शनिवार, 14 जनवरी 2017

प्राची-दिसंबर 2016- कहानी - देशभक्ति की मिसाल / डॉ. ज्योति अग्रवाल

कहानी

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देशभक्ति की मिसाल

डॉ. ज्योति अग्रवाल

मैं और मेरे दादाजी आज बहुत खुश हैं, अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं पर साथ ही यह ध्यान भी रख रहे कि कोई इस खुशी को देख न पाये. न न...हमने कोई गलत कार्य नहीं किया है. हमने तो बस एक सच्चे देशभक्त होने का फर्ज निभाया है वो भी बिना किसी पारितोषिक की लालच के. आज टी.वी. पर सभी न्यूज चैनलों पर आज बस एक ही न्यूज चल रही है कि पत्थरबाजों के ठिकानों पर छापा! उनकी गिरफ्तारी! अब होगा हालात में सुधार! कर्फ्यू से मिलेगा शायद छुटकारा! कश्मीर में पहली बार इतने लंबे समय के लिये कर्फ्यू लगा था.

मुझे याद है कि वो ईद वाला दिन जब हम दादाजी के साथ मस्जिद जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तभी बगल वाले घर से चचा जान शाम की दावत का बुलावा देने आये. अब्बा हुजूर के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके बेटे और उसके साथी जेल से वापस आ रहे हैं, सरकार ने उनकी सजा माफ करके रिहा कर दिया है. सारे इलाके में खुशी का माहौल था. शाम को दावत में जेल से आने के बावजूद भी उन सबकी ठाठ-बाट, शानो-शौकत देखकर मैं सोच में पड़ गया. मेरा वहां के माहौल में दम घुट रहा था. अब्बू मेरी घुटन को समझ रहे थे, इसलिये उन्होंने मुझे पढ़ाई के बहाने से घर भेज दिया. घर में भी मैं बेचैन ही रहा. जैसे ही अब्बा हुजूर वापस आये, मैंने उनसे पूछा- ‘‘जेल से आने के बाद इतनी इज्जत कैसे हो सकती है?’’

अब्बा हुजूर- तुम इन सब बातों पर ध्यान मत दो. अपना ध्यान पढाई पर लगाओ.

मैंने कहा- मैं जानना चाहता हूं.

अब्बा हुजूर- अभी सो जाओ, कल स्कूल भी तो जाना है. बस इतना समझ लो कि वो हमारे रिश्तेदार जरूर हैं, पर उनके इरादे नेक नहीं हैं, इसलिये उन लोगों से ज्यादा मिलना-जुलना ठीक नहीं.

मैंने कहा- ‘‘आप निश्चिंत रहें, मैं उनसे नहीं मिलूंगा.’’

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सोते समय मैंने दादाजी से पूछा तब उन्होंने समझाया कि ये सब हमारे शहर के बेरोजगार युवक हैं जिन्होंने बुरी संगति के कारण एक तो पढ़ाई बीच में छोड़ दी, साथ ही नशे जैसी अनेक बुरी आदतों को अपना लिया है. इसका फायदा उठाते हैं ये आतंकवादी जिनका अपना कोई ईमान-धर्म नहीं. ये युवक रहते तो यहां हैं पर उनके हाथों की कठपुतली बन चुके हैं. चंद रुपयों के लालच में वे इनसे देश विरोधी कार्य करवाते हैं, इसीलिये तुम्हारे अब्बू इनसे दूर रहने को कह रहे थे.

मैंने कहा- ‘‘आप ठीक कह रहे हैं दादाजी. मैं इनसे दूर रहूंगा व समय आने पर अपने देश की सेवा करूंगा.’’

मैं कोचिंग में था कि अचानक शोर बढने लगा. लोग दुकानें बंद करके घर की ओर भागने लगे. हमसे भी जल्दी घर जाने का कहा गया. पता चला कर्फ्यू लग गया है...जैसे-तैसे हम घर पहुंचे. चारों ओर सन्नाटा छा गया था. अब्बू ने बताया पत्थरबाजी हो गयी है और सेना के कई जवान भी घायल भी हो गये हैं. दादाजी बहुत दुखी लग रहे थे. मैं जब उनके पास बैठा तो कहने लगे- ‘‘जो हो रहा है वो अच्छा नहीं है. आज एक बार फिर हमारे सैनिकों को अपनों ने चोट पहुंचायी.’’

मैंने कहा- ‘‘दादाजी आप हमेशा कहते हैं ये सैनिक हमारे रक्षक हैं. आज इन्हीं की मदद से मैं सुरक्षित घर पहुंचा हूं. फिर इन्हें घायल क्यों किया जा रहा है?’’

दादाजी- ‘‘मेरे बच्चे! ये युवा राह भटक गये हैं. इन नादानों को होश नहीं है. अच्छे बुरे की पहचान भूल चुके हैं. ये सैनिक अपना घर-परिवार छोड़कर देश की, हमारी सुरक्षा के लिये रात-दिन एक करते हैं. इसके बदले में हम इन्हीं को चोट पहुंचा रहे हैं. बहुत शर्म की बात है.

दूसरे दिन हमारे पास के इलाके में भी पत्थर चलने लगे. सेना के दो जवान जिनमें से एक ज्यादा चोटिल था, हमारे घर के पास आकर रुके. दादाजी ने मुझे आवाज दी और फर्स्ट-एड बॉक्स लाने को कहा. हम दोनों ने उनकी मरहम पट्टी की. हमने उन्हें गरम दूध भी देना चाहा पर उन्होंने मना कर दिया. थोड़ा आराम करके धन्यवाद देते हुये वो वापस चले गये.

मैंने दादाजी से पूछा- ‘‘उन लोगों ने दूध क्यों नहीं पिया?’’

दादाजी- ‘‘बेटे वो सैनिक हैं, उन्हें चौकस रहना होता है कि कहीं कोई मदद की आड़ में उन्हें नुकसान न पहुंचा सके. फिर हम तो मुसलमान हैं. कुछ लोगों के कारण हम सभी शक के दायरे में हैं.’’ कहते-कहते दादाजी उदास हो गये.

मैंने कहा- ‘‘दादाजी क्या हम इन घायल सैनिकों की मदद कर सकते हैं?’’

दादाजी- ‘‘नहीं बेटा, हम प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे पड़ोसी, हमारे रिश्तेदार, याद है न जो ईद पर मिले थे, वे हमें भी नहीं बख्शेंगे.

मैंने कहा- ‘‘मैं अपने साथियों के साथ टोली बनाकर छिपकर मदद करूंगा.’’

दादाजी- ‘‘ठीक है बेटा, पर बहुत संभलकर रहना. हम भी तुम्हारे साथ हैं.’’

अब तो मैं और मेरे दो साथी दादाजी के साथ घायलों की सेवा करने लगे. सैनिक अंकल लोगों से भी हमारी दोस्ती हो गई.

रात में हमारे कमरे में अब्बू आये और बताने लगे कि ईद के दिन जो लोग जेल से रिहा हुये थे, वही ये सारी वारदात कर रहे हैं. उनका नेता हमारे रिश्तेदार का बेटा ही है. उसकी खोज-बीन चल रही है. हमें चौकस रहने को कहकर अब्बू सोने चले गये.

दोपहर को मेरा एक साथी छिपते-छिपाते आया. वह बुरी तरह घबराया हुआ था. उसने बताया कि आज पत्थरबाज उसके इलाके के लोगों से जबरन पत्थरबाजी करने के लिए कह रहे थे. सारे लोग डरे हुये हैं. उसने कहा कि वह उनका ठिकाना भी पता करके आया है.

दादाजी के साथ हमने उन्हें पकड़वाने की गुप्त योजना बनाई. सैनिक अंकल को उनका ठिकाना भी हमने पत्र के माध्यम से बताया, क्योंकि दादाजी हमारी सुरक्षा भी चाहते थे. उन्होंने समझाया कि नाम उजागर होने से हमारे तथा परिवार के लिये खतरा हो सकता है.

अभी न्यूज में आ रहा है कि सेना की स्थानीय नागरिकों द्वारा की गई मदद से पत्थरबाजों के ठिकानों पर छापा मारकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है. दादाजी ने आकर मेरी पीठ थपथपाई और गले से लगा लिया.

मुझे महसूस हो रहा है जैसे मुझे परमवीर चक्र प्रदान किया गया है, और चारों ओर तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है.

 

सम्पर्कः फ्लैट नं.444, रामा अपार्टमेंट,

द्वारका, सेक्टर-11

नई दिल्ली-110075.

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