शनिवार, 14 जनवरी 2017

प्राची- दिसंबर 2016 - पाक अधिक्रांत जम्मू और कश्मीरः ‘बिसरे भूमि के बिसरे लोग’ / डॉ. शिवपूजन प्रसाद पाठक

पाक अधिक्रांत जम्मू और कश्मीरः ‘बिसरे भूमि के बिसरे लोग’

डॉ. शिवपूजन प्रसाद पाठक

‘भारत एक उभरती हुई शक्ति है’ यह अब केवल अकादमिक जगत के विमर्श का विषय नहीं है. भारत ने अपने सैन्य, आर्थिक व सांस्कृतिक क्षमता से साबित कर दिया है कि वैश्विक राजनीति में उसकी प्रमुख भूमिका है. भारत की वैश्विक समुदाय में सक्रिय भूमिका निभाने की सोच आन्तरिक आधार और वैश्विक स्थिति से निकलकर आती है. स्थिर राजनीतिक व्यवस्था, सक्षम अर्थव्यवस्था व सशक्त सैन्य क्षमता के माध्यम से विश्व के मंच पर अपनी बात कहने का साहस दिखाया है. विश्व के कई देश इसको वास्तविक रूप में स्वीकार करने लगे हैं. उभरते हुए देश के सामने कई चुनौतियां होती हैं. भारत भी इसका अपवाद नहीं है. घरेलू और वैश्विक राजनीति मिलाकर भारत के सामने कई बाधाएं हैं. उदाहरण के लिए, सुरक्षा के दृष्टि बाह्य मोर्चे पर पाकिस्तान, चीन व संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे बड़ी चुनौती है, तो पूर्वोत्तर भारत को अलगाववाद,

मध्य भारत का नक्सलवाद व उत्तरी भारत में जम्मू और कश्मीर राज्य में आतंकवाद आन्तरिक सुरक्षा की प्रमुख बाधाएं हैं. जम्मू और कश्मीर प्रान्त की चुनौती पाकिस्तान से विवाद के कारण विशेष हो जाती है, क्योंकि इसके कुछ भूभाग पाकिस्तान के नियंत्रण में हैं जिसे हम पाक अधिक्रांत जम्मू कश्मीर कहते हैं. भारत का यह भू-भाग 1947 से आज तक पाकिस्तान के पास है.

भारतीय संविधान की अनुसूची 1 में 15वें स्थान पर जम्मू-कश्मीर का नाम आता है. जम्मू-कश्मीर का भू-क्षेत्र दर्शाते हुए यह कहता है कि यह ‘वह राज्यक्षेत्र जो इस

संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले जम्मू-कश्मीर राज्य में समाविष्ट था.’ अर्थात जम्मू-कश्मीर प्रान्त में वह भूमि शामिल है जो महाराजा के विलय के समय उनके राज्य में था. इसमें जम्मू, कश्मीर, लद्दाख व गिलगिट सीमान्त इलाका का क्षेत्र शामिल है. वर्तमान समय में जम्मू-कश्मीर प्रान्त का सम्पूर्ण क्षेत्रफल 222, 236 वर्ग कि.मी. है. जिसमें 101,437 वर्ग किमी भारत के पास है. शेष भूमि पाकिस्तान और चीन के नियंत्रण में है. पाकिस्तान के हिस्से को भारत के दृष्टिकोण से ‘पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर’ के नाम से जाना जाता है जो दो भागों में विभाजित है. इसका क्षेत्रफल 78,114 वर्ग किमी है. इस भूभाग को पाकिस्तान के उपनिवेश के रूप में विकसित किया जा रहा है.

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वैश्वीकरण का युग है. कहा जाता है कि विश्व एक वैश्विक ग्राम में बदला रहा है. विश्व का एकीकरण हो रहा है लेकिन पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर दुनिया के सबसे कटे हुए क्षेत्रों में है. उन नागरिकों के राजनीतिक व आर्थिक स्थिति स्थिति को जानने का समय है.

आपदाएं अभिशाप ही होती हैं, लेकिन उसमें भी वरदान शामिल होता है. 2005 के भूकम्प ने इस भूभाग को दुनिया के लिए खोल दिया. इस भूकम्प ने ‘पाक अधिक्रांत जम्मू कश्मीर’ की वास्तविक स्थिति को दुनिया के सामने रख दिया. बचाव और राहत दल और समूह इस भू-भाग के पिछड़ेपन, अशिक्षा, गरीबी और भुखमरी से परिचित हुए. इस भूकम्प ने अमानवीय दशाओं को उजागर किया.

मीरपुर-मुजफ्फराबाद और गिलगित-बाल्तिस्तान पाकिस्तान द्वारा नियंत्रित व संचालित होते हैं, लेकिन पाकिस्तान कभी भी इस पर अपना वैधानिक दावा नहीं करता है.

मीरपुर-मुजफ्फराबाद

मीरपुर-मुजफ्फराबाद क्षेत्र का भारत की ओर कोई अधिकारिक नाम नहीं है, पाकिस्तान इसे ‘आजाद काश्मीर’ कहता है. मुजफ्फराबाद इसकी राजधानी है. मीरपुर का हिस्सा जम्मू संभाग से है और मुजफ्फराबाद कश्मीर संभाग का हिस्सा है. यह 13297 हजार वर्ग किमी पाकिस्तान के अनाधिकृत कब्जे में है. पाकिस्तान प्रत्यक्ष रूप से इस भाग पर शासन करता है.

गिलगित-बाल्तिस्तान

गिलगित-बाल्तिस्तान को ‘उत्तरी क्षेत्र’ के नाम से जाना जाता है जिसे पाकिस्तान ने 2009 में इसे गिलगिट-बाल्टिस्तान के नाम से संबोधित किया है. यह भारत का उत्तरी सीमांत है. इसका क्षेत्रफल 72,496 हजार वर्ग किमी है. इस भाग की

राजधानी गिलगिट है. यह वह क्षेत्र है जहां कई देशों की सीमाएं आपस में मिलती हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, चीन, तिब्बत एवं भारत. यह मध्य एशिया से जोड़ने वाला दुर्गम क्षेत्र है जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा जिसके द्वारा पूरे एशिया पर दृष्टि रखा जा सकता है.

यह भू-भाग भारत की ओर से उपेक्षा का शिकार रहा है. बाल्टिस्तान आंदोलन के नेतृत्वकर्ता सियांग सेरिंग कहते हैं कि हम लोग ‘बिसरे भूमि के बिसरे लोग’ ;थ्वतहवजजमद च्मवचसम व`ि थ्वतहवजजमद स्ंदकद्ध हैं. पाकिस्तान इन नागरिकों पर दमन और खड्यंत्र के माध्यम से जनानिकी बदल रहा है. नागरिकों का शोषण हो रहा है. अपने उपनिवेश के रूप में विकसित कर रहा है. भारत इस विषय का प्रभावी संज्ञान और निर्णात्मक निदान नहीं खोज पा रहा है.

वर्तमान संदर्भ में केन्द्र की सरकार ने अधिकारिक रूप से घोषणा की ‘पाक अधिक्रांत कश्मीर’ को ‘पाक अधिक्रांत जम्मू कश्मीर’ कहा जाय. यह पहला अवसर था जब भारत सरकार ने इस भूभाग को कोई नाम दिया है. दूसरी बात भारत सरकार के राष्ट्रीय सलाहकार अजीत डोवाल ने कही कि भारत की 106 किमी सीमा अफगानिस्तान से मिलती है. इसका अर्थ ‘पाक

अधिक्रांत जम्मू कश्मीर’ की भू सीमा से है. इसी संदर्भ में, भारतीय संसद ने 22 फरवरी 1994 को सर्वसम्मति से यह संकल्प प्रस्ताव पारित किया है कि भारत की एकता, प्रभुसत्ता और अखण्डता के विरुद्ध हर तरह के षड्यंत्रों का प्रतिरोध करने की इच्छा और क्षमता भारत में है और पाकिस्तान को भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर के सभी क्षेत्र को खाली कर देना चाहिए जिन्हें आक्रमण कर हथिया लिया हैं

इस भूभाग का उपयोग भारत के विरुद्ध आतंक फैलाने में किया जा रहा है. पठानकोट इसका अद्यतन उदाहरण है. इस क्षेत्र में विदेशी ताकतों की उपस्थिति से भारत और पाकिस्तान के विवाद से विषयान्तर हो गया है. उसमें अन्य कारक भी शामिल हो गए हैं. पाकिस्तान द्वारा चीन को 5130 वर्ग किमी भूमि 1963 ई. की संधि के अनुसार छोड़ने और 42,685 वर्ग किमी चीन के पास होने से इसका विशेष महत्व है. विशेषकर चीन का आर्थिक निवेश भारत के लिए चिंता का विषय है.

अब प्रश्न उठता है कि जो विषय भारत के एकता, अखण्ड़ता व संप्रभुता के लिए इतना महत्वपूर्ण है, क्या उस विषय की सामान्य समझ भारतीय जनमानस में है? यह सत्य हो सकता है कि विषय का संज्ञान अकादमिक विमर्श में या नौकरशाही के बीच हो, लेकिन सामूहिक चेतना के निर्माण के लिए इस विषय के विशेषज्ञों से बाहर लाकर जनसामान्य तक पहुंचना चाहिए. भारतीय विदेश नीति की यह कमी बनी हुई है कि इसमें जनसामान्य की रुचि नहीं है. इसके कई कारणों में एक प्रमुख कारण है कि विदेश नीति संबंधित प्रमाणिक लेखों व पुस्तकों का हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में अभाव है. प्रस्तुत कार्य में ‘पाक अधिक्रांत जम्मू और कश्मीर’ के राजनीति, आर्थिक व सामाजिक पक्षों का अध्ययन करना है. ‘पाक

अधिक्रांत जम्मू कश्मीर’ के विषय को व्यापक रूप में और सहज व सरल ढंग से भारतीय जनमानस के सामने लाना है.

सम्पर्कः रिसर्च फेलो, जम्मू-काश्मीर अध्ययन केन्द्र

प्रवासी भवन, तृतीय तल, 50 दीनदयाल

उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली-110001

मोः 9868020812

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