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January 2017
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क्लेर ओ’ फेरेल

मिशेल फूको और उत्तर आधुनिकतावाद : सिडनी पेपर्स

(अनुवाद - पुनर्वसु जोशी)

सर्वप्रथम तो मैं श्री जेरार्ड हेंडरसन को धन्यवाद देना चाहूंगी, जिन्होंने मुझे सिडनी इंस्टिटय्ूट में उद्बोधन के लिए आमंत्रित किया। बहरहाल, जो शोधपत्र यहां मैं पढ़ने जा रही हूँ, वह मुख्यतः प्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक मिशेल फूको और उनकी जिरहों के साथ ही उनकी उपलब्धियों तथा उनके अवदान के आसपास केंद्रित है। मिशेल फूको जो सन 1926 में जन्मे और सन 1984 में जिन्होंने इस संसार से विदा ली, वे बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक प्रभावशाली दार्शनिक और चिंतक हैं। उनके विचार, सामाजिक विज्ञान, मानविकी तथा व्यावसायिक अनुशासन, जैसे कि शिक्षा, प्रबंधन अध्ययन और स्वास्थ्य की समूची परिधियों तक व्यापक रूप से प्रयुक्त हुए हैं। उनका काम, विस्मयजनक रूप से ध्रुवीकृत प्रतिक्रियाओं की तरफ ध्यान खींचने की चेष्टा करता है। मिशेल फूको का एक ओर जहाँ अत्यंत उत्साह के साथ प्रतिमा पूजन हुआ, वहीं दूसरी ओर उन्हें पर्याप्त निंदा के साथ निरस्त भी किया गया। मैं उनके ओजस्वी स्वागत के विषय में तो यथा आवश्यक दृष्टिपात करूंगी ही, लेकिन साथ ही साथ, उनके उस व्यक्तित्व पर भी दृष्टि डालूंगी, जो इतनी प्रबल प्रतिक्रिया और मताभिव्यक्ति को जन्म देता है।

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मिशेल फूको का नाम, अक्सर उत्तर आधुनिकता के इर्द-गिर्द होने वाले विमर्शों में प्रकट होता है। बावजूद इस तथ्य के कि उन्होंने कभी भी इस ‘विचार’ से संबंधित आंदोलन से जुड़े होने का दावा नहीं किया। इस ‘ज्ञात-संबंध’ की रोशनी में, मैं हाल ही में जनमाध्यम में उत्तर आधुनिकतावाद तथा उसके घातक प्रभावों को लेकर हुई ताजा बहस पर, अपनी कुछ टिप्पणियों के साथ, बात करूंगी, जिनका असर आमतौर पर, साहित्यिक हलकों पर तथा खास तौर पर स्कूलों में पढ़ाए जा रहे पर, हुआ है। यहाँ तक कि अंग्रेजी, इतिहास और इतिहास के शिक्षण पर तथाकथित उत्तर आधुनिकतावाद के नकारात्मक प्रभाव को लेकर प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने भी इन बहसों को परखने के बाद टिप्पणी की, जो व्यापक रुप से पढ़ी-सुनी गई। वैसे यह अभी भी पूर्णतः स्पष्ट नहीं है कि इन बहसों में योगदान देने वाले वास्तविक रूप से, उत्तर आधुनिकतावाद से क्या अर्थ रखते हैं। परंतु सामान्यतः कहने के लिए यह शब्द, उस एक किस्म की भंगिमा को प्रकट करता है, जो अवेध्य ‘जार्गन’ और ‘पॉलिटिकल करेक्ट्नेस’ को परस्पर मिलाता है। जिसके चलते, लोकप्रिय संस्कृति के उत्पाद की तरफ अकारण ही ध्यान आकर्षित करता है, साथ ही वस्तुगत सत्य और तथ्य के प्रति, असावधान सम्मान पैदा करता है।

तर्क कुछ यूं जाता है कि स्कूल के छात्रों को, फ्रेंच और जर्मन दार्शनिकों (जिसमें मिशेल फूको का नाम अक्सर प्रमुखता के साथ लिया जाता है।) से प्राप्त यह ‘दुरूह सिद्धांतिकी’ और ‘पॉलिटिकल करेक्ट्नेस’ की यह खुराक, जबर्दस्ती पिलाई जा रही है, बजाय उन्हें प्राथमिक कौशल, जैसे ‘सही उच्चारण कैसे करें, या सही वर्तनी कैसे लिखें’ सिखाने के, या बजाय उन्हें संस्कृति, इतिहास, और ऐतिहासिक कालक्रम के मूलभूत तथ्यों के पढ़ाने के।

और तो और, तर्क यह भी दिए जा रहे हैं कि ‘ग्रेट वाइट योरपीय पुरुषों’ के ‘अमर’ शास्त्रों को, जिनको कि हर स्कूली बालक को याद करवाया जाना चाहिए, वह, लोकप्रिय संस्कृति के क्षणभंगुर ‘ज्ञान’ पर अनुचित जोर देने से अपदस्थ हो रहा है। बहरहाल, 20 अप्रैल, सन 2000 को ए.बी.सी. से प्रसारित अपने प्रसारण में, प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने, उनके उद्धरण के अनुसार, कहा कि, ‘इस तथाकथित उत्तर आधुनिकतावाद के बारे में कई लोगों के दृष्टिकोण’ से, वे पूर्णतः सहमत हैं। उन्होंने आगे जोड़ा, ‘हम यह समझते हैं कि एक तरफ तो जहाँ उच्च स्तरीय साहित्य है, वहीं दूसरे ओर निरा कूड़ा भी है। दरअसल, हमें ऐसे पाठय्क्रम की आवश्यकता है, जो उत्कृष्ट साहित्य की समझ को बढ़ावा दें, बजाय ‘निरे कूड़े’ के।’

निश्चित रूप से, यह समझने बात है कि प्रधानमंत्री की ऐसी टिप्पणी ने ध्यान आकर्षित करते हुए, मीडिया और शैक्षणिक वृत्तों में एक बहस को भी जन्म दिया है और साथ ही साथ ‘द ऑस्ट्रेलियन’ (सन 1964 से प्रकाशित होने वाला ऑस्ट्रेलिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार-अनु.) के द्वारा ‘उत्तराधुनिकता’ और ‘आलोचनात्मक-साक्षरता’ की बुराइयों के विरुद्ध चलाए जा रहे एक लंबे अभियान में, आग में घी का काम किया है। यद्यपि, जैसा कि कुछ लोगों ने इंगित किया है कि उन बहसों में बहुतेरे भ्रम और अंतर्विरोध भी प्रकट होते हैं, जबकि दूसरी ओर यह तर्क भी दिया जा रहा है कि, यह उत्तर आधुनिकता, इतनी उच्चस्तरीय सिद्धांतिकी जो कि स्नातकोत्तर विश्वविद्यालयीन कक्षा के विद्यार्थियों के लिए भी दुरूह है, वह स्कूल के स्तर पर पढ़ाई जा रही है। विडंबना यह है कि इस तर्क के साथ, यह तर्क भी जुड़ा हुआ है कि विद्यार्थियों को लोकप्रिय संस्कृति का ‘कूड़ा’ संस्करण पढ़ाया जा रहा है, और इसके फलस्वरूप, अगर हावर्ड के शब्दों में कहें तो, हम अंग्रेजी के पाठय्क्रम के ‘सरलीकरण’ को देख रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘अपर्याप्त’ रूप से समझे गए विचारों को आत्मसात करने से कुछ गंभीर समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, परंतु यह तर्क इतना सशक्त नहीं है कि ‘चमड़े के लिए भैंस’ मार दी जाये।

इस बहस में खास तौर पर एक अतिरेकी अवदान तो जाइल्स ओटी का है, जो उन्होंने हावर्ड द्वारा रेडियो को दिए गए साक्षात्कार के पश्चात, 21 अप्रैल को ‘द ऑस्ट्रेलियन’ प्रकाशित किया। ओटी, मार्क्सवाद और उत्तर आधुनिकतावाद- यह दो विश्वदृष्टियाँ, जो कि एक दूसरे से पर्याप्त रूप से विपरीत होने के रूप में मान्यता प्राप्त हैं- इन दोनों विश्व दृष्टियों को एक दूसरे में मिश्रित कर के अपना तर्क प्रारम्भ करते हैं और फिर उन्हें शिक्षा के ‘वर्तमान, गुप्त रूप से राजनीतिकारण से ग्रसित, और शैक्षणिक रूप से विनाशकारी प्रारूप’ के लिए दोष देते हैं। ओटी के अनुसार, वह व्यक्ति, जो इन दोनों विचारधाराओं का मूर्त रूप है और जो ‘जिस तरह हमारे बच्चे और विश्वविद्यालय के छात्र पढ़ाये जा रहे हैं, उन तरीकों का ‘मरणोपरांत मध्यस्थता’ कर रहा है’ वह और कोई नहीं बल्कि मिशेल फूको हैं, जो कि ओटी के विवरण में, बौद्धिक जगत के ‘ओसामा बिन लादेन’ के समकक्ष उभरते हैं, तथा जो ‘ऑस्ट्रेलियन स्कूलों में हाजिर होने वाले हजारों-हजार बच्चों’ पर अपना पापमय प्रभाव डाल रहे हैं।

ओटी के, मिशेल फूको के ‘व्यक्तिगत’ के इस ‘स्याह’ विवरण को दरकिनार करते हुए, ओटी के द्वारा लिखा गया, यह आलेख इसलिए उल्लेख के योग्य है क्योंकि, यह फूको के विरुद्ध दिये गए, उन घिसे-पिटे और अतिपरिचित आरोपों के कथानक को दोहराता है, जो कि निम्नलिखित हैं।

1. सर्वप्रथम, यह कि फूको ‘वस्तुगत’ सत्य या ‘तथ्यात्मक’ चीजों में विश्वास नहीं रखते, और ‘सब कुछ चलता है’ के उस अतिरेकी उत्तराधुनिक दृष्टिकोण को अंगीकार करते हैं। संक्षेप में, अगर आप किसी वस्तु में विश्वास रखते हैं, तो वह सत्य है। इसके अलावा, ‘सत्य’ जैसा कुछ भी नहीं है, जो है वह सिर्फ ‘सत्ता’ है। जिसे लोग ‘सत्य’ मान कर चलते हैं वह और कुछ नहीं सिर्फ ‘सत्ता के संघषोंर्’ का उत्पाद है।

2. दूसरे, फूको एक अनैतिक नकारवादी हैं- एक अराजकतावादी, जिसकी एकमात्र रुचि सिर्फ आज जो अस्तित्व में है, उस समकालीन व्यवस्था को ढहाना और ध्वस्त करना है, और उस व्यवस्था के स्थान पर कोई अन्य वैकल्पिक प्रस्ताव नहीं देना और उन मूढ़ लोगों के मध्य, जो कि उसके लिखे को पढ़ते हैं, के मध्य सिर्फ एक सामान्य बदहवासी, उदासीनता और राजनीतिक नकारवाद फैलाना भर है।

3. तीसरे, फूको और अन्य जैसे कि, जॉक देरीदा (विखंडनवाद के प्रणेता), ज्याँ फ्रांसवा ल्योतार (‘द पोस्ट मॉडर्न कंडीशन’ के लेखक) और ज्याँ बौदलियार (अपनी इस स्थापना के लिए प्रसिद्ध कि समकालीन संस्कृति, स्वयं के अलावा किसी का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।) दुरूह शब्दों के एक ऐसे शब्दजाल बुनने के लिए जिम्मेदार हैं, जिसका कि कई अकादमिक अनुशासनों में अँग्रेजी की स्पष्ट अभिव्यक्ति और गल्प पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है। यह ‘लक्कड़-जुबान’, जैसा कि यह बहुरंगी फ्रेंच मुहावरा ‘विचारधाराओं की शब्दावलियों’ के बखान के लिए प्रयुक्त होता है, अँग्रेजी और इतिहास के पाठय्क्रमों में, प्रताड़ित करने के लिए, छन कर आ गई है।

 

4. और अंतिम, यह भी कि फूको की व्यक्तिगत नैतिकता अत्यधिक संदिग्ध है।

वास्तव में, यह अत्यधिक ‘बढ़ा-चढ़ा’ हुआ तुच्छ बखान है जो कि कतिपय मीडिया में, ऑस्ट्रेलिया और उसके बाहर, अक्सर मिलता है। इससे अधिक सहानुभूतिपूर्ण और संतुलित विवरण, अमूमन, केवल अकादमिक पुस्तकों या पत्र-पत्रिकाओं में मिलता है, जो वैसे ही सीमित प्रसार में होती है, या फिर पढ़ी-लिखी, अकादमिक जन-समूह को लक्षित करते हुए उन विशिष्ट विषय केन्द्रित माध्यमों में, जैसे कि ‘द बुक शो’ और ‘द फिलोसोफर्स जोन’ (ऑस्ट्रेलियन रेडियो पर प्रसारित होने वाले ये दोनों कार्यक्रम साहित्यिक जनसमूह को केंद्र में रख कर बनाए और प्रसारित किए जाते-अनु०)। अतः, दुर्भाग्यवश, जन साधारण, जिन विचारों के बारे में हम बात कर रहे हैं, उनके बारे में, निरंतर, और इरादतन भ्रमित करने वाले बखान सुनते रहे। बिना किसी विकल्प के, जो कि उन विचारों के लिए प्रतिपक्ष भी रख सके। फूको के काम से संबन्धित इसी प्रकार के ‘बक-वाद’ की सार्वजनिक घटना, अभी हाल ही में फूको के विकिपीडिया पृष्ठ पर देखने में आई, जो कि सन 2006 के अगस्त माह में, एक भीषण, उन्मुक्त ‘सम्पादन युद्ध’ का विषय था। (इन्टरनेट पर उपलब्ध विकिपीडिया पर किसी भी विषय से संबन्धित, किसी भी पृष्ठ को, कोई भी व्यक्ति संपादित कर सकता है-अनु.)। विकिपीडिया, निश्चित रूप से, अधीरता में रहने वालों के लिए, ज्ञान के सर्वस्व का एक सुविधाजनक इंटरनेट फव्वारा है। इस ताजा ‘सम्पादन-युद्ध’, जो कि मिशेल फूको की विकिपीडिया की प्रविष्टि के ‘बहस’ के पृष्ठों पर पूरी तरह दर्ज है, के फलस्वरूप दो प्रविष्टिकर्ता स्थायी रूप से प्रतिबंधित हो चुके हैं और एक अन्य बर्खास्त है। चारों दृष्टिकोण, जो कि पहले उल्लेखित हैं, इस ‘सम्पादन युद्ध’ में उन्हें पर्याप्त तरजीह दी गई।

इस एक दीर्घ प्रस्तावना के उपरांत, मैं अब फूको के काम के प्रभाव के सकारात्मक मूल्यांकन को प्रस्तुत करूंगी। मैं अब मिशेल फूको के कार्य को संदर्भित करने वाली विभिन्न राजनीतिक और ऐतिहासिक घटनाओं पर विशेष बल देना चाहूँगी, क्योंकि अक्सर या तो इन मुद्दों की चर्चा ही नहीं होती या फिर जब पाश्चात्य सभ्यता की वर्तमान अवनति के बारे की जाने वाली उपदेशात्मक भाषणों में, मिशेल फूको का नाम बिना सोचे समझे ले लिया जाता है, तब इन घटनाओं का मात्र सतही विवरण भर दे दिया जाता है।

मिशेल फूको, सन 1926 में एक सुविधा-जीवी मध्यमवर्ग के एक नौकरी पेशा परिवार में जन्मे थे। उनके पिता एक चिकित्सक थे, और चाहते थे कि उनका पुत्र भी परिवार की परंपरा का अनुसरण करे और चिकित्सा-शिक्षा लेकर यशस्वी चिकित्सक बन जाएगा। सन 1946 में उन्होंने पेरिस के प्रतिष्ठित ईकोल नोर्माल सुपीरियर में दाखिला लिया। सन 1845 में स्थापित हुआ, यह संस्थान मूलतः अध्यापकों के लिए शैक्षिक महाविद्यालय था, लेकिन बहुत ही कम समय में उसने फ्रांस के सर्वोत्तम संस्थानों में अपनी जगह बना ली और फ्रांस के शीर्ष बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ और यहां तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता भी दिये। लुई पाश्चर, ज्याँ पाल सार्त्र आदि इसी संस्था के पूर्व छात्र थे। सन 1950 में मिशेल फूको, उस समय के तमाम अन्य स्वाभिमानी, और क्रांतिकारी छात्रों के तरह, ईकोल के स्थानीय साम्यवादी पार्टी के प्रकोष्ठ से जुड़ गए। हालाँकि, उनका साम्यवादी पार्टी से जुड़ने का निर्णय, इण्डो-चाईना में चल रहे युद्ध से जुड़ी घटनाओं से प्रभावित था, परंतु, उनका कार्यकाल अत्यधिक उत्साहजनक नहीं रहा-वे यदा-कदा ही पार्टी की बैठकों में भाग लेते थे और सन 1953 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी, जब सोवियत संघ में कुछ यहूदी डॉक्टर कथित तौर पर राजद्रोह के लिए कारावास में डाल दिये गए। (मिशेल फूको के साम्यवादी पार्टी छोड़ने के इस प्रसंग का विवरण, इसी अंक में दिये गए मिशेल फूको के साक्षात्कार में विस्तार से है-अनु.) दिलचस्प बात यह है कि मिशेल फूको का यहूदियों के प्रति द्वेष, पूर्वाग्रह और भेदभाव की भावना की सीधी अस्वीकृति, उनकी जीवन यात्रा में, काफी बाद में सामने आई। सन 1982 में, पेरिस में, एक प्रसिद्ध यहूदी रेस्तरां पर एक गंभीर आतंकवादी हमले के पश्चात, जिसमें कि कई लोग घायल हुये और कई मारे गए, फूको, आतंकवाद के विरोध में, एक संकेत के रूप में, जितना हो सकता था, उतना वहाँ जाते थे और खाना खाते थे। परंतु, चलिये, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के, फ्रांस के राजनीतिक और बौद्धिक परिवेश की ओर पुनः लौटते हैं। दक्षिण पंथी विचार धाराएँ, जिन्होंने मातृभूमि से लगाव, पारंपरिक कुटुंबीय मूल्यों और सत्ता और सेना के सम्मान की बात की थी, वे जर्मन आधिपत्य और उसके पश्चात, वृद्ध होते प्रथम विश्व युद्ध के नायक मार्शल पितां के नेतृत्व में बैठाई गई कठपुतली सरकार के कार्यों के कारण, निर्ममता से लज्जित की गई थी। दक्षिण पंथी राजनीतिक दर्शन के ढहने से उत्पन्न शून्य को, प्रारम्भ में विभिन्न प्रकार के वाम पंथी, मार्क्सवादी, कैथोलिक और अस्तित्ववाद के नास्तिकतावादी संस्करणों ने भरने की कोशिश की। साम्यवादी पार्टी ने, जिसने कि (थोड़े विलंबे से ही सही) प्रतिरोध में अपना योगदान दिया, उस योगदान के फलस्वरूप जन साधारण की दृष्टि में एक यशस्वी और शानदार छाप स्थापित कर ली थी। दक्षिण पंथी राजनीतिक दर्शन के अवशेष, हालाँकि, फिर भी, विशेष तौर पर, चार्ल्स द गएल की नीतियों और सिद्धांतों में जीवित थे। ये सारे भिन्न-भिन्न आंदोलन, ‘मानवतावाद’ के एक विस्तृत छत्र में समूहबद्ध कर दिये गए थे। इस दर्शन की मुख्य धारणा यह थी कि, ‘मानवीय प्रकृति’ जैसा कुछ ही यह निर्धारित करता है कि जनता किस प्रकार विश्व में रहे और जिये। ‘मानवीय प्रकृति अपने अपने दृष्टिकोण के अनुसार, या तो ईश्वर-प्रदत्त थी, या एक प्रकार का प्राकृतिक जैविक साँचा थी, जो कि पूरे इतिहास में सतत् थी, और जिसे कि शनैः शनैः उद्घाटित किया जा सकता था और जिसे मानवीय और भौतिक विज्ञानों के प्रयासों द्वारा, या अगर कोई साहित्यिक या दार्शनिक रुझान का हो तो, कलात्मक और दार्शनिक आत्म- निरीक्षण की प्रक्रिया के द्वारा, परिभाषित भी किया जा सकता था।

हालाँकि, 1950 के दशक के अंत में, फ्रांस और फ्रांस के बाहर की कई घटनाओं, जैसे कि ख्रुश्चेव रपट, जिसने कि स्टालिन की नीतियों और सिद्धांतों की निंदा की थी, अल्जीरिया का युद्ध, और हंगेरियन क्रान्ति का साम्यवादी दमन, ने बुद्धिजीवियों के हलकों के बीच, एक व्यापक मोह-भंग को जन्म दे दिया था जिसके परिणामस्वरूप, कइयों ने प्रत्यक्ष राजनीतिक मुद्दों से अपना मुँह मोड़ लिया और उन ‘वैज्ञानिक’ क्षेत्रों की छान-बीन करने लगे, जो कि विचारधारात्मक रूप से तटस्थ थे और जो तात्कालिक प्रसंग थे। इन युवा बुद्धिजीवियों ने, मानवतावादी दृष्टिकोण, जो कि उन्हें राजनीतिक रूप से समझौतावादी और प्रचलन से बाहर लगता था, उसे रद्द कर दिया। इस नए आंदोलन के एक सदस्य थे, मिशेल फूको, जो इस काल खण्ड के संबंध में टिप्पणी करते हैं :

”युद्ध के अनुभव ने हमें एक ऐसे समाज की अविलंब आवश्यकता दर्शाई थी, जो कि जिस समाज में हम रह रहे हैं-वह समाज जिसने कि नाजीवाद को अनुमति दी थी, उससे पूर्णतः भिन्न हो... फ्रांसीसी युवा के एक बहुत बड़े हिस्से की उस सबके प्रति घृणा की प्रतिक्रिया थी।“

इस नए आंदोलन को अखबारों ने ‘संरचनावाद’ का नाम दिया था।

आम तौर पर कहा जाये तो, ‘संरचनावाद’ इस विचार को रद्द करता है कि ‘सार्वभौमिक मानवीय प्रकृति’ जैसा कुछ है, जो कि सारे इतिहास और अस्तित्व की व्याख्या कर सकता है। ‘संरचनावादियों’ का यह तर्क था कि, ‘अर्थ’ का निर्धारण, वस्तुओं के अंतरसबंध से होता है- वह स्वयं ‘वस्तुओं’ में स्थित नहीं है। बजाय यह खोजने की कोशिश करने के कि ‘मनुष्य’ का वास्तव में अपना ‘सार’ क्या है, ‘संरचनावादियों’ की रुचि, ज्ञान, संस्कृति, समाज और भाषा की आधारभूत ‘संरचनाओं’ को समझने में थी। तो, उदाहरण के लिए, रोलां बार्थ, यह तर्क देते हैं कि ‘लेखक’ सिर्फ भाषा का ‘वाहक’ है, वह भाषा जिसकी कि पहले से ही, जब लेखक ने लिखना भी प्रारम्भ नहीं किया था, तब से ही अर्थ और संरचनाएँ हैं। मार्क्सवादी चिंतक, लुई अल्थुसर ने यह सुझाव दिया कि इतिहास महज एक प्रक्रिया है जिसे लोग क्रियान्वित करते हैं- वे एक व्यक्तिगत स्तर पर उसके प्रभारी नहीं हैं।

मिशेल फूको का काम, विचार के इस आंदोलन में बिलकुल ठीक बैठता था। अगर हम उनके काम को उसकी विषयों के रूप में देखें तो वह इस प्रकार होगा : सन 1950 और 1960 के दशक में, फूको का प्रारम्भ का काम, विज्ञान के इतिहास और विज्ञान के दर्शन के व्यापक क्षेत्रों में रहा है। सन 1970 के दशक में, उन्होंने अपना ध्यान प्रत्यक्ष रूप से संस्थानों और ‘राज्य’ के इतिहास पर एकाग्र किया। फिर सन 1980 के दशक में, वे नैतिक तंत्रों के इतिहास की जांच-पड़ताल में जुट गए। उन्होंने, साहित्य और कला, हिस्टोरियोग्राफी (इतिहास के लेखन और लिखे हुए इतिहास का अध्ययन-अनु.), समसामयिक विषयों और राजनीति पर भी लिखा। मूल, ध्यान देने योग्य शब्द यहाँ ‘इतिहास’ है। कहना न होगा कि फूको, उतने ही इतिहासकार भी थे, जितने की वे दार्शनिक। वे, ज्ञान की ऐतिहासिक प्रणालियों में, प्रतिमानों की व्यवस्था को, बिना अस्पष्ट श्रेणियों, जैसे ‘जीनियस’, ‘प्रगति’, ‘तर्क-संगतता’, ‘कारण’, और ‘प्रभाव’ में आयोजन के सहारे पहचानने के लिए उत्सुक थे। व्यवस्था के ये प्रतिमान, उनके तर्क के अनुसार, ‘काल’ और ‘स्थान’ के प्रति पूर्णरूपेण विशिष्ट हैं, हालाँकि, उनका प्रयोग, ‘कल क्या होगा?’ यह जानने में नहीं किया जा सकता, परंतु, ये उस ‘आधार’ को समझने के लिए उपयुक्त हैं जिन पर हमारे आज के ‘समाज’ टिके हुए हैं और उन रास्तों को सचेत ढंग से खोलने के लिए भी, जो संभाव्य परिवर्तन की दिशा में जाते हैं। परंतु, हम यहाँ पर संभवतः अमूर्तता की तरफ भटक रहे हैं, और यह एक उपयुक्त बिन्दु होगा जहाँ से हम फूको के काम के वास्तविक और ठोस कथ्य की ओर देखना प्रारम्भ करें।

फूको ने अपना पहला काम, सन 1954 में, मनोविज्ञान पर प्रकाशित किया था, परंतु उन्होंने व्यापक ध्यानाकर्षण, अपनी पुस्तक ‘मैडनेस एंड सिविलाइजेशन’ के प्रकाशन से, सन 1961 में किया। 700 पृष्ठों के इस वृहद खण्ड का अँग्रेजी में अनुवाद, अभी सन 2006 में जा कर ही हुआ है। इस कृति में, फूको, तेरहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक के कालखण्ड में, पाश्चात्य जगत ने किस तरह ‘पागलपन’ का सामना किया, इस इतिहास का अनुसंधान करते हैं। उनका कार्य, अनुशासनों के एक व्यापक दायरे को जिसका विस्तार एक तरफ कला और साहित्य से लेकर, विज्ञान, औषधि-विज्ञान, और अर्थशास्त्र तक को सम्मिलित करता है। फूको, जो ‘पागल’ कहे जाते हैं उनकी दुर्दशा के प्रति सहानुभूति रखते हैं, और उन्होंने यह तर्क दिया कि ‘मनोरोग’ के रूप में ‘पागलपन’ की आधुनिक वैज्ञानिक परिभाषा, निश्चित तौर, मानव इतिहास में आवश्यक रूप से एक स्पष्ट प्रगति नहीं है। अगर उनकी इस पुस्तक ने प्रारम्भ में, लोगों पर कोई खास प्रभाव नहीं डाला, लेकिन सन 1960 के दशक में उसकी बिक्री कई गुना बढ़ गई, विशेषकर जब फूको की नई पुस्तक ‘द ऑर्डर ऑफ़ थिंग्स’ प्रकाशित हुई और अत्यधिक चर्चित हुई, और इसके साथ ही साथ, हाशिये पर डाल दिये गए समूहों और उनके अनुभवों के बारे में, लोगों की उत्सुकता जागृत हुई। सन 1969 में, फ्रांस में, परंपरागत मनोचिकित्सकों के एक समूह ने तो इस पुस्तक और उसमें वर्णित मानसिक रोगों की चिकित्सा की, कुछ हद तक संशयग्रस्त उत्पत्ति की, अप्रसन्न करने वाले वर्णन की निंदा के लिए, एक समूचे सम्मेलन का ही आयोजन कर डाला। मनश्चिकित्सा विरोधी आन्दोलन ने तो इस पुस्तक को अपने से चिपटा ही लिया, और मनश्चिकित्सा विरोधी डेविड कूपर ने तो इसके, सन 1967 में छपे अंग्रेजी अनुवाद के संस्करण की प्रस्तावना भी लिखी। भले ही फूको उस आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखते थे, परंतु उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि उनका काम, वास्तव में, इस आंदोलन की सीमाओं के भीतर ठीक-ठीक नहीं बैठता है। यह अंतर इस बात में था कि, जहाँ मनश्चिकित्सा विरोधी यह दावा करते थे कि ‘पागलपन’, सामाजिक बहिष्कार के फलस्वरूप उपजता है, फूको का यह मानना था कि उस व्यवहार को जिसको कि हम ‘पागलपन’ या मनोरोग के संकेतों के रूप में ले सकते हैं, का एक ठोस जैविक आधार है।

यह एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। फूको के काम से संबन्धित एक भ्रांत अवधारणा यह है कि वे तथाकथित आख्यान के एवज में ठोस यथार्थ की अनदेखी कर देते हैं। इस भ्रांत धारणा के अनुसार, वस्तुएँ, वास्तविकता का अधिग्रहण, या तो वे सामाजिक अभ्यासों के फलस्वरूप करते हैं, या फिर तब, जब उनके बारे में चर्चा की जाये। फूको की, इसके ठीक विपरीत, धारणा यह है कि दरअस्ल, एक दुःसाध्य भौतिक यथार्थ है- परंतु, जिस तरह हम उसका वर्णन करते हैं, उस पर परस्पर प्रभाव डालते हैं, और जिस तरह उस पर स्वयं को एकाग्र करते हैं, यह सब अपने आप में परिवर्तनशील है और किसी भी प्रकार से स्थिर नहीं है। और इस प्राकृतिक स्तर को पकड़ने का सिर्फ एक ही रास्ता है, और वह है उन जटिल संस्कृतिक और वैचारिक युक्तियों और साधनों के समूह को प्रयोग में लाना, जो कि ऐतिहासिक कालखंड और संस्कृति के अनुसार व्यापक रूप से भिन्न हैं। फूको, यह तर्क रखते हैं कि, जिस प्रकार से हम शब्दों और विचारों को जोड़ते हैं, वह अपने आप में प्रकट नहीं है, और ऐसा कोई भी सरल तरीका नहीं है, उन सारी कड़ियों को सर्वथा के लिए प्रकट करने का, जो कि हम शब्दों (या ज्ञान) और विचारों के बीच जोड़ते हैं। अगर निश्चितता का अभाव किसी को निराश कर देता है, तो वहीं दूसरी ओर फूको, इसे आशावाद की एक वजह के रूप में देखते हैं। वे विचार और अभ्यास, जो लोगों पर दमनात्मक और अनुचित प्रभाव डालते हैं, और ज्ञान और विज्ञान के अंतर्गत सीमित प्रभाव डालते हैं, हमेशा बदले जा सकते हैं। किसी कृत्रिम सत्य-भले ही वह वैज्ञानिक, धार्मिक या राजनतिक हो, के नाम पर हम, जन संख्या के वृहद समूहों को, जीवन भर की दुर्गति के लिए नहीं अभिशापित कर सकते। फूको लिखते हैं“ रू ”यह मेरा एक लक्ष्य है, लोगों को यह दिखाना कि बहुत सारी वस्तुएँ, जिनके बारे में लोग सोचते हैं कि वे सार्वभौमिक हैं, और जो कि उनके परिदृश्य का भाग हैं, वे बहुत सटीक ऐतिहासिक परिवर्तनों के फलस्वरूप हैं। मेरे सारे विश्लेषण, मानवीय अस्तित्व में सार्वभौमिक आवश्यकताओं के विचार के विरुद्ध हैं।“

यहाँ यह तर्क नहीं है कि ‘सत्य’ जैसा कुछ नहीं है। फूको, यह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे, ‘सारे सत्यापित किए जा सकने वाले सत्यों को संशयात्मक या सापेक्षतावादी रूप से नकारने में नहीं लगे हैं’। बल्कि, उनकी रुचि इसमें है कि, वे कतिपय उन विशिष्ट सांस्कृतिक और ऐतिहासिक नियमों की जांच-पड़ताल करें जो यह नियंत्रित करते हैं कि किस तरह लोग ‘सत्य’ तक पहुँच सकते हैं और किस तरह ‘सत्य’ किसी सामाजिक निकाय में वितरित होता है। उदाहरण के लिए, हम यह देख सकते हैं कि समाज में, कौन-कौन (पुरोहित, वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, पत्रकार, हर प्रकार के चिकित्सक) सत्य बोलने के लिए अधिकृत हैं। हम उन पद्धतियों की, जिनका उन कथनों (वैज्ञानिक शोध, ऐतिहासिक शोध, चिकित्सकीय या धार्मिक आत्मनिरीक्षण) को, जिन्हें कि हम ‘सत्य’ के रूप में मान्यता देते हैं, के उत्पादन और संयोजन की वैधानिकता स्वीकृत है, का विश्लेषण भी कर सकते हैं। तीसरे, हम उन संस्थानों (विद्यालय, मंदिर, राजनीतिक पार्टियां, विशेषज्ञों के विद्यालय, अकादमिक पत्र-पत्रिकाएँ, संचार माध्यम) को केंद्र-बिन्दु बना सकते हैं जो कि सत्य के विपणन के लिए सामाजिक रूप से अधिकृत हैं।

यह एक समयानुकूल बिन्दु है जहां हम उस विचार का परिचय दे सकते हैं जो कि पक्के तौर पर फूको के नाम के साथ सम्बद्ध है, वह विचार है ‘सत्ता या अधिकार’ का। फूको, ‘अधिकार’ की परिभाषा कुछ इस प्रकार देते हैं। वे क्रियाओं की एक ‘संरचना’ द्वारा, क्रियाओं की एक दूसरी ‘संरचना’ को, रूपांतरित करने की क्षमता को ‘अधिकार या सत्ता’ कहते हैं। यह ऐसा कुछ नहीं है कि जिस पर स्वामित्व पाया जा सके, बल्कि, यह अस्तित्व में तभी आता है, जब इसका प्रयोग किया जाये। फूको के मतानुसार, ‘सत्य’ का उत्पादन और परिनियोजन, ‘अधिकार’ के प्रयोग से, आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है। सामान्यतः, प्लेटो के समय से यह विचार चला आ रहा है कि ‘सत्ता या अधिकार’ और ‘सत्य’, एक वर्णक्रम के दो विपरीत ध्रुव हैं। परंतु, इस तर्क के विरोध के लिए हमारे लिए, शोध के लिए दिये जाने वित्तीय अनुदान की राजनीति पर एक फौरी दृष्टि डालना ही पर्याप्त रहेगा। स्पष्टतः, चिकित्सा-विज्ञान का एक शोधार्थी, जो कैंसर जैसे प्रचलित विषय पर शोध कर रहा है, और समुचित रूप से वित्तीय अनुदानों के द्वारा पोषित है, ‘सत्य’ जैसे कुछ को अत्यधिक प्रकट कर पाएगा, बजाय एक शोधार्थी के, जिसके पास उतने वित्तीय अनुदान नहीं हैं और जो फाइब्रोमाएल्जिया, जैसे ‘अनाकर्षक’ और अप्रचलित विषय पर शोध कर रहा है। फूको, 1963 की अपनी पुस्तक, ‘द बर्थ ऑफ़ द क्लीनिक’ में, फ्रांस में सन 1769 से 1825 के मध्य हुए, आधुनिक लाक्षणिक चिकित्सा के उत्थान के संदर्भ में, यही मुद्दा उठाते हैं, और औषधि-विज्ञान के विज्ञान के रूप में गठन को, अपने समय के जटिल राजनीतिक, आर्थिक, और सामाजिक कारकों से जोड़ते हैं। फूको सतर्कता बरतते हुए, इस ओर इंगित करते हैं कि, इन तत्वों की भागीदारी, विज्ञान के आंतरिक वैचारिक प्रविधि या व्यवस्थित ज्ञान के अन्य रूपों को, अमान्य नहीं करती है। संक्षेप में, ज्ञान और विज्ञान, भौतिक और बाह्य जगत के संबंध में, फिर भी, परिचालित रहते हैं।

फूको की अगली पुस्तक, ‘द ऑर्डर ऑफ़ थिंग्स’, जो कि सन 1966 में प्रकाशित हुई, तुरंत ही सर्वाधिक बिक्री वाली सिद्ध हुई। उस पुस्तक के आते ही उसका स्वागत, नव संरचनावादी आंदोलन के घोषणा पत्र की तरह हुआ- भले ही बहुतेरे लोगों ने, जिन्होंने वह पुस्तक खरीद ली हो लेकिन वे उसके पहले पृष्ठ से आगे भी न बढ़े हों- और एक वाजिब वजह के कारण। फूको, की यह संभवतः, सबसे कठिन और विचार वैशिष्टय् की पुस्तक है, जो अर्थशास्त्र, जीव-विज्ञान और भाषा-विज्ञान के इतिहासों के बारे में बात करती है। पत्रकारों ने उसके विशिष्ट कथ्य को नजरअंदाज किया और फूको के उन उकसाने वाले कथनों पर स्वयं को एकाग्र किया, जैसे कि मार्क्सवाद, बच्चों के पैर छपछ्पाने वाले तरण-ताल में उठने वाले छोटे से तूफान से अधिक कुछ नहीं था, और यह कि वह ‘मानव’, जो मानवतावादियों का श्रद्धेय था, अगर पूरी तरह मर नहीं चुका था तो, मरने के निकट था। इस तरह के कथनों ने, दोनों खेमों, संरचनावादी और मानवतावादी, में विवाद के लिए पर्याप्त उर्वर भूमि प्रदान की।

इस पुस्तक के प्रकाशन के दो वर्ष पश्चात, सन 1968 में, पूरे विश्व में छात्र आंदोलन, प्रस्फुटित हो गए। प्रसंग से इतर, जिस तरह हम अमेरिकी संस्कृति की बढ़ती हुई व्यापकता देख रहे हैं, उसी तरह अभी हाल ही तक, सन 1968 में पेरिस में हुई घटना को ‘प्रतिष्ठित’ माना जाता था, अब अमेरिका, विश्व मंच पर, और साथ ही साथ अन्य कई सांस्कृतिक और ऐतिहासिक क्षेत्रों में, अपनी उपस्थिति दर्शाने के लिए धक्कामुक्की कर रहा है। बहरहाल, पुनः फूको पर लौटें। फूको उस समय टय्ूनीसिया में रह रहे थे, और छात्रों के साथ जो हुआ- मारपीट, प्रताड़ना, और राजनीतिक प्रणालियों में महज बाधा उत्पन्न करने के लिए वर्षों का कारावास- उससे वे अत्यधिक व्यथित हुए। उन्होंने स्वयम ने भी जोखिम उठाया- उन्होंने अपने घर में छात्रों द्वारा संचालित एक प्रेस को जगह दी- यह एक ऐसा काम था कि अगर वे पकड़े जाते तो उन्हें इसके गंभीर परणाम भुगतने पड़ते। वे सन 1968 के अंत में, एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता बनने और भागीदारी करने के दृढ़निश्चय के साथ, फ्रांस लौट आए। ऐसा करने में वे अकेले नहीं थे, सन 1968 ने सिर्फ बुद्धिजीवियों ही नहीं, बल्कि छात्र, सामाजिक रूप से वंचित कई दूसरे समूहों के कार्यकर्ताओं, का राजनीतिकरण देखा और सामान्य सामाजिक अशांति और प्रतिवाद के एक दशक की शुरुआत की।

सन 1970 के दशक के दौरान, सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करती हुई, बौद्धिक और अतिवादी, दोनों तरह की गतिविधियों में, फूको सबसे आगे पाये जाते थे। प्रदर्शनों में भाग लिया, समितियों की अध्यक्षता की, असंख्य याचिकाओं पर अपने हस्ताक्षर किए, और कई समूहों, जो की बंदियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, और अप्रवासियों की सहायता करते थे, में भागीदारी की और कईयों की स्थापना भी की। आश्चर्यजनक रूप से, फ्रांस में कोई वामपंथी आतंकवादी समूह उत्पन्न नहीं हुआ, हालाँकि, जैसा कि सन 1970 के दशक में इटली और जर्मनी के परिदृश्य में प्रकट हुआ। उस समय ऐसे कुछ प्रस्ताव जरूर थे, कि ऐसा फूको और दूसरे बुद्धिजीवियों, जिन्होंने फ्रांस के उन मसलों की हालत में योगदान दिया, के शांत और संयमित प्रभाव के कारण हुआ। सन 1975 में, कारागारों की स्थिति के बारे में उनकी सक्रियता के चलते, फूको ने सन 1757 से लेकर सन 1838 में, फ्रांस में, कारागारों की आपराधिक दण्ड के रूप में सार्वभौमिक स्वीकृति का इतिहास प्रकाशित किया। इस पुस्तक का शीर्षक था ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’। यह निस्संदेह फूको का सबसे ख्यात और सबसे प्रभावशाली काम है। कारागार को उदाहरण की तरह प्रस्तुत करते हुए वे, उस समाज के उद्भव का खाका खींचते हैं, जिसे वे ‘अनुशासनात्मक समाज’ कहते हैं, जिसमें कि आबादी के वृहद समूहों को, उस तरह से कार्य करने के लिये प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे कि वे सरलता से प्रबंधित किए जा सके। संस्थान जैसे कि, विद्यालय, कारागार, सैनिकों के लिए बने बैरक, कारखाने, और अस्पताल, ये सारे संस्थान, अपने स्थापत्य, दैनंदिन, और शारीरिक हाव-भाव और गतिविधियों के अनुशासन से, इस प्रकार के प्रशिक्षण के लिए एक वाहिका की तरह कार्य करते हैं। अनुपालन की आश्वस्ति, निगरानी की जटिल प्रणालियों के द्वारा आश्वस्त की जाती है।

सन 1976 में, फूको ने ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्स्युआलिटी’ का पहला खंड प्रकाशित किया। यह पुस्तक, यह तर्क रखती है कि, बजाय यौनिकता के दमन के, आधुनिक योरपीय विचार- उससे निपटने के लिए, वैज्ञानिक और संस्थागत श्रेणियों की तादाद में बढ़ोतरी करते हुए, अनवरत उसकी चर्चा करता रहता है। वे, उन विचारों की रूपरेखा रखते हैं, जो यह बताते हैं कि किस तरह किसी सामाजिक निकाय या संस्था में, ‘अधिकारों का प्रयोग और प्रतिरोध’ होता है, और इस प्रकार वे, ‘बायोपावर’ की अवधारणा, जिसने कि हाल ही के वर्षों में टीकाकारों के कार्यों में यथेष्ट प्रतिष्ठा अर्जित की है, को प्रस्तुत करते हैं। ‘बायोपावर’ से फूको का अभिप्राय है, आधुनिक ‘राज्य’ के द्वारा जन संख्या में होने वाले जन्म, मृत्यु, प्रजनन, और बीमारियों के प्रबंधन का। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में फूको ने ‘गवर्नमेंटालिटी’ की प्रस्तावना की, यह शब्द अँग्रेजी के दो शब्दों ‘गवर्नमेंट’ यानि सरकार और ‘रेशनालिटी’ यानि तर्क-संगतता के युग्म से बना है। फूको ने इस शब्द का प्रयोग प्रारम्भ में, आधुनिक योरपीय इतिहास में, ‘राज्य’ की अवधारणा के उदय के संदर्भ में, जनसमूहों पर शासन के विशिष्ट तरीकों के वर्णन करने में किया था। बाद में उन्होंने इस शब्द की परिभाषा में विस्तार करते हुए, उन तकनीकों के वर्णन को भी शामिल कर लिया जो कि लोगों के दैनंदिन के कार्यकलापों और हर सामाजिक स्तर पर उपलब्ध स्वतंत्रताओं को दिशा देती हैं। यह विचार बहुत प्रचलित हुआ है, और इसने पूरे विश्व में एक उद्योग को जन्म दिया जो कि इस विचार को अधिकारी-वर्ग के पेशे और संचालन के विकास पर लागू करता है।

सन 1980 के दशक में, फूको ने अपना ध्यान, पश्चिम में नैतिक व्यवस्थाओं के इतिहास पर केन्द्रित किया और उन्होंने प्राचीन ग्रीक और रोमन दर्शनिकों के कार्य की जाँच-पड़ताल की। अब तक, हमेशा से, उनके चुनाव का ऐतिहासिक कालखण्ड, योरप में सत्रहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी रहा है। पुनः, उनका यह कार्य भी अत्यधिक प्रभावी रहा, इस कार्य ने टीकाकारों को इस बारे में चिंतन के लिए ऐतिहासिक उपकरण उपलब्ध कराये, कि किस तरह मानव जाति स्वयं को उस ‘सत्ता’ की तरह, जो कि चयन कर सकती है कि हम अपने बाह्य परिवेश और एक दूसरे के साथ पारस्परिक कैसे कार्य करें, आकार देती है। सन 1984 में, मृत्यु के एक महीने पहले उन्होंने ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्स्युआलिटी’ के दो और खंड प्रकाशित किए। इन खंडों में उन्होंने, यौनिकता के प्रति प्राचीन ग्रीक और रोमन रवैयों और नीति-शास्त्रों को, जो कि दर्शन के कई ग्रन्थों में उल्लेखित हैं, की विवेचना की।

तो, इस सबसे हम, उस प्रकार की टिप्पणियों के संदर्भ में जिनकी रूपरेखा मैंने इस आलेख के प्रारम्भ मे रखी थी, क्या निष्कर्ष निकालें? फूको के काम को गंभीरता से क्यों लिए जाते रहना चाहिए? इसमें कोई संदेह नहीं कि फूको का काम कठिन है। वे स्वयं ही यह स्वीकारते हैं कि उनकी लेखन शैली जटिल है, परंतु, उसके साथ ही साथ यह तथ्य भी है कि, इस प्रकार का लेखन जो कि विचार के संयोजन के परंपरागत तरीकों को चुनौती देता है, निश्चित रूप से पाठक की ओर से भी श्रम की आकांक्षा करेगा। फूको निश्चित रूप से एक पढ़े-लिखे और निस्संदेह विशिष्ट पाठक के लिए लिख रहे थे, और बिना इस पृष्ठभूमि के उनके कुछ कार्यों को समझना कठिन है। इसके साथ, उनके काम को अँग्रेजी में पढ़ना, दोनों, भाषा और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुवाद में आने वाली कठिनाइयों से जूझने की आवश्यकता पर भी बल देता है। यह जटिलता, फूको के काम को भ्रांतियों और उसके त्रुटिपूर्ण निरूपण की ओर भी ले गई हैं। फूको ने स्वयं इसके बारे में शिकायत की है, उनकी पुस्तकों के ‘आप्त वाक्यों और नारों’ में विघटन के बारे में बात करते हुए, और इस बारे में भी बात करते हुए कि लोगों ने उनके काम के बारे में अपनी धारणा, दूसरे दर्जे के साहित्य को पढ़ कर बनाई है, बनिस्बत उसके मूल पाठ को पढ़ने के।

फूको के व्यक्तिगत जीवन और उसके उनके कार्य से संबंध के बारे में प्रश्न, अत्यधिक जटिल और दीर्घकाल से दुहराये हुए, उन प्रश्नों को उठाते हैं, जो कि किसी लेखक और उसके कार्य के संबंध में उठाए जा सकते हैं और साथ ही साथ, समकालीन समाज में समलैंगिकता के प्रति समाज के रवैये के बारे में उठाए जा सकते हैं। उनके व्यवहार के बारे में लगाए गए अत्यधिक निंदनीय अभियोग, किसी भी प्रकार के साक्ष्यों और प्रमाणों द्वारा समर्थित नहीं हैं, और इसके साथ ही साथ यह भी स्पष्ट नहीं है कि यथार्थ में उनके कार्य के विषय-वस्तु में कोई निहितार्थ रहा हो। किसी भी लेखक के कार्य को ‘एड होमिनम’ तर्कों से रद्द करना, वाग्मिता की एक प्राचीन और संदिग्ध गुण वाली युक्ति रही है। कलात्मक और बौद्धिक उत्पाद, का उत्थान और पतन उनकी स्वयं की ही शतोंर् पर होना आवश्यक है और सामान्यतः यह किसी भी रचना-कर्म के लिए एक ऐतिहासिक परीक्षण होता है।

लोग फूको के दृष्टिकोण से इतने व्यथित क्यों हो जाते हैं और उनका निरूपण एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करने लगते हैं, जो सत्य को कदापि सम्मान न देता हो? मूलतः बात यह है कि, जो भी पारंपरिक रूप से ‘सत्य’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसे उसके अंकित मूल्य पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। ना ही वे इस बात के लिए तैयार थे कि वे लोगों को बताएं कि ‘क्या करना चाहिए और क्या नहीं’, जैसा कि दार्शनिकों के आचरण के लिए एक प्रारूप रखा जाता है। उनका दृष्टिकोण यह था कि कई ‘तथा-कथित’ सत्य जो कि स्वयं-सिद्ध स्वीकार लिए जाते हैं, उनके सटीक ऐतिहासिक मूल हैं, और उन ‘सत्यों’ को, किसी भी सामाजिक निकाय में ‘सत्ता’ के उन विशिष्ट विभाजन के हितों की रक्षा के लिए बनाए रखा जाता है। उनका रचना-कर्म इन्हीं प्रक्रियाओं की चौकस ऐतिहासिक जाँच-पड़ताल और खँगालने का था। इससे कई सारे टीकाकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि फूको उस सब को ध्वस्त करने के लिए निकल पड़े थे, जिसे कि अच्छे सोच वाले लोग, निर्विवाद रूप से ‘सत्य’ मानके चलते हैं, और ऐसा करने के लिए फूको किसी भी सीमा तक जाने को तैयार थे, भले ही इसके लिए उन्हें पूर्ण ‘गल्प’ ही क्यों न ईजाद करना पड़े। यह सच्चाई कि, फूको के विचारों का, विकृत प्रयोग, अक्सर इस बिन्दु की ओर बढ़ जाता है, निश्चित रूप से सहायक नहीं होती है। परंतु, फूको के मूल रचना कर्म की महज फौरी जाँच-पड़ताल ही इस बात का खंडन करने में सहायक होती है। तकनीकी स्तर पर, फूको का रचना-कर्म, ऐतिहासिक पुरालेख संबंधी अन्वेषण की दृढ़ प्रणालियों और तुलना, सत्यापन और उद्धरण के विश्लेषणात्मक पद्धतियों के साथ, अनुभवजन्य शोध पर टिका हुआ है। फूको, पेरिस के राष्ट्रीय ग्रंथालय के परिचित व्यक्ति थे, और कई लोगों ने उन्हें दिन-रात उस ग्रंथालय के ‘रीडिंग-रूम’ में पढ़ते देखने का जिक्र किया है। तो, प्रश्न यह उठता है कि, फिर भी यह उन लोगों को विश्वास दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है, जो यह कहते हैं कि फूको का ‘सब-कुछ’ मनगढ़ंत है? इसका एक कारण यह है कि फूको, उस अनुभवजन्य सामाग्री के साथ काम करते हैं जिसकी कि अक्सर दूसरों के द्वारा अवहेलना कर दी जाती है, और उस सामग्री को नए और अनपेक्षित तरीकों में क्रमबद्ध करते हैं। एक दूसरा कारण, फूको कहते हैं, यह भी है कि, यह अनुभावजन्य सामाग्री, पहले ही एक व्याख्या है, जो कि पहले से ही विशिष्ट तरीकों से चुनी गई, संकलित और व्यवस्थित की गई है। इस विचार कि शोध का ‘कच्चा माल’ अगर ‘नया’ नहीं है, तो अपने आप में तटस्थ भी नहीं है, अक्सर सुविधापूर्ण ढंग से उपेक्षा की जाती है, क्योंकि यह विचार दूसरे शोधार्थियों और विश्लेषकों के प्रयासों पर भी प्रश्न उठाता है, क्योंकि वे इस विचार से, उनके स्वयं के काम की नींव को क्षीण होता हुआ पाते हैं।

परंतु, कोई भी इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि, फूको यह दावा कर रहे हैं कि कुछ भी ‘सत्य’ नहीं है और जो कुछ भी ‘सत्य’ जैसा निर्दिष्ट किया गया है, वह सिर्फ ‘सत्ता’ के हितों की सेवा करता है, और जो कि दूसरों के व्यवहार को सर्वदा हानिकारक दिखाने का प्रयास करता है। बल्कि, इसके बजाय, फूको यह प्रस्ताव दे रहे हैं कि, हमें अत्यधिक सतर्कता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है- दोनों ही स्तरों, ज्ञान के स्तर पर या सामाजिक संयोजन के स्तर पर, यथास्थिति की एक सरल स्वीकृति, मिथक, अन्याय और सामाजिक निकाय में यथोचित स्वतंत्रताओं के बंधन की स्वीकृति और स्थायीकरण का कारण बन सकती है।

फूको के रचना-कर्म ने उस कठोर और सख्त हो चुके दृष्टिकोण को मुक्त करने में सहायता दी है, और कइयों को अपने विचारों के पुनर्मूल्यांकन के लिए, बहसों के प्रारम्भ के लिए, और फूको के रचना-कर्म को आधार बना कर दूसरे अनुशासनों के व्यापक दायरे में शोध करने के लिए उकसाया भी है।

फूको मूलरूप से एक आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। किसी भी क्षेत्र में ‘वस्तुस्थिति’ पत्थर की लकीर नहीं है, बल्कि, कई लोगों द्वारा, समय के एक लंबे अंतराल में की गई क्रियाओं और लिए गए निर्णयों के समूह का उत्पाद है। इसका अभिप्राय यह है कि वस्तु-स्थिति बदली जा सकती है। वर्तमान में, इस तरह के आशावाद की आपूर्ति न्यूनतम है और मेरे विचार से, यही बिन्दु फूको के रचना-कर्म को पढ़ते रहने का मुख्य कारण है।

 

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जीवन

पुनर्वसु जोशी

मिशेल फूको : एक त्रासद जीवन का हासिल

मिशेल फूको, बीसवीं शताब्दी के ऐसे चिंतकों में से हैं जिन्होंने सदी के उत्तरार्ध्द में अपनी अवधारणाओं और उनसे उपजे विमर्शों से, ‘आधुनिकता’ के स्वीकृत तर्कों को अपदस्थ कर दिया। ‘आधुनिकतावाद’ ने, जिस तरह से ‘पश्चिम के ज्ञानोदय’ से, अपनी शक्ति अर्जित करके, विचारों और तर्कों का, जो भव्य-भवन खड़ा किया था, उसमें सेंध लगा कर, उसे भग्नावशेष में बदलने का काम जिन चिंतकों ने किया, वे कहलाये उत्तर-आधुनिकता के सिद्धान्तकार जिनकी लम्बी फेहरिस्त में, एक नाम मिशेल फूको का भी लिया जाता है। इन्होंने, यह प्रमाणित करने में, कतई

कोई कसर शेष नहीं रहने दी कि, ‘ज्ञानोदय’ के उस युग में ही, उसके ‘नाश की नागरिकता‘ भी मौजूद थी। लेकिन, वह एक लम्बे समय तक, अ-मुखर ही बनी रही। लेकिन, सदी के उत्तरार्ध्द में, नई दार्शनिक अवधारणाओं का उदय हुआ, और उसने ‘ज्ञानोदय’ काल के ‘समग्रतावाद’ को खण्ड-खण्ड किया और उसकी दरारों से, निरन्तर नए-नए प्रश्न निकल कर आने लगे। उन्होंने ‘समग्र’ को ही संकटग्रस्त कर दिया। लगने लगा, ‘ज्ञान’ के उस ‘आततायी’ से लगने वाले युग का यह विदा का समय है।

 

नतीज़तन, सामाजिक वर्चस्वों के तमाम केन्द्रों में, उथल-पुथल मच गई। विचारों की दुनिया के लिए इसे ‘भयाक्रांत’ समय बताया जाने लगा। इसे ‘कल्चरल मेलन्कली’ भी कहा गया। क्योंकि, अवधारणाएँ, जो अभी तक अपने वर्चस्व के शिखर पर थीं, वे आहिस्ता-आहिस्ता ढहने लगी थीं। इस कारण, विचारों की दुनिया में एक नितान्त नए अवसाद ने जन्म लिया। ‘अविश्वसनीयता’ मूल-भाव की जगह लेने लगी। ‘समग्रतावाद’ के दुर्ग में ध्वंस शुरू हो चुका था। केंद्रीकृत विश्व, तिरोहित होने की तरफ़ कूच करने लगा। सत्ता विकेंद्रित होती दिखाई देने लगी। ‘ट्राईसेक्शन ऑफ़ पावर’ की वकालत की जाने लगी। ‘ज्ञान’, ’पूँजी’, और ‘हिंसा’ के बाद, अब सत्ता ‘देह’ में खोजी जाने लगी। ‘सत्ता, मनुष्य की कामना का ठोस और मूर्त उत्पाद है’--यह विचार एक सार्वदेशीय विचार बनने लगा। कहना न होगा कि मिशेल फूको, एक दार्शनिक की तरह, इसी हलचल से भरे क्षितिज पर उदय हुए, और ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्सुयालिटी’, ‘डिसिप्लिन एण्ड पनिश’, ‘मेडनेस एण्ड सिविलाइजेशन’, ‘बॉयोपावर’ आदि पुस्तकों ने उन्हें महत्त्वपूर्ण चिंतक के रूप में, एक विशिष्ट पहचान दी।

उन्होंने ‘ज्ञान’, ’दण्ड’, ’औषधि’, और ’यौनिकता’ जैसे विषयों पर स्वयं को एकाग्र करते हुए जो कुछ लिखा, उसने अमेरिका और ब्रिटेन की युवा पीढ़ी को पर्याप्त प्रभावित किया और वे मादक-द्रव्यों के सेवन तथा यौन-स्वछन्दता को, जीवन की एक नई शैली की तरह अपनाने के लिए तैयार होने लगे। वे निषेध में प्रवेश के लिए, नैतिकता को अवरोध की तरह देखने लगे। मिशेल फूको, दूसरे अन्य दार्शनिकों के साथ, इन सबके पीछे, एक अवेध्य-सी दार्शनिक पृष्ठभूमि के स्थापत्यकार की तरह अवतरित हुए थे। उनके विचारों से, वहाँ के केवल अकादमिक जगत में ही हलचल नहीं मची, बल्कि, कई आन्दोलनकर्ता समूहों ने भी, फूको से जुड़ कर, उनकी अवधारणाओं को चतुर्दिक स्वीकार्य बनाने की पूर्व-पीठिका बनाई। निश्चय ही, इस तरह की अवधारणाओं को आविष्कृत कर लेने के पीछे, फूको के व्यक्तिगत जीवन और उसमें फैली हुई अराजकता की भी, बहुत महत्त्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका मानी जाती है।

आरम्भिक वर्षों में, मिशेल फूको के व्यक्तिगत जीवन के बारे में, उनके पाठकों को, बहुत ही न्यूनतम जानकारी थी। उन्होंने स्वयं भी, अपने निजी जीवन के बारे में कहीं ज़्यादा कुछ लिखा ही नहीं, लेकिन मृत्यु के बाद, उनके साहचर्य में रहे कुछेक लोगों की लिखी किताबों से, थोड़ी बहुत बातें बाहर आयी हैं।

पॉल मिशेल फूको का जन्म 1926 के अक्टोबर माह की 15वीं तारीख को हुआ था। वे पश्चिमी फ्रांस के प्वातिए शहर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की तीन संतानों में, दूसरे क्रम पर जन्मे बालक थे। पिता चिकित्सक थे और पारिवारिक परम्परा के अनुसार, उनका नाम पॉल फूको रखा गया। लेकिन, उनकी माँ के भावनात्मक आग्रह के चलते, उनके नाम में मिशेल शब्द जोड़ दिया गया। पिता, स्वभाव से एक क्रुद्ध व्यक्ति थे, नतीज़तन, उनके क्रोध से बचने के लिए, पॉल ने दो वर्ष पूर्व ही स्कूल जाना शुरू कर दिया था। स्कूल, उनके लिए, पिता के क्रोध से सुरक्षा की गारण्टी बन गया था। जहाँ वे स्कूल के पुस्तकालय में हर समय बरामद किये जा सकते थे। उन्होंने 1930 से 1936 तक पढ़ाई की और ख़ासकर, भाषा में उनकी कुशाग्रता के चलते, उन्होंने फ्रेंच और ग्रीक में उत्कृष्टता अर्जित कर ली, लेकिन दुर्भाग्यवश गणित में वे हमेशा फिसड्डी ही बने रहे। क्योंकि, इस विषय के उनके अध्यापक, स्वभाव से बहुत रूखे और चिड़चिड़े थे।

 

जब वे किशोर वय में ही थे कि 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया और फ्रांस पर जर्मन नात्जियों का कब्ज़ा हो गया जो 1945 तक बना रहा। हालाँकि, उनके पिता और परिवार ने, इसका विरोध तो किया, लेकिन उन्होंने इसके प्रतिरोध के लिये होने वाले किसी आन्दोलन में, कोई सक्रिय भागीदारी नहीं की। अलबत्ता वे इस तरह के आन्दोलन से दूर ही रहे।

ज्याँ हिप्पोलाइट और लुई अल्थुसर के प्रभाव में आने के बाद युवा मिशेल का झुकाव दर्शनशास्त्र की तरफ़ हो गया और उसे नीत्शे के दार्शनिक विचार खींचने लगे। वे जीवन भर नीत्शे के दार्शनिक वर्चस्व से बाहर नहीं आए। वे फ्रेडरिक नीत्शे को, अनहोली-घोस्ट कहा करते थे। सन् 1966 से 1968 तक उन्होंने टय्ूनीसिया के एक विश्वविद्यालय में पढ़ाया और वहाँ से लौटने के पहले ही, वे पेरिस के एक प्रयोगात्मक विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष हो गए। सन् 1970 में, वे कॉलेज ऑफ़ फ्राँस से सम्बद्ध हुए और यह सदस्यता, उन्होंने मृत्यु तक बरक़रार रखी। हालाँकि, कई वर्षों तक वे विदेशों में सांस्कृतिक राजनयिक के पद पर भी रहे, और वहीं से लौट कर, उन्होंने अपनी सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तकें, ‘बर्थ ऑफ़ क्लीनिक’, ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्स्युआलिटी’, और ’मेडनेस एण्ड सिविलाइजेशन’ पूरी की जिसने दुनिया भर के चिंतकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। वे कई वामपंथी समूहों से भी जुड़े रहे जो ‘नस्लवाद’ और ‘फासिज़्म’ के िख़लाफ़ थे। वैसे, नीत्शे के दर्शन से प्रभावित होने के कारण, फूको को भी परम्परागत वामपंथियों ने फासिस्ट भी कहा, लेकिन जब उनकी ‘आर्कियोलॉज़ी ऑफ़ नएलेज’ तथा उनकी ‘बॉयो-पावर’ जैसी किताबें सामने आयीं तो उन्हें उत्तर-आधुनिकतावादी विचार की प्रतिष्ठा मिलने लगी। यहाँ तक कि नव-वामपंथियों ने भी उन्हें अहमियत देनी शुरू की और उन्हें चतुर्दिक प्रतिष्ठा मिलने लगी। उन्होंने ‘ज्ञान’ और ‘सत्ता’ के गठजोड़ से, सामाजिक नियंत्रण के सांस्थानिक गढ़न्त पर, एक गहरे सामाजिक सिद्धान्तकार की तरह हस्तक्षेप किया। इसमें उनको, हेगेल के अध्ययन की विशेषज्ञता से पर्याप्त मदद मिली और उन्होंने अस्तित्ववाद और मार्क्स-हेगेल के ‘द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त’ को नाथ कर, नए निष्कर्ष निकाले। उन्होंने मार्क्सवाद को, ‘आत्मनिष्ठता’ (सब्जेक्टिविटी) से जोड़ा तो लोगों ने कहा कि वे मार्क्सवाद को बेदख़ल करना चाहते हैं जबकि वे फ्रेंच कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे। सन् 1953 में अन्ततः उन्होंने पार्टी छोड़ दी, लेकिन वे अल्थुसर के हमेशा पक्षधर बने।

उनका पूरा जीवन एक विचित्र त्रासदी से भरा रहा। इसके चलते 1948 में जब वे फ्राँस के सबसे ख्यात विश्वविद्यालय ईकोल नोर्माल के छात्र थे तब उन्होंने आत्महत्या की एक असफल कोशिश भी की थी। डॉक्टरों ने बाद में इसका कारण उनके समलैंगिक समूहों के साथ रह कर, मादक द्रव्यों के सेवन को जिम्मेदार बताया था। तब पिता ने राजधानी के सर्वोत्कृष्ट अस्पताल में उनका यथेचित उपचार भी कराया था लेकिन बाद इसके, मृत्यु को लेकर उनके अवचेतन में एक स्थाई गाँठ-सी पड़ गई थी।

फूको के विचारों से फ्राँस के बौद्धिकजगत में एक अपूर्व बौद्धिक चेतना बनी रही। एक अतिक्राम्य बुद्धिजीवी की तरह वे फ्रेंच बुद्धिजीवी बिरादरी के बीच स्वीकारे जाते रहे और राजनीतिक क्षेत्र में, हस्तक्षेपकारी भूमिका रखने वाले लोगों में वाल्टेयर, ईमाइल जोला से लगा कर ज्याँ पॉल सार्त्र तक आते हैं, ठीक इनके बाद मिशेल फूको का ही नाम आता है। नीत्शे को सबसे पहले, जब 1953 में फूको ने पढ़ा, तबसे ही वे ईसाइयत और ‘पवित्रतावाद’ के विरुद्ध निरन्तर लिखते रहे।

 

उनका कहना था कि जब किसी के लिए ‘ईश्वर मर चुका हो, तब उसके लिए उस धर्म तथा उसके पवित्रतावाद द्वारा निर्धारित, नैतिक-प्रतिमानों की भला क्या प्रासंगिकता हो सकती है?’ उन्हें लगने लगा था कि मादक द्रव्यों के सेवन, समलैंगिक सम्बन्धों और आत्महत्या की कोशिशों को लेकर, कोई अपराधबोध अनुभव करने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने ‘ज्ञान की सत्ता’ को भी अतिक्राम्य माना और ‘पागलपन’ तथा ’समाज के द्वैधों’ पर मुखरता से लिखने और बोलने लगे।

उन्होंने अपनी पुस्तक में बन्दीगृहों को, मनुष्यता के विरुद्ध, सत्ता का आतताई विचार मान कर, उनको ख़त्म किये जाने की वकालत की। उन्होंने ‘सत्ता’ के गहरे दार्शनिक विमर्श पैदा किए और राजनीति जो कि आपातमस्तक स्वयं के नियंत्रण में रहने के साथ ही, वह सब को भी नियंत्रित करती है। बन्दीगृह और पागलख़ाने, सत्ता के उस विमर्श के उत्पाद हैं, जिसमें मनुष्य को मात्र प्रबन्धन के केंद्र में एक ‘वस्तु’ की तरह देखा जाता है, वह हरेक का ‘ऑब्जेक्टीफिकेशन’ अर्थात् ‘वस्तुकरण’ करती है। उसकी प्रपंचकारी भूमिका, दोनों स्तरों पर चलती है, अर्थात् प्रकट और अप्रकट। वह अपने विमर्शों की शृंखला में, ‘जैव-सत्ता’ के निकट पहुँच कर, मनुष्य को भी प्राणी जगत के एक जीव की तरह देखते हैं। वहाँ, ‘देह’ का भी वस्तुकरण हो जाता है। सत्ता द्वारा, ‘कामना’, ‘इच्छा’, और ‘मांग’ में वर्गीकृत होती मानव चेतना, अपने कर्ता का ऐसा विषयीकरण करती है कि वह समस्याग्रस्त हो जाता है। वे ‘ज्ञान’ और ‘सत्ता’ के समीकरण में, विषय (कर्ता) के विलोपन की ओर संकेत करते हैं। दरअस्ल, उनका सबसे सूक्ष्म बौद्धिक आकलन तो, उनकी मृत्यु के बाद आरम्भ हुआ।

अपनी मृत्यु के बाद तो मिशेल फूको पर, अकेले अमेरिका में ही लगभग, सौ बड़े चर्चित लेखकों और चिन्तकों की पुस्तकें प्रकाशन में आईं, और उनके विचारों को आधुनिकता के ‘संश्लिष्ट पाठ’ की तरह देखा गया। उनके विचारों में ‘व्यक्ति’ सत्ता की अमानविक कार्यवाहियों का अप्रकट शिकार होता है, और वह इस बात को जान ही नहीं पाता। इसलिए एक उदार जनतंत्र की संरचना ज़रूरी है। ‘द पैशन ऑफ़ मिशेल फूको’ शीर्षक से आई पुस्तक में, जेम्स मिलर ने यह प्रतिपादित करनी की चेष्टा की है कि किस तरह से वे अपने जीवन को ही, एक कला-चेष्टा में बदलने का यत्न करते रहे। वे व्यक्ति की निजता के निरन्तर होते चले जाने वाले ‘विलोपन’ को लेकर बहुत चिन्तित थे। हमें अपनी मूल्य-मीमांसा के साथ, जीवन में जीना और कार्य करना चाहिए। इसलिए, ताकि हम स्वयं के प्रति सच्चे और विश्वसनीय रहें। फूको ने, सामान्य से अतिक्रमित होते हुए, तमाम निषेधों को लाँघकर, नीत्शे के चिंतन के सत्य में, स्वयं की खोज की। मार्की दु साद के ‘पोर्नोग्राफिक’ रचनाओं को भी, उन्होंने गहरे सजग पाठक की तरह पढ़ा और उदार जनतान्त्रिक दृष्टि में जाकर, उनका विवेचन किया।

अपनी जीवन शैली की वजह से फूको को बहुत आसानी से ख़ारिज किया जा सकता था। ‘पापियों से मैत्री करो’ और उन लोगों के मिथ्या दम्भ को तोड़ो जो स्वयं को पुण्यवान् प्रतिपादित करते हैं। हमें सिर्फ, पवित्र गन्थ के प्रति विश्वसनीय रहना चाहिए क्योंकि वह पाप के लिए पश्चाताप प्रकट करने पर क्षमा कर देता है। सलीब पर चढ़ा दिये गए देवता के मूर्खतापूर्ण संदेश का कोई अर्थ नहीं रह गया है। इसलिए, व्यक्ति को बुद्धिमानी के साथ दुनियादार समझ भी चाहिए। सम्वेदना के वैयक्तिक धरातलों पर जिस तरह उन्होंने अपने तर्कों के स्थापत्य से, अपनी विचारधारा का भवन खड़ा किया, वह धर्माश्रित दृष्टि को लाक्षागृह की तरह लगा और उन्होंने युवाओं को निरन्तर उपदेश दिया कि उस भवन में प्रवेश घातक है, लेकिन पिछले दशकों में जिस तरह उनके विचारों का वर्चस्व बढ़ा, वह हत्प्रभ करता है। बेशक उन्होंने अपने विचारों और जीवन-शैली से, एक प्रति-संस्कृति को जन्म दिया।

अपने जीवन के आख़िर के वर्षों में, वे कई अप्रकट व्याधियों से जूझते हुए, थक से गए थे, लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी अभिव्यक्तियों को आत्मदया के दायरे से पूरी तरह बाहर ही रखा। हालाँकि उन्हें कभी-कभी अवैध इच्छाओं के काले नरक में भटकते हुए, ईश्वर की भूख लगती थी। इसलिए जब फूको को हम, उनकी समग्रता में आलचाल करते हैं तो लगता है कि वह कोई एक अभिशप्त व्यक्ति था, और जो नीत्शे के ईश्वर रहित संसार में घिर आए शून्य को भरने का बौद्धिक उपक्रम करते हुए चुपचाप मारा गया। वे हमेशा ‘कर्ता’ को हाशिये पर रख कर, ‘विषय’ के भीतर प्रवेश की माँग करते थे। अन्त में, मुझे यह याद आता है कि, मिशेल फूको, आत्महत्या की चेष्टा भी करते हैं और जीवन को जीने की ज़िद में मुब्तिला भी रहे।

एस असाध्य रोग की भयावहता से जूझने के बीच, मृत्यु के इस अधिवक्ता ने जीवन की दारुणता से मुक्ति की कामना, अर्थात् मृत्यु की इच्छा, किसी भी मित्र या व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत नहीं की। शायद, सब कुछ नष्ट होने के बीच भी, मनुष्य के भीतर वह आद्य जिजीविषा मरती नहीं है। मुझे एक लातिनी कवि की एक बात याद आती है- मनुष्य की आद्य-वृत्ति को जब-जब सामने के दरवाजे से बाहर फेंक दिया गया, वह पिछले दरवाजे से फिर प्रवेश कर गई है। मुझे लगता है कि एक अर्ध मृत और अर्ध जीवित कामना, मनुष्य के भीतर से सदा से ही उसे पुकारती रहती है।

 

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पुनर्वसु जोशी

डॉ. पुनर्वसु जोशी की प्रारम्भिक शिक्षा इंदौर में हुई। अपनी विद्यालयीन शिक्षा के पूर्ण होने के पश्चात उन्होंने सन् 2001 में, एरिज़ोना, यू.एस.ए. की एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी (ASU) में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के बी.एस.ई. की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया और वहाँ से सन 2005 में डिग्री हासिल की। बी.एस.ई. करने के दौरान, अपनी पढ़ाई के दूसरे वर्ष में वे, सेंटर फॉर सॉलिड स्टेट इलेक्ट्रोनिक रिसर्च के निदेशक और क्वान्टम इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रोफेसर, डॉ. ट्रेवर थोर्ण्टन, जिन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय, ब्रिटेन से भौतिकी में पीएच-डी की और उसके पश्चात अमेरिका की बेल लैब्स में शोध किया, के संपर्क में आए और उनके लिए अंडरग्रेजुएट शोधार्थी के रूप में काम करने लगे। सन 2005 में अपनी बी.एस.ई. डिग्री के अंतिम सेमेस्टर में, डॉ. थोर्ण्टन के आग्रह, अनुशंसा और रिसर्च सेंटर द्वारा प्रदत्त छात्रवृति की सहायता से, पुनर्वसु को सीधे पीएच-डी में दाखिला दिया गया। डॉ. थोर्ण्टन, उस समय, नैनो-टेक्नोलोजी के डी.एन.ए. सीक्वेंसिंग के क्षेत्र के अंतर्गत शोध कर रहे थे, और उन्होंने पुनर्वसु को भी उसी विषय पर शोध करने के लिए प्रोत्साहित किया। अपने शोध के दौरान पुनर्वसु ने कई अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में शोध-पत्र प्रकाशित किए। पुनर्वसु जोशी को सन 2011 में पीएच-डी प्रदान की गई।

पुनर्वसु अपनी पीएच-डी की पढ़ाई के दौरान, सन् 2007 में, ASU के, सेंटर फॉर नैनो-टेक्नालजी इन सोसायटी द्वारा आयोजित, एक पंद्रह दिवसीय यात्रा के लिए विश्वविद्यालय से चुने गए, जो कि विज्ञान और इंजीनियरिंग के चुनिन्दा छात्रों को अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी.सी. ले जाती है, और सत्ता और विज्ञान, विज्ञान का इतिहास, राजनीति और विज्ञान, कानून और विज्ञान, जैसे विज्ञान और दर्शन से जुड़े कई मुद्दों पर न केवल विचार-विमर्श में भाग लेने का अवसर उपलब्ध कराती है, बल्कि, इन विषयों से जुड़े संस्थानों जैसे, नेशनल साइंस फाउंडेशन, नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ़ हेल्थ, केपिटल हिल, वाईट हाउस के अंतर्गत आनेवाला ऑफ़िस ऑफ़ साइंस एण्ड टेक्नालजी पॉलिसी आदि का दौरा भी करवाती है। सन 2010 में, पुनर्वसु ने इसी तरह की दूसरे प्रवास में आयोजक की तरह भागीदारी की।

सन् 2008 की यात्रा के पश्चात, पुनर्वसु ने सेंटर फॉर नैनो-टेक्नालजी इन सोसायटी के विमर्शों में भाग लेना प्रारम्भ किया। सन् 2008 में उन्होंने विश्वविद्यालय की ओर से, अमेरिका की नेशनल अकेडमी ऑफ़ साइंस में आयोजित, विज्ञान और राजनीति से संबन्धित एक आठ दिवसीय वर्कशॉप में भाग लिया। इसके अतिरिक्त, सामाजिक विज्ञानों, कला, और साहित्यिक विषयों में अपनी गहरी आसक्ति के चलते, पुनर्वसु को अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों जैसे हार्वर्ड, स्टेनफोर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिलवेनिया, हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल आदि, में लोगों से मिलने और मैत्री का अवसर भी मिला। इसके अतिरिक्त अमेरिका के कई कला दीर्घाओं और संग्रहालयों जैसे, न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम, गुग्गनहाईम म्यूज़ियम, विटनी म्यूज़ियम, म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, वाशिंगटन डी.सी. की नेशनल गैलारी ऑफ़ आर्ट, सिएटल आर्ट म्यूज़ियम आदि देखने का अवसर भी मिला। अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात, पुनर्वसु ने तीन वर्षों तक नैनोटेक्नोलोजी संबन्धित एक कंपनी में भी काम किया। सन 2014 में पुनर्वसु पुनः भारत लौट आए।

पता : द्वारा प्रभु जोशी, 303, गुलमोहर निकेतन,

प्लॉट-सी, ड.प् बसंत विहार, शांति निकेतन के पास,

इन्दौर-462010

मिहाएला मेरल अहमद

उत्तर आधुनिकतावाद दार्शनिक आख्यान :

मिशेल फूको और जॉक देरीदा

(अनुवाद - पुनर्वसु जोशी)

इस विशिष्ट अध्ययन में हम, मिशेल फूको और जॉक देरिदा की भाषा से संबन्धित उत्तर आधुनिक चिंतन की उन ऐतिहासिक पुनस्र्थापनाओं का हम विश्लेषण करेंगे। मिशेल फूको भाषा और सत्ता और यथार्थ के अंतरसंबंध को विश्लेषित करते हैं, वहीं दूसरी ओर जॉक देरीदा, भाषा और ‘पाठ’ के अंतरसंबंध को विश्लेषित करते है। यहाँ यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि इस अध्ययन में उत्तर आधुनिक साहित्य ही, वह दायरा है, जिसमें इस सिद्धांत की रोशनी में ही, समालोचनाएं सामने आएंगी जिनमें, समीक्षात्मक-प्रज्ञा सक्रिय रह कर, तर्क के जटिल रूप को, विवेचित करती है।

मिशेल फूको, सत्ता की प्रकृति और उसके कार्य और व्यवहार की शैली को विवेचन के उपकरणों से आलचाल करते हैं, और पाते हैं कि सत्ता अपनी आत्यंतिकता में किस तरह से ‘ज्ञान’ तथा उससे संबंध और अंतर्निहित को, ‘सामाजिक-नियंत्रण’ के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करती है। क्योंकि, जो मनुष्य की ‘आवयविकता’ या शरीर से संबन्धित है, वही सत्ता की कामना के केंद्र के इर्द-गिर्द, ज्ञान का आवरण चढ़ा कर, उसे और अधिक ‘समवेत’ सत्ता में बदलती है। उन्होंने, अपने सामाजिक संस्था के आलोचनात्मक अध्ययन में, खास तौर पर, मनःचिकित्साशास्त्र, औषध विज्ञान, मानविकी तथा कारागार के अतिरिक्त मनुष्य के यौन व्यवहार के विभिन्न पक्षों को समाहित किया है। ज्ञान की इस ‘जीनियोलोजी’ को रूपायित करने में निर्विवाद रूप से, जिस दार्शनिक से उन्होंने सर्वाधिक प्रबल प्रभाव ग्रहण किया है, वह है बीसवीं सदी के सर्वाधिक प्रखर दार्शनिक फ्रेड्रिक नीत्शे।

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मिशेल फूको के लेखन की केंद्रीय निष्पत्ति यही है कि वे ‘ज्ञान’ और ‘सत्ता’ के बीच चतुर्दिक फैले सूक्ष्मतम सूत्रों को पकड़कर, उस आवरण को उतार सकें जिसके चलते वे दर्शन की दुनिया में दुःसाध्य बनकर, लगभग एक अबूझ-सी पहेली की तरह बन गए हैं। वे स्थापना देते हैं कि ‘सामाजिक वर्चस्व’ और ‘ज्ञान की प्रविधि’ के बीच, एक गहन लेकिन अप्रकट अंतरसंबंध है जिसके कि बहुतेरे आयाम हैं। फूको ज्ञान की विभिन्न प्रविधियाँ, सामाजिक नियंत्रण की तकनीकों और अभ्यासों का ‘संहिताकरण’ करते हुए, नियंत्रण की प्रकृति को उद्घाटित करते हैं। उदाहरणार्थ, कारागार, पागलखाना, विश्वविद्यालय, अस्पताल इत्यादि वे संस्थाएं हैं जिनमें ‘सत्ता’ विभिन्न भागों और क्षेत्रों में फैली हुई है। हम इनको समझने के लिए कोई सामान्य-सिद्धांतिकी ईजाद नहीं कर सकते, जो इनके मध्य और इनके भीतर के सत्ता के अंतसंर्घर्षों को पूरी तरह बता सके।

हालाँकि, लेखक की मृत्यु जैसे जटिल मुद्दे को मिशेल फूको ने जितने तीक्ष्ण और सूक्ष्म विवेचन से, और लगभग एक विस्फोटक ढंग से प्रकट किया है, वह अन्य किसी विचारक ने, जो उत्तर आधुनिक विचारक के रूप में चिह्नित और स्वीकृति भी रहे हैं, ने नहीं किया है।

फूको, पुस्तक को एक ‘ऑब्जेक्ट’ की तरह देखते हैं, अर्थात साहित्य की एक ‘जगह’। प्रकारांतर से एक ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में, पुस्तक की प्रतिष्ठा को वे व्याख्यायित करते हैं, तो साहित्य की विशिष्टता के रूप में ही, और पुस्तक का एक ‘नियत स्थान’ निर्धारण भी वह उसी अवधारणा के आश्रय से करते हैं। मिशेल फूको अवकाश (स्पेस) की अवधारणा को, स्पष्टतः इमैनुअल कांट के दार्शनिक चिंतन से ही प्रभावित होकर, अपनी व्याख्याओं के उपकरण के बतौर लाते हैं। क्योंकि, इमैनुअल कांट की दर्शन के क्षेत्र में यदि कोई महानतम उपलब्धि कही जा सकती है तो निःसन्देह, वह है, मानव तर्क के, शुद्ध-बुद्धि विवेक और न्यायिक संकाय में विभक्तिकरण का।

यह मनुष्य की बौद्धिक योग्यता का वह प्रादर्श है, जिसके चलते ‘ज्ञान’ का उपयोग जीवन और समाज के क्षेत्रों में संभव बनता है। यह भी त्रिस्तरीय वर्गीकरण है- सूचनाओं का परिवेश से संकलन, सूचनाओं को अवधारणा के रूप में व्यवस्थित करना, और ‘विचार’ का विस्तार करना। प्रथम स्तर है, मस्तिष्क अंतःबोध से सूचनाओं को ग्रहण करता है, फिर उसको बाह्य चेतना (स्पेस) से भी सुस्पष्ट ढंग से संबंधित करता है। हम किसी भी ‘ऑब्जेक्ट’ को तब तक ग्रहण ग्रहण नहीं कर सकते जब तक कि उनकी, स्पेस में होने की आंतरिकता को हम यथेष्ट ढंग से चिह्नित न कर सकें। हम ‘ऑब्जेक्ट’ को ‘काल’ के संदर्भ के बिना भी ग्रहण नहीं कर सकते, क्योंकि ‘काल’ की अनुपस्थिति में हम गति और क्रोनोलोजी को भी नहीं समझ पाएंगे। मिशेल फूको का कहना यह है कि चूँकि इमैनुअल कांट के दार्शनिक विवेचन ने ‘काल’ की समस्या को हमेशा के लिए स्पष्ट कर दिया था, कदाचित इरादतन लेकिन उन्होंने यह किया ‘स्पेस’ की समस्या की अवहेलना करते हुए। चूँकि, कुछ अन्य महान दार्शनिकों मसलन, हेनरी बर्गसां, हेगेल, मार्टिन हाइडेगर आदि ने मनुष्य के अस्तित्व को ‘काल’ के विशिष्ट संबंध के अंतर्गत केंद्रित कर लिया था।

अतः, मिशेल फूको, पाठ को ‘स्पेस’ के साहचर्य और ‘स्पेस’ के संबंध में ही रखते हैं। वे नैरेटिव (बखान) को मृत्यु के अवकाश की तरह विश्लेषित करते हैं, लेकिन पूरी तरह मृत्यु के विरुद्ध अभिमुखी होकर। इसके लिए स्पष्टीकरण यह है कि मनुष्य के मस्तिष्क के भीतर मृत्यु की झलक, एक व्योम को उत्कीर्ण करती है, वही बोलने के लिए उकसाती भी है। हम जीवित हैं, यह जनचेतना में प्रमाणित करने के लिए हम बोलते हैं। हम लिखते हैं, इस उम्मीद से कि हम मृत्यु के बाद में लोगों की स्मृति में जीवित रह जाएंगे। और अगर यदि हम पढ़े जा रहे हैं, यदि हमने यश अर्जित कर लिया है, तो निश्चय ही हमारा स्मरण किया जाएगा, हम विस्मृत नहीं होंगे। यह मृत्यु की अनिवार्यता का अतिक्रमण है, क्योंकि यह काया से इतर एक ‘यश-काया’ का निर्माण करता है। जबकि उत्तर आधुनिकतावादी मनुष्य यह सुस्पष्टतया जानता है कि इस वक्त में, जिस में हम जी रहे हैं, उसमें हम सिर्फ एक ही उम्मीद कर सकते हैं, और वह यह कि हम एक ‘क्षणिक चौंध’ भर हैं। हम अपने पूर्वजों की कालजयी प्रसिद्धि पर विजय नहीं हो सकते, क्योंकि अब मनुष्य के ज्ञान का वृत्त अधिक बड़ा है। हमें कुछ भी अविस्मरणीय करने के लिए, अथाह ज्ञान का दावेदार बनना होगा। बावजूद इसके हम अपने ‘लिखे हुए’ (टेक्स्ट) से उठती हुई अमरत्व की पुकार पर नियंत्रण नहीं पा सकते। क्योंकि, लिखा हुआ प्रकारांतर से हमारे अस्तित्व के अंश को ‘अंतरस्थ’ कर लेता है। लुक फेरी का कहना है कि यह लिखने की, जब्त न हो सकने वाली इच्छा, नैराश्य के बावजूद भूलना संभव नहीं है। लुक फेरी का यही कहना है कि हम लिखते हैं क्योंकि हम मृत्यु से भयाक्रांत हैं।

बहरहाल, एक लेखक का लिखना, उसकी मुक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। इसके उपरांत स्टारोबिंस्की का कथन है कि अमरत्व और एक लेखक और उसकी कृतियों के बीच एक अतर्क्य संबंध है। वे साथ ही गेस्टन पेरिस के एक अध्ययन ‘पोण्डरिंग ज्यू’ को उदाहरण की तरह प्रस्तुत भी करते हैं। इसके साथ ही, यह भी तय है कि लेखक अपनी मानसिक-पैथोलॉजी को ही प्रस्तुत करता है, जो इस शर्त से प्रभावित होकर, यह यकीन करने लगता है कि वह अमर है। यह अवस्था, उस सामान्य से व्यवहार से संचालित होने लगती है, कि अस्थाई सीमा को, अनंत से भिड़ा देता है। इस तरह, वे तर्क और अतर्क के बीच की खाली जगह में प्रवेश करके वहाँ से प्रश्न और उसकी भंगिमा को उठाते हैं।

यह अनंतकाल, वही समय है, जिसमें कोई संभावना शेष नहीं है। यह रचने की असंभाव्यता, उसके अंदर गहन कुंठा, उसे, मन और तन सहित एक ‘इटरनल वांडरिंग’ यानि कि भटकाव में डाल देती है। ‘पैथोलॉजिकल मेलंकली’, महान जैसा कुछ लिख पाने की असंभाव्यता से उपजती है। भाषा, मृत्यु के विरुद्ध विद्रोह का प्रतिनिधित्व करती है, जो इस बात से इंकार करती है कि वह अपने पीछे महान जैसा छोड़े बगैर मर सकता है। लेकिन, लेखन बोले गए से हमेशा अधिक ही है। एक आख्यान का मौखिक बखान, विचार का दोहराव होगा। लिखने का अर्थ दोगुने का दोगुना कहा जाएगा। लिखने का अर्थ एक आत्म-प्रतिनिधित्व के साथ आभासी ‘स्पेस’ के भीतर अवस्थित होना है। मिशेल फूको के अनुसार लिखने का अभिप्राय, वस्तुओं के साथ कर्म केंद्रित होना नहीं, बल्कि केवल ‘विचार’ के साथ निरंतर सक्रिय रहते हुए कार्यरत रहना है। जबकि भाषा पहले से ही कर्म का प्रतिनिधित्व करना है, तथा तथ्यों की एक अवस्था भी है। भाषा हमारे कर्म का दर्पण है। दरअसल प्रकारांतर से ‘लेखन’ लेखक को दर्पण की सी एक सूक्ष्मतम नियति की ओर धकेलता है, फलस्वरूप, वह यह प्रतिरोपण का नैरंतर्य कर देता है, एक अंतहीन जीवन का। फूको, इसी जैविक-जटिलता को खोलने का यत्न करते हैं, जो कि एक गहरी दार्शनिक चेष्टा है।

मिशेल फूको, दर्शन के क्षेत्र में चर्चित रहे अपने प्रसिद्ध अध्ययन में ‘पागलपन’ को भी गहरे दार्शनिक कोण से विश्लेषित करते हैं। उनके इस अध्ययन का परिप्रेक्ष्य यह है कि ‘पागलपन’, भाषा से बहुत भिन्न है। पागलपन, अबौद्धिकता की एक वर्जित आवाज़ है। मनोरोगी, भाषा के स्पष्ट चिह्नित रुप से विलग और असंबद्ध है। विगत वर्षों के इतिहास में यही साक्ष्य मिलते हैं कि हम मनोरोगी की भाषा को ख़ारिज करने को उद्धत रहे हैं। क्योंकि, उसकी सामान्य बुद्धि की दृष्टि से, अतर्क्य लगती भाषा को, ढंग से ‘डिकोड’ नहीं किया जा सकता। जबकि, एक पागल व्यक्ति की कल्पना की तीव्रता ही उसकी भाषा और आंतरिक तार्किकता की निर्मिति करती है। और मनोरोग को एक ‘टैबू लैंग्वेज’ के रूप में ही उसकी तस्दीक करते हैं। और विक्षिप्तता को, एक निषिद्ध भाषा के दायरे में रखते आए हैं, जबकि दर्शन एक दूसरी किस्म की वर्जित भाषा का सामना करती है, इस तरह वह, भाषा में अव्यक्त को रखना चाहती है। यहाँ ही भाषा की सीमाएं प्रकट हो जाती हैं। क्योंकि, ‘पागल’ की कल्पना में जो है, वह अव्याख्येय है, उसका साधारणीकरण संभव नहीं है। एक सामान्य व्यक्ति की बुद्धि से कभी भी नहीं।

मृत्यु और लेखन के मध्य संबंध, वह सिद्धांतिकी जो कि शहरजाद के उस मिथक के विरुद्ध है, मिशेल फूको को उन उत्तराधुनिक चिंतकों के बीच चिह्नित करती है जो कि ‘ऑथर’ की मृत्यु का विश्लेषण करते हैं। वर्णन, मौखिक संप्रेषण से या पाठ के रूप में, मृत्यु को आहूत नहीं करता बल्कि, केवल लेखक की मृत्यु को ही इंगित करता है। लेखक अपनी वैयक्तिकता के संकेतों से पाठक को भ्रमित करता है। इस तरह लेखन की क्रीडा में लेखक ‘मृतक’ की भूमिका का निर्वाह करता है। पश्चिम में, सत्रहवीं शताब्दी तक, ऑथर की ऑथौरिटी थी। उसका होना और दावा करना, स्वीकारा जाता था।

मिशेल फूको आख्यान के ध्रुव को और उसके मनोनयन के बीच फर्क करते हैं। लेखक का नाम उस व्यक्ति का नाम नहीं है, जो लिखता है। हालाँकि, दोनों मिलकर एक ही व्यक्ति का ही बखान और उसे ही चिह्नित करते हैं, लेकिन, उसी यथार्थ को निर्दिष्ट नहीं करते। मिशेल फूको, लेखक के नाम के अंतर्विरोधी एकाकीपन को विश्लेषित करते हैं। लेखक का प्रकार्य 17वीं और 18वीं सदी के मध्य लुप्त हो गया था। लेखक की सत्ता, उसमें विलुप्त थी, जिसमें ‘लिखे हुए’ का संबंध उस सत्य से था, जो पहले भी स्वयं को स्थापित और अपनों को व्यक्त कर चुका था। साहित्यिक विमर्श भी, वैज्ञानिक विमर्श की तरह ही, लेखक के नाम को धारण करता है। उत्तर आधुनिक ‘वैचारिकी’, हमेशा मौलिकता की गुणवत्ता के बारे में केंद्रित नहीं रहती, बल्कि, इसके उलट वह मौलिकता को ही प्रश्नांकित करती है। क्योंकि, वह सृजन को ‘दिक’ और ‘काल’ में से गुजारने के बाद देखती है। इस वैचारिकी को अत्यधिक सुसंगत रूप में स्पष्ट करने के लिए हम एक उदाहरण दृश्य कलाओं से लेंगे। छायाकार शेर्री लेविन, प्रख्यात चित्रों के चित्र लेने के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ ‘प्लेजियारिज्म’ को उस तरह लागू नहीं किया जा सकता, जैसा कि ‘अन्य’ मसलों में होता है, क्योंकि वे उन प्रसिद्ध चित्रों को एक मॉडल के रूप में ले रही हैं। यह समस्या उस संदर्भ में प्रासंगिक है- वे चित्र किसके हैं? क्या वे उसके चित्र हैं, चूँकि उसने बनाए हैं, या वे कि उस मूल ‘ऑथर’ (चित्रकार-छायाकार) के हैं, चूँकि उन्होंने पहली बार बनाए हैं। इसलिए, लेविन के फोटो की मीमांसा की स्थिति क्या है? वह फोटो क्या हैं? क्या लेविन के चित्र, कलाकृति हैं, यदि कलाकृति को ‘मौलिकता’ के रूप में ही देखा जाए तो सहसा हमारे सामने मौलिकता तथा ऑथौरिटी का अंतर्विरोध तब सहसा प्रकट होता है, जब हम आखरी प्रश्न का उत्तर खोजने लगते हैं। ये इस अर्थ में मौलिक हैं, क्योंकि लेविन के पूर्व किसी अन्य ने, चित्रकृतियोें के चित्र नहीं लिए थे। लेकिन, दूसरे अर्थ में वह मौलिक बिलकुल नहीं है, क्योंकि जो वास्तविक ‘छवि’, वे चीज जो कि चित्रकृति प्रस्तुत करती है, वे मूलतः उसके पहले ‘ऑथर’ की ही मिल्कियत हैं। कुल मिलाकर, वह उन चित्रों के द्वारा, यह संप्रेषित करना चाहती हैं कि संप्रति कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे मौलिकता की तरह स्थापित या कि चिह्नित किया जा सके। उसका अभीष्ट यह बताना है कि उसने उन चित्रों की प्रतिलिपि ही की है। अतः उत्तर आधुनिकता मौलिकता के च्युत होने के प्रति पूर्णतः चेतस भी है, क्योंकि वह नवोन्मेष द्वारा स्थाई नवीनीकरण के आदर्श को त्याग देती है। इसलिए, सृजन व सृजक के अंतरसंबंध सामान्यतः देखने में सरल लगते हैं-लेकिन, वे दुरूह तथा जटिल हैं, और उसमें आवेष्टि ‘वस्तुगत’ साथ की मांग करते हैं।

लेविन का उदाहरण यहाँ बहुत प्रासंगिक है, क्योंकि हम उत्तर आधुनिक साहित्य में इस समस्या से रू-ब-रू होते हैं। उदाहरण के लिए ‘फ्राइडे या अन्य द्वीप’ विलियम डफो के ‘रॉबिंसन क्रूसो’ का पुनर्लेखन ही है। अतः इस उदाहरण को हम सूक्ष्मता से विवेचित करें तो पाते हैं कि न केवल ‘गल्प’ का सृजन होता है, बल्कि उसके साथ लेखक का भी। यदि उपन्यास का लेखक, वही वास्तविक व्यक्ति नहीं है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह कठपुतली का संचालन करने वाले का, अनंत तक से गुणनफल हो सकता है। लेकिन हम स्क्रैच से गल्प के संसार की रचना नहीं कर सकते, चूँकि हम यदि गल्प का सृजन करना चाहें, तो हमें यथार्थ से कुछ तथ्य उधार लेने पड़ेंगे।

अतः दर्शन और साहित्य के मध्य यही प्रमुख भेद है कि ऑथर (लेखक) केवल कंवेंशन का एक सेट बनाता है, या वह किसी अन्य लेखक द्वारा रचे गए सेट ऑफ़ कंवेंशन को लिखने के लिए प्रयुक्त करता है, ताकि वह बखान के आधार पर कोई पाठ निर्मित कर सके। जबकि दार्शनिक केवल विमार्शात्मक पैटर्न का ही निर्माण करता है। एक उपन्यास का लेखक, साहित्यिक शैली को भी उद्घाटित करता है जो कि किंचित समानताओं और उपमाओं के क्षेत्र को खोलता है। अतः दार्शनिक न केवल अपनी पुस्तक के लेखक होते हैं, बल्कि वह पाठ निर्मिति की संभावनाएँ और उसके नियम भी तैयार करता है। उदाहरण के लिए, फ्रायड न केवल, ‘स्वप्नों की व्याख्या’ नामक पुस्तक के लेखक हैं, बल्कि वह अन्य विमर्शों की नई संभावनाओं से भी परिचित कराते हैं। दार्शनिक स्वयं को, न केवल एक पुस्तक के संदर्भ में, बल्कि सिद्धांतिकी और परंपरा के संदर्भ में भी स्वयं को एक ट्रांस-डिस्कर्सिव (विमर्शात्मक) स्थिति में पाता है। जबकि, ‘साहित्य’ की पाठ निर्मिति का सर्जक, केवल अपने ही पाठ का सर्जन होता है। दार्शनिक, जहां नई संभावना, नई शैली और नये चलन के भीतरी संरचना में, एक चिंतन के पैराडाइम का भी सृजनकर्ता है। पैराडाइम की सिद्धांतिकी मूलतः विज्ञान के एक थॉमस कून ने दी है। अतः पैराडाइम एक किस्म का विश्व के प्रति दृष्टिकोण है, एक चिंतन का मार्ग बनाता है, उस हर चीज के लिए जो एक शोध की रुचि का ऑब्जेक्ट होता है। पैराडाइम उनके बीच संप्रेषित नहीं करता। कून यह व्याख्या देते हैं कि उनके पास कोई झरोखा नहीं है, इकाइयों के बारे में जो, लाइबनीज का फार्मूला या सूत्र है। एक वैज्ञानिक पैराडाइम से दूसरे वैज्ञानिक पैराडाइम तक जाना, एक बहुत जटिल परिवर्तन के कारण संभव होता है, जो कि कभी कभार ही घटता है। हालांकि, ये जरूरी नहीं है कि, हरेक त्रुटिपूर्ण परिणाम, वैज्ञानिक पैराडाइम में परिवर्तित नहीं हो जाता। वैसे ज्यादातर परिणामों को एक तरह से त्रुटि की तरह ही लिया जाता है। केवल बहुत ही किसी विरले प्रकरण में ही, नए पैराडाइम का जन्म होता है। साहित्यिक ‘टेक्स्ट’ भी इन्हीं पैराडाइम का प्रतिभाग ही है, क्योंकि पैराडाइम का जो पैटर्न है, जो बहुत सारे कालखंडों को परावर्तित करता है, और बहुत सारे विचारों को भी। विमर्श का प्रवर्तक ही संभावनाओं को ‘टेक्स्ट’ से नाथता भी है। यह विमर्शात्मक उद्घाटन, विज्ञान के ‘सत्य’ के उद्घाटन से किंचित भिन्न होता है, लेकिन यह भिन्नता, इस अर्थ में भिन्न होती है कि वहां, शोधकर्ता किसी एक सिद्धांतिकी पर एकाग्र होता है, जबकि दर्शन में, एक नहीं अनेक विमर्शों का सर्जन होता है। मिशेल फूको, दर्शन में, वह मार्ग, जो दार्शनिक सिद्धांतों ने खोला था, वह वापस भी वहीं ले आता है, और पैराडाइम में डोमेन को रूपांतरित करने का सामर्थ्य भी होता है। यह सृजनोन्मुखी भी हो सकता है। इसके बरक्स, विज्ञान में केवल डोमेन के इतिहास में रूपांतर संभव है, मूल डोमेन में नहीं। और, यह सृजनोन्मुखी हो, यह भी अनिवार्य नहीं है। मिसाल के तौर पर ग्रीक से बिल्कुल आरंभ में, पुरातन दार्शनिकों को देखें, वे नीत्शे पर बहुत सृजनात्मक प्रभाव डालते हैं, वे खास तौर पर, पुरातन दार्शनिकों के काम में, अपनी रुचि रखते हैं, जैसे कि हेराक्लिटेस। लेकिन जब मिशेल फूको उन तक जाते हैं, तब मिशेल फूको की रुचि एक नई शोध-प्रविधि को जन्म देती है, जिसे वह कहते हैं, जिनियोलॉजी।

हाइडेगर भी नीत्शे के द्वारा प्राचीन दार्शनिकों के काम में रुचि प्रकट करने के अभीष्ट को पाते हैं कि समकालीनों की तुलना में वह कहीं ज्यादा चुनौतियां पैदा करते हैं। वह प्राचीन दर्शन के डोमेन को पुनर्जीवित और पुनराविष्कृत करते हैं, चाहे वह फिर सर्वाधिक प्राचीन मेटाफिजिक्स ही क्यों न हो। वह नीत्शे की रुचि को धारणा की शर्त की तरह ग्रहण करते हैं, उदाहरण के लिए हाइडेगर के काम को, विशेष तौर पर Sein Und eZit को लें, वह लगभग एक नई भाषा में लिखा गया है, जिसमें, जर्मन, प्राचीन जर्मन और ग्रीक भाषा के तत्वों का मिश्रण कर दिया गया है। जैसी कि हम चर्चा कर रहे थे कि मिशेल फूको ने भी अपनी जिनियोलॉजी के दृष्टिकोण के लिए, नीत्शे से यह प्रविधि विरासत की तरह हासिल की है, जिनमें पागलपन, यौनिकता, और दंड विधान के संदर्भ में जीनियोलोजी शामिल हैं। वह शोध का मार्ग अतीत में ले जाता है, लेकिन समकालीन ज्ञान और समकालीन प्रविधियों के साथ, जिसके जरिए वह ‘समकाल’ की जटिलताओं का समाधान निकालते हैं। यह अतीत की वापसी का रास्ता, उत्तर आधुनिकतावादियों में अत्यंत प्रचलित है क्योंकि वे किसी भी साधन से उसे नवोन्मेषी नहीं बनाते।

देरिदा इस बात पर देर तक टिके रहते हैं कि ‘पाठ’ से बाहर कुछ भी नहीं है क्योंकि, मूलतः ‘सत्य’ को भी एक संरचना मान कर, उसे ‘भाषा’ के भीतर अवस्थित एक निर्णायक घटक की तरह देखते हैं । इस दृष्टिकोण में, परिभाषाएँ किसी चरम-अर्थ को आवेष्टित करके नहीं रहतीं, बल्कि, यह दूसरी परिभाषाओं से एक पारस्परिक अवधारण बनाती है। विखंडन, विसर्जन बन जाता है, विनष्टिकरण नहीं। यही है, वह प्रक्रिया, जो इसके अनिवार्य तत्व में घुला देती है। सन् साठ के दशक में विखंडनवाद एक सांस्कृतिक प्रवृत्ति का रूप ग्रहण कर लेती जिसमें देरिदा विशेषकर सर्वाधिक निष्णात दिखाई देते हैं। देखा जाए तो इसकी प्राथमिक शुरुआत, हाइडेगर के उस प्रयास से होती है, जब वे पुरातन सत्ता मीमांसा के विखंडन के सहारे, एक दूसरी सत्ता मीमांसा को संभव बनाने के काम में लगे थे। जब विखंडन को मेटाफिजिक्स से पृथक करते हैं, तब ‘साहित्यालोचन’ के डोमेन में प्रवेश कर जाता है। और खासकर अमेरिकी दर्शन के विखंडनवाद में। लेकिन, ओल्सन का कथन है कि यदि हम दर्शन के डोमेन से विदा नहीं लेते हैं तो ‘विखंडन’ अपनी प्रासंगिकता को कायम किए रहता है। विखंडन का अर्थ उसके कोई खंड खंड कर देने से नहीं है अपितु उसके आरंभिक तत्व में घुल जाना है। विखंडन की सिद्धांतिकी अतीत पर लागू नहीं होती है, सिर्फ वर्तमान और भविष्य के वैश्लेषिक में प्रयुक्त अवधारणा का होता है। हाइडेगर के लिए ‘विखंडन’ का अभिप्राय किसी जटिल दार्शनिक समस्या को निरस्त करके कूड़ेदान में फेंक देने से बचाने की चेष्टा को कहा जाएगा। और सबसे यदि कोई जटिल समस्या है, तो वह है ‘होने’ की अर्थात अस्तित्व के होने की। एक तरह से किसी वस्तु या विषय के बारे में सामान्यतः जो हमारी मान्यता होती है, उसके वास्तविक अर्थ का अभिलोपन है। हम क्या जानते हैं और हम क्या सोचते हैं, हम जानते हैं कि उस धारणा को हम छुपाना चाहते हैं, जो वह धारणा स्पष्ट करती है। जबकि हाइडेगर, विश्लेषित करते हैं ‘विखंडन’ की प्रक्रिया में ‘होने’ भर को। देरिदा किसी अर्थ की दशा में विभेद की क्रीड़ा पर जोर देते हैं। दूसरा जो प्रमुख प्रसंग है, देरिदा के चिंतन की परिधि में, वह है, उद्भव। कुल मिला कर, विखंडन का मुख्य अभीष्ट यह होता है कि वह भिन्न मेटाफिजिकल अवधारणाओं से मूल अर्थ को निकाल ले। देरिदा, फूको से भिन्न काम करते हैं। वह यह कि वे भाषा के विश्लेषण की शुरूआत phonemes (ध्वनि की न्यूनतम इकाई) से व्याख्या करते हैं कि यदि हम किसी phonemes को सुनते भी हैं तो, जो अनिवार्यतः भाषा के भीतर नहीं है, क्योंकि हम सुनते हैं, वह मात्र दो के बीच के भेद को सुनते हैं। Marges de La Philosophie में, देरीदा, भाषा की क्रीडा को स्थगित कर देते हैं। वे कहते हैं, यदि हम उसकी शुरुआत विमर्श से करेंगे तो भाषा को कदापि नहीं समझा जा सकता। विमर्श भी स्वयं को वहीं स्थिर किये रहता है, जहां उसके भीतर ‘पाठ’ का सिद्धांत मौजूद होता है। जबकि, भाषा ऐसा नहीं करती। विभेद अनसुना रह जाता है। जो आवश्यक तत्व है, भाषा का, वह है खामोशी। देरीदा तो इसीलिए आगे चल कर ‘रचना’ और ‘सृजन’ के बीच भी एक सूक्ष्म भेद की उपस्थिति को इंगित करते हैं। वे कहते हैं कि वे समानार्थी दिखते हैं, लेकिन अर्थ वैभिन्य है। ‘रचना’ केवल ‘कंस्ट्रक्ट’ है, जबकि ‘सृजन’ में संवेदना भी है। यहाँ देरिदा फूको के बरअक्स एक दूसरा दृष्टिकोण रखते हैं। हम किसी भी भाषा को तभी समझ सकते हैं, जब हम अनिवार्य अवधारणाओं के विमर्श को जिनियोलॉजी के द्वारा समझने की चेष्टा करें और साथ ही विमर्श के वैशिष्ट्य को विचारणीय मानें, फिर चाहे वह साहित्यिक हो, वैज्ञानिक हो या कि दार्शनिक। इसका अभिप्राय हुआ कि मिशेल फूको सिद्धांतः, विखंडन के अत्यंत सामीप्य में हैं, क्योंकि वे यह मानते हैं कि कहीं कोई इतिहास नहीं है, जिसे ‘इन सोलिटरी जिनियोलॉजी’ का आधार स्वीकार कर लिया जाए। जिनियोलॉजी का अस्तित्व यह बताता है कि हम इतिहास की एकात्मकता के बारे में अब और बात नहीं कर सकते। एक उदाहरण विखंडन का हम लें, खासकर विखंडन के जरिए सामने रखें तो यह भेद करना, देरिदा के विभेदीकरण की प्रविधि से। वैसे फ्रेंच के ‘डिफरेंस’ शब्द से अंग्रेजी के भेद शब्द का सही अभिप्राय नहीं समझ पाएंगे क्योंकि दोनों का ही उच्चारण एक सा ही है। लेकिन दोनों के मध्य काफी अर्थ वैभिन्य है। यहाँ हमें यह स्वीकार लेना चाहिए कि उत्तर आधुनिकता हमें बहुतेरे सिद्धांतिक विकल्प उपलब्ध कराती है, जिसके सहारे से हम समकाल में, जो गहरे और त्वरित सांस्कृतिक परिवर्तनों को जज्ब करके उन्हें समझने में हम सफल हो सकते हैं। यद्यपि वे कारक, जो इन परिवर्तनों को तय करते हैं, अनेकानेक हैं। मसलन, ज्ञान युग के आदशोंर् का विलीनीकरण, व्याख्याओं को विस्तार दे देता है, फिर किसी भी प्रकरण में उत्तर आधुनिक सिद्धांतकार, हमें यह बता देंगे कि हम ऐतिहासिक को उसकी एकरेखीयता में देख नहीं सकते। आधुनिकतावादी लेखन में, गल्प जगत का संघटन ‘कर्ता’ चारों ओर ही रहता है जबकि इसके समांतर, उत्तर आधुनिक लेखन का दायरा संघटित नहीं, विखंडित होता है। इसमें साहित्य के पाठ के स्पेस का संघटन और विखंडन एक साथ होता रहता है। ये अवस्थितियाँ निम्नांकित हैं : सर्व प्रथम तो यह कि गल्प जगत का सीमोल्लंघन होता है और फलस्वरूप, पाठ के भीतर के जगत में कई अन्य पाठों के लिए अवकाश निर्मिति भी चलती रहती है। यह क्षेत्र दर्शन में भी निर्मित होता है और दिलचस्प बात यह कि यह प्रकृति काफी पहले से उत्तर आधुनिक दर्शन में रही आई है। क्योंकि कोई भी दर्शन परंपरा के योगदान के अभाव में अपने विगत के आलोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ ही, पुनर्नवीनीकरण और नवोन्मेष करती है। क्लेरेंस मेजर के रिफ्लेक्स एंड बोन स्ट्रक्चर में हम चरित्र के कैंसलेशन को अत्यंत स्पष्ट तौर पर पाते हैं। डेल जो कि मेजर का प्रमुख पात्र है, दरवाजा खोलता है तो पाता है कि वह उसके सामने बैठा है, तब ‘बाहर’ का ‘आख्यानकार’, पाठक को सूचित करता है कि, उसने उसे कैंसिल कर दिया है। दर्शन में हम, इसी प्रविधि से मुठभेड़ करते हैं, जो देरीदा ने प्रयुक्त की है।

ग्रामेटोलॉजी में एक तकनीक प्रस्तावित होती है कि किसी शब्द को किन्हीं दो काटने वाली पंक्तियों से काटा जाता है। हम तभी ‘पाठ’ को समझ सकते हैं, यदि हम उन कटे हुए शब्दों को पढ़ते हैं, लेकिन यह भी कि उन कटे शब्दों के बीच का भेद नहीं समझ पाते हैं, क्योंकि उनका अर्थ बदल चुका होता है। पाठक विभ्रमित हो जाता है कि कटा हुआ ‘पाठ’ वहां है भी और नहीं भी है। ठीक ऐसे ही जैसा कि अनकटा पाठ वहां मौजूद है। दरअसल, मूलतः अभीष्ट यही है कि देरिदा के मेटाफिजिक्स से जुड़े कुछ मुख्य अवधारणाओं को प्रश्नांकित करना है। उत्तर आधुनिक साहित्य में, उसी प्रविधि के प्रयुक्त किए जाने के पीछे, प्रदर्शित गल्प जगत के कुछ ऑब्जेक्ट को सवालों से घेरना भी है। इस विखंडन के ‘आवेग’ से पाठ के भीतर ‘अन्य’ पाठ को आविष्कृत करना है, या कोई एक अन्य ‘सूचना’ को प्राप्त करना है, जिससे पता चले कि एक पाठ के भीतर दूसरे ‘पाठ’ की संरचना कैसे हो रही है।

विखंडनवादियों के चिंतनानुसार, कोई भी साहित्य या दर्शन का ‘पाठ’, किसी ‘अन्य’ और पूर्व पाठ से ही जन्म लेता है। और, वे यह कहने में भी संकोच नहीं करते कि इसकी ‘भनक’ ऑथर को भी कतई नहीं होती। देरिदा के कथनानुसार यह वह प्रमुख कारण है, जिसके चलते उत्तर आधुनिक विमर्श से एक किस्म के कोलाज की प्रतीति होती है। इस तरह के कोलाज में, सूचना को ग्रहणकर्ता, एक प्रतिभागी है जैसे कोई सह-प्रस्तुतकर्ता हो, उत्तर आधुनिक दर्शन के पाठ का, कलाकृति का, या साहित्यिक ‘टेक्स्ट’ आदि का भी। पाठक केवल कोई अक्रिय या निर्विकार उपभोक्ता नहीं है, चूँकि उसे उत्तरआधुनिक सृजन को एक अर्थ प्रदान करना है। इस तरह से, विखंडन की प्रक्रिया के प्रभाव के परिणामतः लेखक की वैधता का भी विखंडन अनिवार्य रूप से घटित होता है। न केवल साहित्य अपितु दर्शन में भी, देरिदा, sous rature टेक्स्ट के जरिए, अवकाश (स्पेस) के महत्त्व को रेखांकित करना चाहते हैं कि यह उत्तर आधुनिक ‘थीम’ के भीतर एक प्रमुख घटक है। वस्तुतः यहां यह स्पष्ट कर दें कि देरीदा के द्वारा ‘स्पेस’ के महत्त्व पर इतना अधिक जोर देने का एक कारण यह है कि आधुनिकतावादियों ने, अपनी गढ़ंत के कारण अवकाश (स्पेस) का बुनियादी थीम की तरह विलोपन कर दिया था, जिससे वे विकास और ‘इवोल्यूशन’ तथा द्वंद्वात्मकता को अभिव्यक्त करना चाह रहे थे। शब्द प्राथमिक रूप से, ‘स्पेस’ के जरिए ही अनावृत और अभिव्यक्त होते हैं, जब टेक्स्ट को प्रकृति की तरह प्रयुक्त किया जाता है। लिखित ‘पाठ’ विमर्श में उपस्थित ‘संदेश’ को उठा ले जाते हैं। जहां शब्द समय पर लंगर डाले रहता है और वह आकाशीयता में मुक्त रहता है। देरिदा का यह दावा महत्त्वपूर्ण इसलिए है चूँकि कुछ लेखक, ‘काल’ और ‘दिक’ के संदर्भ को रखकर, आधुनिकतावाद और उत्तर आधुनिकतावाद के बीच भेद स्थापित करने लगते हैं। उदाहरणार्थ, हार्वे के अनुसार आधुनिकतावाद ‘काल’ और ‘दिक’ से संबंधी एक नए अनुभव के कारण हमारे चिंतन के दायरे में दाखिल हुआ। संक्षेप में कहें कि ‘काल’ और ‘दिक’ के संकुचन की प्रतीति की तरह। आगे वह अपने विचार को विस्तार देते हुए कहने की चेष्टा करते हैं कि पुनर्मूल्यांकन और विश्व की आधुनिकतावादी प्रस्तुति, यह दोनों ही ‘काल’ और ‘दिक’ के परिवर्तन के प्रसूत हैं। और यह जो एक तरह का ‘बायनरी अपोजीशन’ है तथा होने और बनने के मध्य जो तनाव दृष्टिगोचर होता है, वह काल की विशिष्ट पहचान तथा ‘दिक’ का केंद्रीकरण है। और, यह एक भू-राजनीतिक संबंध है, जो केवल दर्शन के स्तर भर पर नहीं है। सत्तर के दशकारम्भ से ही, भू-राजनीतिक सिद्धांतिकी के लिए, बहुतेरी और विस्तृत रुचि की वजह भी है, जिसमें अवकाश का सौंदर्य खास तौर पर और स्थानिकता की समस्या आमतौर पर रही है।

रिचर्ड रोट्री तो इंगित करते हैं, यह बताने के लिए कि विखंडनवाद तथा साहित्य और दर्शन के मध्य उपस्थित विभेद को विलोपित कर दिया जाना चाहिए। इस बिंदु से देखा जाए तो जॉक देरिदा, नीत्शे की खींची हुई रेखा पर खड़े दिखाई देते हैं जिसने पुरातन ग्रीक त्रासदी और दर्शन के बीच के विभेद को निरस्त कर दिया था। मार्टिन हाइडेगर की प्रेरणा का स्रोत तो खास तौर पर जर्मन रूमानवादी कवि ही रहा था। यहाँ तक आते हुए हम यह भी स्पष्ट कर दें कि विखंडनवाद का एक अन्य अर्थ भी है जिसका संदर्भ, पाठ की व्याख्या की प्रविधि भी है, जो साहित्य और दर्शन के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींचती है। दुर्भाग्यवश, देरीदा ने इसका उपयोग नहीं किया। दर्शन अपने उत्तर आधुनिक स्वरूप के पूर्व, एक वास्तविक और मिथ्याभास के बीच विभाजन और अदार्शनिक भाषा के चरित्र को पकड़ने का भी काम करता रहा है, क्योंकि वह परंपरागत तर्क पद्धति की जरूरत को पूरा नहीं कर पाती थी। हालाँकि, अंत में फूको, ‘सत्ता’ और ‘ज्ञान’ के अंतसंर्बंधों के आलोचक नहीं हैं, बल्कि वे उनके बीच उपस्थित अप्रकट संबंध और संवाद को सबको उपलब्ध कराने की बहुत बड़ी दार्शनिक भूमिका के निर्वाहक का काम करते हैं।

टॉड मे

फूको की स्वतंत्रता की अवधारणा

(अनुवाद - पुनर्वसु जोशी)

‘स्वतंत्रता’ शब्द रूसो के ‘सामाजिक अनुबंध’ के बाद से, विचारों की दुनिया का सर्वाधिक प्रीतिकर शब्द है जिससे मनुष्य का ‘होना’ परिभाषित होता है। क्योंकि, इसकी मांग और इसकी उपस्थिति-अनुपस्थिति को लेकर ही, सारा सभ्यता-विमर्श खड़ा होता है। हालाँकि, सभ्यता के केंद्र में कई और घटक और कारक भी हैं, लेकिन वे अंततः ‘स्वतंत्रता’ के निकट पहुँच कर, अपनी अर्थवत्ता प्राप्त करते हैं।वैसे, स्वतंत्रता को वर्गीकरण की भूल-भुलैया में ले जाकर, उसकी किस्में भी तय की गईं और इसके चलते, राजनीतिक स्वतंत्रता, नैतिक स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता आदि आदि। इसमें ‘इच्छा’ और ‘कामना’ के द्वैत को भी परिभाषित करते हुए, ‘मेटाफिजिकल प्रॉब्लम ऑफ़ फ्री विल’ को भी विमर्शों की परिधि में रखा गया।लेकिन, मार्क्सवाद के विचारधारात्मक वर्चस्व के बीच, ‘स्वतंत्रता’ को लेकर जितनी तीखी बहसें हुईं, उनसे अर्थ की पर्त-दर-पर्त खुली और स्वतंत्रता को ‘विचारधारा और सांस्थानिकता’ की रौशनी में विवेचित किया गया। इसमें ‘व्यक्ति-स्वातंत्र्य’ सबसे पहले निशाने पर आया। उसे पूंजीवादी अवघारणा मान कर, बहुत आक्रामक विचार आए और इसके परिणामस्वरूप, सामूहिकता के पक्ष और हित में नृशंसता ने जन्म लिया। बीसवीं शताब्दी में तो आइन्स्टाइन की ‘सापेक्षिकता के सिद्धान्त’ ने सब अर्थ उलट डाले। बहरहाल, उत्तर-आधुनिकता के विमर्शों में फिर हमें स्वतंत्रता की परिभाषाएँ तय करते हुए वैचारिक मुठभेड़ें दिखाई देती हैं। फूको ने हालाँकि प्रकट रूप से इस विषय पर कुछ नहीं लिखा है, लेकिन ये प्रश्न उनके चिंतन में परोक्ष रूप से रहे हैं। प्रस्तुत है, फूको के एक चर्चित अध्येता द्वारा की गई फूको की ‘स्वतंत्रता’ संबंधी अवधारणा की एक संक्षिप्त मीमांसा। -अनुवादक

रचना समय

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अगर हम दर्शन में, एक सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में,‘स्वतंत्रता’ की अवधारणा को देखें तो वह भ्रांतिजनक है। यह अवधारणा, दर्शन की समस्याओं में से, कम से कम दो, बहुत भिन्न समूहों के केंद्र में स्थित है। पहला सवाल तो मनुष्य की आध्यात्मिक स्थिति का सवाल है और दूसरे, उसके राजनीतिक स्थिति का प्रश्न है। इन मुद्दों को और अधिक जटिल बनाने के लिए, ‘स्वतंत्रता’ पर मिशेल फूको के नजरिए को खंगालें तो वह दोनों ही समूहों से पूरी तरह बाहर हैं। फूको के विचार, हालांकि, उन दोनों समूहों के साथ मुठभेड़ करके, उन्हें अतिरिक्त जटिल भी बना देते हैं। मेरा प्रस्ताव यह है कि फूको के ‘स्वतंत्रता’ के प्रति दृष्टिकोण को, सिलसिलेवार, तीन चरणों में समझा जाए तो कहीं ज्यादा उचित होगा। पहले मैं, ‘स्वतंत्रता’ की उन दो अवधारणाओं को विवेचित करना चाहूँगा जो कि ‘पारंपरिक दर्शन’ में प्रचलित हैं। फिर मैं फूको की ‘स्वतंत्रता’ की अवधारणा पर चर्चा करूँगा, यह दर्शाते हुए कि वे किस तरह, ‘पारंपरिक दर्शन’ की अवधारणाओं के बरअक्स ठहरती हैं। और अंत में, मैं इन सबको समेटते हुए, फूको के विचारों की तुलना एक और दार्शनिक मौरीस मर्लो-पॉन्टी के विचारों के साथ करना चाहूँगा।

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हम स्वतंत्रता की उन दो परंपरागत अवधारणाओं को, ‘आध्यात्मिक’ और ‘राजनीतिक’ कह सकते हैं। ‘आध्यात्मिक‘ शब्द अपने आप में कुछ गूढ़ है, अतः विमर्श में आगे बढ़ने से पहले, यही बेहतर होगा कि हम पहले से ही, यह बात ठीक से स्पष्ट कर लें कि हम इस ‘शब्द’ का क्या अभिप्राय लेते हैं। ‘आध्यात्मिकता‘, मूलतः प्रकृति के मूलभूत यथार्थ से संबद्ध है। मसलन, ‘यह क्या है?’ या ‘अस्तित्व के मूलभूत सिद्धान्त क्या हैं?’ जैसे प्रश्नों को उठाती है। इस अभिप्राय में हम, इसे ‘ऑण्टोलॉजी’ भी कह सकते हैं। मस्तिष्क और देह का अंतर-संबंध, तत्त्वमीमांसा का एक केन्द्रीय पहलू है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि, यथार्थ, अगर सिर्फ दो चीजों से बना है--पहली मानसिक वस्तुएँ (चेतना) और दूसरी भौतिक वस्तुएँ (देह) तो फिर इनके अंतरसंबंध का प्रश्न, एक केन्द्रीय प्रश्न बन जाता है, और ऐसा है भी, आज से नहीं, देकार्त के समय से। नतीजतन, मस्तिष्क और देह के अंतरसंबंध से जुड़े हुए, बहुतेरे सवालों के बीच, यह सवाल भी खड़ा होता है कि ‘क्या मस्तिष्क, देह का संचालन कर सकता है या नहीं?’ यह प्रश्न अपने दूसरे स्वरूप में ‘स्वतंत्र इच्छा’ (फ्री-विल) के प्रश्न में बदल जाता है जिसके बारे में हम आगे बात करेंगे।

‘आध्यात्मिकता’ का गूढ़ चरित्र, बीसवीं शताब्दी के दौरान, मार्टिन हाइडेगर के विचारों के प्रभाव में उभरा। हाइडेगर के लिए सम्पूर्ण पाश्चात्य दर्शन ही, ‘आध्यात्मिकता’ का पर्याय है। हाइडेगर के लिए, चिंतन के केंद्र में ‘परम-प्रश्न’, अस्तित्व का प्रश्न है। हाइडेगर के नजरिये में, समस्या यह है कि पाश्चात्य दर्शन में, आद्योपान्त अस्तित्व की व्याख्या, व्यक्ति के होने से की गयी है। अतः, जब हम यथार्थ के स्वरूप के बारे में प्रश्न करते हैं, और जब हम यह पूछते हैं ‘क्या है?’, तब, हम दरअस्ल यह पूछ रहे होते हैं कि ‘कितने तरह के व्यक्ति हैं?’ यह दृष्टिकोण अस्तित्व के प्रश्न की अवहेलना करता है। इसलिए हाइडेगर, जब ‘आध्यात्मिकता’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो वे दर्शन के उस दृष्टिकोण की बात कर रहे होते हैं जो दर्शन के परम प्रश्न, अस्तित्व के प्रश्न को भूल कर व्यक्ति के प्रश्नों की बात करता है।

यह हम सब जानते हैं कि हाइडेगर का ‘आध्यात्मिकता’ शब्द का इस्तेमाल काफी प्रभावशाली रहा है, खासकर हाल ही में फ्रेंच दार्शनिक जैक देरीदा और उनके अनुयायियों के बीच। हालांकि, इस निबंध के लिए, हम यह मुद्दा संप्रति यहीं छोड़ देते हैं। ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’  शब्द का जो अभिप्राय हम लगाते हैं, उसका संबंध ना तो ‘अस्तित्व’ से है और न ही ‘व्यक्ति’ से। दरअसल, उसका मूल संबंध ‘स्वतंत्र इच्छा’ से है।

तब, सहज ही यह प्रश्न जन्म लेता है, तो फिर, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता क्या है?’ यह ऐसा कुछ है, जो मनुष्यों के पास हो सकता है या नहीं भी हो सकता है। जो लोग ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के विचार का समर्थन करते हैं, उनका उस ‘स्वतंत्रता’ से प्राथमिक आशय क्या है, इस बारे में भी बहुत अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। परंतु, इस पर सब सहमत हैं, कि ‘वह जो भी है’, उस में हमारे ‘होने’ की नियति का प्रतिरोध समाहित है। फिर हमें, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ को ठीक से समझने के लिए, ‘नियतिवाद’ का सिद्धान्त भी समझना जरूरी होगा। तो, फिर, ‘नियतिवाद क्या है?’ यानि यह दृष्टिकोण कि मनुष्य का, अपने ‘विचारों’ और ‘कमोंर्’ पर नियंत्रण नहीं है। हम, जो भी करते हैं, उसका स्रोत, हमारी चेतना के नियंत्रण से सर्वथा बाहर है। नियतिवाद के बहुतेरे प्रकार होते हैं। कैल्विनवादी दृष्टिकोण रखने वाले विमर्शकार, ‘पूर्वनियति’ के एक धार्मिक दृष्टिकोण को अपनाते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, ईश्वर ने ‘जो कुछ होने वाला है’ उसे पहले से ही निर्धारित कर रखा है और मानव जीवन केवल, उस पूर्वरचित पटकथा को दुहरा भर रहा है। ‘जेनेटिक’ नियतिवादी यह मानते हैं कि जो कुछ भी हम होंगे और विभिन्न परिस्थितियों में, जो भी हमारी प्रतिक्रिया होगी, वह सब हमारे ‘जीन्स’ में कूटबद्ध है। जबकि दूसरी ओर, व्यवहारवादियों का मत है कि हमारा परिवेश ही, हमें पूर्ण रूप से गढ़ता है। हम हमारे ‘नकारात्मक’ और ‘सकारात्मक’ संबलनों के उत्पाद के अलावा कुछ नहीं हैं। इन तमाम दृष्टिकोणों में, यह विचार समान है कि लोग अपने जीवन के, किसी भी पहलू के नियंत्रण में नहीं हैं। वे उन शक्तियों के उत्पाद हैं, जो उनके प्रभाव से दूर और बाहर हैं।

इसके विपरीत, जो यह विश्वास करते हैं कि ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ है, वे इस बात को स्पष्टतः नकारते हैं कि मानव जीवन पूर्णरूपेण नियत है। यहाँ पर भी अलग-अलग दृष्टिकोण हैं, न केवल इसमें कि ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ में क्या समाहित है, बल्कि इसमें भी कि हमें दरअस्ल कितनी स्वतंत्रता उपलब्ध है। कुछ, हालांकि बहुत थोड़े, दर्शनिकों का मानना है कि हम अपने तमाम निर्णयों में पूर्णरूपेण स्वतंत्र हैं। जबकि अधिकांश दार्शनिक, कुछ कम रूढ़िवादी सिद्धान्त मानते हैं। इस तरह से देखा जाये तो ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के इन सारे दृष्टिकोणों को, जो विशिष्ट बनाता है, वह है, इस बात का खण्डन कि हम पूर्णरूपेण नियतिबद्ध हैं। मनुष्य का, अगर वह मानसिक रूप से विक्षिप्त नहीं है तो, अपने विचारों और अपने आचरण पर, कुछ सचेतन नियंत्रण अनिवार्यतः रहता ही है।

हम सामान्यतः यह जानते ही हैं कि ‘राजनीतिक स्वतंत्रता’, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ से एकदम भिन्न है। राजनीतिक स्वतंत्रता का संबंध, उन स्वछंदताओं से है, जो हमें किसी समाज के सदस्य होने पर उपलब्ध हों या ना उपलब्ध हों। उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट्स में ‘अभिव्यक्ति’ की राजनीतिक स्वतंत्रता है, मगर म्यांमार के लोगों के पास यह नहीं है। राजनीतिक स्वतंत्रता, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ की तरह, मानव स्वभाव का सिद्धान्त नहीं है। इसके बदले, यह किसी समाज के विशिष्ट घटकों का चरित्र चित्रण है।

यहाँ, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक स्वतंत्रता और ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’, ‘अवधारणात्मक’ रूप से भिन्न-भिन्न हैं। लोगों के पास, एक प्रकार की स्वतंत्रता के होने और दूसरी तरह की स्वतंत्रता न होने की कल्पना की जा सकती है। एक तरफ, कोई राजनीतिक स्वतंत्रता के अभाव में भी, ‘आध्यात्मिक’ रूप से मुक्त हो सकता है। उदाहरण के लिए, चलिये मान लें कि लोग पूर्णरूपेण अपने व्यवहार में नियतिबद्ध नहीं हैं। इसके तहत कोई ऐसा व्यक्ति, जो कि ‘राजनीतिक बंदी’ की तरह है, ‘आध्यात्मिक’ रूप से स्वतंत्र है, परंतु राजनीतिक रूप से नहीं। वहीं दूसरी ओर, अगर हम यह मान लें कि लोग पूर्णरूपेण, अपने व्यवहार में नियतिबद्ध हैं, तो उस समाज में, जहाँ प्रचुर राजनीतिक स्वतंत्रताएँ उपलब्ध हैं, वे राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होंगे परंतु ‘आध्यात्मिक’ रूप से नहीं।

ज़ाहिर है कि यह वैचारिक भेद, दर्शन की परंपरा का लक्षण है। शायद, फिर भी, अपेक्षया यह काफी हद तक सुलझा हुआ है। शायद, यह विचारों को स्पष्ट करने के बदले, उन्हें और धुंधला कर देता है। आखिरकार, उदाहरण के लिए, क्या हम यह कल्पना नहीं कर सकते कि किसी समाज में, जिसमें ‘राजनीतिक स्वतंत्रता’ अबाधित रूप से अनुपलब्ध रही है, वहाँ लोगों की गतिविधियां सीमित रहेंगी, भले ही वे अचानक स्वतंत्र हो जाएँ। व्यवहारवादियों का तर्क है कि, हम पूर्णरूपेण, अपने परिवेश के द्वारा नियतिबद्ध हैं। हमें यह पहचानने के लिए उतनी दूर जाने की जरूरत नहीं है कि जिसे हम, अपनी ‘आध्यात्मिक स्वतन्त्रता’ कहते हैं, वह शायद परिवेशगत कारणों से सीमित हो, जिनमें राजनीतिक स्वतंत्रता भी शामिल है। अंततः, हमने पिछले कई दशकों में देखा ही है कि पीढ़ियों तक राजनीतिक अधीनता में रहने के बाद किस तरह लोगों को अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता का उपभोग करने में कठिनाई का सामना करना पड़ा है। ऐसे उदाहरण कई अल्प विकसित समाजों में ही नहीं, बल्कि, उपनिवेशरहित समाजों में भी मिल ही जाएंगे।

‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के सिद्धांतकार, यह तर्क दे सकते हैं कि राजनीतिक स्वतन्त्रता की अनुपलब्धि, ’आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के अस्तित्व से समझौता नहीं कर सकती। उनका यह दावा रहेगा कि ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’, सारे मनुष्यों के पास उपलब्ध है। जो लोग राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हैं, उससे उनकी ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ में न तो कोई अभिवृद्धि होती है, न ही कोई घटोतरी। वे सिर्फ अपनी इस ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ को नवोपार्जित राजनीतिक स्वतंत्रता की सेवा में न लगा पाने की अज्ञानता दर्शा रहे हैं।

हालाँकि, मुझे लगता है कि इस उत्तर में, ऐसा कुछ है, जो छूट रहा है। अगर हम यह जानना चाहते हैं कि लोगों का जीवन कैसा है? वे क्या और क्या नहीं कर सकते? तब, शायद यह कहा जाना बहुत हद तक, सहायक सिद्ध नहीं होगा कि भले ही उनकी परिस्थिति कैसी भी हो, वे ‘आध्यात्मिक’ रूप से स्वतंत्र हैं। ज्यादातर लोगों की रुचि, यह जानने में नहीं है कि वे, किसी अप्रकट ढंग से लाचार हैं, या कहें कि वायवी-लाचारी है, उनकी। बल्कि उनकी रुचि यह जानने में हैं कि उनके पास, कौन से ठोस विकल्प उपलब्ध हैं। यानी, अगर लोगों को, किसी एक तरीके से रहने के लिए बाध्य कर किया गया है, तो यह दावा कि ‘वे ऐसे रहने के लिए बाध्य नहीं हैं’ खोखला साबित होगा। अगर, इस सबका अभिप्राय यही निकले, कि मनुष्य ‘होने’ में ऐसा कुछ है, जो पूरी तरह, उन परिस्थितियों के अधीन नहीं है। उन लोगों की दिलचस्पी, उन परिस्थितियों के चरित्र चित्रण को जानने में ज्यादा होगी। साथ ही, उनकी दिलचस्पी यह जानने में भी होगी, कि कैसे वे परिस्थितियाँ,जो वे हैं और जो वे करते हैं, उसमें दखल डालती हैं और वे कैसे अपने आप को, उन परिस्थितियों से पूरी ‘स्वतंत्र’ कर सकते हैं।

 

ऐसे में, ऐन ठीक इसी बिन्दु पर, मिशेल फूको के, स्वतंत्रता के बारे में विचार अत्यंत प्रासंगिक हो उठते हैं। फूको, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के किसी भी रूप का बचाव नहीं करते हैं। न ही वे, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ को अस्वीकार करते हैं। बल्कि, इसके विपरीत, वे उन असंख्य बाधाओं को गिनाते हुए मिलते हैं, जिन्होंने हमें बाध्य कर रखा है। हालाँकि, जिन बाधाओं का विवरण, वे करते हैं, और जैसा कि वे जोर दे कर कहते हैं, वे बाधाएँ ‘आध्यात्मिक’ बाधाएँ नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से मनुष्य पर लाद दी गयी बाधाएँ हैं। नतीजतन, वे ऐसी बाधाएँ हैं, जिनसे निश्चय ही पार पाया जा सकता है। और उन बाधाओं से पार पाना, न तो ‘आध्यात्मिक’ चेष्टा होगी, और न ही दार्शनिक। बल्कि, यह एक राजनीतिक अभ्यास है। अगर दूसरी तरह से कहें तो, फूको, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ का न तो बचाव करते हैं और न ही खण्डन। वे ऐसा कुछ राजनीतिक प्रतिरोध के होने के लिए मान लेते हैं। हालाँकि, उनकी रुचि वहाँ नहीं है, बल्कि उनकी रुचि, उन विशिष्ट बाधाओं को जानने के प्रश्न में निहित है, जो कि हमारे ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हैं। वे जानना चाहते हैं कि, वो बाधाएँ क्या हैं, वे अपने उस रूप में कैसे आईं, और उनके क्या प्रभाव हैं? और इन प्रश्नों के उत्तर जानने के बाद ही हम, अपने आप को उन बाधाओं से मुक्त कर सकते हैं। जैसा कि वे, अपनी अंतिम प्रकाशित कृति में लिखते हैं, ’आखिरकार, ज्ञान के लिए, वो जुनून ही क्या, जिसकी परिणति सिर्फ कुछ मात्रा की सुविज्ञता में हो, न कि, एक या दूसरे रूप में और जहाँ तक संभव हो सके, ज्ञाता के खुद से ही विषय से भटकने में । (फूको 1990 बी 8)

यह सर्वविदित है कि फूको ने, ‘स्वतंत्रता’ पर स्वतन्त्र रूप से कोई भी पुस्तक प्रकाशित नहीं की। और न ही उनकी, स्वतंत्रता, चाहे वह ‘आध्यात्मिक’ हो या राजनीतिक’, पर कोई निरंतर चलने वाली टिप्पणी है। जब भी वे ‘स्वतंत्रता’ शब्द या ‘स्वतंत्रता के विचार’ का उल्लेख भी करते हैं, तो वह हमेशा ही किसी दूसरे ही संदर्भ या किसी दूसरे ही मसले की बहस में होता है। फिर भी, हम यह कह सकते हैं कि अपने कार्यकाल के, एक छोर से दूसरे छोर तक, ‘स्वतंत्रता का प्रश्न’, उनके काम को निरंतर प्रेरित करता रहा। उनके लिए चुनौती के रूप में, प्रश्न यह नहीं कि ’क्या हम स्वतंत्र हैं?’, बल्कि, प्रश्न यह है कि, ’हम कैसे ऐतिहासिक रूप से बाध्य हैं और हम उसके बारे में अपने तईं क्या कर सकते हैं?’ हालाँकि, फूको के पास इस प्रश्न के दूसरे भाग के बारे में कहने के लिए बहुत कम उपलब्ध था, परंतु वे, इस प्रश्न के पहले भाग के बारे में, और उस विचार के संदर्भ में, अपनी भूमिका के बारे में काफी स्पष्ट थे। उनकी भूमिका, हमें यह बताने की नहीं थी कि ‘हम क्या करें’, बल्कि, बाधाओं के एक नए समूह को प्रस्तुत करने की थी। इसके साथ यह भी कि उन विशिष्ट ऐतिहासिक बाधाओं को समझने में, हमारी और स्वयं की मदद करने के अभीष्ट में था, और यह समझाने में भी था कि, वे बाधाएँ ऐतिहासिक बाधाओं से ज्यादा कुछ नहीं हैं। इसी प्रवृत्ति में उन्होंने एक बार लिखा था :

‘चीजें, इससे बेहतर नहीं हो सकतीं, ऐसा कहने में एक निराशावाद है, जबकि मेरा केन्द्रीय आशावाद यह कहने में निहित है कि बहुतेरी चीजें बदली जा सकती हैं, जो वैसे ही कमजोर हैं, जो परिस्थितियों से ज्यादा बंधी हुई हैं, बनिस्बत आवश्यकताओं के, जो ज्यादा मनमानी हैं, बनिस्बत स्वयं-सिद्ध होने के, और ज्यादा जटिल, अस्थायी ऐतिहासिक परिस्थितियों के मसले बजाय अवश्यंभावी मानव-विज्ञानी शाश्वतताओं के।‘ (1990 डी, 156)

 

इस बिंदु तक हम, बहुत ही सामान्य तौर पर ‘स्वतंत्रता’ शब्द के अभिप्राय के बारे में बात कर रहे हैं। तथापि, अगर फूको का दृष्टिकोण उपयोगी है, तो हमें ‘स्वतंत्रता’ पर व्यापक दार्शनिक टिप्पणियों से अलग हट कर, अपनी विशिष्ट परिस्थिति का स्थापित, ऐतिहासिक विश्लेषण करना होगा। और कहना न होगा कि यही, जाहिर तौर पर फूको का लेखन कर रहा है। इन कृतियों में, स्वतंत्रता की अंतर्निहित भूमिका देखने के लिए, चलिये हम संक्षेप में, इस एक उदाहरण पर विचार करें। ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ फूको द्वारा लिखित फ्रांस में, जेलों के उदय का इतिहास है। यह यातना से लेकर पुनर्वास तक के परिवर्तन काल का बखान करता है। उस दौर से गुजरते हुए, यहाँ दोनों अवस्थाओं का दखल है। यातना काल के दौरान, अपराध कभी-कभी ही लेकिन गम्भीरता से दण्डित होते थे। हर एक अपराध, शासक के विरुद्ध माना जाता था, और उस दोष को पूर्णरूपेण अक्षरशः शासक की सत्तानीति के ढाँचे के खिलाफ, एक हमला माना जाता था। इस अपराध का दमन, अपराधी के शरीर के प्रति अत्यधिक नृशंस दण्ड से किया जाता था, ताकि शासक की सत्ता और प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की जा सके।

कहना न होगा कि, यातना कई मानों में, दण्ड की एक निरर्थक विधि थी। यह असामान्य रूप से लागू की जाने वाली, महंगी विधि थी और अक्सर, अपराधी के लिए सहानुभूति उत्पन्न करती थी। पूंजीवाद के उदय और उसके साथ बढ़ते हुए, भूमि सम्बन्धी अपराधों पर ध्यान अधिक केन्द्रित किए जाने के कारण, दण्ड की, एक कुशल प्रणाली की आवश्यकता उत्पन्न हुई। फूको, इस समस्या से निपटने के एकमेव समाधान के रूप में, जेल के उदय की, एक जटिल गाथा बताते हैं। हमारे उद्देश्य के लिए, इस गाथा में, प्रासंगिक यह है कि इस व्यवस्था के केंद्र का परिवर्तन, शनैः शनैः अपराध से, अपराधी की तरफ हो गया। इससे एक ऐसा तंत्र उभरा, जो अपराधों को दण्डित करने के बदले, अपराधों को, आपराधिकता की अभिव्यक्ति मानने लगा। अतः, इस धारणा के कारण, जिसे ठीक किए जाने की जरूरत थी, वह अपराध के पीछे का अपराधी था। इसके लिए हस्तक्षेप और निगरानी की उन्नत तकनीकों की आवश्यकता पड़ी, जो पहले से ही दण्ड प्रणाली से अलग मठों, अस्पतालों, और सेना में विकसित हो रही थीं। इन तकनीकों को, जेल के सीमित परिवेश के साथ मिला दिया गया, जहाँ कैदी पर सतत निगरानी रखी जा सकती थी और हस्तक्षेप किया जा सकता था। कारावास, वे जगहें थीं, जिन्हें फूको, ‘आज्ञापरायण निकाय’ कहते हैं। निकाय, जो काम करने में कुशल और सत्ता के आज्ञाकारी, दोनों थे।

कुल मिलाकर, उन करावासों में, जो गढ़ा गया वह, वही नहीं रहा। निगरानी और व्यक्ति की निजता में हस्तक्षेप की तकनीकें, पूरे समाज में फैल गईं। पूरे लन्दन में, निगरानी कैमरों और संयुक्त राज्य अमेरिका में, वायरटेप्पिंग की निगरानी की तकनीकों के उद्भव से, निगरानी की खबरें आजकल अखबारों में ज्यादा हैं। निजता में अप्रकट हस्तक्षेप की तकनीकें, गुप्त रूप से फैली हैं और उतनी ही प्रभावी हैं।‘परिवार’ और ‘व्यक्ति’, हर बड़े और मँझले आकार के कार्पोरेशन में के मानव संसाधन विभागों से लेकर, स्कूल काउंसिलरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बहुलता के चलते, अपने आपकीे, मनोवैज्ञानिक निगरानी के लिए अधीन कर दिये गए हैं, जो यह प्रामाणित या सिद्ध करने के लिए कटिबद्ध हैं कि हम अपना उपयुक्त सामाजिक दायित्व निभा रहे हैं।

 

‘निगरानी’ और ‘हस्तक्षेप’ की इस प्रणाली, जिसे फूको अनुशासन का नाम देते हैं, की मौजूदा स्थिति पर काफी चर्चा हुई है। कुछ ने, खासकर दार्शनिक जील द्लूज ने तर्क दिया है कि हम एक नई ‘उत्तर-अनुशासनात्मक’ अवस्था में प्रवेश कर गए हैं (द्लूज 1995)। हमारी चिंता, हालांकि, इस प्रश्न के साथ है कि इस ऐतिहासिक अध्ययन में, ‘स्वतंत्रता’ को कहाँ उलझा दिया गया है। यह देखने के लिए, हमें यह पहचानना जरूरी होगा कि फूको, ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ में जो बखानते हैं, वह दरअस्ल लोगों के व्यवहार पर, ऐतिहासिक बाधाओं के समूह का उदय है। बाधाएँ, ऐसे तरीकों से काम करती हैं, अमूमन जिन्हें परंपरागत राजनीतिक दर्शनों में, नजरअंदाज कर दिया जाता है। वे ऐसे काम नहीं करती हैं कि वे लोगों को, वो कुछ करने से रोकें, जो वे अन्यथा करने के लिए प्रवृत्त हो सकते हैं। बजाय इसके, वे कुछ अचूक तरीकों से लोगों को गढ़ती हैं, और इस तरह की गढ़न्त में, उन्हें ‘आज्ञा-परायण निकायों’ में बदल देती हैं।

हालाँकि, ठीक इसी विमर्श-बिन्दु पर सत्ता का प्रश्न सहज ही रूप में आ खड़ा होता है लेकिन, सत्ता की अवधारणा की चर्चा काफी गहराई में, दूसरे निबंध में की जाएगी। अभी के लिए, मुझे सिर्फ इतना कहने दीजिये कि फूको, ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ और अपने दूसरे ऐतिहासिक निबंधों में जो समाहित करते हुए प्रस्तुत करते हैं, वह सत्ता का‘नकारात्मक’ के स्थान पर, ‘सकारात्मक’ दृष्टिकोण कहा जा सकता है। इस दृष्टिकोण में सत्ता, निरोध के बदले सृजन से काम करती है। सत्ता हमारी ‘स्वतंत्रता’ को सीमांकित नहीं करती, बल्कि, वह हमें मानवों की एक विश्वसनीय किस्म में बदल देती है। वह ऐसा दो स्तरों पर करती है। पहले, वह हमारे शरीर को, विशेष प्रकार के सामाजिक व्यवहार की तरफ उन्मुख होने के लिए प्रशिक्षित करती है। दूसरे, और शायद यह अधिक महत्त्वपूर्ण है कि वह कतिपय विश्वसनीय तरीकों से, हमें अपने बारे में सोचने के लिए बाध्य करती है। उदाहरण के लिए फूको,‘डिसिप्लिन एंड पनिश’में जिस मनोवैज्ञानिक निगरानी और हस्तक्षेप की बहुलता का बखान करते हैं, वह एक ऐसा समाज बनाती है, जो मनुष्य को मनोवैज्ञानिक जीव के रूप में, खुद के बारे में सोचने के लिए तैयार कर देती है। इसके परिणामस्वरूप, वे अपने दुःखों को मनोविज्ञानजन्य मानते हैं और फिर उसकी समस्याओं का मनोवैज्ञानिक इलाज ढूंढते हैं। बजाय, जिस समाज में वे रहते हैं, उसके चरित्र पर सवाल उठाने के, वे खुद पर सवाल उठाते हैं। अर्थात्, एक सामूहिक चिंतन को, परिस्थिति- मूलकता से नाथ देने के बजाए, समाज निरपेक्ष होकर, मनोगत दिशा की ओर मोड़ देते हैं। कुल मिलाकर, सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन करने के बदले, वे स्वयं में परिवर्तन करते हैं। यह कृत्य, फिर, व्यवस्था की आलोचना को, पुनः उन्हीं लोगों की ओर मोड़ देता है, जो उससे असंतुष्ट हैं और इस प्रकार उसी सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करता है। इस तरह सभी समस्याएँ,़ अपने मूल में सामाजिक या राजनीतिक होने के बदले, मनोवैज्ञानिक हो जाती हैं।

सत्ता, इस मामले में, निरोध के बजाय, जिसे कहा जाए ‘बाधा’ या हस्तक्षेप के जरिए काम करती है। परंतु, निरोध की तरह, बाधा व्यक्ति के विकल्पों को सीमित करने का काम भी करती है।

किसी को मनोवैज्ञानिक जीव बनाने में बाधाएँ, एक विशिष्ट ‘समरूपता’ का सृजन करती हैं और सामाजिक प्रतिरोधों की संभावनाओं या जीने के अन्य रूपों के साथ, प्रयोगों को भोथरा बनाती हैं। इसके अलावा, बाधाएँ, निरोधों की तुलना में, कहीं अधिक प्रभावी होती हैं। जब किसी को रोका जाता है, तो वह निषिद्ध की ‘कामना’ फिर भी करता है। परंतु, जब कोई बाधित है, तो उसे वही इच्छा करने के लिए ढाला जाता है, जो इच्छा सत्ता की दृष्टि में करने के लिए उपयुक्त है। कोई व्यक्ति, न केवल, जो वह चाहता है, उसे प्राप्त करने से अवरुद्ध है, बल्कि वह प्रस्तुत किए गए, सामाजिक विकल्पों के अलावा के अन्य विकल्पों पर विचार ही नहीं करता।

ऐसे में यह प्रश्न उठ सकता है और समाजशास्त्रीय दृष्टि वाले लोग उठाते भी रहे हैं कि इस सबका स्वतंत्रता से क्या लेना देना है? ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ की अवधारणा को याद कीजिये। अगर हम ‘आध्यात्मिक’ रूप से स्वतंत्र हैं तो हम अपने विचारों और या व्यवहार का नियंत्रण, हम स्वयं कर सकते हैं। हम किसी बाहरी शक्ति या व्यक्ति द्वारा नियंत्रित नहीं हैं। फूको जिसका ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ में वर्णन करते हैं, वह एक बाह्य शक्ति है, जो हमारे सोचने, हमारे कार्य करने, और ‘हम जो हैं’, उसको प्रभावित करता है- कम से कम हमारे इतिहास के, इस खास बिन्दु पर।

फूको, जिन शक्तियों के बारे में कहते हैं और जो ताकतें ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ से वास्ता रखती हैं, उनके बीच, अंतर यह है कि फूको की शक्तियाँ, ‘आध्यात्मिक’ होने के बदले, बहुत साफ तौर पर ऐतिहासिक हैं। फूको, मानव के ‘विचार’ और ‘व्यवहार’ को अनिवार्यतः नियंत्रित करने वाली, उन शक्तियों के प्रकार (ईश्वर, परिवेश, जीन्स) का वर्णन नहीं करते हैं। फूको, ऐतिहासिक रूप से, ‘अप्रत्याशितता’ से बने अभ्यासों के समूह को दर्शाते हैं, जो हमारे व्यवहार पर, इस विशिष्ट कालखंड में प्रभावी हैं। इसके कारण, यह मानने का कोई आधार नहीं है कि अगर हम हमारी ऐतिहासिक विरासत समझें, तो हम उसे बदल नहीं सकते। अर्थात, वे दृष्टि में ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को बहुत निर्णायक मानते हैं।

इसीलिए, फूको उपर्युक्त कथन में कहते हैं कि ‘कई चीजें बदली जा सकती हैं।’ उनका यह मत, जो उन्होंने ज्ञानोदय के युग से विरासत में पाया है, और जिसे बहुतेरे लोग, उन्हें उसे यह कह कर खारिज करते हुए कहते हैं-- ‘अगर हम हमारी स्थिति को समझते हैं तो हमारे पास इसे बदलने का मौका है।’

यह परिप्रेक्ष्य अंतर्निहित रूप से, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के विचार को अंगीकार करता है, यद्यपि यह न तो उसके पक्ष में तर्क प्रस्तुत करता है, और न ही इसके विशिष्ट चरित्र या सीमाओं को स्थापित करता है। हम इस विचार को देख सकते हैं, जब फूको लिखते हैं :

‘हमें यह जरूर देखना चाहिए कि अगर जनता स्वतंत्र नहीं है तो सत्ता के संबंध नहीं हो सकते। इन दोनों में से कोई भी, अगर पूर्णतः दूसरे के नियंत्रण में है और उसके अधीनस्थ है, वह कर्ता बन गया है, जिस पर वह अनंत और अपरिमित हिंसा कर सकता है, तो सत्ता के संबंध नहीं होंगे। अतः सत्ता के संबंधों का उपभोग करने के लिए दोनों तरफ किसी भी किस्म की स्वतंत्रता जरूरी है। (1994/12)

बहरहाल, प्रस्तुत पाठ को विवेचित करते हुए, जैसा कि सहज ही देखा जा सकता है, फूको का स्वतंत्रता के प्रति यह दृष्टिकोण कि ‘स्वतंत्रता’, वह कुछ है, जिसका हमारे वर्तमान को परिवर्तित करने से संबंध है, एक सुनिश्चित राजनीतिक रुझान लिए हुए है। फिर यह प्रश्न उठता है कि इस विचार का राजनीतिक स्वतंत्रता से क्या संबंध है? राजनीतिक स्वतंत्रता, अगर हम याद करें, तो उन स्वच्छंदताओं का मुद्दा है, जो हमें किसी ‘समाज-विशेष’ या सामाजिक व्यवस्था विशेष में उपलब्ध हैं। पहली नजर में, यह कहा जा सकता है कि फूको उन तरीकों का वर्णन कर रहे हैं, जिनसे समाज विशेष और सामाजिक व्यवस्थाएँ, स्वच्छंदताओं का अतिक्रमण करती हैं तो यह कहना पूरी तरह गलत नहीं होगा। फूको, उन तरीकों का भी वर्णन करते हैं, जिनसे जीवन जीने के वैकल्पिक तरीके बाधित हैं। जिन तरीकों से हमें बनाया जाता है और जैसे हमें अपने बारे में सोचने के लिए बाध्य किया जाता है। हालाँकि, इस तरह चीजों को प्रस्तुत करना भ्रामक है। यह सत्ता और स्वतंत्रता के प्रारूप का पूर्वानुमान करता हुआ, पूर्व-प्रस्तावित जान पड़ता है। परंतु यह फूको का प्रारूप नहीं है। यह देखने के लिए हमें थोड़ा समय, उस प्रारूप के विवेचन में लगेगा।

पारंपरिक उदार राजनीतिक सिद्धान्त में, ‘राज्य की सत्ता’ और ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता’ के बीच एक द्वंद्व है, जिसे संतुलित किया जाना चाहिए। अगर ‘राज्य’ के पास बहुत ज्यादा अधिकार हैं तो वह व्यक्ति के अपने जीवन को ‘जैसा वह चाहे वैसा’ बनाने के अधिकार की अनुचित रूप से कटौत्री करता है, अर्थात् वांछित जीवन शैली के चयन को खारिज करता है। वहीं दूसरी ओर, अगर स्वतंत्रता अपरिबद्ध है, तो लोग ‘खुद अपनी चुनी हुई जीवन-शैली’ की खोज के, एक दूसरे के अधिकार में, हस्तक्षेप कर सकते हैं। इसीलिए, उदार राजनीतिक सिद्धान्त की भूमिका, ‘राज्य सत्ता’ और ‘स्वतंत्रता’ के बीच, सही संतुलन बनाने की है, और वही संतुलन बेहतर होगा, जो इन दोनों अतियों से बच कर रहे। (उदार राजनीतिक सिद्धान्त की बहुतेरी जिम्मेदारियाँ और भी हैं, परन्तु हम यहाँ सिर्फ उसकी ‘राजनीतिक स्वतंत्रता’ में भूमिका को देख रहे हैं।) इस दृष्टिकोण पर कि ‘राज्य सत्ता’ व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर थोपा गया एक बाहरी निरोध है। अब प्रश्न यह है कि इसे कितना और कहाँ पर लागू किया जाना चाहिए?

यह सत्ता का नकारात्मक, निरोधक नजरिया है। जैसा कि हमने पहले देखा है, फूको का सत्ता का‘डिसिप्लिन एंड पनिश’और अन्यत्र विवेचन सत्ता के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण नहीं है। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि फूको नकारात्मक सत्ता के अस्तित्व को नहीं नकारते हैं, विशेषकर राज्य के स्तर पर। हालाँकि, उनके विचार में, जिस तरीके से सत्ता काम करती है, वह राज्य और उसके विविध दमनकारी तंत्रों के स्तर के बदले, उसे यथार्थ के निकट लाती है। वह हमारे दैनंदिन के जीवन में बसती है, हमें विशिष्ट प्रकार के आज्ञाकारी व्यक्तियों में ढाल देती है।

जिस हद तक फूको का लेखन, सत्ता की कार्यप्रणाली को पकड़ता है, हमें स्वतंत्रता के पारंपरिक उदार दृष्टिकोण में संशोधन करना होगा। यह सिर्फ किन क्रियाओं पर कितना निषेध लगाये जाने का मुद्दा नहीं हो सकता। मुद्दा यह भी है कि हम ‘जो हैं’ वह हम कैसे बनें और हम उसके बारे में, क्या कर सकते हैं। इसलिए, राजनीतिक स्वतंत्रता, सिर्फ हमें अपनी स्वेच्छानुसार करने के लिए छोड़ दिये जाने का मुद्दा ही नहीं है। इस के साथ ही, और अधिक सूक्ष्म रूप में, मुद्दा यह समझने का भी है कि हम किस तरह ढाले गए हैं ताकि हमें कुछ चीजें पसंद आएँ और कुछ बिलकुल ही नापसंद। और इसके अलावा, मुद्दा यह समझने का भी है कि ‘हमें क्या उपलब्ध है?’ हम इस सब को, यह कह कर एक स्पष्ट रूपरेखा में डाल सकते हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता, इसी बात से सरोकार नहीं रखती है कि हम ‘किससे स्वतंत्र हैं’, किंतु ज्यादा सार्थक रूप में, इससे सरोकार रखती है कि मौजूदा बाधाओं के साथ, हम किसके लिए स्वतंत्र हैं।

 

फूको इस विचार को निम्नलिखित उल्लेख में पकड़ते हैं। यह उद्धरण, हमें फूको की स्वतन्त्रता की अवधारणा को गहराई में समझने में मदद करेगा :

‘मैं वर्तमान की प्रकृति के विषय में किसी भी निदान के दायित्वों के बारे में कुछ कहना चाहूँगा। यह ‘हम क्या हैं’ के सरल चित्रण में निहित नहीं है, बजाय इसके- वर्तमान में परिलक्षित भंगुरता की सीमा रेखाओं का अनुसरण करते हुए- यह समझने की कोशिश करते हुए कि ‘क्यों और कैसे’ कि- ‘जो-है’, वह, अब और ‘जो-है’ नहीं रह सकता। इस अभिप्राय में, कोई भी विवरण हमेशा, इस प्रकार की अप्रत्यक्ष दरारों के अनुरूप किए जाने चाहिए जो कि मूर्त स्वतंत्रता की जगह बनाती हैं यानी कि संभावित परिवर्तन के लिए एक अनाक्रमित ‘स्पेस’। (1990/36)

हम यहाँ पर, उन विषय वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, जो हमने फूको के स्वतंत्रता के प्रति दृष्टिकोण में से अलग की हैं, ऐतिहासिक विषयों के रूप में बाधाएँ, उन बाधाओं की आकस्मिकता, और अमूर्त के बजाय मूर्त स्वतंत्रता। इसके अलावा, इस वाक्य ‘संभावित परिवर्तन की एक जगह’ के इस्तेमाल में, फूको इस विचार को पकड़ते हैं कि स्वतंत्रता, सिर्फ अकेले छोड़ दिये जाने भर का विषय नहीं है, बल्कि यह हम ‘जो होना चाहते हैं’, उसमें ‘आत्म’ के ‘पुनर्गठन’ का विषय भी है, किसी के लिए स्वतंत्रता, न सिर्फ किसी से स्वतंत्रता। इसी उल्लेख के आधार पर, हम फूको की ‘स्वतंत्रता’ की अवधारणा को, जो हम विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थिति के मापदंडों के भीतर, स्वयं के गठन के लिए कर सकते हैं, के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।

अगर हम स्वतंत्रता को, इस तरह परिभाषित करते हैं, तो हमें स्वतंत्रता की इस परिभाषा को सही तरीके से समझने के लिए पर्याप्त चेतस रहना होगा। पहले, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि किसी विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थिति में, पहले से दी गई चीजों का एक समूह है, जो हम ‘आत्म की निर्मिति’ के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि यहाँ ऐसा कुछ है, जिसे हम, जो हम बनते हैं उसका ‘सत्य’ कह सकते हैं, और जब एक बार हम अपनी ऐतिहासिक परिस्थिति को समझ जाते हैं, तब हम उस सत्य को खोज सकते हैं। इस तरह का दृष्टिकोण, फूको के स्वयं के उन पहलुओं के ऐतिहासिकीकरण की परियोजना का उल्लंघन करेगा, जिन्हें हम अपरिवर्तनीय या स्थायी मानते हैं। यह हमारी संभावनाओं को मूर्त रूप में देखेगा जो कि यथार्थ में एक अस्थायी ऐतिहासिक परिस्थिति है।

दूसरे, और इससे सम्बद्ध, हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि हम हमारी ऐतिहासिक परिस्थिति को पूर्णरूपेण समझ सकते हैं। अगर, ‘जो हम हैं’ वह अभ्यासों की जटिल परस्परिक क्रियाओं का उत्पाद है, तब कम से कम, जो शक्तियाँ हमें रूप देती हैं, उनके आयाम संभवतः, हमारी समझ से परे हैं। ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’, उदाहरण के लिए, ‘हम जो हैं’ उसकी समग्रता का लेखा नहीं है। यह ‘हम जो हैं’ उसके सिर्फ एक पहलू का विवरण है। ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्सुआलिटी’ का पहला खंड दूसरा पहलू है, और शासनात्मकता पर फूको ने, जो व्याख्यान शृंखला दी थी, वह तीसरा पहलू। साथ ही साथ, ‘जो हम हैं’, वह हमारी अभ्यासों की निरंतरता के साथ बदलता रहता है। इसलिए, किसी एक क्षण में, ‘हम जो हैं’ यह पकड़ना और भी कठिन हो जाता है। हम हमेशा, ‘हम जो अभी थे’ को समझने के जोखिम में रहते हैं, बजाय ‘जो हम अभी हैं’, अर्थात् ‘वयमबोध’ की वर्तमान अवस्थिति।

 

इसका निष्कर्ष यह है कि, फूको के लिए, ‘स्वतंत्रता’ एक प्रकार से प्रयोग का विषय है। ‘मूर्त स्वतंत्रता की जगह’का आशय यह अंदाज लगाना नहीं है कि ‘हम क्या हो सकते हैं’ और फिर उस लक्ष्य की तरफ अग्रसर होना। वस्तुतः उसका अभिप्राय तो है, हमारे जीवन के लिए बहुतेरी अलग अलग संभावनाओं को, कई विभिन्न ‘संभावित परिवर्तनों’ को, यह देखने के लिए खंगालना कि वे हमें कहाँ ले जाते हैं। स्वतंत्र जीना यानी स्वयं के साथ प्रयोग करना है, और हमेशा, इस स्थिति से नितांत अनभिज्ञ रहते हुए कि चाहे ‘हम’ अपने को गढ़ने वाली शक्तियों से मुक्त हुए हों या नहीं, और न ही (और हम कुछ क्षणों में इस पर वापस आयेंगे) उन स्वतंत्र जीवन के प्रयोगों के प्रभावों के बारे में सुनिश्चित होना। यह एक अनिश्चितता की जगह से, ‘कैसे होने के लिए’ गढ़े जाने के, सीमित या अल्पज्ञान के साथ जीवन बनाये जाने की कोशिश है।

तो कुल मिलाकर हमारी स्थिति फिर यह है कि अगर हम इतिवृत्तांतों की निर्मिति करते हैं जैसा कि फूको ने किया, और महा आख्यानों की निर्मिति करते हैं, जो हमें, उन शक्तियों के विभिन्न पहलुओं का लेखा देते हैं, जिन्होंने हमारे ‘बन चुकने’ पर अपना प्रभाव डाला है, तब हमें ‘हम ऐसे कैसे बने’ इसका मात्र आंशिक ज्ञान होता है। यहाँ से, हम यह निर्णय ले सकते हैं कि उन शक्तियों में से, कौन सी वे शक्तियाँ हैं,जो हमें स्वीकार्य हैं, और कौन सी, अगर फूको की शब्दावली का इस्तेमाल करें तो, जो असह्य या अस्वीकार्य हैं। (फूको के इतिवृत्तांत सिर्फ अस्वीकार्य शक्तियों का लेखा ही देते हैं, क्योंकि सबसे अधिक परिवर्तित हो जाने की संभावना हम उन्हीं की रखते हैं।) इन अस्वीकार्य शक्तियों से पार पाने की कोशिश में, हमें ‘हम क्या बन जाएँ’ के साथ प्रयोग करना होगा, इसको समग्रता में न जानते हुए कि वास्तव में हम उन शक्तियों से पलायन कर रहे हैं या नहीं। यह हम सिर्फ अपने प्रयोगों के व्यवहार में समाहित हो जाने के बाद ही जान सकते हैं। हम तब, ‘अपने को गढ़ने वाली शक्तियों’ के समक्ष न तो बेबस हैं और न ही निश्चित कि हम इसके बारे ‘क्या और कैसे’ में कर सकते हैं। हम कहीं बीच में हैं। उसी में हमारी स्वतंत्रता निहित है और वास्तव में वही हमारी ‘स्वतंत्र’ स्थिति भी है।

चूँकि हम अपने प्रयोगों के परिणामों के बारे में अनिश्चितता से भरे हैं, इसलिए, हमें हमेशा सतर्क रहना होगा। चूँकि हम, यह पहले से नहीं जानते कि हमारे प्रयोग, हमें कहाँ और किस दिशा में ले जाएँगे। बहुत संभव है, हम या तो उन असह्य शक्तियों का पुनर्सृजन कर बैठें या नई शक्तियाँ खड़ी कर लें। इसलिए, हम इस तरह के इतिवृत्तान्तों से पीछे नहीं हट सकते, जिस प्रकार के इतिवृत्तान्तों में फूको संलग्न हैं, और न ही हम फूको के इतिवृत्तान्तों से संतुष्ट रह सकते हैं। हमारे ‘होने का’ इतिवृत्तान्त एक असमाप्त परियोजना है। दूसरे शब्दों में कहें तो, हमारी ‘स्वतंत्रता’ के परिणाम उतने ही अनिश्चित हैं, जितनी कि हमारी स्वतंत्रता खुद। हमें कभी भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि ‘संभावित परिवर्तन की जगह’ का हमारा इस्तेमाल, हमें हमेशा बेहतर स्थिति में ही ले जाएगा। स्वतंत्रता अपनी आत्यन्तिकता में भी मुक्ति का पर्याय कतई नहीं है। हमारी स्वतंत्रता, हमें मुक्त कर देने वाली है या नहीं इसका आश्वासन हमें नहीं दिया गया है। वहाँ सिर्फ प्रयोगों और इतिहास-सजग चिंतन के द्वारा ही वहाँ पहुँचा जा सकता है।

आइए अब जरा, फूको की स्वतंत्रता की अवधारणा को बेहतर समझने के लिए फूको के विचारों को, फूको की पूर्ववर्ती पीढ़ी के एक फ्रांसीसी दार्शनिक के विचारों के बरक्स रख कर देखें। मुमकिन है कि यह देखना सहायक हो सकता है। मौरीस मर्लो-पॉन्टी की भी ‘स्थापित स्वतंत्रता’ के बारे में अपनी अवधारणा है, जिसमें हम ‘स्वतंत्र’ हैं, पर पूर्णरूपेण स्वतंत्र कतई नहीं हैं। इन दो अवधारणाओं के बीच के अंतर्विरोधों को देख कर, हम फूको के दृष्टिकोण पर अपनी पकड़ को काफी मजबूत कर सकते हैं।

मर्लो-पॉन्टी अपनी ‘स्वतंत्रता’ की अवधारणा, अपने समकालीन विचारक ज्यां पॉल सार्त्र के विपरीत खड़ी करते हैं। सार्त्र का ‘स्वतंत्रता’ के प्रति दृष्टिकोण सर्वविदित ही है कि हम मूलतः आध्यात्मिक अर्थों में स्वतंत्र हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो हमारे निर्णय के सामर्थ्य से बाहर है। सार्त्र, अपने शुरू के लेखन में, मनोविश्लेषणात्मक अचेतन या अप्रकट ऐतिहासिक शक्तियाँ, जो हमें गढ़ती हैं, की तमाम धारणाओं को रद्द करते हैं। वे विशुद्ध अस्तित्ववादी रीति में, मानते हैं कि हमारे सारे ‘चयन’ केवल हमारे अपने हैं और हमें उनके लिए, अपने पर पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। मर्लो-पॉन्टी, स्वतंत्रता के इस मौलिक दृष्टिकोण को अंगीकार नहीं करते हैं। मर्लो-पॉन्टी के लिए, एक शक्ति जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है और जो हमें बनाती है, वह है, शरीर। दैहिकता- जिसे समझना मर्लो-पॉन्टी की केन्द्रीय परियोजना है- जो अनुभूति के द्वारा, हमें संसार से हमारे पहले अनुभव और संसार की समझ देती है। जीवित देह, बजाय एक जड़ पदार्थ होने के, जिसमें से संवेदनाएँ गुजरती हों, जगत से हमारे प्राथमिक विनियोजन का स्रोत है। हम उस विनियोजन में रद्दोबदल कर सकते हैं, पर हमारा मूर्त रूप, यह सुनिश्चित करता है कि हमारे जीने के कुछ पहलू होंगे, जिन पर हमारा संपूर्ण नियंत्रण न हो। हमारे जीवन का एक अचेतन आयाम है, जो हमसे अप्रकट रहेगा, वह आयाम, जो जगत से हमारे दैहिक अंतरक्रिया के माध्यम से चलता है। इसके अलावा, जैसा कि मर्लो-पॉन्टी इंगित करते हैं, इस अंतरक्रिया का वर्णन, ‘शरीर जो जगत से अंतरक्रिया करता है’, के रूप में करना ठीक नहीं है। यह इस से कहीं ज्यादा अंतरंग और गूढ़ है। यह अन्तरक्रिया देह जगत संकुल के रूप में बेहतर चित्रित होती है।

यह स्थिति स्वतंत्रता के अपेक्षया एक कम उग्र दृष्टिकोण की ओर लेकर जाती है जो कि सार्त्र के दृष्टिकोण की तुलना में और भी अल्प है। सार्त्र के लिए, देह सिर्फ एक जड़ वस्तु है, जो चेतना के द्वारा संचालित है। अगर चेतना अबाधित है, तो चेतना की स्वतंत्रता असीमित होगी। सार्त्र, बेशक, यह स्वीकारते हैं कि चेतना किसी रूप में देहबद्ध तो है ही, अतः अगर कोई उन्मुक्त हो कर यह निर्णय ले कि ‘वह उड़ना चाहता है’, इसका यह मतलब नहीं कि ‘वह सचमुच ही उड़ सकता है’। परन्तु, यह निर्णय अपने आप में मूल रूप से स्वतंत्र है। मर्लो-पॉन्टी का दैहिकता का विश्लेषण, सार्त्र के मस्तिष्क और शरीर के मूलभूत भेद को मिटा देता है। जैसा कि मर्लो-पॉन्टी दर्शाते हैं, व्यक्ति की ‘देह’ सचेतन चिंतन के पहले ही, बोधात्मक व्याख्या में संलग्न हो जाती है। वे अपनी बात रखने के लिए दृष्टि भ्रमों का उदाहरण देते हैं। उनका कहना है कि दृष्टि भ्रम पहले ही ‘कुछ है’ की तरह दृश्यगोचर होते हैं, और सचेतन चिंतन ही उन्हें बाद में ठीक करने की कोशिश करता है। अगर यह सत्य है, तब कोई मूलभूत स्वतंत्रता नहीं है। देहबद्ध प्राणी अपने देह जगत विनियोजन से बाधित है। इसका यह मतलब नहीं है कि हम उस विनियोजन पर चिंतन नहीं कर सकते। पर, देहबद्ध होने से वह स्वतः ही होता है।

उस चिंतन और व्यक्ति के व्यवहार की स्वतंत्रता, मर्लो-पॉन्टी और जैसा कि फूको के लिए भी, यह एक प्रकार की स्थितिमूलक स्वतंत्रता है :

 

हम अपने जगत को चुनते हैं और जगत हमें चुनता है... स्वतंत्रता हमेशा अंतर और बाह्य का मिलन है... और वह पूर्णरूपेण अदृश्य हुए बिना, हमारे जीवन के दैहिक और संस्थानिक आंकड़ों की अनुमति से कमतर होती हुई, सहिष्णुता के सीधे अनुपात में सीमित होती चली जाती है।(मर्लो-पॉन्टी 1962/454)

हमारी स्वतंत्रता हमारे भीतर है और उन प्रतिबंधनों के चलते, जिन्हें हमारी देह और हमारे जगत ने नियत किया है। वे बाधाएँ कार्य के लिए लघुत्तर या वृहत्तर जगह की अनुमति देती हैं। अर्थात् वृहत्तर या लघुत्तर सहिष्णुता। पर देह और ऐतिहासिक रूप से दिये गए संस्थागत ढांचों के बिना, कोई स्वतंत्रता नहीं होगी, क्योंकि ऐसा कुछ नहीं होगा (यानी देह) जिसके द्वारा, वह अभिनीत हो सके और आस पास कुछ नहीं होगा (यानी जगत) जिससे वह संबंध रख सके।

कुछ विवेच्य कोणों में, मर्लो-पॉन्टी की स्थिति मूलक स्वतंत्रता की अवधारणा फूको की अवधारणा से काफी मिलती जुलती है। दोनों ही देहबद्धता का महत्त्व स्वीकारते हैं और वे देह का जगत और उसके अभ्यासों से खुलाव भी पहचानते हैं। इसके साथ ही, इन दोनों अवधारणाओं में, वह मुक्तता व्यक्ति की स्वतंत्रता के परिसीमन से जुड़ती है। जो इन्हें अलग करता है वह है, सिर्फ विश्लेषण का स्तर, जिन पर ये स्वीकारोक्तियां आश्रित हैं। मर्लो-पॉन्टी की स्थितिमूलक स्वतंत्रता, आध्यात्मिक स्वतंत्रता है। वे मानव देह और जगत के साथ, उसके गूँथने का एक व्यापक दार्शनिक लेखा प्रस्तुत करते हैं। वह लेखा दर्शाता है कि किस तरह मस्तिष्क और देह और साथ ही साथ देह और जगत, एकल समष्टि बनाते हैं। इससे, वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि, सार्त्र के उलट, सारी मानव स्वतंत्रता स्थितिमूलक ही होनी चाहिए। कहीं कोई मूलभूत स्वतंत्रता नहीं है, क्योंकि हमारे होने का ऐसा कोई भी पहलू नहीं है, जो इस जगत की चतुर्दिकता से बाहर हो। सारी स्वतंत्रता, एक देहबद्ध चेतना की स्वतंत्रता है, जो इस जगत और उसके इतिहास में सन्निहित है।

फूको को, इसमें से कुछ भी नकारने की जरूरत नहीं है। और ना ही उन्हें इसे अंगीकार करने की आवश्यकता है। उनकी पहुँच, एक दूसरे रास्ते से आती है। उनका प्रश्न मानवीय स्वतंत्रता की प्रकृति का आध्यात्मिक प्रश्न नहीं है। बल्कि, उनका प्रश्न राजनीतिक है कि विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों, यानी हमारी ऐतिहासिक परिस्थितियों के अंतर्गत, हमें कौन सी स्वतंत्रताएँ उपलब्ध हैं। जिस स्थितिमूलक स्वतंत्रता के बारे में फूको उत्सुक हैं, वह जगत में स्थापित देह की स्वतंत्रता नहीं है, वह हमारी स्थिति की स्वतंत्रता है। उपरोक्त दिये गए उल्लेख में, फूको इस बात पर बल देते हैं कि वर्तमान की प्रकृति का निरूपण, वर्तमान की व्याख्या, इस तरह से करे कि उसकी भंगुरता और उसका ध्वंस गोचर हो। वर्तमान की भंगुरता इसलिए नहीं है, क्योंकि मनुष्यों के पास आध्यात्मिक स्वतंत्रता है, पर, जैसा कि हमने पहले देखा, फूको किसी प्रकार की आध्यात्मिक स्वतंत्रता मान कर चलते हैं। वह इतिहास के अप्रत्याशित से बने ढांचे के कारण है।

इतिहास कभी पहले से दिये हुए या अंतर्जात ढांचे के कारण नहीं घटता है। वह चतुर्दिक फैले हुए अभ्यासों के आपस में प्रभाव और आकस्मिक अन्तरक्रिया का उत्पाद है और वह किसी अंतर्जात प्रतिमान के अनुरूप नहीं होता है। (इसका यह मतलब नहीं है कि इतिहास में प्रतिमान नहीं खोजे जा सकते, इसका मतलब यह है कि हम उन्हें तभी देख सकते हैं, जब उन प्रतिमानों ने अप्रत्याशित से बने अभ्यासों के अंतरसंबंध से, अपना निर्माण कर लिया होता है।) स्थितिमूलक स्वतंत्रता, इतिहास की इसी अप्रत्याशितता से बने होने की उपज है। अतः व्यक्ति की, उसकी स्वतंत्रता ‘कौन सी है’ और उसकी स्वतंत्रता ‘कहाँ है’, का आध्यात्मिक प्रश्न नहीं है, बजाय इसके यह प्रश्न है कि व्यक्ति के विशिष्ट इतिहास ने उसे कहाँ रख छोड़ा है, और किस तरह उस इतिहास में हस्तक्षेप हुआ है? फूको के लिए, संक्षेप में, स्थितिमूलक स्वतंत्रता, आध्यात्मिक होने के बदले, ऐतिहासिक और राजनीतिक अवधारणा है।

स्वतंत्रता के प्रति फूको का दृष्टिकोण, फिर, उनके काम के दूसरे बहुतेरे पहलुओं के मानिंद, एक साथ ‘ऐतिहासिक’ और ‘दार्शनिक’ दोनों है।

फूको का यह दृष्टिकोण, दर्शनोन्मुखी अवधारणा होने के कारण, यह इतिहास को दूसरे इतिहासविदों के सामर्थ्य से बाहर, अपेक्षया, एक अधिक परिष्कृत दिशा में ले जाता है। ऐतिहासिक रुझान वाली अवधारणा होने के कारण, यह पारंपरिक दार्शनिक विश्लेषणों के प्रश्न उठता है। फूको का लेखन, इन दोनों अक्षों के, जो कि एक दूसरे से सतत संवाद में हैं, समानांतर पढ़े जाने की मांग करता है। अगर हम, अपने आप को इस द्विस्तरीय बहस में शामिल होने की अनुमति दें, तो हम न केवल हमारे विशिष्ट दार्शनिक रुझान वाले दृष्टिकोण, जिससे हम दुनिया देखते हैं, के प्रति सजग हो जाएंगे, बल्कि उस दृष्टिकोण के ऐतिहासिक रूप से, जो कि अप्रत्याशित से बना है और जिसकी प्रकृति है, के प्रति भी सजग हो जाएंगे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, कहना होगा कि, हम इसी तरह यह अनुभव करें कि हम, शायद हमारी स्वतंत्रता के आमने सामने आ पहुँचें।

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