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रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 - मिशेल फूको विशेषांक : मिशेल फूको का जीवन

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क्लेर ओ’ फेरेल मिशेल फूको और उत्तर आधुनिकतावाद : सिडनी पेपर्स(अनुवाद - पुनर्वसु जोशी) सर्वप्रथम तो मैं श्री जेरार्ड हेंडरसन को धन्यवाद देना चाहूंगी, जिन्होंने मुझे सिडनी इंस्टिटय्ूट में उद्बोधन के लिए आमंत्रित किया। बहरहाल, जो शोधपत्र यहां मैं पढ़ने जा रही हूँ, वह मुख्यतः प्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक मिशेल फूको और उनकी जिरहों के साथ ही उनकी उपलब्धियों तथा उनके अवदान के आसपास केंद्रित है। मिशेल फूको जो सन 1926 में जन्मे और सन 1984 में जिन्होंने इस संसार से विदा ली, वे बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक प्रभावशाली दार्शनिक और चिंतक हैं। उनके विचार, सामाजिक विज्ञान, मानविकी तथा व्यावसायिक अनुशासन, जैसे कि शिक्षा, प्रबंधन अध्ययन और स्वास्थ्य की समूची परिधियों तक व्यापक रूप से प्रयुक्त हुए हैं। उनका काम, विस्मयजनक रूप से ध्रुवीकृत प्रतिक्रियाओं की तरफ ध्यान खींचने की चेष्टा करता है। मिशेल फूको का एक ओर जहाँ अत्यंत उत्साह के साथ प्रतिमा पूजन हुआ, वहीं दूसरी ओर उन्हें पर्याप्त निंदा के साथ निरस्त भी किया गया। मैं उनके ओजस्वी स्वागत के विषय में तो यथा आवश्यक दृष्टिपात करूंगी ही, लेकिन साथ ही साथ, उनके उस…

रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 - मिशेल फूको विशेषांक : उत्तर आधुनिकतावाद दार्शनिक आख्यान : मिशेल फूको और जॉक देरीदा / मिहाएला मेरल अहमद

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मिहाएला मेरल अहमद उत्तर आधुनिकतावाद दार्शनिक आख्यान : मिशेल फूको और जॉक देरीदा (अनुवाद - पुनर्वसु जोशी)इस विशिष्ट अध्ययन में हम, मिशेल फूको और जॉक देरिदा की भाषा से संबन्धित उत्तर आधुनिक चिंतन की उन ऐतिहासिक पुनस्र्थापनाओं का हम विश्लेषण करेंगे। मिशेल फूको भाषा और सत्ता और यथार्थ के अंतरसंबंध को विश्लेषित करते हैं, वहीं दूसरी ओर जॉक देरीदा, भाषा और ‘पाठ’ के अंतरसंबंध को विश्लेषित करते है। यहाँ यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि इस अध्ययन में उत्तर आधुनिक साहित्य ही, वह दायरा है, जिसमें इस सिद्धांत की रोशनी में ही, समालोचनाएं सामने आएंगी जिनमें, समीक्षात्मक-प्रज्ञा सक्रिय रह कर, तर्क के जटिल रूप को, विवेचित करती है। मिशेल फूको, सत्ता की प्रकृति और उसके कार्य और व्यवहार की शैली को विवेचन के उपकरणों से आलचाल करते हैं, और पाते हैं कि सत्ता अपनी आत्यंतिकता में किस तरह से ‘ज्ञान’ तथा उससे संबंध और अंतर्निहित को, ‘सामाजिक-नियंत्रण’ के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करती है। क्योंकि, जो मनुष्य की ‘आवयविकता’ या शरीर से संबन्धित है, वही सत्ता की कामना के केंद्र के इर्द-गिर्द, ज्ञान का आवरण चढ़ा कर, उस…

रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 - मिशेल फूको विशेषांक : फूको की स्वतंत्रता की अवधारणा / टॉड मे

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टॉड मे फूको की स्वतंत्रता की अवधारणा (अनुवाद - पुनर्वसु जोशी) ‘स्वतंत्रता’ शब्द रूसो के ‘सामाजिक अनुबंध’ के बाद से, विचारों की दुनिया का सर्वाधिक प्रीतिकर शब्द है जिससे मनुष्य का ‘होना’ परिभाषित होता है। क्योंकि, इसकी मांग और इसकी उपस्थिति-अनुपस्थिति को लेकर ही, सारा सभ्यता-विमर्श खड़ा होता है। हालाँकि, सभ्यता के केंद्र में कई और घटक और कारक भी हैं, लेकिन वे अंततः ‘स्वतंत्रता’ के निकट पहुँच कर, अपनी अर्थवत्ता प्राप्त करते हैं।वैसे, स्वतंत्रता को वर्गीकरण की भूल-भुलैया में ले जाकर, उसकी किस्में भी तय की गईं और इसके चलते, राजनीतिक स्वतंत्रता, नैतिक स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता आदि आदि। इसमें ‘इच्छा’ और ‘कामना’ के द्वैत को भी परिभाषित करते हुए, ‘मेटाफिजिकल प्रॉब्लम ऑफ़ फ्री विल’ को भी विमर्शों की परिधि में रखा गया।लेकिन, मार्क्सवाद के विचारधारात्मक वर्चस्व के बीच, ‘स्वतंत्रता’ को लेकर जितनी तीखी बहसें हुईं, उनसे अर्थ की पर्त-दर-पर्त खुली और स्वतंत्रता को ‘विचारधारा और सांस्थानिकता’ की रौशनी में विवेचित किया गया। इस…

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