व्यंग्य की जुगलबंदी-18 - दलबदल या दिलबदल / अनूप शुक्ल

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अनूप शुक्ल व्यंग्य की जुगलबंदी-18 ------------------------- व्यंग्य की जुगलबंदी-18 का विषय़ रखा गया था दलबदल या दिलबदल। इस पर अभी तक 13 स...

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अनूप शुक्ल

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व्यंग्य की जुगलबंदी-18
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व्यंग्य की जुगलबंदी-18 का विषय़ रखा गया था दलबदल या दिलबदल। इस पर अभी तक 13 साथियों ने लेख लिखे। बिना किसी क्रम के इन लेखों का संक्षेप में विवरण यहां पेेशे है।

1. Devendra Kumar Pandey

ने सबसे पहले लिखा । दलबदल को डकैतों द्वारा गिरोह बदलने के समान बताते हुये अपनी बात शुरु की। खात्मा बुद्धत्व और दलबदलू पर किया यह कहते हुये :

“सिद्धार्थ ने आम आदमी के दुःख दूर करने के लिए सत्ता सुख का त्याग किया और नेता जी आम आदमी का दुःख दूर करने के लिये सत्ता पाना चाहते हैं! दोनों में सही कौन? वो जो बुद्ध बन गये या वो जो राजा बनना चाहते हैं?”
पूरा लेख पढने के लिये इधर आइये https://www.facebook.com/devendra.pandey.188/posts/1173585592770026

जब तक आप लेख पढें तब तक हम आपको इसके कुछ अंश पढवाये देते हैं:

(अ) दलबदलू कोई साधारण तो होता नहीं। वही हो सकता है जिसके पास जन बल और धन बल दोनों हो।

(ब) ये (कार्यकर्ता) उस मजनू की तरह मायूस होते हैं जो लड़की पटाये और उसका टिकट छीन कर फिलिम दिखाने कोई और ले कर चला जाया!

(स) किसी सिद्धांत की दुहाई देने वाले का दिल, किसी दूसरे उस सिद्धान्त की दुहाई देने वाले दल पर आ जाय जिसकी जीवन भर बुराई करके नेता बना है तो दोनों दलों के अलावा जन सामान्य का भी दिल टूटना स्वाभाविक है।

2. Sanjay Jha Mastan

ने दलबदल की बात अपनी जानू से साझा की । पत्र लिखा। दलबदल के बारे में विचार करते हुये अपना मत रखा:

“आखिर सभी दलों को दल-बदलू क्यों पसंद आते हैं ? क्या राजनीति में निष्ठा, नीति और नीयत की बातें बेमानी हो गयी हैं ? क्या आज सियासत भी कॉरपोरेट घराने की तरह हो गई है जहां लोग पैसा, पावर और पद के लिए सारे रिश्ते नाते भूल जाते हैं ?”

भारतीय मतदाता इस इंतजार में रहता है कि कोई आयेगा और सब कुछ सुधार कर रख देगा। यही आशा संजय झा इस लेख में सन्नी लियोन से करते हैं।

इस बेहतरीन लेख को आप इधर पहुंचकर बांचिये। लेख का लिंक यह रहा।https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=10154974569567658&id=640082657 लेख के कुछ अंश यहां पेश हैं:

(अ) मैं अब 'खपा' में नहीं हूँ, आज से मैं 'नपा' में हूँ ! खुश हूँ आज से मेरा फ़ोन नंबर, ई मेल आईडी, बैंक अकॉउंट नंबर और घर का पता सब बदल जायेगा ! फिर भी भारी मन से कहना पड़ रहा है और ये बहुत दुःख की बात है कि पर्सनल दिल - बदल या पोलिटिकल दल - बदल की खबरें अब किसी को भी चौंकाती या हैरान नहीं करती हैं !

(ब) आज कई नेता अपनी पार्टी में धोबी के कुत्ते वाली हालत में हैं, ना घर के ना घाट के ! तुम्हारा दलबदलू अपना घर और घाट समय पर चुन लेता है !

(स) राजनीति, नौकरशाही और मीडिया में मेरे मित्रों को भी तुम्हारे दिल - बदलु टैलेंट पर बहुत भरोसा है ! तुमने नाम बदला ! पेशा बदला ! देश बदला ! अब तुम मेरी तरह भारतीय राजनीती भी बदल डालो ।

3. DrAtul Chaturvedi

ने अपने लेख में दलबदल का गूढ ज्ञान दिया। बताया कि जहां फ़ायदा दिख रहा हो उसके लिये लपकने में देरी नहीं करनी चाहिये। वे लिखते हैं:

“ जहां कंद मूल फल दिख रहे हों छलांग लगा दो । वस्तुतः छलांग ही युग की मांग है । भरपूर छलांग लगाइए । ऊंची कूद हो या लंबी कूद । आपकी कूद आपकी सामर्थ्य पर निर्भर करती है । “

इस लेख को पूरा पढने के लिये इधर आइये https://www.facebook.com/atul.chaturved…/…/10208661519399646

लेख के कुछ अंश मने छंटे हुये पंच देखिये:

(अ) दलबदल करने के लिए हौसला चाहिये, जज्बा चाहिये । दूसरे को स्वीकार और उसमें ढल जाने की सुनम्यता चाहिए । दलबदल समय की मांग है और जो समय का सम्मान नहीं करता समय उसको हाशिए पर डाल देता है ।

(ब) दलबदल हमारी शानदार राजनीतिक परपंरा का हिस्सा है इससे परहेज कैसा । यह तो विचारों के तालमेल का मामला है बस । वैसे कहना तो यह चाह रहे थे कि सीटों या टिकटों के तालमेल का मामला है । लेकिन आप जानते हैं कि इतना शब्दों का घालमेल तो चलता ही है

(स) जनसेवा के कांसेप्ट का तल्ला घिस चुका है । उसमें से लगातार उदर सेवा और परिवार सेवा की आवाज टक टक आ रही है । इसलिए दौड़ जाइए जिधर लोग आपको गलबहियां करने को तत्पर हों । सब जरूरतों का खेल है । किस्मत की बलिहारी है । जरूरत बने रहेंगे तो पुजते रहेंगे । अप्रासंगिक हुए तो ठुकते रहेंगे ।
इस लेख का अंश दैनिक ट्रिब्यून में छपा ।

4. Anshu Mali Rastogi

ने तो शीर्षक के बहाने ही सीधे सलाह ही दे दी कि ’ दल और दिल बदलते रहना चाहिय’। दलबदल करने वालों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुये अपनी बात शुरु की उन्होंने। अंशुमाली की नजर में नेता के लिये टिकट मिलने के मायने देखिये :

“नेता के लिए टिकट मिलना, उत्ता ही ‘रोमांचक’ है, जित्ता ‘डर्टी पिक्चर’ में विद्घा बालन का पल्लू सरकना। “

लेख पूरा बांचने के लिये इधर आइये https://www.facebook.com/anshurstg/posts/182030645610631

लेख के कुछ अंश देखिये:

(अ) नेता इत्ता संघर्ष करने के बाद राजनीति में कोई घास काटने के लिए थोड़े न आता है। उसकी ‘प्राथमिकता’ में पहले टिकट, फिर पार्टी, बाद में जनता होती है।
(ब) टिकट की पीठ पर ही नेता की सेवाएं टिकी होती हैं। चुनाव के दौरान नेता के टिकट का काटा जाना, उसके लाइफ की सबसे बड़ी ‘तौहीन’ समझी जाती है।

(स) आजकल तो बुद्धिजीवि लोग भी अपनी विचारधारा के साथ कहां प्रतिबद्ध रह पाते हैं फिर नेता तो नेता ठहरे। भाग-दौड़ भरी जिंदगी ने सबको तेज भागना सीखा दिया है। अब किसी के पास इत्ता समय नहीं कि ठहर कर सोचे सके; क्या सही है, क्या गलत। जहां मौका देखा, चौक्का जमा दिया। बाद में जो होगा देखा जाएगा।

5. Udan Tashtari

ने लेख का शीर्षक रखा - ’बदलाव की बयार।’ पूरी बयार देखने के लिये इधर आइये https://www.facebook.com/udantashtari/posts/10154683605081928

लेख के कुछ अंश दिखाते हैं आपको:

(अ) उस दल वाले इस दल में चले आये तो इस दल के कुछ बदल कर उस दल में चले गये कुछ तो दल बदलने के बजाये दल के दलदल में पूरा दल ही धँसाये चले जा रहे हैं.

(ब) जो अपने दल को कभी दल नहीं जीवन शैली कहते थे वो वोंटों की थैली का वजन तौल रहे हैं और जो इसे विचार धारा मान कर चलते थे, उनके विचार कहीं ताक पर धरे रह गये हैं. सबका उद्देश्य मात्र इतना ही कि सत्ता कबजिया लें किसी भी तरह से. दलबदली, दिलबदली सब जायज है सत्ता के सियासी खेल में.

(स) दलबदल और दिलबदल की राजनितिक प्रक्रिया यूँ तो नित खुदरा तौर पर चलती रहती है मगर चुनाव के उत्सव के दौरान होल सेल में यही खेला देखना नित नये अनुमानों को जन्म देता है.

6. Nirmal Gupta

ने अपने लेख का नाम दिया- “ दलबदल,दिलबदल और तुला में फुदकता मतवाद “। लेख की शुरुआत दार्शनिक अंदाज में करते हुये लिखा :

“ जब हम खुद को समझने में निर्णायक रूप से पराजित हो जाते हैं तब दूसरों की जिन्दगी का अतापता पूछना शुरू करते हैं।यह पूछताछ ऐसी ही है जैसे कोई नकटा दूसरों की नाक की कुशलक्षेम जानने के बहाने कुतरी हुई नाक के विषय में जानकर तसल्ली पाए।जैसे ट्रम्प के आने के बाद लोग गहरी सांस लें कि मान्यवरजी जैसे लोग दुनिया में और भी हैं।बात –बेबात खिल्ली उड़ाने के लिए तमाम विकल्प मौजूद हैं। “

इस लेख का यह अंश काफ़ी पसंद किया गया:

“ एक दिन अन्ना का आदमकद चित्र ढूंढते हुए आये थे जब वह उन्हें नहीं मिला तो बन्दर नचाते मदारी का फोटो यह कह कर ले गये कि यह भी ठीक है।इससे भी काम चल जायेगा।बोसीदा दीवार को ढांपना ही तो है। “

लेख बांचने के लिये लिंक यह रहा https://www.facebook.com/gupt.nirmal/posts/10211052761170592 लेख के कुछ अंश :

(अ) दलबदल नहीं करते।सिर्फ अपनी धारणाओं में विकास करते हैं।कारोबारी शब्दावली में कहें तो अपने मतवाद में वैल्यू एडिशन करते जाते हैं।दरअसल यह मूल्य सम्वर्धन बड़े कमाल की चीज है।

(ब) ये लगभग भारहीन होते हैं।किसी भी तरह का आकर्षण इनके लिए अपकर्षण होता है।गुरुत्वाकर्षण को धता बताना इन्हें आता है।

(स) ये न कभी दल बदलते हैं और न ऐसी किसी बात को दिल पर लेने की नादानी करते हैं।दिल को धड़कने के लिए सदा खुला रखते हैं।गाहे बगाहे दल जरूर बदल लेते हैं लेकिन दिल से इस मामले को अपने आसपास भी नहीं फटकने देते।

7. ALok Khare

ने दल बदलने से ज्यादा अहमियत दिल बदलने के मामले को। शुरुआत में ही प्रेमिका को याद किया फ़िर वाइफ़ को। लेख के बहाने अपने मन की कर डाली। आलोक खरे ने तो साफ़ कह दिया:

“जब जब दल बदले जाते हैं तो ये दलदल के सरीखे मामलात हो जाते हैं! जो जितना दल बदलेगा वो उतने ही बड़े दलदल का स्वामी बनेगा! अगर एक तरह से देखे तो दिल बदलना और दल बदलना में समरूपता होती है! “

उनका लेख इधर पहुंचकर देखिये। https://www.facebook.com/alok.khare3/posts/10209652225997400

लेख के कुछ अंश देखिये:
(अ) आजकल दिल और दल बस एक क्लिक के मोहताज होते हैं, की कब गलत क्लिक हुआ बोले तो लाइक हुआ और कब सामने वाले का दिल बदलकर दूसरे दल से जुड़ गया यानि इसमें एक लाइक से दो क्रियाएं सम्पन्न हुई की दिल भी बदला और दल इस क्रिया से उत्पन्न प्रोडक्ट!

(ब) दिल भी वही लगता है जहाँ दाल गलती है!

(स) दिल न होता तो आदमी कैसे व्यव्हार करता! क्या वो सभी से प्यार करता या सभी से व्यापर करता! लेकिन फिर ये सोचता हूँ की ये तो दिल होने के बाबजूद भी ऐसा ही तो हो रहा है! सब और व्यापार ही तो हो रहा है, चाहे कोई दिल बदल रहा है या दल बदल रहा है!

8. विनय कुमार तिवारी

ने लेख के बहाने 56 इंच के सीने पर हाथ धर दिया। लेख का अंत करते-करते यह ज्ञान मिल गया :

“नेताओं का दिल-विल कुछ भी नहीं बदलता, नहीं तो दलबदल-विरोध कानून की तरह अब तक दिलबदल-विरोधी कानून भी बन गया होता। राजनीतिकों का एक अलग ही किस्म का दिल होता है यह आलरेडी बदला हुआ होता है। “
लेख बांचने के लिये इधर आइये:

https://www.facebook.com/vinaykumartiwari31/posts/1172604756190815

(अ) राजनीति में तो सारे विकल्प खुले रखने चाहिए.. आखिर, कब किस विकल्प की जरूरत पड़ जाए..!

(ब) लोकतंत्र में चुनाव के मौसम को राजनीतिक बसंत के रूप में देखा जाना चाहिए, वैसे भी हमारा देश विविधताओं भरा देश है। इन्हीं विविधताओं के कारण यहाँ का राजनीतिक बसंत खूब खिला-खिला दिखाई देता है।

(स) आज नेता किसी को दिल नहीं देते। बल्कि अपने छप्पन इंची सीने में ही अपना विशाल विकल्पों भरा दिल लिए घूमते हैं। शायद आज "दलादली" के जमाने में इसी चौड़े सीने की वजह से इनका काम चल निकलता है।

9. Yamini Chaturvedi

ने लेख की शुरुआत यह जानकारी देते हुये की:

“ हमारे हुक्मरान और कुछ करें या न करें, जनता का दिल बहलाने का भरपूर इंतजाम करते हैं | एक आम आदमी रोटी पानी की जद्दोजहद में घर से दफ्तर और दफ्तर से घर जाते बोर न हो जाए, इसके लिए ये क्या कुछ नहीं करते | “

चुनाव को परिभाषित करते हुये यामिनी ने लिखा:
“सत्ता अगर सुंदरी है तो उसके योग्य वर ढूँढने के लिए किया गया स्वयंवर ही चुनाव है | “
लेख बांचने के लिये इधर आइये: https://www.facebook.com/yamini.chaturvedi.92/posts/1346914181996761

यामिनी के लेख के कुछ अंश देखिये:
(अ) चुनाव जनता द्वारा बड़े ही मनोरंजक ढंग से सरकार चुने जाने का तरीका होता है, तो मनोरंजन के इस महाएपिसोड के आरम्भ होते ही नेताओं में सरगर्मी बढ़ गयी| सभी नेता जनता की सेवा करने के लिए लालायित फिरने लगे | इस हद तक कि जनता बेचारी परेशान हो गयी कि किस किस से सेवा करवाएं |

(ब) उसकी (जनता की ) हालत कुछ ऐसे बुजुर्ग जैसी हो गयी, जिनके नाम की कोई पुरानी पालिसी मेच्योर हुई हो और उसका भुगतान पाने के लिए बड़े मियाँ का खुश होना जरुरी हो और नालायक बेटे उसकी सेवा में लगे हों |

(स) चुनाव में एक बार इन्वेस्ट कर दो फिर पांच साल जम के सेवा करो, साथ में अपने भाई-भतीजे, नातेदार-रिश्तेदार, यहाँ तक कि ड्राईवर-माली तक का उद्धार करो | यही सच्ची सेवा है |”

10. रवि रतलामी

ने कीर्तिश भट्ट का कार्टून लगाया जिसमें जनसेवक कहता है:

“मैं दलगत राजनीति में विश्वास नहीं रखता। जिस पार्टी में टिकट की संभावना होती है उसमें चला जाता हूं।”

लेख को पूरा बांचने के लिये इस लिंक पर पहुंचिये: http://raviratlami.blogspot.in/2017/01/blog-post_22.html

लेख के कुछ अंश हम दिखाते हैं आपको:

(अ) भारतीय न्यायालयों के लिए असंभव कुछ भी नहीं. न्यायालयों के मार्फत यह सिद्ध हो जाता है कि मृतक की हत्या हुई ही नहीं – या शायद वो मरा ही नहीं. ....भारतीय अदालतें अमीर, पहुँच वाले और रसूखदारों को निराश करने का जोखिम नहीं ले सकतीं.

(ब) एक नेता का दिल कैसा होता है. उसका दिल तो बस कुर्सी के लिए ही समर्पित होता है. उसका दिल वहीं लगा होता है. जहाँ कुर्सी वहाँ नेता. नेता दल बदलता है, परंतु अपना दिल नहीं.

(स) जो नेता दल विशेष के प्रति समर्पण और निष्ठा की बात करता है, वो दरअसल नेता ही नहीं होता. वो तो दोगला होता है. उसका कहना कुछ और करना कुछ और, और चाहना कुछ और होता है. नेता वही है जो कुर्सी के प्रति समर्पण रखे. दल तो आते जाते रहते हैं, बनते बिगड़ते रहते हैं, टूटते फूटते रहते हैं.

11. Alok Puranik

हालिया समय के सीन देखते हुये ’ भारतीय कांग्रेस जनता पार्टी ’ लेख लिखकर दलबदल के मायने बताते हैं। लेख बांचने के लिये इधर आइये https://www.facebook.com/puranika/posts/10154396632548667
इधर के आलोक पुराणिक के लेख देखकर साफ़ लगता है कि अब वे व्यंग्य के पक्के आलराउंडर हो गये हैं। राजनीति की फ़ील्ड में भी धुंआधार व्यंग्य बैटिंग करने लगे हैं।

लेख के कुछ अंश देखिये:
(अ) उत्तराखंड में विकट कनफ्यूजनात्मक सीन हैं। चार कांग्रेसजन आटो में बैठकर कहीं निकलते हैं, तो पत्रकार खबर चला देते हैं भाजपा में आठ कांग्रेसजन शामिल, चार ये और चार इनके बेटों को मिलाकर कुल आठ।

(ब) किसी कांग्रेसी परिवार की शादी में बीस-पच्चीस कांग्रेसी आ जायें, तो भाजपावाले प्रचार उड़ा देते हैं कि यहां शादी के फेरे से पहले ही कांग्रेसजन फेरा मार देंगे भाजपा में।

(स) उत्तराखंड में शोधार्थी, पत्रकार कांग्रेस का इतिहास पढ़ने भाजपा के दफ्तर में जा रहे हैं। कांग्रेसी होते अपने घर में हैं, पर तलाश भाजपा दफ्तर में होती है। एकदम मेले का खोया-पाया तंबू हो लिया है उत्तराखंड भाजपा दफ्तर।

12. Arvind Tiwari

जी ने लेख के शीर्षक से ही अपने इरादे साफ़ कर दिये। लिखा -’दिल नहीं दल बदला है ’ लेकिन कारण का खुलासा लेख के अंत में किया जब बताया:
“दल बदले एक नेता से हमने पूछा क्या आपने दल के साथ दिल भी बदल लिया।वह बोला हरगिज़ नहीं।दिल बदल जायेगा तो मैं भी आपकी तरह कवि लेखक हो जाऊंगा। “

लेख बांचने के लिये इधर पहुंचिये:https://www.facebook.com/permalink.php…
लेख के कुछ अंश देखिये:

(अ) चुनाव के मौसम में दल बदल एक प्राकृतिक बदलाव माना जाता है।चुनाव में दलबदल होली में फ़ाग गायन की तरह होता है।अगर फ़ाग गायन के बिना होली आ गयी तो समझो वह होली नहीं ,कोई और त्यौहार होगा।

(ब) पब्लिक नेता जी से शिकायत करती है म्युनिस्पेल्टी वाले अलाव नहीं जलवा रहे।कड़कड़ाती ठण्ड में शहरवासियों का जीवन अस्त व्यस्त है।निगम का अध्यक्ष और कमिश्नर अलाव की लकड़ी खाये जा रहे हैं।नेताजी कहते हैं अभी कुछ न कुछ करूँगा।घण्टे भर बाद नेताजी दल बदल लेते हैं।शहर का तापमान यकायक बढ़ जाता है।इस घटना ने सिध्द क्र दिया नेता लोग पब्लिक का ध्यान रखते हैं।

(स) नेता जी दल बदल रहे हैं दिल नहीं।आपके पास जो चीज है उसे ही आप बदल सकते हैं।जिसके पास दिल होता है उसके पास दल नहीं होता।दिल वाले दुल्हनिया ले जाते हैं,दल वाले आज का एम् एल ए बनाते है।

13. अनूप शुक्ल

का लेख बांचने के लिये इधर पहुंचिये: https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210349228500538
लेख के कुछ अंश देखिये:

(अ) जनसेवक की सार्थकता जनता की सेवा में है। जनसेवा मतलब टिकट मिलना, चुनाव लड़ना, विजयी होना और सरकार में कोई सेवादार पद प्राप्त करना। पद न मिला तो सेवा कार्य में अड़चन होती है।

(ब) एक ही दल में रहते हुये जननेता की इज्जत कम होती जाती है। बेटा बाप को अध्यक्षी से बेदखल कर देता है। चेले गुरु को मार्गदर्शक मंडल के किले में कैद कर देते हैं। सलाह तक लेना बन्द कर देते हैं। उसको आशीर्वादी रोबोट में बदल देते हैं।

(स) हर जनसेवक चाहता है कि जाहे जान भले ही चली जाये लेकिन जनसेवा का अवसर हाथ से न जाये। एक बार जनसेवा से बेदखल हुये तो गये काम से। जनसेवा का अवसर मिलना जनसेवक के लिये जरूरी होता है। चुनाव में टिकट मिलना जनसेवक के लिये उतना ही जरूरी होता है जितना जरूरी आईसीयू में आक्सीजन। टिकट न मिला तो गया जनसेवक।

तो यह रही व्यंग्य की जुगलबंदी -18 की रपट। जिन साथियों के लेख और मिलेंगे उनको शामिल किया जायेगा इसमें। कैसी लगी व्यंग्य की जुगलबंदी अपनी राय बताइयेगा।

#व्यंग्यकीजुगलबंदी, #व्यंग्य, #vyangy

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टिप्पणियाँ

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Sanjay Jha Mastan आप ने लेख की प्रशंशा की, बहुत ख़ुशी हुई ! पढ़ने और सराहने के लिए शुक्रिया अनूप भाई clip_image006:) clip_image006[1]:)

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अनूप शुक्ल धन्यवाद ! लेख हम बहुत पहले पढ चुके थे। कल फ़िर पढा ! लेख पर टिप्पणी अभी तक न हो पायी ! clip_image006[2]:)

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Sanjay Jha Mastan कोई बात नहीं अनूप भाई साहेब जब समय मिले पढ़ें और लाइक / टिप्पणी न भी करें तो भी कोई बात नहीं / व्यंग्य परिवार में मैं सबसे नया और लेखन में सबसे जूनियर हूँ, मुझे आप ने जोड़ा और स्थान दिया यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है / लगातार लिखने के अनुशाशन के साथ आप सबके साथ सीखने का अवसर ही मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है / आप के दिए हुए पांच विषय पर मैंने अब तक छः आर्टिकल लिखा है और हर लेख में मुझे कुछ न कुछ जादुई सीखने को मिला है / आप सबसे जो स्नेह मिला हैं उसके लिए पुरे व्यंग्य परिवार का आभारी हूँ clip_image009<3 clip_image006[3]:)

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Mazhar Masood भाई इनका उद्देश्य तो अपनी सेवा करना है और इस यात्रा के लिए टिकट आवश्यक है जहां से मिले जितने में मिले नेता टिकेट खरीद ही लेता है

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अनूप शुक्ल सही बात !

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Dulal Krishna Chatterjee दर असल दिलबदल और दलबदल में कुछ खास फर्क है ही नहीं। हाँ, "दलबदल" शब्द से राजनीतिबाज लोगों की घिनौनी बदबू आती है।

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अनूप शुक्ल मौके का फ़ायदा उठाना है !

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Pradeep Singh रघुराज प्रताप सिंह( उर्फ राजा भैया) भी कुंडा (प्रतापगढ़) से 24 साल की उम्र से ही लगातार निर्दलीय विधानसभा चुनाव जीत रहे है

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अनूप शुक्ल राजा भैया की क्या कहें ? वे निर्दलीय लड़ते हैं इससे जीतकर किसी भी दल से मंत्रिमंडल में शामिल होने की सुविधा रहती है।

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Suresh Yadav इसे Universal Leader के एक नये परिभाषा के रूप में लेना चाहिए जो वर्तमान भारतीय राजनीति की देन कही जाएगी।

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अनूप शुक्ल जैसे आयुध निर्माणियों में मल्टीस्किल्ड वर्कर clip_image006[4]:)

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DrAtul Chaturvedi बहुत बढ़िया सार संक्षेप । सबको उल्लेखनीय तरीके से प्रस्तुत किया है

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अनूप शुक्ल धन्यवाद !

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Udan Tashtari वाह जी...बहुत उम्दा विश्लेषण!!

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अनूप शुक्ल बहुत उम्दा टिप्पणी ! clip_image006[5]:)

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Devendra Kumar Pandey मजा आ रहा है।

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अनूप शुक्ल लिखते रहो, मजा आता रहेगा। clip_image006[6]:)

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Arvind Tiwari बेहतरीन

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अनूप शुक्ल धन्यवाद। clip_image018

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Suresh Yadav क्या बात कही है।

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अनूप शुक्ल आभार सर जी। clip_image018[1]

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Mohammad Khaliq रूख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

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अनूप शुक्ल क्या बात !

COMMENTS

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रचनाकार: व्यंग्य की जुगलबंदी-18 - दलबदल या दिलबदल / अनूप शुक्ल
व्यंग्य की जुगलबंदी-18 - दलबदल या दिलबदल / अनूप शुक्ल
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