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सुशील शर्मा की कविताएँ, गीत, दोहे, हाइकु

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एक थी आस्था
जो बहुत प्यारी थी।
सबकी दुलारी थी।
बहुत शैतान थी।
करती सबको परेशान थी।
बोलने में बहुत प्यारी।
लगती थी सबसे न्यारी।
सबकी थी मन भावन।
झरती जैसे सावन।
मन के बहुत समीप सी।
दीपावली की दीप सी।
फिर एक अंतराल।
लंबा सूना सा काल।
फिर एक दिन प्रकट हुई आस्था।
निश्छल मुस्कान लिए।
सौंदर्य की शान लिए।
मन मे प्रतिबिंबित।
जीवन आनंदित।
कर्तव्यों के पथ पर।
कर्म से अभिसिंचित।
शुभ्र धवल सौंदर्य सिक्त
पुष्पगन्ध देह युक्त।
सभी संबंधों का निर्वहन।
प्रेमयुक्त संवहन।
स्नेहसिक्त प्रेमयुक्त आस्था
सबकी स्नेहमयी आस्था
श्री राम विवाह
            सुशील शर्माश्री जनक जी बने घराती।
पूरा अवध बना है बाराती।चारों भाई बने हैं दूल्हे।
सबके नुते हैं चूल्हे।जनक जी करें अगवानी।
सुन्दर सजी राजधानी।चारों बहनें बनी है बन्नी।
दावत में बनी है सिन्नी।जनकपुरी में मचो है हल्ला।
दूल्हा बन के आये राम लल्ला।समधी गले मिल रहे हैं।
खुशी से सब खिल रहे हैं।सीता मैया को हल्दी चढ़ी है।
शुभलग्न में भाँवर पड़ी है।अब आयी विदा की बेला।
बहा देखो आंसुओं का रेला।रो रही है मैया प्यारी।
रोवें चारों जनक दुलारी।बेटियाँ जनक जी तुम्हारी।
बहु नहीं …

पुस्तक समीक्षा- पुस्तक- कुर्सी बिन सब सून

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पुस्तक समीक्षा- पुस्तक- कुर्सी बिन सब सून , व्यंग्यकार- डॉ0गोपाल बाबू शर्मा , पृष्ठ-64, मूल्य-70रु प्रकाशन वर्ष-2013ई0 समीक्षक- डॉ.दिनेश पाठक'शशि'निरन्तर गिरते जा रहे सामाजिक मूल्यों तथा बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के इस दौर में व्यंग्य लेखन एक चुनौती से कम नहीं। व्यंग्य स्वयं नहीं जन्मता बल्कि विरोधाभासों का तांडव, व्यंग्य को जन्म देता है। व्यंग्यकार के मन में किसी व्यक्ति की भावनाओं को आहत करने का विचार नहीं होता किन्तु सामाजिक बुराइयों पर भरपूर चोट करने की छटपटाहट उस लेखन को प्रेरित करती है ऐसे में अभिधा व लक्षणा से बात नहीं बनती तो वह व्यंजना का सहारा लेता है। ़व्यंग्य विधा की मुख्य विशेषता, परोक्ष रूप से मीठी मार के द्वारा समाज को सजगता प्रदान करना होता है जिसका निर्वाह व्यंग्यकार को चुनौतीपूर्ण होता है। हिन्दी साहित्य में व्यंग्य लेखन की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। भारतेन्दु काल से ही हास्य-व्यंग्य की रचनाएँ होने लगी थीं। द्विवेदी काल में व्यंग्यपूर्ण लेखों की परम्परा का खूब विकास हुआ जो उत्तरोत्तर उन्नयन की ओर बढ़ते हुए आज पूर्ण विकास कर चुका है। आज का व्यंग्यकार समाज में व्याप्…

योग से जुड़ रही है दुनिया -संजय द्विवेदी

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विश्व योग दिवस 21 जून पर विशेष  भारतीय ज्ञान परंपरा में योग एक अद्भुत अनुभव है। योग भारतीय ज्ञान का एक ऐसा वरदान है, जिससे मनुष्य की चेतना को वैश्विक चेतना से जुड़ने का अवसर मिलता है। वह स्वयं को जानता है और अपने परिवेश के साथ एकाकार होता है। विश्व योग दिवस, 21 जून के बहाने भारत को विश्व से जुड़ने और अपनी एक पहचान का मौका मिला है। दुनिया के तमाम देश जब योग के बहाने भारत के साथ जुड़ते हैं तो उन्हें भारतबोध होता है, वे एक ऐसी संस्कृति के प्रति आकर्षित होते हैं जो वैश्विक शांति और सद्भाव की प्रचारक है।   योग दरअसल भारत की शान है, योग करते हुए  हम सिर्फ स्वास्थ्य का विचार नहीं करते बल्कि मन का भी विचार करते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व योग दिवस को मान्यता देकर भारत के एक अद्भुत ज्ञान का लोकव्यापीकरण और अंतराष्ट्रीयकरण करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसके लिए 21 जून का चयन इसलिए किया गया क्योंकि इस दिन सबसे बड़ा दिन होता है। योग  कोई धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं है यह मन और जीवन को स्वस्थ रखने का विज्ञान है। यह पूर्णतः वैज्ञानिक पद्धति है जिससे व्यक्ति की जीवंतता बनी रहती है। भारत सरकार के प…

प्रदेश के प्रथम योग गुरु : गजानंद प्रसाद देवांगन

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21 जून योग दिवस पर विशेष                                        योग केवल शारीरिक क्रिया नहीं है । यह सिर्फ अंगों को नहीं बल्कि मन को भी साधने की एक प्रक्रिया है । योग का व्यावहारिक और परमार्थिक अर्थ है – स्वार्थ का परमार्थ से , मैं का तू से , व्यष्टि का समष्टि से , अहम का परम से , इड़ा का पिंगला से , शक्ति  का शिव से , विज्ञान का धर्म से और आत्मा का परमात्मा से मिलना । अर्थात एक - दूसरे को आपस में जोड़ते हुये परमात्मा तक जोड़ को सुदृढ़ बनाने की क्रिया योग है – यह कथन है प्रदेश के प्रथम योग गुरु स्व.श्री गजानंद प्रसाद देवांगन जी का ।                     स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी के विश्वायतन योगाश्रम से सन 1971 में योग में डिप्लोमा प्राप्त श्री देवांगन जी  , छत्तीसगढ़ साहित्य का एक जाना पहचाना नाम है  । 1972-1973 से अध्यापनरत स्कूल में , योग की विधिवत शिक्षा देने वाले प्रथम योग गुरु के योगदान को  , प्रत्येक वर्ष मनाये जा रहे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को स्मरण किया जाना समीचीन होगा , साथ ही  प्रदेश वासियों को बताना और जताना  , उतना जरूरी कि , वर्तमान युग का पहला प्रादेशिक योग गुरु बाहर…

"सतनाम संस्कृति में योग" / अनिल भतपहरी

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गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम संस्कृति में योग एक अभिन्न अंग है। या यूं कहें - अनुयायी और साधक सहज कर्म योग में प्रवृत्त रहते हैं।सतनाम सुमरन ध्यान और समाधि यहाँ विशिष्ट संस्कृति है। गुरु घासीदास के पूर्वज मेदनीराय गोसाई संत प्रवृत्ति के थे। वे गिरौदपुरी परिछेत्र में ख्याति नाम नाडी वैद्य रहे। मानव के साथ- साथ अवाक पशुओं के चिकित्सा कर उनकी दुख और पीड़ा का शमन करते थे। वे  अपना नित्य कर्म सतनाम सुमरन और सहज ध्यान योग से आरंभ करके कर्मयोग में निरत हो जाया करते थे।मेदनीदास /महगूदास के यहाँ अनेक सिद्ध साधु महात्माओं निरन्तर आगमन होते रहते और मानव कल्याण के साथ साथ जीवन के मुक्ति के संदर्भ में साधु संगत समय समय पर होते रहते।बाल्यावस्था में ही शिशु घासी को विरासत से मानव और पशुओं की पीडा दुख का शमन करने की कला कौशल मिल गये थे। और साधु महात्माओं के दर्शन व सत्संग भी। अनेक सहजयान- ब्रजयान के साथ साथ गोरख पंथी साधुओं का सान्निध्य मिलते रहे हैं।जन्म के तत्क्षण बाद एक साधु का नवजात शिशु का दर्शन करने आना और बालक को गोद में लेकर आंगन में नाचना तथा उनके चरणों में शीश नवाना एक विलक्षण बालक के शुभागम…

“नजरें बदलो नजारे बदल जायेंगे” / पंकज "प्रखर"

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आपकी सोच जीवन बना भी सकती है बिगाड़ भी सकती है सकारात्मक सोच व्यक्ति को उस लक्ष्य तक पहुंचा देती है जिसे वो वास्तव में प्राप्त करना चाहता है लेकिन उसके लिए एक दृढ़ सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है| जब जीवन रुपी सागर में समस्या रूपी लहरें हमें डराने का प्रयत्न तो हमें सकारात्मकता का चप्पू दृढ़ निश्चय के साथ उठाना चाहिए | यदि आप ऐसा करते है तो निश्चित रूप से मानकर चलिए आप की नैया किनारे लग ही जाएगी | लेकिन ये निर्भर करता है की उस समय समस्या के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है ,आप उन परिस्थितियों पर हावी होते है या परिस्थितियाँ आप पर  दो पंक्तियाँ याद आती है नजरें बदली तो नजारे बदले ,कश्ती ने बदला रुख तो किनारे बदले| सोच का बदलना जीवन का बदलना है जी हाँ आप जब चाहे अपने जीवन को बदल सकते है|समाज में कई बार देखने को मिलता है की एक व्यक्ति जो पूरी मेहनत से काम करता है वो उस व्यक्ति से पीछे रह जाता है जो कम समय में मेहनत करता है और अधिक सफल दिखता है| यह प्रायः: विद्यार्थियों के साथ भी देखा जाता है कम मेहनत करने वाला  छात्र ज्यादा अंक अर्जित करने में सफल होता है| जबकि पूरे वर्ष लगन से पढ़ने वाला छात्…

कल की एक उम्मीद / कहानी / राजन कुमार

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जिंदगी में मुझे तकलीफों का सामना बहुत ही कम करना पड़ा। अब तक मैं यही सोचता था कि मेरा परिवार पहले से ही खुशहाल रहा है। पर आज माँ से उसकी आपबीती सुनकर मैं सन्न रह गया। बात कुछ दिनों पहले की है, किसी विषय को लेकर माँ और पिताजी के बीच कहा-सुनी हो गई थी। मैं पापा के साथ रहता था, इसलिए उनकी बातें सुनकर माँ को फोन पर ही डाँटने लगा, मेरी बातें सुनकर वह सिसकते हुए बोली, “बेटा तुम्हारे पापा ने जो कहा उनकी बातें सुनकर तू भी मुझसे लड़ने-झगड़ने लगा।” पर सुन, ‘आज मैं तुम्हें वह सच्चाई बताने जा रही हूँ, जिससे तू अब तक अनजान है।’पहले तो मैं थोड़ा घबराया, फिर माँ की बातें गौर से सुनने लगा। माँ ने बताना शुरू किया, ‘बेटा! तुम्हारे पापा ने मेरे दर्द को कभी समझा ही नहीं बल्कि उसने मुझे हमेशा दुःख ही दिए। शादी के बाद से अब तक खुशी मुझे शायद ही नसीब हुई हो। वह दिन मुझे आज भी याद है जब तुम्हारी बड़ी बहन पैदा हुई थी, मैं खुश थी कि मेरे घर लक्ष्मी आई है। पर तुम्हारे पापा और दादी के चेहरे मुरझाए हुए थे, क्योंकि उन्होंने लड़के की उम्मीद जो पाल रखी थी।’समय यूँ ही गुजरता रहा, फिर दूसरी बेटी का जन्म हुआ। इस बार से…

प्रदीप उपाध्याय की दो लघुकथाएँ

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लघु कथा।(1)चरित्रदेखिये मिसेस शर्मा,हमारे पड़ोसी चोपड़ा साहब की लड़की का केरेक्टर! नित नये लोगों की गाड़ी पर घर से जाते हुए देखा है। कैसे माता-पिता इसको अनदेखा कर देते हैं। लोग तरह तरह की बातें करते हैं परन्तु उन्हें जरा भी शर्म नहीं है।छोड़ो न,अपने को क्या करना है। आजकल की लड़कियाँ ही ऐसी हैं। देखो न,अपना चिन्टु कितना भोला-भाला है। कितनी लड़कियाँ उसके पीछे पड़ी रहती हैं। किसी को कॉलेज छोड़ना तो किसी की शॉपिंग करवाना। अब किन-किन को वह कितना टाईम दे। फिर भी वह सम्बन्धों को निभाता  है। मोहल्ले वाले तो उसे कृष्ण कन्हैया ही कहने लगे हैं।लघु कथा।(2)अन्तर“भाई ने देखो कितना गलत किया है। मम्मी-पापा का बहुत दिल दुखाया है। वे उसे कभी माफ नहीं करेंगे। लड़की भी गैर जाति की है और उन लोगों ने भी देख लिया कि लड़का आय ए एस हो ही गया है। कोई दहेज भी नहीं देना पड़ेगा।” निशा ने भड़कते हुए कहा।“लेकिन तुमने भी तो प्रेम विवाह किया था और तुम्हारे पति भी दहेज विरोधी रहे हैं। तुमने भी अन्तर्जातीय विवाह किया है। ऐसी स्थिति में तुम्हें तो अपने भाई का पक्ष लेना चाहिए।” मैंने कहा“नहीं, हमारी बात अलग है। हमने सेम प्रोफेशन में …

कहानी - दाग ही तो है..... / अपर्णा बाजपेयी

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बहुत दिनों बाद आज जीन्स पहन कर घर से निकली थी। जीन्स में जो कम्फर्ट मिलता था वो किसी और ड्रेस में नहीं था। मन थोड़ा खुश था, उन्मुक्त , एक अलग एहसास। सोचा थोड़ी दूर पैदल चल कर अगले बस स्टाप से बस पर पकड़ूंगी। समय भी था । आज ऑफिस में ज्यादा काम भी नहीं था। बस स्टॉप पर पारूल मिल गयी मेरी कलीग। हम दोनों साथ साथ बस में चढ़े। बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी। सामने की सीट खाली थी । हम दोनों बैठ गये। मैं बैठी ही थी कि पेट के नीचे थोड़ा मरोड़ सा हुआ। थोड़ी देर बाद मुझे कुछ डिस्चार्ज सा महसूस हुआ । मैं समझ गयी थी क्या हुआ लेकिन चार दिन पहले..... अब क्या करें। ब्लड शायद जीन्स की हद पार कर चुका था। मैं पेट को दबाकर बैठी थी इस उधेड़बुन में क्या करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैंने पारूल के कान में बताया तो उसका चेहरा देखने लायक था । वो क्या बताती उसकी तो जैसे जान अटक गयी थी। मेरा स्टॉप आने वाला था लेकिन सीट से उठूं कैसे ... सीट में दाग लगा हुआ तो... किसी ने देख लिया तो.... ऑफिस तक कैसे जाऊंगी... बैग में एक सैनिटरी पैड है लेकिन टॉयलेट तो कहीं नहीं है । बस स्टॉप आ गया था । मैंने पारूल से कहा पहले तू उतर फिर मैं …

सिर्फ़ डेढ़ सौ रू० (कहानी) / डॉ० आसिफ़ सईद

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करवट बदलते-बदलते आधी रात से ज़्यादा का वक़्त हो गया था लेकिन नींद थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी। बेचैन हो सुबह उठ खड़ा हुआ और एक गिलास में पानी निकाल कर वह बाहर बॉलकनी में आया, तभी सामने खिड़की में उसे बहुत ही हल्की रोशनी में समद भाई नमाज़ पढ़ते नज़र आये, उसने अन्दर आकर घड़ी देखी तो तीन बजे थे. वह समद भाई के बारे में सोचता हुआ लेट गया, जब सुबह आँख खुली तो घड़ी में दस बज रहे थे, वह जल्दी से तैयार हो कॉलेज पहुँच गया। सुबह ग्रेजुएशन कर रहा था और गाँव का रहने वाला था दूसरे माँ बाप की तरह सुबह के माँ-बाप का भी सपना था कि उनका बेटा पढ़-लिखकर बहुत बड़ा आदमी बने. और अपने गाँव का नाम ख़ूब रोशन करे. उसे शहर आए तीसरा साल चल रहा था।ख़्वाब और ख़्वाहिश ज़रूरी नहीं कि यह पूरी हों, पर इन्सान ज़िन्दगी में न जाने कैसे-कैसे ख़्वाब देख लेता है, ऐसा ही एक ख़्वाब सुबह ने देखा है अन्जुम के लिए, अन्जुम क़ुदरत का एक रंगीन शाहकार जिसका नाम सुनते ही सुबह के दिल की धड़कने तेज़ हो जाती हैं, जिसकी एक झलक के लिए वह घण्टों कहीं भी एक टांग पर खड़ा रह सकता है, जिसकी ख़ातिर वह दुनिया का कोई भी मुश्किल से मुश्किल काम कर सकता है, अ…

रमेशराज के विरोधरस के दोहे

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------------------------------------------पीते आये आज तक जो जनता का रक्त
  वही अधम इस दौर में बनें देश के भक्त |
“ तेरी रक्षा मैं करूं हो मत नारि अधीर “
   चीर खींचते वो कहे “ बढ़ा रहा मैं चीर ” |
जिसके मन-भीतर बसा अहंकार छल द्वेश
  दुष्ट आज धारण किये गुरु नानक का वेश |
भगतसिंह-आज़ाद की कुर्बानी कर याद
  धीरे-धीरे जाल को बिछा रहा जल्लाद |
कभी खत्म होती नहीं वीरों की तादाद
भगतसिंह हैं और भी भगतसिंह के बाद |
खल के सम्मुख क्यों करे बन याचक सम्वाद
  खरबूजे की कब सुनी चाक़ू ने फरियाद |
  + हर सहमति मुझसे बने कहता है प्रतिकार
“ मैं  जल का भण्डार हूँ “ बोल रहा अंगार |
बाँट रहा वो आजकल केवल ख्वाब हसीन
वो रोटी देता नहीं, रोटी लेता छीन |
उसने ऐसे कर दिया ‘सही सोच’ का अंत
पतझर को हम देखकर बोलें आज ‘ वसंत ‘ |
चिन्तन को कुछ भी नहीं आज हमारे पास
  धीरे-धीरे आ रही हमें गुलामी रास |
आमों की चाहत लिए बोने लगे बबूल
  अंधभक्त हम कह रहे अब काँटों को फूल |

धर्मग्रन्थ कोई उठा इतना-सा है मर्म
ऊंचनीच के भेद को नहीं जानता धर्म |
अंधकार अब कह रहा-“मुझसे सुखद प्रभात”
करता छँटना आजकल जल-संचय की बात |

मरुथल कहे-“समुद्र हूँ“…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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