मंगलवार, 31 जनवरी 2017

रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 - मिशेल फूको विशेषांक : संपादकीय

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    यह अंक
Madness is the absolute break with the work of art, it forms
the constitutive moment of Abolition which dissolves in the
time of truth of the work of art.
In its function, the power to punish is not essentially
different form that of curing or educating.
Freedom of conscience entails more dangerous than
authority and despotism.
अर्थात्‌
कला रचना से पूरी तरह विलगाव ही जुनून है, यह विलोपन के उस विधायक क्षण की निर्मिति करता है, जो काल में समाहित हो जाता है- यही कला का सत्‍य होता है।
दण्‍डित करने की ताक़त दरअसल उपचार करने या शिक्षित कर पाने की ताक़त से अलग नहीं है।
अंतःकरण की स्‍वच्‍छंदता निरंकुशता और तानाशाही से अधिक खतरनाक हो जाती है।

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उपरोक्‍त विचार फ्रेंच दार्शनिक मिशेल फूको के हैं जिनके समूचे सोच का सार-तत्त्व है कि सत्‍य सत्ता के हितों की रक्षा के लिए बनाए जाते हैं- देखा जाए तो मिशेल फूको का सम्‍पूर्ण रचना-कर्म इन्‍हीं प्रक्रियाओं की ऐतिहासिक जाँच-पड़ताल करता है। स्‍वीकृत विचार परम्‍परा के समानांतर नहीं बल्‍कि उसके प्रतिकूल चलने वाले फूको ने ज्ञान और सत्ता के बीच उन बारीक़ अनावरणों को अनावृत किया जो दर्शन की दुनिया में एक अबूझ पहेली थे। फूको ने मनश्‍चिकित्‍सा, औषध विज्ञान, मानविकी तथा कारागार के अतिरिक्‍त मनुष्‍य के यौन व्‍यवहार को अपने अध्‍ययन का दायरा बनाया। उन्‍होंने ज्ञान, सम्‍पदा और हिंसा में देह को एक समांतर सत्ता के रूप में प्रतिपादित किया। मिशेल फूको का मानना है कि सत्ता अपनी आत्‍यंतिकता में ज्ञान को सामाजिक-नियंत्रण के उपकरण के रूप में इस्‍तेमाल करती है। फूको ने तकरीबन 35 पुस्‍तकें लिखी हैं जिनमें हिस्‍ट्री अॉफ सेक्‍सुआलिटी, मैडनेस एण्‍ड सिविलाईजेशन, डिसिप्‍लिन एण्‍ड पनिश तथा बॉयो-पॉवर प्रमुख हैं- जो सामाजिक विज्ञान, मानविकी तथा व्‍यावसायिक अनुशासन- शिक्षा, प्रबंधन-अध्‍ययन और स्‍वास्‍थ्‍य की समूची प्रविधियों-परिधियों को प्रश्‍नांतिक करती हैं। अपनी वैज्ञानिक दृष्‍टि के चलते उन्‍होंने मार्क्‍सवादी चिंतन को भी प्रश्‍नांकित किया जिस कारण वे खुद भी प्रश्‍नों के घेरे में आ खड़े हुए- बावजूद इसके वे इस तर्क के     पक्षधर रहे कि विचारधारा नहीं बल्‍कि जीवन अंतिम सत्‍य है। मात्र सर्वहारा ही सामाजिक परिवर्तन का कारक नहीं है- इसकी परिधि का दायरा विस्‍तृत करना होगा, इसमें उन घटकों का योग ज़रूरी है जो ज़रूरी होते हुए भी जीवन की धारा से च्‍युत रहे- नस्‍ल, धर्म, लिंग कहें या स्‍त्री के नाम पर। इन घटकों को केन्‍द्र में लाने पर ही सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया अपना वास्‍तविक रूप ले सकेगी... फूको जीवन-दृष्‍टि का एक ऐसा संसार रचते हैं जिनके आलोक में आधुनिक विचारकों की एक लम्‍बी सफ़ आ खड़ी होती है।
‘रचना समय’ का यह अंक बीसवीं सदी के इस सर्वाधिक प्रभावशाली दार्शनिक और उत्तर आधुनिक विमर्श के मूलाधार मिशेल फूको पर केन्‍द्रित है जिसके अन्‍तर्गत हमने फूको के लेख, उनकी लम्‍बी बातचीत और विचारकों की नज़र में फूको पर लेख प्रस्‍तुत किये हैं।

‘रचना समय’ ने हमेशा समय के प्रतिनिधि साहित्‍य को प्रस्‍तुत किया है ताकि पठनीयता का स्‍पेस निर्मित हो सके- यह प्रयास इसी दिशा में ज़रूरी पहल के रूप में है।

फूको विशेषांक का अनुवाद पुनर्वसु जोशी ने किया है जो हाल ही में अमेरिका से पन्‍द्रह वर्ष बाद अपना उच्‍च-अध्‍ययन पूरा करके स्‍वदेश लौटे हैं। पुनर्वसु कथाकार-चित्रकार प्रभु जोशी के बेटे हैं और इंदौर में रहते हुए स्‍वतंत्र लेखन में व्‍यस्‍त हैं। ‘रचना समय’ के आंगामी फेडरिक जेमेसन, ज्‍याँ बुद्रियार, आरिफ डिरलिक तथा स्‍लाव जिजेक विशेषांकों के अनुवाद वे प्रस्‍तुत करेंगे।
साहित्‍यिक परिवार से जुड़े व्‍यक्‍ति के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करना महज़ औपचारिकता होगी। उनसे काम कराने का हक़ तो हमारा बनता है।
हरि भटनागर

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