आकर्षण है ।
'सुल्तान'से 'दंगल'है ।
बाकी सब कुशल मंगल है ।


चटुकारिता चौमुखी है ।
मनुष्य बहुमुखी है ।
सच लिखना दायित्व है ।
सहमा सा साहित्य है ।
सम्मान बिकता है ।
सृजन सिसकता है ।
स्मृतियों के दंश हैं ।
भविष्य के सुनहरे अंश हैं ।
नववर्ष का आगमन है ।
संभावनाओं का आचमन है ।


सत्य के संकेत हैं ।
सभी श्याम श्वेत हैं ।
सुरभित व्यक्तित्व हैं ।
सुरक्षित अस्तित्व हैं ।
सुसंस्कृत व्यवहार हैं ।
संपन्न परिवार हैं ।
मन कृत संकल्प हैं ।
खुशियों के विकल्प हैं ।
सच के सिद्धान्त हैं ।


अस्तित्व सीमांत हैं ।
गुड़ियों के खिलौने हैं ।
बचपन सलौने हैं ।
शिक्षा का अधिकार है ।
बढ़ते व्यापार हैं।
सांझी सी साँझ है ।
प्रेम की झांझ है ।
सीमा पर वीर हैं ।
बाँकुरे रणधीर हैं ।


शत्रु हैरान है ।
झूठ परेशान है ।
साहित्य समृद्ध है ।
सत्य वचनबद्ध है ।
शब्दों के अर्थ हैं ।
शंकाएँ व्यर्थ हैं ।
प्रगति के सोपान हैं ।
लक्ष्यभेद विमान हैं ।


नवीनताओं का सृजन है ।
अहंकारों का विसर्जन है ।
व्यवस्थित अवधारणाएं हैं ।
असीमित संकल्पनाएँ हैं ।
सभी को नववर्ष की शुभकामनाएं हैं।

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मेराज रजा

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नये साल में
नयी उम्मीदें
नया उमंग
नया उल्लास
दुआ करें
खुशियो की बारिश में
नित्य नहाये सब
ना हो कोई उदास।

नये साल में
नयी राहें
नयी मंजिले
नयी इबारत
दुआ करें
चांद- तारों से भी आगे
तरक्की के बांध धागे
चमके भारत।

नये साल में
नये आयाम
नये सोपान
नित्य गढे हम
और साथ ही
कालाधन बाद में
पहले सफेद कर लें
अपना काला मन।


Merajraja.bazidpur@gmail.com
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विनोद कुमार दवे 

 


                            

  यह नया वर्ष है खुशियों का

नवजात शिशु सा डरा-डरा
उम्मीदों से भरा-भरा
ख्वाबों का शज़र हरा-हरा
दस्तक दे रहा जरा-जरा

रोशन रंगीं फुलझड़ियों का
यह नया वर्ष है खुशियों का

ओस कणों से भीगा-भीगा
कुछ मीठा कुछ तीखा-तीखा
जरा भरा जरा रीता-रीता
नमकीन जरा सा फीका-फीका

बे स्वाद जीवन में आस का
यह नया वर्ष है मिठास का

नन्हीं कलियों सा खिला-खिला
अल्हड़ यौवन सा खुला-खुला
प्रिय प्रिया सा मिला-मिला
चीनी पानी सा घुला-घुला

रूठे पतझर में बहार का
यह नया वर्ष है प्यार का

परिचय -
साहित्य जगत में नव प्रवेश।  पत्र पत्रिकाओं यथा, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, अहा! जिंदगी,  कादम्बिनी , बाल भास्कर आदि  में रचनाएं प्रकाशित।
अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत।
पता :
विनोद कुमार दवे
206
बड़ी ब्रह्मपुरी
मुकाम पोस्ट=भाटून्द
तहसील =बाली
जिला= पाली
राजस्थान
306707
मोबाइल=9166280718
ईमेल = davevinod14@gmail.com

 

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दोहे रमेश के नववर्ष पर

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पन्नो में इतिहास के, लिखा स्वयं का नाम !
दो हजार सोलह चला,..यादें छोड तमाम !!

दो हजार सोलह चला, ले कर नोट हजार !
दो हजार के नोट का,. .दे कर के उपहार !!

दो हजार सोलह चला, छोड सभी का साथ !
हमें थमा कर हाथ में,... नये साल का हाथ !!

जाते-जाते दे गया, घाव कई यह साल !
निर्धन हुए अमीर तो, भ्रष्ट हुए कंगाल !!

हो जाए अब तो विदा, कलुषित भ्रष्टाचार !
यही सोचकर हो रही, लम्बी रोज कतार !!

ढेरों मिली बधाइयाँ,........बेहिसाब संदेश !
मिली धड़ी की सूइंयाँ,ज्यों ही रात "रमेश"!!

मदिरा में डूबे रहे, ......लोग समूची रात !
नये साल की दोस्तों, यह कैसी सुरुआत !!

नये साल की आ गई, नयी नवेली भोर !
मानव पथ पे नाचता, जैसे मन मे मोर !!

नये साल का कीजिये, जोरों से आगाज !
दीवारों पर टांगिये, .नया कलैंडर आज !!

घर में खुशियों का सदा,. भरा रहे भंडार !
यही दुआ नव वर्ष मे,समझो नव उपहार !!

आयेगा नववर्ष में, .....शायद कुछ बदलाव !
यही सोच कर आज फिर, कर लेता हूँ चाव !!
रमेश शर्मा, मुंबई.
9820525940.rameshsharma_123@yahoo.com

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बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष"

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नया सबेरा
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नए साल का,नया सबेरा,
जब, अम्बर से धरती पर उतरे,
तब,शान्ति,प्रेम की पंखुरियाँ,
धरती के कण-कण पर बिखरें,

चिडियों के कलरव गान के संग,
मानवता की शुरू कहानी हो,
फिर न किसी का लहू बहे,
न किसी आँख में पानी हो,

शबनम की सतरंगी बूँदें,
बरसे घर-घर द्वार,
मिटे गरीबी,भुखमरी,
नफरत की दीवार,
 
ठण्डी-ठण्डी पवन खोल दे,
समरसता के द्वार,
सत्य,अहिंसा,और प्रेम,
सीखे सारा संसार,
 
सूरज की ऊर्जामय किरणें,
अन्तरमन का तम हर ले,
नई सोंच के नव प्रभात से,
घर घर मंगल दीप जलें//

 

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शालिनी मुखरैया

        नया जहाँ


सितारोँ के आगे इक नया जहाँ और बसाया जाय
जहाँ रह्ते हो  सिर्फ इंसान
ऐसा इक नया घर बनाया  जाय
बहुत हुआ नफरत का शोर ,
हैवानियत की इंतेहाँ
इंसान  को इंसान से फिर मिलाया जाय

दे कर खुदा ने हज़ारोँ  नेमतेँ भेजा था

हम सभी को  इस धरती  पर
न कद्र कर सके हम उसकी 

कभी हावी हुआ सब पर

यूँ लालच का ज़हर

रगोँ मेँ बह्ता हुआ लहू पानी हुआ

हर रिश्ता कमज़ोर हुआ ,
नफरत का ज़ख्म नासूर हुआ
ऐसे दुखते ज़ख्म पर प्यार का मरहम लगाया जाय
इंसान  को इंसान से फिर मिलाया जाय

दुनिया का हर मज़हब
देता प्यार की ही सीख है
जो इज़्ज़त दे इंसान को ,
वो खुदा के करीब है
सच्चाई , नेकी और इंसानियत
हर धर्म के उसूल हैँ
किसी भी राह को अपनाओ,
हर इबादत खुदा को कुबूल है
         2                       

इंसानियत  ही हो धर्म सभी का
ऐसा इक चलन चलाया जाय
इंसान को इंसान से फिर मिलाया जाय


बैर हो उसके बन्दोँ मेँ कभी
यह खुदा को कभी मंज़ूर नहीँ अगर मिल कर रहेँ सभी
तो बन जायेगी फिर जन्नत यहीँ
इंसान को इंसान का ,हम कदम होना चाहिये
जो भट्का कभी अपनी राह से
इल्म अपनी गल्तियोँ का उसको होना  चाहिये
भूला कर गिले शिक्वे सभी
विश्वास का इक दरिया बहाया जाय
इंसान को फिर इंसान से मिलाया जाय
सित्तारोँ के आगे इक नया जहाँ और बसाया जाय
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शालिनी मुखरैया
                                विशेष सहायक
                                शाखा मेडीकल रोड
                                अलीगढ
                                01.10.2016


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शालिनी तिवारी

ऐसा ही कुछ करना होगा

लम्बे अर्से बीत चले हैं,
इनसे कुछ सबक लेना होगा,
उम्मीदों की सतत् कड़ी में,
इस बार नया कुछ बुनना होगा,
अपने समाज के अन्तिम जन को,
अब तो बेहतर करना होगा,
शिक्षित और जागरूक बनाकर,
इनके हक में लड़ना होगा,
कुछ न कुछ पाने का सबका,
अपना अपना सपना होगा,
सूख चुके आँसुओं को अब तो,
मुस्कानों में बदलना होगा.

सुख समृद्धि सौहार्द्रता का,
दृश्य दिखे तो अच्छा होगा,
गगन चूमती उम्मीदों को ,
आयाम मिले तो अच्छा होगा,
मेरी बहनें बढ़ चढ़ करके,
इतिहास रचें तो अच्छा होगा,
शोध जगत दुनिया को अपना,
लोहा मनवाए तो अच्छा होगा,
भारत की संस्कृतियों को हम सब,
अपनाए तो अच्छा होगा,
भारत माँ के गौरव का परचम,
लहराए तो अच्छा होगा.

परमपिता से यही आस है,
इस बरस किसी का दिल न दहले,
स्त्री को सम्मान मिले और,
ख़ामोशी मुस्कान में बदले,
कुछ पद्चिह्न छुटे हम सबके,
अड़िग पथिक बन हम सब चल लें,
स्वर्णिम युग का क्रन्दन हो और,
भारत विश्व गुरू में बदले,
हिन्दी के इस पुत्री 'शालिनी' को,
आशीर्वचन अब देना होगा,
नए वर्ष में संकल्पित होकर,
ऐसा ही कुछ करना होगा.
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अखिलेश सोनी, इंदौर

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गीत: स्वागत है नव वर्ष धरा पर...

नव वर्ष की प्रथम भोर
करती है अंतरमन विभोर
हो जीवन में उत्कर्ष

स्वागत है नव वर्ष धरा पर
स्वागत है नव वर्ष

प्रथम रश्मियाँ अपने संग
लायें आशा और उमंग
भरें जीवन में हर हर्ष

स्वागत है नव वर्ष धरा पर
स्वागत है नव वर्ष

फैले मानवता का धर्म
शिखर छू लें सब सत्कर्म
यही हो जीवन का निष्कर्ष

स्वागत है नव वर्ष धरा पर
स्वागत है नव वर्ष

- अखिलेश सोनी, इंदौर
परिचय: अखिलेश सोनी
जन्म तारीख :   17 अप्रैल 1973
जन्मस्थान :     पिपरिया, ज़िला-होशंगाबाद (मध्यप्रदेश)
विधा :         ग़ज़ल / गीत / कविता /
सम्प्रति :       सॉफ्टवेर कंपनी में यूजर इंटरफ़ेस डिज़ाइनर

पारिवारिक परिचय:
माता :         श्रीमती लक्ष्मी सोनी
पिता :         श्री ओमप्रकाश सोनी (व्यंग्यकार / साहित्यकार / वरिष्ठ पत्रकार)
पत्नी :         श्रीमती सपना सोनी
पुत्र :           ओजस एवं तेजस
शिक्षा :         उर्दू साहित्य से एम.ए (बरकतउल्लाह यूनिवर्सिटी, भोपाल)
भाषाज्ञान :      हिंदी / अंग्रेजी / उर्दू
वर्तमान पता :   77 जगजीवनराम नगर, पाटनीपुरा चौराहे के पास, इंदौर-452001 (मध्यप्रदेश)
स्थायी पता :    ओम प्रिंटिंग प्रेस, जैन मंदिर के पास, मंगलवार बाजार, पिपरिया-461775 ज़िला-होशंगाबाद (मध्यप्रदेश)
मोबाइल नम्बर : +91 9479517064
ई-मेल :        akhileshgd@gmail.com

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      -भरत कुमार "तरभ"

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नयी सोच ,नयी उमंगें ।
नये सपने ,नयी राह
जिसमें हो सत्य।
जिसमें ना हो कड़वाहट की दरार।
जिससे ना टूटे रिश्तों की डोर।
न हो बुरी आदतें,न हो बुरे विचार।
जिससे मिले सीख अनेक को।
हो विचार मन में यह,जिससे
राह बने आसान।
जिससे होगा एक नया आगाज।
जिससे ना छूटे अपनों का साथ।
                             
                               -भरत कुमार "तरभ"
                                सांथू,जालौर, राजस्थान 

ईश पूजन के प्रमुख उपादानों का महत्‍व

डॉ. नरेन्‍द्र कुमार मेहता

मानस शिरोमणि’

पूजा का सीधा-सादा अर्थ होता है आराधना या साधना। पूजा की परम्‍परा वैदिक काल में यज्ञ से उत्‍पन्‍न मानी गई है। यज्ञ करने की परम्‍परा का ह्रास होने पर लोग मूर्ति निर्माण करने लगे। मूर्ति निर्माण कला ने पूजा करने की परम्‍परा का श्रीगणेश किया। ईश्‍वर की पूजा करने वाला पुजारी कहा जाता है। जहाँ पूजा की जाती है वह स्‍थल घर या मंदिर हो सकता है। निराकार ईश्‍वर की प्रार्थना के प्रचलन के कम होने से साकार ईश्‍वर की पूजा की जाने लगी। भारतीय संस्‍कृति में पूजन करने से मन शांति तथा सकारात्‍मकता का प्रादुर्भाव होता है। पूजा करने से मनोवांछित फल प्राप्‍त होता है तथा पूजा करने वाले व्‍यक्‍ति में आत्‍मविश्‍वास तथा क्रियाशीलता उत्‍पन्‍न होने लगती है।

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पूजा में अनेकानेक वस्‍तुओं या सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। पूजा के कई प्रतीक हैं, उनमें से कतिपय प्रतीय है-

1. शिवलिंग - शिवलिंग अर्थात्‌ शिव की ज्‍योति। शिवलिंग एक प्रकार की मूर्ति जो प्रायः पत्‍थर, स्‍फटिक अथवा पारद से निर्मित की जाती है। शिवलिंग के गोलाकार स्‍वरूप में जनेऊ का विशेष महत्‍व है। श्रीरामचरितमानस में शिवलिंग की स्‍थापना का वर्णन है। वर्तमान में कई भक्‍तजन मिट्टी के शिवलिंग निर्मित कर विधि-विधान से पूजा करते हैं। शिवलिंग का मूर्तियों में विशेष स्‍थान माना गया है। शिवलिंग सत्‍यम्‌-शवम्‌-सुन्‍दरम्‌ माना गया है। शिवलिंग घर में सुख-शांतिदायक एवं शुभ माना गया है।

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2. शालिग्राम -काले पत्‍थर की गोलियाँ या बट्टियों के रूप में जो मूर्ति होती है तथा उस पर चक्र का चिन्‍ह बना होता है, वह शालिग्राम की मूर्ति होती है। ऐसी मूर्ति जिस पर चक्र का चिन्‍ह नहीं होता है, वह शालीग्राम के रूप में पूजा नहीं की जाती है। जिस घर में शालिग्राम (शालग्राम) तथा शिवलिंग की पूजा होती है, घर की ऊर्जा में सन्‍तुलन होता है तथा उस घर में पवित्रता का वास होता है।

3. फूलपात्र या आचमनी - छोटे से ताम्‍बे के गिलासनुमा बर्तन में जलभर कर उसमें तुलसी की पत्तियाँ डालकर सदैव पूजा स्‍थल पर रखा जाता है। आचमनी (चम्‍मच जैसा) से भक्‍तों को तीन बार चरणामृत दिया जाता है। इसे ग्रहण करने से पूजा का दुगना फल प्राप्‍त होता है तथा हमारे विघ्‍न नष्‍ट हो जाते हैं। चरणामृत लेने के पश्‍चात्‌ हाथ को सिर से पोंछना नहीं चाहिये, इससे हमारी सकारात्‍मक ऊर्जा नष्‍ट हो जाती है।

4. पंचामृत - पंचामृत का अर्थ पाँच प्रकार के अमृत से होता है। दूध, दही, शहद, घी व शुद्ध जल के मिश्रण को पंचामृत कहते हैं। गाय का दूध एवं घी श्रेष्‍ठ माना गया है। कतिपय विद्वान दूध, दही, शहद, घी और गन्‍ने के रस से बने द्रव्‍य को पंचामृत कहते हैं। आजकल अधिकांश लोग दूध, दही, घी, शकर एवं शहद को मिलाकर पंचामृत बनाते हैं। पंचामृत में रोगनिवारण क्षमता होती है। पंचामृत स्‍वास्‍थ्‍य के लिए पुष्‍टिकारक है। तीन चम्‍मच से ज्‍यादा पंचामृत स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक नहीं होता है।

5. चन्‍दन - चंदन शांति व शीतलता प्रदान करता है। मंदिर या घर में चंदन की एक बट्टी तथा पत्‍थर की सिल्‍ली पूजाघर में होती है। चन्‍दन की सुगन्‍ध नकारात्‍मक विचार नष्‍ट करती है। चंदन घिस कर शालीग्राम एवं शिवलिंग पर अवश्‍य लगाना चाहिये। पूजा करने वाले को भी अलग से चन्‍दन घिस कर मस्‍तक पर लगाना चाहिये। इससे मन-मस्‍तिष्‍क शांत बना रहता है।

6. अक्षत - अक्षत श्रम करने से प्राप्‍त सम्‍पन्‍नता का प्रतीक होता है। अक्षत लक्ष्‍मीजी को भी बहुत पसन्‍द है। अक्षत ईश्‍वर को अर्पित करने का अर्थ यह है कि हम मानव सेवा की भावना से प्रेरित है।

7. पुष्‍प - पुष्‍प सुन्‍दरता का प्रतीक होता है। हम ईश्‍वर की मूर्ति पर पुष्‍प या फूल समर्पित कर यह प्रार्थना करते हैं कि हमारा जीवन फूल सा सुन्‍दर बने। पुष्‍प हमें अन्‍दर तथा बाहर से सुन्‍दर बनने का सन्‍देश देते हैं।

8. नैवेद्य - पूजा तब पूर्ण मानी जाती है जब तक हम हमारे देवता या देवी को नैवेद्य लगा न दें। नैवेद्य में मिठास होती है। नैवेद्य जीवन में मिठास और मधुरता रखने की शिक्षा देता है। इस प्रकार नैवेद्य पूजा करने वाले तथा नैवेद्य प्राप्‍त करने वाले के जीवन में सरसता, सौम्‍यता, सरलता और मधुरता उत्‍पन्‍न करता है। नैवेद्य में फल, मिठाई, मेवे एवं पंचामृत चढ़ाया जाता है।

9. रोली या कुंकुम - रोली को कुंकुम या कंकू भी कहा जाता है। यह चूने की लाल बुकनी और हल्‍दी को मिलाकर बनाया जाता है। प्रत्‍येक पूजा में इसे चावल (अक्षत) के साथ पानी में घोलकर माथे पर लगाया जाता है। यह शुभ माना गया है। अतः पूजा के अतिरिक्‍त हमारे समस्‍त त्‍यौहारों पर मस्‍तक पर कुुुंकुम लगाने की परम्‍परा है। लाल रंग वीरता-साहस-शौर्य का प्रतीक है। कंकू लगाने से आरोग्‍य प्राप्‍त होता है। कंकू को सदैव माथे पर नीचे से ऊपर की ओर लगाना चाहिये तथा उस पर अक्षत लगाना श्रेष्‍ठ होता है।

10. धूप - धूप सुगन्‍ध उत्‍पन्‍न करती है। इसके जलाने से सकारात्‍मक ऊर्जा प्राप्‍त होती है। मन में और घर में वातावरण शुद्ध होता है। सुगन्‍ध का जीवन में महत्‍व है। घर में बाँस से बनी अगरबत्ती के स्‍थान पर धूप का प्रयोग करना शुभ माना गया है।

11. दीपक - दीपक में पाँच तत्त्व मिट्टी, आकाश, जल, अग्‍नि और वायु होते हैं अतः दीपक मिट्टी का होना चाहिये। पूरी सृष्‍टि इन्‍हीं पाँच तत्त्वों से निर्मित हुई है। दीपक के नीचे अक्षत रख कर उस पर दीपक रखना चाहिये।

12. गरुड़ एवं घण्‍टी - गरुड़ अथवा घण्‍टी की ध्‍वनि वायुमण्‍डल में बजाने से नकारात्‍मकता को समाप्‍त करती है। वातावरण इस ध्‍वनि से शुद्ध एवं पवित्र बन जाता है। नकारात्‍मकता समाप्‍त होने से जीवन में समृद्धि आने लगती है। इसीलिये घर या मंदिर में गरुड़ या घण्‍टी रखी जाती है।

13. शंख - शंख मंदिर में अथवा घर में रखने से लक्ष्‍मीजी प्रसन्‍न होती है तथा वहाँ उनका वास होता है। शंख को सूर्य-चन्‍द्रमा के समान माना गया है। शंख के मध्‍य में वरुण, पृष्‍ठ में ब्रह्मा तथा अग्रभाग में गंगा और सरस्‍वती नदियों का वास होता है। शंख के दर्शन एवं पूजन से तीर्थाटन का लाभ मिलता है।

14. जलकलश-जल कलश को मंगल कलश भी कहते हैं। एक कांस्‍य या ताम्रकलश में जल भर उसमें आम के पत्‍ते डालकर उसके मुख पर नारियल रखा जाता है। कलश पर कंकू का स्‍वस्‍तिक का चिन्‍ह बनाकर उसके गले पर नाड़ा बांधना चाहिये। जल कलश में पान और आखी सुपारी डालना चाहिये। जल कलश देवताओं का आसन होता है इसके रखने से ईश्‍वर आकृष्‍ट होकर प्रसन्‍न होते हैं।

15. ताम्‍बे का सिक्‍का - ताम्‍बे के सिक्‍के को कलश में डालना चाहिये। इससे घर में समृद्धि की वृद्धि होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती है तथा घर में सात्‍विकता उत्‍पन्‍न करती है। ताम्‍बे में अन्‍य धातुओं की तुलना में सात्‍विक लहरें उत्‍पन्‍न करने की क्षमता अधिक होती है।

उपर्युक्‍त वर्णित पूजा के उपादान आपके घर में सुखसमृद्धि उत्‍पन्‍न करेंगे। यह पढ़ने में छोटी बात है किन्‍तु महत्‍वपूर्ण है।

 

डॉ. नरेन्‍द्र कुमार मेहता ‘मानस शिरोमणि’

Sr. MIG-103, व्‍यास नगर, ऋषिनगर विस्‍तार उज्‍जैन (म.प्र.)

Ph.:0734-2510708 Mob:9424560115

Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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मृत्यु पत्र (A Death Note) 

( मरने से पहले इंसान सोच पाता अपनी जिन्दगी में वह क्या करना चाहता है, क्या बनना चाहता है, उनके लिए जो सीखना चाहते हैं )

दिल की आवाज, परमात्मा की आवाज है, जिसमें भावों का संचार परमात्मा से आत्मा की ओर प्रसारित होता है, दिमाग की आवाज आत्मा की आवाज है, जिसमें भावों का संचार आत्मा से परमात्मा की ओर होता है, जब हम दिल की बात मानना चाहते हैं,  तो दिमाग उस पर हावी हो जाता है, जब आप दिमाग की बात सुनना चाहोगे, तो दिल उसे रोक लेता है, इसीलिए इंसान को दिल और दिमाग में सामंजस्य कर विश्वनीय विकास की अग्रसर हो जीवन के शिखर तक पहुंचना चाहिए ।

सुख और संतोष 

( दिल और दिमाग की कुछ बातें) 

मेरा दिमाग मुझे तथ्यात्मक सत्य करवाना चाहता है, जिससे समाज में नाम, पैसा और इज्जत मिले, इसे पाने के लिए कड़ी मेहनत चाहिए और इस पर अनेक आ चुके हैं, मुझे लगता है उन रास्तों पर चलकर मैं भी वह पा लूँगा, जो वो पा चुके हैं,कर्म करने के पश्चात् कुछ नहीं पाने का इसमें डर नहीं लगता, चूंकि इसमें एक बने बनाए रास्ता दिखाई दे रहा होता है, पर मेरा दिल उस राह पर चलने के लिए राजी नहीं होता है, कहता है वह रास्ता तू स्वयं बना, जिसमें कोई न चला हो, जिसकी सारी मुश्किलों की सामना करने वाला पहला इंसान तू स्वयं हो, 

चमकना तो उस दीपक की तरह मत चमकना, जो एक कमरे का अँधकार हरता है, फिर कुछ क्षण पश्चात् तेल के खत्म होने के पश्चात् बुझ जाता है, 

मैं बनना चाहता हूं  उस सूर्य की तरह जो दिन रात स्वयं प्रज्जवलित होकर अपना प्रकाश दुनिया को प्रदान करता रहता है।

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पर दिमाग की  बातें सुनना होता है आसान, दूसरों के चले हुए रास्तों का अाँख मूंदकर करना होता है अनुसरण, दिल की बात सुनकर बनाना चाहो नया रास्ता तो दुनियाभर से मिलने वाले सवालों और अपमान का डर, गिरने का डर, आने वाली मुश्किलों का डर, आगे बढ़ने से रोकता है, उन रास्तों पर आने वाली सारी मुश्किल, सारी बाधा नई होगी, जहाँ आगे चलकर हमें सुख की प्राप्ति होगी, दिमाग के रास्तों पर चलने से हमें सिर्फ संतोष की प्राप्ति होगी।

जिसे चाहत हो सुख की, उसे त्यागने होते हैं मान अपमान का डर, उसे अपने कर्मों को ही ईश्वर बनाकर बढ़ना चाहिए, दिल की आवाज सुनकर आगे बढ़ने पर रिस्क बढ़ जाता है, परिवार  की जिम्मेदारी, नाम, पैसा,  सामाजिक सम्मान दिल की बात सुनने को रोक देती है, एक डर सा लगने लगता है वह रास्ता है या नहीं, मृगमरीचिका सा हमें यह कहीं न भटका देगा, या यह मेरा सपना है जो सुबह होने पर समाप्त हो जाएगा। 

दिमाग हर बार हमें वह रास्ता  दिखाता  है, जिसमें कम मेहनत लगते हैं, जिसमें कम खतरे होते हैं, जो आत्मा  को कुछ पल को संतोष देता है, दिल के रास्तों में, जिन्दगी के राहों में आने वाली  दिक्कतों का कर्म ही अकेला अस्त्र होता है।

(आत्मा की बातें परमात्मा के साथ)

हे प्रभु!  मुझे  ऐसा मनुष्य मत बनाना, जो सिर्फ अपने  लिए जीता है, उसके बदले  मुझे एक सूकर बनाना,जो जीवित रहने पर संसार का  गंदगी  साफ करता है, मरने पर मानव का भूख शांत करता है।

हे प्रभु!  मुझे  एक पेड़ बनाना, जो जीवनभर परहित का कार्य करता है, मानव को प्राणवायु देता है, फल और फूल देता है, औषधि देता है, लकड़ी देता है।

हे प्रभु! मुझे  वह पत्थर मत बनाना,  जो मंदिर में विराजमान हो, जिसे दूध से नहलाया जाए, पुष्पों से ढका जाए, मुझे  वह पत्थर बनाना, जो घर की नींव बने, जो मानवों को धूप और बारिश से बचाए।

हे प्रभु!  मुझे वो विद्यार्थी मत बनाना, जो प्रतिस्पर्धा के दौड़ में परस्पर ढकेलते हुए बढ़ते हैं, मुझे वह विद्यार्थी बनाना, जो ज्ञान को ग्रहण करता है, अज्ञान को मिटाता है ।

हे प्रभु! मुझे वैसा शिक्षक भी मत बनाना, जो सिर्फ पैसा के लिए ही पढ़ाते हैं, मुझे वह शिक्षक बनाना, जो मिट्टी को आकार देता है, उसमें ज्ञान का बीज डालकर नवनिर्माण करता है। 

हे प्रभु! मुझे वो इंसान मत बनाना, जो तुम्हें अपने स्वार्थ के लिए अनेक धर्मो में विभाजन करता है, मुझे वो इंसान बनाना, जो संसार के अच्छाइयों में तेरा रूप पाता है, परहित में सुख पाता है।

हे प्रभु ! मुझे वो नेता मत बनाना, अपनी भूख मिटाने के लिए आम आदमी  से झूठे वायदे करते हैं, उनको लूटते हैं, मुझे वो नेता बनाना, जो अपने जीवन का बलिदान कर लोगों को सही राह लाता है।

हे प्रभु! वह व्यवसायी भी मत बनाना, जो लोगों का खून चूसते हैं, मुझे वह व्यवसायी बनाना, जो गरीबों को काम देकर उनका भूख मिटाता है ।

हे प्रभु! मुझे वो मत देना, जिनकी मेरी ही जरूरत हो, पर मुझे इतना जरूर देना, जिससे मैं दूसरों की मदद कर सकूँ।

हे प्रभु! मुझे  वो शक्ति देना, दुनिया में अकेला भूखा सो सकूँ, पर दूसरों का भूख दूर कर सकूँ, मुझे  वो शक्ति देना, जिससे सबको सुख दे सकूँ।

हे प्रभु! मुझे दुनियाभर का दर्द दे दे, दुनिया  को सारा सुख दे दे।

हे प्रभु! मुझे  रक्त पिपासु मच्छर मानव मत बनाना, जो सिर्फ दूसरों का खून पीकर जीता है, मुझे दधीचि की तरह बनाना, जो अपनी शरीर का दान कर सकूँ, हड्डियाें को बज्र बना दुनिया का काम आऊँ।

हे प्रभु!  मुझे वो इंसान मत बनाना, जो नारियों को मात्र योनि समझ क्षणिक सुख का मनोरंजन उठाता है, जो आत्म तृप्ति के लिए दूसरों को तड़फाता है, सिर्फ कामवासना में फँसकर अपनी जीवन का नाश करता है, मुझे श्रीराम की तरह बनाना जो नवनिर्माण में अपना योगदान  देता है।

हे प्रभु!  मुझे वह ज्ञान  दे, जो संसार के अज्ञान के बंथनों को तोड़ सकूँ, असंभव को संभव कर सकूँ, असाध्य को साध्य कर सकूँ, हे प्रभु! मैं अपना तन और आत्मा आपको  समर्पित करता हूँ।

 

सोमपिनाकी पटेल

गाँव - पत्रघर -रेड़ा

थाना-तहसील-डभरा

क्षेत्र-चन्द्रपुर

जिला- जांजगीर चांपा (छत्तीसगढ़) 

पिन-495692

मो नं-8962730864

ई-मेल-naveksp@gmail. com

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लोकेन्द्र सिंह

दृश्य एक। सुबह के पांच बजे का समय है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि यानी वर्ष प्रतिपदा का मौका है। ग्वालियर शहर के लोग शुभ्रवेश में जल विहार की ओर बढ़े जा रहे हैं। जल विहार के द्वार पर धवल वस्त्र पहने युवक-युवती खड़े हैं। उनके हाथ में एक कटोरी है। कटोरी में चंदन का लेप है। वे आगंतुकों के माथे पर चंदन लगा रहे हैं। भारतीय संगीत की स्वर लहरियां गूंज रही हैं। सुर-ताल के बेजोड़ मेल से हजारों मन आल्हादित हो रहे हैं। बहुत से लोगों ने तांबे के लोटे उठाए और जल कुण्ड के किनारे पूर्व की ओर मुंह करके खड़े हो गए। सब अघ्र्य देकर नए वर्ष के नए सूर्य का स्वागत करने को तत्पर हैं। तभी सूर्यदेव ने अंगडाई ली। बादलों की चादर को होले से हटाया। अपने स्वागत से शायद सूर्यदेव बहुत खुश हैं। तभी उनके चेहरे पर विशेष लालिमा चमक रही है। सूर्यदेव के आते ही जोरदार संघोष हुआ। सबने आत्मीय भाव से, सकारात्मक ऊर्जा से भरे माहौल में एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं दीं।

            दृश्य दो। दिसम्बर की आखिरी रात। पुलिस परेशान है कि 'हैप्पी न्यू ईयर वालों' को कैसे संभाला जाएगा? शराब पीकर बाइक-कार को हवाईजहाज बनाने वालों को कैसे आसानी से लैंड कराया जा सकेगा? खैर पुलिस के तनाव के बीच जैसे ही रात 12 बजे घड़ी की दोनों सुईयां एक जगह सिमटीं, जोरदार धमाकों की आवाज आती है। आसमान आतिशबाजी से जगमग हो उठा। आस-पास के घरों से म्यूजिक सिस्टम पर कान-फोडू संगीत बज उठा है। देर शाम से नए साल के स्वागत में शराब पी रहे लौंडे अपने बाइक पर निकल पड़े हैं। कुछ बाइकर्स कॉलोनी में भी आए हैं। सीटी बजाते हुए, चीखते-चिल्लाते हुए, धूम मचा रहे हैं। नारीवादी आंदोलन के कारण खुद को 'ठीक से' पहचान सकीं लड़कियों ने भी लड़कों से पीछे नहीं रहने की कसम खा रखी है। शोर-शराबे के बीच जैसे-तैसे सो सके। सुबह उठे तो अखबार में फोटो-खबर देख-पढ़कर जाना कि नए साल का स्वागत बड़ा जोरदार हुआ। कई लीटर शराब पी ली गई। बहुत-से मुर्गे-बकरे भी निपट गए। कुछ लोग पीकर सड़क किनारे गटर के ढक्कन पर पाए गए तो कुछ लोग सड़क दुर्घटना में घायल हो गए, जिनकी एक जनवरी अस्पताल में बीती। और भी बहुत कुछ है बताने को।

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            दो तस्वीर आपने देखीं। इनमें नया कुछ नहीं है। कुछ दिन से यह सब बताने वाले चित्र आपके फेसबुक पेज और व्हाट्सअप पर आ रहे होंगे। हो सकता है आपने इन्हें लाइक-शेयर-कमेन्ट भी किया हो। हो सकता है आप थोड़ी देर के लिए भारतीय हो गए हों और आपने इन्हें आगे बढ़ा दिया हो। आपको अचानक से अपनी संस्कृति खतरे में नजर आई हो। बहरहाल, समस्या यहां सिर्फ संस्कृति संरक्षण की नहीं है। यहां यह प्रश्न भी नहीं है कि मेरी संस्कृति अच्छी, उनकी संस्कृति घटिया। यहां प्रश्न लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी नहीं है। असल में प्रश्न तो यह है कि हमें किस तरफ आगे बढ़ाना चाहिए? हमें भारतीय मूल्यों, भारतीय चिंतन और भारतीय संस्कृति की ओर बढ़ाना चाहिए या फिर पश्चिम से आए कचरे को भी सिर पर रखकर दौड़ लगा देना है? क्या भारतीय संस्कृति पुरातनपंथी है? क्या वर्ष प्रतिपदा 'बैकवर्ड' समाज का त्योहार है और न्यू ईयर 'फॉरवर्ड' का? प्रश्न तो यह भी है कि वास्तव में हमारा आत्म गौरव कब जागेगा? कब हमारी तरुणाई अंगडाई लेगी? कब हम अपने मूल्यों में अधिक भरोसा दिखाएंगे? कब हम अपनी चीजों को दुनिया से सामने प्रतिष्ठित करेंगे?

            समय तो तय करना पड़ेगा, खुद को बदलने का। सोचते-सोचते, भाषण देते-देते, कागज कारे करते-करते बहुत वक्त बीत गया है। अब समय आ गया है कि हम भारतीय हो जाएं। आखिर कब तक प्रगतिशील दिखने के लिए दूसरे का कोट-जैकेट पहने रहेंगे? अब हम जान रहे हैं कि एक जनवरी को हमारा नववर्ष नहीं है। कारण भी क्या हैं कि एक जनवरी को नववर्ष मनाया जाए? सिर्फ यही कि अंग्रेजी कैलेण्डर बदलता है। अब तय कीजिए क्या यह हमारे लिए उत्सव मनाने का कारण हो सकता है? यदि हो सकता है तो निश्चित ही हमारे पुरखे तय कर गए होते। हम तो वैसे भी उत्सवधर्मी हैं, त्योहार मनाने के मौके खोजते हैं। लेकिन, हमने इस नववर्ष को उत्सव घोषित नहीं किया, क्योंकि हमारे लिए एक जनवरी को नया साल मनाने का कोई कारण नहीं था। हिन्दू जीवनशैली पूर्णत: वैज्ञानिक है। यह तथ्य सिद्ध हो चुका है। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने प्रकृति के चक्र को समझकर बताया कि चैत्र से नववर्ष शुरू होता है। उस वक्त मौसम बदलता है। वसंत ऋतु का आगमन होता है। प्रकृति फूलों से मुस्काती है। फसल घर आती है तो किसानों के चेहरे पर खुशी चमकती है। दुनिया के दूसरे कैलेण्डर से भारतीय कैलेण्डर की तुलना करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मनीषियों की कालगणना कितनी सटीक और बेहतर थी। वर्ष प्रतिपदा को ही नववर्ष मनाने का एक प्रमुख कारण यह है कि भारतीय कालगणना के मुताबिक इसी दिन पृथ्वी का जन्म हुआ था।

            बहुत से विद्वान कहते हैं कि जब ईस्वी सन् ही प्रचलन में है तो क्यों भारतीय नववर्ष को मनाने पर जोर दिया जाए। जब एक जनवरी से ही कामकाज का कैलेण्डर बदल रहा है तो इसे ही नववर्ष मनाया जाना चाहिए। जवाब वही है, सनातन। जब सब काम ग्रेगेरियन कैलेण्डर से ही किए जा रहे हैं तो फिर निजी जीवन में जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक की सभी प्रक्रियाओं के लिए पंचाग क्यों देखा जाता है। क्योंकि अंतर्मन में विश्वास बैठा है कि कालगणना में भारतीय श्रेष्ठ थे। भारतीय कैलेण्डर का पूर्णत: पालन करने पर कोई क्या कहेगा, इसकी चिंता हमें खाए जाती है। सारी चिंताएं छोड़कर अपने कैलेण्डर को प्रचलन में लाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। एक मौका हाथ आया था लेकिन पाश्चात्य प्रेम में फंसे हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वह मौका खो दिया था। वर्ष 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद ने पंचाग सुधार समिति की स्थापना की थी। समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से की थी। लेकिन, पंडितजी ने इस सिफारिश को नजरअंदाज कर दिया। खुद को सेक्यूलर कहने वाले प्रधानमंत्री ने ऐसे कैलेण्डर को मान्यता दी, जिसका संबंध एक सम्प्रदाय से है। जनवरी से शुरू होने वाले नववर्ष का संबंध ईसाई सम्प्रदाय और ईसा मसीह से है। रोम के सम्राट जूलियस सीजर इसे प्रचलन में लाए। जबकि भारतीय नववर्ष का संबंध हिन्दू धर्म से न होकर प्रकृति से है। यानी खुद को सेक्यूलर कहने वाले विद्वानों को भी अंग्रेजी नववर्ष का विरोध कर पंथ निरपेक्ष भारतीय कैलेण्डर के प्रचलन के लिए आंदोलन करना चाहिए।

            बहरहाल, खुद से सवाल कीजिए कि अपने नववर्ष को भूल जाना कहां तक उचित है? अगर भारतीयपन बचा होगा तो निश्चित ही आप जरा सोचेंगे। यह भी सोचेंगे कि वास्तव में उत्सव के रंग एक जनवरी के नववर्ष में दिखते हैं या फिर चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा में। उत्सव मनाने का तरीका पाश्चात्य का अच्छा है या भारत का? कब तक गुलामी के प्रतीकों को गले में डालकर घूमेंगे? अब अपने मूल्यों, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान और अपने ज्ञान-विज्ञान को दुनिया में स्थापित करने का वक्त आ गया है।

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भवदीय
लोकेन्द्र सिंह

Contact :

Makhanlal Chaturvedi National University Of

Journalism And Communication

B-38, Press Complex, Zone-1, M.P. Nagar,

Bhopal-462011 (M.P.)

Mobile : 09893072930
www.apnapanchoo.blogspot.in

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बोनसाई
निशु के जाते मानो घर में भूचाल आ गया. माता जी यानि के मेरी सास , तिया की दादी ने घर में शोर मचा दिया ॰ असल में निशु टिया के लिए मेडिकल का फ़ार्म ले कर आई थी ॰ मेडिकल का फ़ार्म भरने का अर्थ है टिया की शादी ५ साल के लिए टल जाना, जो माता जी हरगिज़ नहीं चाहती थी. वो तो बस यही चाहती थी कि टिया किसी लोकल कालेज़ से बी ए कर ले. और इसी टाइम में उस की शादी निबटा दे. मुझे तो पति और सास का ग़ुस्सा सहने की आदत है, पर टिया तो कमरा बंद कर के मानो कोप भवन में बैठ गई । रात का खाना भी नहीं खाया । इतिहास स्वयं को दोहरा रहा था । + २ के बाद मैं फैशन डिजाइनिंग करना चाहती थी । हम ने अपनी बेटी को दरजी नहीं बनाना कह कर मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया गया था । और बी ए पूरी होने से पहले ही मेरी डोली भेज दी । अगले दिन रविवार होने के कारण सभी घर पर थे । मेरे पति बहार माली से काम करवा रहे थे । मैं चाय लेकर बाहर ही आ गई । ये माली से एक पेड़ बनते पौधे की शाखायें कटवा कर बोनसाई बनवाना चाहते थे । नहीं इसे प्राकृतिक रूप में बढ़ने दो हमें बोनसाई नहीं चाहिए । मेरे तेवर देख ये हैरान रह गए । माली के हाथ की कैंची रुक गई।

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मैं अपनी बेटी को बोनसाई नहीं बनने दूँगी। मैं बड़बड़ाने लगी मेरे मुख पर आई दृढ़ता से सब हैरान थे ।
अब तक टिया और उसकी दादी भी बाहर आ गए ।
टिया अपना फार्म लेकर आओ अभी पाप के साथ बैठ कर भरो । तुम्हें कोई नहीं रोकेगा । मैं तुम्हें बोनसाई नहीं बनने दूँगी ।

Lalita bhatia

 

अद्वितीय यानी जिसके जैसा दूसरा न हो. इसे ही अंग्रेजी में यूनिक ( Unique ) भी कहा जाता है. खैर यह बिल्कुल सच भी है  कि दुनियाँ का प्रत्येक प्राणी अद्वितीय है. यकीन मानिए आप जैसा न कोई इस दुनियाँ में हुआ है और आने वाले वक्त में न होगा ही. जरा गौर कीजिए, क्या इस दुनियाँ के सम्पूर्ण जड़ चेतन में कभी भी दो चीजें पूर्णतः एक जैसी दिखाई दी हैं ...?? शायद नहीं. परमात्मा ने प्रत्येक को एक अद्वितीय सामर्थ देकर अलग अलग कार्य के लिए भेजा है. कुल मिलाकर जीवन के मर्मों को समझने के लिए हमें अपनी अन्तःचेतना को केन्द्रित करना ही होगा. शायद यही वजह है कि सदियों से आज तक योग साधना में ध्यान को विशेष महत्वता दी गई है. अर्थात जब हम स्वयं से रूबरू हो जाएगें तो हमें जीवन में भौतिक लझ्य तलाशने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. हम स्वतः जीवन के मूल उद्देश्य को समझकर सन्मार्ग की ओर अग्रसर हो जाएगें.

गौरतलब है कि आज अत्याधुनिकता के दौर में हम सारी दुनियाँ को जानने समझने की बात करते हैं और उसके लिए हर सम्भव प्रयास भी करते हैं. इतना ही नहीं, सच यह भी है कि समूची दुनियाँ गूगल-मय हो गयी है. मानो गूगल नाम के परिन्दें ने समूचे जड़ चेतन को अपने आप में समेट लिया है. यकीनन हम सब गूगल उपयोग करने में बड़ा फ़क्र महसूस करते हैं परन्तु उसके मूल को जानने की कभी कोशिश ही नहीं करते, जिसने ऐसे अनोखे गूगल का इज़ात किया. निश्चित रूप से वह भी हम जैसा मानव ही होगा. परन्तु उसमें और हममें खास फर्क यह है कि उसने स्वयं की क्षमता और ऊर्जा को समझा है. न जाने आज हम लोग क्यूँ दिन प्रतिदिन वास्तविकता से परे होकर काल्पनिक और क्षणिक भौतिकता में मशगूल होते जा रहे हैं....??

एक हास्यास्पद बात यह है कि जो स्वयं को नहीं समझ सकता, वो दुनियाँ को कितना समझ पाएगा...?? असल में हमारे जीवन यात्रा की शुरूआत स्वयं को समझने से होनी चाहिए. कई बार हमने देखा है कि जब लोग झगड़ते है तो कहते हैं कि तू मुझे नही जानता कि मै कौन हूँ और क्या कर सकता हूँ ? इसके जवाब में सामने वाला भी यही कहता है . वास्तविकता तो यह है कि वो दोनो स्वयं को नहीं जानते हैं और न ही जानने की कोशिश करते हैं.

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जरा दिमाक की रील को पीछे चलाइए, कुछ वर्ष पहले आप एक पराक्रमी योद्धा थे और आपने अपने पराक्रम से वह युद्ध जीता भी था. वो भी आपकी जिन्दगी का एक पल था जब आप स्वयं को चौतरफा मुसीबतों से घिरा पा रहे थे. उस वक्त आपके सारे मौकापरस्त हम-दर्दियों ने आपसे दूरी बना ली थी. इन सबके बावजूद आप रण में अकेले खड़े थे. यह वही पल था, जिस वक्त आप खुद को क्षण मात्र के लिए समझ पाए थे. नतीजा भी साफ रहा कि आप विजयी हुए. घबराइए नही, अड़िग रहिए, कुछ नया सीखते हुए आगे बढ़ते जाइए, मुसीबतें जीवन में अन्तःशक्तियों को जागृत कर स्वयं को समझने का मौका देती हैं. शायद अगर आप आज उन पलों को याद करेंगे तो सहम उठेंगे और यह सोचनें पर मजबूर हो जाएगें कि वह मै ही था जो जिन्दगी की इतनी कठिन परीक्षा पास किया था. लेकिन अब आप उन परिस्थितियों से उबर चुके हैं. इससे सिद्ध होता है कि आप में अटूट सामर्थ्य है. बस एक बार फिर स्वयं की शक्तियों को समझना पड़ेगा.

यक़ीन मानिए, विश्व के सबसे सुपर कम्प्यूटर का मालिक अमेरिका नहीं बल्कि आप हैं. आपके दिमाक में लगा कम्प्यूटर हरपल आपका साथ देता है, रचनात्मकता लाने की पुरजोर कोशिश करता है. फिर भी आप इतने लाचार एवं बेवस क्यूँ .. ? क्यूँकि हमें दिमाक के सुपर कम्प्यूटर को आपरेट करना नहीं आता. क्या आपनें कभी गौर किया है कि अत्याधुनिकता के दौर में हमारे सुपर कम्प्यूटर को हम नहीं बल्कि कोई और चला रहा है. यहाँ तक कि हमारे इस कम्प्यूटर को समाज, भय, कल्पना आदि शक्तियाँ चला रहीं हैं.
अब आपका समय है, जागिए, खड़े होइए और चलते ही जाइए. परमात्मा आपको कुछ नए मुकाम रचनें के लिए भेजा है. मुझे पूरा यकीन है कि आप वैसा सब कुछ कर जाएगे, जैसा और दूसरा कोई नहीं किया होगा. क्यूँकि आप अद्वितीय हैं.

"अन्तू, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश की निवासिनी शालिनी तिवारी स्वतंत्र लेखिका हैं । पानी, प्रकृति एवं समसामयिक मसलों पर स्वतंत्र लेखन के साथ साथ वर्षो से मूल्यपरक शिक्षा हेतु विशेष अभियान का संचालन भी करती है । लेखिका द्वारा समाज के अन्तिम जन के बेहतरीकरण एवं जन जागरूकता के लिए हर सम्भव प्रयास सतत् जारी है ।"

सम्पर्क - shalinitiwari1129@gmail.com

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आज जब इस विषय पर लिखने बैठा तो पूरा साल स्मृतियों में किसी बच्चे की चीख चिल्लाहट उसकी मृदुल हँसी की भाँति झिलमिला गया कुछ खट्टी यादें कुछ मीठी यादें हालाँकि मैंने इन यादों को अपने मन में संजों कर रख लिया है जैसे काला बाजारियों ने नोटों को तिजोरी में रखा हुआ था लेकिन आपसे वादा है आप जब भी इनका हिसाब मांगेंगे मैं पूरा हिसाब दूँगा ,आज में सिर्फ साहित्य एवम मानवीय रिश्तों के सन्दर्भ में बात करूँगा।

यदि वर्तमान में हमने कुछ खोया है तो वह है - रिश्तों की बुनियाद। दरकते रिश्ते, कम होती स्निग्धता, प्रेम और आत्मीयता, इतिहास की वस्तु बनते जा रहे हैं।आज नव वर्ष के उपलक्ष्य में कुछ संकल्पों की मानव और मानवीयता को अभीष्ट आवश्यकता है।

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है यही बात उसे संकल्पित करती है। यही संकल्प मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाते है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होते है।

हर साल के शुरुवात होने से पहले हम सब सौ प्रतिशत उत्साहित होते हैं कुछ अच्छा और नया करने के लिए पर जैसे ही हम नए वर्ष में घुसते हैं हम सब कुछ भूल जाते हैं। ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए क्योंकि यही उस वर्ष का असफलता का पहला कारण होता है।आज इस नव वर्ष के उपलक्ष्य में हम निम्न गुणों के लिए संकल्पित हों।

1. लोगों को अंदर से पसन्द करिये

2. मुस्कराहट के साथ मिलिए।

3. लोगों के नाम ध्यान रखिये।

4. "मैं " से पहले "आप "को रखिये।

5.बोलने से पहले सुनिए

6.क्या कहते हैं से कैसे कहते हैं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

7.बिना अपना फायदा सोचे दूसरों की सहायता करिए

8.अपनी भेष भूसा को उत्तम बनाइये।

9.आप जिसकी प्रशंसा कर सके उसे खोजिये

10. अपने को लगातार परखिये एवं सुधार करते रहिये।

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सबसे महत्वपूर्ण बात अपने अन्दर सकारात्मक सुविचार लायें।अपने कार्य को सफल बनाने के लिए सही योजना बनायें। आपको अपने लक्ष्य को पाने के लिए अपने आप से अटल वायदा करना पड़ेगा, तभी आप हमेशा अपने संकल्पों को सफल बनाने के लिए प्रेरित रहेंगे। पक्का कर लें कि चाहे रास्ते में जितनी बड़ी मुश्किल आए या छोटी-मोटी असफलता आए आप रुकेंगे नहीं चाहे बार-बार आपको जितना भी कोशिश करना पड़े ।

आज दुनिया में पश्चिमी साम्राज्यवाद का शिकंजा तेजी से कसता जा रहा है, जिसके कारण एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिकी देशों के स्वतंत्र अस्तित्व और पहचान पर गंभीर खतरा उपस्थित है। दूसरी ओर हमारे समाज में नवजागरण तथा राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के ऊँचे आधुनिक आदर्शों को रौंदते हुए छद्म तुष्टिकरण और जातिवादी ताकतें नए सिरे से सक्रिय हुई हैं। इधर भाषिक पृथकतावाद तथा अन्य संकीर्णताएँ भी पनपी हैं। लोगों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से विच्छिन्न किया जा रहा है और उपभोक्तावाद फैल रहा है। जन संचार माध्यम द्वारा सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाया जा रहा है, जिसके कारण लोग अपसंस्कृति के दल-दल में फँस रहे हैं। बुनियादी मानवीय मूल्य आज गहरे संकट में हैं।

भारत मिश्रित संस्कृतियों का संघ है अथवा यह भी कह सकते हैं कि वह कई राष्ट्रीयताओं का संघीकृत राज्य है।उपर्युक्त संदर्भ को भारत की आंतरिक समाज व्यवस्था पर घटाने का प्रयास करें तो भी स्थिति कुछ सहज नहीं होगी। आज भी हमारी मौलिक समस्याएँ क्या हैं? वर्तमान साहित्यकारों के लिये आज भी भारत की मौलिक समस्या भूख, गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, आइडेंटिटी क्राइसिस आदि ही हैं।आधुनिक साहित्य ने राष्ट्रवाद को विकास करने में अहम् भूमिका निभाया है। यही कारण है है कि भारत की जनसंख्या बहुधर्मी-बहुजातीय एवं बहुभाषी होने के बाद भी राष्ट्रवाद की ओर अग्रसर है।

साहित्य अब सामाजिक सक्रियता की ओर बढ़ना चाहता है। परिवर्तन की अदम्य चाह में कवि ‘एक्टिविस्ट’ के तौर पर ‘कलम की ताकत’ को नई भूमिका में 21वीं सदी में प्रस्तुत कर रहा है। आज का उस दौर का साक्षी है जहाँ मनुष्य के अमानवीकरण की गति में तीव्रता आई है। वैचारिक दृष्टि से समाजवाद का स्वप्न ध्वस्त हुआ है तो यांत्रिक सभ्यता का कहर भी विद्यमान है। मानवता को खूंटियों पर टाँग देने का प्रयास हो रहा हो, आज साहित्यकार को न केवल आक्रोश व्यक्त करना होता है, बल्कि वह उस विचारहीनता को चुनौती दे रहा है।

आज नए-नए संगठनों का जन्म होने लगा। नए लेखकों और साहित्यकारों के छोटे-छोटे समूहों ने, छोटी-छोटी जगहों से, इस दौर में अपनी सामर्थ्य के अनुसार, छोटी पत्रिकाओं का प्रकाशन और अक्सर मुफ्त या सामान्य मूल्य पर उनका वितरण निष्ठापूर्ण उत्साह के साथ किया जा रहा है ताकि आम पाठक तक उसकी पहुँच हो सके।आज साहित्यकार इस बात के मुखापेक्षी नहीं रह गए कि वे बड़ी-बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं या नहीं। सेठाश्रयी पत्रिकाओं के बहिष्कार का तो नारा ही चल पड़ा है ।'आज के दौर में 'जरूरी यह हो गया है कि रचित साहित्य सामाजिक परिवर्तन का पक्षधर है या नहीं।'

आज के साहित्यकार को चुनौती है की वह सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य का बहुआयामी विश्लेषण करें एवं सामाजिक जीवन के उच्चत्तर मूल्यों एवं आदर्शों के सामने सांप्रदायिकता एवम तुष्टिकरण से उत्पन्न हो गए खतरों को रेखांकित करे । इस संदर्भ में सांस्कृतिक माध्यमों, विशेषकर लघु-पत्रिकाओं की बढ़ी हुई जिम्मेदारियों को महसूस करते हुए संकट की इस घड़ी में मिलजुल कर अपनी प्रखरतम भूमिका का ऐतिहासिक दायित्व निभाने के लिए आज का रचनाकार तैयार है।

मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच जैसे रचनाधर्मी संस्थान आज साहित्य को जनक्रांति बनाने के लिए कृत संकल्पित है। साहित्य जब जन सामान्य की विषय वस्तु बन जाता है तभी वह आम संवेदनाओं का सम्प्रेषण कर पाता है। आजादी के 69 साल पूरे हो जाने पर भी हवा, पानी और रोटी की समस्या हल नहीं होना, उस भ्रष्ट तंत्र का चेहरा प्रस्तुत करता है, जिसका प्रभाव इस दशक तक जारी है। आज के साहित्य का आक्रोश देर तक संयमित नहीं रह पाता। मनुष्य के राक्षस बनने की प्रक्रिया पर आज का साहित्य उस विचारहीन, बेढाल, निर्द्वन्द्व अथवा मरे हुए लोगों की भाँति पीढ़ी पर व्यंग्य कर रहा है। रचनाकार अपनी रचनाओं में वर्तमान के प्रति चिंता व्यक्त करता है, देश की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करता है, इन स्थितियों में सुधार की कामना करता है, जनता का आह्वान करता है और स्वयं सक्रियतापूर्वक भाग भी लेता है।

प्रगति, विकास, संस्कृति, इतिहास-भूगोल आदि की जड़ भाषा होती है ,और भाषा को समृद्ध साहित्य करता है | साहित्य प्रत्येक वर्तमान को कलात्मक एवं यथार्थ रूप में समाज के सम्मुख प्रस्तुत करता हैं | मनुष्य चाहे जितना प्रगति करलें , विकास की डींगे हाँक ले , सभ्यता का दंभ भरे | पर जब तक वह भीतर से सभ्य नहीं होता, तब तक मनुष्य की सही मायने में प्रगति नहीं हो सकती |नव वर्ष के शुरुआत से हम सभी रचनाकार ये संकल्प लें की हम अपने देश समाज और पर्यावरण को अपनी लेखनी से ही नहीं वरन अपने आचरण से एक नयी दिशा प्रदान करने की कोशिश करेंगें।

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मुबारक साल नया ! भगवान करे इस नये साल में आपका सारा ‘कालाधन’ “गुलाबी” हो जाय ! खुदा करे आपके गुप्त ठिकानो को ई डी वाले खोज न पायें ! आपके बाथरूम में छिपी तिजोरी को कोई भी थपकी देकर खोल न सके ! ईश्वर करे नये साल में आप पर इनकम टैक्स की रेड ना पडे ! अल्लाह करे आपके बैंक का ऐ टी एम कैशलेस न हो और वोह अपना पूरा जबडा खोल कर आपकी जेब भर दे ! इस सर्दी के मौसम में आपकी सारी जेबें गर्म रहें जिससे आपको वार्मर पहनते की जहमत न उठानी पडे !

तैंतीस करोड देवी देवताओं से प्रार्थना है कि जिन गृहणियों ने पत्नी धर्म को निबाहते हुए अपने पतियों की जेब का भार हल्का करके चुराये हुए गुलाबी नोटों को जिस जिस सुरक्षित स्थान पर छुपाया है उस पर किसी मुए की बुरी नज़र न पडे ! देवी माता कृपा करें ऐ टी एम लक्श्मी का रूप बन कर आए और आपको लम्बी-लम्बी लाईनो में खडे रहकर अपनी सास-ननद या पडोसन की चुगली ना करनी पडे ! गुरु जी की कृपा से आपको दो हज़ार के नोट की चेंज़ जल्दी मिल जाय !

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सभी पीर पैगम्बरों को साष्टांग प्रणाम करते हुए अरदास है कि जिस पाजामे के नाडे में आपने अपने काले धन को छिपाया है उस पाजामे को उतरवाने की कोई हिम्मत न कर सके ! हमेशा की तरह इस साल भी आप खूब (काला) धन कमाएँ और नये नये गुप्त ठिकानों की खोज करके उसमे सोने, चान्दी और नोटो का भम्डारण करने में सफल हों !

भगवान से, ईश्वर से, अल्लाह से, खुदा से बिनती है कि आपने जिस जिस गरीब रिश्तेदार या दोस्त के खाते में अपना कालाधन जमा करवाया है वो आपको सही सलामत पूरा का पूरा गुलाबी होकर वापिस मिल जाय !

भगवान करे, ईश्वर करे, अल्लाह करे, खुदा करे कि दो हज़ार के गुलाबी गुलाबी नोट अभी बन्द न हों और आपके लाकर पहले की तरह ही आबाद रहें ! नया वर्ष आपके लिए खुशियां लेकर आए !

नव वर्ष की आप सब को लाख लाख बधाई !

राम कृष्ण खुराना

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    हंस मिलन कुमार की कलाकृति

अक्तूबर १०, प्रीन आम किमजी, शाम ५ बजे :

हर दिन की तरह आज भी किमजी की पहाडियों पर उष्मा का नतर्न हो रहा था। चारों ओर प्रकृति का सौंदर्य टूरिस्टों पर अपना सम्मोहक प्रभाव दिखा रहा था। सिटी सेन्टर पर भीड थी। गोयथे-इंस्टीट्यूट में जरमन भाषा सीखने वालों की भीड़ जो अपलक नेत्रों से किमल्ली झील की सुन्दरता उसमें पैडिल बोटों पर घूमते हुए लोगों को निरख रही थी। उस झील के मध्य में निर्मित सुन्दर किले पर प्रकाश की छटा उसे परीलोक का दुर्ग होने का भ्रम उत्पन्न कर रही थी।

ऐसे वातावरण में रहते हुए वृद्ध क्लूगे का मन अवसाद से भारी था। उन्हें प्रकृति का सौंदर्य बोझिल लग रहा था और उन्हें लोगों की. उन्मुक्तता भयभीत कर रही थी। वे अपने अस्सी वर्ष के पूर्ण हो जाने के प्रभाव से घबरा रहे थे। इसी कारण वे अपने छोटे से मकान के गेट पर खड्डे रहते हुए भी कहां दूर खोये हुए थे।

जीवन के बीते हुए दिनों को वे याद कर रहे थे। उस समय वह सारा वातावरण, किमजी झील में तेजी से घूमती हुयी रंग बिरंगी .प्रालों वाली नौकाएं, पहाडों पर गिरती बर्फ, साथ में पास के पब से उडती मशहूर बायरिशे बियर की सुगंधि और सुन्दर बाबेरियन स्वियाँ, उसे जीवन जीने में सहयोग करती थीं। परन्तु अब.......! अपने एकाकीपन से ऊब कर एक दिन वह पास पार्क में पडी बेंच पर बैठी सुन्दर स्त्री के बगल में जा बैठे उसने उस स्त्री से सुन्दर मौसम की चर्चा की, पर उसका कोई उत्तर न देकर, वह प्रस्तर प्रतिमा सी बैठी रही । एकाकीपन झेल रहे क्लूगे के दूसरे शब्द को सुनकर, वह तेजी से पर्स का उठाकर, झटके से उठकर, चल दी। तुरंत क्लूगे को लगा कि उसने फिर गलती कर दी। पर अब विकल्प ही क्या था। उसे वृद्धावस्था पर क्रोध आ गया था। वह उदास हो गया था। एकाकी होना उसे अभिशाप लगा। वह अवसाद से निकलने के प्रयास में असफल होकर वह उसी में डूब गया। वह गेट से हटकर अपनी इजी चेयर पर बैठ गया। उसने इस दुनिया की निष्ठुरता को पुन: न देखने की आशा में, अपने नेत्रों को बन्द कर लिया।

उसके जरमन शेफर्ड सीजर की गुर्राहट ने उसकी आंखें खोलने पर बाध्य कर दिया। सीजर खडा हुआ था, किसी की आवाज पर। परन्तु क्लूगो को कोई आसपास दिख नहीं रहा था।

उसने स्नेह से सीजर के सर को सहलाया। उसके बाल अभी भी मुलायम थे, पर वे पहले की भांति घने नहीं रह गए थे। उसके बालों की चमक भी घट गयी थी।

क्लूगे उसकी आयु के विषय में सोचने लगे। उन्हें ध्यान आया कि वे सीजर को अपने एक मित्र के यहां से बारह वर्षों पूर्व लाए थे।

बारह वर्ष का हो गया सीजर। आयु में बडा है यह। क्लूगे अपने आप बोल उठे 'मेरे साथ रहने के कारण तुम एकाकी नहीं हो, बहुत ही वफादार हां तुम सीजर ।'

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सीजर कानों को खडा किये कुछ सुन रहा था। वह हल्के हल्के गुर्रा रहा था। उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गयी थीं।

एकाएक क्लूगे की लगा कि उसका शरीर और मस्तिष्क जडवत हो गया है। उसे लग: कि तैसे कोई उसके शरीर को ऊपर खींच रहा हो, उसे पसीना आ गया वह घबरा गया था। मौत-मृत्यु नहीं.... अभी नहीं.... ¦ उसका हाथ हवा में अपने आप उठ गया। वह देख रहा था कि उसका हाथ विचित्र मुद्रायें बना रहा है। उसे लगा कि उसका दाहिना हाथ और उंगलियां भऱरत-नाट्यम की मुद्रायें बना रहे हैं ¦ क्या मेरा मास्तिष्क कहीं खो गया है। चिन्तित चकित भयभीत क्लूगे ने सोचा

नहीं ऐसा कुछ भी नही है'' के शब्द उसके मस्तिष्क में झनझना उठे।

अक्तूबर १०, प्रीन आम किमजी, शाम ५:३० बजे :

' क्लूगे चैतन्य हुआ। सुदूर गगन में गतिमान एक सफेद बादल के टुकडे पर उसकी आंखें टिक गयी, जैसे वह उसमें छिपे किसी संकेत को पढ़ने का प्रयास कर रहा हो। उसका सर उसी प्रकार झनझना रहा था। जैसे किसी ने शक्तिशाली जड़ दिया हो। उसके हृदय की धड़कन बहुत बढ़ गयी। परन्तु वह संयत होने का प्रयास कर रहा था।..... धीरे-धीरे अपने मस्तिष्क में गूँज रहे उस अज्ञात उद्भव के शब्दों को स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा था। उसे लगा कि वह स्वप्न से जाग उठा है।

'तो तुम अन्तरिक्षचारी हो, मेरे मस्तिष्क में तुमने अपना वास बना लिया है'' कहते हुए अपने परिवर्तित स्वर में बोलते हुए वह रुक गया।

उसकी दृष्टि किमजी झील में चल रही नावों में बैठे हयूमनायडों पर टिक गयी। उनमें और कुल पलों में पूर्व देखे गये मानवों में कोई साम्य नहीं था।

.आन्तरिक्षचारियों का इस स्थान पर स्वागत है उसने जोर से कहा। परन्तु इन शब्दों के उच्चारण के बाद वह भ्रमित सा हो गया।

'क्या तुम इस धरा के जीव नहीं हो?' उसके मस्तिष्क में ध्वनि गूँजी |

'हाँ मैं इस धरा का पृथ्वी का वासी था, अनेक वर्षों तक, परन्तु अब अस्सी वर्ष की आयु प्राप्त करने के उपरान्त, मैं स्वयं को भू को इस धरा का वासी नहीं मानता हूँ। क्योंकि मैं इतना एकाकी हूँ अथवा दूसरे शब्दों में मेरे जैसे अनेक व्यक्ति इसी एकाकीपन से घबराकर अपने को इस पृथ्वी का प्राणी मानने में संशय करते हैं। कभी कभी ऐसा लगता है कि हम किसी वीरान ग्रह पर वास कर रहे हों। यहां का जीवन हमारे ऐसे लोगों के बिना भी चल रहा है। हम तो पूरी तरह से अस्तित्व विहीन से हैं। इसी कारण मैं अपने को तुम्हारी भांति मानता हूँ।''

"ओह ! तो यह बात है'' उसके मस्तिष्क से ध्वनि आती लगी।

"तुम में और मुझ में मात्र एक ही अन्तर है। तुम्हारा मुझसे संपर्क करना, मेरे मस्तिष्क में रहना, एक चमत्कारिक घटना मीडिया के लिए बन सकती है। परन्तु मेरा अस्तित्व नगण्य है। मेरे जैसे करोडों हैं, इस पृथ्वी पर।

"तुम्हारे शब्द कटुता से भरे हुए हैं।'

""तुम सही समझे, मेरे भीतर एकाकी होने, किसी के योग्य न होने की भावना का विष भरा हुआ है।'

"'तुम सम्पन्न हो, शिक्षित हो और प्रीन-आम किम जी जैसे रमणीक स्थान पर निवास करने हुए भी तुम दुखी हो?' .

" 'हाँ तथ्यत: मैं बहुत ही दुखी व्यक्ति व्यक्ति हूँ। मैंने अपने इस दुख की भावना को, मन से निकाल फेंकने के अनेक प्रयास किये, परन्तु मैं सफल न हो सका। सुनो! जब मैं एक सुन्दर युवक-युवती और उनके बच्चों को देखता हूँ, मेरा दर्द . मेरी पीडा उभर आती है।' कहते हुए क्लूगे के आंसू लुढकते हुए नीचे आ गये। उसने अपनी रूमाल से उनको पोंछा और कुछ ठिठकते हुए, रूमाल को ठीक से फोल्ड कर अपनी पाकेट में रख लिया। '. अरे! तुम रो रहे हो' उसके मस्तिष्क में अंतरिक्षचारी की ध्वनि गूँजी पर', इस प्रकार अब तुम्हारा मानसिक तनाव कुछ अंश तक घट जायेगा।

अक्तूबर ११, प्रीन आम किमजी, प्रात: ८ बजे :

सदा की भांति प्रात: काल भ्रमण से वापस आने के बाद क्लूगे कैफे- किमजी में नाश्ता करने गया। वह अपनी प्रिय टेबिल जो केफे के बालकनी से झील का सुन्दर नजारा दिखाती थी, पर बैठ गया। उसकी थकान को झील की तरफ से आ रही मंद वायु ने बहुत कुछ दूर कर दिया था। धीरे-धीरे चलता हुआ वह काउन्टर से काफी लेकर वापस आ रहा था। उस समय उसका हाथ कांपने लगा।

वह समझ गया कि ऐसा क्यों है।

"तुम घबराओ मत', उसके मस्तिष्क में ध्वनि गूंजी ।

"मैं तुम्हारी उपस्थिति जान गया था, तुम मेरे प्रत्येक कार्यकलाप पर दृष्टि रखने लगे हो। तुम मेरे मस्तिष्क का एक रिफरेंस पुस्तिका की भांति प्रयोग कर रहे हो। तुम मेरे शरीर और मन पर अधिपत्य जमाए बैठे हो।' '

'मेरा यही कार्य है, मैं इसी को करने के लिए धरा पर आया हूँ। तुम्हारे ऐसे व्यक्ति को मेरी प्रत्येक आज्ञा माननी होगी। ठीक उसी प्रकार जैसे सीजर तुम्हारे हर आदेश को मानता है।'

क्लूगे का काफी कप पकडे हुए, दाहिना हाथ काँपने लगा। उसे बाये हाथ में पकडड कर, वह सावधानी से अपनी टेबिल पर जा बैठा। कुछ शक्ति की अनुभूति उसे, काफी के सिपों के बाद, आती प्रतीत हुयी। तुम्हारा क्रीत-दास नहीं हूँ, गुलाम नहीं हूँ" उसने दहाइते हुए कहा।

ब्रेकफास्ट लेते हुए लोग चौंक कर उसे देखने लगे। उसके मस्तिष्क में सीजर की गुर्राहट गूँज उठी। अन्तरिक्षचारी उसे चिढ़ा रहा था।

अक्तूबर १२, प्रीन आम किमजी, प्रात: ६ बजे :

क्लूगे रात्रि मैं आराम में सोया। प्रात: काल उसने अपने एकाकीपन को दूर करने के लिए सम्पर्क करने की इच्छा की थी। इसी कारण ब्रेक फास्ट करने समय उसने अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठाकर अपने मन में कहा - कल की बात को कल के साथ समाप्त करो। क्या तुम मुझसे बातें करना नहीं चाहोगे? तुम तो हमारी आकाशगंगा के अन्तरतारकीय यात्री हो, व्यवहार कुशल हो। तुम इस समय हो कहाँ?"

उसका दाहिना हाथ ऊपर उठा था। उसने उस हाथ को धीरे से नीचे कर दिया। उसका ब्रेक फास्ट आ गया था। काफी सिप करने हुए उसकी दृष्टि किम जी झील के मध्य स्थित किले के पास तैरते हुए बत्तकों और हंसों के झुण्ड एक गयी। वे सभी प्रसन्नता से झील के नीलम के रंग के पानी में डुबकियाँ लगा रहे थे। उनके घवल-श्वेत बिम्ब जल के स्थिर हो जाने पर नैनाभिराम लगते थे।

अन्यमनस्क सा वह काफी पीने के बाद झील के किनारे टहलने निकल पडा। उसकी आयु अथवा उससे दस-पांच वर्ष इधर उधर के स्त्री-पुरुष झील के किनारे लगी बेंचों पर बैठे प्रकृति की छटा निरख रहे थे।

एक बार उसक मन हुआ कि किसी से बेंच पर बैठ कर बातें की जायें, पर न जाने क्यों उसे घूमना अधिक प्रिय लगा।

अक्तूबर १२, प्रीन आम किमजी, शाम ८ बजे :

क्लूगे के मस्तिष्क पर नियंत्रण किये अन्तरिक्षचारी के लगातार प्रलाप, संदेश, आदेश, अनुरोध और कभी कभी क्लूंगे द्वारा किये गये प्रतिरोधों के उत्तरों ने, उसे बुरी तरफ थका दिया था। कई घण्टों तक किसी अज्ञात भाषा में, पूर्ण रूपेण मानव के लिए अपरिचित भाषा में बातें करते, क्लूगे को लगा कि कहीं वह शाइजोफ्रेनिक, अथवा विक्षिप्त तो नहीं हो गया है। वह उठकर अपनी प्रिय इजीचेयर पर बैठ गया। तनाव का परिष्कार करने हेतु उसने अपने सिटिंग रूम की खिडकियों को खेल दिया। अब उसे लग रहा था कि उसकी शक्ति कितनी घट गयी है, जैसे किसी ने उसका आपरेशन कर दिया हो। चारों तरफ सन्नाटा था, चिड्रियों की चहचहाट उसे कभी कभी भंग कर देती थी। क्लूगे आंखे बन्द कर बैठा था। उसे शान्ति की अनुभूति हो रही थी।

''लगता है तुम थक गए' उसके मस्तिष्क में ध्वनि गूँजी ।

'. हाँ | मैं थक गया हूँ, तुम भी मौन हो जाओ' क्लूगे ने थके स्वर से उत्तर दिया।

'वास्तव में मैं भी थक गया हूँ" अन्तरिक्षचारी की आवाज उसके मस्तिष्क में पुन: गूँजी।

अन्तरिक्षचारी भी थक सकता है, इसकी कल्पना क्लूगे ने नहीं की थी। उसे तो अन्तरिक्षचारी अतीव शक्तिमान, बुद्धिमान और अन्तरिक्ष यात्राओं का विशेषज्ञ लगा था। यह अलग बात थी कि उसके शरीर के विषय में. क्लूगे नहीं जानता था पर उसके मस्तिष्क तो है ही, यह निश्चित था। मस्तिष्क थक सकता है। इस दृष्टि से अन्तरिक्षचारी की बात सही हो सकती है।

''मुझे अपनी बातों से निर्देशों से थका देने के बाद तुम भी थक गये, मुझे प्रसन्नता है। तुम्हें थकना आवश्यक था। इस पृथ्वी. पर तुमको किसी ने बुलाया नहीं था, और न किसी ने तुम्हें हमारी प्रौद्योगिकी की प्रगति का अध्ययन करने के लिए निमंत्रण ही दिया था। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम किस लिए आये हो यहां पर?" क्लूगे ने कहा।

'मैं अपने दायित्व का निर्वाह कर रहा हूँ। हमारे ग्रह से अनेक व्यक्ति (?) हाँ, तुम मुझे व्यक्ति कह सकते हो, अदृष्य व्यक्ति, मस्तिष्क पर नियंत्रण करने वाले व्यक्ति, आकाशगंगा की उन्नत सभ्यता वाले ग्रहों पर यात्रा करते हैं।'

''तुम्हारी तरह?" चकित भाव से क्लूगे ने पूछा।

'तुम ठीक समझे।"

'यह एकत्रित सूचनाएँ तुम अपने ग्रह पर किसको प्रेरित करते हो।' '

गीगा को।

''गीगा कौन है?"

'मानव की दृष्टि से अदृष्य रहकर कार्य करने वाला।

'यंत्र अथवा उन्नत मस्तिष्क!''.

'तुम दोनों कह सकते हो' हँसने का, प्रथम बार, हँसने का प्रयास करते हुए अन्तरिक्षचारी ने उत्तर दिया।

'आज की वार्ता को मैं समाप्त. करना चाहता हूँ, कुछ संदेश आ रहे हैं। मैं कल प्रात: कल ६ बजे सम्पर्क करूँगा"

सुन कर क्लूगे ने गहरी साँस ली।

वह टहलता हुआ अपने प्रिय रेस्ट्रां ''होख श्वान" जो झील के दूसरे छोर पर था में जा पहुंचा।

शाम का डिनऱ वह यहीं लेता था। वेटर उसे पहचानता था। 'गुटेव आवेन्द ! हर क्लूगे" के अभिवादन के साथ उसे उसी निश्चित चेयर पर बैठने का संकेत कर, मीनू कार्ड पकड़ा दिया। . वेटर- गारसॉ के आते ही क्लूगे ने उसको ''कापूसीनों"' लाने का आर्डर दिया। ''सुबीतो सीन्योर" कहते. हुए इटैलियन वेटर मुस्कुराया और उसकी टेबिल पर 'कापूसीनों' की बाटल और ग्लास रख दिया। क्लूगे आज अपनी मानसिक थकान दूर करना चाहता था जो अन्तरिक्षचारी से कभी जरमन तो कभी अंग्रेजी और कभी किसी अज्ञात भाषा में बातें करने के परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुई थी।

उसने गॉरसां के आते ही फुल प्लेट रैवीओली का आर्डर दिया और 'होनिंग-साकेल' वाइन का। आज उसमें बहुत दिनों के बाद जिजीविषा जागृत हुयी थी। वह भोजन और वाइन का आनन्द ले रहा था।

उस रात क्लूगे तनाव रहित सोया।

अक्तूबर १३, प्रीन आम किमी जी, प्रात: ६ बजे :

मशीन से लगी पेन ने एक पीक, फिर वैली और फिर पीक के क्रम को बरकरार रखा। उसकी बीप बीप की आवाज लगातार गूंज रही थी।

क्लूगे के दाहिने हाथ की वेन में धंसी निडिल और उसके शरीर से लगे एलेक्ट्रोडों ने उसके रक्त एवं हृदय की गतिविधियों को रेकार्ड कर लिया था। इक्जामिनेशन टेबल पर लेटे हुए क्लूगे को उस पर बिछी प्लास्टिक कवर में लगे फीते ने कस कर बांध रखा था।

सभी उपकरण स्वचालित थे और उनके परिणाम क्लूगे के हेल्थडेटा बैंक में स्टोर होते थे। कोई चिकित्सक नहीं रहता था वहाँ, जब तक शरीर में कुछ असमान्यता उत्पन्न न हो जाये।' वैसे भी अब तो मशीनें चिकित्सक बन गयी हैं, संवेदना रहित। क्या वे मुझमें और अन्तरिक्षचारी में निहित मानवीय अथवा जैविक अंश को समझ पायेंगी? हमारा पुराना समय बेहतर था। चिकित्सक और व्यक्ति में वैचारिक सामन्जस्य था, सौहार्द था, मानवता थी पर अब? क्लूगे की विचार शृंखला टैस्ट समाप्त की यांत्रिक ध्वनि ने भंगकर दिया।

१३ अक्तूबर, प्रीन आम किम जी प्रात: ८ बजे :

"तुम्हारा स्वास्थ्य तो बिल्कुल ठीक है। जी जीन्ड गेसुन्ड अन्तरिक्षचारी ने जरमन में कहा।

'आज मुझे मीटिंग में जाना है।'

कैसी मीटिंग?"

"आकाशगंगा के सभी वासियों की जिन पर हमारा नियंत्रण है।''

"तो मैं एकाकी तुम्हारा शिकार नहीं हूँ।" -

'तुम विष बुझी बातें कर रहे हो। मैं तो सहजता से.

' मैं तुम्हारी सहजता से परिचित हूँ, पर यह तो बताओ कि मीटिंग में डिसकस करने का क्या खास बिन्दु होता है?"

क्लूगे ने थोडा सहज होकर कहा।.

'विभिन्न सभ्यतायें, जो अन्तरिक्ष में फैली हुयी हैं, उनकी टेक्नोलोजी, प्रौद्योगिकी और विज्ञान के विकास का अपने ग्रह के हेतु उपयोग करने के संदर्भ में चर्चा होती है।''

''कब जाना है तुम्हें?"

''तुम्हारे ग्रह की. समस्त सूचनाएँ एकत्र करने के उपरान्त ही यह यात्रा संभव होगी' अन्तरिक्षचारी का उत्तर था।

क्लूगे को लगा कि अन्तरिक्षचारी कुछ सोचने लगा।

कुछ पल शान्ति में बीते। अन्तरिक्षचारी ने कहा 'तुम अपनी बेटी के पति को पसन्द नहीं करते हो।'

"तो तुम मेरे ब्रेन की मेमरी कुरेद रहे हो?"

'ठीक समझा तुमने ।'

'हाँ मैं उसे पसन्द नहीं करता हूँ" मुख में कडुवाहट की अनुभूति करते हुए क्लूगे ने उत्तर दिया। '

'कारण मैं जान गया हूँ'

'ठीक है, तो फिर?"

'तुम्हारा बेटा सर्जन है, और उसकी पत्नी गाइनेक?"

'हाँ तुम्हें ठीक पता चल गया है।''

'क्यों कि वे बहुत ही व्यस्त हैं' क्लूगे का संतुलित उत्तर था।

'क्या तुमको, तुम्हारी दिवंगत पत्नी की याद नहीं आती है।

स्वाभाविक है कि आती है पर उसकी कमी को मैं अब सहन कर सकता हूँ। क्या करूँ?! आह भुरते हुए क्लूगे की आवाज, विगत की स्मृतियों में डूब गयी है, ऐसा अन्तरिक्षचारी को अनुभव हुआ।

''मुझे अपनी दिवंगत बहन से संवेदना है 'उत्तर था अन्तरिक्षचारी का, जिसको सुनकर क्लूगे चौंक उठा। 'क्या तुम स्त्री हो?"

'तुम क्या समझ रहे थे, अभी तक?"

'"पुरुष.... कुछ । ठिठकते हुए, झेंपते हुए क्लूगे का उत्तर था।

''मैं जानती हूँ कि तुम्हारी पत्नी को संगीत बहुत प्रिय था, मुझे यह भी पता है कि उनको किन-किन कम्पोजरों की म्यूजिक प्रिय थी।

"मुझे आश्चर्य है'' क्लूगे का उत्तर सुनकर अन्तरिक्षचारिणी पहली बार हंसी|

नाम क्या है?" ,

नाम में क्या रखा है'' उत्तर सुनकर क्लूगे ने कहा

'' ओह! तुम ठीक कह रहे हो।'

"क्या तुम मुझे म्यूजिक नहीं सुनाओगे", कुछ आग्रहपूर्ण स्वर में थ्वनि आयी।

"क्यों नहीं? संगीत तो मुझे भी अतिप्रिय है" प्रसन्न होकर क्लूगे ने अन्तरिक्षचारिणी के लिए म्यूजिक आन कर दी। म्यूजिक की तरंगों में वह खो सी गयी थीं वह मौन हो गयी थी।

म्यूजिक के बन्द होने पर उसने कहा '' यह हमारे ग्रह पर नहीं है, हम लोग संगीत प्रेमी नहीं हैं। लेकिन यह संगीत हमारी अवधारण को बदलने में निश्चय ही सफल होगा। कौन इसका कम्पोजर है?"

"केड्रिक चोपिन और यह नाकटर्न नम्बर-२, ई-फ्लैट मेजर, में कम्पोज की गयी है। क्लूग ने प्रसन्नतापूर्ण स्तर में उत्तर दिया।

'हूं! एकाकीपन में संगीत प्रसन्नता जीवन्तता प्रदान करती है। 'क्या तुम भी कभी एकाकी होते हो' मधुर स्वर में क्लूगे ने प्रश्न किया।

'तुम्हारी ही भांति अधिकांश समय' का संक्षिप्त उत्तर अर्थपूर्ण लगा. क्लूगे को।

'मैं तुम्हें और संगीत सुनाना चाहता हूँ, तुम्हारा क्या विचार है?"

'मैं प्रतीक्षा कर रही हूँ' अन्तरिक्षचारिणी का प्रसन्नता भरा उत्तर था। क्लूगे ने बीबाल्डी के फियर यॉर जाइटेन-फोर सीजन" को आनकर दिया।

संगीत के उतार-चढाव में अन्तरिक्ष चारणी और क्लूगे खो गये।

". अभूतपूर्ण कम्पोजीशन है वह कौन कम्पोजर है इसका" अन्तरिक्षचारिणी अपनी उत्सुकता रोक न सकी।

क्लूगे के नाम बताया" और म्यूजिक क्लासिकस काम्पोजीशन मुझे सुनाओ।"'

क्लूगे ने उसे वीथ हावेने की. शूवर्ट की तथा मोजार्ट की आइन क्लाइने नाख्ट म्यूजिक' सुनाया। अन्तरिक्षचारिणी संगीत के सुधा रस में डूब चुकी थी ¦

समय ठहर सा गया था। दोपहर के बारह बज चुके थे। मेरे वापस जाने के संकेत आ चुके हैं। मुझे अभी चल देना होगा। पर मैं यह संगीत काम्पोजीशन क्लासिकल म्यूजिक अपने साथ ले जाकर अपने ग्रह वासियों को प्रथम बार सुनाऊँगी । यह संगीत आनन्दमय है, एकाकीपन दूर करने की प्रभावी औषधि है। तुम्हें अनेक धन्यवाद रार्बट; आउफ वीडर जेन (फिर मिलेंगे) की आवाज के साथ'' अन्तरिक्षचारिणी की ध्वनि मौन हो चुकी थी। *

सामने किमजी झील में पड रहे आकाश में तैरते सफेद बादल के एक टुकडे के प्रतिबिम्ब को, अब राबर्ट क्लूगे अपने एकाकी मन और सूनी आंखों से देख रहा था।

 

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यान-त्रिशंकु

अजितेय और केन विस्मित नेत्रों के सबसे ऊँची डेक पर खड़े गरुढ को अन्तरिक्ष में बढ़ते हुए देख रहे थे। यह अन्तरिक्ष स्थित पूर्ण रूपेण सज्जित वेधशाला उस विशाल अन्तरिक्ष यान के उद्यान में स्थित थी और उसमें चारों ओर क्यारियों में खिले सुन्दर गुलाब के पुष्प नेत्रों को एव् तोषदायक शान्ति प्रदान कर रहे थे। प्रोब क्रमश: गति बढाते हुए अदृष्य सा होता जा रहा था। अजितेय ने केन को ध्यान से देखा। वह प्रोब को अब भी देखने का असफल प्रयास किये जा रही थी।

त्रिशंकु पृथ्वी से एक हजार प्रकाश वर्षों को दूरी पर अंतरिक्ष में स्थित था। उसके चारों ओर अंतरिक्ष गैसों और उनसे निर्मित बादलों का लीला नर्तन नैनाभिराम था, मोहक था और त्रासद भी। त्रासद इस कारण, क्योंकि अजितेय के मानस में अपने अस्तित्व का प्रश्न भी यदाकदा इन्हीं अन्तरिक्षचारी अभ्रों की गति की भांति, बरबस कौंध जाता था, तथा समय के, काल के परिपेक्ष्य में एक प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देता था।

अति सघन श्याम-विवर जो वृश्चिक राशि में स्थित था, वह अतीव तीव्रता से तप्त गैसों को उदस्थ कर रहा था। उससे पश्चिम में एक त्रिकोणीय चक्री प्लाज्मा, तप्त गैसों का पुंज जो तीन प्रकाश वर्ष विस्तार का था, क्रमश: शीतल तो हो रहा था परन्तु उससे निसृत रेडियेशन, अति घातक था। उसकी चमक सर्वत्र चकाचौंध उत्पन्न कर रही थी। दूसरी ओर पूर्व में, वृश्चिक राशि के मध्य बिन्दु के पूर्व में एक विचित्र विस्तृत होती गतिविधि चल रही थी। यह एक सहस्र वर्ष पूर्व हुआ अन्तरिक्ष विस्फोट था, जो विस्तृत होता हुआ बढता जा रहा था।

श्याम विवर में रक्त तप्त तारे टूट कर अदृश्य हो रहे थे और उस गतिमान अंतरिक्ष में नाश का, विनाश का नृत्य, रेडियो मैग्नेटिक ऊर्जा सृजन के साथ, चल रहा था।

'तुम्हें कैसा लग रहा है" अजितेय के स्वरुप ने केन के स्वरुप से प्रश्न किया।

''यही प्रश्न तो तुम त्रिपथगा से भी कर चुके हो' केन का उत्तर था।

'क्या कहा था उसने?" . क्या बताया था उसने ?

'हम सभी के स्वरुप उस अतिसूक्ष्म नैनों क्रिस्टल कम्यूटर कैप्सूल में बन्द हैं और उसी के माध्यम से हम इस विशाल श्याम विवर के मध्य में जाकर इस अंतरिक्ष नर्तन के विभिन्न पक्षों का अध्ययन कर सकते हैं।

वहाँ हम मन व शरीर से जा नहीं सकते" त्रिपथगा ने कहा, ।

_ "उसका कथन ठीक है। इस भीषण रेडिएशन को मापने के लिए, ऊर्जा कणों की क्षणभंगुरता मापने के लिए, मात्र यही विकल्प है" केन ने स्पष्टीकरण दिया।

''यही शिव का नृत्य है" अजितेय ने कहा।

'मैं समझी नहीं केन ने तत्काल कहा।

"|तुम समझोगी भी नहीं" अजितेय का उत्तर सुन केन मौन हो गयी।

''आओ चलें त्रिपथगा" अजितेय ने संकेत दिया।

'उस प्रोब में, विशेष रूप से निर्मित कैप्सूलों को, सभी प्रकार के वैज्ञानिक प्रश्नों के समाधान हेतु, जो उस तप्त दिक काल रहित प्लाज्मा पुंज में घटित हो रहे हैं, के अध्ययन हेतु भेज तो दिया गया है, परन्तु उनके विवरण हमें कब प्राप्त होंगे, यह ज्वलन्त प्रश्न मेरे मानस में लगातार कौंध रहा है" एक दार्शनिक की भांति त्रिपथगा ने कहा।

"समय की प्रतीक्षा ही मात्र उचित विकल्प है", अजितेय ने स्पष्ट किया।

केन त्रिपथगा की तलाश में अजितेय के कैबिन में आ गयी उसने अजितेय को देखा कुछ पलों तक, और कहने लगी मैं तुम्हारे शिव के नृत्य को नहीं जानती, क्या तुम मुझे स्पष्ट कर सकते हो?"

क्यों नहीं अजितेय का संक्षिप्त सा उत्तर था ।

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अजितेय अपने कक्ष के एक कबर्ड को खोल कर एक काँस्य की, ब्रॉज की प्रतिमा हाथ में लिए आ गया । वह विचित्र लगी केन को।

उस प्रतिमा को केन की हथेली पर रखकर' अजितेय ने कहा 'यह नटराज-शिव हैं।' इनके चारों ओर जो शक्ति पुंज बनाया गया है, जिससे ज्वाला निकलती दर्शायी गयी हैं, वह ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।''

ओह! तो यह प्रतिमा किसी विशेष क्रम का संकेत करती है' कुछ चकित भाव से केन ने कहा। तुम अब भारतीय चिन्तन को समझने के समीप हो '

अजितेय का उत्तर था। परन्तु भारतीय धर्म में इतनी भिन्नता है, इतने देवता, देवियां क्यों है ?

यह जान सामान्य के बौद्धिक स्वच्छन्दता की चरम पराकाष्ठा का, स्वतंत्र चिन्तन का परिणाम एवं प्रतीक है। ' बहुदेववाद भी 'अन्त में सिमट कर, पूंजीभूत होकर एक अदृश्य प्रेरक शक्ति में लय हो जाता है, लीन हो जाता है, उस शक्ति का अंश बन जाता है, जो इन अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों को नियंत्रित करती है, विस्तृत करती है, सृजन करती है, और विनाश करती है, संहार करती है'' अजितेय वैज्ञानिक-दार्शनिक सा लगा केन को। वह मौन श्रोता थी।

'शिव को यह प्रतिमा, उसी अनादि काल से सतत सृजन एवं संहार का, ऊर्जा के नर्तन का, शक्ति के क्षरण और पुर्नसृजन का प्रतीक है।

' अद्भुत है तुम्हारा भारतीय दार्शनिक चिन्तन । मुझे गम्भीरता से इस का अध्ययन करना पडेगा" केन ने प्रशंसायुक्त स्वर में कहा।

तुम्हारे इस विचार का स्वागत है" संक्षिप्त सा अजितेय का उत्तर था।

- गरुड

हम अपने यान के हाईपर जम्प के उपरान्त जाग गये। यह हाइपर जम्प अन्तरिक्ष में स्थित उस टनल का, उस बात विवर का क्षेत्र था जो जापानी वैज्ञानिक कलावीयू के द्वारा खोजा गया था। प्रौब को, गरुड को, अन्तरिक्ष में गैलेक्सियों के मध्य, सम्पेषित किए कई दिन हो चुके थे। वह पाँच प्रकाश वर्ष की दूरी तय कर चुका था, उसको स्पीड, गति बढ रही थी। वह एन्टीमैंटर चालित प्रोब था। उसका बाहरी कवच सुदृढ था और गति संतोष जनक। यह सूचना पैनल पर लगातार आ रही थी।

त्रिशंकु के ऊपर, चारों ओर छाये गैलेक्टिक बादल, निहारिकाओं के बादल और घनीभूत हो गये थे। चारों तरफ गहन अंधकार था। हमारा यान त्रिशंकु श्याम विवर से निकल कर , उस चमकीले तारे की ओर बढ़ रहा था जो स्वत: श्याम विवर वृश्चिक नक्षत्र स्थित, श्याम विवर में उदरस्थ होने से बच गया था। सम्भवत: उसकी आभा जो तीव्र थी, इसी तथ्य की घोषणा कर रही थी। स्क्रीन पर श्याम विवर का मध्य घनीभूत भाग जो तप्त नीले तारामंडल, जिसे हम बी.आर.एस-२० कहते थे, की तरफ बढ़ता दिख रहा था, और एक दूसरा लाल तप्त तारा बी.आर.एस-१० श्याम विवर के तेज चक्रवात से बचने का प्रयास कर रहा था, यह पैनल पर उभर रही गामा किरणों और इन्फारेड के उत्पन्न होने की गति से स्पष्ट हो रहा था। ,

अजितेय और केन उस तारों को ध्यान से देखने का प्रयास कर रहे थे जो न तो अतिशय घनीभूत थे और न ही अति स्थिर। वे यह जानने का प्रयास कर रहे थे कि यह प्लूटों के समान गति करने वाला तारा उस श्याम विवर के मुख में जाने से कैसे बचा है। ,.

इस आश्चर्यजनक तथ्य का अध्ययन करने के लिए मैं अजितेय अपनी आवजरवेटरी, वेधशाला में जाना चाहता हूँ।

तथ्यत: ऐसी वेधशाला थी ही नहीं, वहाँ न टेलिस्कोप था, न कुर्सी और न टेबल ही और न टेलिस्कोप को देखने के लिए सीढी ही। हम तो कम्यूटर कैप्सूल में बन्द थे। हमारी यान के संचालन की सफलता ही हमारी मानवीय प्रतिरूपों की सफलता थी। हमारा रूपान्तरण, इस भीषण ऊर्जा पुंज को. सहन करने में सफल था और इस प्रकार हमारे सृजन भी संतुष्ट थे। इस प्रकार केन वेधशाला के पैनेल के सम्मुख ''बैठ गयी" और 'ऊपर" सीढियाँ चढ कर टेलिस्कोप को नियंत्रित करने लगी। सब कुछ स्पष्ट दिख रहा था। अचानक मेरा मानस अपने जन्म स्थल जो अंतरिक्ष स्टेशन पर, था, हाँ ! ऊर्ट-बादलों के सोल नाम सिस्टम में स्थित था, के ऊपर चला गया। अन्तरिक्ष मेरा वास स्थल, जन्म स्थल था, इस कारण मैं आज तक यह न समझ सका कि कैसे भूमि-पुत्र मानव अंतरिक्ष में रह सकते हैं। वे किस प्रकार प्रदूषित वायु में जीवन यापन कर सकते हैं।

. जीवित रहने के लिए श्वास ले सकते हैं। केन और त्रिपथगा धरा वासी वैज्ञानिक थे, और मैं था वास्तविक प्रथम अंतरिक्ष जन्मा भारतीय।

किसी मानस स्वरूप की यह प्रथम निहारिकीय यात्रा थी। यही सोचता अजितेय सीढियों से नीचे उतर आया। "केन तुम इस त्रासद अन्तरिक्ष अभियान में बोर तो नहीं हो रही हो' अजितेय ने पूछा। ---

''प्रश्न ही नहीं है, यह विकिरण के रेडिएशन के आंकडे इतने जटिल और अस्पष्ट हैं, कि इनको स्पष्ट करने में ही मेरा सारा समय निकल रहा है' केन का उत्तर सुन कर अजितेय प्रसन्न हो उठा। उसने जानबूझ कर केन से पहले प्रश्न किया था। वह चाहता था कि केन उसके त्रिपथगा के प्रति आकर्षण को न जान सके। त्रिपथगा उसको आकृष्ट करती थी।

'और त्रिपथगा तुम'' अपने स्वर में मधु घोलते हुए उसने प्रश्न किया।

'मैं तो श्याम विवर में समा रहे पिंडों की गति निर्धारण के प्रयास में उलझी हूँ। मुझे मेरा विषय प्रिय है'' त्रिपथगा ने मुझे देखते हुए उत्तर दिया। अंतरिक्ष यान के कैप्टन का दायित्व होता है, अपने मनोभावों को व्यक्त न करना। मेरे भावों को त्रिपथगा जानती थी अव्यक्त रूप में। अजितेय ''केन के स्वर में उत्तेजना थी, वह मास स्पेक्ट्रोमीटर की रीडिग जहाँ पर कुछ नहीं दिख रहा है, उस क्षेत्र में घनीभूत 'मास' दिखला रहा है।' 'हो सकता है कि वहाँ कोई नवीन तारा उत्पन्न हो रहा हो' अजितेय ने सुझाया।"'

"'पर यह बिन्दु उस श्याम विवर के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बहुत दूर है'' केन ने कहा।

''हो सकता है कोई सुपर हैवी स्टार उदय हो!"

'पर वह कुछ करोड वर्षों का जीवन पायेगा"

"केन चिन्ता मत करो। यह विवरण मुख्य यान के कष्यूटर को प्रेषित कर दो' अजितेय के विचार से त्रिपथगा भी सहमत थी।

यान-त्रिशंकु

अजितेय और केन शतरंज खेलने में व्यस्त थे। वातावरण में शह-चेक और चेक नहीं की आवाजें थीं। अजितेय अच्छा खिलाड्री था। वह तीसरी बार भी जीत गया, परन्तु केन के चेहरे पर शिकन नहीं थी। वह उस खिलाड्री की भांति थी, जो जानता था कि हार-पराजय निश्चित है- पर डटा रहता है, खेल के मैदान में, क्रीडा-प्रांगण में। अंतरिक्ष की अज्ञात गहराइयों में उनके मनोविनोद का यही साधन था।

उनका शतरंज का खेल वैज्ञानिक सूचना के मिनी कैप्सूल की प्रतीक्षाजन्य आतुरता को शमनार्थ बढता गया। ऐसा लगता - था कि यह शतरंज का खेल अनिवार्य सा हो गया है, दोनों शहर और मात के ताने-बाने में रम गये थे। कभी केन जीत जाती तो कभी अजितेय। एकाएक अजितेय उठ गया और उसने शिव की ताण्डव नृत्य करती प्रतिमा को कवर्ड से निकाल कर सामने की शेल्फ पर रख दिया।

'"यहाँ क्यों ? केन का प्रश्न था।'

"तथ्यों के स्पष्टीकरण और साक्षातकार हेतु अजितेय का उत्तर था। 'इस नटराज शिव की मूर्ति के चारों ओर ज्वाला निकलनी क्यों दर्शायी गयी हैं?'! केन ने जानना चाहा। 'यह उसी स्थित का प्रतीक है जिससे हम इस समय साक्षात्कार कर रहे हैं' अजितेय ने उत्तर दिया।

'क्या अर्थ है, इसका?"

'यह ज्वालायें, इस अनन्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त शक्ति को उसने विविध रूपों के रेडियेमान को, तथा उससे उत्पन्न ऊर्जा की प्रतीक हैं' अजितेय ने स्पष्ट किया।

''सूचना का मिनी कैप्सूल का गया है'' त्रिपथगा के इस कथन ने सभी को चैतन्य कर दिया।

गरुड

मानव मस्तिष्क के विचार नैनो कम्पयूटर से पुन: उत्पन्न होने पर मानवीय विचार ही होते हैं। यद्यपि उनमें जैविक क्रियाओं की आवश्यकता, जैसे वे एन्जाइम जो जैविक इच्छाओं, भूख, प्यास, निद्रा, काम, क्रोधादि को नियंत्रित करते हैं, नहीं होते परन्तु स्वभाव के गुण तो विकसित रहते ही हैं। इसी कारण मेरा दायित्व था कि मैं इन गुणों को संरक्षित रखने में सक्षम रहूँ। अब सोने का समय हो गया है। केन और त्रिपथगा विगत १८९ घण्टों से कार्यरत थीं। उनकी क्षमता का क्षरण न हो इस कारण निद्रा आवश्यक थी।

"त्रिपथगा अब सो जाओ' केन ने कहा।

वहाँ प्रोग्राम के संतुलन से लिए यह आवश्यक है इस प्रोग्राम में उत्पन्न हुयी त्रुटियों के निराकरण के लिए यह आवश्यक है तथा यह भीषण रेडिएशन जो हमारे प्रोग्राम के लिए घातक है उसके द्वारा उत्पन्न हुई समस्याओं को ठीक करने के लिए भी" कहती हुई त्रिपथगा मौन हो गयी। निद्रा ने उस पर अधिकार कर लिया।

'मैं भी सोने चला" कहते हुए अजितेय ने केन को देखा। पर वह आँखों को बन्द कर मौन हो गयी थी। और आठ घंटे बाद."... केन तुम मुझे डेटा के विषय में बताना प्रारम्भ करो। निद्रा पूर्ण होने के फल स्वरूप चैतन्य अजितेय ने केन से कहा।

'यह भारी नवीन तारे वहाँ है जहाँ पर इन्हें होना नहीं चाहिए। इसका कारण या तो वे गतिशील मैटर पदार्थ हैं जो वहाँ पर सतत हैं, बन रहे हैं, अथवा वहाँ पर कोई श्याम विवर.. ... पर इसके सत्यापन के लिए हमें प्रोब को, आगे बढाना होगा।'

परन्तु इस प्रोब के पावर पैक में मात्र दो जम्पों को क्षमता है और वह भी बिना मेरी अनुमति के सम्भव नहीं है। मैने केन को बताया।

मैं एक विशेष बिन्दु पर सुपर हैवी कणों को फायर करना चाहती हूँ" प्रयास करो।

कुछ पलों बाद.....

मॉनीटर पर यह कण नष्ट हो गये। उस क्षेत्र का गुरूत्व इन को डिस्टार्ट कर रहा है, पर यह गुरुत्व......"

"हाँ केन, मुझे लगता है कि वहाँ पर एक छोटा श्याम विवर है, इसी कारण यह तुम्हारे भेजे कण डिफ्लेक्ट हो गये परावर्तित हो गये '"अजितेय ने स्पष्ट करते हुए कहा।

बहुत पहले भौतिकविद हाकिन्स ने घोषणा की थी कि 'तीन सोलर मास से, छोटे ब्लेक होल, श्याम विवर नहीं हो सकते और मास डिटेक्टर यही दिखा रहे हैं।'

यह सूचना तुम त्रिशंकु को प्रेषित कर दो'।

केन ने अजितेय को प्रशंसा भरे नैनों से देखा। संदेश प्रेषित हो चुका था।

दूसरे दिन २४ घण्टों के बाद अजितेय को एक विचित्र नजारा देखने को मिला। उसने केन को दिखाते हुए बताया, उस 'अणुतिक केन्द्र के समीप से जाती हुई गैसों की, उनके बादलों की गति असमान्य है, यह देखो सभी वृश्चिक नक्षत्र स्थित उस सुदूर पश्चिमों बिन्दु पर मुड जाते हैं।' 'यह तो आर.एस-२० का वातीय प्रवाह है केन का उत्तर था। नहीं यह सम्भव नहीं है, क्यों कि मैंने गणना करके देख लिया है।'

"तो क्या यह बी.आर.एस-१० के चुम्बकीय गुणों द्वारा सृजित नहीं हो सकता अजितेय?" अजितेय मौन धारण कर कुछ सोचने लगा।

'गैसों के बादल अतीव तीव्र गति से केन्द्रीय नाभिक, अपने केन्द्रीय अणुविक बिन्दु से, जिस तीव्रता से शंकु आकार धारण कर उस श्याम विवर में समाहित हो रहे हैं'और परिणाम स्वरूप करोडों डिग्री सेल्सियस का ताप उत्पन्न होता है, यह प्रक्रिया तो स्पष्ट है, परन्तु गैसों के चक्रण की यह विचित्र गति, और फिर उनका उस विवर में समाहित होना, हमारी गणनानुसार क्यों नहीं हो रहा है?"

क्या हमें पुन: हमारी गणना के सत्यापन हेतु गरुड को दूसरे बिन्दु पर भेजना चाहिए ? अजितेय असमंजस में था।

यान-त्रिशंकु

केन, अजितेय और त्रिपथगा भूखे भेडिये की भांति प्राप्त आंकडों को, डेटा को समझने में लगे थे। मिनी कैप्सूल के डेटा, मिनी नहीं थे, वे विस्तृत थे, और अस्पष्ट थे। विशेषकर मास-स्पेक्ट्रोमीटर के डेटा तो चौंकाने वाले थे। उसकी स्पष्ट करने हेतु, वे हर सम्भव प्रयास कर रहे थे। ऊब कर केन ने कहा, मैं विगत ४८ घण्टों से इस पहेली को सुलझाने में लगी हूँ। थक गई हूँ और मैं भी, कहती हुई त्रिपथगा झटके से उठ खडी हुई। उनके चेहरों पर थकान थी। अजितेय भी थक गया था, पर कुछ कहना नहीं चाहता था, इस कारण कार्यरत था। सभी ने अपनी निद्रा की अवधि का लाभ उठाया। सभी प्रमुदित थे, चैतन्य थे और तनाव रहित थे, निद्रापूर्ण होने के बाद।

‘मैं स्वप्न में भी उन बादलों की विचित्र गति के विषय में सोचती ही रही, और ....." कहते हुए केन रुक गयी। "क्यों क्या हुआ?" त्रिपथगा का प्रश्न था।

"ओह तो यह संभव है...पर"

'पहेलियाँ मत उछालो" त्रिपथगा ने कहा।

'अजितेय हमें प्रोब को गरुड को दूसरे बिन्दु की ओर मोड्ना होगा।'

'या वृश्चिक राशि के पश्चिमी छोर पर स्थित उस श्याम विवर के समीप?"

'समीप नहीं उस से तीन प्रकाश वर्ष दूर, जिससे उसे डेटा प्राप्त हो सके’

"हूँ, अजितेय, अपनी गणना के सत्यापन हेतु और नवीन अवधारणा को स्थापित करने हेतु, यह अब मुझे आवश्यक प्रतीत हो रहा है।'

केन नेत्रों को बन्द करके कहती जा रही थी। अजितेय को ऐसा प्रतीत हुआ कि केन के नेत्र सम्भवत: इस कारण बन्द हैं क्योंकि उसे भय है कि नेत्र उन्मलिन से कहीं कोई दूसरा उसके मनोभावों को पढ़ न ले।

गरुड

गरुड केन की अवधारणा को विस्तार देने हेतु वृश्चिक राशि के उस . पश्चिमी बिन्दु की तरफ अग्रसारित कर दिया गया। सभी को आशा थी कि पहेली अब सुलझ जायेगी।

''मुझे उसकी ट्रेजेक्टरी चाहिए" केन ने कहा।

''वह तुम्हारे टरमिनल पर ट्राँसफर कर दी गयी है" अजितेय ने सूचित किया।

प्रोब गरुड गुरुत्व एवं रेडिशन के आघात के कारण नष्ट हो गया है। हमारे वास्तविक स्वरूप जो रक्त और मांस से निर्मित दूर बैठे हैं, कभी सोच भी नहीं सकते थे कि प्रोब गरुड इस निहारिका मंडल से, वृश्चिक राशि से जुड़े श्याम विवर के भीतर जाकर अदृश्य हो रहे बादलों को सूचनाएँ.....मेरा तात्पर्य है उनसे संबंधित समस्त सूचनाएँ, प्रेषित भी कर सकेगा। निश्चय ही वे मिनी कैप्सूल के द्वारा एकत्र किये गये विवरणों को, एक ईश्वरीय चमत्कार की भाँति स्वीकार करते" केन ध्यानावस्थित सी कह रही थी।

''यह प्रोब अभी अपने सुरक्षित फ्यूएल भण्डार के कारण वृश्चिक राशि स्थित....उसके पश्चिमी छोर पर स्थित श्याम विवर के समीप नहीं पहुँच सकता। समीप से मेरा अर्थ है कि वह पाँच प्रकाश वर्ष की दूरी भी नहीं पा सकता, परन्तु यदि कभी...जो सम्भव है यह उसके गुरुत्व क्षेत्र में प्रवेश करेगा तो निश्चय ही यह गरुड उस भीषण खिंचाव-जन्य आकर्षण को सहन कर सकने को स्थित में, उस विवर में समाहित हो जायेगा और फिर उसका जीवन समाप्त हो जायेगा...... लेकिन उस समय हम कहाँ होंगे पता नहीं" कहते हुए केन रुक गयी। गरुड प्रोजेक्टेड ट्रेजेक्टरी के अनुसार, श्याम विवर के बादलों को चीरता हुआ, उससे दूर होता जा रहा था। ¦ ''यह गुरुत्वाकर्षण नहीं है, अजितेय"' केन चीख सी पडी।

''यह प्रोब गरुड हमारी गणना के विपरीत जा रहा है।" ¦

"मुझे उसे आगे बढाना चाहिए कहते हुए अजितेय ने त्रिपथगा से प्रोब के पाथ करेक्शन करने के लिए, संकेत प्रेषित कर दिया। वे सभी प्रोब पथ पर दृष्टि गड़ाए बैठे थे। उनको यह साधना विगत तीन घंटों के निरीक्षण के उपरान्त भी परिणाम देती देखी नहीं। .

गरुड अपनी निर्धारित कक्षा में पहुँच नहीं पा रहा था। वह किसी विचित्र प्रकार के आकर्षण से प्रभावित लग रहा था |

प्रबल आकर्षण जो गरुड को निर्धारित कक्षा में, जाने में गतिरोध पैदा कर रहा था। '

त्रिपथगा अपने निरीक्षण कम्यूटर पर एक विचित्र दृश्य देख रही थी। वृश्चिक नक्षत्र के सूदूर छोर पर, उसके पश्चिमी छोर पर भीषण अंधेरे में चक्रवाती बादलों का समूह उस नक्षत्र को अपने में छिपा लिए था और सामने बी.आर. एस-१० का नीला तारा तेजी से चमक रहा था। गरुड के संकेतों की प्रतीक्षा सब को थी। त्रिपथगा की सूचना पर केन ने अजितेय की तरफ अर्थ पूर्ण दृष्टि से देखा।

""लगता है तुम किसी परिणाम पर पहुँच गयी हो" केन को देखते हुए अजितेय ने कहा।

''मुझे लगता है कि सामान्य धारणा अब मान्य हो जानी चाहिए केन का संक्षिप्त सा उत्तर था।

'कौन सी सामान्य धारणा" त्रिपथगा ने कौतुहल पूर्ण स्वर में कहा, "'मिंसिग मैटर की डार्क मैटर की" केन ने कहा।

यह अवधारणा पाँच सौ वर्ष पूर्व प्रतिपादित की गयी थी और उस समय लोगों ने इसका उपहास किया था परंतु आज हम इसके अस्तित्व को स्पष्ट देख रहे हैं। इस डार्क मैटर की उत्पत्ति तो महाविस्फोट-बिग बैंग के उपरान्त ही हुई होगी"' त्रिपथगा का प्रश्न था।

"हाँ यह महाविस्फोट के १० सेकेन्डों के उपरान्त हुई होगी'' केन ने स्पष्ट किया।

"परन्तु केन इस महा विस्फोट के पूर्व क्या था ? क्या यह अपने इसी स्वरूप में था ? क्या वह घना पुन्जीभूत बिन्दु मात्र था?! त्रिपथगा जिज्ञासु की भांति प्रश्न कर रही थी। केन उत्तर पर विचार करने लगी। कुछ क्षणों बाद उसने कहा इसके संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण इस प्रकार की व्याख्या देता है-

''आपो हवा इदमग्रे.सलिलमेवास । ता आकामन्त । कथं नु जायेमहि इति।" (शतपथ ब्राह्मण ११,१/६ /१-२)

''आप: ही निश्चय ही सलिलावस्था वह अवस्था जिसमें सब लीन हो जाते हैं, में थी, उसमें कामना हुई कि हम कैसे प्रज्ञारूप - में फैलें।"'

'यह तो आश्चर्यजनक तथ्य है, जिसकी कल्पना भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्षों पूर्व की, और वह भी पूर्ण वैज्ञानिक रूप में चकित" त्रिपथगा ने कहा।

'हाँ यहाँ देखो, कि आप: में उसी घनीभूत बिन्दु में कामना हुई, अर्थात उसमें गति हुई, वह सचेतन हो उठा, विस्तार हेतु" केन कह रही थी कि उत्साहित त्रिपथगा कह उठी, यह चेतना तो :उस तथ्य का संकेत है, जिसे ऋषियों ने स्फोट कहा है, बिग-बैंग कहा है- महाविस्फोट बताया है, और इसी के उपरान्त इस ब्रह्माण्ड का विस्तार हुआ! कितनी वैज्ञानिक, कास्मालोजिकल अवधारणा थी यह ।'

' थी नही- यह अवधारणा, सत्यापित हो चली है। हम इसी के सत्यापन हेतु तो यह डेटा, ये आंकडे एकत्र कर रहे हैं" अजितेय जो अब तक मौन था, ने टिप्पणी की। 'इस प्रकार पदार्थ की उत्पत्ति के साथ ही डार्क मैटर भी उत्पन्न हो गया और वह कल्पनातीत शीघ्रता से कुछ नैनो सेकेन्डों में इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो गया'' केन ने स्पष्टीकरण दिया।

“ इतना ही नहीं यह अधिक मात्रा में नक्षत्र के उस क्षेत्र में विद्यमान है जहाँ पर हमने प्रोब को प्रक्षेपित किया है" कहते हुए केन के नेत्रों में चमक आ गई।'

''और इसी कारण हमारा गरुड निर्धारित मार्ग से हट रहा है" त्रिपथगा ने तथ्यों की अन्तिम कड्डी को पूरा कर दिया। केन ने यह तथ्यों भरी सूचना त्रिशंकु को प्रेषित कर दी और अजितेय प्रोब की स्थिति में परिवर्तन लाने के प्रयास में लग गया। _, केन और त्रिपथगा विगत बीस घण्टों से कार्य में लगे थे। अजितेय ने अपने कार्यों को बन्द करने का संकेत उनको दिया, और स्वत: भी शट-डाउन कर के सोने चल दिया। प्रोब वृश्चिक राशि की सर्पिल-निहारिका के पूर्वी भाग में प्रविष्ट कर गया था। विगत कई करोड वर्षों पूर्व हुए विस्फोट के परिणाम के फलस्वरुप, इसका निर्माण हुआ था। यह क्षेत्र कम्यूटरों को दृष्टिगोचर तो नहीं होता था परन्तु गामा-किरणों के मापी यंत्र, इसकी उपस्थिति को सूचना दे रहे थे। रेडिएशन प्रत्येक प्रकार के घातक है, हम इसमें अधिक सम्बन्धित: सूचनाएँ एकत्र कर उसे त्रिशंकु को सम्प्रेषित कर सकें, बेहतर होगा।

यान त्रिशंकु

प्रगाढ निद्रा ने हमें नवीन शक्ति प्रदान कर दी थी। हमारे न्यूरानों में स्पन्दन सामान्य गति से हो रहा था। त्रिपथगा भी प्रफुल्लित थी परन्तु केन की प्रतीक्षा थी। त्रिपथगा केन को जगाने अपने स्थान से उठ कर गयी पर केन ''सो'' रही थी।

त्रिपथगा ने केन को कई बार हिलाया। वह अंगडाई लेकर उठ बैठी। थकान उसके चेहरे से गई नहीं थी। 'क्या हुआ'' चैतन्य होते ही उसने प्रश्न किया। 'दूसरा मिनी कैप आ गया है और तुम्हारे प्रतिरूप ने सूचना दी है कि डार्क मैटर के विषय में और डाटा चाहिए।'

त्रिपथगा क्या जो आंकडे हमने प्रथम मिनी कैप से भेजे थे वे उसी स्वरूप में मिले हैं अथवा उनमें कुछ परिवर्तन हो गया है?"

सशंकित केन का प्रश्न था।

"उनमें कोई परिवर्तन तो नहीं हुआ है, परन्तु तुम्हारा प्रतिरूप इसे डार्क मैटर को सर्वस्वीकार्य कराने के लिए कुछ और डेटा चाहता है,” त्रिपथगा ने स्पष्ट किया।

‘’ओह’” कहती केन उठ गयी।

गरुड़

प्रोब के इस नवीन पोजीशन से प्राप्त डेटा संतोषजनक हैं।' केन इतना ही नहीं यह रीडिंग स्पष्टत: दिखा रही है कि एक शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण का केन्द्र उस क्षेत्र में विद्यमान है जो हमारे प्रोब को भी, उन गैसों की भाँति अपने ओर खींच रहा है। .

'मैं प्रोब को थोडा और खिसका कर इस तथ्य का सत्यापन करना चाहता हूँ" अजितेय ने बताया।

डिटेक्टर क्या बता रहा है?' केन को प्रश्न था।

''उसकी सूचना है कि हम पाँच करोड सूर्यों के मास के तरफ खिंचते चले जा रहे हैं।' अजितेय के स्वर में चिन्ता स्पष्ट थी। 'पर इसकी उपस्थिति को न तो एक्स-रे-डिटेक्टर, न रेडियो सेंसर और नही गामा-रे-डिटेक्टर दर्शा रहे हैं," चकित भाव से केन कह उठी।

केन उठ कर आबजरवेटरी पर जाना चाहती थी। पर वह उठ न सकी।

आटोमेटकि सायरन गूंज उठा। हम सभी केन को उठाने दौड पडे। केन का शरीर अकड़ गया था। अजितेय ने डायगोस्टिक आन कर दिया।

दूसरे क्षण डायगनोस्टिक की सूचना थी ''केन के शरीर का एक तिहाई भाग क्षतिग्रस्त हो गया है।'

अजितेय और त्रिपथगा ने हर संभव रिपेयर का प्रयास किया पर रेडिऐशन द्वारा किया जाने वाला डैमेज अपना प्रभाव दिखा चुका था। "हमारे मस्तिष्कों में रक्त का संचार नहीं होता, और न हम अपने प्रतिरूपों की भाँति श्वास ही लेते हैं। हम सामान्य मांसपेशियों से युक्त भी नहीं होते और न ही हममें हारमोन्स और एन्जाइम ही होते हैं। हम एक विशुद्ध प्रकार के त्रियामी प्रतिरूप होते हैं, जो कम्पयूटर के ब्रेन से संचालित होते हैं और इस कम्यूटर ब्रेन का सीधा सम्बन्ध मुख्य कम्यूटर से होता है, जिसमें हमारे प्रतिरूपों के मस्तिष्क की गतिविधियाँ सुरक्षित रखी जाती हैं। हमारा नियंत्रण मुख्य कप्यूटर से तो होता ही है, साथ ही साथ हमारी मानवीय भावनायें, कार्य-कलाप भी हमारे प्रतिरूपों के, वास्तविक स्वरूपों की भाँति होते हैं।

'हमारा निर्माण इस ब्रह्माण्ड के रहस्यों के उद्घाटन हेतु किया गया है। यहाँ हमारे मानवीय रूप आ ही नहीं सकते, इसी कारण हम यहाँ पर भेजे गये हैं", अजितेय सोच रहा था। अजितेय का चिन्तन त्रिपथगा के आने के कारण भंग हो गया। दोनों मिलकर केन के मस्तिष्क में हुये, डैमेज को, आघात को दूर करने के प्रयास में लग गये।

उसके ब्रेन का स्पन्दन, उसमें लगे न्यट्रानों का, नैनो चिप्स का 'स्पन्दन, रेडियेशन जनित घातक प्रहार के परिणाम स्वरूप टूटे चिप्स को हटाने और उस स्थान पर उसी प्रकार के नैनों चिप्स को लगाने के, उपरान्त पूर्ववत हो गया।

केन . पुन: जाग उठी। 'मैं क्या कर रही थी' उसने त्रिपथगा से प्रश्न कियां।

'तुम डार्क-मैटर पर कार्य कर रही थीं।"

' 'कौन सा? कैसा, डार्क मैटर ?" वही जो मिनी कैंप ने भेजा था" त्रिपथगा ने याद दिलाने का प्रयास किया।

''ओह ! कुछ याद आ रहा है'' कहते हुए केन उठ गयी। * ''ओह !" अब सभी कुछ स्पष्ट हो गया, कह कर वह मुस्कुराई और अजितेय से चलने का संकेत देकर अपने टर्मिनल पर जा. पहुँची। केन अब अपनी प्रखर मेघा का प्रमाण दे रही थी।

इस घटना के दूसरे दिन, चौबीस घण्टे के बाद, वह अपनी प्रतिपादित: डार्क पदार्थ डार्क मैटर के अवधारणा के सत्यापन विवरण ला कर सभी को दिखा रही थी। ऐसा प्रतीत होता था कि रेडिएशन डैमेज ने परोक्ष में उसमें नवीन ऊर्जा भर दी थी। गरुड प्रकाशवर्ष के पाँचवे अंश की गति प्राप्त कर उस वृश्चिक राशि के सर्पिल-पश्चिमी मंदाकिनी की ओर बढ रहा था।

यह सूचना हमने त्रिशंकु को संप्रेषित कर दी।

पर उनका कोई संदेश संकेत नहीं आया। हम संशय में थे क्या हम और हमारा प्रोब इस घातक रेडिएशन से बचा रहेगा? क्या हमारा यान: डार्क मैटर के उद्गम को खोजने में, कहीं उसी का अंश न बन जाये ? कहीं वह उस श्याम विवर का अंश बन न जाये, उसमें समाहित न हो जाये?"

यान की गति प्रोब की गति बढ रही है, केन, त्रिपथगा और स्वत: मैं आगत की आहट सुन रहे हैं। हमारे वास्तविक स्वरूप कोई संदेश- मार्ग निर्देश नहीं दे रहे हैं।

एकाएक मेरी दृष्टि शिव की प्रतिमा पर, उनके मुख मंडल पर जा पडी।

मुझे लगा कि वे कह रहे हैं, '' इस श्याम विवर में प्रवेश करने के उपरान्त तुम सभी इस नृत्य मग्न ब्रह्माण्डीय लीला का अंश बन जाओगे, मेरा अंश बन जाओगे।" .

मैंने अपने साथियों को तैयार रहने का संकेत दे दिया शिव के अनन्त नर्तन के सानिध्य हेतु !

 

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