शनिवार, 14 जनवरी 2017

प्राची - दिसंबर 2016 / कहानी / अपने अपने अस्त्र / बृज मोहन

कहानी

अपने अपने अस्त्र

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बृज मोहन

नाम : बृज मोहन

जन्म : 1951, झांसी.

शिक्षा : स्नातक.

शुरुआती लेखन मोहन बृज के नाम से और कविताओं से हुआ.

प्रकाशन : पहली कहानी 1974 में प्रकाशित.

हंस, कथाक्रम, साहित्य अमृत, वर्तमान साहित्य, अहा! ज़िंदगी, कथाबिंब, युद्धरत आम आदमी, साक्षात्कार, अक्षरपर्व, माधुरी, हरिगंधा, पुष्पगंधा, सरिता, मुक्ता, गृहशोभा, सरस सलिल, गृहलक्ष्मी, परिन्दे, प्राची, कदम, सोच विचार आदि पत्रिकाओं के अतिरिक्त जनसत्ता, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका आदि के साप्ताहिक परिशिष्टों में तीन दर्जन से अधिक कहानियां समय-समय पर प्रकाशित.

कहानी संग्रह : ‘इसे जन्म लेने दो’

उपन्यास : ‘नौ मुलाकातें’

तीन नाटक : आकाशवाणी लखनऊ व छतरपुर से प्रसारित.

सुपरिचित पत्रिकाओं में कुछ कहानियां प्रकाश्य.

पुरस्कार : ‘कथाबिंब’ द्वारा सर्वश्रेष्ठ कहानी पर ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार- 2015’

सम्मान : बुन्देलखण्ड साहित्य कला अकादमी द्वारा ‘मुंशी प्रेमचंद सम्मान 2015’

सम्प्रति : बैंक ऑफ़ बड़ौदा से सेवानिवृत्ति के बाद अब निरन्तर कहानी-लेखन व प्रकाशन.

संपर्कः ‘मनोरम’, 35, कछियाना, पुलिया नम्बर- 9, झांसी-284003

 

नायास मुझे ही इन्तज़ार है कि एक चमचमाती बड़ी कार मेरी गली में मुड़ेगी, जरूर मुड़ेगी. मेरे घर के सामने आहिस्ता से रुकेगी. कार से दमकते व्यक्तित्व की स्वामिनी विशाखा बाहर निकलेगी. प्रभामण्डल के साथ खट-खट करती सीढ़ियां चढ़कर मेरे कमरे में आयेगी. मुझे बिस्तर पर लेटा देख खनखनाती आवाज में सफल विज्ञापन की तर्ज पर पूछेगी, ‘‘ये क्या हाल बना रखा है?’’

मेरी बीमारी के समाचार अखबारों में छपे हैं. एक-दो स्वयंसेवी संस्थाओं ने मेरे स्वस्थ होने की कामनाएं व्यक्त की हैं. मैं इतना बीमार नहीं हूं कि समाचार बनें, फिर भी छपे हैं.

नगर में हलचल है. उत्सव का माहौल है. मेरी बीमारी का समाचार इसमें कोई खलल डालेगा, ऐसा भी नहीं है. हलचल का कारण है- नगर में विशाखा के साथ बॉलीवुड के दो-तीन चमकते सितारों की उपस्थिति. दो विशेष समारोह हैं. एक विशाखा के नवनिर्मित भव्य होटल ‘‘गुलमोहर महल’’ का शुभारम्भ और दूसरा विशाखा के बेटे की ‘बुन्देलखण्ड ग्रेनाइट इण्डस्ट्रीज’ के विपणन कार्यालय का विधिवत उद्घाटन, जो इसी होटल की तीसरी मंजिल पर होना है. समाचार पत्रों में पूरे पृष्ठ के रंगीन विज्ञापन हैं. नगरीय समाचारों के पृष्ठ पर भावी उद्घाटनों के सूचनात्मक समाचार हैं और ठीक नीचे छोटा-सा समाचार है, जिसका शीर्षक है- वरिष्ठ पत्रकार केशव जी अस्वस्थ.

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ठहरे जल में मन्द हवा लहरें उत्पन्न कर सकती है, फिर उसमें सोद्देश्य उछाला गया एक छोटा-सा कंकड़ तो अनन्त लहरों को जन्म देता है, जिन्हें कोई रोकना भी चाहे तो रोक नहीं सकता.

मेरी बीमारी के समाचार पर विशाखा की दृष्टि न पड़े, यह हो नहीं सकता और यह भी नहीं हो सकता कि वह प्रतिक्रिया विहीन रहे. सितार के कसे हुए तार छेड़ने से स्वर जरूर निकलता है, अगर अनायास ही छू जाएं तब भी. फिर यदि सायास छेड़ा जाए तो मनचाहा स्वर निकलता है, मनभावन तरंगें उत्पन्न करता है.

मै अपने मुंह मियां मिट्ठू नहीं बन रहा. सच कहता हूं कि मेरा वार कभी खाली नहीं जाता. शिकार आहत होता ही है. तन से ही नहीं मन से भी. हिंसक तो मैं कभी नहीं रहा. इस तरह की अहिंसा में मुझे बहुत मजा आता है. बड़ी आत्मसन्तुष्टि मिलती है. यह मेरी मजबूरी कही जा सकती है या आदत कहें तो ज्यादा ठीक है. अभी कुछ माह पहले छपे मेरे एक आलेख से सरकार के कान पर जूं भले ही न रेंग पाई हो परन्तु क्षेत्र के बड़े उद्यमियों में हलचल जरूर मच गई थी. विपक्ष के विधायक को आवाज उठाने का मामला मिल गया था. चटपटा, गरमागरम.

बात बहुत छोटी सी लगती थी, जिसे मेरे प्रतिद्वन्द्वी पत्रकार नहीं पकड़ पाए थे. यहां हमारे पिछड़े और अन-उपजाऊ क्षेत्र में हजारों वर्षों से फैली पत्थरों की चानों को लोग साधारण समझ कर अनदेखा करते रहे थे. लेकिन पारखियों की नजर पड़ते ही वे पत्थर अचानक असाधारण हो गए हैं. अकूत सम्पत्ति का पर्याय बन गए हैं, जब से उनकी पहचान उत्तम श्रेणी के ग्रेनाइट के रूप में की गई है. एकाएक वे पूंजीपतियों के आकर्षण के केन्द्र बन गए. जंगली झाड़ियों वाली पथरीली जमीन खरीदने और पट्टे पर लिए जाने की होड़ मचने लगी. भारी पूंजी निवेश के लिए अनेक पूंजीपति मैदान में उतर आए.

मुझे पता चला कि विशाखा के बेटे ने भी इस क्षेत्र में एक बड़ा उद्योग जमाने की नीयत से मजबूत कदम रखा है. विशाखा के नाम से मुझे अपार खुशी हुई, परन्तु मुझसे रहा नहीं गया. मैंने एक तीर चूम धीमे से छोड़ ही दिया. मीडिया में साधारण से चलताऊ मुद्दे छोड़े. प्राकृतिक आपदा की आशंका, जन स्वास्थ्य की समस्या, श्रमिक शोषण, पर्यावरण असन्तुलन, वैधता को चुनौती, पूंजीपतियों और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से सरकार को करोड़ों का चूना आदि-इत्यादि. प्रदेश स्तर पर प्रतिक्रियाएं और बहसें शुरू हो गई थीं.

उधर मेरा शिकार आहत हुआ था.

सुबह टेलीफोन की लंबी घंटियों ने मुझे जगा दिया. मुम्बई से विशाखा थी. खनकती आवाज में उसने कहा, ‘‘केशव जी सॉरी...मैंने आपको डिस्टर्ब किया सुबह-सुबह.’’

‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘देखिए आपके कारण हम लोगों का बड़ा नुकसान हो सकता है.’’

‘‘क्या?’’ मैं कह पाया.

‘‘देखिए आप अच्छी तरह समझते हैं, जानते हैं. मेरे बड़े बेटे ने आपके एरिया में एक एक्सपोर्ट बेस ग्रेनाइट इण्डस्ट्री डाली है...शुरुआत में ही लाखों का इन्वेस्टमेंट हो चुका है. लगता है आपको अच्छा नहीं लगा. शायद आपको मुझसे कोई पुरानी जलन है.’’

‘‘अरे आप यह क्या कह रही है सुबह-सुबह, गुड मॉर्निंग के बजाए...’’

‘‘आपको कोई गिला-शिकवा है तो मुझसे कह सकते थे...पर मेरे बेटे पर प्रहार...कम से कम आपको शोभा नहीं देता.’’ उसके स्वर में आवेग था.

‘‘सच, मैं कुछ समझा नहीं विशाखा!’’ मैने बनावटी आश्चर्य से कहा.

‘‘आप सब समझते हैं. मैं भी आपको अच्छी तरह जानती हूं. मानती हूं, आपके पास धारदार अचूक अस्त्र हैं. आप उन्हें चलाने में पारंगत भी है परन्तु क्या कभी अपनों का भी शिकार किया जाता है.’’

‘अपनों का’ सुनकर मैं पानी-पानी हो गया. मैंने नितान्त बचाव की भाषा में कहा, ‘‘विशाखा रियली आई वाज अननोन कि आपके बेटे ने यहां कोई इण्डस्ट्री डाली है. क्या नाम है, इण्डस्ट्री का?’’

‘‘बुन्देलखण्ड ग्रेनाइट्स...बेटे का नाम है शान्तनु. अभी नादान है, विदेश से लौटा हैं. यहां के तौर तरीके नहीं जानता. वह आज ही आपसे मिलेगा. प्लीज़ हेल्प हिम. उसे आपका आशीर्वाद चाहिए...ओ.के.? मैं रात में फिर फोन करूंगी आपको. अगेन आय एम सॉरी फॉर डिस्टर्बिंग यू इन अर्ली मॉर्निंग.’’

विषाखा का फोन प्रत्याशित तो था परन्तु आहत होते हुए भी इतना निवेदनशील होगा, मैंने सोचा नहीं था. मेरा मन अपनी सफलता पर इतराने लगा. उसके फोन ने मेरे भीतर स्फूर्ति भर दी थी.

फोन तो एक भौतिक माध्यम था, परन्तु मैं तो बिना किसी ठोस माध्यम के भी उससे हमेशा जुड़ा सा रहा हूं. मेरे और उसके बीच कुछ अदृश्य, अखण्ड तरंगें थीं, जो मुझे उससे जोड़े रहतीं. उसकी जीवन्त स्मृतियां मेरी उन्नति की प्रेरणा थीं और आत्मबल देतीं और हताशा से दूर रखतीं.

फोन पर फिर लंबी रिंग. मेरी आशा के अनुसार फोन पर शान्तनु था, ‘‘अंकल मैं शान्तनु, आपसे मिलना चाहता हूं. मम्मी ने सुबह आपको फोन किया था....’’

‘‘कहां से बोल रहे हो बेटे?’’ मुझे साधिकार बेटा कहना अच्छा लगा.

‘‘जी ललितपुर से. आप तक पहुंचने में मुझे दो घण्टे लगेंगे. आप कहां मिल सकते हैं...’’

‘‘दो घंटे बाद मैं कमिश्नरी में मिलूंगा. आज कमिश्नर के साथ मेरा एप्वाइण्टमेंट है. तुम वहीं आ जाओ. तुम्हारी मुलाकात नए कमिश्नर से करा दूंगा. वे कभी तुम्हारे काम आ सकते हैं.’’

‘‘थैंक्यू अंकल.’’

कमिश्नर का हवाला देने के पीछे मेरा मन्तव्य अपने प्रभाव प्रकट करना ही था. उस दिन मैं ‘गुलमोहर कोठी’ के फाटक के सामने से सायास निकला था जहां गुलमोहर के पेड़ों के बीच बहुमंजिली इमारत का ढांचा काफी ऊंचा उठ चुका था.

ठीक दो घंटे बाद कमिश्नर के चैम्बर में शान्तनु की प्रतीक्षा कर रहा था कि उसके पहुंचने का सन्देश मिला. मैंने उसे अन्दर बुलवा लिया था. आते ही उसने मेरे चरण स्पर्श किए व आयुक्त को हाथ जोड़ कर प्रणाम किया. परिचय की औपचारिकताएं पूरी कर हम बाहर आ गए.

‘‘अंकल मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए. मुझसे बड़ी भूल हुई जो आपसे सम्पर्क नहीं मिला. अंकल मुझे माफ कर दीजिए प्लीज.’’ उसने एक शुद्ध व्यवसायी की तरह आत्मसमर्पण की मुद्रा में कहा. मैं जान रहा था कि वह अपनी मां की आज्ञा का पालन कर रहा है.

मैंने हंसते हुए कहा, ‘‘मुझे पता नहीं था कि तुम भी ग्रेनाइट्स के धन्धे में हो. बोलो क्या लोगे, ठण्डा या गरम.’’

‘‘नथिंग अंकल...थैंक्यू. आप प्लीज बताइए, मुझे आप का आशीर्वाद मिलेगा?’’ वह कुछ उतावला सा था.

‘‘बिल्कुल बेटे. तुम्हारी मां से मेरी बात हो गई है.’’

‘‘अंकल आपको कहीं जाना हो तो आपको छोड़ दूं.’’ उसने अपनी कार की ओर इशारा किया.

‘‘ठीक है, मुझे एलिट सिनेमा चौराहे तक छोड़ दो.’’ मैंने हंसते हुए कहा, ‘‘सारा शहर उसे इलाइट कहता है और मैं एलिट.’’

उसका संकेत पाते ही ड्राइवर ने फौरन कार का दरवाजा खोल दिया, जो हमें तत्परता से देख रहा था.

‘‘अगर यहां रुको तो मेरे साथ लंच लो.’’ मैंने कहा ही था कि उसके मोबाइल फोन पर रिंग हुई. वह ‘‘सॉरी’’ कह कर बात करने में व्यस्त हो गया. सिनेमा चौराहे पर गाड़ी रुक गई.

वह बोला, ‘‘अंकल मुझे वापस ललितपुर जाना पड़ेगा. एक जरूरी काम आ गया है. जल्दी ही आपसे मिलूंगा. आपका पूरा दिन चाहूंगा.’’ चरण-स्पर्श करते हुए, मेरी ओर अनुमति प्राप्त करने की याचना भरी दृष्टि से देखा. उसके चेहरे की शालीनता और कुलीनता में मुझे विशाखा की झलक साफ दिखाई दी.

वर्षों पहले की विशाखा मुझे याद आ गई. जीवन में कुछ लोग ऐसे आते हैं जो पहली मुलाकात में ही भा जाते हैं, बिल्कुल अपने लगने लगते हैं. विशाखा से मिलकर मुझे ऐसा ही लगा था. मेरे रिश्ते की बहन माला ने मिलवाया था, ‘‘भैया ये है मेरी नई सखी विशाखा. अभी एडमिशन लिया है बी.ए. फर्स्ट ईयर में...और विशाखा ये मेरे बड़े भाई साहब केशव जी, यहीं अपने कॉलेज से हिंदी साहित्य में एम.ए. कर रहे हैं. इसकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं. अपने कॉलेज और शहर का नाम ऊंचा कर रहे हैं.’’

विशाखा ने हाथ जोड़ते हुये ऐसी विनम्र मुद्रा में अभिवादन किया कि मैं देखता ही रह गया. उसकी तन्वंगी देह और तराशे नयन नक्श मेरे भीतर तलहटी तक उतर गए. मेरी दृष्टि के प्रत्युत्तर में नुकीली घनी पलकों तले उसने अपनी बड़ी-बड़ी कंटीली आंखें झुका लीं. मेरे दृष्टिपात को शायद वह सह नहीं पाया थी.

‘‘ये गुलमोहर कोठी वालों की इकलौती सन्तान हैं.’’ माला ने आगे जोड़ा था.

शहर में गुलमोहर कोठी अपने आप में सम्पन्नता का पर्याय थी. ऐतिहासिक किले के मुख्य द्वार के सामने टौरिया पर स्थित चारदीवारियों को गुलमोहर कोठी के नाम से जाना जाता था. चहारदीवारी के अन्दर गुलमोहर के अनेक पेड़ थे जो मौसम आने पर सुर्ख रंग होने पर अनायास ही निगाहों में चढ़ते थे. खासतौर से तब, जब अन्य वृक्ष बेजान से हो जाते थे. कभी फाटक के अन्दर जाने का अवसर नहीं मिला था. मेरे कॉलेज जाने का रास्ता कोठी के सामने से होकर जाता था.

मैं उसे कॉलेज क्या पूरे शहर की अप्रतिम सुन्दरी कह सकता था. उसकी एक झलक देखने को आतुर रहता था. माला को उसने अपना जोड़ीदार बना रखा था. वह एक खास तांगे से कॉलेज आती-जाती. साथ में माला होती. जब वह तांगे से जा रही होती तो मैं एक निर्धारित दूरी बनाकर अपनी पुरानी साइकिल से तांगे का पीछा करता. मिनर्वा टॉकीज की ढाल पर बिना पैडल मारे मेरी साइकिल की गति अपने आप तेज हो जाती. गुलमोहर कोठी आते-आते मैं तांगे को पार करता. दोनों की दृष्टि कुछ पलों के लिए उलझती. कभी-कभी वह मुस्करा देती थी. उसने मुझे कभी अनदेखा नहीं किया. मुझे लगता मेरी तरह वह भी साक्षात्कार की इच्छुक रहती थी.

एक बार उससे बात करने के लिए एकान्त मिल गया. मैं जानता था कि वह निपट एकान्त माला द्वारा प्रायोजित था. हमारे नगर से दूर कवि केशवदास की जन्मस्थली ओरछा में केशव जयन्ती समारोह था, जिसे सम्पन्न कराने अनेक विद्वान आए थे. कॉलेज की साहित्य परिषद् की ओर से हम लोग उस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए थे. कुछ छात्र-छात्राओं ने प्रस्ताव रखा कि विद्वानों के भाषण तो होते ही रहेंगे, क्यों न हम उस रमणीक पर्यटन स्थल का लाभ उठाएं. हम धीमे से बेतवा के तट पर जा पहुंचे. छोटे-बड़े पत्थरों से टकराकर बहती बेतवा की कल-कल व जल का विस्तार नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत कर रहा था. अन्य छात्र-छात्राएं आगे बढ़ गए और पीछे रह गए हम तीन- मैं, वह और माला.

मैंने प्रस्ताव रखा, ‘‘क्यों न हम पत्थरों पर बैठ कर नदी का संगीत सुनें.’’

माला बोली, ‘‘भई, मुझे तो पानी से बहुत डर लगता है. आप लोग बैठें और सुनें गीत-संगीत.’’ और वह तेजी से आगे बढ़ गई.

मैंने किनारे के पत्थर पर चढ़कर उसे आमन्त्रित किया तो उसने स्वीकृति में अपना हाथ बढ़ा दिया. मैंने साहस करके उसका कोमल हाथ पकड़ लिया. एक-दूसरे का हाथ पकड़े हम सम्भलते हुये पत्थरों को पार कर आगे बढ़ गए.

पानी की शीतलता और उसके सामीप्य ने मेरे तन-मन में सिहरन भर दी. निर्मल जल में विचरण करती छोटी-बड़ी मछलियां हमारे पैरों को छूकर गुदगुदी पैदा कर जातीं. उसके चिकने गोरे पैरों की तुलना में मुझे अपने पैर बहुत भद्दे लग रहे थे. उसका ध्यान हटाने के लिए मैंने कहा, ‘‘विशाखा कितना अच्छा लग रहा है. जानती हैं वह नदी बहते-बहते कहां जा रही है.’’

‘‘हां, नदी बम्बई जाती है.’’ (तब मुम्बई को बम्बई कहा जाता था.)

‘‘बम्बई?’’ मैं चौंका.

‘‘हां, नदियां समुद्र में जाकर मिल जाती हैं. मैंने देखा है बम्बई में बहुत बड़ा समुद्र है. मेरी मौसी बम्बई में रहती हैं.’’ उसने बिना झिझक बांहें फैलाते हुये कहा.

‘‘मैं उसके भौगोलिक ज्ञान पर मुस्करा उठा, ‘‘अरे समुद्र तो विशाल है. वह सिर्फ बम्बई में ही नहीं, मद्रास और विशाखापट्टनम में भी है. और भी बहुत जगह है समुद्र. इसका मतलब यह नहीं कि सारी नदियां बम्बई में जाकर ही समुद्र में मिलती हैं.’’

वह मुझे आश्चर्य से देखते हुये समझने की कोशिश करने लगी. थोड़ा समय ही व्यतीत हुआ था कि माला की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘अरे रोमियो-जूलियट. बाहर आइए. वापस चलना है.’’

दोनों उठ खड़े हुए. एक-दूसरे का सहारा लेकर किनारे आ गए. छात्र-छात्राओं के झुण्ड में शामिल हो गए. जयन्ती समारोह में पास-पास बैठे मुझे बराबर लगता रहा, हम लोग तन से ही नहीं मन से भी निकट आ गए हैं.

उसे लेकर मैं स्वप्नजीवी हो गया था. वह लगातार मेरी स्मृतियों में तैरती रहती. कभी सपने में भी आती.

एक दिन माला ने मुझे टटोला, ‘‘भैया आप विशाखा को पसन्द करते हैं?’’

मैं चुप रहा.

‘‘आप उससे शादी कर लीजिए.’’

‘‘क्यों विशाखा ने खबर भेजी है क्या?’’

‘‘नहीं. वह बेचारी क्या खबर भेजेगी. मां-बाप जहां शादी तय कर देंगे, चुपचाप कर लेगी. उसकी मौसी ने उसके लिए बम्बई से एक रिश्ता भेजा है. किसी उद्योगपति घराने से.’’

‘‘क्या विशाखा को वह रिश्ता पसन्द नहीं?’’

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं. अभी तो सिर्फ बात आई है. बात आगे बढ़े, इससे पहले आप अपनी बात कह दीजिए. धनी घराने की सुन्दर लड़कियां ज्यादा उम्र तक अविवाहित नहीं रहतीं. आपके साथ उसकी जोड़ी बहुत अच्छी रहेगी.’’

‘‘माला, मुझ में हिम्मत नहीं.’’

‘‘क्यों? आपको तो जाति-बिरादरी की दीवार भी नहीं तोड़नी. प्रेमी तो ऊंची-ऊंची दीवारों को तोड़ने का दम भरते हैं.’’

‘‘ऊंची और मजबूत दीवारें तोड़ सकने का साहस तो मेरे पास भी है लेकिन आर्थिक खाई को लांघना मेरे वश की बात नहीं. तुम तो जानती ही हो उसके अभिजात्य परिवार से मेरे साधारण परिवार का कोई मेल नहीं. फिर मेरा कोई निश्चित भविष्य भी नहीं.’’

‘‘अरे साम्यवादी विचारधाराओं के स्वर वाला और तीखे तेवरों वाली रचनाओं का रचयिता दिल से इतना कमजोर है. इसके मायने आपकी चाहत खोखली है. कोई भावुक लड़की आपके चक्कर में आ जाए तो बेचारी गई काम से.’’

‘‘सिर्फ भावुकता से काम नहीं चलता. खड़े होने के लिए ठोस धरातल की आवश्यकता होती है. मैं उसे वे सुख

सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा सकता, जिसमें वह पली-बढ़ी है.’’ मैंने अपनी कुण्ठा प्रकट कर दी.

‘‘अगर वह सुख-सुविधाओं का त्याग करने को तैयार हो तो...’’

‘‘तो भी नहीं....मैं उसे कंटीले रास्ते पर जाने से रोकूंगा.’’

‘‘भई मान गए, आपके प्यार को. खुद चाहे सारी जिन्दगी पछताते रहो. खाइए कसम उसे कभी याद नहीं करोगे.’’

‘‘विशाखा क्या भूलने की चीज है.’’

सचमुच मैं उसे भूल नहीं पाया.

आदमी जब कुछ नहीं होता तो अपने आप पर भरोसा नहीं होता. आत्मविश्वास का धनी होने में समय लगता हैं स्वयं समर्थ होने में समय निकल जाता है, मोहपाश या मोहजाल, जिससे आदमी मुक्त नहीं हो पाता. सपने बुनता रह जाता है. सपने आसानी से बुने जा सकते हैं. सपनों के लिए ठोस धरातल जरूरी नहीं. सपनों को पंख सरलता से मिल जाते हैं. वे आगे भाग सकते हैं, उड़ान भर सकते हैं परन्तु स्मृतियां पंखहीन होती है. परकटे पक्षी की तरह पड़ी रहती हैं, मन के किसी कोने में. उड़कर वर्तमान में नहीं आ सकतीं. हां एक सशक्त दंभ का आश्रय जरूर हो सकती हैं.

यही दंभ था कि मैं अपने अस्त्र चला कर कभी-कभी परोक्ष रूप में विशाखा से जुड़ना चाहता, उसे प्रभावित करना चाहता. उसके आकर्षण को लेकर मैंने एक कहानी लिखी- ‘‘नदी बम्बई चली गई.’’ जो एक असफल प्रेमकथा थी. नायिका धन-दौलत के आगे अपने प्रेमी को उपेक्षित करती है. कहानी बम्बई के ही एक लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिका में मेरे चित्र परिचय के साथ छपी थी. मुझे विश्वास था कि वह जरूर पढ़ेगी.

एक साहित्यिक कार्यक्रम में मेरा मुम्बई जाना हुआ. अपने मशहूर फिल्मी गीतकार मित्र के यहां ठहरा था. उनके निवास से विशाखा को फोन किया. मैं जताना चाहता था कि वहां भी मेरे चाहने वाले कितने बड़े लोग हैं. उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए तुरन्त घर आने का आमन्त्रण दिया था,

‘‘आप मिलने जरूर आएं. मुझे आपसे शिकायत भी करनी है. लगता है आप मेरे वैवाहिक जीवन में तूफान लाना चाहते हैं.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘नदी बंबई चली गई, जैसी झूठी-सच्ची कहानी लिख कर. यदि मेरे पति जान जाते कि मैं ही उस कहानी की नायिका हूं तो मुझे अपने वैवाहिक जीवन की धवलता बचाना मुश्किल हो जाता. कम-से-कम मैं ऐसी तो नहीं, जैसा आपने चित्रित किया है. अगर आप मुझे इतना चाहते थे तो फिर माला के कहने पर हथियार क्यों डाल दिए थे.’’

‘‘कहानी गढ़ने के लिए तो कल्पना का सहारा लेना ही पड़ता है. आप सुखी रहें, प्रसन्न रहें, मेरी शुभकामनाएं हैं. आपने कहानी पढ़ी, यह मेरा सौभाग्य है. मेरी याद तो जरूर आई होगी.’’

‘‘आपको कौन भूल सकता है, आप आ रहे हैं न मिलने? ’’

‘‘अगर आप लेने आएंगी तो...’’

‘‘देखिए ऐसी कोई शर्त न रखिए, जिसे मैं पूरी न कर सकूं. मेरी कुछ विवशताएं हैं, मर्यादाएं हैं. आप आइए, मैं अपने पति से मिलवाऊंगी.’’

पति का जिक्र मुझे कुछ बेस्वाद सा लगा. आने की कोशिश करता हूं जैसी औपचारिक बात कह कर अपने शहर वापस चला आया था, मन में एक टीस लिए हुये.

समारोह का लुभावना निमन्त्रण-पत्र अपनी भव्यता बिखेरता मेरे सामने है, जिसे पाना सचमुच एक सम्मान और गौरव का सूचक है. नगर की कुछ प्रमुख हस्तियों को ही ये निमन्त्रण-पत्र मिले हैं. इन्हें लेकर नगर में पिछले सप्ताह से बैचेनी है. मुझे तो यह निमन्त्रण-पत्र विशाखा के उद्योगपति-पुत्र शान्तनु ने विशेष आदर व आग्रह के साथ स्वयं आकर दिया था. मैं इस समारोह में पूरे मन से जाना चाहता हूं, मगर मन में दम्भ है कि अगर विशाखा स्वयं आकर कहे तो.

लगता है अतृप्त लालसाएं पीछा करती हैं, शायद मरने तक.

मुझे लगा कि मेरी कल्पना साकार हुई. खिड़की से दिखाई पड़ा कि एक चमचमाती नए मॉडल की बड़ी कार मुख्य सड़क से मेरी गली में मुड़ी. मैं लपककर बिस्तर पर लेट गया. आंखें बन्द कर लीं. थोड़ी देर में कमरे के बाहर चहलकदमी सुनाई पड़ी. पत्नी ने आवाज दी, ‘‘देखिए, कौन आया है, आपसे मिलने.’’

मैनें आंखें खोलीं. सामने विशाखा थी, नयनाभिराम भव्यता के आवरण में खुशबू बिखेरती हुई. साथ में प्रौढ़ा लग रही माला भी थी. मैं उठने का प्रयास करता हूं. वह लेटे रहने का इशारा करती है. चिन्ता के भाव चेहरे पर लिये हुये मेरे पलंग पर किनारे बैठ जाती है. भावुकता में मेरा हाथ पकड़ लेती है.

‘‘कब आईं?’’ मैं धीमें से बीमारों की तरह पूछता हूं. हालांकि मैं भीतर से पुलकित हूं.

‘‘रात में...सुबह आपकी बीमारी का समाचार पढ़ा तो रहा नहीं गया.’’

मैं मन ही मन प्रसन्न हो जाता हूं कि तीर निशाने पर लगा है.

‘‘क्या हुआ? क्या बीमारी है?’’

‘‘कोई खास बात नहीं. क्या मैं बहुत बीमार लगता हूं?’’ मैंने मुस्कराने के अभिनय की कोशिश की.

‘‘नहीं अखबारों में समाचार देखकर मैं तो घबरा गई थी. चल-फिर तो सकते हैं आप. हमारे कार्यक्रम में आपकी उपस्थिति बहुत जरूरी है. आप समारोह के मुख्य अतिथि हैं.’’

‘‘निमन्त्रण-पत्र में तो ऐसा कुछ नहीं...और न ही आपकी घोषणाओं में ऐसा कुछ है.’’ मेरी आवाज तेज हो जाती है. भूल जाता हूं कि बीमारी का अभिनय करते रहना है.

‘‘यही तो सरप्राइज है.’’ वह खिलखिलाकर हंस पड़ती है.

मैं मन ही मन गदगद हो जाता हूं. आवेग में बिस्तर पर उठकर बैठ जाता हूं. पत्नी से चहककर कहता हूं, ‘‘कुछ लाओ, मुंह मीठा कराओ मेहमानों का.’’

‘‘मेहमान तो आज आप हैं हमारे...मुख्य अतिथि महोदय. शाम को तैयार रहिएगा. आपको लेने शान्तनु आएगा. अभी मुझे जाने दीजिए. बहुत से काम हैं.’’ खड़े होकर विनम्र मुद्रा में हाथ जोड़े वह बोली.

मुझे लगता है, मैं निहत्था हो गया हूं.

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