मंगलवार, 31 जनवरी 2017

रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 - मिशेल फूको विशेषांक : साहित्य की भाषा क्या है ? / मिशेल फूको

मिशेल फूको

साहित्य की भाषा क्या है ?

साहित्य में, जब भी ‘भाषा‘ की बात उठती है, तो आलोचक-बिरादरी, समवेत स्वर में, कार्ल सैण्ड्बर्ग की बात दुहराते हुए कहते रहे हैं कि, ‘उसे, अधिकतम लोगों से अधिकतम तादात्म्य करने वाली होना चाहिये’ अर्थात् काव्य-भाषा हो या कथा-भाषा, उसमें सम्प्रेषण को प्राथमिक शर्त माना जाता है। जबकि, उत्तर-आधुनिक विचारकों का कहना है कि, ‘सम्प्रेषण’ शब्द, साहित्य का नहीं, समाजशास्त्र का है, और एक कृति की चिंता के केंद्र में यह शब्द, वह नहीं है। कृति की चिन्ता दूसरी है। सबसे पहले तो वह अपने ‘होने’ की चिंता करती है, बाद इसके वह स्वयं ‘कर्ता’ के विरुद्ध भिड़न्त लेती है। वह मूलतः अपने आत्यन्तिक आशय में, ‘भाषा’ हो जाना चाहती है, लेकिन, वह वैसी भाषा नहीं होना चाहती है, जिसमें, ‘सरलता’ उसकी और उसके भीतर से ‘रचे जाने वाले’ के जीवन-मरण की शर्त बना दी जाये। यहाँ उसके, ‘मेटाफोरिक’ और ‘मेटानिमिक’ होने का द्वन्द्व भी नहीं है। बल्कि, ऐसी ‘आत्म-सजग भाषा, जिससे बाहर कुछ भी नहीं है। वह ‘स्वयंसिद्धा’ है। वह एक अतिक्राम्य भाषा है, जो अपने को ही आविष्कृत करने की जद्दोजहद में होती है--‘जो एक असम्भाव्य में, भाषा के उस ‘स्पेस’ को दृश्य बनाती है, जो कहीं छुपा हुआ है। ‘भाषा’ का वह अदृश्य ‘स्पेस’, जो न केवल मलार्मे के लेखन में व़िद्यमान है, बल्कि, हर उस रचनाकार के लेखन में उसका ‘होना’ जरूरी है, जिसे कि हम पढ़ना चाहते हैं, वही रचने की वास्तविक गुंजाइश बनाती है।

पॉल डी मान ने, अपनी किताब ‘ब्लाइण्डनेस एण्ड इनसाइट’ में, आलोचना की, जिस भाषा की चर्चा की है, मिशेल फूको, उसको एक नया आयाम देते हैं। प्रस्तुत व्याख्यान में उन्होंने, साहित्य की भाषा पर विचार करते हुए, जिस दार्शनिकता के साथ, अपनी स्थापनाएँ दी हैं, इससे पूरी नव-आलोचना प्रभावित और प्रेरित रही है। कहना चाहिए कि, उत्तर- आलोचनात्मक विवेक को उन्होंने, प्रतिमानित करते हुए, कुछ बुनियादी प्रश्न उठाए हैं, जो एक गंभीर सर्जक को पुनर्विचार के लिए प्रेरित करते हैं। -अनुवादक

(अनुवाद - पुनर्वसु जोशी)

कल मैंने, साहित्य के बारे में कई विचारों को प्रस्तुत किया और उस वैपरीत्य और सादृश्य प्राणी की प्रस्तुति की कोशिश की, जिसे पुस्तक रूप में साकार भी कर दिया गया है। आज इस शाम को, मैं साहित्य के बारे में दिये गए अपने वक्तव्यों को, किंचित् ध्वस्त करूँगा। ऐसे में पूछा जा सकता है कि आखिरकार, साहित्य के बारे में बोलना, इतना स्पष्ट, इतना प्रकट, और क्या सचमुच ही इतना तात्कालिक है? क्योंकि, जब हम साहित्य के बारे में सम्वाद करते हैं, तब हमारे पास किस प्रकार का धरातल होता है? कैसा क्षितिज होता है? निस्सन्देह, साहित्य के चतुर्दिक, एक शून्य के अलावा कुछ और नहीं, जिसके फलित ऐसा कुछ है, जो कि लगभग काफी और संभवतः अनोखा भी है, या कहें कि साहित्य एक ऐसी अनन्त भाषा है जो कि हमको एक अन्तहीन विमर्श की अनुमति देती है।

मैं यहाँ, इस बिन्दु पर पहुँच कर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना चाहूँगा कि यह भाषा के द्वारा साहित्य का, साहित्य के बारे में सतत पुनर्प्रतिलिपिकरण क्या है? यह साहित्य की कैसी भाषा है, जो कि, भाष्यों, टिप्पणियों, प्रति-टिप्पणियों और इस तरह से निरन्तर द्विगुणन को जन्म देती है? समस्या, मुझे ऐसा लगता है कि स्पष्ट नहीं है। यह अपने आप में ही बहुत स्पष्ट नहीं है, और मुझे ऐसा भी लगता है कि पहले की अपेक्षा आज के समय में तो यह और भी अस्पष्ट है।

मेरे ऐसा मानने के पीछे बहुतेरे कारण हैं। पहला तो यह कि जिसे हम आलोचना कहते हैं, उसमें हाल ही में, काफी कुछ परिवर्तन आ चुका है। हम यह कह सकते हैं कि आलोचनात्मक भाषा की परत, समकाल में, पहले से कहीं अधिक जटिल हो गई है। आज के बनिस्बत, कभी यह ‘दूसरी भाषा‘ जिसे हम आलोचना के नाम से जानते हैं, इतनी बहुलता से प्रयोग में नहीं लाई गई है और न ही परस्पर रूप में, पूर्णतः ‘प्रथम भाषा‘ भाषा जो कि, स्वयं के बारे में बोलती है और स्वयं के ही नाम का जाप करती है, आनुपातिक रूप से, कभी इतनी जटिलतम नहीं रही है जितनी की वह आज, हमारे मौजूदा समय में है।

फिर भी, यह सघनता, यह आलोचना-कर्म का निरन्तर गुणन, एक विरोधाभासी तथ्य के साथ सम्बद्ध है। यह सम्बद्धता, जो यहाँ विद्यमान आलोचक की छवि यानि, ‘होमो क्रिटिक्स’, जिसका आविष्कार तकरीबन उन्नीसवीं शताब्दी के आसपास, ‘ला आर्प’ और ‘सेन्त बव’ के मध्य हुआ था, ठीक उन्हीं क्षणोें से, वह निरन्तर मिटाये जाने की प्रक्रिया में है, जब आलोचना के प्रकार्यों की संख्या में अभिवृद्धि आरम्भ हुई है।

इस कथन से मेरा कुल आशय यह है कि आलोचना का काम आलोचना को समर्पित ‘पाठों’ में अटके न रह कर, अब स्वयं के प्रसार या कहें कि एक बड़ी व्याप्ति में आ गया है। ऐसे प्रकार्य अब उपन्यासों, निबन्धों, और संभवतः दर्शन में पाए जाते हैं। आज आलोचना के वास्तविक प्रकार्य रेने शाख की कविताओं या फिर मौरिस ब्लैंशो के वाक्यांशों में मिलते हैं, और या फिर, फ्रांसिस पोंज के पाठों में प्राप्त होते हैं। और,वे भाषा के, उस दिये गए अंश से कहीं अधिक, जो कि प्रकट रूप से, और उसके ‘लेखक’ के नाम के कारण, ‘आलोचना के कार्य’ के रूप में निरूपित हैं। हम यह कह सकते हैं कि, आलोचना, आमतौर पर, भाषा का एक सामान्य, असांस्थानिक और कर्ता-विहीन प्रकार्य बन गया है।

 

और इस सब के बावजूद, यह तीसरा तथ्य होगा जो कि, ‘समकालीन आलोचना’ को समझने में व्यवधान और दुरूहता उत्पन्न करेगा। फिर भी, आज, एक नया तथ्य सामने आया है, और वह है हमने, हर भाषा में, एक संबंध का, और जो कि किसी भी प्रकार से आलोचना का नहीं है, का संस्थापन देखा है। और, जो किसी भी प्रकार से, परम्परागत आलोचना से सुसंगत नहीं है, यह आकलन करने वाली, यह श्रेणीबद्ध करने वाली संस्था, यह मध्यस्थ संस्था, जो कि, ‘सृजनात्मक भाषा’, ‘सृजनात्मक लेखक’, और ‘लोग’ (पाठक), जिसे सिर्फ उपभोक्ता की तरह देखा जाता है, के बीच बन गया है। आज, जिसे हम कह सकते हैं ‘प्रथम भाषा’, और जिसे हम सिर्फ ‘साहित्य’ कह सकते हैं, और यह ‘दूसरी भाषा’, जो कि साहित्य के बारे में बात करती है, और जिसे हम ‘आलोचना’ कहते हैं, इन तीनों के बीच एक बहुत ही भिन्न सम्बन्ध स्थापित हो गया है। दरअस्ल, आलोचना का इस्तेमाल, साहित्य और स्वयं आलोचना के बीच दो नए तरह के सम्बन्धों की स्थापना के द्वारा हो रहा है।

साहित्य के संदर्भ में, आलोचना, आज उस ‘प्रथम भाषा’ से संदर्भित होकर, एक प्रकार के वस्तुगत संजाल को स्थापित करना चाहती है, जो कि विमर्शात्मक हो, स्वयं के सारे धरातलों पर न्यायसंगत हो, और प्रदर्शक हो। इसके समान्तर उसमें, आलोचक की सुरुचि, जो कि, अक्सर गुप्त और अप्रकट है, महत्त्वपूर्ण न हो, मूलभूत न हो, बल्कि, आवश्यक रूप से, एक प्रकार की सुस्पष्ट पद्धति का काम कर सके। कहना न होगा कि यह पद्धति, विश्लेषणात्मक, मनोविश्लेषणात्मक, भाषाई, सैद्धान्तिक, या जो भी हमारे पास हो, औपचारिक रूप में हो सकती है। अतः आप कह सकते हैं कि, आलोचना, ‘निश्चयात्मकता’ या एक तरह की वैज्ञानिक व्यवस्था के भीतर, स्वयं के लिये ही आधार की समस्या को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में है।

फिर भी, वहीं दूसरी ओर, आलोचना, एक नई भूमिका अदा करती है, और जो कि, उस भूमिका से भिन्न है, जो वह पहले निभाती आ रही थी, जो कि, ‘साहित्य’ और ‘लेखन’ के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका में थी। लेकिन, अब एक सहज प्रश्न यह उठता है कि सेन्त बव के समय से लेकर आज तक, अन्ततः आलोचना करने का अर्थ क्या होता था? पूर्व में, इसका अर्थ होता था, एक प्रकार का पहला, ‘अधिकृत पाठ’, एक पाठ (रीडिंग) जो कि दूसरों के ‘पढे़ जाने से पूर्व’ का है। जो लेखक की रचना- जो कि, अपरिहार्य रूप से थोड़ी अपारदर्शी, दुरूह या गूढ़ है- उस ‘दूसरी श्रेणी’ के पाठक (जिसमें कि हम सब सम्मिलित हैं) को समझ पानेे के लिए बोधगम्य बनाती है। इसी हेतु ही आलोचना की आवश्यकता है। यदि दूसरे शब्दों में कहें तो, आलोचना एक प्रकार से, ‘रचना’ के पाठ का, एक विशेषाधिकार प्राप्त, परम, और प्रथम रूप है।

मुझे, अब निस्सन्देह ऐसा प्रतीत होता है कि‘आलोचना’ में, जो महत्त्वपूर्ण है, वह यह है जैसे कि अब ‘आलोचना’ स्वयं ही लेखन (सृजनात्मक) की दिशा में अग्रसर होने की प्रक्रिया में है। और ऐसा दो प्रकारों से होता है। पहला, क्योंकि आलोचना की उत्सुकता, अब रचना के सृजन के मनोवैज्ञानिक क्षण को जानने में नहीं है, बल्कि, स्वयं ‘लेखन’ ही है। ‘लेखन’ की ‘संश्लिष्टता’ में है, जिसका अपना रूप है, अपने विन्यास हैं। और दूसरा, चूँकि, आलोचना ने, ‘पाठ’ का एक पूर्व-पठन, या बेहतर तैयार रूप होना बन्द कर दिया है, क्योंकि आलोचना स्वयं अब ‘लेखन’ होने की प्रक्रिया में है। निस्सन्देह, यह लेखन (आलोचना) जो कि पहले लेखन (सृजनात्मक) के समक्ष दूसरा है, परन्तु, समरूप है। अतः यह लेखन भी अन्य लेखनों की तरह ही, एक भूल-भुलैया, या अन्तर्ग्रथित बिन्दुओं और कथा-रेखाओं के एक संजाल की निर्मिति करता है। इस लेखन के, ये बिन्दु और कथा-रेखाएँ, आम तौर पर, एक दूसरे को दुहराते हैं, एक दूसरे को काटते हैं, एक दूसरे को ढाँपते हैं, अपनी जगह भी बदलते रहते हैं, अन्ततः, एक ‘सम्पूर्ण निरपेक्षता’, को बनाने के लिए, जिसे हम ‘साहित्य और आलोचना की संपूर्णता’ कह सकते हैं-अर्थात् इसे हम कह सकते हैं कि यह है लेखन का वास्तविक तैरता हुआ, दृश्यालेख।

मैं, अब यह अनुमान लगा सकता हूँ कि आप उस ‘अस्पष्टता’ को समझ सकते हैं जिससे हमें इस ‘दूसरी भाषा‘ को समझने में, विशिष्ट चुनौती का सामना करना पड़ता है जिसे अभी ही साहित्य की ‘प्रथम भाषा’ से जोड़ा गया है और जो उस प्रथम भाषा से सम्बन्धित, एक पूर्णरूपेण सकारात्मक, पूर्णरूपेण विमर्शात्मक और प्रकट प्रदर्शनीय आख्यान का दावा करती है, और जो कि, एक ही समय में, आलोचना भी है और साहित्य की तरह, ‘लेखन’ (सृजनात्मक) होने का प्रयास करती है। यहाँ थोड़ी उलझन भी है कि आप कहेंगे कि हम इस अंतर्विरोध का निराकरण कैसे करेंगे? आलोचना, कैसे यह दूसरी भाषा भी है? और वह कैसे साथ ही साथ, एक ही समय में, प्रथम भाषा का दायित्व भी पूरा करती है? अर्थात् साहित्य भी है। मैं, आज, ठीक वही स्पष्ट करना चाहूँगा कि अन्ततः आलोचना क्या है?

अभी हाल ही में, तकरीबन एक दशक पहले से ज्यादा नहीं हुआ होगा जब रोमन जेकब्सन नामक एक भाषाविद् ने, आलोचना की प्रकृति की व्याख्या करने की चेष्टा करते हुए, तर्कशास्त्रियों से एक अवधारणा उधार लेकर, एक ‘मेटा-लैंग्विेज’ की अवधारणा प्रस्तुत की। जेकब्सन, ने कहा कि आलोचना, आमतौर पर, व्याकरण की तरह, शैली विज्ञान की तरह, भाषा विज्ञान की तरह, एक ‘मेटा-लैंग्विज’ है। निश्चित रूप से, यह बहुत ही सम्मोहक अवधारणा है और प्रथम दृष्टया, यह आलोचना पर लागू करने योग्य भी जान पड़ती है। क्योंकि, ‘मेटा-लैंग्विज’ की अवधारणा, हमें उन दो गुणधमोंर् की उपस्थिति से अवगत कराती है, जो कि, गहराई में जाकर ‘आलोचना’ को परिभाषित करने के लिए अत्यावश्यक भी है। पहला तो है, किसी एक भाषा के रूपों, उसके सूत्रों, और उसके नियमों को, किसी दूसरी भाषा में परिभाषित करने की सम्भावना। और इस ‘मेटा-लैंग्विज’का दूसरा गुणधर्म यह है कि यह ‘दूसरी भाषा’, जिसमें हम पहली भाषा के रूपों, सूत्रों, और नियमों को परिभाषित करते हैं, यह दूसरी भाषा, जरूरी नहीं है कि ‘पहली भाषा’ से अभीष्ट में भिन्न हो। क्योंकि, अन्ततः, हम जर्मन, अँग्रेजी, या किसी अन्य भाषा को, फ्रेंच की ‘मेटा-लैंग्विज’ की तरह प्रयोग में ला सकते हैं। और तो और, हम फ्रेंच को ही, फ्रेंच की ‘मेटा-लैंग्विज’‘ कीे तरह प्रयोग में ला सकते हैं। हम, इस गुणधर्म को समझने के उद्देश्य के लिए एक सांकेतिक भाषा का आविष्कार भी कर सकते हैं। इसके फलस्वरूप, इस ‘पहली भाषा’ से परम दूरी की सम्भावना में, हमारे पास, उस एक आख्यान की प्रयुक्ति की पूरी सम्भावना है, जो कि, पूर्णरूपेण विमर्शात्मक हो और फिर भी ,उसी धरातल पर अवस्थित हो, जिस पर कि वह भाषा है।

हालाँकि, मैं आश्वस्त नहीं हूँ कि, ‘मेटा-लैंग्विज’ की यह अवधारणा, जो कि, कम से कम एक अमूर्त रूप में, उस एक तार्किक स्थल (site) को परिभाषित करती दिखती है, जहाँ कि आलोचना को रखा जा सके। मुझे ऐसा नहीं लगता कि ‘आलोचना’ को परिभाषित करने के लिए, इस अवधारणा का प्रयोग किया ही जाना चाहिए।‘मेटा-लैंग्विज’ की अवधारणा के संदर्भ में, इस मौन की व्याख्या में, शायद हमें उस बात पर लौटना चाहिए, जब हम ‘साहित्य’ के बारे में विमर्श कर रहे थे। आप को याद होगा कि, पुस्तक, साहित्य के मुकाम के रूप में आई थी, यानि, वह ‘स्पेस’, जिसमें कोई रचना, साहित्य की ‘प्रतिकृति’ बन जाती है। कहना चाहिये, ‘माया‘ और उसके ‘परावर्तन’ की एक लीला बन जाती है, जहाँ पर, अतिक्रमण और मृत्यु, दोनों का प्रश्न था। अगर हम उसी प्रश्न की, भाषाविदों की शब्दावली का प्रयोग करते हुए, पुनराभिव्यक्ति का प्रयास करें, तब शायद हम ऐसा निम्नांकित-सा कुछ कह सकते हैं।

मसलन, ‘साहित्य, निश्चित रूप से, ‘वाक्य’ के, उन अनगिनत तथ्यों जो कि मानवजाति द्वारा प्रभावोत्पादकता के साथ अभिव्यक्त होते हैं, में से एक है। सारे ‘वाक् तथ्यों’ की तरह, साहित्य, सिर्फ उन्हीं शब्दों (paroles) तक सम्भव है, जहाँ तक वे शब्द, आम तौर पर भाषा से अविभेद्य हैं, उस सामान्य क्षैतिज से, जो कि किसी भाषा के सूत्रों का गठन करता है। अतः, पूरा साहित्य, एक उक्ति के रूप में, सिर्फ उसी भाषा के सन्दर्भ में सम्भव है, सिर्फ उन संरचनाओं और सूत्रों के सन्दर्भ में, जो कि उस भाषा के हर शब्द को एक ‘सटीक अभिव्यक्ति’ बनाते हैं। वे, उसे पारदर्शी बनाते हुए, उसे समझे जाने की अनुमति देते हैं। अगर वाक्यों का अर्थ है, तो वह इसलिए है, क्योंकि, हर ‘वाक्-तथ्य‘, भाषा के आभासी, परन्तु पूर्णतः सीमित विस्तार में अवस्थित है। निश्चित रूप से, ये सारे विचार अब सर्वविदित हैं।

परन्तु, क्या हम यह नहीं कह सकते कि साहित्य, दूसरे सारे ‘वाक्-तथ्यों’ से विलग, एक नितान्त अभिनव वाक्-तथ्य है? दरअस्ल, यह बात किंचित् दुरूह लग सकती है कि--‘साहित्य, गहराई में जा कर, वह उक्ति है, जो उस सूत्र का जिसमें वह अवस्थित है, उसका सम्भवतः आज्ञापालन तो करती है, परन्तु जो कि, ठीक अपने जन्म के क्षण में, और उन सारे शब्दों में, जो वह अपने ‘उद्गार’ के लिए प्रयोग में लाती है, उन सूत्रों को संकटग्रस्त करती चलती है, जिसमें वह समझी जाती है। और,जिसमें वह अवस्थित है। यानि, कहने का तात्पर्य यह है कि, जब भी कोई कुछ लिखने के लिए कलम उठाता है, तो यह ‘साहित्य’ है और उस सीमा तक ‘साहित्य’ है, जहाँ तक उन सूत्रों का परिसीमन, उस शब्द को लिखने के कृत्य में, स्थगित है, क्योंकि, यह ‘स्थगन’ ऐसा है कि, एक समय ऐसा भी हो सकता है, जबकि, ‘शब्द’ स्वयं ही, उन सूत्रों की आज्ञा को पालन करने से इनकार भी कर सकता है। अगर लेखक द्वारा लिखा गया हर शब्द, वास्तव में भाषा के उन सूत्रों के नियमानुसार न हो तो, वह किसी भी प्रकार से समझा न जा सकेगा। वह नितान्त असम्प्रेष्य हो जायेगा। और वह तब निश्चित रूप से ‘पागलपन’ की भाषा होगी, और शायद, यह आज ‘भाषा’ (स्मरण रहे, जिसे फूको पहले ‘साहित्य’ कह चुके हैं-अनुवादक) और ‘पागलपन’ के बीच के अत्यावश्यक सम्बन्ध का कारण भी है।

‘साहित्य और पागलपन’, यह एक अलग मुद्दा है, जिस पर हम बाद में कभी चर्चा करेंगे।

फिलहाल, हम सिर्फ यह कह सकते हैं कि साहित्य, हमेशा हर वाक्य के, हर शब्द द्वारा उठाए जाने वाला जोखिम है और हो सकता है कि यह शब्द, या यह वाक्य, या यह बाकी सब, उन सूत्रों के नियमों का अनुसरण न करे। उदाहरण के लिए, इन दो वाक्यों को लीजिये, ‘काफी अरसे तक, मैं सोने के लिए बिस्तर पर जल्दी गया’ और ‘काफी अरसे तक, मैं सोने के लिए बिस्तर पर जल्दी गया।’ ध्यान दीजिए कि इसमें पहला वाक्य वह है, जो मैंने कहा है, और दूसरा वाक्य वह है, जो मैंने प्रूस्त की पुस्तक में पढ़ा है। कहना न होगा कि ये दोनों वाक्य, अपने ‘वाचिक’ रूप में तो निस्सन्देह एक ही समान हैं, परन्तु, यथार्थ में, वे परस्पर गूढ़ रूप से भिन्न हैं। जिस क्षण, In Search वि स्वेज Time में वे शब्द प्रूस्त द्वारा लिखे गए, यह सम्भव है कि उनमें से एक भी शब्द का ठीक वही अर्थ नहीं होगा, जो उन शब्दों का अर्थ आज है। और जिससे हम आज, अपने दैनन्दिन के जीवन में परिचित हैं। शायद यह भी सम्भव है कि, भाषा (वाणी) ने अपने उन सूत्रों को ‘स्थगित’ कर दिया हो, जिनसे वह उधार ली गई है।

हम यह कह सकते हैं कि, यहाँ पर एक जोखिम है, हमेशा अत्यावश्यक, मूलभूत, हमेशा अनुन्मूलनीय, संरचनात्मक रहस्यवाद का जोखिम। यह भी बहुत सम्भव है कि उन सूत्रों का ही अपेक्षित सम्मान न किया जाये। खैर, बहरहाल, साहित्यिक भाषा के पास, उन सूत्रों के स्थगन का संप्रभुसत्तात्मक अधिकार सर्वदा रहता है, और इस सम्प्रभुता की उपस्थिति, भले ही वह उपयोग में न लाई जाए, साहित्य की रचना की भव्यता और अनिश्चितता की निर्मिति करती है। इस हद तक, मुझे ऐसा नहीं लगता कि साहित्यिक आलोचना की एक विधि के रूप में ‘मेटा-लैंग्विज’ प्रयोग में लाई जा सकती है या वह उस तार्किक क्षैतिज की तरह प्रस्तावित की जा सकती है, जिसके बरक्स हम आलोचना की कोई पहचान कर सकें। क्योंकि, ‘मेटा-लैंग्विज’ का विशिष्ट रूप से, यह अभिप्राय निकलता है कि, हमारे पास एक सैद्धान्तिकी है, जिसके अंतर्गत वे सारे उच्चरित शब्द आते हैं, जो कि, भाषा के लिए स्थापित किए गए सूत्रों पर आधारित हैं। तब अगर, वे सूत्र भाषा में संकटग्रस्त होते हैं, अगर किसी समय, वे सूत्र अपना आत्यन्तिक मूल्य खो बैठते हैं, तब उस क्षण, ऐसी भाषा के लिए, ’मेटा-लैंग्विज’ की स्थापना करना सम्भव नहीं है। तब हमें अन्य साधनों को खोजना होगा। तब, जबकि हम, ‘मेटा-लैंग्विज’ की अवधारणा को अपने वास्तविक अभिप्राय के साथ प्रयोग में नहीं ला सकते। तब आखिरकार, फिर प्रश्न उठता है कि ऐसे में, अब हम, साहित्य को ठीक से परिभाषित करने के लिए किस ओर देखें?

यहाँ आकर मैं एक पुनर्विचार का प्रस्ताव करता हूँ। दरअसल, हमें सम्भवतः थोड़ा सन्तुलित होना चाहिए, और बजाये हड़बड़ी में, तर्क से उधार लिए गए, इस धूल-धूसरित शब्द-यानि ’मेटा-लैंग्विज’ को बढ़ाने के, हमें एक लगभग अतिसूक्ष्म साक्ष्य को स्वीकार कर लेना चाहिए, जो कि मेरे विचार में सर्वथा निर्णायक है, वह यह कि, भाषा ही इस विश्व में ऐसा जीव है, जिसकी पूर्णरूपेण पुनरावृत्ति हो सकती है।

बेशक, इस जगत में ऐसे और भी जीव हैं जिनकी पुनरावृत्ति हो सकती है, जैसे कि दो एक जैसे प्राणी, दो एक जैसे पौधे। परन्तु, प्राकृतिक व्यवस्था में, पुनरावृत्ति, वास्तव में, एक आंशिक परिचय है, और जो कि इसके अलावा, आसानी से विमर्शात्मक रूप में विश्लेषित की जा सकती है। और भाषा के बहुत कठोर अभिप्राय के बाहर, किसी भी प्रकार की पुनरावृत्ति नहीं है। और एक दिन हमें, निश्चित रूप से, भाषा में पुनरावृत्ति के सभी रूपों का विश्लेषण करना होगा, और शायद तब पुनरावृत्ति के उन रूपों के विश्लेषण से हम, भाषा की सत्ता-मीमांसा जैसा ‘कुछ’ रेखांकित कर सकें। परन्तु, अभी के लिए तो हम बस इतना भर कह सकते हैं कि, भाषा कभी स्वयं की पुनरावृत्ति को स्थगित नहीं कर सकती।

भाषाविद्, इस विचार से भलीभाँति परिचित हैं और यह दिखा चुके हैं कि, भाषा की सम्पूर्ण शब्दावली के संगठन के लिए सिर्फ कुछ ही ध्वनि-ग्रामों की आवश्यकता है। वे ही भाषाविदों, और साथ ही साथ, शब्दकोशों के रचनाकार, यह जानते हैं कि, सारे उद्गारों का लेखा-जोखा रखने के लिए कितने कम शब्दों की आवश्यकता होती है, फिर भी हमारे पास, एक असीमित संख्या, जो कि निश्चित रूप से एक मुक्त संख्या है, और ये वे उद्गार हैं, जिन्हें हम दैनन्दिन में बोलते हैं। हम लगातार एक पुनरावृत्त ढाँचे को बोलते हैं-ध्वन्यात्मक पुनरुक्ति, शब्दों की अर्थगत पुनरुक्ति। हम यह भी जानते हैं कि, भाषा, जैसे ही बोली जातीे है, वह उसी क्षण, जिस क्षण में बोली जाती है, दुहराई भी जा सकती है। हम वही वाक्य कह सकते हैं, हम उसी बात को दूसरे शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं, और ठीक यही वह पुनर्प्रस्तुति है, जो कि, भाष्य, टीका, और आदि आदि को बनाता है। यहाँ तक कि हम भाषा के रूप को भी दुहरा सकते हैं, लगभग पूरी तरह उसके अर्थ को स्थगित करते हुए, और भाषा के सिद्धान्त ठीक यही करते हैं, जब वे भाषा को उसके वैयाकरणिक या आकृतिमूलक संरचना के सहारे दुहराते हैं।

खैर, आप यह देख सकते हैं कि, भाषा ही सम्भवतः एक ऐसा ‘होना’ है, जिसमें ‘पुनरावृत्ति’ जैसा ‘कुछ’ पूर्णरूपेण सम्भव है। भाषा में पुनरावृत्ति का यह तथ्य, निस्सन्देह, भाषा का एक गठनात्मक गुणधर्म है। परन्तु, यह गुणधर्म अपने आप में निरपेक्ष नहीं है, और लेखन के सन्दर्भ में अ-क्रिय भी नहीं है। लेखन का अर्थ, भाषा की अत्यावश्यक पुनरावृत्ति से बच कर निकलना नहीं है। मेरा यह मानना है कि, साहित्यिक अर्थ में लेखन में, पुनरावृत्ति को रचना के मर्म में रखना है। और सम्भवतः हमें यह भी कहना होगा कि पाश्चात्य साहित्य, निस्संदेह क्योंकि, मैं दूसरे अन्य साहित्यों से अनभिज्ञ हूँ और मैं नहीं जानता कि मैं, उनके बारे में क्या कह सकता हूँ- तो पाश्चात्य साहित्य का आरम्भ होमर से हुआ होगा, जिन्होंने ज्ीम व्कलेेमल में पुनरावृत्ति की अद्भुत संरचना का प्रयोग किया है। आप The Odyssey की पुस्तक 8 को याद कीजिये, जहाँ हम, यूलिसिस को PÈeacians के मध्य पाते हैं, परन्तु, जहाँ उन्होंने अभी यूलिसिस को पहचाना नहीं है। यूलिसिस को PÈeacians ने एक भोज में आमन्त्रित किया गया है परन्तु कोई उसे पहचानता नहीं है। क्रीड़ाओं में उसका बल, उसके विरोधियों पर उसकी विजय ही, वे प्रसंग हैं जो कि यह दर्शाते हैं कि वह पराक्रमी है, परन्तु ये भी उसकी वास्तविक पहचान को उद्घाटित नहीं करते हैं। इसलिए, वह उपस्थित भी है और गुप्त भी। और उस भोज के मध्य, एक भाट आता है, और वह भाट, यूलिसिस की शौर्यगाथाएँ गाने आया है, वह यूलिसिस के कारनामों के गीत गाने आया है, वे शौर्यगाथाएँ और कारनामे, जो कि भाट की आँखों के सामने घटित हुए हैं, क्योंकि यूलिसिस वहाँ उपस्थित है। वे कारनामे, जो कि अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, अतः अपने ही वृत्तान्त में, एक उपाख्यान की तरह समाहित हैं। क्योंकि, यह यूलिसिस की शौर्यगाथाओं का एक भाग है कि किसी भी क्षण, वह (यूलिसिस स्वयं) एक भाट को यूलिसिस की शौर्यगाथाएँ गाते हुए सुनेगा। और इस प्रकार, ज्ीम व्कलेेमल स्वयं अपने ही भीतर पुनरावृत्त होती है, उसके केंद्र में एक प्रकार का दर्पण है, अपनी ही भाषा के मर्म में, इसी कारण, होमर का पाठ, अपनी ही ओर मुड़ता है, अपने ही केंद्र को लपेटता हुआ या अपने ही केंद्र के इर्दगिर्द खुलता हुआ, और वह उस गति में पुनरावृत्त होता है, जो कि उसके स्वयं के लिए अत्यावश्यक है। मुझे ऐसा लगता है कि, यह संरचना, जिसे कि हम बहुधा पाते हैं- जैसे कि उदाहरण के लिए हम इसे The Arabian Nights में पाते हैं, जहाँ एक रात की कथा, जिसे कि हम बहुधा पाते हैं, शहरजाद के द्वारा सुल्तान को किस्सा-ए-हजार रात सुनाने की कथा है ताकि वह मृत्यु से बच सके- संभवतः यह प्रकारान्तर से साहित्य के अस्तित्व का संघटक है, सारे साहित्यों का नहीं तो कम से कम पाश्चात्य साहित्य का तो है ही।

यह सम्भव है, या शायद निश्चित है, कि यह पुनरावृत्त संरचना और आन्तरिक पुनरावृत्ति की संरचना जिसे हम आधुनिक साहित्य में पाते हैं, में एक महत्त्वपूर्ण पृथकत्व है। The Odyssey में, हम भाट का एक अनन्त गीत पाते हैं, जो एक प्रकार से, निरन्तर यूलिसिस का पीछा करके, उसे पकड़ने की कोशिश करता रहता है, और इसके साथ, एक ही समय में, हमारे पास भाट का यह गीत है, जो बहुत पहले ही प्रारम्भ हो चुका है, और जिसका यूलिसिस से साक्षात्कार अभी ही होता है, और जो यूलिसिस का अपनी स्वयं की किंवदन्ती में, स्वागत करता है और उसे मौन के ठीक उस क्षण, यूलिसिस को उद्घाटित करता है और बोलने के लिए विवश करता है, जब यूलिसिस स्वयं को छुपाने की चेष्टा करता है। आधुनिक, साहित्य में, आत्म- संदर्भात्मकता, होमर के द्वारा वर्णित इस लम्बे विस्थापन की बनिस्बत, सम्भवतः अधिक मौन है। यह सम्भव है कि स्वयं की भाषा की इस सघनता में, आधुनिक साहित्य स्वयं की पुनरावृत्ति करता है, और, यह भी सम्भव है कि, उक्तियों और सूत्रों की इस अन्तरक्रीड़ा से भी, जिसका अभी थोड़ी देर पहले ही, मैंने उल्लेख किया, से भी साहित्य स्वयं की पुनरावृत्ति करता है।

मैं, ‘मेटा-लैंग्विज’और पुनरावृत्त संरचनाओं पर अपने विचारों के समापन में यही कहूँगा कि क्या हम, इस बार, आलोचना को, बहुत सहज और सरल रूप में, एक ‘मेटा-लैंग्विज’ के बदले, उसकी पुनरावृत्ति के रूप में, जो कि भाषा में पुनरावृत्ति के योग्य है, के रूप में नहीं परिभाषित कर सकते? और उस परिधि तक, साहित्यिक आलोचना, सम्भवतः भाष्य की उस महान परम्परा में समाविष्ट की जा सके, जिसका प्रारम्भ, कम से कम ग्रीक जगत ने, उस समय करना शुरू किया, जब पहले व्याकरणविदों ने होमर के लिखे हुए पर टिप्पणियाँ कीं। क्या हम, यह नहीं कह सकते कि, एक प्राथमिक अनुमान के रूप में कि आलोचना सिर्फ, विशुद्ध रूप से द्वैध का आख्यान है, यानि कि, उन दूरियों और भेदों का विश्लेषण, जिनमें भाषा की पहचान फैली है? और यह बिलकुल अप्रत्याशित नहीं कि उस क्षण में हम पायेंगे कि, आलोचना के तीन रूप सम्भव हैं। पहला है विज्ञान, या ज्ञान, या उन आकृतियों का संग्रह, जिनके द्वारा भाषा के एक-से तत्व, पुनरावृत्त होते हैं, बदलते हैं, सम्मिलित होते हैं। यानि, हम कैसे ध्वन्यात्मक तत्वों को, अर्थगत तत्वों को, और वाक्य-विन्यास के तत्वों को, बदलते हैं, सम्मिलित करते हैं, और उनकी पुनरावृत्ति करते हैं। आलोचना का, इस अर्थ में, भाषा की औपचारिक पुनरावृत्ति के विज्ञान के रूप में, एक नाम है और वह कई वर्षों से इस रूप से अस्तित्व में है। यह रूप ‘वाग्मिता’ के नाम से जाना जाता है।

बहरहाल, द्वैध के विज्ञान का एक दूसरा रूप भी है, जो कि, ‘समरूपता‘ या संशोधनों का, या भाषा के वैविध्य के कारण उपजे अर्थ के विखण्डन का विश्लेषण- यह कैसे संभव है कि, हम, शब्दों को बदल कर, किसी अर्थ को दुहरा सकते हैं। और, आप यह जानते हैं कि आलोचना ने, सेन्त बव के समय से लेकर लगभग आज तक, जब हम किसी ऐतिहासिक या मनोवैज्ञानिक अर्थ की विशिष्टता पुनरान्वेषण करने का प्रयास करते रहे हैं, यानि कि, सारे लेखन की ‘बहुवचनीयता’ के भीतर, किसी प्रदत्त विषयीकरण की विशिष्टता की पहचान का प्रयास करते हैं। इसे ही परम्परागत रूप से आलोचना कहा जाता रहा है।

 

मैं सोचता हूँ कि, आलोचना के इस तीसरे रूप के लिए कहीं वह ‘स्पेस’ पहले से ही मौजूद नहीं है, या बिलकुल है ही नहीं, यानि कि, इस आत्म-संदर्भित का उद्वाचन, इस रचना का अपने आप में निहितार्थ निकालना, इस पुनरावृत्ति की सघन संरचना में, जैसा कि थोड़ी देर पहले मैंने होमर के बारे में चर्चा करते हुए कहा। क्या, इस वृत्तांश के विश्लेषण के लिए कोई ऐसी ‘स्पेस’ नहीं हो सकती, जिससे कि रचना हमेशा स्वयं के भीतर होकर, स्वयं की ओर संकेत करती है और स्वयं को भाषा के द्वारा, भाषा की पुनरावृत्ति के रूप में प्रस्तुत करती है? मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि शायद मुद्दा यही है, ‘रचना के स्वयं को निहितार्थ करने के विश्लेषण का अभीष्ट, उन संकेतों का विश्लेषण करना, जिससे रचना निरन्तर स्वयं के भीतर से, स्वयं की ओर ध्यान दिलाती रहती है। संक्षेप में, मेरे सोचने में यही है, जो कि इस विविध और बहुरूपी उद्यम, जिसे हम साहित्यिक विश्लेषण कहते हैं, को वास्तविक अर्थ प्रदान करता है।

और मैं यह भी दर्शाना चाहूँगा कि किस प्रकार ‘साहित्यिक विश्लेषण’ की यह अवधारणा, जो कि बहुतेरे विभिन्न व्यक्तियों- बार्थेस, स्टारोबिन्स्की, और आदि आदि- द्वारा प्रयोग और व्यवहार में लायी गई है, कैसे यह साहित्यिक विश्लेषण, चिन्तन का आधार बन सकता है, यानि कि, कैसे यह एक अर्ध-दार्शनिक मनन को खोल सकता है, अनावृत्त कर सकता है- क्योंकि मैं, उतना ही वास्तविक दर्शन करने का दावा नहीं करता, जैसा कि मैंने दावा किया था कि, साहित्यिक पेशेवर, वास्तविक साहित्य का सृजन करते हैं। मैं दर्शन का ‘प्रतिरूप’ में होऊँगा जैसे कि कल, साहित्य के ‘प्रतिरूप’ में था। इसीलिए, मैं जानना चाहूँगा कि, ये साहित्यिक विश्लेषण, हमें कहीं दर्शन के प्रतिरूप की ओर तो अग्रसर नहीं कर रहे हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि, साहित्यिक विश्लेषण की अभी तक खींची गयी रूपरेखा को, एक साथ, एक समूह में रखा जा सकता है और हम बेशक, उनकी दो विभिन्न दिशाएँ भी निर्धारित कर सकते हैं। प्रथम है, उन संकेतों की दिशा, जिसके द्वारा रचना स्वयं के भीतर से, स्वयं को संदर्भित करती है और दूसरी दिशा, उस तरीके से सरोकार व्यक्त करती है, जिससे कि वह दूरी जो रचना, स्वयं में धारण कर लेती है, वह स्थानिक हो सके।

मैं पहले, विशुद्ध रूप से क्रमानुसार, उन विश्लेषणों के बारे में कुछ बोलना चाहूँगा, जो कि किये जा चुके हैं, और जो सम्भवतः किए जा सकते थे यह दिखाने के लिए कि किस तरह साहित्यिक रचनाएँ आंतरिक रूप में, यह आत्म-संदर्भित होती रह सकती हैं। आप जानते हैं कि, यह अन्तर्विरोधात्मक रूप से अभी ही की खोज है कि साहित्यिक रचनाएँ, न तो विचारों से सृजित होती हैं, और न ही सौन्दर्य से, और विशेष तौर पर भावनाओं से भी नहीं, बल्कि, साहित्यिक रचनाएँ सृजित होती हैं, भाषा से। (जिसे भाषा से भाषा में जन्म लेना कहा है, विट्गेंस्टाइन ने -अनुवादक ) यानि कि, यह संकेतों की एक व्यवस्था पर आधारित है। परन्तु, संकेतों की यह व्यवस्था, पृथक्कृत नहीं है। यह एक पूरे, दूसरे संकेतों के संजाल का भाग है, वे संकेत, जो कि सारे समाज में प्रचलित हैं, वो संकेत, जो कि भाषिक संकेत नहीं हैं, बल्कि, संकेत, जो कि अर्थशास्त्रीय, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक और आदि आदि हो सकते हैं। जब भी, हम किसी संस्कृति के अस्तित्व में आने से लेकर उसके विकास और परिष्कार के इतिहास का अध्ययन करते हैं, तब एक ‘संकेतों के राज्य’ अस्तित्व में आता है, एक सामान्य ‘संकेतों का राज्य’, इसका अभिप्राय है कि हमें उन तत्वों को स्थापित करना होगा, जो कि मूल्यों को प्रकट

 

करने में सहायक हों और उन नियमों का भी जिनको वे प्रकट करने वाले तत्व, अपने प्रचालन में पालन करते है।

चूँकि, यह वाचिक संकेतों का सुविचारित हेरफेर है, हम इस बात को लेकर सुनिश्चित हो सकते हैं कि साहित्यिक रचना, क्षेत्रीय रूप में, एक सदैव झिलमिलाते हुये समानान्तर संजाल का हिस्सा है- फिर वह मौन हो या वाचाल, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता- कि, संस्कृति के इतिहास के प्रतिक्षण में, उसकी निर्मिति होती है, जिसे हम ‘संकेतों का एक राज्य’ कह सकते हैं। इसके फलस्वरूप, यह जानने के लिए कि साहित्य कैसे स्वयं को अर्थगर्भित बनाता है, हमें यह जानना होगा कि वह कैसे अर्थवान होता है, वह किसी समाज के संकेतों के जगत में कहाँ स्थित है, यह ऐसा कुछ है, जो कि समकालीन समाजों में कभी नहीं किया गया है, ऐसा कुछ जो कि किया जाना चाहिए, सम्भवतः किसी लेखन को, जो कि हमारी संस्कृति से अधिक प्राचीन है, उस लेखन को आदर्श मान कर ऐसा कुछ किया जाना चाहिए। मुझे यहाँ जार्ज ड्यूमेजील के इंडो-योरपीयन समाजों को लेकर किए गये काम की याद आ रही है।

ड्यूमेजील ने यहा दिखाया कि, किस तरह आइरिश किंवदन्तियाँ, स्केंडिनेवियन आख्यान, रोमनों की ऐतिहासिक कथाएँ, जैसी कि वे टाइटस-लिवियस में मिलती हैं, और आर्मेनियन किंवदन्तियाँ, ये सब जिन्हें हम भाषा-रचनाएँ कह सकते हैं। अगर हम ‘साहित्य’ शब्द का प्रयोग न करना चाहें तो, वे तमाम भाषा-रचनाएँ, वास्तविकता में, एक वृहद् और व्यापक संकेत संरचना के भाग हैं। और हम यह तभी समझ सकते हैं कि वे किंवदन्तियाँ वास्तव में क्या हैं, जब हम, उनके और, और उदाहरण के लिए, किसी दूसरी इंडो-योरपीयन समाज में पाई जाने वाली धार्मिक या सामाजिक रीतियों के मध्य एक संरचनात्मक एकरूपता पुनर्स्थापित करें? तब ही इसके तथ्य के प्रकाश में, हम यह देख सकते हैं कि, ऐसे समाजों में, साहित्य का प्रयोजन एक अत्यावश्यक सामाजिक और धार्मिक संकेत की तरह रहा है, और चूँकि, साहित्य ने उस सामाजिक और धार्मिक रीति के अर्थवान प्रयोजन होने के उत्तरदायित्व को स्वीकार कर लिया, इसलिए साहित्य अस्तित्व में रहा, और इस के ही कारण, वह सृजित भी हुआ और सर्वत्र ग्राह्य भी बना।

आज, यह बहुत संभव है- यह दर्शाना पड़ेगा, ऐसे में अपरिहार्य रूप से, हमें, हमारे आज के समाज में विद्यमान रहने वाले, उन संकेतों की प्रतिष्ठा स्थापित करनी पड़ेगी-चलिये कहिए कि अर्थव्यवस्था या उपभोग के संकेतों से हो, यह बहुत सम्भव है कि, साहित्य का सम्बंध अब धार्मिक संकेतों से न हो, बल्कि, उन संकेतों से ही हो। परन्तु, फिर भी अभी इस समय, हम यह नहीं जानते कि वे संकेत कैसे कार्य करते हैं। यह प्रथम लाक्षणिक परत है, साहित्य के द्वारा अधिकृत, उस अर्थवान क्षेत्र को स्थापित करना, जिसका हमें अन्वेषण करना होगा।

इस प्रथम लाक्षणिक परत की तुलना में, हम यह कह सकते हैं कि साहित्य निरपेक्ष है। निस्संदेह, साहित्य कार्य करता है, परन्तु ,जिस संजाल में वह कार्य करता है, वह न तो उसका है और न ही उससे शासित होता है। परिणामतः, हमें इस लाक्षणिक विश्लेषण को उस दिशा में धकियाना, या विकसित करना होगा, जहाँ पर एक दूसरी परत, जो कि रचना की अन्दरूनी परत है। इसका अर्थ यह कि हमें उस संकेत व्यवस्था की प्रतिस्थापना करनी होगी, जो कि इस संस्कृति में नहीं बल्कि, रचना के भीतर कार्य करे। यहाँ पर भी, एक तरह से हम, मूलभूत रूप में हम, अपवादों की ही चर्चा कर रहे हैं। फर्डिनाण्ड द सास्यूर कई कार्य-पुस्तिकाएँ छोड़ गए हैं, जिसमें उन्होंने, दरअस्ल, रोमांस भाषाओं के साहित्य में, ध्वन्यात्मक या अर्थगत संकेतों के प्रयोगों और संरचनाओं को परिभाषित करने का प्रयास किया है। वे सारे पाठ स्टारो बिन्स्की ने डमतबनतम कम थ्तंदबम में प्रकाशित किए हैं। उस प्रकाशन में, वे उस विश्लेषण की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं, जिसमें साहित्य, मूलरूप से वाचिक संकेतों के संयोजन की तरह प्रस्तुत है। कुछ रचनाकार ऐसे हैं, जिनके लिए यह विश्लेषण अत्यन्त सरल है। चार्ल्स पेगी, रेमण्ड रुसेल का नाम याद आता है, और बेशक तमाम अति-यथार्थवादियों का भी।

और इसके अलावा, इन वाचिक संकेतों के विश्लेषण में, इसके अलावा, आप कह सकते हैं, संभवतः एक प्रकार की लक्षण-विज्ञानी विश्लेषण की दूसरी परत भी हो सकती है, और वह एक परत, जो कि सांस्कृतिक कोरी लाक्षणिकता की होने के बजाए भाषिक लाक्षणिकता की होगी, जो कि उन विकल्पों को परिभाषित करेगी, जो चयन के लिए उपलब्ध हैं, वे संरचनाएँ, जिनके अधीन वे विकल्प हैं, और वे विकल्प क्यों चुने गए, और उस व्यवस्था के हर बिन्दु पर किस मात्रा की अव्यक्तता उपलब्ध की गई, और जो रचना की आन्तरिक संरचना को अर्थवान बनाता है। संभवतः, संकेतों की एक तीसरी परत भी है, संकेतों का एक तीसरा संजाल, जिसका प्रयोग, साहित्य के द्वारा, स्वयं को अर्थवान बनाने के लिए होता है। इसमें, वे संकेत सम्मिलित होंगे, जिन्हें रोलाँ बार्थ ‘लेखक के संकेत’ कहते हैं। यानि कि, वे संकेत जिनके द्वारा लेखन तात्कालिक संम्प्रेषण के प्रभाव क्षेत्र के बाहर जाकर, रीतिबद्ध होता है।

हम, अब यह जानते हैं कि, लेखन, किसी एक युग के सूत्रों और कुछ विशिष्ट सूत्रों के सम्मिश्रण का प्रयोग भर नहीं है। लेखन, थोड़ी सी प्रतिभा, थोड़ी सी औसत बुद्धिमत्ता या प्रतिभा संपन्नता का मिश्रण भी नहीं है, बल्कि, लेखन का उद्देश्य सिर्फ उन संकेतों का प्रयोग है जो कि लेखन के संकेतों के अलावा और कुछ नहीं हैं। वे संकेत शब्द हो सकते हैं, या कुछ तथाकथित अभिजात शब्द भी हो सकते हैं, परन्तु, अधिकतर वे गहन भाषिक संरचनाएँ हैं, जैसे फ्रेंच में क्रिया-काल। जैसे उदाहरण के लिए, फ्लूबेर का लेखन- हम यही बात बाल्जाक से लेकर प्रूस्त तक, सारे क्लैसिकल फ्रेंच के कथानकों के लिए कह सकते हैं- मूलतः, कुछ विशिष्ट संयोजनों, और अपूर्ण, अतीत- ऐतिहासिक, उत्तम और पूर्णभूत काल के विशिष्ट सम्बन्धों से बना हुआ है, यह ऐसा समूह है जो कि हमारे या आपके द्वारा बोली जानी वाली भाषा या अखबार में भी, उन्हीं मूल्यों के साथ नहीं मिलेगा। फ्रेंच कथानक में, इन चार कालों का संयोजन है, वह है जो कि, एक साहित्यिक कथानक की स्थापना करता है।

अंततः, हमें एक चौथी लाक्षणिक परत, जो कि और अधिक सीमित और पृथक है, को जोड़ने की आवश्यकता है। यह, जिसे हम कह सकते हैं निहितार्थ या जिसे कहें कि स्व-निहितार्थ होने के संकेतों का अध्ययन होगा। यह वह संकेत है, जिससे, रचना, आंतरिक रूप से आत्म-संदर्भित होती है, स्वयं की एक विशिष्ट रूप में, एक विशिष्ट चेहरे के साथ अपनी पुनर्प्रस्तुति करती है। बहुत पहले मैंने, ज्ीम व्कलेेमल की पुस्तक 8 की चर्चा की थी, जिसमें यूलिसिस, भाट के द्वारा गाये हुए यूलिसिस के साहसिक कार्यों को सुनता है। इस दृश्य में कुछ विशिष्ट लक्षण हैं। क्योंकि, यूलिसिस, जिसे अभी तक च्ींमंबपंदे ने पहचाना नहीं है, जब वह भाट को अपने स्वयं के कारनामों के बारे में गाते हुए सुनता है तब, वह अपना सिर झुका कर, अपना चेहरा छुपा लेता है, और जैसा कि होमर के पाठ में वर्णित है, ठीक उसी तरह रोने लगता है, जिस तरह स्त्रियाँ, जब युद्ध के बाद अपने पति का शव देखती हैं और विलाप करती हैं।

यहाँ, साहित्य का आत्म-निहितार्थ होने का संकेत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि, यह एक रीति है, विशिष्ट रूप से, शोक की रीति। यानि कहने का तात्पर्य यह कि, रचना स्वयं को सिर्फ मृत्यु के समय में ही आत्म-सन्दर्भित करती है, और वह भी सिर्फ नायक की मृत्यु के समय। रचना सिर्फ उस सीमा तक अस्तित्व में रहती है, जब तक नायक, जो कि रचना में जीवित है, फिर भी पहले से ही, उस सृजित की गई कथा के सम्बन्ध में मृत है।

अगर, हम इस स्व-निहितार्थ होने के संकेत का, प्रूस्त की रचना के स्व-निहितार्थ होने के संकेत से तुलना करें, तो हमें कुछ अत्यन्त रोचक और चारित्रिक भिन्नताएँ मिलेंगी। In Search fo Lost Time में मिलने वाला आन्तरिक आत्म-निहितार्थ, इसके उलट, एक कालातीत दीप्ति के रूप में प्रकट होता है, जब अचानक, एक कसीदे काढ़ा हुआ रुमाल, या एक मेडलिन (एक मिठाई-अनु.), या गेख्मांटे (उत्तरी फ्रांस का एक कस्बा-अनु.) के प्राँगण की जमीन पर लगे हुए बटिया पत्थरों की असमतलता में, जो कि वेनिस की गलियों में लगे हुए बटिया पत्थरों की असमतलता की याद दिलाती है। तब रचना की कालातीत जैसी ‘कुछ’, प्रकाशित, और अत्यन्त आनन्ददायक उपस्थिति, उस व्यक्ति के सामने प्रकट होती है, जो कि उस रचना को लिखने की प्रक्रिया में है। इस कालातीत प्रदीपन और यूलिसिस के अपने मुँह छुपाने और उस स्त्री की तरह विलाप करने के, जिसने अपने पति का युद्ध से लाया गया शव देखा है, के दृत्य के मध्य आप देख सकते हैं कि एक मूलभूत अन्तर है और रचनाओं के ऐसे आन्तरिक आत्म-निहितार्थक संकेतों का, लक्षण-विज्ञान, हमें निश्चित रूप से साहित्य की प्रकृति के बारे में कई चीजें बताएगा। परन्तु, ऐसा प्रयास कभी किया ही नहीं गया। अगर, मैंने इन विभिन्न लाक्षणिक परतों पर बल दिया है तो वह इसलिए क्योंकि, आजकल, भाषिक और लक्षण-वैज्ञानिक विधियों के साहित्य में प्रयोग को लेकर, कुछ भ्रामक स्थिति बनी हुई है। आजकल, कुछ लोग ऐसे हैं जो कि सब चीजों के लिए भाषा- वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करते हैं और साहित्य के साथ भाषा के एक निर्मम तथ्य की तरह व्यवहार करते हैं।

यह सत्य है कि साहित्य भाषा से बना है, ठीक वैसे ही, जैसे कि स्थापत्य, पाषाणों से बना है। परन्तु, हमें इस तरह किसी ऐसे निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाना चाहिए कि हमें साहित्य पर किसी भी प्रकार से उन संरचनाओं, अवधारणाओं, और नियमों को लागू करना चाहिए जो कि सामान्यतः भाषा के लिए वैध हैं। दरअस्ल, जब हम लाक्षणिक‘ विज्ञान की प्रविधियाँ जब साहित्य पर लागू करते हैं, तब हम दो बार भ्रम के शिकार होते हैं। एक तरफ तो, हम संकेतों के क्षेत्र की सामान्यतः किसी विशिष्ट अर्थवान बनाने वाली संरचना के पुनरुपयोग का आश्रय लेते हैं, यानि कि हम यह भूल जाते हैं कि भाषा अंततः, संकेतों की एक व्यापक व्यवस्था, (जैसे कि, धार्मिक, सामाजिक, और आर्थिक संकेतों की, जिनकी चर्चा मैंने पहले की) उसी की एक व्यवस्था है। और, वहीं दूसरी ओर, साहित्य पर, अपरिपक्व भाषिक विश्लेषण लागू करते हुए, हम यह भूल जाते हैं कि, साहित्य कुछ अत्यन्त विशिष्ट अर्थ-गर्भित बनाने वाली संरचनाएँ जो कि भाषा की प्रातिनिधिक संरचनाओं से कहीं अधिक महीन हैं (और विशेष रूप से आत्म-निहितार्थक संकेतों का, जिनका मैंने पहले जिक्र किया) को प्रयोग में लाता है। दरअस्ल, वे संकेत सिर्फ और सिर्फ साहित्य में ही अस्तित्व में आते हैं और सामान्यतः उनका उदाहरण भाषा में कहीं और पाना लगभग असम्भव है।

अगर दूसरे शब्दों में कहें तो, साहित्य का विश्लेषण, अभिरंजकों और आत्म-अभिरंजकों, की तरह सिर्फ भाषा के आयाम पर ही लागू नहीं होता। यह संकेतों की उन क्षेत्रों में सन्निहित है, जो कि अभी ‘वाचिक’ ही नहीं हुए हैं, और, वहीं दूसरी ओर, यह उन संकेतों की ओर खींचा हुआ है, फैला हुआ है, और बढ़ा हुआ है, जो कि वाचिक संकेतों से कहीं अधिक जटिल है। इसीलिए ,साहित्य जो है, वह सिर्फ उसी हद तक, केवल किसी एक ‘अर्थगत’ सतह तक सीमित नहीं है, यानि, वाचिक संकेतों की इकहरी सतह तक। यथार्थ में, साहित्य संकेतों की ऐसी कई सतहों में भी वह ऊर्ध्वाधर रहता है। आप यह कह सकते हैं कि, साहित्य गहन रूप में अर्थ-बहुल है, लेकिन उस रूप में नहीं जैसा कि कोई एक सन्देश बहुतेरे अर्थ लिए होता है, और न ही साहित्य द्वि-अर्थी है, परन्तु फिर भी वह एक अभिनव प्रकार से अर्थ-बहुल है। वास्तव में, साहित्य अर्थ-बहुल है, जिसका अर्थ है कि, सिर्फ एक चीज कहते हुए या कहिए कि सम्भवतः कुछ भी न कहते हुए। क्योंकि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि साहित्य को कुछ कहना ही है- खैर, साहित्य कुछ कहे या ना कहे, साहित्य कई लक्षण-वैज्ञानिक सतहों (कम से कम वे चार परतें जिनके बारे में मैंने पहले चर्चा की।) के पारगमन के लिए बाध्य है, और उन चार परतों में, साहित्य उसकी पहचान करता है, जो उसे एक ‘निश्चित रूप’ गढ़ने के लिए चाहिए, ऐसा ‘रूप’, जिसका गुणधर्म आत्मनिष्ठ होना है। इसका आशय यह कि साहित्य, समाज और संस्कृति में, विभिन्न परतों में उपस्थित संकेतों का ऊर्ध्व रूप में पुनसंर्योजन है। साहित्य, मौन पर आधारित नहीं हो सकता। यह मौन की ‘अकथनीयता’ नहीं है, साहित्य उसका, जो कहा नहीं जा सकता‘ और ‘जो कभी कहा भी नहीं जाएगा का प्रवाह नहीं है।

यथार्थ में, साहित्य सिर्फ उसी हद तक अस्तित्व में है, जब तक कि हम उसके बारे में बात करना जारी रखें, जब तक कि हम उसके संकेतों को प्रचलन में रखने में उसकी मदद करें। ऐसा इसलिए क्योंकि, साहित्य, हमेशा संकेतों से घिरा रहेगा, और चूँकि संकेत बोलते हैं, इसीलिए साहित्य जैसा कुछ भी बोलता है। तो, अगर हम एक मोटे तौर पर इसका खाका खींचें तो हम यह कह सकते हैं कि, हम साहित्यिक विश्लेषण को, इस दिशा की ओर अग्रसर होते हुए देख सकते हैं, वह दिशा जो कि, शब्द के कठोर अभिप्राय में, लक्षण-विज्ञानी है। मुझे ऐसा लगता है कि दूसरा दृष्टिकोण, जिससे कि हम लगभग परिचित हैं, वह रचना की अर्थ-गर्भित और अर्थवान बनाने वाली संरचनाओं को सम्मिलित नहीं करेगा, बल्कि, उसका अवकाशीय होगा।

काफी लम्बे समय तक, यह माना जाता था कि भाषा का ‘काल’ से गहरा सम्बन्ध है। निस्संदेह, इस विश्वास के बहुतेरे कारण भी विद्यमान थे। क्योंकि, भाषा ही, मूल रूप में किसी कथा के सृजन को सम्भव बनाती है और, उसके साथ ही साथ, वह कथा को भरोसा दिलाने की अनुमति भी देती है। भाषा मूलतः ऐसा कुछ है, जो कि काल को ”बांधती“ है। और भाषा, ‘काल’ को स्वयं के भीतर एकत्र भी करती है क्योंकि, वह लेखन है, और, लेखन की ही तरह वह स्वयं को, और जो वह कह रही है उसे भी, ‘काल’ में जारी रखती है। संकेतों से ढँकी हुई वह परत, गहराई में, सिर्फ अवधि का अवकाशी छल है। अतः, इसीलिए, ‘काल’ को भाषा में ही प्रकट होने के लिए बाध्य किया जाता है, और भाषा में ही, ‘काल’, इतिहास के रूप में, स्वयं के बारे में चेतस होता है। और यह हम हर्डर से लेकर हाइडेगर तक के लिए कह सकते हैं, कि प्रतीकों के रूप में भाषा का मुख्य कार्य समय को संजोना है, उसके ऊपर चौकसी रखना है, और स्वयं को, गुजरते ‘काल’ के साथ जारी रखना है, और इसके साथ ही साथ, ‘काल’ को भी, अपने अचल अवलोकन के अंतर्गत जारी रखना है।

मेरा ऐसा मानना है कि किसी ने भी कभी ऐसी अपेक्षा नहीं की थी कि, भाषा अन्ततः ‘काल’ नहीं, बल्कि, ‘स्पेस’ है। किसी ने भी नहीं, सिवाय एक व्यक्ति के, और जिसे मैं बहुत पसन्द नहीं करता फिर भी, जिसका उल्लेख करने के लिए मैं बाध्य हूँ, वह है बर्गसाँ । बर्गसाँ का यह विचार था कि भाषा, ‘काल’ के बारे में नहीं है, बल्कि, ‘स्पेस’ के बारे में है। परन्तु, इस विचार के साथ एक समस्या थी, वह यह कि बर्गसाँ ने, इस अवलोकन से एक नकारात्मक निष्कर्ष निकाला। और उन्होंने, स्वयं से कहा कि, अगर भाषा ‘काल’ के बजाए ‘स्पेस’ है, तो फिर यह, भाषा के लिए अत्यन्त अशुभ है। और क्योंकि, दर्शन, जो कि, अन्ततः, भाषा है, का ‘सार’, काल का ‘चिन्तन’ है। तब उन्होंने दो निष्कर्ष निकाले। पहला यह कि, दर्शन को भाषा और ‘स्पेस’ को दरकिनार करना होगा ताकि वह ‘काल’ को बेहतर अवधारित कर सके, और दूसरे, ‘काल’ को अवधारित और अभिव्यक्त करने में सक्षम होने के लिए, भाषा से कतराना होगा, और, अन्त में, जो भी भाषा में सघनता से ‘अवकाशी’ था, उसे छोड़ना होगा। और इन शक्तियों को, या इस प्रकृति को या भाषा की इस अवकाशी सघनता को, निष्प्रभावी बनाने के लिए भाषा को स्वयं के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य करना होगा। कहना चाहिये कि एक प्रकार से, शब्दों को शब्दों के प्रतिशब्दों के विरुद्ध प्रयोग करना होगा।

तब इस घड़ी में, इस आघात से, इन शब्दों को, एक दूसरे में गूँथने से जहाँ हर शब्द की अवकाशीय गुणवत्ता छिन्न-भिन्न हो जाएगी, मिट जाएगी, नेस्तनाबूद हो जाएगी, दूसरे शब्दों की अवकाशीय गुणवत्ता से इस अंतरक्रीड़ा से जो कि शब्द के सुनिश्चित अर्थ में, रूपक है (बर्गसाँ के लिए रूपकों का महत्त्व यहीं से आता है), उन्हें लगा कि, भाषा की, इस स्वयं के विरुद्ध क्रीड़ा के कारण, रूपकों द्वारा इस अवकाशीयता को निष्प्रभावी बनाने के इस खेल के कारण, संभवतः कुछ जीवन्त हो उठेगा या कम-ज-कम, कुछ होगा, और वह काल का प्रवाह होगा।

दरअस्ल, जो अब प्रकट हो रहा है, और उन हजारों मागोंर् द्वारा जो कि लगभग सारे के सारे अनुभवजन्य हैं, वह यह है कि, भाषा ही ‘स्पेस’ है। भाषा ‘स्पेस’ है, हम यह विस्मृत कर चुके थे, क्योंकि, भाषा ‘काल’ के भीतर कार्य करती है- यह एक वाचिक माला है- और उसका कार्य समय को अभिव्यक्त करना है। परंतु, भाषा का कार्य ही उसका ‘होना’ नहीं है, और भाषा का ‘होना’, अगर उसका कार्य ‘काल’ होना है, तब, तो भाषा का ‘होना’, ‘स्पेस’ ही है। ‘स्पेस’, क्योंकि, भाषा के हर तत्व का अर्थ एक नैरेटिव संजाल के भीतर ही है। ‘स्पेस’, क्योंकि, हर शब्द या अभिव्यक्ति का भाषिक मूल्य किसी सारणी या रूप तालिका के विभाजन से परिभाषित है, ‘स्पेस’, क्योंकि, इन तत्वों का अनुक्रम, इन शब्दों की व्यवस्था, विभिन्न शब्दों के मध्य सहमति, वाचिक शृंखला की लंबाई, ये सभी, कम या ज्यादा गुँजाइश के साथ, वाक्य विन्यास की समकालिक, संरचनात्मक, और इसके फलस्वरूप, अवकाशीय, आवश्यकताओं को निर्देश मानते हैं। और, अन्त में, फिर ‘स्पेस’ क्योंकि, आम तौर पर, कोई भी संकेत, किसी दूसरे अर्थप्रदत्त संकेत के द्वारा अर्थवान नहीं बनता, सिवाए प्रतिस्थापन के नियमों के, या तत्वों के संयोजन से। और, इसीलिए, किसी समूह पर निश्चित निर्धारित विधानों के- और इसके परिणामतः किसी ‘स्पेस’ में ही।

काफी लंबे समय तक, लगभग आज तक, मुझे ऐसा लगता है कि, संकेतों के घोषणात्मक और आवृत्तिमूलक कार्य, जो कि, निश्चित रूप से कालिक हैं, उन्हें भ्रमवश यह मान लिया गया कि ये वे कार्य हैं जिनसे संकेत, संकेत बनता है और वह जो संकेत को, संकेत बनाता है, वह समय नहीं, बल्कि, ‘स्पेस’ है। ईश्वर का शब्द, क्योंकि, उसी के कारण सृष्टि के अन्त के संकेत, सचमुच, सृष्टि के अन्त के संकेत हैं, ईश्वर का वह शब्द, वह काल में अवस्थित नहीं है। वह, निश्चित रूप से स्वयं को किसी काल में प्रकट कर सकता है, यह शाश्वत है, यह उन सब संकेतों के संदर्भ में वर्णनात्मक है, जो कि किसी न किसी चीज को अर्थवान बनाते हैं। साहित्यिक विश्लेषण का कोई अंतर्निहित अर्थ, तब तक व्यक्त नहीं होगा, जब तक कि वह उन सारी कालिक रूप रेखाओं का परित्याग नहीं कर देता, जिनमें वह भाषा और समय के भ्रम के कारण उलझा हुआ है। और उन्हीं रूप रेखाओं में से एक है, सृजन का मिथक।

अगर आलोचना ने, अभी तक, प्रारम्भिक सृजन के इस क्षण की, जो कि वह क्षण होगा जब रचना अपने जन्मने की प्रक्रिया में होती है और फलित हुई है, की पुनर्प्रतिष्ठा का दायित्व और भूमिका संभाली है, तो वह सिर्फ इसलिए क्योंकि, आलोचना ने भाषा के कालिक मिथक का आदेश पालन किया है। आलोचना की हमेशा से ही यह आवश्यकता रही है, सृजन के मागोंर् के पुनरान्वेषण के प्रति विषाद रहा है, पुनसंर्गठन का, अपने स्वयं के आलोचनात्मक आख्यानों में, जन्म (आदि) और समाप्ति (अन्त) के समय का निर्धारण, (जो कि, जैसा माना जाता रहा है) रचना के रहस्यों से भरा हुआ है। आलोचना, सृजनात्मक है, अगर आप कहना चाहें कि, उस सीमान्त तक कि, वह उसकी भाषा के संकल्पना काल से जुड़ी हुई है, यहाँ तक कि भाषा को ही काल समझा जाता था। आलोचना, ठीक उसी तरह सृजन में भरोसा रखती थी, जिस तरह वह मौन में विश्वास रखती थी।

मुझे ऐसा लगता है कि, रचना की भाषा का, एक ‘स्पेस’ की तरह विश्लेषण किया जाना चाहिए। दरअस्ल, कुछ व्यक्तियों ने ऐसा करने का प्रयास भी किया है, और कई दिशाओं में करने का किया है। मैं एक बार फिर सिर्फ सैद्धान्तिक रूप से उन चीजों का वर्णन करूँगा, जो कि, रूप रेखाओं से अधिक कुछ और नहीं है, परन्तु, मैं सोच रहा हूँ कि क्या हम, एक स्थूल रूप में, ऐसा कुछ नहीं कह सकते?

पहला, यह स्पष्ट है कि, जटिल सांस्कृतिक संयोजनों के साथ, अवकाशी मूल्य भी जुड़े हुए हैं और जो उस संस्कृति में उत्पन्न होने वाली हर रचना और हर ’भाषा’ का अवकाशीकरण करते हैं। उदाहरण के लिए, मैं सोच रहा हूँ, पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर, अनुमानतः सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक के वर्तुल का ‘स्पेस’- वह कालावधि, जो कि ‘मध्य युग’ के अन्त का समय, रेनेसां से लेकर, ‘क्लैसिकल’ युग के प्रारम्भ तक। उस समय, यह वृत्त, न तो साहित्य में और न ही शास्त्र में एक विशेषाधिकार प्राप्त इकाई था, बल्कि दूसरे कई ‘रूपों’ के मध्य एक और ‘रूप’ की तरह था। यथार्थ में, यह वृत्त, वास्तविकता में, एक अवकाशीय ‘रूप’ था, परम, आरम्भिक जगह, जहाँ पर रेनेसां और बारोक संस्कृति के दूसरे सारे ‘रूप’ उपस्थित थे। गोल घेरा, केंद्र, गुंबज, प्रकाशित ग्लोब, ये सब, उस समय के लोगों के द्वारा यूँही चयनित रूप नहीं हैं, ये एक तरह से वे मुहिमें हैं, जिनसे उस संस्कृति और भाषा के सारे ‘स्पेस’ मौन रूप से वर्णित हैं। निस्संदेह, यह अनुभावजन्य रूप में खोजा गया कि, पृथ्वी गोल है और जिसने वर्तुल के महत्त्व को स्थापित किया, और यह कि पृथ्वी खगोलीय वर्तुल और उसके भीतरी कक्ष की एक ठोस, स्याह, और आत्म-परिवृत्त छवि है, और साथ ही यह विचार भी कि, मानव, इसी प्रकार से, एक अत्यन्त सूक्ष्म, गौण वर्तुल है, जो कि पृथ्वी के अन्तरिक्ष और साथ ही साथ ईथर के जगत में स्थित है।

क्या ये खोजें और विचार हैं, जिन्होंने इस वर्तुल को उसका महत्त्व प्रदान किया? संभवतः यह एक महत्त्वपूर्ण समस्या नहीं है। जो निश्चित है, वह यह है कि, और जिसका हम विश्लेषण करने में सक्षम हैं, वह यह है, प्रतिनिधित्व अपने सर्वव्यापक अर्थ में-छवि, आविर्भाव, सत्य, अनुरूपता- पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक, वर्तुल के मूलभूत ‘स्पेस’ में प्रस्तुत किया जाता था। जो तय है, वह यह है कि, क्वात्रोसेंतो (पन्द्रहवीं शताब्दी की कला और संकृति की घटनाओं को दिया जाने वाला नाम- अनु.) चित्र का चित्रात्मक घन, अब खोखले अर्ध-वर्तुल के द्वारा विस्थापित हो चुका था, जिसमें चित्रों के द्वारा प्रतिनिधित्व की गई आकृतियाँ, पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और विशेष कर सोलहवीं शताब्दी तक विस्थापित हो चुकी थीं। जो तय है, वह यह भी है कि, भाषा भी स्वयं पर दुहरी होने लगी थी और घुमावदार रूपों का आविष्कार करने लगी थी, अपने प्रस्थान बिन्दु पर पुनः लौटने लगी थी। उदाहरण के लिए, Pantagruel (The Life fo Gargantua and fo Pantagruel) की अकल्पनीय समुद्र यात्रा, अपने अस्पष्ट प्रस्थान बिन्दु पर आकर ही समाप्त होती है, और उन आह्लादक पृथ्वियों का आह्वान करती है, जैसे, ओलिंपस, थेसेली, मिस्र, लीबिया और खाब्ले आगे जोड़ते हैं, ‘यहूदी समुद्र का एक हाईपरबोरियन (ग्रीक मिथक की एक मिथकीय प्रजाति-अनु.) द्वीप’। परन्तु, एक बार, जब हम इस पृथ्वी से पार हो जाते हैं, उन सारे द्वीपों से पार हो जाते हैं, जब हम अपनी यात्रा के सबसे दूरस्थ बिन्दु पर आते हैं, जब हम पूरी तरह खो जाते हैं, तब यह भूमि, खाब्ले आगे कहते हैं कि, उसी तरह गरिमामय है जैसे कि तूरेन का देहात। दरअस्ल, यह वही देहात है, निस्संदेह, यात्रियों का प्रस्थान बिन्दु, उनकी दूसरे द्वीपों की समुद्र यात्रा का आरंभ स्थल। तो, इतनी लम्बी समुद्र यात्रा की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। क्योंकि, वे कहीं गए ही नहीं, या शायद पुनः प्रस्थान की कोई आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि, जब वे तूरेन में ही हैं, ठीक उसी समय जब वे पुनः प्रस्थान की तैयारी में व्यस्त हैं, क्योंकि वे पुनः एक नई समुद्र यात्रा पर जाने वाले हैं। खैर, किसी भी हाल में, यह वृत्त बिना किसी अन्त के पुनः प्रारम्भ होता है।

संभवतः पुनर्जात प्रतिनिधित्व के इस वर्तुल में, जो कि विलगाव से, उसके विस्फोटन से, या घूम कर स्वयं पर ही पुनः लौटने ने, हमें मध्य सत्रहवीं शताब्दी तक, दर्पण, सतरंगी बुलबुले, वर्तुल, कुंडलाकार, और वे प्रचुर वस्त्र जो कि देह पर एक ‘हेलिक्स’ की भाँति लिपट कर ऊपर चढ़ते जाते हैं, जैसे, मुख्य बारोक आकृतियों की तरह। मेरा मानना है कि साहित्यिक रचनाओं के अवकाशीय आयाम का एक साधारण सा विश्लेषण तो कर ही सकते हैं, और कई ऐसे निबन्ध भी हैं, जो कि महज संक्षिप्त विवरणों से कहीं अधिक हैं-वह अपने आप में विश्लेषण जैसे कि, उदाहरण के लिए जार्ज पूले के।

 

यह भी संभव है कि भाषा का यह सांस्कृतिक अवकाशीय आयाम, एक व्यापक रूप में, रचना को सिर्फ बाह्य रूप में ही पकड़ सके। परन्तु, दरअस्ल, रचना के भीतर भी एक अवकाशीयता अवस्थित है। यह आन्तरिक अवकाशीयता उसका संयोजन नहीं है, और न ही वह, जिसे हम परम्परागत रूप से, उसकी लय या गति कहते हैं। एक प्रकार से ये एक गहरा ‘स्पेस’ है जिससे और जिसमें रचना के विभिन्न रूप उदित और प्रचलित होते हैं। इस प्रकार के विश्लेषण भी किए गए हैं, ज्यादातर ज्यां स्टारोबिन्स्की के द्वारा, रूसो के बारे में उनकी पुस्तक में, और ज्याँ रुसे के द्वारा Forme et signification में। और विशेष रूप से मुझे स्मृति हो रही है- और मैं सिर्फ उस पाठ का उल्लेख भर कर रहा हूँ ताकि आप उसे बाद में देख सकें- मैं सोच रहा हूँ कोर्निए के वृत्त और पेचक के ज्याँ रूसे द्वारा अद्भुत विश्लेषण का। वे यह दर्शाते हैं कि, किस तरह कोर्निए की नाटय् रचनाओं, Galerie du Palais से ले कर Cid तक, ने एक वृत्ताकार अवकाश का आज्ञा पालन किया, यानि कि, दो पात्र प्रस्तुत किए जाते हैं, जिनका नाटक के प्रारम्भ में पुनर्मिलन होता है।

नाटक का प्रारम्भ उस सीमा तक होता है कि वे पात्र बिछुड़ जाते हैं, और, फिर, नाटक के मध्य में वे फिर मिलते हैं, वे मिलते हैं परन्तु वे एक दूसरे को पार कर जाते हैं, उनका समन्वय सम्भव लेकिन अधूरा होता है। यह कथा है रोद्रिगे और शिमेने की, जिनका पूरी तरह से पुनर्मिलन असंभव है। क्योंकि, जो कुछ अब तक कथानक में हुआ है। और इस तरह वे पुनः एक दूसरे से बिछुड़ जाते हैं और फिर नाटक के अन्त में, उनका पुनर्मिलन होता है। यह एक वृत्त की आकृति बनाता है, अंक आठ की आकृति बनाता है, गणित में ‘अनन्त’ का चिह्न बनाता है, जो कि, कोर्निए की रचना में अवकाशीयता को चित्रित करता है। और पोलिउक्त एक प्रकार से उस ऊर्ध्वाधार गति के प्रस्फुटन का प्रतिनिधित्व करता है, जो कि कोर्निए की रचनाओं में पहले अस्तित्व में नहीं थी। वहाँ पर भी हमें उस अंक आठ की आकृति देखने में आती है, और दो पात्र, पोलिउक्त और पोलीन जो कि बिछुड़ गए थे, वे नाटक के शुरुआत के पहले पुनः मिलते हैं, वे बिछुड़ जाते हैं, फिर मिलते हैं, एक बार फिर बिछुड़ जाते हैं और अंत में, एक बार फिर उनका पुनर्मिलन होता है। परन्तु, यह बिछुड़ना उन घटनाओं के कारण नहीं है, जो कि उसी धरातल पर घटती हैं, जिस पर पात्र उपस्थित हैं। यह मूलतः उस ऊर्ध्वाधार गति के कारण है जो पोलिउक्त के परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है। इसे रखने का दूसरा तरीका यह है कि, यह मिलने और बिछुड़ने के कारक, एक प्रकार की लम्बवत संरचना है जिसकी परिणति ईश्वर में होती है। और उस क्षण के बाद से, पोलिउक्त, पोलीन से अलग होने लगता है ताकि वह ईश्वर से जुड़ सके, एक चक्राकार जो कि पोलिउक्त और कोर्निए के उत्तरवर्ती लेखन को, एक ‘हेलिकल’ गति दे सके, उस प्रकार का ऊर्ध्वाधार वस्त्र-विन्यास, जो कि संभवतः उस कालावधि के बारोक शिल्पों से संबन्धित है।

और अन्त में, साहित्यिक रचनाओं के अवकाशीयता के विश्लेषण की एक तीसरी संभावना, रचना के भीतर की भाषा की अवकाशीयता के अध्ययन से मिल सकती है, बजाए सामान्य रूप से रचना की अवकाशीयता से। इसका अर्थ है, उस ‘स्पेस’ का प्रकटीकरण, जो कि न तो संस्कृति का है, न ही रचना का, परन्तु भाषा स्वयं का ‘स्पेस’ है, उस सफेद कागज के पृष्ठ पर रखा हुआ, एक भाषा, जो कि, अपनी प्रकृति से, एक ‘स्पेस’ का संगठन करती है और उसे खोलती है, प्रायः एक अत्यधिक जटिल ‘स्पेस’, जो कि अन्ततः मलार्मे की रचनाओं में साकार हुआ- यह अबोधता का, कौमार्य का, धवलता का ‘स्पेस’ है। यह खिड़की के दरवाजे के काँच का स्पेस भी है, जो कि, उस शीत का, उस बर्फ का, उस तुषार का भी स्पेस है, जिसमें कि चिड़िया फँस जाती है।

यह वह स्पेस है जो कि कसा हुआ और समतल है, और जो बन्द है और जो स्वयं पर ही दुहरा हो जाता है। कहना चाहिए कि वह अपनी सारी धर्मसंगतता के सारे गुणों के लिए प्रकट है, यह प्रकट है, उस वेधी त्राटक-दृष्टि (यह शब्द अनुवादक का) के लिए भी, जो कि उसकी संवीक्षा कर सके, परन्तु यह त्राटक-दृष्टि, उसे छू कर भी जा सकती है। यह मुक्त स्पेस, एक ही समय में, एक पूर्णरूपेण परिबद्ध स्पेस भी है। यह स्पेस, जिसकी हम संवीक्षा कर सकते हैं, ऐसा स्पेस है जो जमा हुआ जान पड़ता है और पूरी तरह बन्द भी है। मलार्मे की वस्तुओं का यह स्पेस, मलार्मे की झील का यह‘स्पेस’ उनके शब्दों का स्पेस भी है। उदाहरण के लिए, उन मूल्यों को लीजिये जो कि, ज्याँ-पियरे रिचर्ड द्वारा, बहुत शानदार तरीके से, विश्लेषित किए गए हैं, मलार्मे की रचना में पंखे और पंख के मूल्य। पँखा और पँख, जब खुले हुए होते हैं, तब वे अपने पर पड़ने वाली दृष्टि से छुपाना उनका गुणधर्म होता है। अपनी पूर्णता में पँख, पक्षी को दिखने से छुपाता है, और इसी तरह पँखा चेहरे को छुपाता है। पँखा और पँख, दृष्टि से गुप्त रखते हैं, छुपाते हैं, वे सुरक्षा और दूरी प्रदान करते हैं, परन्तु वे उसी हद तक छुपाते हैं, जिस हद तक वे प्रकट भी करते हैं, यानि कि, उस हद तक कि जहाँ तक हम पँख, के सतरंगी चटकीलेपन को प्रकट पाते हैं, या पँखे की परिकल्पना को प्रकट पाते हैं। परन्तु, जब वे बन्द होते हैं, उसके उलट, पँख हमें पक्षी को देखने देते हैं, और पँखा, हमें चेहरा देखने देता है, वे हमें आने की अनुमति देते हैं, जब वे खुलते हैं तब, वे उसे पकड़ने या एकटक देखने की अनुमति देते हैं, जो अभी ही उन्होंने छुपाया था, परन्तु जैसे ही वे लिपटाए जाते हैं, वे जो कुछ भी अभी दृश्य था और प्रकट था,उसे आवृत्त कर लेते हैं, उसे छुपा देते हैं। अतः, पँख, और पँखा,अनावरण के एक अस्पष्ट क्षण, जो कि रहस्य का क्षण भी है, की निर्मिति करते हैं। वे सारा जो कुछ भी दृष्टव्य है,उस पर आवरण के क्षण की निर्मिति करते हैं और साथ ही साथ, उनके प्रदर्शन के क्षण की भी निर्मिति करते हैं।

मलार्मे की वस्तुओं का यह अस्पष्ट स्पेस, जो एक ही साथ प्रकट भी करता है और छुपाता भी है, संभवतः मलार्मे के शब्दों का स्पेस भी है, स्वयं शब्द का स्पेस। मलार्मे के लेखन में, शब्द, स्वयं को आवृत्त करके खुलता है, उसे इस प्रदर्शन के तले दफनाते हुए, जो वह कहने की प्रक्रिया में है। वह रिक्त पृष्ठ पर आवृत्त है, जो कुछ भी वहाँ कहने के लिए है, उसे छुपाते हुए, और आत्म-संगोपन के उस क्षण में, उसे, जो दूर है और जो कि हठधर्मिता से अनुपस्थित है, उसे दृष्टि में लाता है। और सम्भवतः यह मलार्मे की सारी भाषा की गति है। यह गति है, मलार्मे की पुस्तक की, वह पुस्तक जिसे कि हमें, भाषा की जगह के संदर्भ में, अत्यधिक सांकेतिक रूप से देखना चाहिए, और मलार्मे के इस अत्यधिक सटीक कार्यान्वयन को, जिसमें कि वे अपनी जीवन के अन्त में, खो चुके थे।

अतः, इसलिए इस पुस्तक की गति, यह ही है कि वह पँखे की भांति खुलती है, उस सब को ढाँपती हुई, जिसे वह प्रकट करना चाहती है और जब वह बन्द होती है तो उस शून्य को प्रकट करती है, जिसकी तरह उनकी भाषा ने, कभी इंगित करना बन्द नहीं किया। इसीलिए, यह पुस्तक एक पुस्तक का असम्भाव्य है, जब वह खुलती है तो धवलता को विलग करती है, और जब बन्द होती है तो धवलता को प्रकट करती है। मलार्मे की पुस्तक, अपने धुँधला देने वाले असम्भाव्य में, भाषा के उस अदृश्य ‘स्पेस’ को दृश्यमान बनाती है, भाषा का वह अदृश्य ‘स्पेस’ (जिसका विश्लेषण किया जाना चाहिए) ने,न केवल मलार्मे के लेखन में बल्कि, हर उस रचनाकार के लेखन में जिसे की हम पढ़ना चाहते हैं, रचने की गुँजाइश बनाई है।

बहुत संभव है कि आप कहेंगे कि इस प्रकार के विश्लेषण, जो कि यहाँ-वहाँ रेखांकित किये गए हैं, एक प्रकार से लेखन को एक छितरे हुए तरीके से संबोधित करते हैं। जहाँ एक तरफ हमारे पास लक्षण-विज्ञानी परतों का अर्थान्वेषण है, वहीं दूसरी ओर, हमारे पास अवकाशीयता के रूपों का विश्लेषण है। तो विश्लेषण की यह दो गतियाँ- लक्षण-विज्ञानी परतों का विश्लेषण और अवकाशीयता के रूपों का विश्लेषण- क्या समानान्तर चलने चाहिए? वे कहाँ जाकर एक दूसरे से मिलते हैं? या फिर, वे सिर्फ अनन्त में ही जाकर, जहाँ लेखन अपनी दूरी में जाकर अत्यन्त क्षीण रूप में ही दृष्टिगोचर रह जाता है, एक दूसरे से मिलते हैं? क्या हम, एक दिन, उस अभिनव भाषा की आशा कर सकते हैं जो कि, लक्षण-वैज्ञानी मूल्यों के साथ-साथ, उस अवकाश को भी दृष्टि में लाएगी, जिसमें वह अवकाशित है?

इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि, हम इस प्रकार के किसी भी विमर्श की सम्भावना से बहुत दूर हैं, और मैंने जो अभी दृष्टिकोण प्रस्तुत किए, उनकी विषमताएँ, उस अक्षमता की ओर इंगित करती हैं।

लेकिन फिर भी, और सम्भवतः, यही हमारा उद्देश्य भी है। आज के, साहित्यिक विश्लेषण का कार्य, शायद, आज के दर्शन का कार्य, और सम्भवतः, आज के सारे विचार और सारी भाषा के विश्लेषण का कार्य, सम्भवतः, इसलिए है ताकि, हम भाषा को, हर भाषा के ‘स्पेस’ को समायोजित करने की अनुमति दे सकें, वह ‘स्पेस’ जिसमें शब्द, ध्वनियाँ, ध्वनि-ग्राम, लिखे हुए अक्षर, एक प्रकार से, संकेत हो सकें। एक दिन यह प्रारूप, जो कि भाषा को रखते हुए, अर्थ को मुक्त करता है, उसे प्रकट होना होगा। परन्तु, किस भाषा के पास वह बल या धैर्य होगा? किस भाषा के पास उतनी पर्याप्त हिंसा या तटस्थता होगी कि वह उस ‘स्पेस’ को नाम दे सके या प्रकट कर सके, जो कि उसे भाषा बनाता है? यह, हम नहीं जानते। क्या वह ऐसी भाषा होगी, जो कि हमारी भाषा से अधिक संघनित होगी, एक ऐसी भाषा जो कि साहित्य, आलोचना, या दर्शन के वास्तविक पार्थक्य के अनुभव से परे हो? एक भाषा, जो कि, एक प्रकार से, परम आद्य हो, वह जो कि, आह्वान कर सके, और आह्वान शब्द के कठोरतम अर्थ में, उसका जो कि ग्रीक विचार से प्रथम भाषा हो सकती है? या क्या हम कुछ और नहीं कह सकते, क्या हम यह नहीं कह सकते कि, साहित्य का वास्तव में अर्थ है, और अगर साहित्यिक विश्लेषण, उस अभिप्राय में, जिसमें कि मैंने उसका अभी जिक्र किया है, का कोई वास्तव में अर्थ है? संभवतः क्योंकि, ऐसा इसलिए है, क्योंकि भाषा क्या होगी इसका उन्हें पूर्वाभास है, शायद, ऐसा इसलिए है क्योंकि, ये वे संकेत हैं, जो बताते हैं कि, यह भाषा अपने जन्मने की प्रक्रिया में है। अन्ततः साहित्य क्या है? और वह उन्नीसवीं शताब्दी में क्यों प्रकट हुआ, और जैसा कि मैंने कल कहा, एक पुस्तक के ‘स्पेस’ में? शायद, यही साहित्य है, दरअस्ल, एक हाल ही का आविष्कार, जो कि दो शताब्दियों से भी कम पुराना है। यह एक मूलभूत सम्बन्ध का बनना है, एक ऐसा सम्बन्ध जो कि, धूमिल रूप से दृष्टव्य है, परन्तु फिर भी भाषा और ‘स्पेस’ के बीच में अवधारित नहीं हो सकता।

 

जब भाषा अपने सदियों पुराने कार्य, जो कि उसे एकत्रित करना है, जो कि विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए, को छोड़ देती है--जब भाषा, यह अनुभव करती है कि वह अतिक्राम्य और मृत्यु के द्वारा, ‘स्पेस’ के इस टुकड़े से, जिसे आसानी से भंग तो किया जा सकता है, परन्तु जिसका प्रकल्पन कठिन है, यानि कि पुस्तक, से सम्बन्धित है। तब जान लीजिए साहित्य जैसा कुछ जन्मने की प्रक्रिया में है। साहित्य का जन्म, हमारे फिर भी बहुत निकट है, और फिर भी, उसके मर्म में, यह प्रश्न उठता है कि, ‘वह क्या है?’ वह उस भाषा में, जो कि बहुत पुरानी है, अभी बहुत युवा है। वह एक ऐसी भाषा में प्रकट हुआ है, जो कि एक सहस्राब्दी से, या कहें कि ग्रीक विचार की भोर से, काल को दिया जा चुका है। इसलिए, यह उस भाषा में प्रकट हुआ है, जिसे कि काल को दिया जा चुका है, जैसे कि, हकलाना, भाषा के प्रथम, लड़खड़ाते हुए पग, जो कि, काफी समय तक चलते रहे, और जिसके निष्कर्ष में (हम अभी उस बिन्दु से बहुत दूर हैं) यह भाषा, ‘स्पेस’ को दे दी जाएगी। उन्नीसवीं शताब्दी तक पुस्तक, अपनी अवकाशीय भौतिकता में, उस वाग्मिता के लिए, एक आकस्मिक अवलम्ब थी, जिसकी मूल चिन्ता, स्मृति और अपनी ‘पुनरागमन’ की ही थी। परन्तु, उसके बाद, पुस्तक--और यहाँ पर साहित्य आता है--पुस्तक तो, लगभग साद के समय के आसपास, भाषा का मूलभूत स्थल, भाषा का दुहराया जा सकने वाला उद्गम स्थल, परन्तु, सर्वथा स्मृति-विहीन।

तो, फिर,सेन्त बव के समय से आलोचना क्या है? वह, अगर विचारने के एक प्रयास के अलावा, और क्या थी? एक आशाहीन प्रयास, और जो कि निश्चित रूप से विफलता के लिए अभिशप्त है, और समय के रूप में, उत्तराधिकार के रूप में, सृजन के रूप में, प्रभाव के रूप में, वंशानुक्रम के रूप में, उसे अवधारित करने का प्रयास, जो कि, काल के लिए अत्यन्त बाहरी है, ऐसा कुछ जो कि, ‘स्पेस’ को दिया जा चुका है, यानि कि, साहित्य? और यह साहित्यिक विश्लेषण, जो आज कल बहुतेरों के द्वारा विचाराभ्यास (विशेषण अनुवादक का) में है। यह किसी ‘मेटा-लैंग्विज’ में आलोचना की अभिवृद्धि नहीं है, यह आलोचना नहीं है, जो कि अब सकारात्मक हो गई है, अपने सारे गौण, धैर्य धरे संकेतों के साथ और अपने थोड़े से श्रमशील संचयनों के साथ। साहित्यिक विश्लेषण, अगर उसका कोई अर्थ है, और कुछ नहीं करता है सिवाय, आलोचना की मूलभूत सम्भावना को मिटाने के। वह शनैः-शनैः, परन्तु फिर भी एक धुन्ध के भीतर के, उस तथ्य को प्रकट करता है, कि भाषा अब कम ऐतिहासिक और वंशानुक्रत हो रही है। साहित्यिक विश्लेषण, मात्र यह दर्शाता है कि, भाषा अब स्वयं से दूर होती जा रही है, और वह, स्वयं से एक संजाल की तरह दूर हो रही है, और यह कि उसका बिखराव, काल के अनुक्रमण के कारण नहीं है, और न ही सायं के आह्लाद की तरह, बल्कि, मध्याह्न के, गतिहीन, तेजस्वी, विस्फोटन की तरह है। साहित्य, इस शब्द के कठोर और गम्भीर अर्थ में, जैसा कि मैंने विवेचन का प्रयास किया है, इस प्रकाशमान भाषा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, स्थिर, और टूटी हुई, यानि कि, ठीक वही ‘वस्तु’, जिसको हमें आज विचारना है।

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