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2017
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अनीस नियाजी की कलाकृति

जब से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति ने मांग की है कि एक किसी बेकार फ़ौजी टैंक को विश्वविद्यालय परिसर में सजाने के लिए उन्हें मुहैया कराया जाए ताकि विद्यार्थी उसे देखकर सेना के त्याग और बलिदान को याद कर सकें – टैंक सुर्ख़ियों में आ गया है।

टैंक, जैसा की हम जानते ही हैं, एक ऐसा उन्नत सैन्य वाहन है जो तोप आदि से लैस होता है और लोहे की मोटी चादर से ढंका रहता है। यह बख्तरबंद भी है और दुश्मन पर तोप से गोले दागने का साधन भी है। बचाव भी करता है और आक्रमण भी करता है। किसी भी देश या व्यक्ति को सम्मुन्नत बनाने के लिए, कहा गया है, शस्त्र और शास्त्र – इन दो चीजों की आवश्यकता होती है। विश्वविद्यालयों में शास्त्र तो इफरात में होता है, शस्त्र नहीं होता। विद्वान कुलपति ने सोचा होगा की यदि विद्यालय के प्रांगण में तोप रख दी जाए तो विद्यार्थियों को ‘शस्त्र’ का कुछ तो आइडिया हो सकेगा। विश्वविद्यालयों में आजकल आए दिन लाठियां और गोलियां चल जाती हैं, लेकिन इनसे उन मारक हथियारों के बारे में विद्यार्थी बिलकुल अनभिज्ञ रहते है जो सेना में इस्तेमाल किए जाते हैं। कम से कम ज्ञान तो उनका भी होना ही चाहिए। अत: एक प्रतीक के रूप में परिसर में एक पुरानी तोप रख दी जाए तो हर्ज ही क्या है ?

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ट्विट करने वाले भी कमाल के टिप्पणीकार होते हैं। किसी ने टिप्पणी की कि आज आप परिसर में कोई पुराना तोप सजाएंगे तो कल यह तय है कि आज के छात्र एक ऐसे ‘नए’ तोप की, जो ‘वर्किंग ऑडर’ में हो, मांग करने लगेंगे और मांग पूरी करने के लिए भूख हड़ताल में बैठ जाएंगे जो तोप से भी कहीं ज्यादह मारक हो सकती है।

एक अन्य ट्विट कुछ इस प्रकार की थी। ‘लगता है हमारे कुलपति महोदय गांधी के इस सिद्धांत से पूरी तरह वाकिफ हैं कि सैनिक और ‘सिवीलियन’ के बीच की खाई ख़त्म होना चाहिए। सैनिक को सिविलियन के और सिविलियन को सैनिक के गुणों को भी अपनाना चाहिए। अपना मानना है कि शिक्षा परिसर में तोप का रखा जाना इसी दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम के रूप में लिया जाना चाहिए।”

एक अन्य ट्विटकार का कहना था, वस्तुत: एक सैनिक टैंक की बजाय परिसर में एक बड़ा पानी का टेंक रखा जाना चाहिए कि जिसमें विश्वविद्यालयीन शिक्षा को रोज़ नहलाया-धुलाया जा सके। शिक्षा यदि शासन में दखल देने लगे और इस प्रकार देश के लिए किसी मसरफ की न रहे तो उसे उसी टैंक में डुबो भी दिया जा सकता है। लेकिन टिप्पणीकार ने यह नहीं बताया की कि पानी का यह विशालकाय टैंक रखा कहाँ जाएगा ? ये ‘अंडर-ग्राउन्ड टैंक’ (ज़मीन के नीचे) होगा या ग्राउंड लेबल (भूमि तल) पर होगा ? या फिर ‘ओवर हेड’ (ऊपरी तल्ला) टैंक होगा ? और फिर इसमें पानी कैसे भरा जाएगा? वैसे, पानी की तो खैर कोई समस्या नहीं होगी। ‘टेंकर’ से उपलब्ध हो ही जाएगा।

एक अन्य विद्वान ने सुझाया, विश्वविद्यालय में शस्त्र वाहक टैंक या पानी की विशाल टंकी की इतनी ज़रूरत नहीं है जितनी एक ‘थिंक टैंक’ की आवश्यकता है। थिंक टैंक विशेषज्ञों का एक ऐसा समूह होता ही जो किसी तंग कर रही कठिन समस्या के सन्दर्भ में उसे हल करने के लिए अपने कीमती और नीतिगत सुझाव दे सके। थिंक टैंक सुझाओं का एक ढेर है जिसे एक वैचारिक टंकी में सुरक्षित रख दिया जाता है और सुविधा- नुसार इसमें से कुछ सुझावों का क्रियान्वयन कर लिया जाता है। यों तो विद्या की अर्थी निकालने के लिए आज विद्यार्थी ही काफी हैं लेकिन इस काम के लिए यदि एक ‘थिंक टैंक’ गठित कर दिया जाए तो इससे विश्वविद्यालय एक गरिमा के साथ अपने ‘लक्ष्य’ तक आगे बढ़ सकेगा। थिंक टैंक के गठन के लिए हमें अनेक अवकाश प्राप्त प्रोफ़ेसर आसानी से मिल भी सकते हैं। वे अपनी सेवाएं देने के लिए तत्पर बैठे हैं। उन्हें बस मनोनीत भर करना है } वे थिंक टैंक की कार्य अवधि बढ़वाते जाएंगे, और इस प्रकार खुद की और वि. वि. की उम्र भी बढाते चलेंगे।

बहरहाल अब समय आ गया है कि हर विश्व-विद्यालय में किसी न किसी एक टैंक का होना ज़रूरी है, फिर वह चाहे सेना का टैंक हो या पानी का टैंक हो या फिर ‘थिंक टैंक’ ही क्यों न हो।

( एक ज़रूरी टीप – हिन्दी का एक अदना सा सेवक होने के नाते अंग्रेज़ी शब्दों से – ताकि हिन्दी शुद्ध बनी रहे – मैं हमेशा बचने की कोशिश करता रहा हूँ। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया। क्या किया जाए, पहला सैन्य टैंक भारत में बना ही नहीं और उसे एक अभारतीय नाम ‘टैंक’ दे दिया गया। ‘थिंक टैंक’ का विचार सर्वप्रथम अमेरिका के राष्ट्रपति जाँन एफ़ कैनेडी को आया। सो थिंक टैंक की परिकल्पना भी भारत के हाथ से निकल गई। बचा अब पानी का ‘टैंक’। सो मैं एक पक्का भारतीय होने के नाते गारंटी से कह सकता हूँ कि यह ‘टैंक’ मूलत: हिन्दी शब्द, ‘टंकी’ का बिगड़ा हुआ रूप है। पर टंकी को अब कौन पूछता है। ‘टेंक’ की बात ही अलग है। )

डॉ. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

लोकेन्द्र सिंह

- लोकेन्द्र सिंह

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक हैं।)

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भारतीय संविधान में 'वंदेमातरम्' को राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' के समकक्ष राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त है। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने 'वन्देमातरम्' गीत को देश का राष्ट्रगीत घोषित करने का निर्णय लिया था। यह अलग बात है कि यह निर्णय आसानी से नहीं हुआ था। संविधान सभा में जब बहुमत की इच्छा की अनदेखी कर वंदेमातरम् को राष्ट्रगान के दर्जे से दरकिनार किया गया, तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वंदेमातरम् की महत्ता को ध्यान में रखते हुए 'राष्ट्रगीत' के रूप में इसकी घोषणा की। बंगाल के कांतल पाडा गाँव में 7 नवंबर, 1976 को रचा गया यह गीत 1896 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गाया गया। गीत के भाव ऐसे थे कि राष्ट्रऋषि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का लिखा 'वंदेमातरम्' स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिवीरों का मंत्र बन गया था। 1905 में जब अंग्रेज बंगाल के विभाजन का षड्यंत्र रच रहे थे, तब वंदेमातरम् ही इस विभाजन और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बुलंद नारा बन गया था। रविन्द्र नाथ ठाकुर ने स्वयं कई सभाओं में वंदेमातरम् गाकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जन सामान्य को आंदोलित किया।

वंदेमातरम् कोई सामान्य गीत नहीं है, यह आजादी का गीत है। यह क्रांति का नारा है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इसका बहुत बड़ा योगदान है। किसी गीत का ऐसा गौरवपूर्ण इतिहास होने के बाद भी उसे यथोचित सम्मान नहीं देना, हमारी निष्ठाओं को उजागर करता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि राष्ट्रीय प्रश्नों पर भी क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ और संकीर्ण मानसिकता हावी हो जाती है। संविधान में राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त होने के बाद भी वंदेमातरम् को हकीकत में समान दृष्टि से सम्मान नहीं दिया जाता। वंदेमातरम् को सम्मान देने का जब भी प्रश्न उठाया जाता है, सांप्रदायिक राजनीति शुरू हो जाती है। भला है कि इस बार किसी संगठन या राजनीतिक पार्टी ने वंदेमातरम् के सम्मान के प्रश्न को नहीं उठाया है। एक मामले की सुनवाई करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के स्कूल, सरकार और निजी कार्यालयों में वंदेमातरम् गाना अनिवार्य कर दिया है। उच्च न्यायालय का यह निर्णय उपेक्षा के शिकार राष्ट्रगीत वंदेमातरम् का सम्मान बढ़ाएगा। संविधान का सम्मान करने वालों को न्यायालय के इस निर्णय का खुलकर स्वागत करना चाहिए। क्योंकि, न्यायालय ने अपनी ओर से अलग से कुछ विशेष नहीं कहा है, बल्कि राष्ट्रगीत के लिए यह सम्मान संविधान में ही वर्णित है। जिन लोगों को वंदेमातरम् का विरोध करना है तो उन्हें यह भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि भारत के संविधान में उनकी निष्ठाएं नहीं है।

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बहरहाल, मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एमवी मुरलीधरन ने अपने निर्णय में कहा है कि विद्यालयों में वंदेमातरम् सप्ताह में कम से कम दो बार और कार्यालयों में महीने में कम से कम एक बार राष्ट्रगीत गाया जाना चाहिए। न्यायालय ने अपने निर्णय को विवाद से बचाने के लिए कह दिया है कि 'यदि किसी व्यक्ति या संस्थान को राष्ट्रगीत गाने में किसी प्रकार की समस्या है, तो उसे जबरन गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। बशर्ते उनके पास राष्ट्रगीत न गाने के लिए पुख्ता वजह हो।' न्यायालय की इस टिप्पणी के बाद प्रश्न उत्पन्न होता है कि आखिर किसे वंदेमातरम् के गायन से आपत्ति हो सकती है? ऐसा कौन-सा कारण है कि राष्ट्रगीत के गायन में समस्या उत्पन्न होती है? इस तरह का प्रश्न ही अपने आप में राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान करने वाला है। किसी भी नागरिक के लिए राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना उसका पहला कर्तव्य होता है। अपने देश और संविधान के प्रति सम्मान का भाव रखने वाला नागरिक उनकी अवहेलना नहीं कर सकता। किंतु यह सब हो रहा है। देश में ऐसी स्थितियाँ बनाने के पीछे किसकी जिम्मेदारी माननी चाहिए। क्योंकि, प्रारंभ में वंदेमातरम् को लेकर कोई आपत्ति किसी को नहीं थी। स्वतंत्रता संग्राम में कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों से लड़ रहे मुसलमानों ने भी वंदेमातरम् का स्वर ऊंचा किया था। फिर क्या परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं कि मुस्लिम संप्रदाय वंदेमातरम् से दूर होता गया? दरअसल, इसके लिए हमारे नेतृत्व का लुंज-पुंज रवैया जिम्मेदार है।

वर्ष 1923 में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में मौलाना अहमद अली के विरोध को महत्त्व नहीं दिया गया होता तो आज मुस्लिम समाज राष्ट्रगान की तरह राष्ट्रगीत को भी बिना किसी झिझक के सम्मान दे रहा होता। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मौलाना अहमद अली ने अपनी संकीर्ण और कठमुल्ली सोच का प्रदर्शन करते हुए हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के हिमालय पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वंदेमातरम् गाने के बीच में टोका। किंतु, पलुस्कर ने वंदेमातरम् का सम्मान रखते हुए अपना गायन जारी रखा और पूरा गीत गाने के बाद ही रुके। 1896 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन के बाद से प्रत्येक अधिवेशन में वंदेमातरम् गाने की परंपरा बन गई थी, जो मौलाना अहमद की आपत्ति के बाद टूट गई। इसके बाद से ही वंदेमातरम् को लेकर मुस्लिम संप्रदाय में दुविधा खड़ी हो गई। एक जमाने में वंदेमातरम् का आह्वान करने वाले लोग राष्ट्रभक्त कहलाते थे, लेकिन आज सेक्युलर समूहों ने ऐसी स्थितियां पैदा कर दी हैं कि वंदेमातरम् के लिए आग्रह करने वाला प्रत्येक व्यक्ति या संस्था सांप्रदायिक है। आखिर वंदेमातरम् का सांप्रदायिकता से क्या संबंध है? सेक्युलरों ने वोटबैंक की राजनीति को साधने के लिए देश के ओजस्वी स्वर 'वंदेमातरम्' को सांप्रदायिक और विवादित बना दिया। इसी कारण न्यायालय को उक्त टिप्पणी करनी पड़ी। इसके साथ ही उसे कहना पड़ा कि युवा ही इस देश की भविष्य हैं और कोर्ट को विश्वास है कि इस आदेश को सही भाव और उत्साह के साथ ही लिया जाए।

वंदेमातरम् के गायन की अनिवार्यता का निर्णय सुनाते समय मद्रास उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अगर लोगों को यह लगता है कि राष्ट्रगीत को संस्कृत या बंगाली में गाया जाना कठिन है तो वे इसका तमिल में अनुवाद कर सकते है। यहाँ भी न्यायालय ने भाषायी विवाद से बचने के लिए यह गैर-जरूरी टिप्पणी की है। राष्ट्रगीत का एक ही स्वरूप और एक ही भाषा रहे तो ज्यादा अच्छा रहेगा। यह बात सही है कि हमें अपनी मातृभाषा में गीत गाने में अधिक सहजता होती है। इसी कारण प्रारंभ में वंदेमातरम् के अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुए। अरबिंदो घोष ने इस गीत का अनुवाद अंग्रेजी में किया और आरिफ मोहम्मद खान ने उर्दू में अनुवाद किया। लेकिन, यह सब अनुवाद वंदेमातरम् के राष्ट्रगीत बनने से पूर्व हुए हैं। राष्ट्रगीत के रूप में संस्कृत में लिखे वंदेमातरम् को ही मान्यता है। वंदेमातरम् इतना लोकप्रिय गीत है कि इसे विभिन्न लय में गाया गया है। इसलिए तमिल में या अन्य किसी भारतीय भाषा में इसका अनुवाद होना अच्छा ही है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदेमातरम् के प्रथम दो पद संस्कृत में और शेष पद बांग्ला भाषा में लिखे थे।

मद्रास उच्च न्यायालय जिस मामले (के. वीरामनी प्रकरण) की सुनवाई कर रहा था, उसका संबंध भी इसी बात से है कि राष्ट्रगीत प्रारंभ में किसी भाषा में लिखा गया था। बहरहाल, मद्रास उच्च न्यायालय से आया निर्णय शुभ है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। वंदेमातरम् का संबंध किसी धर्म या संप्रदाय से नहीं है। हमें यह भी भ्रम भी कतई नहीं रखना चाहिए कि यह किसी देवी-देवता की वंदना है। वंदेमातरम् शुद्धतौर पर अपने देश भारत के प्रति अपनी भावनाओं का प्रकटीकरण है।

इस संबंध में महात्मा गाँधी के विचार उल्लेखनीय हैं। उन्होंने लिखा है- 'मुझे यह पवित्र, भक्तिपरक और भावनात्मक गीत लगता है। कवि ने हमारी मातृभूमि के लिए जो सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए हैं, वे एकदम अनुकूल हैं, इनका कोई सानी नहीं है।'

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बॉलीवुड की ज्यादातर फिल्में दर्शकों से अपना दिमाग सिनेमा हाल से बाहर छोड़ देने की मांग करती हैं लेकिन “लिपस्टिक अंडर माई बुर्का” साल भर में रिलीज हुई उन चुनिन्दा फिल्मों में से हैं जो आपसे मनोरंजन के साथ–साथ सोचने की भी मांग करती है. हमारे समाज में मर्द ही हैं जो जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं के लिये “कोड आफ कंडक्ट” तय करते हैं. यहां औरतों के खुद की मर्ज़ी की कोई बख़त नहीं है. इसलिए महिलायें जब भी समाज द्वारा बनाये गये बंधनों और ढ़ांचे को तोड़ कर बाहर निकल निकलती हैं तो समाज इसे बर्दाश्त नहीं कर पाता है फिर वो चाहे फिल्म में ही क्यों ना हो. “लिपस्टिक अंडर माई बुर्का” को उसके बोल्ड विषय ने विवादित बना दिया और लोग इसे लड़कियों को बर्बाद करने वाली फिल्म बताने लगे. परम संस्कारी और हर दूसरी बात पर आहत हो जाने वाले भारतीय समाज में ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्क़ा' जैसी फिल्में बनाकर उसे रिलीज करना कितना मुश्किल भरा काम है यह इस फिल्म के मेकरों से बेहतर कौन बता सकता है, इसके लिये उन्हें सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन के साथ लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी.यह फिल्म सेंसर बोर्ड के मुखिया पहलाज निहलानी द्वारा जताये गये ऐतराजों के बाद चर्चा में आई थी जिसमें उनकी मुख्य आपत्ति थी कि एक महिला प्रधान फिल्म में औरतों की फेंटसी दिखाई गयी है जिससे हमारे समाज पर बुरा असर पड़ेगा. सेंसर बोर्ड के इस रुख की वजह से इस फिल्म को अपने रिलीज के लिए संघर्ष करना पड़ा.

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जीवन के अन्य भागों की तरह कला, साहित्य और फिल्मों पर भी पुरुषवादी नजरिया हावी रहती है और सेक्स को तो मर्दों की बपौती माना जाता है. यहां सब कुछ मर्द ही तय करते हैं, दरअसल पुरुषों के लिये यौनिकता सदियों से स्त्रियों पर नियंत्रण का सबसे बड़ा हथियार रहा है. “लिपस्टिक अंडर माई बुर्का” इन्हीं सवालों से टकराती है. यह महिलाओं के आकांक्षाओं की कहानी है फिर वो चाहे किसी भी उम्र, धर्म या समाज की हों. यह औरतों के इच्छाओं और अभिलाषाओं की एक यात्रा है. फिल्म में लिपस्टिक्स और बुर्के को इच्छाओं व पितृसत्तात्मक नजरिये के रूपक के तौर पर दिखाया गया है.

फिल्म की कहानी भोपाल जैसे मध्यम शहर में रहने वाली चार महिलाओं की है जो अपने परिवार और समाज की रवायतों की बंदिशों में जकड़ी हुई है. ये चारों अलग-अलग उम्र की हैं लेकिन अपनी छिपी इच्छाओं और अभिलाषाओं को हक़ीक़त बनाने की इनकी कोशिश में समानता है, फिर वो चाहे वित्तीय स्वतंत्रता,गायक बनने की,बड़े शहर में जाने की हो या बस जीवन को पूरी तरह से खुल कर जीने की हो.

विधवा ऊषा (रत्ना पाठक) हवाई महल नाम के एक पुरानी इमारत की मालकिन हैं, जहाँ शिरीन (कोंकणा सेन शर्मा), लीला (अहाना कुमरा) और रिहाना (पलबिता बोरठाकुर) किराये पर रहती हैं.चारों की कुछ छिपे सपने हैं जिसे वे पूरा करने की कोशिश करती है, शिरीन का पति (सुशांत सिंह) उसे सिर्फ इस्तेमाल की चीज समझता है लेकिन वो छुपकर एक सेल्स गर्ल की नौकरी करती है. लीला एक फोटोग्राफर से प्यार करती है लेकिन उसकी मां ने उसकी शादी एक दूसरे लड़के के साथ तय कर दी है. रिहाना एक बुरखा सिलने वाले दर्जी की बेटी बनी हैं जो घर से कॉलेज के लिए निकलती तो बुरखा पहन कर है लेकिन कॉलेज में बुरखा बैग में रखकर जींस-टॉप में घूमती है, ‘जींस का हक, जीने का हक’ जैसे नारे लगाती है और माइली सायरस को अपना आदर्श मानती है. उषा जी जो 55 साल की विधवा हैं जिन्हें आस पास के सभी लोग बुआ जी कहते हैं, उनका यौन अस्तित्व समाज में स्वीकार्य नहीं है लेकिन वे अकेलेपन से छुटकारा पाने की कोशिश करती हैं. इन्हीं चारों किरदारों के इर्दगिर्द पूरी फिल्म घूमती है और अपने अंदाज से सारे हदों को तोड़ती जाती है. समाज की ढ़ोंगी नैतिकताओं और महिलाओं को पीछे रखने वाली सोच पर सवाल करते हुए यह आपको चौंकाती और झकझोरती है.

फिल्म में सभी कलाकारो का अभिनय प्रभावशाली है और सभी अपने किरदार में फिट नजर आते हैं जहाँ रत्ना पाठक और कोंकणा सेन शर्मा का अभिनय अपने बुलंदी पर है तो वही आहना कुमरा, प्लाबिता बोरठाकुर भी चौकाती हैं.

फिल्म की डायरेक्‍टर अलंकृता श्रीवास्तव दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से मास कम्‍युनिकेशन में पोस्‍ट ग्रेजुएट हैं और वे लम्बे समय तक प्रकाश झा के साथ बतौर सहायक निर्देशक काम कर चुकी हैं. यह उनकी दूसरी फिल्म है इससे पहले 2011 में उनकी 'टर्निंग 30 नाम से एक फिल्म आ चुकी है. वे हिम्मती है और जोखिम लेना जानती हैं, सेंसर बोर्ड द्वारा “लिपस्टिक अंडर माई बुर्का” को प्रमाणित करने से इनकार करने पर उन्होंने कहा था कि “मैं पराजित या निराश नहीं हूं”. अगर उन्होंने अपनी यही गति बनाये रखी तो आने वाले दिनों में वे पुरुषवादी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को एक नया नजरिया दे सकती हैं.

आनंद पांचाल की कलाकृति

सुशील शर्मा


चंद्रशेखर आज़ाद (जन्मतिथि पर विशेष )

तुम आज़ाद थे आज़ाद हो आज़ाद रहोगे ।
भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे ।
मौत से आँखें मिला कर वह बात करता था।
अंगदी व्यक्तित्व पर जमाना नाज करता था।
असहयोग आंदोलन का वो प्रणेता था।
भारत की स्वतंत्रता का वो चितेरा था।
बापू से था प्रभावित पर रास्ता अलग था।
खौलता था खून अहिंसा से वो विलग था।
बचपन के पंद्रह कोड़े जो उसको पड़े थे।
आज उसके खून में वो शौर्य बन खड़े थे।
आज़ाद के तन पर कोड़े तड़ातड़ पड़ रहे थे।
जय भारती का उद्घोष चंदशेखर कर रहे थे।
हर एक घाव कोड़े का देता माँ भारती की दुहाई।
रक्तरंजित तन पर बलिदान की मेहँदी रचाई।
अहिंसा का पाठ उसको कभी न भाया।
खून के ही पथ पर उसने सुकून पाया।
उसकी शिराओं में दमकती थी जोशो जवानी।
युद्ध के भीषण कहर से लिखी थी उसने कहानी।
  उसकी फितरत में नहीं थी प्रार्थनाएं।
उसके शब्दकोशों में नहीं थीं याचनाएं।
नहीं मंजूर था उसको गिड़गिड़ाना।
और शत्रु के पैर के नीचे तड़फड़ाना।
मन्त्र बलिदान का उसने चुना था।
गर्व से मस्तक उसका तना था।
क्रांति की ललकार को उसने आवाज़ दी थी।
स्वतंत्रता की आग को परवाज़ दी थी।
माँ भारती की लाज को वो पहरेदार था ।
भारत की स्वतंत्रता का वो पैरोकार था।
अल्फर्ड पार्क में लगी थी आज़ाद की मीटिंग।
किसी मुखबिर ने कर दी देश से चीटिंग।
नॉट बाबर ने घेरा और पूछा कौन हो तुम।
गोली से दिया जबाब तुम्हारे बाप हैं हम।
सभी साथियों को भगा कर रह गया अकेला।
उस तरफ लगा था बन्दूक लिए शत्रुओं का मेला।
सिर्फ एक गोली बची थी भाग किसने था मेटा ।
आखरी दम तक लड़ा वो माँ भारती का था बेटा।
रखी कनपटी पर पिस्तौल और दाग दी गोली।
माँ भारती के लाल ने खेल ली खुद खून की होली।
तुम आज़ाद थे आज़ाद हो आज़ाद रहोगे ।
भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे ।

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(गुरुपूर्णिमा पर विशेष)
गुरु पर दोहे

गुरु अमृत है जगत में ,बांकी सब विषबेल
सतगुरु संत अनंत हैं ,प्रभु से करदें मेल।

गीली मिट्टी अनगढ़ी ,हम को गुरुवर जान।
ज्ञान प्रकाशित कीजिये ,आप समर्थ बलवान।

गुरु बिन ज्ञान न होत है ,गुरु बिन दिशा अजान।
गुरु बिन इन्द्रिय न सधें ,गुरु बिन बढे न शान।

गुरु मन में बैठत सदा ,गुरु है भ्रम का काल।
गुरु अवगुण को मेटता,मिटें सभी भ्रम जाल।

शिष्य वही जो सीख ले ,गुरु का ज्ञान अगाध।
भक्ति भाव मन में रखे ,चलता चले अबाध।

गुरु ग्रंथन का सार है ,गुरु है प्रभु का नाम।
गुरु अध्यात्म की ज्योति है ,गुरु हैं चरों धाम।

अन्धकार से खींच कर मन में भरे प्रकाश।
ज्यों मैली चुनरी धुले ,सोहत तन के पास।

गुरु की कृपा हो शिष्य पर ,पूरन हों सब काम
गुरु की सेवा करत ही ,मिले ब्रह्म का धाम।

गुरु अनंत तक जानिए ,गुरु की ओर न छोर।
गुरु प्रकाश का पुंज है ,निशा बाद का भोर।

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गुरुपूर्णिमा पर
हाइकु-100


गुरु की कृपा
अनंत आशीर्वाद
जीवन धन।

गुरु का ज्ञान
अनमोल संपत्ति
कभी न घटे।

गुरु का मान
जीवन से अमूल्य
शिष्य का धर्म।

जीवन ज्योति
गुरु से प्रकाशित
चमके सदा।

तमस दूर
जगमग जीवन
गुरु की कृपा।

शिष्य की शान
गुरुवर महान
ब्रह्म समान

गुरु वरण
तेजोमय संस्कार
आत्म प्रदीप्त।

गुरु शरण
आत्मोन्नति चरित्र
ऊंचा व्यक्तित्व।

शिष्य संस्कार
मूलाधार है गुरु
पुण्य उदय।

गुरु का स्पर्श
चरित्र उत्कृष्टता
शिष्य समग्र।

प्रखर बुद्धि
गुरु मार्गदर्शन
जिज्ञासा शांत।

गुरु संयुक्त
सा विद्या या विमुक्त
अहम रिक्त।


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रुचि प जैन


ख़्याल
 
हज़ूर इतनी सी खवाइश है  कि ख़्याल का भी ख़्याल रखना,
न शिकवा करना गिला करना ख़्याल में ही ख़्याल रखना।

जो न हो मुलाक़ात हक़ीक़त में ख़्याल में ही मुलाक़ात रखना,
वतन के लिए निकला है क़ाफ़िला ख़्याल में भी दुआ करना।

ज़ख़्म हो या बहती हो खूं की धारा ख़्याल में भी यह ख़्याल न करना,
इतना हसीन हो ख़्याल खुदा से उसे हक़ीक़त बनाने का ख़्याल करना।

ख़्याल ही ख़्याल में जो गुफ़्तगू हुई उसे ख़्याल में रखना,
वतन से वफ़ा का ख़्याल उस ख़्याल की तुम हिफ़ाज़त करना।

ग़म न करना ख़्याल में बस ख़ुशियों का ख़्याल करना,
गुमराह न हो ख़्याल इसका ख़्याल रखना।

अलविदा न कहा हमने यह ख़्याल करना,
रहेंगे साथ ख़्याल में यह ख़्याल रखना।

छोड़ जाते है अपनों को उनका तुम ख़्याल रखना,
सबकी मुस्कराहट के ख़्याल में अपनी मुस्कराहट का भी ख़्याल रखना।


                      रुचि प जैन
Email id ruchipjain@yahoo.com

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प्रदीप उपाध्याय

कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
लगता जैसे काँपती सूरज की तपन
बच्चें-बुढ़े और युवाओंकी मण्डली
जमाये रहती थीं चौपाल वहाँ
सुबह हो या फिर शाम
और देर रात तक
जमे रहते थे लोग जहाँ
करते गपशप और वार्तालाप
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
जिसके नीचे मौसी की दुकान
चाय पीते खाते चने परमल
आते हैं याद वे दिन
समय के क्रूर हाथों
दे दी गई बरगद की बलि
और तन  गया वहाँ कांक्रीट का जंगल
अब नहीं वहां बरगद की छांव
सूरज करता अट्टहास वहाँ
कैसे   बचेंगे उसकी तपन से
आते हैं याद वे दिन जब
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ।
छूट गये हैं कई संगी-साथी
बिछुड़ गये हैं अपने सारे
लगता है भला था अपना बचपन
और बेफिक्री की वह जिन्दगी
अब तो रह गई हैं यादे ही शेष
और हम भी रह जायेंगे यादों में
ठीक उस बरगद की तरह।।

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श्रद्धा मिश्रा


    *मछलियाँ*
मछलियाँ अनगिनत तैर रहीं है जल में
उसी एक जल में इधर से उधर घूमती हुई
दाने खाने में लगी हुई,
जैसे औरतें टहलती है एक ही घर मे,
दाने पानी के इंतजाम में लगी हुई।
एक औरत दूसरी लड़की को
औरत बनते ही दे देती है
वो सब ज्ञान जो उसने पाया है।
किसी और औरत से औरत बनने के लिए,
ये ठीक वैसा ही नहीं लगता जैसे
निगल जाती है
बड़ी मछली छोटी मछली को।।

---------.
*सैनिक की पत्नी*
कभी आसमां
कभी चांद
कभी तारो को
तकती रही
रात भर,
बस जिसका इंतजार था
वो ही नहीं आया
रात भर,
मौसम कुछ गर्म था,
फिर भी
आंखों में सीलन थी,
एक आग में मैं
जलती रही
रात भर,
सोचती हूँ
कैसा होगा वो दृश्य
जब तुम जानते होंगे
कि
मरना ही है जी के
रात भर,
जब गूंजती होगी चीत्कार
मच जाता होगा हाहाकार,
जो जिंदा रह जाये
वो कैसे जीते है
रात भर,
लाल नदिया
मरुस्थल में बहा सकते हो
तुम ही हो जो
दो माँ के लाल
कहा सकते हो,
एक तुम्हें पालती है
एक को तुम सम्भालते हो
एक रात से अगली
रात भर,
कभी सोचा था तुमने
जो होती रहीं
हममें
बातें
रात भर,
कहा था बच्चों के
लिए
खिलौने लाओगे
माँ को चारों धाम घुमाओगे,
बहन को उसका प्यार मिलेगा
भाई को पसंद की गाड़ी
पर ये क्या अगले ही दिन
भूल गए सब
हम ये कैसे सम्भालेंगे अब,
तुम सोये रहे
हम जागे रहे
रात भर,
गर्व है तुमपे देश को
ये कौन समझता है कि
गर्व के गर्त में भी
सुलगता है कुछ,
रात भर,
हकीकत होंगे
तुम्हारे सपने
अपना मनमौजी
फौजी ही होगा,
जबकि वो बेपरवाह था,
अब बुन रहा है
तुम्हारा ही ख़्वाब
रात भर,
हमारे सपने
तुमने नहीं समझे
फिर भी
होगा वही
मैंने सोचा है यही,
जो तुम्हें लगता था सही,
रात भर...
--------.
*नारी*
तुम्हारे रूप की एक झलक का
दरवेश हूँ,
तुम हो जिसमें शामिल हर क्षण ऐसा
परिवेश हूँ
हाँ हूँ मैं
हाँ मैं अविवेक हूँ।
प्रेम अगर विवेक शून्य
कर देता है,
तो क्या मैं द्वेष हूँ,
जिस रूप राशि से
इतना मैं प्रभावित हूँ,
क्या उसमें अब भी मैं शेष हूँ।
जहाँ आकर तुम अपना
सब शोक भूल जाते थे,
हाँ मैं हूँ
मैं ही वो देश हूँ।
तुम ही खुशबू,तुम ही वृक्ष,
तुम ही हरियाली थे
अब क्या
अब तो मात्र अवशेष हूँ।
मगर अवशेषों का
अपना महत्त्व है
धरा की धरोहर तो हूँ
सबला की मोहर तो हूँ।
कृपा की पात्र बन सकती थी,
मगर अब सबल हूँ,
स्वतंत्र हूँ, सशक्त हूँ,
हाँ मैं हूँ
मैं भी अभिव्यक्त हूँ
काया से कोमल
विचारो से सख्त हूँ,
अब मैं बेकार नहीं
बेशकीमती वक़्त हूँ।

------------.
एक छोटी सी कागज की
हमारे बीच में दीवार है
और लोग कहते हैं
तकरार में भी प्यार है,
रूठने का मजा तब है
जब मनाने वाला हो,
जिसे कोई मनाने वाला न हो
उसके लिए सब बेकार है।
मुझे वो चाहत भी स्वीकार थी,
ये नफरत भी शिरोधार्य है।
मैं अपराधी हूँ
अक्ष्म्य अपराध की,
बँधी हूँ कुटिल काल के
हाथों में,
या जूझ रही हूं किसी
श्राप से,
मुक्ति कही दिखती नहीं
स्त्री होने के पाप की,
इतनी निर्मम है दुनिया
की कोई साथ नहीं देता,
जैसा दिखता है सब
वैसा नहीं होता।।
------------.
उसका था...
मैं अच्छा था या बुरा था ये फैसला उसका था,
मजबूरियां मेरी थी और फ़ासला उसका था,
उड़ती रही पंख फैला बेपरवाह आकाश में,
चोट खाई थी मगर ये हौसला उसका था।
देखते देखते अपने भी पराये हो गए,
महफिलें किसकी थी वीराना उसका था,
आज आये हैं बरसो बाद तो पराया है,
अब मेहमान है कभी आशियाना उसका था।
बहुत मिलती है उसकी सूरत से सीरत,
आदमी अच्छा है दीवाना उसका था।
खेलते रहे दिल-ए-नादान से वो बार-बार
ये बहकना मेरा था और बहाना उसका था।
---------------.
*निष्कर्तव्य *
जब भी रोना
समंदर के पास रोना,
वो तुम्हारा दर्द
खुद में समा लेगा,
क्योंकि दुनिया का बस चले
तो तुम्हारे
दर्द का भी सौदा कर देगी,
माफी मांगने से अगर
पाप कम होते तो
स्वर्ग और नर्क का
प्रपंच नहीं होता,
ये सहारा भी बुजदिलों का है
जिनसे कुछ नहीं होता
वो ही कहते है हाथ में हाथ धरकर
ईश्वर है अब वही न्याय करेगा।
-----------.
*कुछ नहीं*
जीवन थम सा गया है वक़्त की तरह,
वक़्त? ये तो रफ्तार है,
जी हाँ
जीवन ऐसी ही रफ्तार में है
बस  सांसे चलती जा रही है,
अलसाये से
थके हुए
निरर्थक
एक तारतम्य में
बीतते ही जा रहे है,
जीवन के पल,
उत्साह
उमंग
साहस
सब दूर हो गए हैं,
एक ही धुन में सुईयों से चलते हुए
हर एक कि पसंद को
अपनी पसंद बनाने में,
रोज वही घर
उस घर को करीने से सजाने में,
सुबह की पूजा शाम की आरती
आज तक नहीं समझी
सवारी हूँ या सारथी,
और तुम कहते हो
कुछ करती ही नहीं,
सच तो ये है
करती तो हूँ बहुत कुछ
या शायद
सब कुछ,
मगर उसे मैंने नियति
और समाज ने कर्तव्य
समझ लिया है,
और
परिवार ने समझा
कुछ नहीं...

10/05/2017 श्रद्धा मिश्रा
mishrashraddha135@gmail.com
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कुमारी अर्चना


"चमेली के फूल"
जब मैं छोटी थी फूलों की खुशबू
मुझे इत्र से ज्यादा भाती थी
उन दिनों पापा के साथ पुलिस थाना के कैंपस में ही
टाली के बने दो छोटे कमरे रहते थे
थाना के चारों ओर बाग बगीचे थे
आम, कटहल, केला, जामुन, शरीफा के फल थे
क्यारियों में चमेली के फूल लगे थे
मैं यही सोचती थी ये फूल ही यहाँ क्यों लगें है
बाद पता चला इन पौधों को अल्प जल ही चाहिए
जैसे मुझे तुम्हारा थोड़ा प्यार!
इनकी खुशबू भी बहुत देर तक टिकी रहती है
थाने का वातावरण संध्या में गमगम करता था
चौकीदारों द्वारा सबेरे संध्या पौधों में जल छिड़काव किया जाता था
मैं और मेरे भाई भी चमेली के पौधों को खुब पानी देते थे
ताकि ज्यादा से ज्यादा फूल खिले
सफेद सफेद व  बड़े बड़े!
संध्या को जब चमेली के फूल
अधखिले होते थे हम उन्हें तोड़ सिरहाने रख लेती थी
सुबह जब पलक खुलती फूलों को पूर्ण खिला देख
खुशी से आँखें चमक जाती थी मेरी
उसको बार बार चूमती बार बार सूंघती
जा जा कर मम्मी पापा को बताती थी
मम्मी कहते क्यों सूँघा  लिया
भगवान को अब ये फूल नहीं चढ़ सकते!
पर मुझे तो किसी ने सूँघा नहीं
स्पर्श भी नहीं किया
ना ही मैं बासी हूँ
फिर मेरे भगवान ने मुझे
अपने चरणों में जगह क्यों नहीं दी
मैं इसी गम़ में घुलती हूँ
आसुँओं को उसका दिया प्यार
समझ दिन-रात पीती हूँ
मैं चमेली का फूल क्यों ना बनी!
------.
"मैं तेरी मीरा"
मैं तेरी मीरा
ओ मेरे धनश्याम
जग तो पहचाने मुझको
अब तू भी मोहे जान
मैं अनजान नहीं
तेरी परिचित हूँ!
मैं ना तेरे बचपन का सखा सुदामा हूँ
ना प्रेयसी राधा व गोपी हूँ
बस अपनी बंद अंखियन को खोल
और मुझे अपने दिलद्वार में
जाने का प्रवेश दें!
सबका दिल जीती हूँ
एक दिन तुम्हारा भी जीत लूँगी
ना जीती तो
तू मुझको जीत लेना
अपनी पटरानी के लिए!

----

"तेरे लिए मैं अल्पना बनना चाहती"
वैसे तो मुझे उत्सवों में रंगोली जैसा
नाजुक नाजुक हाथों से बनाया जाता!
पर मैं तेरे सख्त़ हाथों से बनना चाहती
चावल की तरह तेरे प्यार में मिटकर
तेरे जीवन में आनंदरस भरना चाहती!
तेरे लिए मैं अल्पना बनना चाहती
मेंहदी सी घिसकर तेरे हाथों पर
प्रेमरंग भर देना चाहती हूँ !
तेरे लिए मैं अल्पना बनना चाहती
तेरे आँगन की तुलसी सी बनकर
बुरी हवाओं से तुझे बचाना चाहती !
तेरे चौखट पर काला टिका सा बनकर
तेरे हर बलाओं को अपने ऊपर लेना चाहती!
तेरे कोहबर घर की दीवारों पर सजकर
तुझपर समर्पण और अर्पण होना चाहती!
तेरे  लिए मैं अल्पना बनना चाहती
फूलों की खुशबू सी बिखर जाना चाहती!
-----------.
"तितली हूँ मैं"
तितली हूँ मैं
अपने चमकीलें परों को संभालते हुऐ
उर चली गगन छूने
टिड्डे जैसे हो तुम
भँवरे के रूप में बहुरूपीय हो
झूठा प्यार दिखाकर
मुझ तितली का कली जैसी रस चूसना चाहते हो !
अपना रेन बसेरा कहीं ओर बसाकर
तितली का धरौंदा ना बनने देना चाहते
बिन घोसले की चिडिया का क्या होता है मुझे पता नहीं !
अपना जीवन चक्र कितने समय का
सब जानती हूँ इसलिए
उड़ चली मैं
जहाँ अनंत खुला आकाश होगा
सच्चा प्यार होगा
और मेरा तितला होगा
वहीं तितले के संग
नया घर बनाउँगी!
-----------.
"ओ मृगनयनी आ तुझे प्यार कर लूँ"
ओ मृगनयनी आ तुझे प्यार कर लूँ
मेरी मृगनयनी आ तेरा दीदार कर लूँ
भरके तुझे बाँहों में मैं गंगा स्नान कर लूँ
चूमकर तेरे लब्बों को मैं
जिन्दग़ी की भवबाधा को पार कर लूँ
जाने अगले जन्म मेरा शरीर किस रूप में आये
फिर ना मैं तुझे जानूँ ना तू
आ इसी जन्म में जानपहचान कर लूँ
ओ मृगनयनी आ तुझे प्यार कर लूँ !
-------------.
"रात और दिन"
मेरे हिस्से में रात आई
रात का रंग काला है
इसमें कोई दूजा रंग नहीं मिला
इसलिए सदा सच्चा है
मेरी ज़िन्दगी भी अकेली है
कोई दूजा ना मिला!
फिर दिन का हिस्सा
सफेद रंग का है
जो दूजे रंग से मिल बना
झूठा सा दिखता है
फिर भी जीवन में
विविध रंगों को भरता है
वो कहाँ गया
जो मेरे दिल को भाता था
शायद गुम हो गया
रात के काले में!
---------------.
"कतरन सी हो गई हूँ मैं"
कागज की कतरन सी हो गई हूँ
जो कल तक तुम्हारे पहरन में थी!
बासी सी हो गई हूँ मैं
कल तक ताजी थी तुम्हारे लिये
आज बुढ़िया सी हो गई हूँ !
घर का पुराना समान सी हो गई हूँ मैं
जो कल तक नयी थी तुम्हारे लिए
बंद कोठरी में पड़े पड़े धूल
कब्र सी बन गई हूँ!

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार

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सत्येंद्र अग्रवाल


आज सुबह ईश्वर को देखा है मैंने-

गीत गाते उमंगों से भरे परिंदों की चहचहाट में,
नव जीवन का संचार करती सूरज की रश्मियों में,
हँसते फूलो पर मँडराते भंवरों की गुंजन में,
शीतल मंद मंद पवन की संगीत मैं गाते पत्तों की सरसराहट में,
बहती नदी की कल-कल ध्वनि में,

आज सायं फिर देखूंगा ईश्वर को,
डूबते सूरज की लालिमा में,
धवल चंद्रमा की फैली चांदनी में,
नन्हें नन्हें टिमटिमाते तारों के विस्तृत आकाश में,
अस्तित्व में समाहित प्राकृतिक रहस्यों में
थके नींद की आगोश में समाये मानव में ,
धन्यवाद ,कृतज्ञता ज्ञापित करते मनुष्य में,

सत्येंद्र अग्रवाल

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पूजा डालमिया


समर्पण

बेटी
बहन
बहू
पत्नी
माँ
और न जाने
कितने ही रिश्तों को
जीवन भर बखूबी
निभाया है मैंने
हर एक रिश्ते में
पूर्ण समर्पण
दिखाया है मैंने
जीवन भर
सबके लिए
सब कुछ
सोचती आई हूँ मैं
लेकिन
वो दिन कब आएगा
जब
कोई सोचेगा
मेरी खातिर
क्या मुझे
जीवन भर
बस
कर्तव्यों को ही
निभाना पड़ेगा
या मुझे
मिलेंगे कभी
अधिकार भी मेरे
क्या मुझे ही
हमेशा
समर्पण दिखाना होगा
या कभी कोई
होगा समर्पित
मेरे प्रति भी??

पूजा डालमिया
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  पुखराज यादव"पुक्कू"


        नर्क
हे मानव..! कहाँ पहुंच गया है।
काला अंधकार हो जैसे गागर में।
नर्क द्वार है खड़ा,देख सही,
पाप भरा पड़ा हो जैसे सागर में।
लुट लालच लोभ भर मन है ।
पाँव पसार न तू फटे चादर में।
मनु-मनुज का है ना अनुज का,
टकराते जैसे द्वंद हो बादर में।
रोता होगा जन्मदाता देख हमें,
हमने नर्क बना दिया भवसागर में।
भ्रष्ट भटकाव भ्रमित करना काज,
मति मनचला मनुज है भ्रमाकर में।
रहते समय सार समझले समझाऊँ,
पृथ्वी परम देवस्थल आओ बताऊँ।
ना निर्मित करो इसे नर्क द्वार तुम,
पुक्कू पाठ पढ़ फिर आओ बताऊँ।

               
         पुखराज यादव"पुक्कू"
            सोनासिल्ली, फिंगेश्वर
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स्वराज सेनानी


ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए
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पढ़ लिख कर भी जहां भटक रहे नौजवान
जहां मुमकिन नहीं है अमन ओ ईमान
मजबूर हैं आवाम और मुश्किल में है जान
ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए .....
जहां आदमी की घात में हर पल है शैतान
जहाँ दहशत में जीते हों हरदम इंसान
कानून है बुजदिल और मुजरिम बलवान
ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए .....
शान्ति और सुरक्षा का नहीं दिखता कोई निशान
जहां मुश्किल में इस्लाम और बेबस है कुरान
यह हालात जिसने बनाये हो उन्हें ही मुबारक
ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए .........
ठिठुर रही घाटी उर सुलग रहा इंसान
सत्तर साल से ये भू भाग बना है श्मशान
मुसीबत में है रियाया और मज़े में सियासतदान
ऐसा स्वर्ग हमें नहीं चाहिए .....

On 4 July 2017 at 03:47, Swaraj Senani

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विशाल गर्ग


रिश्ते
आसमान से हरदम ऊँचे सागर से गहरे रिश्ते
खून के रिश्तों से भी बढकर गहरे होते दिल के रिश्ते।
रिश्ते होते हैं बेहद अनमोल
बस अपनों की खुशियाँ ही होती हैं इनका मोल।
एक बार जो टूटे रिश्ते दोबारा नहीं जुड पाते हैं
अगर दोबारा जुड भी जाये दर्द गांठ का सह नहीं पाते हैं।
रिश्ते होते हैं इंसान की जीवनभर की पूँजी
रिश्ते होते हैं इंसान की सफलता की कुँजी।
दुनिया क्या है रिश्तों का एक जाल है
इस जाल को जोडकर न रखने वाला मनुष्य कंगाल है।
पैसे होते जेब में तो चार लोग रिश्ता बनाते हैं
जरा गरीबी आ जाये तो वहीं लोग साथ छोड जाते हैं।
हम सब अपनों का रखे ख्याल
अपने-अपने रिश्तों को रखे संभाल।
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सर्वेश कुमार मारुत


सुंदर पंखों वाली तितली
       रंग रंगीली प्यारी तितली।
पंखों को तू है फड़काती।
       फूल-फूल पर है मंड़राती।
फूलों को तू बहुत चाहती।
       फूल बिना प्यासी रह जाती।
फूलों से तू रस है भरती।
       और ना जाने क्या-क्या करती?
कठिन परिश्रम तू है करती।
       मानव से तू बहुत है डरती
-------------.
कुछ तो बोलो,कुछ तो बोलो।
                       बेटा अपना मुँह तो खोलो।
                                मेरा नन्हा राजा बेटा अब,
                                उठो अभी डोलो रे डोलो।
                       मम्मी मुझको भूख लगी है,
                       पहले मुझको खाना दे दो।
                                 मम्मी बोली चल हठ शैतान,
                                 पहले अपने हाथ तो धोलो।
                       बेटा बोला हाथ न धोयें तो,
                       क्या होगा कुछ तो कह दो?
                                  कुछ तो बोलो,कुछ तो बोलो।
                                  मम्मी अपना मुँह तो खोलो।
                       मम्मी बोली तब बेटे से,
                       बात ध्यान लगाकर तुम सुन लो।
                                   इन हाथों में कुछ कीटाणु,
                                   बस जाते हैं यह सुन लो।
                       खाना खाएंगे इन गंदे हाँथों,
                       बीमार पड़ जायेंगे हम सब तो।
                                    कुछ तो बोलो, कुछ तो बोलो।

-----------------.
  नभ खुली आंखों से देखे,
               दुःखी दिख रहे हैं सारे।
दूषित बसन यह कैसे छाय?,
               भीड़ लगाए पर सब हारे।
शून्य का मन क्यों व्याकुल?,
               और आंखों में छाय आंसू रे।
क्यों अश्रु गिराए ऐसे उसने?,
               धरा पर टप-टप, टप-टप रे।
धरा व्याकुल विचलित सी फ़िरती,
               भीग क्षीण तन-वसन-दामन रे।
तुषार आपतित पुञ्जित  है ऐसे,
               खंडित दर्पण-अर्पण सा रे।
रवि उठकर इठलाता शनैः- शनैः,
               भोर हो चली अब तो रे।
इठलाता बिलखता प्यासित है देखो,
               अब कुछ ना तो उसे फरे।
धरती सहमे दामन बचाये शर्माये,
               होंठों पर होंठों को रखते हुए।
भानु भी अति मस्ती से पीता ही रहा,
               लव-तन-केश-कपोल सारे।
धरा के उज्ज्वलित होंठों से,
               तृप्त हो चला अब तो धीरे -धीरे।
तीनों पहर गुज़ारे हमदम ने,
               इठलाते-फड़फड़ाते उमंगित मन में रे।
क्षण होता, ना बातूनी और अलसाया;
               नन्हें-नन्हें पैरों पर चला जाता रे।
धरा रवि का भी क्षण आया,
               दुःखित करुणामय युगल तब से रे।
पोटली बाँधती धरा क्यों है?,
               अधर मुरझाये लालित भास्कर अब रे।
चला-चला,चला-चला दिग् परिवहन,
               चढ़ चला बैठ पश्चिम गाड़ी से रे।
हाथ हिलाए होंठ छिपाए,
               उसकी लालिमा भू को लख ना पाई रे।
अंश छोड़ा, कालित पहर और शांत निशा;
               व्यथित आँखों में मोती से रे।

-------------------.
मस्त पवन का झोंका देखो, वह इतना क्यों इतराता?
तरु भी इसके आने से डोले, और इन्हें है लचकाता।
कली खिलीं, मंगल में खग, और पत्तियों को खनकाता।  
कृषक खेतों में रमें , सियारों का शोर उधर से आता।
  इसके आने से यह जग सारा, देखो कैसे इठलाता?
मस्त पवन के झोंके के बल, शिशु घुटबन चल जाता।
उठता-गिरता बस इसी तरह से, है देखो चल पाता।
मां देखे उसे दूर खड़ी, और उससे रहा ना जाता।
पकड़ उसे हाथों से, उसे अपने हृदय पर ले जाता।
कुछ खुशी-कुछ गम भी, क्या उसका हृदय सह पाता?
उधर मस्त पवन का झोंका, धीरे-धीरे बढ़ता चला जाता।
गया वह नदी पोखरों-सागरों से, देखो कैसे लड़खाता?
माना रोया हो आकाश, और आँसू नीचे आता-जाता।
मस्त पवन का झोंका, देखो लोगों को कैसे तड़पाता? 
जैसे निकले हो प्राण वदन से, ऐसे शरीर बलखाता।
धीरे-धीरे मस्त पवन का झोंका, आगे बढ़ता ही जाता।
उसे मिले जब खेत खलिहान,फ़िर देखो कैसे लहराता?
मानो पी मदिरा झूमे मस्ती में, अपने कदमों को लड़खाता। 
उसे मिली पीली सरसों, समझ आमतरु फिर उसे हिलाता।
मैं अचरज में पड़ा हूं ऐसे , सरसों पीली या धान हों पीले।
पर अनजान हूँ क्यों?, पर जो भी हो मस्त पवन इतराता।
छाई धूप पीली सरसों, फड़की बाली हर तिनका-तिनका।
पर कुछ ना कुछ तो, धरा पर भी है छिड़काता जाता।
पर कृषक की कृषि पर, मेला लगाता ही चला जाता।
मानो कर ली लीला इसने, इस तरह से खेतों को गिराता।
मस्त पवन का झोंका मिला, वन उपवन मंदिर धाम से।
तीव्र चाल तीव्र वाक से ,इनको कैसे नृत्य कराता?
मानो आकाश  गरज-गरज कर, और गुज़र जब जाता।
याद नहीं पर लोगों को,  बस याद यही रह जाता।
क्या गरजा था-क्या गुज़रा?, बस सहम हृदय तक रह जाता।
हाथ लगाओ इसको तो बस,  छूकर एहसास कराता।
लहू पड़ा था ऐसे मानों, आकाश पड़ा हो लाल निरा।
इसे देख बह-बह कर, सुखा के आगे बढ़ता ही जाता।
चटके पेड़ पड़े थे ऐसे, मानों टूट चुका था तारा।
पर इठलाता- बलखाता, इस जग में बहता ही जाता।
कुछ आशियाने क्षतिग्रस्त किए, और कुछ को किया वेगाना।
इसे दुःख नहीं अफसोस नहीं, इसे तो बस है बढ़ते जाना।
मिलाप किया इसने शीतलता से, तब उससे रहा नहीं जाता।
लवों पर खुशी छाई है ऐसे, मानो पूर्णिमा का चांद निकल आता।
पर मानव शीत ऋतु में तड़पता,  और इसको सह ना  पाता।
ठिठुर चुका वह पूरा  है, और दांतों को है किट- किटकाता।
मानव ग्रीष्म ऋतु में तड़पा इसके बिन, याद तभी कर पाता।
पर यह बवंडर लाया ऐसे, मानो आसमान भू पर हो आता।
पेड़ों के झड़ चुके पात्र अब, फिर वसंत में है चिलकाता।
इसको देख मस्त पवन ने भी, मानो इन्हें अपना दर्पण बनाया।
इसे देख अति मस्ती में, इठलाता-बलखाता कुछ दीदार किया।
इस पर भी इसका वश कहां?, प्रतिबिंब स्वयं साथ-साथ बिलखाता।
पर कुछ गम है-कुछ हताशा भी, जब होली की दहकी ज़्वाला।
अपने तीव्र वेग से ज्वाला की गति, और बढ़ाता ही चला जाता।
मस्त पवन का झोंका अरि मस्ती में, बहता-बहता-बहता जाता। 
दहक उठी होली की ज्वाला, लपटें अंबर तक ले जाता।
धूम्र-धाम जा पहुँचा शिखर पर, मानो कोई बवंडर आया।
मस्त पवन का झोंका इसमें, फ़िर नहीं बिल्कुल दिखलाता।
पड़ी होली की अग्नि ठंडी, इसकी राख़ धीमे-धीमे ले जाता।
पड़ चुके थे पेड़ पके, पके थे सारे गली चौबारे और सरिता।
कलियां सूखीं- खुशबू फ़ूटीं, सूने पड़े खेत-खलिहान और धरा।
चकाचौंध आसमान पड़ा था, उधर सूर्य बन चला था राजा।
पर मस्त पवन के झोंके को डर था, पर साहस था बांधा।
हुई न वर्षा सूखे कृषि अम्बर. सम्पूर्ण धरा का जन सारा।
मस्त पवन के झोंके ने भी, साथ दिया भास्कर राजा का।
अदृश्य करवा दिया, नदी-पोखर-गड्ढों का सलिल सब सारा।
पर मस्त पवन का झोंका देखो, बढ़ता- बढ़ता-बढ़ता जाता।

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                सर्वेश कुमार मारुत
नाम-  सर्वेश कुमार मारुत
जन्म तिथि:- 15-07-1988
पिता-  श्री रामेश्वर दयाल
माता- श्रीमती माया देवी
पता:- ग्राम व डाo - अंगदपुर खमरिया, थाना-भुता, तहसील-फरीदपुर ,ज़िला:- बरेली (उo प्रo)
पिन नo:-243503
शिक्षा:- बीo ए o, एमo एo ( अर्थशास्त्र )  और  बीo एडo
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शंकर परगाई


 
1 .मौसमी बरसात
 
बादलो के
झुंड के झुंड
उतर रहे है
ऊंचे पहाड़ों से
बेहद पास जमी के
बांध लेते है
फिज़ाओं को
भर आते है पहाड़ों के
गाढ़ गधेरे जब
शहरों में छ्तों पर 
नाली सड़कें चढ़ आयी है
सब उफान पर है
बरसाती मौसम में
दूर घाटियों से
निकलता पानी
दून की सड़कों पर
बह रहा है
अपने ही अहम में
अपने ही गुमान में
हैरान वो भी है
बारिश के इस तरह होने से
हैरान लोग भी है
कि अब
बारिशों ने धूप को
जकड़ लिया है
मजबूत पकड़ से
आखिर डर है उन्हें
कहीं मौसम
फिर से न बदल जाये
क्योंकि धीमे धीमे
जमी घूम रही है
पहाड़ खिसक रहा है
बादल उड़ रहे है ।

 
 
2.  शब्द चलते हैं
 
शब्द चलते हैं
जन्म लेते हैं
जीवन से
जीवन चलता है
अनवरत क्रिया से
क्रियाओं का बल तुमसे
जितना गहरा मन है
जुड़ा तुमसे
उतनी ही गहरी
शब्दों की सीमा
नापना पड़ता है
फिर भी मुझको
गोता लगाते हुये
शब्दों की गहराई का परिमाप
  चुनने पड़ते है शब्द
फिर भी मुझको
जब बिंधे हुए है
गहरे तुमसे
जब छिपी हुयी है
अनगिनत छबियाँ तेरी
गोया
खयाल रखता हूँ मैं 
लिखे जाने पर शब्दों का
कि उनमें जीवन का ही गीत हो
आखिरकार
शब्द जन्म लेते है
शब्द चलते है
बढ़ते है आगे
जीवन से
जीवन चलता है
अनवरत क्रिया से ।
.......शंकर परगाई

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-सागर यादव 'जख्मी'

(नजर ना आ सकूँ खुद को मैं इतनी दूर जाऊँगा)

1.
नजर ना आ सकूँ खुद को मैं इतनी दूर जाऊँगा
मैं शीशे की तरह बेशक किसी दिन टूट जाऊँगा
अभी इक दूसरे के हम बहुत नजदीक हैँ पर कल
मुझे तुम भूल जाओगी तुम्हेँ मैं भूल जाऊँगा

2.
लगाकर पंख साहस का फलक पे पाँव रखना है
सुना है अब पतंगे को शमाँ की माँग भरना है
हमेँ इक दूसरे से दूर मत करना जहाँ वालोँ
हमेँ इक साथ जीना है हमेँ इक साथ मरना है

3.
तुम्हेँ विस्की नहीँ मिलती हमेँ भी रम नहीँ मिलता
मुहब्बत के परिँदोँ को अगर जंगल नहीँ मिलता
जमाने मेँ दवा की सैकड़ोँ दुकानेँ हैँ लेकिन
हमारे दिल के जख्मोँ का कहीँ मरहम नहीँ मिलता

4.
पहरेदार गहरी ,निद्रा मेँ सो रहे हैँ
धन के लोभी धरम ,से विमुख हो रहे हैँ
सरकार की गंदी ,नीतियोँ के चलते 'जख्मी'
गरीब और गरीब,धनी-धनी हो रहे हैँ

5.
कोई पिता अपने,बेटे से जुदा ना हो
मेरे मौला वक्त,इतना बेवफा ना हो
मुझको ऐसा सफर,सनम अच्छा लगता है
मेरे साथ मेँ तुम हो,मंजिल का पता ना हो
----
(मुझे अधिकारी बनाने का,पापा का सपना टूट गया)

1.
मुझे अधिकारी बनाने का,पापा का सपना टूट गया
इक जरा सी भूल के कारण,मेरा घुटना टूट गया
इश्क-विश्क करने वालोँ का,होता है अंजाम यही
पल दो पल प्यार किया फिर,उनका रिश्ता टूट गया

2.
अमीरोँ के महल मेँ प्रीति की चादर नहीँ शायद
जमाने मेँ मुहब्बत की कोई कीमत नहीँ शायद
जिसे देखो वही हमको घृणा से देखता है अब
हमारा दिल किसी के प्यार के लायक नहीँ शायद

3.
मुझे मुझसे चुराने की शरारत कौन करता है
अँधेरी रात मेँ मेरी इबादत कौन करता है
वो मेरी खूबसूरत शायरी पर मर मिटी होगी
नहीँ तो हम गरीबोँ से मुहब्बत कौन करता है

4.
खुदा के सामने हमसे कभी सजदा नहीँ होता
फकत मजबूरियाँ हैँ इसलिए ऐसा नहीँ होता
हमारी मुफलिसी पर तुम अगर हँसते नहीँ 'सागर'
मै सबके सामने यूँ फूटकर रोया नहीँ होता

5.
घिनौना कर्म करने से मना कोई नहीँ करता
अमीरोँ की कड़ी आलोचना कोई नहीँ करता
हमारा दिल दुखाने की खता सब लोग करते हैँ
हमेँ दिल से लगाने की खता कोई नहीँ करता

------------.
(तुम्हेँ दिल्ली बना देगी हमेँ गोवा बना देगी)


तुम्हेँ दिल्ली बना देगी हमेँ गोवा बना देगी
सियासत एक दिन सबको कोई कस्बा बना देगी

तुम्हेँ जब देखता हूँ मै जमाना भूल जाता हूँ
तुम्हारी ये हँसी मुझको कभी राँझा बना देगी

मै अपना हर इरादा आसमाँ से ऊँचा रखता हूँ
मुझे मालूम है किस्मत मुझे राजा बना देगी

बुजुर्गोँ की दुआ 'जख्मी'कभी जाया नहीँ जाती
बुजुर्गोँ की दुआ तुमको खरा सोना बना देगी

-----------.
(गरीबोँ को कभी सुख चैन से रहने नहीँ देते)

गरीबोँ को कभी सुख चैन से रहने नहीँ देते
हमारे देश के नेता सुमन खिलने नहीँ देते

कोई कायर नहीँ हैँ हम जो विपदा देखकर रोए
हमारे हौसले हमको कभी झुकने नहीँ देते

हमारे रोने से कुछ उनको भी तकलीफ होती है
मगर वो आँख से आँसू कभी बहने नहीँ देते

हमेँ भी गाँधी के जैसा सरल इंसान बनना है
मगर कुछ लोग ऐसे हैँ जो सरल बनने नहीँ देते
------.
(अगर हो सके तो)

सदा मुस्कुराना अगर हो सके तो
न आँसू बहाना अगर हो सके तो

मेरी तिश्नगी अब तुम्हीँ से बुझेगी
जरा पास आना अगर हो सके तो

कहीँ कट न जाएँ मेरे सोच के पर
खुदा से मनाना अगर हो सके तो

मेरे प्यार को तुम भुला ही चुके हो
मुझे भी भुलाना अगर हो सके तो

तुम्हेँ जब सताये कभी याद मेरी
गजल गुनगुनाना अगर हो सके तो

कहीँ प्यार का दीप जलता नहीँ अब
बदल दो जमाना अगर हो सके तो



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प्रदीप उपाध्याय


कभी था बरगद का पेड़ वहाँ

कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
लगता जैसे काँपती सूरज की तपन
बच्चें-बूढ़े और युवाओं की मण्डली
जमाये रहती थीं चौपाल वहाँ
सुबह हो या फिर शाम
और देर रात तक
जमे रहते थे लोग जहाँ
करते गपशप और वार्तालाप
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ
जिसके नीचे मौसी की दुकान
चाय पीते खाते चने परमल
आते हैं याद वे दिन
समय के क्रूर हाथों
दे दी गई बरगद की बलि
और तन  गया वहाँ कांक्रीट का जंगल
अब नहीं वहां बरगद की छांव
सूरज करता अट्टहास वहाँ
कैसे   बचेंगे उसकी तपन से
आते हैं याद वे दिन जब
कभी था बरगद का पेड़ वहाँ।
छूट गये हैं कई संगी-साथी
बिछुड़ गये हैं अपने सारे
लगता है भला था अपना बचपन
और बेफिक्री की वह जिन्दगी
अब तो रह गई हैं यादें ही शेष
और हम भी रह जायेंगे यादों में
ठीक उस बरगद की तरह।।
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सूर्य करण सोनी

"अग्निवृष्टि"


शीर्षक :- बंग प्रदेश

कटुता द्वेष
मिटती मानवता
बंग प्रदेश
***********
अस्मतें लूटी
मरघट पसरा
बंग प्रदेश
***********
खंडित देश
तुष्टिकरण राज
बंग प्रदेश
***********
जलती झुग्गी
अदृश्य सेकुलर
बंग प्रदेश
**********
सत्ता का मद
चुभता जनादेश
बंग प्रदेश
***********
शिक्षित नारी
हद तोड़ती सारी
जाति विशेष
***********
धर्म विशेष
कुंठित परिवेश
बंग प्रदेश
***********
दुर्गा पूजा
मुहर्रम से ऊँचा
बंग प्रदेश
***********
वीरों की भूमि
संस्कृति अशेष
बंग प्रदेश
***********
मैला आँचल
स्मृतियाँ विशेष
टेरेसा वेश
***********
केंद्र भी मौन
उलझे अब कौन
बंग प्रदेश
************
घुटते प्राण
है पाश्विक इंसान
बंग महान
***********
अथक श्रम
करें शोषित जन
भादो सावन
**********
  पपीहा बोला
मचला तन मन
भीगा सावन
**********
  गुरु चरण
पड़े घर आँगन
हर्षित मन
***********
बंजारापन
  ले जायेगा मुझको
  तुमसे दूर
*************

जल मछली
तड़पे बिन पानी
मेरी कहानी
*************

उषा किरण
इठलाती पवन
मानो बसंत
*************
आया सावन
जलती बिरहन
चाहे साजन
*************
दूर क्षितिज
सविता वसुधा का
प्रेम मिलन
**************
नदी तट-सा
जीवन तेरा-मेरा
अमृत धारा
**************


सूर्य करण सोनी
"अग्निवृष्टि"
0000000000000000000

- बृजमोहन स्वामी 'बैरागी'


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शीर्षक - हैरानी सारी हमें ही होनी थी
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हैरानी कुछ यूँ हुई
कि उन्होंने हमें सर खुजाने का
वक़्त भी नहीं दिया,
जबकि वक़्त उनकी मुट्ठियों में भी नहीं देखा गया,
लब पर जलती हुई
सारी बात हमने फूँक दी
सिवाय इस सिद्धांत के
कि हमने सपनों की तरह
आदमी देखे,
जबकि 'सपने' किसी गर्भाशय में पल रहे होते तो
सारे अल्ट्रासाउंड
घड़ियों की तरह बिकते
और हम वक़्त देखने के लिए सर फोड़ते,
मेहँदी की तरह लांछन लगाते,
सिगरेटों की तरह घर फूंकते,
कुत्तों की तरह बच्चे पालते,
रक्तदान की तरह सुझाव देते,
एक हाथ से ताली बजाते,
औरतें चूड़ियों में छुपाती 'सुहाग'
आदमी बटुओं में 'सुहागरात' छुपाते
और भाट पूरी रात गाते विरुदावलियाँ
सच बताऊँ तो हुआ यूँ था कि
जब हमने आज़ादी के लिए आवाज़ उठाई
तो हमारी अंगुलियां बर्फ की तरह जमी हुई मिली, हमारे गलों में
और हमने तकलीफों को
मुद्दों की तरह उठाया
जबकि 'रोना' कॉलेजों के शौचालयों में ही घुटाकर मरा
बाहर हमारे बनाये पोस्टर दम तोड़ते गए।
हमने हयात फूंकने की ज़हमत उठाई
और हड्डियों के बुरादे को
रोटियों में मिलाकर खाया
ताकि एक पीढ़ी बचा सकें।
प्यार के दरवाज़े हमारे लिए सिर्फ
स्कूलों की उबासियों में टिफिन की तरह ही खुलते थे
और चीन के साथ लड़ाई की
खबरों के साथ हमने नींद के केप्सूल खाये,
जबकि बीच रात पालने में खेलते
हमारे छोटे बहन-भाइयों का बदन
दैनिक जागरण और भास्कर नामक अखबारों से पोंछा जाता रहा
उनमें इसी दुनिया के लोगों के मौत की खबरें थी
हमने बिस्तरों की चादरें खींच कर
अपने बदन और चेहरे को ढक लिया था
समझदार प्रेमिकाओं की तरह।
अपनी महानता के नियमों में
मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
सान्त्वना देने के बहाने
हमने धरती रोककर
उनका मांस सहलाया,
पावरोटी सी फूली बाजुएँ लिए फिरे,
आपत्तिजनक टिप्पणियाँ
कागजों में ही सोई रही।
संयोग से
आदमी ही हथियार बनाया गया
नौकरी सिर्फ विज्ञापनों में रही,
क्रन्तिकारी तस्वीरों में चले गए,
अंगूरों पर मौत लिखी गई,
टीवी, रेडियो और मोबाइलों पर जिंदगी
अब जाकर नशा टूटा
आज़ादी का असली मतलब देखा
हमने उन्ही रास्तों में पिरोये दस्तखत
उन्हीं सपनों को जिया
जो हमारे सर काटना चाहते थे
जबकि रेलगाड़ियों के आगे कटकर मरना सस्ता था।
सबकुछ छीनने के बाद भी
उन्हीं सांसों में सहारा लिया गया
जो सिर्फ 'सांसें' थी
और गुनाह सिर्फ इतना था
की हमने
घटनाओं का विरोध करना अपने बच्चों को सौंपा !!
बेज़ुबां दास्ताँ ये...
कितने दर्द छुपाएगी?
----------------------------------------

(1)घर लौटना और सौ बरस जीना
---------------------------
ख़ुशी के कुछ मायने
बोलकर नही बताये जाते
जैसे
आप चाय या पैसे के लिए बोलते हैं
और ख़ुशी
किसी भी वक़्त टपक सकती है
बिना बताये, खबर दिए
पर आपका स्वागत है...
ये महज़ एक शब्द नहीं
फूल है
जो खिलता है यूँ नागफनी...
ख़ुशी तब भी झलककर आयेगी
जब आपका फोन चार्जर के अभाव में
दम तोड़ देता है
उस मौके पर यह
पड़ोसी के लैंडलाइन तार से होकर आती है, जबकि
इसके लिए आपके बेटे को
किसी सरकारी नौकरी या
तनख्वाह मिलने की देर होती है।
ख़ुशी के मायने
अलग अलग होते है
वे हथेली पर धरे होते हैं
उनमें आपकी बाकी बची जान होती है
ख़ुशी, खबर है, यह कानों कान होती है
आपके दिल का टुकड़ा ही
मुझको छलता है !
यह आपकी ख़ुशी हो सकती है
जबकि मेरा रोना सर्वनाम शब्द है
ख़ुशी बदलती रहती
जैसे कोई  मौसम है ,
एक बुलेटिन में है
जो रोज़  बदलता है !
एक ख़ुशी को 'ख़ुशी' बनाने की जद में
सौ गुनाह  माफ़ करते हैं
जैसे तौलिये से बाल झटककर
अभिनेता को रिझाती अभिनेत्रियाँ,
ख़ुशी एक कद्दूकस जैसी
आदमी के लिए बहुत कीमती है।
तमाम झुटे गवाहों और बयानों को
मध्यनजर रखते हुए,
घबराई सांसों और कजलाई आँखों को लेकर जब हम
अपने अपने घरों को लौटाना चाहते हैं
तो खुशियाँ  माओं की तरह
कहती हैं
कि सौ बरस और..
तुम्हें जीना ही चाहिए।


(2) दम तोड़ती विडम्बनाएं और आज़ादी
---------------------
हमारे लिए मरने वाले
सबसे बहादुर लोगों ने
अपने जन्मदिन
रूठी हुई प्रेमिकाओं  की तरह
नही मनाये
या किसी दूसरी तरह भी नही मनाये
इस इंतज़ार में कि
हम सबका मत एक होगा,
पर हमारी सीमाओं तक
पहुंचते पहुंचते
विडम्बना इस कदर दम तोड़ गई
कि उन्होंने जो कहा
वह मैंने और आपने नहीं सुना।
मिसेल फोको समेत तमाम लोगों ने
अपने मोम जैसे हाथों से
कागजों पर खून से लिखे
मलाई की तरह बिलोये हुए शब्द
उससे बहुत अलग हमने पढा
या ज्यादा कहें
तो हमें ज़बर्दस्ती पढ़वाया गया
ताकि हम क्लास की सबसे आगे वाली बेंच पर बैठ सकें
और हर महीने हमारे गार्ज़ियन
ऑफिस में अकड़ अकड़ कर
प्रिंसिपल को महानताएं बता सकें।
आज़ादी कैसे मिली
किसको मिली
और कितनी मिली
ये बातें हमारे भीतर जाकर
बिलकुल भिन्न अर्थों में खिलखिलाई और यह आखरी से आखिरी बात
आप मेरे ऊपर थोपेंगे
कि मैंने कहा है।
ठीक इसी तरह
उन खून से भी लाल दस्तखतों
और इतिहास में दी गई
सबसे सफेद गवाहियों को
नहीं समझा हमने,
इसके बाद
चाय पीकर
उपनिषद के ऊपर कप रखे
गाने सुनकर
बाइबिल पर इयरफोन रखे
और दुनियां को बताना चाहते हैं
कि
हमने
आज़ादी का मतलब सीख लिया।


(3)
इंसाफ मांगती लड़की
------------------------
"आफरीन" नाम की लड़की ने
अगर इंसाफ माँगा होता
तो क्या उसे मिलता?
शायद हज़ारों बेज़ुबान लड़कियों के मामलों की तरह फाइलों में दम तोड़ देती।
यह बात किसी न्यूज़ में नहीं आई।
अँधेरे ही में रोल कट करना
और फ़िर अख़बार में छपना
ऊपर से जो पारिश्रमिक मिला
वो लेकर हम घर आए
ताकि हमारे बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ें।
ज़िंदगी यूँ ही !रिश्तों में लूटी।
लेकिन
इंसाफ मांगती लड़की की आँखों में किसी ने नहीं देखा।
हम सब दोबारा से बौने होते गए,
हमारी आत्माएं मिट्टी हो गई
आत्माएं उपकरण भी बनी
इसलिए हमारी आत्माओं ने
खुद को ही बताया
कि
बंदिश तोड़ ही देती हूँ सब ,
हाव - भाव  पर  जब  हो !
-------------------------------------
लेखक परिचय
कवि बृजमोहन स्वामी 'बैरागी'
(उपनाम - कवि बैरागी)
पता -
बरवाळी, नोहर
हनुमानगढ़ जिला
राजस्थान (335504)
नागरिकता - भारतीय
शिक्षा-  बी एस सी , जीव् विज्ञान
             स्कूल अध्यापक कोर्स
कार्य क्षेत्र-  कहानीकार, नाटककार
फ़िल्म राइटर, रंगमंच कर्मी
और राजस्थानी भाषा मान्यता आंदोलन में सक्रिय योगदान
वर्तमान -  स्कूल अध्यापक,
और
जिला अध्यक्ष,
राजस्थानी भाषा संगर्ष सेना
(हनुमानगढ़ इकाई)

© बृजमोहन स्वामी 'बैरागी'
     (हिंदी प्रगतिवादी लेखक)
सम्पर्क सूत्र - birjosyami@gmail.com
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  सोम पिनाकी पटेल


कौन हूं मैं
1ः-
कौन हूं मैं
एक आत्मा या एक शरीर
या हूं मिट्टी, जो है नम
जिसे सब अपने हिसाब से
रूप देने को हैं आतुर
जैसे शराबी अपनी तरह
अपने साथी को बदलना चाहता
जब भी सोचता हूं है एक शरीर
बंध जाता है रिश्तों के डोर
प्रेम औ अहसानों के बंधन में बंध जाता
सामाजिक भय धर दबोजता
हंसी के पात्र बनने का डर लगता
और हो जाता पिंजरे में कैद
एक पंछी की तरह मजबूर
जिसकी प्रवृत्ति है
उन्मुक्त गगन में उड़ना
पर लोग उसकी जान के डर से
उसे बाहर निकलने नहीं देते
क्यों नहीं देख पाता
स्वयं को आत्मा के रूप में
जिसे न गिरने की परवाह
न सामाजिक बेईज्जती का डर
जिसे न कोई जकड़ सकते
न कोई कैद कर सकते
जो अपने मनमाफिक
उड़ सकता है उन्मुक्त गगन में
2ः-
कौन हूं मैं
एक पुत्र, एक पुत्री
एक भाई, एक बहन
एक पिता, एक माता
एक पति, एक पत्नी
एक मित्र, एक शत्रु
या सामाजिक प्राणी
बिना उधार लिए
बनाया जाता है ऋणी
और बिना लिए कर्ज के लिए
आपके तरफ घृणा से देखते
चीखते चिल्लाते आदमी
रिश्तों में होने चाहिए
पूर्ण समर्पण और प्यार
जो हमारा है ही नहीं
उस पर भी हमारा लोभ
एक दिन छोड़ छाड़ के
चला जाएगा रोक सके तो रोक
3ः-
ईमानदारी से करना चाहिए
हमें अपना हर काम
क्योंकि इसी से बदलता है
नजरिया दुनिया को देखने का
सुनो सबका
पर किसी को तब तक न कहो
बन जाओ जब तक कहने लायक
समरथ को नहीं दोष गोसाईं
कह गए हैं रामभक्त तुलसीदास भी
अपने महाकाव्य रामचरितमानस में
शक्तिशाली का वचन सर्वमान्य
ज्ञान की बातें भी व्यर्थ है सामान्य
अपने विचारों का आदान प्रदान
अपने समान लोगों से करें
खग ही खग की भाषा जानता है
ज्ञानी के लिए बेमतलब
अज्ञानी के सामने बनेंगे हंसी का पात्र
मन चांद की तरह हैं चंचल
हर रात्रि बदलता है अपना आकार
इसे बनाएं हम
सूर्य की तरह स्थिर और ज्योतिर्मय
हम दूसरों की तरह नहीं बन सकते
हमें अपने ही तरह बनना है
               


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प्रवीण


   "Guru Kripa "
एक  शील    अश्लील रूप में,
मिला राह में      राही को ।
देख उस पत्थर को यूं -
आई  दया  उस  राही  को ।
सोचा, करूं उद्धार मैं,
इस निराकार पत्थर का,
दे रूप इसे   मूरत   का ।
चोट-चोट से, खोट - खोट के ,
खोट दूर पत्थर का करके,
रूप हृदय का उसमें उतार,
किया शील का उद्धार ।।
रहता यूं ही पड़ा हुआ,
पैरों की ठोकर खा-खा,
जीने पर शरमिंदा होता,
जो शिल्पी ने न चुना होता।।
ऐसे तो, था, शील  मात्र,
पूर्ण   उपेक्षा  का   पात्र !
आई महत्व उसमें तब, जब -
गुरु ने बनाया अपना छात्र ।।।
                 
                                            प्रवीण
-----#----#----##---#-#----$$-
       "Nimitt "
यूं जिज्ञासा होती सबमें आजन्म ,
होती चलने-बढ़ने-उड़ने की शक्ति , 
पर  न  होती  दिशा  की      सख्ती  ,
जिसका    देते   गुरु    ही   ज्ञान,
जिनको  अपना  निमित्त  मात्र
बनाते हैं                   भगवान ।।।।।
                                              प्रवीण
Pravin Kumar Sharma from Panjwara, Dist :- Banka, Bihar ,pin :- 813110

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मंजरी गर्ग


जिंदगी!!!....????

ये जिंदगी बड़ी ही हसीन है...
सच में कुछ ज्यादा ही रंगीन है।

पहले आसमां में उड़ाती है...
फिर जमी पर लाती है।

पहले ख्वाब दिखाती है...
फिर नींद से जगाती है।

पहले उम्मीदें बढाती है...
फिर सच्चाई दिखाती है।

पहले बदलाव लाती है...
फिर उन्हीं में ढलना सिखाती है।

पहले इतराना सिखाती है...
फिर आईना दिखाती है।

पहले हालात बनाती है...
फिर उनसे लड़ना सिखाती है।

पहले सहना सिखाती है...
फिर बोलने पर मजबूर कराती है।

इस जिंदगी के बहकावे में ना आना यारों,
ये पहले तो हमें हमारे डर से भगाती है...
फिर भगा भगा कर उस डर के करीब लाके,
उसी का सामना कराती है।
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मोहम्मद अली अहमद अंसारी 


कहना है तुमसे
पर अल्फाज नहीं है
फ़िर भी चंद शब्द है कहने को......
तुम साथ होती तो कैसा होता
साथ चलती तो कैसा होता
तुम रूठती तो कैसा होता
मैं मनाता ,
वो मनाना कैसा होता
चाँदनी रात में
अँधेरी गली में फिसल जाना कैसा होता
मैं और मेरा अकेलापन
ये सवाल करते हैं
तुम होती तो कैसा होता........?
प्रेम हो या सड़क
यूँ गुज़र जाना कैसा होता
कांटों के रस्ते पर
कोमल हृदय लिए लथपथ  चले जाना कैसा होता
कैसा होता अगर साथ होती
कैसा होता आज़ाद पंख लगाए  चले आती तो
बागीचे में बैठ कर
यूँ तुम्हें तकना कैसा होता
मैं और मेरा अकेलापन
ये सवाल करते  है
तुम होती तो कैसा होता........?
बाबूजी को देख कर
छुप जाना कैसा होता
कैसा होता
जब भावी पूछती कहाँ थे    तब से
वो खामोश खड़ा होना कैसा होता....
तुम्हारे छत पर आने के इन्तेज़ार में ,
गली में टकटकी लगाना कैसा होता
कैसा होता जब दोस्त तुम्हारे नाम से हँसी ठिठोली करते
कैसा होता जब तुम्हें घुमाने
चोरी छुपे भईया की गाड़ी ले आता
कैसा होता जब एक आइसक्रीम में
दोनों मिलकर खाते
मैं और मेरा अकेलापन
ये सवाल करते हैं
तुम होती तो कैसा होता...........?

मोहम्मद अली अहमद अंसारी 
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नन्दलाल भारती


।। राजा की चिन्ता।।
राजा किसी सल्तनत का नवाब नहीं है
एक मामूली सा गाय का बछड़ा है
नाम है राजा,
एक वक्त था जब ऐसे राजा
खेत, खलिहान और दरवाजे की
शान हुआ करते थे
जिनके श्रम से उपजे अन्न पर
पलता था देश
लोग राजाओं की पीठ थपथपा कर
अपनी मूंछ तक ऐंठते थे
मशीनों की घुसपैठ क्या हो गई
राजाओं का जीवन खतरे में पड़ गया
राजाओं की एक पूरी पीढ़ी की
बोटी बोटी हो चुकी है
नई पीढ़ी पर चोर निगाहें टिकी हुई हैं
कम उम्र के राजा भेलख पड़ते ही
गायब हो जाते है रात के अंधेरे में
जिनका सुराग फिर कभी नहीं मिलता
लगेगा भी कैसे ?
बना दी जाती है उनकी मनचाही बोटियां
मेरे राजा यानि गाय के बछड़े पर भी
चोर निगाहें बिछी रहती है
शरीर से अक्षम पिता
रात के अंधेरे के खौफ़ से
पीटते रहते है लाठी
राजा की पहरेदारी में
ऐसे ही राजाओं के बल पर
खड़ा हुआ था कुटुंब
घर के दूसरे सदस्य भी करते है
राजा की चौकीदारी
  राजा न बन पाए
किसी चोर का शिकार
राजा कुटुम्ब का है रुआब
  कुटुम्ब बचाने में जुटा रहता है
राजा को बनने से बिरयानी, मसाला मटन,
टिक्का या कबाब।।।।।
------.

।।मरते घर ।।

गांव वीरान हो रहे हैं
धरती बंजर सी लगने लगी है
वो घर जहां पनपती थी यादें
पीढ़ियों पुराने पुरखों की
संवरते थे खून के रिश्ते
गूंजा करती थी विरासतें
गांव के घरों से उठा करती थी
लोरी किस्से सोहर की
मधुर स्वर लहरियां
तीज त्यौहार के दिन
गांव के घरों से तितलियों सी गीत गाती
तालाब पोखर की ओर बढ़ती थी
गांव की आन मान शान लड़कियां
पवित्र स्नान के लिए
वही पोखर तालाब अपवित्र हो चुके हैं
गांव के घर रोज रोज मर रहे है
गाँव विस्थापित हो चुका है
आकी बाकी भी हो रहा है
शहरों की भीड़ में
गांव में बचे है तो बार बार
चश्मे साफ करते हुए लोग
इंतजार में ताला जड़े मरते हुए घर
जातिवाद चट कर रहा सर्वस्व
सरकारें और जातिवाद के ठेकेदार
हो चुके है बेखबर
गांवों का देश खतरे में है
सरकारें व्यस्त है दिन साल का
जश्न मनाने में और कागजी घोड़े दौड़ाने में
काश सरकारें और जातिवाद के ठेकेदार
उबर जाते अपने गुमान से
बच जाते नित मरते घर
विकास की बयार जुड़ जाती
वीरान होते गांव से।।।।
----------.
गाँव -एक विरह।।
ये वही चौकी (खैरा)आज़मगढ़ का
गांव है जो मेरी जन्मभूमि है
मुझे अपनी जन्मभूमि पर गर्व है
चौकी से
लालगंज तक जाने के लिए
खेतों की मेड़ों और पगडंडियों से जाना पड़ता था
हॉट से सामान की गठरी सिर पर
साइकिल वाले साइकिल पर लाते थे
मैं सिर पर और साइकिल पर भी लाया हूँ
अब हाईवे है मोटरें भी
इतनी तरक़्क़ी हुई है
इसके अलावा चौकी
तुम्हारी और कोई है पहचान
ग़रीबी और अमीरी के बीच कोई
जंग नहीं हुआ,
क्या  दमन कहें या शान
तुम्हारी साख और गिर गयी
हल खूंटी पर टंग गए
बैल कसाई घर पहुंच रहे हैं
बची है  तो सिसकती ज़िन्दगी
और गांव के दो टुकड़े
पूरब की तरफ सवर्ण और
पश्चिम की तरफ संघंर्षरत
झंखते श्रम के सिपाही दलित
ना जाने क्यों दलितों की बस्ती में
ना सरकारी अफसर, ना नेता
न अभिनेता  पैदा होते है
पैदावार रुकी नहीं है
पैदा हो रहे है अभावग्रस्त
दारू, गांजा, बीड़ी,कैंसर की दुकान सुर्ती की
लत से लैस  मजदूर
  चौकी गांव के शोषितों की
यही तेरी दर्द भरी कहानी है
जहां नहीं बनती कोई सुनहरी निशानी है
हाशिये के आदमी के अरमानों पर
गिर रहा ओला पानी है
चौकी गांव तुम आज भी
रुके पानी की तरह क्यों हो
भूमि आवंटन से वंचित
लहूलुहान,दर्द रंजित हो
चौकी  तुम्हारी पहचान क्या है ?
तुमने आग में मूतने वालों
आकाश पर थूकने वालों को देखा होगा
दलितों की बस्ती से उठी
कराह को भी सुना होगा
जाने क्यों समता की क्रांति का
बिगुल नहीं बजाया तुमने
चौकी अब तो करवट बदलो
तरक़्क़ी की बयार आने दो
शिक्षा -अर्थ की राह पर
हाशिये के लोगों को पांव जमाने दो
चौकी गांव ना तुम कोलकाता हो
ना मुम्बई हो
हाशिये के आदमी की तरक़्क़ी के बिना
कुछ नहीं हो तुम
चौकी तुम हमारी जन्मभूमि हो
तुम्हारी मांटी हमारे लिए चन्दन है
चौकी गांव तुम्हारा अभिनंदन है।।।।।
-----------
बीमार हैं क्या ?

आप बीमार  हैं क्या?
नहीं हैं बड़ी अच्छी बात है
गर है तो सुनहरा मौका
कुछ दिन सकूँ से बिता लीजिये
मौका और दस्तूर भी है
हाड़ मांस की काया को थोड़ा
विश्राम दीजिये।
विश्राम के दिन को जश्न मान लीजिए
बदन की जरूरत है
आराम कर लीजिए
बीमार होना अच्छी बात तो नहीं है
बीमार होना आपके हाथ में नहीं है
व्याधि के कई कारण भी सकते है
जनाब बीमारी तो ठीक हो जाएगी
हिम्मत और खुश रहना,चिंतामुक्त रहना हैं
डॉ के बताये अनुसार दवा लीजिये
बीमारी का मज़ा लीजिए
बीमारी बरसात के पानी की तरह निकल जायेगी
रहिमन बाबा ने पहले ही कह दिया था
रहिमन विपदा हूँ भली जो थोड़े दिन होय
हित अनहित या जगत  में जानि परत सब कोय
जनाब यकीन मानिये बीमारी
बीमारी कतई नहीं रहेगी
पारखी नज़र रखिये
बरसाती मेढकों की बारात विदा हो जाएगी
ए परजीवी भी बड़ी बीमारी है
कहते है बस आदेश कीजिए
आसमान से तारे तोड़ लाएंगे
बीमारी में,दुःख की बेला में
कही दूर तक नज़र नहीं आएंगे
सगे होगे या बेगाने पहचान लीजिये
लिखते पढ़ते, हंसते गाते
समय पर दवाई लेते रहिये।
पानी अधिक पीया कीजिये
बीमारी का चटकारे मर कर  मज़ा लीजिये
बीमारी को दूर भगा ही  सकते नहीं
बीमारी को आनंद से भी कबमक़लेना सीख लीजिए
निरोगी काया निरोगी काया रटते रहिये
रटना ही नहीं, शारीरिक व्यायाम करिये
बीमारी को जश्न की तरह समझिए
कबीर साहब ने तो  मौत को
उत्सव के रूप में देखते थे
हम तो आम आदमी है
कम से कम बीमारी का जश्न तो मना ही सकते है
बीमार हूँ बीमार हूँ रट लगाना
बीमारी को बढ़ाना है
ज़िन्दगी सकूं से जीना है
हौशले कि ताकत से बीमारियों को पछाड़ दें
ज़िन्दगी है विष तो जीवन की सांस बना दें
दुख या कहे बीमारी बस आनंद उठा लीजिये
दुख ,बीमारी जीवन की पाठशाला
इस पाठशाला से सच्ची ज़िंदगी
अच्छी तरह से जीना सीख लीजिये।

डॉ नन्दलाल भारती

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लोकनाथ साहू ललकार


मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान

अपनी माटी, अपना देश
कितना बदल गया परिवेश
कबीर का दीया जलता था
फूले-नानक पीर पिघलता था
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
गोविन्‍द से प्‍यारा गुरू महान्‌ था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान


माटी सोना उगलती थी
सोने की चिड़िया कहलाती थी
शास्‍त्री के किसान मिट रहे
उनके खेतों को गिद्ध लूट रहे
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
शास्‍त्री दुलारा जवान-किसान था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान


सीते-राधे की जयकार यहाँ
पर लज्‍जा रेखा पार यहाँ
फिल्‍मी गानों में नारी बदनाम
जिसमें नाचते-गाते आम आवाम
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
झाँसी का प्‍यारा स्‍वाभिमान था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान


कर्णावती की राखी थी
हुमायूं को वो बांधी थी
अब मज़हब की गलियाँ तंग हुईं
अक़ीदत बेनूर ओ बेरंग हुईं
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
कृष्‍ण का प्‍यारा सैयद रसखान था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान

बचपन मस्‍ताना होता था
हर ग़म से बेगाना होता था
गिल्‍ली-डंडे-पतंगें उड़तीं थीं
टोली प्रभात फेरी मचलती थी
वो न्‍यारा हिन्‍दुस्‍तान था
तिरंगा प्‍यारा गली मुस्‍कान था
मैं ढूंढता वो हिन्‍दुस्‍तान, बंदे !
जिसकी अमर है दास्‍तान
---
लोकनाथ साहू ललकार
बालकोनगर, कोरबा, (छ.ग.)

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सार्थक देवांगन


तुम पेड़ हो
छाया देते हो
भोजन देते हो
पक्षियों को घर बनाने
दिल के भीतर
जगह देते हो
स्वयं तपकर
ठंडक पहुंचाते हो ।

परवाह
नहीं करता कोई तुम्हारी
फिर भी
बिना किसी आशा के
तुम
सबका साथ देते हो
घबराओ नहीं
तुम्हारे जैसे
और भी हैं वो सब
तुम्हारा
साथ देंगे
क्योंकि
तुम पेड़ हो ।

सार्थक देवांगन
छठवीं
के वि रायपुर
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बाबा राम अधार जी जो कवियों में श्रेष्ठ है,
मेरे बचपन के साथी है थोड़ा मुझ से ज्येष्ठ है।।
--"अंजान"


अधीर का काव्य पक्ष-एक विश्लेषण-
श्री राम अधार शुक्ल "अधीर" जिन्हें सभी उम्र के लोग 'बाबा जी' के नाम से पुकारते थे।वे समाज सुधारक,साहित्यकार,राजनीतिज्ञ थे। पूरे प्रदेश में खासकर अवधी बेल्ट में एक लम्बे समय तक मंचों पर उनकी कविताएँ लोगों द्वारा सराही जाती रही।वे अवधी में लिखते थे।26जुलाई2006 को वे अपने निवास पूरे नन्दू मिश्र जखौली , पटरंगा फैजाबाद में 77 वर्ष की अवस्था में अकस्मात खुशनुमा मौसम में हरियाली का आनंद लेते हुए यादें बन गए।शुरुआती दौर में वे वीर रस में कविताएँ लिखते थे। बाद में ज्यादातर रसों में अपनी रचनाएँ दी।
शिव साहित्य परिषद के अध्यक्ष पद को सुशोभित करते हुए परिषद की ओर से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका का सफल सम्पादन भी उन्होंने किया। उस पत्रिका के माध्यम से उनके ढेर सारे विचार व उनकी कृतियों ने समाज को आइना दिखाया जो आज भी प्रासंगिक है। वे आज हमारे बीच नही हैं लेकिन उनके मुक्तक गंभीर पाठकों की वाणी से अनायास ही निकल पड़ते है। उनमें जहाँ एक ओर अधुना के प्रति अनुराग था तो वही अतीत के गौरवमय संस्कृति के आधार पर एक नये समाज के निर्माण का सपना। उनकी कविताओं में जीवन अपनी पूरी ऊर्जा के साथ मौजूद है ।


समाज में महिलाओँ की निम्न स्थिति पर चिंतित कवि ने 'कन्या'शीर्षक से लिखे खण्डकाव्य मेँ राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं की भूमिका को चित्रित कर उनके हर प्रकार के प्रगति व सम्मान को जरुरी बताया है। जिसके लिए उन्होंने पौराणिक तत्वों का भी सहारा लिया। यथा
'शुचि गंगा व गीता समान पवित्र,
सुनीता के रूप में आती है कन्या...
'पुनि राम, कृष्ण और गौतम,गांधी
से लाल धरा पर लुटाती है कन्या।'


अधीर के मुक्तक व छन्द काफी लोकप्रिय रहे हैं -
'भारत के जन भारतीयता सनेही आओ,
जनगणमन में अमित प्यार भर दो।'...
'कौन सा मुकाम जहाँ लड़ना सिखाया है।'...


जैसे छन्द जो सर्वधर्म समभाव,राष्ट्रीय एकता व प्रगति पर हैं,काफी प्रभावशाली व बेहद प्राणवान है। कुछ ऐसे छन्द है जहाँ कवि गहराई से मूल्यबोध के साथ जीवन की पड़ताल करता है। ये छन्द सिर्फ सपाटबयानी नहीं है और न ही साहित्य का कोरस। अधीर जी की तमाम रचनाएँ जिंदगी के सहजबोध से प्रभावित है वे अपनी छोटी-छोटी पंक्तियों में बड़ी-बड़ी बातें कह जाते है।
गुरु व्यर्थ हैं जो धननाश करै ,कर्त्तव्य का पाठ पढ़ा न सके।...
वह कैसी उठान है उन्नति का,मन में सद्भाव जगा न सके।..
वह सीख है व्यर्थ जो मानव को,मानवता सिख ला न सके।..
वह राष्ट्र का नायक व्यर्थ है जो,सेबरी के निवास को जा न सके।..


जैसी रचनाएँ समाज में व्याप्त विषमता को प्रकट कर आम जन मानस के मन में हलचल पैदा कर साहित्य समाज का दर्पण है इस उक्ति को सार्थक करती है।
'आज सत्ता के पुजारी जन-जन के गुलाम हैं ।'


में उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि जब चुनावी मौसम आता है तब नेतागण क्षेत्रों में दिखाई देते हैं। और अपने को जनता का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की कसमें खाते है तथा मौसम निकल जाने के बाद कसमें वादे याद नहीं रहते।
'चरित्र से भाग्य रचा करते है।' में उन्होंने बताया है कि कर्म ही हमारे उन्नति का अधार है। आजादी आन्दोलन के संघर्षों की याद में भी उनकी लेखनी चली है।
'जिन्हें देवता पुकारा और दूध भी पिलाया। अवसर कभी न चूके,जब पाया डसा ही हैं ।'
'लगता है सच न बोलो शासन से मनाही है।'
जैसे गजलों में वे अपने अनुभव व दृष्टिकोण साझा करते हुए दिखाई देते हैं।


'देवर जी रंग मत डालो -एक ही धोती है।'जैसे मार्मिक गीतों में अधीर जी ने सामाजिक- आर्थिक विषमता पर खुलकर प्रहार किया है।'मुट्ठी बाँध तन अकड़ चला काम पे' जैसी रचनाओं में उन्होंने यह चित्रित किया है कि किस प्रकार किसान , मजदूर को हर मौसम व परिस्थिति को शिकस्त देते हुए रोटी के जुगाड़ में घर से निकलता ही पड़ता है ।मौजूदा समाज में स्वार्थपरता, अवसरवाद इस कदर हावी होता जा रहा है, जहां हर कोई अपने को भी नहीं छोड़ने को तैयार है। अधीर जी ने अपना जीवन बहुत ही सादगी से जिया तथा वे अपने जीवन में अन्तिम समय तक लोकहित में संघर्ष करते रहे साथ ही उन्होंने अपने संघर्षपथ पर जो अनुभव प्राप्त किए उसे साहित्य के माध्यम से सामने लाते रहे। उनकी गज़लें इस बात के प्रमाण है -


'हर शूल जिन्दगी का पलभर की खताही हैं।

अनुभव बता रहे है, इतिहास गवाही हैं
पंथी सम्हल के चलना पग-पग पर कसाले है।
पलभर की चूक बनती सदियों की तबाही हैं.'..
'जिन्हें देवता पुकारा और दूध भी पिलाया
अवसर कभी न चूके, जब पाया डसाही है'
'लगता है सच न बोलो शासन से मनाही है।'


मुक्तक में उन्होंने अपने कटु अनुभव व जीवन संघर्षों को बड़ी सफलता के साथ उजागर किया है।
'हर चमकती हुई धातु सोना नहीं।'
'कष्ट जिसने सहा क्या से क्या बन गया।'
'कैसे कह दूँ अमावस्य गुनहगार है।
काफिले लुट रहे चाँदनी रात मेँ।'


जैसे मुक्तक में उन्होंने पूरे समाज को आईना प्रस्तुत कर अपने दृष्टिकोण को साझा किया है ।
"मै बन फूल खिला भी तो क्या
किसने जाना किसने पहचाना
अगर किसी ने जाना भी तो
स्वार्थी तत्वोँ ने पहचाना।"...


इस गीत में यह दिखाया गया है कि किस तरह एक ईमानदार व समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति का शोषण पर टिकी पूंजीवादी व्यवस्था उसका इस्तेमाल करती है ।
अधीर जी एक सफल साहित्यकार रहे है। संयोगवश उनकी रचनाओं का कोई संकलन प्रकाशित नहीं हो पाया हालांकि पत्र पत्रिकाओं में उनकी रचना प्रकाशित होती रही। वे चकाचौंध,बाजार से दूर के रचनाकार रहे है उनकी तमाम रचनाएँ चोरी भी हुई। उन्होंने मुत्यु के दो दिन पूर्व ही अपनी रचनाओं का संकलन कम्पोजिंग के लिये दिया था लेकिन आज भी पाठकों की निगाहें बड़ी बेसब्री से निहार रही है कि-वे अच्छे दिन कब आये।
वीरेन्द्र त्रिपाठी
लखनऊ

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पूनम चंद्रिका त्यागी की कलाकृति

अग्रहायण की शीत भरी धुंधली शाम थी। चारों ओर शांति एवं ठंडक का साम्राज्य था। ऐसे शांत एवं ठंडे वातावरण में भी सविता अशांत थी। वह सोच रही थी अपने पति संजय के बारे में।

कुछ दिनों पूर्व जिन्हें एक क्षण का भी वियोग सह्य न था, वही आज महीनों से, न जाने क्यों, घर बहुत कम आते हैं ,आते भी हैं तो फ़ाइल को अलमारी के हवाले कर न जाने कहाँ चले जाते हैं। इसी तरह दिन बीतते गए। लेकिन थोड़े ही दिनों बाद संजय के चेहरे पर आशंका की रेखाएँ उभरती सी दीख पड़ी । सविता के पैने नेत्रों से यह छिपी न रह सकी ।  उन आशंका की रेखाओं को देखकर सविता के अन्तःकरण से भी आवाज आई -" दाल में कुछ काला अवश्य है।"

एक ही क्षण बाद उसका विचार बदल गया -"छि:! मैं क्या सोचने लगी,  मेरे पतिदेव और वह भी संजय किसी की नजर का शिकार बने, ऐसा कदापि नहीं हो सकता,हरगिज नहीं हो सकता..........।" सविता ने निर्णय किया कि वह उनसे पूछेगी -" आखिर ऐसा क्यों हैं ? क्या मुझसे कोई त्रुटि हो गयी है? त्रुटि हुई भी होगी तो क्षमा मांग लूँगी ,वह अवश्य क्षमा कर देंगे। "

ऐसा निर्णय कर के वह उठी। उसने जो घड़ी देखी ,चौंक गयी । बारह बज चुके थे। वह चुपचाप सो गयी। संजय अपने किसी मित्र के यहाँ गया था।

सविता सवेरे उठी। आज रविवार है । संजय अपने मित्र के घर से 8 बजे वापस आया। थोड़ी देर तक फ़ाइलों में सिर खपाने के बाद स्नान किया । इसी बीच सविता ने भोजन तैयार कर दिया। खाना खाकर संजय ने कपड़े पहने और कहीं जाने के लिए तैयार हो गया ।

सविता ने तो निर्णय कर ही लिया था,अतः संजय को रोकते हुये उसने पूछा-"एक समय था जब मुझे देखे बिना आपको क्षण भर भी चैन नहीं पड़ता था। आजकल घर खाना खाने के लिए भी नहीं आते, कभी आते भी हैं तो उल्टे पाँव जाने को तैयार रहते हैं।

बीच में ही संजय बोला-"बंद करो यह लेक्चरबाजी,मुझे जल्दी है मैं जा रहा हूँ। " "नहीं आपको इसका कारण बताना ही पड़ेगा!" सविता ने हठ किया। इस परज़ोर से चीख कर उसने कहा-" यदि तेरी जिद है तो सुन ,जब तक मैं समझता था कि तुम मेरी हो,मैं इस घर को अपना समझता था पर......... अब मैंने यह जान लिया है कि तुम किसी और को चाहती हो।”

     “नहीं स्वामी यह झूठ है।” धीमे एवं करुण स्वर में-“हे प्रभु! यह क्या लीला है तेरी?” कहते हुये वह अर्ध-मूर्च्छित सी होकर अपना सिर हाथ में थामकर बैठ गयी।”

     “नाथ मैं ईश्वर की सौगंध खाकर कहती हूँ ,मैंने आपके सिवा किसी और से प्यार नहीं किया।”

     “अच्छा सुनो” संजय बोला-“ तुम मनोज को जानती हो न?”

     “जी हाँ,”

     “जब तू पढ़ रही थी तभी से तेरा उससे प्यार चल रहा था।”

     “नहीं देव! आप विश्वास करें, मैं ऐसे दुष्ट लफंगे से कभी प्यार नहीं कर सकती, न ही कभी प्यार किया,एक बार उसने मुझसे कुछ गंदी बातें करने की चेष्टा की थी जिसके उत्तर में मैंने ऐसा चांटा लगाया था की उसे अब भी याद होगा।”

संजय का मनोज की बातों पर विश्वास और भी ढ़ृढ़ हो गया।

    “अच्छा ,मैं जा रहा हूँ,मेरे आने से पूर्व तुम मेरे घर से चली जाना, बस भला इसी मे है” कहते हुये संजय घर से बाहर चला गया।

संजय ने माधुरी को दोपहर 12 बजे मिलने का वायदा किया था। आज उसके मार्ग का रोड़ा दूर हो गया यह ध्यान आते ही उसे थोड़ी शांति मिली। वह हाँफते-हाँफते माधुरी के घर पहुंचा। उसे देखकर माधुरी का मुख-कमल खिल उठा।

दोनों ने जलपान किया। माधुरी एक पत्रिका का पुराना अंक देख रही थी,जिसके खुले पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में छपा था-“धोखा दिया” संजय ने उसे पढ़ा और सोचने लगा- ठीक है उसने धोखा दिया तो क्या हुआ? मैं उसे तलाक दे दूंगा। उसके और माधुरी के बीच काफी देर तक बातचीत होती रही। अंत में उसने कहा-“माधुरी! यदि बुरा न मानो तो एक बात कहूँ। देखो” संजय बोला-“ मैं तुमसे विवाह करने के ध्येय से ,तुम्हारी इच्छा पूरी करने आया हूँ।”

     “धन्यवाद, मेरे बड़े भाग्य जो यह शब्द सुन रही हूँ।” उसके हृदय में एक विचित्र सी गुदगुदी हो रही थी। 

मैंने अपनी कंटक-स्वरूपा पत्नी को निकाल दिया, अब मैं स्वतंत्र हूँ।”

     “हैं! तुमने यह क्या किया? निकाल दिया। धोखा दिया, संजय! तुमने यह क्यों नहीं बतलाया कि तुम विवाहित हो।”

     “तुम चिंता न करो मैं उसे.......”

     “संजय चुप रहो तुमने धोखा दिया।”

     “मैं उसे तलाक दे दूंगा।”

     “कुछ नहीं,आज तुम उसे तलाक दे रहे हो और मुझसे विवाह कर रहे हो,कल किसी और से विवाह करोगे और मुझे छोड़ दोगे.......”

     “नहीं माधुरी,मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा, विश्वास करो।”

     “नहीं मैं ऐसे पुरुष का विश्वास नहीं कर सकती जो एक पतिव्रता को ठुकराता है,ऐसे नीच पुरुष को मैं अपने पास देखना भी नहीं चाहती,तुम अभी मेरी नजरों से दूर चले जाओ।” संजय के सारे प्रयत्न निष्फल हो गए।

उसने अनुभव किया कि सचमुच माधुरी ने उसे धोखा दिया। सविता चली गयी होगी यह चिंता भी थी। तभी उसके मस्तिष्क में एक बात और आई, वह यह कि कहीं मनोज ने भी उसे धोखा तो नहीं दिया? उसका आशा महल ढह गया था। वह इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ थका निराश घर की ओर बढ़ने लगा।

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मनोज भी इसी शहर के एक स्कूल में क्लर्क है। वह संजय के घर से कोई दो फर्लांग दूर रहता है। उसे जब मालूम हुआ कि उसका मित्र संजय अपनी पत्नी सविता को घर से निकल जाने को कहकर कहीं गया है  तो उसकी बाँछे खिल गयी। वह सविता के घर की ओर चल पड़ा। 

सविता अपने पति के व्यवहार से दुःखी थी ही,मायके जाने को तैयार हुयी। पर उसके मन में तुरंत यह बात आई कि यदि उसका पति भूल कर रहा है तो ऐसे समय में प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए ताकि उसके पतिदेव की दुर्बुद्धि दूर हो जाए, वे वास्तविकता समझें, ऐसा कार्य करें जिससे संसार में उनकी कीर्ति फैले। वह प्रार्थना कर ही रही थी कि बाहर से प्रवेश करते हुये किसी अपरिचित पुरुष की आवाज सुनाई दी-“ कहिए सविता जी , आप मुझे बिलकुल ही भूल गयी क्या?”सविता क्रोध से भुनी जा रही थी, उसने कहा- “आवारा! दुष्ट! लफंगा! मेरे घर में आने की तूने हिम्मत कैसे की? मेरे शिव सदृश भोले पति के कान भरकर आज ऐसी हालत की। उसकी आँखों से अंगारे निकल रहे थे। हट नीच! नारकी! मैंने तुझसे कब प्यार किया था? बता तूने मेरे चमन में क्यों आग लगाई?”

       “ तूने न किया, न सही, पर मैं तो करता हूँ, मेरी बात मान लो मैं सब ठीक कर दूँगा।” वह मुसकुराते हुये- “देखें अब तुझे कौन बचाता है?” ऐसा कहकर सविता की ओर लपका ही था कि बाहर से प्रवेश करते हुये संजय की आवाज आई-“ मैं बचाऊंगा मनोज! मेरे रहते हुये कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता।”

       “तुम आ गए संजय! देखो सविता मुझसे प्रणय की भीख मांग रही थी, मैंने इसे इतना समझाया कि पुरानी बातें भूल जाओ पर..........।”

       “चुप रहो मनोज!” क्रोध से आँखें लाल किए संजय बोला-“मैंने सारी बातें सुन ली हैं,भला इसी में हैं कि तुम चले जाओ।” मनोज चुपचाप चला गया।

सविता ने अपनी आँखों के सामने सबकुछ चलचित्र की भांति देखा। संजय को अपनी भूल तथा सविता के पतिव्रत धर्म दोनों की परख हो चुकी थी।

दोनों परस्पर आलिंगनबद्ध थे। उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धार बह रही थी। उनके बीच जो भ्रम या कालुष्य था वह आंसुओं में बह गया और उनके प्रेमबंधन जो ढीले पड़ गए थे, और कस गए।

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(भारत रत्न डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम जी की द्वितीय पुण्यतिथि 27 जुलाई 2017 पर विशेष आलेख)

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भारत माँ के सपूत, मिसाइल मैन, राष्ट्र पुरुष, राष्ट्र मार्गदर्शक, महान वैज्ञानिक, महान दार्शनिक, सच्चे देशभक्त ना जाने कितनी उपाधियों से पुकार जाता था भारत रत्न डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम जी को वो सही मायने में भारत रत्न थे। इन सबसे भी बढ़कर डॉ. अब्दुल कलाम एक अच्छे इंसान थे। जिन्होंने जमीन से जुड़े रहकर ‘‘जनता के राष्ट्रपति’’ के रूप में लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनायी थी। एक ऐसे इंसान जो बच्चे, युवाओं, बुजुर्गों सभी के बीच में लोकप्रिय थे। देश का हर युवा, बच्चा उन्हें अपना आदर्श मानता था, देश का हर युवा डॉ. कलाम बनना चाहता था।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम के धनुषकोडी गाँव में एक मध्यमवर्ग मुस्लिम परिवार में हुआ।  डॉ. कलाम की प्रसिद्धि, महानता, युवा सोच और आजीवन शिक्षक की भूमिका में रहने की वजह से संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनके सम्मान में सन् 2010 में उनके जन्मदिवस 15 अक्टूबर को विश्व विद्यार्थी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। डॉ. कलाम बच्चों से बहुत प्यार करते थे। स्कूली बच्चों को उनके जीवन से प्ररेणा मिले, इसी उद्देश्य से उनके जन्मदिन को विश्व विद्यार्थी दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मनाने का निर्णय लिया गया था। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी के पिता का नाम जैनुलाब्दीन था। पिता जैनुलाब्दीन न तो ज्यादा पढ़े-लिखे थे, और उनकी आर्थिक हालत भी अच्छी नहीं थी। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी की माता का नाम अशिअम्मा जैनुलाब्दीन था। जो कि एक गृहणी थीं। माता-पिता के संस्कार और उनकी कठिन परिश्रम की आदत ने ही उन्हें इतना महान बनाया। डॉ. कलाम के पिता मछुआरों को नाव किराये पर दिया करते थे और एक स्थानीय मस्जिद के इमाम भी थे।

अब्दुल कलाम संयुक्त परिवार में रहते थे। डॉ. अब्दुल कलाम जी पांच भाई बहनों में सबसे छोटे थे। डॉ. अब्दुल कलाम के जीवन पर इनके पिता का बहुत प्रभाव रहा। बेशक उनके पिता पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनकी लग्न, परिश्रम  और उनके दिए संस्कार अब्दुल कलाम के लिए जीवन में बहुत काम आए। डॉ. अब्दुल कलाम जी को अपनी फीस भरने के लिए बचपन में अखबार तक बेचना पड़ा था। डॉ. कलाम ने 1958 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलजी से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद डॉ. कलाम ने हावरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने के लिये भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान (डीआरडीओ) में प्रवेश लिया। इसके बाद डॉ. अब्दुल कलाम 1962 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में आये जहाँ उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत, सूझबूझ और आसमान छू लेने वाली लग्न और स्वप्न ने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी महत्ती भूमिका निभाई। डॉ. कलाम के बतौर परियोजना निदेशक रहते देश का पहला स्वदेशी उपग्रह एसएलवी-3 जुलाई 1980 को लांच किया था। इस लांचर के माध्यम से रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया गया। डॉ कलाम ने कई साल इसरो में परियोजना निदेशक के रूप में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को काफी आगे बढ़ाया।

डॉ. कलाम अपनी सफलता का श्रेय अपनी माँ को दिया करते थे। वे कहते थे कि माँ ने उन्हें अच्छे-बुरे को समझने की शिक्षा प्रदान की। उनका कहना था कि अगर उनकी जिन्दगी में माँ नहीं होती तो वो इतना सफल कभी नहीं बन पाते। अग्नि मिसाइल और पृथ्वी मिसाइल का सफल परीक्षण का श्रेय काफी कुछ डॉ. कलाम को जाता है। डॉ. कलाम ने त्रिशूल, आकाश, नाग जैसी ताकतवर मिसाइलें बनायीं। डॉ. कलाम ने भारत के अंतरिक्ष और मिसाइल कार्यक्रम को काफी उंचाईओं तक पहुँचाया। एक समय ऐसा था जा जब डॉ. कलाम देश के पहले रॉकेट को साइकिल पर लादकर प्रक्षेपण स्थल पर ले गए थे। जिसके लिए  नारियल के पेड़ों को लांचिंग पैड बनाया गया था। इस मिशन का दूसरा रॉकेट काफी बड़ा और भारी था, जिसे बैलगाड़ी के सहारे प्रक्षेपण स्थल पर ले जाया गया था। डॉ. कलाम सहित देश के महान वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत और संघर्ष के बदौलत ही देश इसरो की स्थापना के दो दशकों के अंदर ही अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बन सका। डॉ. कलाम 1992 से 1999 तक रक्षा मंत्री के विज्ञान सलाहकार तथा सुरक्षा शोध और विकास विभाग के सचिव रहे। डॉ. कलाम कि देखरेख में ही  भारत ने 1998 में पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया और भारत देश परमाणु शक्ति से संपन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हुआ। डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम जी को देश के प्रति उनके योगदान के लिए 1981 में भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म भूषण और 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत रत्न प्रदान किया। इसके बाद डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम 2002-2007 तक देश के राष्ट्रपति रहे।

हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी का सम्पूर्ण जीवन देश सेवा में बीता।  डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी को साल 2002 में सर्वसम्मति से पक्ष और विपक्ष की प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस सहित दर्जनों दलों ने अपना उम्मीदवार बनाया। डॉ. कलाम को राष्ट्रपति बनाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री पंडित अटल बिहारी वाजपेयी जी खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के पास प्रस्ताव लेकर गए, जिसका उन्होंने पूर्ण रूप से समर्थन किया। नतीजतन देश की प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस सहित दर्जनों दलों ने एकमत से डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी का नामांकन कराया और नतीजों में भी डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी 90 प्रतिशत के आसपास मतों से जीतकर देश के 11वें राष्ट्रपति बने और पूरे पांच साल उनका कार्यकाल शानदार रहा। इसके बाद डॉ. कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलोंग, भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद, भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर व भारतीय विज्ञान संस्थान,बैंगलोर के मानद फैलो, व एक विजिटिंग प्रोफेसर बन गए। राष्ट्रपति कार्यालय से मुक्ति के बाद डॉ. कलाम अंतिम सांस तक शिक्षक की भूमिका में रहे। जिससे देश के युवाओं को काफी कुछ सीखने को मिला। 27 जुलाई 2015 की शाम अब्दुल कलाम आईआईटी शिलोंग में ‘‘रहने योग्य ग्रह’’ पर एक व्याख्यान दे रहे थे जब उन्हें जोरदार दिल का दौरा पड़ा और व्याख्यान देते-देते  बेहोश हो कर गिर पड़े। गंभीर हालत में डॉ. कलाम को  बेथानी अस्पताल में आईसीयू में ले जाया गया और दो घंटे के बाद डॉक्टरों ने उनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी। डॉ. कलाम जाते-जाते देश के लिए और देश की भावी पीढ़ियों के अपनी शिक्षाएं छोड़ कर गए।

डॉ. कलाम देश के पहले कुंवारे राष्ट्रपति थे। बेशक डॉ. कलाम कुंवारे थे लेकिन देश का हर युवा उनकी संतान की तरह था। देश के करोड़ों बच्चे और युवा उनकी संतान थे। डॉ कलाम का बच्चों और युवाओं के प्रति खास लगाव था। इसी लगाव के कारण मिसाइल मैन बच्चों और युवाओं के दिल में खास जगह बनाते थे। डॉ. कलाम ने देश में मिसाइलों का निर्माण कर भारत की सुरक्षा को नए आयाम दिए। उन्होंने अपनी मिसाइलों द्वारा पाकिस्तान और चीन को अपनी जद में ला दिया। उन्ही की वजह से आज कोई भी देश भारत को आँख दिखाने से पहले दस बार सोचता है। यह डॉ. कलाम की ही दृढ इच्छाशक्ति थी जिन्होंने अत्याधुनिक रक्षा तकनीक की भारत की चाह को साकार किया। चाहें परमाणु हथियार हों, चाहें देश का अंतरिक्ष कार्यक्रम हो, चाहें बैलेस्टिक मिसाइल परियोजना, या लड़ाकू विमान परियोजना में उनके अतुलनीय योगदान ने उनके नाम को हर भारतीय की जुबां पर ला दिया। और उन्हें देश का हीरो बना दिया।

डॉ. कलाम की बातें और विचार सदा तर्कपूर्ण होते थे और उनके विचारों में जवान सोच झलकती थी। यही झलक उन्हें युवाओं में लोकप्रिय बनाती थी। डॉ. कलाम कहते थे कि ‘सपने वो नहीं होते जो रात को सोने समय नींद में आये, सपने वो होते हैं जो रातों में सोने नहीं देते’  और हमेशा से लोगों से कहते थे कि सपने देखो और वो भी ऊँचे सपने देखो और तब तक देखते रहो जब तक कि वो पूरे न हों। डॉ. कलाम सादा जीवन, उच्च विचार तथा कड़ी मेहनत में विश्वास करते थे और उन्होंने इन्हीं बातों को अपने जीवन में उतारा और बुलंदियों तक पहुंचे। डॉ. कलाम अपने जीवन को बहुत अनुशासन में जीते थे. शाकाहार और ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों में से थे। कहा जाता है कि वह कुरान और भगवद् गीता दोनों का अध्ययन करते थे, डॉ. कलाम हर धर्म में विश्वास करते वाले थे और वे हर धर्म के धर्मगुरुओं से मिलते थे। डॉ कलाम ने एक मुस्लिम परिवार में जन्म लिया लेकिन वो हिन्दू धर्म में भी उतनी ही आस्था रखते थे जितनी कि मुस्लिम धर्म में।

डॉ. कलाम जी का सिद्धांत था कि जो लोग जिम्मेदार, सरल, ईमानदार एवं मेहनती होते हैं, उन्हे ईश्वर द्वारा विशेष सम्मान मिलता है। क्योंकि वे इस धरती पर उसकी श्रेष्ठ रचना हैं। उनका यह सिद्धांत उन्ही पर लागू होता था, क्योंकि डॉ कलाम वास्तव में एक सरल, ईमानदार और मेहनती व्यक्ति थे और ईश्वर द्वारा धरती पर के गयी श्रेष्ठ रचना थे और उनके जाने बाद ईश्वर के यहाँ भी उन्हें वही सम्मान मिलेगा जो उन्हें इस धरती पर मिला।  डॉ. कलाम हमेशा कहते थे कि किसी के जीवन में उजाला डालो वास्तव में डॉ. कलाम भारत देश के लोगों के जीवन में अपनी महान उपलब्धियों और अपने विचारों का ऐसा उजाला डाल कर गए हैं जो कि देश के नौजवानों को सदा राह दिखाते रहेंगे। डॉ. कलाम सदा मुस्कराहट का परिधान पहने रहते थे उनकी मुस्कराहट उनकी आत्मा के गुणों को दर्शाती थी उनकी आत्मा सच में एक पवित्र आत्मा थी जिसे दैवीय शक्ति प्राप्त थी। डॉ. कलाम की ईमानदारी, शालीनता, सादगी और सौम्यता हर किसी का दिल जीत लेती थी। उनके जीवन दर्शन ने भारत के युवाओं को एक नई प्रेरणा दी। डॉ. कलाम करोड़ों लोगों के रोल मॉडल हैं। डॉ. कलाम सही मायनों में कर्मयोगी थे, कर्मयोगी शब्द का उदाहरण यदि भारत देश में है तो डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम जी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा है।

लेखक

ब्रह्मानंद राजपूत, दहतोरा, आगरा

पूनम चंद्रिका त्यागी की कलाकृति

महीना बैसाख का
बच्चों के बस्ते छूटे, पड़ा शोर गलियारों में,
मदमज्ञत किसे पवन को, आया महीना बैसाख का।

हर कोई दबा-दबा सा, कह रहा, बैसाखी के मेले जायेंगे
हर कोई आज मदहोश है, आया महीना बैसाख का।
गेहूँ की बालियों से निकल, खनके हैं दाने खलिहानों में,
नव वर्ष का हर्षोल्लास लाया, महीना बैसाख का।

सुन गबरू के ढोल की धुन, नाजुक कमर बल खाने लगी,
सठियाए बाबे को भी ठुमकों की लचक ललचाने लगी,
जवानी, बुढ़ापे पर अजब खुमार लाया महीना बैसाख का।

कई आसें, मुरादें, नव वर्ष पर लगने लगी,
कई दुलहनों की चूड़ियाँ खनकने लगीं।
जन-जन को, कण-कण को, नव वर्ष मुबारक हो,
कुछ ऐसा करने की ठानो कि संसार को ये वर्ष कुछ
दे सके, नई आस, नये सपने लाया है महीना बैसाख का।


व्यथा शब्दों की
आसमान के ख़्याल,
धरा की गहराई,
रात्रि का अंधेरा,
दिन की चमक,
शब्द बोलते हैं।
         इन्सान की इन्सानियत,
         हैवान की हैवानियत,
         फूल की मुस्कान,
         काँटों का ज्ञान,
         शब्द बोलते हैं।
प्रकृति का प्रकोप,
जवान की शहादत,
विधवा का विलाप,
बच्चों की चीत्कार,
शब्द बोलते हैं।
         शब्दों की चोट,
         मन की खोट,
         नज़रों का फेर,
         गहन अन्धेर,
         शब्द बोलते हैं।
शब्दों पर कटाक्ष,
शब्दों पर प्रहार,
शब्दों का दुरुपयोग,
शब्दों का आत्मदाह,
सिर्फ़ शब्द झेलते हैं।


नदी के पत्थर
एक शाम, एक बाबू
नदी के तट पर खड़ा
निहारता रहा, नहाते
पत्थरों को, सफ़ेद
गोल-गोल पत्थरों पे अड़ा
आदेश दे, फटेहाल
पिंजर शरीरों को,
ट्रक भर भिजवा देना
सुनसान तट से टला
सुन ये आवाज़
पत्थर थर्रा गये
फुसफुसाये, गुहार की
कि बीच में बड़े
पत्थर ने पहली
बार प्यार से बात की,
चुन लिये गये हो
भिजवा दिये जाओगे
किस-किस बंगले
की शान कहलाओगे
चीख़ों से नदी गूँज गई,
रोये बड़े छोटे मिलकर
सब पत्थर गले लगकर
सोच कल लाखों प्रहारों को
हज़ारों टुकड़ों को,
हौसला दिया बड़े
पत्थर ने, विदाई
दर्दनाक हो उठी।


ज़िन्दगी की सांझ में
ज़िन्दगी की सांझ में
इक राग छेड़कर
मुझे चूल्हे के पास
अपनी कंबली में
बिठा लेना।
छोटी-छोटी लकड़ियाँ
मैं लगाती जाऊँगी
ताकि तुम्हारी साँसों
की गरमाहट का
अहसास होता रहे मुझे।
बड़ी लकड़ी सिर्फ़
तुम ही लगाना
शायद मुझे
नींद आ जाये
तुम्हारे सीने से
लगकर,
तृप्त हो जाये वो पिपासा
जो ताउम्र तुम्हारा सान्निध्य
ढूँढती रही।
ज़रूर अंकित करना
मेरे लबों पर चुंबन
जो बड़ी लकड़ी के
राख होने तक
गरमाहट देता रहे।


याद
बरसों बाद
पीहर की दहलीज़,
आँख भर आई,
सोच
बेसुध सीढ़ियाँ चढ़ना
पापा के गले लग
रो देना,
हरेक का उनके
आदेश पर गिर्द घूमना,
खूँटी पर टंगा काला कोट,
मेज़ पर चश्मा, ऐश-ट्रे,
घर के हर कोने में
रोबीली गूँज।
आज घूरती आँखें,
रिश्तों को निभाती आवाज़ें,
समझती बेटी को बोझ,
हर तरफ़ परायापन
एक आवाज़ बुलाती,
जोड़ती उस पराये
दर से ‘पापा बुआ
आई हैं।’


पीपल का पेड़
सदियों पुराना, दादाओं का दादा,
गाँव के उस छोर पर खड़ा पीपल का पेड़।
दिन बीते, माह बीते, बरस बीते, दशक बीते,
सदियाँ बीत गईं, इंसान पुश्त-दर-पुश्त गया,
पर एक टाँग पर खड़ा
देखता रहा बदलते युगों को
ये पीपल का पेड़।
दुनिया क्या से क्या हो गई,
राजाओं के महल ढह गये,
पुरानी संस्कृति विलुप्त हो गई,
नई सभ्यता ने जन्म लिया, पर ये
सबको ताकता रहा पीपल का पेड़।
सदियों तक पूज्य रहा
सभ्य रहा, बना रहा
आभूषण ये पीपल का पेड़।
आज यह पूज्य नहीं, सभ्य नहीं,
चुपचाप काटा जाता है इसे,
वह भी लोगों की तरह अंधा, बहरा, गूँगा
व मूक बन जाता है।
देखता है सिर्फ, उसके आँसू,
ये गगन, ये हवा और देते
हैं आवाज़, चुप हो जा,
समझौता कर ले।
सह लेता है असंख्य वज्र
मूक खड़ा ये पीपल का पेड़।



प्रेमिकायें
न जाने किधर
लुप्त हो गईं
वो प्रेमिकायें
सुगंधित गुलाब सी,
मधुर गान सी,
मीठे ख्वाब सी,
बादलों में मेघ सी,
दूध में उफ़ान सी,
मिट्टी की सोंधी
खुशबू सी,
सावन की पहली
बौछार सी, किताब में रखे पुराने फूल सी
हुआ करती थी कभी,
रहती पुरुष का
झरोखा बनकर
सदैव देती थी सूरज
की पहली किरन
चाँद की चाँदनी
भोर तक,
अहसास की
नाव में झुलाती
इस छोर से,
उस छोर तक।


लहूलुहान अख़बार
इक दिन सुबह उठते ही
इक लहूलुहान
अख़बार मुझसे लिपट गया
मैंने उसे ढांढस बंधाया
और उसकी दास्ताँ
सुनने के लिए
उसे कुर्सी पर बिठाया
बोला सीना फाड़कर
देख-देख! कितने शहीदों का
खून मुझ पर लगा है
ये ही नहीं रेल दुर्घटनाओं,
बलात्कारों व कई
हवाई दुर्घटनाओं के
उलीचे हुए खून के
छींटे भी पड़े हैं मुझ पर,
ये एक दिन की नहीं
रोज़ मर्रा की बात
बन गई, थक गया हूँ
हार गया हूँ कुछ तो कर मेरे लिए,
वह चुपचाप अपना
आँचल संभाल बैठ गया
जब उसने देखा
कि उसे देखकर मेरी
आँखों से भी आँसू
टपक रहे थे।


बांटकर दिखाओ
बाँटकर ज़मीन और आसमान
बाँटकर ये आदमी, मैं हिन्दु
तू मुसलमान, कितना खुश
होता है आदमी।
         क्या बाँट सकते हो तुम
         वो बलखाये कंटीले तार
         जिसका एक बल इधर
         और दूसरा उधर है।
बाँट दो उस पीपल के पत्ते,
जो उड़कर इधर से उधर,
घूम आते हैं।
क्या मज़ा आ जाये अगर
         रोक लो, बाँट लो उस
         बादल के टुकड़े को
         जो हमें वर्षा का झाँसा
         देकर उस तरफ़ बरसता है।
पक्षियों के घरौंदे इस तरफ़
और उडारी उस तरफ़ है
कोयल उस सामने वृक्ष पर
और आ रही कूक इधर है।
         शरीर से आत्मा को,
         मन्दिर से परमात्मा को
         मानव से इन्सानियत को
         बाँट सको, तो बाँटकर दिखाओ।


श्रद्धांजलि
आज मेरा दिल उन वीरों को
श्रद्धांजलि देने के लिए,
अपने आप ही नतमस्तक है,
जिन्होंने अपने प्राणों की
बाज़ी लगाने में तनिक भी
संकोच नहीं किया,
पलटकर सूनी माँग,
सूनी कलाइयों को नहीं देखा,
सुबकते बच्चों, नम आँखों
को नहीं देखा,
माँ की ममता को, गले तले
उतार कर, बाप की लाठी को
उसके हाथों में ही थमाकर,
चल दिये भारत माँ की
रक्षा के लिए,
आज भारत माँ ही नहीं, समूचा
देश तुम्हारा, तुम्हारी जननी का ऋणी है
तुम्हें झुक-झुक कर असंख्य
बार प्रणाम करता है,
करता रहेगा।
तुम धन्य हो, वीर हो,
अमर हो, रहती दुनिया तक
तुम्हारी वीरता का ये
चर्चा चलता रहेगा।


शबनम शर्मा
माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. - 173021

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