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रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 - मिशेल फूको विशेषांक : लेखक क्या है ? / मिशेल फूको

मिशेल फूको

लेखक क्या है ?

अनुवाद - पुनर्वसु जोशी

‘लेखक’ के होने और कृति में उसके हस्तक्षेप को लेकर आलोचना के मोटे ग्रन्थों में, निरंतर प्रश्न खड़े किए जाते रहे हैं। वह सदा से ही ‘प्रश्नबिद्ध’ रहा है। उसको ढूंढ कर, कसौटियों पर चढ़ाने का काम ‘पाठक’ और ‘आलोचक’ दोनों ही, अत्यन्त रुचिपूर्वक करते रहे हैं। विचारधारा ने तो हमेशा से ही, उसे सुई की नोंक से निकालने के ही उपक्रम किए। नतीजतन, वह कई-कई प्रविधियों से, लहू-लुहान और हलाक होता रहा- लेकिन, कभी ‘रचना’ या ‘कृति’ से नहीं पूछा गया कि वह अपने सृष्टा के साथ क्या और कैसा सलूक करना चाहती है। इस उपेक्षित स्थिति ने ही ‘पाठ’ के प्रश्न खड़े किए, और ‘लेखक’ को एक ‘अनुपस्थित की उपस्थिति’ की तरह बरामद किया गया। वाल्टर बेंजामिन ने भी, लेखक को सृष्टा के बजाए, एक ’उत्पादक’ के रूप में चिह्नित करते हुए, वांछित प्रहार किए। बहरहाल, एक लम्बे कालखण्ड के बाद, विचारधारा के वर्चस्व से मुक्त होती हुई आलोचना ने, लेखक के अस्तित्व का संरक्षण करने की प्रतिज्ञा प्रकट की- लेकिन, उत्तर-आधुनिक चिंतन में आकर, वह मारा गया। नीत्शे ने ईश्वर का वध क्या किया कि चतुर्दिक ‘अंतवाद’ का ऐसा हो-हल्ला शुरू हो गया कि, धड़ाधड़ विचारधारा, कला, इतिहास, आदि के भी अन्त का उद्घोष सुनाई देने लगा। बेशक, यह अन्तवाद, लेखक के पास भी पहुंचा और इसकी भी मृत्यु की वैसी ही ख़बर फैलने लगी। इस ख़बर की समवेत निर्मिति करने वाले रहे, उत्तर-संरचनावाद के अधिष्ठाता मिशेल फूको, जैक देरीदा और रोलाँ बार्थ। आज इन्हें संसार में ‘पोस्ट-मएडर्न’ सैद्धांतिकी के पुरस्कर्ता की तरह जाना जाता है। इन्होंने कहा कि ‘लेखक’ संस्थागत स्तर पर संकटग्रस्त हो चुका है। दरअस्ल, लेखन की विषय वस्तु अपने जन्म से ही अनाथ होती है। लेखक स्वयं मृत्यु को आमंत्रित करता है, और फलस्वरूप रचना जन्म लेती है। यहाँ तक कि इन चिन्तकों ने यह भी आविष्कृत किया कि, एक पाठ की अन्विति, उसके सृष्टा में नहीं, बल्कि, उसके अभीष्ट (गंतव्य) के रूप में है- और वह अभीष्ट, या गन्तव्य है, पाठक। रोलाँ बार्थ ने ‘डेथ ऑफ़ ऑथर’ जैसी स्थापना भी दी, लेकिन उसके प्रत्युत्तर में, मिशेल फूको ने कुछ भिन्न टिप्पणियाँ दी हैं। उस विमर्श के रूप में प्रस्तुत है, मिशेल फूको द्वारा दिये गए, एक व्याख्यान की प्रस्तुति। -अनुवादक ‘ऑथर‘ (ऑथर शब्द के बहुअर्थी होने के कारण, पाठ की स्पष्टता के लिए मैंने ‘ऑथर’ शब्द का प्रयोग ही रहने दिया है। हिन्दी के ‘लेखक’ शब्द का प्रयोग, ‘राइटर’ के अनुवाद के रूप में हुआ है -अनु.) की अवधारणा का अस्तित्व में आना, ज्ञान, साहित्य, दर्शन, विज्ञान और विचारों के इतिहास में, वैयक्तीकरण के एक विशेषाधिकार के क्षण की निर्मिति करता है। आज भी, जब हम किसी अवधारणा, साहित्यिक श्रेणी या दर्शन की शाखा के इतिहास की पुनर्रचना करते हैं, तब हमें ऑथर और उसकी कृति की ठोस और मूलभूत इकाई की तुलना में ऐसी तमाम श्रेणियाँ कमजोर, दोयम और थोपी हुई जान पड़ती हैं।

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मैं यहाँ ऑथर के सामाजिक-ऐतिहासिक व्यक्तित्व का कोई विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत नहीं करूंगा। परन्तु, निश्चित ही, हमारे लिए यह जाँचना पर्याप्त मूल्यवान होगा कि आखिरकार, हमारी जैसी संस्कृति में, ‘ऑथर’ सहसा कैसे विशिष्ट हो गया? उसे कैसे इतनी प्रतिष्ठा दे दी गई है? किस क्षण, उसकी प्रामाणिकता और उसके गुणारोपण का विधिवत् और मूलभूत अध्ययन प्रारम्भ हुआ? किस प्रकार की मूल्यवर्धन की प्रणाली में ‘ऑथर’ संलिप्त था? कहाँ पर हम नायकों के बदले, ऑथर्स के जीवन का ब्यौरा रखने लगे? और अन्ततः कैसे इस‘ व्यक्ति-और-उसके-काम- की-आलोचना’ जैसी विवेचन की मूलभूत श्रेणी का प्रारम्भ हुआ? हालाँकि, फिलहाल, मैं सिर्फ, ऑथर (लेखक) और उसके पाठ के बीच के सम्बन्ध और उस आचरण में, जिसमें पाठ इस ‘प्रतिमा’ की ओर संकेत करता है, जो कि उससे बाहर और उससे पूर्ववर्ती होने का स्पष्ट आभास देता है, का ही विश्लेषण करूँगा।

कदाचित् बेकेट, इस विषय वस्तु को, जिससे मैं अपना यह विमर्श आरम्भ करना चाहूँगा, उसे अच्छे से सूत्रबद्ध करते हैं, ’इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन बोल रहा है, किसी ने कहा, इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन बोल रहा है!‘ इस तटस्थता में, समकालीन लेखन (मबतपजनतम) का, एक मूलभूत नैतिक सिद्धान्त प्रकट होता है।

मैं इसे स्पष्टतः ‘नैतिक’ कहना चाहता हूँ, क्योंकि यह तटस्थता वास्तविकता में, किसी के बोलने और लिखने के आचरण का चरित्र चित्रण करने वाला लक्षण नहीं है बल्कि एक प्रकार का वह अंतर्निहित नियम है, जिसे बार-बार रेखांकित करते हुए, काफी तल्ख अन्दाज में उठाया जाता है, और जो कदापि पूर्णरूपेण लागू नहीं होता है, और जो लेखन को कभी पूर्णतः मनोनीत भी नहीं करता है। परन्तु, उस पर वह एक व्यवहार के रूप में, अपरिहार्य ढंग से शासन करता है। चूँकि, यह अन्तर्निहित नियम, एक लंबे विश्लेषण की माँग किए जाने के लिए अतिपरिचित है, अतः मैं यहाँ इसकी दो मुख्य विषय-वस्तुओं का, अचूक अनुसरण करके, उससे उत्पन्न होने वाली उलझन को पर्याप्त रूप से स्पष्ट करने में सफल हो सकता हूँ।

सबसे पहले, बेशक हम यह कह सकते हैं कि आज के लेखन ने, स्वयं को अभिव्यक्ति के आयाम से मुक्त कर लिया है। आज का लेखन, अपने आप को ही संदर्भित और संबोधित करते हुए, अपनी आन्तरिकता की सीमाओं में बँधने से इन्कार करता हुआ, स्वयं की प्रकट होती हुई बहिर्मुखता से पहचाना जाता है। इसका मतलब यह है कि यह क्रमबद्ध किए हुए संकेतों की ही, अप्रकट अंतरक्रीड़ा है, जो कि आशय-गर्भित कथ्य के अनुसार व्यवस्थित न होकर, अर्थवत्ता की मूलभूत प्रकृति के अनुसार ही रीतिबद्ध है। नतीजतन, लेखन एक ‘खेल’ की तरह खुलता है, और जो अपने ही नियमों से परे चला जाता है और अपनी सीमाओं को अतिक्रमित करता है। लेखन में, लेखन के प्रकार्य को प्रकट करना या बढ़ाना, अब ये कोई मुद्दा नहीं रह गया हैै, और न ही भाषा में, किसी विषय को निर्धारित करना है। बल्कि, यह तो उस ‘स्पेस’ को बनाने का प्रश्न भर है, जहाँ लेखन का ‘कर्ता’ स्थाई रूप से लुप्त हो सके।

‘लेखन’ का मृत्यु से संबंध, तो हम सब के लिए और भी परिचित है। यह कड़ी, एक पुरानी परम्परा को, जो कि एक ग्रीक महाकाव्य से उद्धरित है, और जिसका उद्देश्य नायक के अमरत्व को अखण्ड बनाना था। अगर नायक युवावस्था में मृत्यु के वरण के लिए तैयार है, और उसका जीवन, मृत्यु से विराट और प्रतिष्ठित हो गया है, तो वह ‘अमरत्व’ में प्रवेश कर सकता है। यह नैरेटिव, बाद में, उस सहर्ष स्वीकारी गई मृत्यु में, मोक्ष की तरह प्रतिपादित करता है। मसलन हम देखें कि एक दूसरे प्रकार में, अरबी कहानियाँ-The Thousand and One Nights -का हेतु और साथ ही साथ, विषयवस्तु और पूर्व-पाठ भी, मृत्यु को टालना था। इसमें पात्र, अगली सुबह तक कहानियाँ सुनाता रहता है ताकि मृत्यु को पूर्वबद्ध किया जा सके ताकि निर्धारण का दिन, जो ‘किस्सागो’ को मौन कर देगा, ऐसी स्थिति को स्थगित किया जा सके। शहरजाद की कथा, एक प्रयास है, जिसका हर रात्रि को पुनर्नवीनीकरण होता है ताकि पूरे कथा-कथन के जरिये, मृत्यु को, जीवन के वृत्त से, बाहर और दूर रखा जा सके।

हमारी संस्कृति ने कथा या कहें कि ‘नैरेटिव के विचार’ को ऐसे ‘कुछ’ में कायान्तरित कर दिया है कि लेखन, मृत्यु को टालने के लिए ही बाध्य और परिकल्पित है। लेखन का जुड़ाव, बलिदान से हो गया है, यहाँ तक कि जीवन के परित्याग से भी, अब यह एक ‘स्वैच्छिक विलोपन’ है, जिसकी प्रस्तुति की आवश्यकता, अब पुस्तकों में भी नहीं रह गई है। क्योंकि, अब यह सब, अच्छी तरह से, लेखक के बुनियादी अस्तित्व से नाथ दिया गया है। ‘लेखन’, जिसका दायित्व कभी अमरत्व प्रदान करना था, अब वह, उसके स्वयं के ऑथर (सृष्टा या लेखक ) के वध का अधिकार रखता है, जैसा कि फ्लुबेर, प्रूस्त, और काफ्का के साथ हुआ। हालाँकि, यही सब कुछ नहीं है, लेखन और मृत्यु के बीच का यह संबंध, लेखन के विषय की वैयक्तिक विशेषताओं के विलोपन में भी प्रकट होता है। उन सारी युक्तियों का प्रयोग करके, जो उसने ‘स्वयं’ और ‘जो वह लिख रहा है’, इन दो छोरों के बीच उनको खड़ी करके, लेखन का ‘कर्ता’ अपनी विशिष्ट होने जाने वाली‘वैयक्तिकता’ को निरस्त कर रहा है। फलतः, लेखक का वर्चस्व घट कर, उसकी ‘अनुपस्थिति की एकवचनीयता’, के अलावा कुछ और शेष नहीं रह गया है-वस्तुतः, लेखक को, अब रचने की क्रीड़ा में, एक ‘मृत व्यक्ति’ की भूमिका धारण कर लेना पड़ेगी।

इसमें से कुछ भी हाल का नहीं है, ऑथर (लेखक) के लुप्त होने के संकेत- या मृत्यु का- अवलोकन, आलोचना और दर्शन ने, कुछ समय पहले ले लिया था। परन्तु, उनकी इस खोज के परिणाम अभी तक पर्याप्त रूप से जाँचे-परखे नहीं गए हैं, और न ही उनके आशय को ठीक से मापा गया है। कुछ अवधारणाएँ, जिनका उद्देश्य ऑथर (लेखक) की, उस विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति की प्रतिस्थापना करना था, वास्तव में उस विशेषाधिकार को संरक्षित करती जान पड़ती हैं और उसकी अनुपस्थिति के वास्तविक अर्थ को छुपाती हैं। मैं इन दो अवधारणाओं को, जो आज बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, उन्हें पहले क्रम पर रखूँगा।

पहला विचार है रचना। यह एक अतिपरिचित सिद्धांतिकी है कि आलोचना का काम, रचना के ऑथर से संबंध को प्रकट करना नहीं है, और न ही पाठ से, एक विचार या अनुभव की पुनर्रचना का है बल्कि आलोचना का काम, रचना के ढांचे से, उसकी संरचना से, उसके अन्तर्ग्रथित रूप से, और उसके आंतरिक संबंधों की क्रीड़ा को समझना, रचना का विश्लेषण करना है। हालाँकि, इस मुद्दे पर एक समस्या खड़ी होती है, रचना क्या है? यह वह कौन सी विलक्षण समग्रता है, जिसे हम ‘रचना’ नामोद्दिष्ट करते हैं? यह किन तत्वों से निर्मित की गई है? क्या यह वह नहीं है, जो ऑथर ने लिखा है? समस्याएँ तुरन्त खड़ी होती हैं। अगर एक व्यक्ति ऑथर नहीं होता, तो क्या हम यह कह सकते हैं कि, जो कुछ भी उसने लिखा है, कहा है, पन्नों में रख छोड़ा है या जो कुछ भी उसकी टिप्पणियों का संग्रह है, उसे ‘रचना’ कहा जा सके? जब साद को ऑथर नहीं माना गया, तब उनके लिखे हुए पृष्ठों की क्या हैसियत थी? क्या वे सिर्फ कागजों के बण्डल मात्र थे, जिन पर वे, अपने कारावास के दौरान, अपनी फन्तासियों को सतत खोलते रहे?

मान लीजिए कि जब कोई व्यक्ति एक ऑथर की तरह स्वीकार भी कर लिया गया है, तब भी हमें यह प्रश्न पूछते रहना चाहिए कि जो कुछ उसने लिखा, कहा, या रख छोड़ा, क्या वह उसके लेखन का भाग है? यह समस्या सैद्धान्तिक और तकनीकी दोनों है। उदाहरण के लिए, नीत्शे के लेखन के प्रकाशन के उत्तरदायित्व पूरा करने के समय, हमें कहाँ रुक जाना चाहिए? निश्चित रूप से उनका सब कुछ प्रकाशित किया जाना चाहिए, परन्तु ‘सब कुछ’ क्या है? निश्चित रूप से, ‘सब कुछ’, जिसे स्वयं नीत्शे ने प्रकाशित किया। और उनके लिखे हुए कच्चे मसौदे का क्या होगा? निश्चित रूप से यह भी प्रश्न खड़ा होता है कि उनकी सूक्तियों की योजना?-हाँ। पृष्ठों की पाद टिप्पणियाँ और विलोपित परिच्छेद? मैं फिर कहूँगा-हाँ। चलिये मान लें कि एक कार्य-पुस्तिका, जो कि सूक्तियों से भरी हुई है, उसमें हमें एक सन्दर्भ मिलता है या किसी से मिलने के समय का विवरण मिलता है या किसी का पता मिलता है, या किराने के सामान की सूची मिलती है, क्या यह लेखन है या नहीं? और नहीं है तो फिर क्यों नहीं है? आदि आदि। उन लाखों पदचिह्नों के बीच, जो व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद छोड़ जाता है, उस काम को कोई कैसे परिभाषित कर सकता है? क्योंकि इस तरह के काम का अभी तक कोई सिद्धान्त अस्तित्व में नहीं है और जो लोग अनभिज्ञता में, रचना के सम्पादन का, अपनी नीमहकीमी में कार्य का बीड़ा उठाते हैं, वे सिद्धान्त की अनुपस्थिति में कष्ट का सामना करते हैं।

हम इससे आगे भी जा सकते हैं, क्या The Thousand and One Nights को रचना की निर्मिति मानी जाए? अलेक्सेण्ड्रिया के क्लेमेण्ट के Miscellanies या डायोजिनीस के Lives का क्या करें? लेखन की इस अवधारणा के साथ बहुतेरे प्रश्न खड़े होते हैं। इसके परिणाम स्वरूप, यह घोषित करना ही काफी नहीं है कि लेखक के बिना हमारा काम चल जाएगा और हमें सिर्फ लेखन का ही विवेचन करना चाहिए। शब्द, लेखन और संरचनात्मक-एकता, जो यह त्रिकोण स्थापित करता है, संभवतः वह उतना ही समस्यामूलक है, जितनी कि ऑथर की वैयक्तिकता की प्रतिष्ठा।

एक और अवधारणा, जिसने ऑथर के विलोपित हो जाने के पूर्ण मूल्यांकन से, जो विघ्न खड़ा किया है, और इस विलोपन के क्षण को धूमिल किया है और ढाँपा है और सूक्ष्म रूप से ऑथर के अस्तित्व को संरक्षित किया है, वही है, लेखन की अवधारणा (ecriture)। जब इसे कठोरता के साथ लागू किया जाता है, तब यह अवधारणा हमें ऑथर के बारे में, अधिकांश सन्दभोंर् को न केवल चतुर्दिक घेरने की अनुमति देता है, बल्कि इसके अलावा, हमें उसकी हाल की अनुपस्थिति को इंगित भी करने देता है। लेखन की यह अवधारणा, जैसी कि यह अभी प्रयोग में है, न तो इसका लेखन के कर्म से सरोकार है, और न ही किसी अर्थ के संकेत या लक्षण- से, जो भी कोई अभिव्यक्त करना चाहता हो। हम, बड़ी मेहनत के साथ, हर पाठ की सामान्य दशा की कल्पना की कोशिश करते हैं, उन दोनों की दशा की, यानि वह ‘स्पेस’, जिसमें पाठ व्यवहृत हुआ है और वह ‘काल’, जिसमें वह प्रकट हो रहा है, की कल्पना की कोशिश करते हैं।

हाल ही के प्रयोग में, हालाँकि,लेखन की अवधारणा, ऑथर की आनुभाविक विशेषताओं को, एक अनुभवातीत अनामत्व, में रूपांतरित करती प्रतीत होती है। हम लेखन को वर्गीकृत करने के दो प्रकारों, यानि, ‘आलोचनात्मक-विवेक‘ और ‘धर्म दृष्टि’ को एक दूसरे से भिड़ा कर, ऑथर की अनुभवजन्यता के अधिक दृष्टिगोचर संकेतों में विसर्जित करने में संतुष्ट हैं। लेखन को एक आद्य प्रतिष्ठा देना, अनुभवातीत शब्दावली में, दोनों, उसकी पवित्र लाक्षणिकता का, ‘धर्म दृष्टि’ द्वारा स्वीकार और उसके सृजनात्मक चरित्र की आलोचनात्मक स्वीकृति के महज पुनरानुवाद का एक तरीका प्रतीत होता है। यह स्वीकार करना कि लेखन, उस इतिहास के कारण, जिसने उसे संभव बनाया, दमन और विचलन के परीक्षण के अधीन है, उस धार्मिक सिद्धान्त का गूढ़ अर्थ (जिसके लिए अभी व्याख्या की आवश्यकता है) और अव्यक्त अर्थवत्ता, मौन निश्चय, और धुंधले कथ्यों के आलोचनात्मक सिद्धान्त (जो कि टिप्पणियों को पैदा करता है) का, अनुभवातीत शब्दावली में, प्रतिनिधित्व करता प्रतीत होता है। लेखन की ‘अनुपस्थिति’ के रूप में कल्पना करना, अनुभवातीत शब्दावली में, एक सरल पुनरावृत्ति प्रतीत होता है, दोनों का अपरिवर्तनीय परन्तु फिर भी कभी परिपूर्ण नहीं की गई परंपरा के धार्मिक सिद्धान्त का, और लेखन के अस्तित्व, ऑथर के मृत्यु के बाद ऑथर के काम का नैरन्तर्य, और ऑथर के संबंध में, ऑथर के काम की प्रचुर गूढ़ता, इन सबका का सौंदर्य सिद्धान्त, लेखन के सन्दर्भ में अन्तरग्रथित है।

लेखन की अवधारणा का प्रयोग, ऑथर के विशेषाधिकार को लेखन की पूर्व-स्थिति को सुरक्षित बनाए रखने का जोखिम उठाता है, प्रभावहीनता की धूसर रौशनी में, यह उन पुनर्प्रस्तुतियों की व्याख्या को जीवित रखता है, जिन्होंने ऑथर की एक विशिष्ट छवि बनाई। ऑथर की अनुपस्थिति, जो कि मलार्मे के समय से, एक निरन्तर होने वाला प्रसंग है, अनुभवातीत अवरोधों की एक शृंखला के अधीन है। ऐसा लगता है कि जो इसमें विश्वास रखते हैं कि वे अभी भी आज की विच्छिन्नता को, उन्नीसवीं शताब्दी की ऐतिहासिक- अनुभवातीत परंपरा में अवस्थित कर सकते हैं, और दूसरे वो, जो इस परंपरा से सर्वथा के लिए स्वतंत्र होने का प्रयास करते हैं, के बीच एक महत्त्वपूर्ण विभाजन रेखा है।

हालाँकि, यह काफी नहीं है, इस सतही स्वीकार को दुहराना कि ऑथर लुप्त हो गया है। और इन्हीं कारणों से, यह दुहराना (नीत्शे के बाद) भी काफी नहीं है कि ईश्वर और आदमी दोनों की एक सामान्य मृत्यु हो चुकी है। इसके बदले, हमें ऑथर के ‘विलोपित’ होने से उस ‘स्पेस’ को ढूँढना ही होगा, उन अंतराल और दरारों की खोज करना होगा, और उन आरम्भों पर ध्यान एकाग्र करना होगा, जो कि ऑथर के विलोपन ने उघाड़े हैं।

पहले तो हमें ऑथर के नाम के प्रयोग से उपजी समस्याओं को संक्षेप में स्पष्ट करना होगा। ऑथर का नाम क्या है? वह कैसे कार्य करता है? बहरहाल, समाधान प्रस्तुत करने के बदले, मैं सिर्फ, कुछ उन कठिनाइयों की तरफ संकेत करूँगा, जो ऑथर के नाम के प्रयोग से उपजती हैं।

ऑथर का नाम, एक व्यक्तिवाचक नाम है, और इसलिए यह उन समस्याओं को उठाता है, जो कि सारे व्यक्तिवाचक नामों में समान है। (यहाँ पर मैं सर्ल के विश्लेषण का संदर्भ दूँगा।) प्रत्यक्ष रूप से, एक व्यक्तिवाचक नाम को एक सीधे और सरल संदर्भ में नहीं बदला जा सकता। इसके संकेतक प्रकार्यों के अलावा और भी कुछ प्रकार्य हैं। यह, संकेत, या मुद्रा, या किसी की ओर उठी हुई उँगली से कहीं अधिक, एक बखान के समकक्ष है। जब कोई, ‘अरस्तू’, कहता है, तब वह एक शब्द को नियुक्त करता है, जो कि एक निश्चित विवरण, या उसकी शृंखलाओं के समकक्ष है, जैसे कि, analytics का लेखक, Ontology के प्रवर्तक, और आदि आदि। हालाँकि, हम सिर्फ यहाँ ही नहीं रुक सकते, क्योंकि व्यक्तिवाचक नामों का सिर्फ एक ही अभिप्राय नहीं होता। हमें जब यह मालूम पड़ा कि रिम्बू ने La Chsase spirituelle नहीं लिखा है, तब हम यह बहाना नहीं कर सकते कि, इस व्यक्तिवाचक नाम का अर्थ, या लेखक के नाम का अर्थ, उलट हो गया है। व्यक्तिवाचक नाम और लेखक का नाम, विवरण और पद के दो ध्रुवों के बीच स्थित है और जिसका वे नामकरण करते हैं, उसके साथ उनका एक निश्चित सम्बन्ध सेतु होना ही चाहिए। परन्तु ऐसा सम्बन्ध, जो कि, न तो पूरी तरह पद के रूप में हो, और न ही विवरण के बल्कि उसको एक विशिष्ट सम्बन्ध सेतु होना चाहिए। हालाँकि, यहाँ पर ऑथर के नाम की विशिष्ट कठिनाई उपजती हैं-व्यक्तिवाचक नाम और व्यक्ति, जिसका नामकरण किया जा रहा है और ऑथर का नाम और ऑथर, जिसका नामकरण करता है, के बीच की समरूपता नहीं हैं, और वे एक ही प्रकार से कार्य नहीं करती हैं। इनमें कई भेद हैं।

उदाहरण के लिए, जैसे, पियरे ड्यूपोण्ट की आँखें नीली नहीं हैं, या उसका जन्म पैरिस में नहीं हुआ था, या वह चिकित्सक नहीं है, यह नाम पियरे ड्यूपोण्ट, सर्वदा उसी व्यक्ति को सन्दर्भित करेगा। दरअसल उपरोक्त चीजें, पद के सम्बन्ध को रूपान्तरित नहीं करती हैं। परन्तु, ऑथर के नाम से उपजी हुई समस्याएँ अधिक जटिल हैं। अगर मुझे यह पता पड़े कि, शेक्सपियर का जन्म उस घर में नहीं हुआ था, जहाँ हम आज जाते हैं, तो यह ऐसा परिवर्तन है जो, प्रकटतः, ऑथर के नाम के प्रकार्य को उलट देगा। परंतु, अगर हमने यह प्रमाणित कर दिया कि, शेक्सपियर ने वे सॉनेट्स नहीं लिखे हैं, जो उनके नाम से चलते हैं, तो यह एक आशयगर्भित परिवर्तन पैदा करेगा, और सहसा उस प्रणाली को ही प्रभावित कर देगा, जिससे ऑथर का नाम काम करता है। अगर हमने यह सिद्ध कर दिया कि, शेक्सपियर ने बेकन का Organon लिखा है, यह दिखाकर कि किसी एक ऑथर ने दोनों, बेकन और शेक्सपियर की कृतियों की रचना की है, तब यह एक तीसरे प्रकार का परिवर्तन होगा जो कि, ऑथर के नाम की कार्यप्रणाली को पूरी तरह रूपान्तरित कर देगा। इसीलिए, ऑथर का नाम, बाकी सारे व्यक्तिवाचक नामों की तरह कतई नहीं है अलबत्ता नितान्त भिन्न है।

इसके अलावा भी दूसरे कई तथ्य ऑथर के नाम की अन्तर्विरोधी एकवचनीयता की तरफ संकेत करते हैं। यह कहना कि, पियरे ड्यूपोण्ट अस्तित्व में नहीं है, यह कहने से सर्वथा भिन्न है कि, होमर या एर्मेस त्रिस्मेगिस्टस अस्तित्व में नहीं थे। पहले प्रकरण में, इसका मतलब यह होता है कि किसी भी व्यक्ति का नाम पियरे ड्यूपोण्ट नहीं है। वहीं दूसरे प्रकरण में, इसका मतलब यह निकलता है कि बहुतेरे लोग इस एक नाम के नीचे एक साथ मिश्रित हैं, या कि वास्तविक ऑथर के पास, वे सारे लक्षण नहीं थे, जो पारंपरिक रूप से एर्मेस या होमर के व्यक्तित्व में आरोपित किए जाते हैं। यह कहना कि फलाँ व्यक्ति का नाम, वास्तव में पियरे ड्यूपोण्ट के बदले जैक द्युरो है, यह कहने जैसा नहीं है कि स्तेन्दाल का नाम हेनरी बेल था। कोई उन प्रस्तावों के अर्थ और उनके कार्यों पर भी प्रश्नचिह्न लगा सकता है, जैसे ”बूरबिक फलाँ-फलाँ हैं, आदि और ”विक्टर एरेमिता, क्लाइमेक्स और एण्टी क्लाइमेक्स, फ्रेटर टैसिटर्नस, कोंस्टनटिन कोंस्टनटिनस, ये सब कीर्केगार्द हैं।”

ये सारे अन्तर, बुनियादी रूप से, इस तथ्य से उपजते हैं कि, ऑथर का नाम सिर्फ आख्यान का तत्व नहीं है (वस्तु या विषय होने में सक्षम है, या व्यक्तिवाचक से विस्थापित होने में सक्षम है, आदि) ऑथर का नाम विमर्श या आख्यान के संदर्भ में, वर्गीकरण का कार्य करता हुआ, एक विशेष भूमिका अदा करता है। इस तरह का नाम, कई पाठों को एक समूह में, एकत्र करने की अनुमति देता है, उन्हें परिभाषित करता है, और दूसरे पाठों से उन्हें विलगाता है और विपर्यय उत्पन्न करता है। इसके अलावा, यह पाठों के बीच एक अन्तर्सम्बन्ध स्थापित करता है। एर्मेस त्रिस्मेगिस्टस, और हिप्पोक्रेट्स उस अर्थ में अस्तित्व में नहीं थे, जिस अर्थ में बाल्जाक अस्तित्व में थे- परन्तु, यह तथ्य कि बहुतेरे पाठ, इन समान नामों के अन्तर्गत हैं, यह इंगित करता है कि, इन नामों और पाठों के बीच एक एकरूपता का, उद्गम का, दूसरों के प्रयोग द्वारा कुछ पाठों के प्रमाणीकरण का, पारस्परिक व्याख्या का, या सहगामी उपयोग का संबंध स्थापित हो चुका है। ऑथर का नाम, आख्यान के अस्तित्व के एक विशिष्ट प्रकार को वर्गीकृत करता है यह तथ्य कि आख्यान के पास ऑथर का नाम है कि कोई यह कह सकता है कि ‘यह फलाँ के द्वारा लिखा गया था’ या ‘फलाँ इसका ऑथर है’, यह दिखाता है कि यह आख्यान दैनंदिन की साधारण भाषा का नहीं है, जो कि सिर्फ ‘आती है और जाती है’, और न ही यह त्वरित उपभोग के योग्य है। इसके विपरीत, यह वह भाषा है, जो कि एक विशेष प्रकार से ग्रहण की जानी चाहिए, और, किसी भी संस्कृति में, इसे एक विशिष्ट प्रतिष्ठा प्राप्त होनी चाहिए।

ऐसा लगता है कि, ऑथर का नाम, दूसरे व्यक्तिवाचक नामों की तरह, आख्यान के आन्तरिक से वास्तविक और बाह्य के ‘वैयक्तिक’, जिसने उसे उत्पन्न किया है, तक नहीं गुजरता है बल्कि ऐसा लगता है कि नाम हमेशा ही उपस्थित रहता है, पाठ के तटों को चिह्नित करता हुआ, उसके ‘होने के प्रकार’ को प्रकट करता हुआ, या कम से कम उसकी लाक्षणिकता को रेखांकित करता हुआ। ऑथर का नाम, एक किसी तर्कमूलक प्रणाली की उपस्थिति को स्पष्ट करता है और समाज और संस्कृति में, उस आख्यान की प्रतिष्ठा की तरफ संकेत करता है। इसकी कोई विधिक प्रतिष्ठा नहीं है, और न ही यह रचना के गद्य में स्थित है बल्कि यह उस विखंडन में स्थित है, जो कि एक तार्किक संरचना और उसके विशिष्ट ‘होने के प्रकार’ को सीमित करता है। इसके परिणाम स्वरूप, हम यह कह सकते हैं कि, हमारी सभ्यता जैसी किसी सभ्यता में, एक नियत संख्या में कुछेक आख्यान ऐसे हैं, जो ’ऑथर के प्रकार्य’ से सम्पन्न हैं, और बाकी आख्यान उससे वंचित हैं। कोई किसी व्यक्तिगत पत्र का हस्ताक्षरकर्ता हो सकता है-

 

उसका ऑथर नहीं होता, किसी अनुबंध का गारण्टियर हो सकता है- उसका ऑथर नहीं होता। अतः, ऑथर का प्रकार्य, समाज के कुछ आख्यानों के अस्तित्व के प्रकार का, उनके प्रचलन का, और उनकी कार्यप्रणाली का लक्षण है।

चलिये, इस ‘ऑथर के प्रकार्य’ का, जिसको हमने अभी प्रस्तुत किया है, विश्लेषण करें। हमारी संस्कृति में, कोई ऑथर का प्रकार्य रखने वाले किसी आख्यान को कैसे चित्रित करता है? किन प्रकारों से यह आख्यान दूसरे अन्य आख्यानों से भिन्न है? अगर हम अपनी टिप्पणियों को किसी पुस्तक या पाठ के लेखक तक सीमित रखें तो, हम उन्हें चार विभिन्न गुणावगुणों के आधार पर अलग कर सकते हैं।

सबसे पहले, आख्यान के विनियोजन के कुछ निश्चित लक्ष्य हैं। स्वामित्व का वह रूप, जिससे वे प्रस्फुटित होते हैं, वह एक विशेष प्रकार का है, जिसे सालों से चिह्नित किया गया है। हमें यह दर्ज करना चाहिए कि, ऐतिहासिक रूप से, कि इस प्रकार का स्वामित्व, हमेशा से, जिसे हम दण्ड-विनियोग कह सकते हैं, का उत्तरवर्ती है।

पाठ, पुस्तकों, और आख्यानों के वास्तविक ऑथर होने लगे ( मिथकीय, ”संस्कार“ और ”संस्कारित रूप“ होने के अलावा), और उस सीमा तक, ऑथर दण्ड के दायरे मे चले गये, जहाँ तक, विमर्श अतिक्रामी हो सकते थे। हमारी संस्कृति में (और निस्संदेह दूसरी कई संस्कृतियों में भी), विमर्श मूलरूप से एक उत्पाद, वस्तु, या एक प्रकार का माल नहीं था। वह अत्यावश्यक रूप से एक कृत्य था- एक कृत्य जो कि पवित्र और पातकी, धार्मिक और ईश-निन्दक के द्विध्रुवीय क्षेत्र में अवस्थित था। ऐतिहासिक रूप से आख्यान, स्वामित्व के कुचक्र में उलझने से पहले, यह एक जोखिम भरी भंगिमा थी।

एक बार जब पाठ के स्वामित्व की व्यवस्था अस्तित्व में आ गई, जब ऑथर- के अधिकारों से, ऑथर प्रकाशक के संबंधों से, और पुनर्प्रकाशन के अधिकारों से संबद्ध कठोर नियम, प्रभावशील हो गए-अठारहवीं शताब्दी के अन्त और उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में- तब लेखन के कृत्य से संबंधित अतिक्राम्य की संभावना, उत्तरोत्तर एक प्रकार की निदेशात्मकता का, जो कि साहित्य के लिए विशिष्ट थी, का रूप लेती गई। यह ऐसा था, जैसे कि ऑथर ने, उस क्षण के प्रारम्भ से, जिसमें वह सम्पत्ति की व्यवस्था में, जो कि हमारे समाज की लाक्षणिकता को प्रकट करती है, में अवस्थित हुआ, और इस तरह से अधिगृहित अपने गौरव के लिए उसने, आख्यान के पुराने द्वि-ध्रुवीय क्षेत्र को पुनराविष्कृत करके, व्यवस्थित रूप से अतिक्राम्य होने की चेष्टा करते हुए, उसकी क्षति पूर्ति करनी शुरू की, और इस तरह उस लेखन में, जिसमें अब स्वामित्व के लाभ सुनिश्चित थे,में जोखिम को पुनः प्रतिस्थापित किया।

हालाँकि, यह ऑथर का प्रकार्य सारे आख्यानों को एक समान रूप से प्रभावित नहीं करता। यह उसका दूसरा लक्षण है। हमारी सभ्यता में, हमेशा एक ही प्रकार के पाठों ने, किसी ऑथर के अधिकार का आग्रह नहीं किया है। एक समय था, जब उन पाठों को, जिन्हें हम आजकल ‘साहित्यिक’ (कथानक, कहानियाँ, महाकाव्य, त्रासदी, व्यंग्य) कहते हैं, वे ऑथर की एक निश्चित पहचान के बारे में बिना किसी प्रश्न के, स्वीकृत होते थे, प्रचलित होते थे, प्रतिष्ठित होते थे, उन पाठों की अनामता से कोई कठिनाई उत्पन्न नहीं होती थी। क्योंकि उनकी, वास्तविक या काल्पनिक, प्राचीनता को, उनकी प्रतिष्ठा की पर्याप्त गारन्टी माना जाता था। वहीं दूसरे ओर, वह पाठ, जिन्हें हम आज वैज्ञानिक कहते हैं- जो अंतरिक्ष और ब्रह्मांड, चिकित्सा और बीमारी, विज्ञान और भूगोल से सरोकार रखते हैं- मध्य युग में ‘सत्य’ की तरह तभी स्वीकृत होते थे, जब उनके ऑथर का नाम उन पर होता था। ”हिप्पोक्रेट्स ने कहा,“ ”प्लिनी ने याद किया“ये सब विशेषज्ञता पर आश्रित तर्कों के सूत्र नहीं थेे। वे विमर्शों में शामिल किए गए चिह्न थे, जिन्हें समर्थन दिया गया था, ताकि वे प्रदर्शित सत्य के, वैध वक्तव्यों की तरह ग्रहण किए जाएँ।

सत्रहवीं या अठारहवीं शताब्दी में, जाकर कहीं इसका उलटफेर हुआ। वैज्ञानिक आख्यान, एक स्थापित या हमेशा पुनः प्रकटित सत्य की अनामता में, स्वयं के ही कारण ग्राह्य होने लगे। उन्हें उत्पन्न करने वाले व्यक्ति के संदर्भ के बदले, एक व्यवस्थित सामूहिकता में, उनकी सदस्यता ही उनकी, गारन्टी की तरह खड़ी हो गई। ऑथर का प्रकार्य धूमिल हो गया, और आविष्कारक का नाम किसी थियोरम, प्रस्ताव-कथन, विशिष्ट प्रभाव, गुणदोष, तत्व समूह, या शारीरिक व्याधि के लक्षण के नामकरण के लिए ही रह गया। और इसी प्रकार से, साहित्यिक आख्यान भी, तभी स्वीकृत होने लगे, जब वे ऑथर के प्रकार्य से सम्पन्न थे। आज हम हर काव्य या गद्य के पाठ से, यह पूछते हैं कि यह कहाँ से आया है? इसे किसने लिखा है? कब, और किन परिस्थितियों में, किस परिकल्पना से इसका प्रारम्भ हुआ है? और जिस तरह से हम इन प्रश्नों के उत्तर देते हैं, उन उत्तरों के आधार पर हम उस ‘पाठ’ को अर्थ के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं और उसे प्रतिष्ठा या मूल्य प्रदान करते हैं। और अगर कोई पाठ अनामता की स्थिति में पाया जाए- भले ही किसी दुर्घटना स्वरूप या ऑथर की प्रकट इच्छा के अनुरूप- तो उस पाठ के ऑथर को खोजने का खेल शुरू हो जाता है। चूँकि, ‘साहित्यिक अनामता’ असह्य है, इसलिए हम उसे सिर्फ एक रहस्य के वेश में ही स्वीकार कर सकते हैं। फलतः, आज ऑथर का प्रकार्य, साहित्यिक कृतियों को देखने की हमारी दृष्टि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (ये निश्चित रूप से सामान्यीकरण हैं, जिन्हें, जहाँ तक आलोचनात्मक चेष्टा का सरोकार है, इसे परिष्कृत करना होगा)

इस ऑथर का प्रकार्य का तीसरा लक्षण यह है कि, ऑथर का प्रकार्य, एक व्यक्ति के विमर्श को श्रेय देने से ही यह अकस्मात विकसित नहीं होता। बल्कि, यह उस जटिल प्रक्रिया का परिणाम है, जो एक बौद्धिक सत्ता को खड़ा करता है, जिसे हम ‘ऑथर’ नाम से चिह्नित करते हैं। आलोचक, व्यक्ति में एक गहन प्रयोजन, एक सृजनात्मक शक्ति, या परिकल्पना, वह परिवेश, जिसमें लेखन जन्म लेता है, को पुनः स्मरण करते हुए, निस्संदेह, इस ‘बोधगम्य-सत्ता’ को एक वास्तविक प्रतिष्ठा देने का भरसक प्रयास करते हैं। फिर भी, व्यक्ति के वह आयाम, जिन्हें हम चिह्नित करते हैं कि वे ऑथर को बनाते हैं, वे सिर्फ प्रक्षेपण मात्र हैं कमोबेश मनोविज्ञान की शब्दावली में, उन कार्य व्यापारों का, जो जिसका अनुभव करने के लिए हम पाठ पर दबाव डालते हैं। इस तरह, जो हम जोड़ते हैं, वे लक्षण जिनसे हम संगति बिठाते हैं, वे निरंतरताएँ, जिन्हें हम पहचानते हैं, या बहिष्कार जिनकी हम चेष्टा करते हैं। ये सारी प्रक्रियाएँ विमर्श के प्रकार और काल के अनुरूप तरह-तरह की हो जाती हैं। जैसे हम ’कवि’ की संरचना बनाते हैं, वैसे ही हम ‘दार्शनिक ऑथर‘ की संरचना नहीं करते हैं, ठीक वैसे ही, जैसे कि अठारहवीं शताब्दी में, कोई उपन्यासकार की संरचना नहीं करता था, जैसा कि हम आज करते हैं। फिर भी, युगों से, ऑथर के गढ़न्त के नियमों में, हमें कुछ स्थिर एकनिष्ठता मिल सकती है।

उदाहरण के लिए, ऐसा लगता है कि, जिस तरीके से साहित्यिक आलोचना ने कभी ‘ऑथर’ को परिभाषित किया- या, शायद कहें तो, जिस तरह मौजूदा पाठों और आख्यानों से प्रारम्भ करके, ‘ऑथर’ का प्रारूप गढ़ा - यह उस प्रविधि का सीधा परिणाम है, जिस प्रविधि से ईसाई परंपरा, अपने निर्णय पर पाठों को सत्यापित (या रद्द) करती थी। किसी ऑथर को, उसके काम में ’पुनराविष्कृत’ करने के लिए, आधुनिक आलोचना, उन्हीं नियत प्रविधियों का प्रयोग करती है, जिन्हें ईसाई भाष्यकार, ऑथर के संतत्व से किसी पाठ का मूल्यांकन करने में प्रयोग में लाता था। De viris illustribus में संत जेरोम यह स्पष्ट करते हैं कि, एक से अधिक कृतियों के लेखकों को, वैध रूप से पहचानने के लिए, कृतियों का, समनाम होना ही पर्याप्त नहीं है, अलग-अलग व्यक्तियों का एक ही नाम हो सकता है या किसी एक व्यक्ति ने, अवैध रूप से, किसी दूसरे व्यक्ति का पैतृक नाम उधार ले लिया हो। जब कोई पाठ परंपरा में काम कर रहा हो तो, एक व्यक्तिगत मुहर की तरह नाम काफी नहीं है।

तब, कैसे, हम बहुतेरे आख्यानों को, एक ही ऑथर के नाम को श्रेय दे सकते हैं? तब कोई ऑथर के प्रकार्य को कैसे प्रयोग में लाकर, यह सुनिश्चित करे कि वह एक व्यक्ति से, व्यवहार कर रहा है या कि कइयों से? संत जेरोम चार कसौटियों का प्रस्ताव रखते हैं (1) अगर ऑथर के नाम से स्वीकार की गईर्, बहुत सारी पुस्तकों में से एक पुस्तक, दूसरी पुस्तकों की तुलना में कमतर है तो, वह पुस्तक ऑथर की लिखी हुई पुस्तकों की सूची में से निरस्त कर के बाहर करनी होगी (ऑथर, इसलिए, एक सतत् मूल्य की तरह परिभाषित होता है) (2) यही तब भी किया जाना चाहिए, जब कोई पाठ, ऑथर की दूसरी कृतियों में प्रतिपादित किए गए मत को खंडित करता है तो ऑथर, तब विचारधारात्मक संगति की तरह परिभाषित है (3) उन कृतियों को भी छाँटकर बाहर किया जाना चाहिए जो कि भिन्न शैली में लिखी गई हैं, या जिनमें उन शब्दों और अभिव्यक्तियों का प्रयोग है, जो कि सामान्यतः ऑथर के लेखन में नहीं मिलते हैं (ऑथर यहाँ एक शैलीगत एक्य की तरह कल्पित किया गया है) (4), और अंत में, वे उद्धरण, जो उन वक्तव्यों या उन घटनाओं को उद्धृत करते हैं, जो कि ऑथर की मृत्यु के बाद बोले गए हैं, या घटे हैं, तो उन्हें पहले कहे गये पाठ की तरह माना जाए (ऑथर को यहाँ एक ऐतिहासिक छवि, जो कि कुछेक संकटमय और दिग्भ्रमित है की तरह देखा जा रहा है।)

आधुनिक साहित्यिक आलोचना, प्रमाणीकरण के प्रश्नों से संबद्ध नहीं है, परन्तु वह फिर भी ऑथर को वैसे ही परिभाषित करती है।

ऑथर अपने काम में, न केवल कुछ प्रसंगों की उपस्थिति को व्याख्यात्मक आधार प्रदान करता है, परन्तु उनके रूपान्तरण, अविरूपन, और बहुस्तरीय संशोधनों (अपनी जीवनी से, अपने वैयक्तिक परिप्रेक्ष्य के निर्धारण से, अपनी सामाजिक स्थिति के विश्लेषण से, और अपनी मूलभूत परिकल्पना के प्रकटीकरण से) भी स्पष्ट करता है। ऑथर, लेखन की एक प्रकार की एकता का सिद्धान्त भी है-विभेदों का कम से कम अंश में विकास, परिष्कार और प्रभावों के सिद्धान्तों से गुँथा हुआ निराकरण। ऑथर, पाठों की शृंखला में प्रादुर्भूत होने वाले विरोधाभासों को भी निष्क्रिय करता है। एक बिन्दु ऐसा होना चाहिए-ऑथर के विचार या कामना के एक स्तर पर, ऑथर के चेतन या अचेतन में- जहाँ सारे विरोधाभास विसर्जित हो जाते हैं, जहां पर वे किसी असंगत छोर में अंत में एक साथ बंध जाते हैं, या किसी मूलभूत या जन्मना विरोधाभास के इर्दगिर्द व्यवस्थित हो जाते हैं। अंत में, ऑथर, एक प्रकार की अभिव्यक्ति का स्रोत है जो, कमोबेश पूर्ण रूप में, और समान वैधता के साथ, अपनी रचनाओं में, अपने रेखाचित्रों में, अपने पत्रों में, अपने लिखे हुये के टुकड़ों में और आदि आदि में समरूप से व्यक्त होता है। स्पष्टतः संत जेरोम के प्रामाणिकता के चार मानदंड (वे मानदंड जो आज के भाष्य के लिए सर्वथा अपर्याप्त हैं), उन चार विभेदों को परिभाषित करती हैं, जिनके मुताबिक आधुनिक आलोचना, ऑथर के प्रकार्य को प्रयोग में लाती है।

परंतु, ऑथर का प्रकार्य, निष्क्रिय सामग्री के रूप में दिए गए पाठ का, दोयम, और एक शुद्ध और नैसर्गिक संरचना नहीं है। पाठ में हमेशा, लेखक की ओर संकेत करने वाले कुछेक चिन्ह समाहित रहते हैं। ये चिह्न, जो कि वैयाकरणों के लिए चिरपरिचित हैं, जैसे व्यक्ति वाचक सर्वनाम, काल और स्पेस के क्रिया विशेषण और क्रिया रूप हैं। ये तत्व, उन आख्यानों, जिनमें ऑथर का प्रकार्य उपस्थित है, में एक जैसी भूमिका नहीं अदा करते हैं, बनिस्बत उन आख्यानों में, जिनमें ऑथर का प्रकार्य नहीं है। इस प्रकार के ”पैंतरा बदलने वाले“ वास्तविक वक्ता को और उसके आख्यान को क्षणिक आवेग की तरह गिनते हैं (हालाँकि, कुछ संशोधन हो सकते हैं, जैसे कि प्रथम पुरुष में लिखे गए, सम्बन्धित आख्यानों के सन्दर्भ में)। उन आख्यानों में, जिनमें ऑथर का प्रकार्य प्रदत्त है, इन तत्वों की भूमिका अधिक कठिन और भिन्न है। हरेक व्यक्ति जानता है कि प्रथम पुरुष में वर्णित किये गये उपन्यास में, न तो प्रथम पुरुष संज्ञा और न ही निर्दिष्ट वर्तमान या तो ऑथर को या फिर उस विशेष क्षण को, जिसमें लेखक लिखता है, को साफ तौर पर सन्दर्भित करता है, बल्कि इसके साथ ही वह, उस अपर-स्वरूप (अल्टर-इगो) की ओर अचूक संकेत करता है, जिससे ऑथर की दूरी, कृति के दायरे में घटती बढ़ती या बदलती रहती है।

यहां तक आ कर कोई व्यक्ति, यह आपत्ति उठा सकता है कि, यह लक्षण औपन्यासिक या काव्यात्मक आख्यानों की विशिष्टता है, एक ‘खेल’, जिसमें ’अर्ध-आख्यान’ भागीदारी करते हैं। दरअस्ल, हालाँकि, वे सारे आख्यान, जो ऑथर के प्रकार्य से सम्बन्धित हैं, इस स्व की बहुवचनता रखते हैं। वह स्व जो कि गणित के शोध-प्रबन्ध की प्रस्तावना में बोलता है- और जो उस शोध-प्रबन्ध के संयोजन की परिस्थितियों की तरफ संकेत करता है- न तो वह अपनी स्थिति में और न ही अपनी कार्य प्रणाली में, उस स्व के समान है, जो एक आख्यान के दौरान बोलता है, और जो ‘मैं इस निष्कर्ष पर आता हूँ’ या ‘मैं यह अनुमान लगता हूँ’ के रूप में सामने आता है। पहले उदाहरण में, ‘मैं’ उस व्यक्ति की ओर संकेत करता है, जिसका कोई समकक्ष नहीं है, जो एक निश्चित काल और दिक् में, किसी कार्य को फलीभूत कर्ता है। दूसरे उदाहरण के ‘मैं’ में, यह एक और घटना-प्रसंग के प्रदर्शन के स्तर की ओर संकेत करता है, जो कोई भी व्यक्ति दे सकता है, जोकि उन समान संकेतों की व्यवस्था और मूल्य-मीमांसा को स्वीकार करता हो। हम उसी शोध-प्रबन्ध में, एक तीसरे आत्म को भी ढूँढ सकते हैं, वह आत्म जो कि शोध-प्रबन्ध के अर्थ को समझाने के लिए, जो व्यवधानों से भिड़न्त करता है, जो परिणाम आए, और शेष समस्याओं के बारे में बोलता है यह आत्म ‘पूर्व से ही उपस्थित’ या ‘जो अभी प्रकट होने वाला है’ उस गणित के क्षेत्र के बारे में बोलता है। ऑथर का प्रकार्य, इन तीनों ‘आत्म’ में से पहले वाले ‘आत्म’ के द्वारा, बाकी दूसरे दोनों ‘आत्म’ के बल बूते पर, क्योंकि अगर ऐसा होता तो वह, पहले ‘आत्म’का बाकी दोनों ‘आत्म’ में कल्पित विखंडन होने के अलावा और कुछ नहीं होता। परंतु, इसके उलट, इन आख्यानों में, ऑथर का प्रकार्य इस तरह कार्य करता है कि इन तीनों ‘आत्म’ की व्याप्ति पर एक ही साथ प्रभाव डाल सके।

निस्संदेह, विश्लेषण ऑथर के प्रकार्य के कुछ और चारित्रिक लक्षणों को खोज सकता है। परंतु, मैं अपने आप को इन चार चारित्रिक लक्षणों तक ही सीमित रखूँगा, क्योंकि, ये सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं और सबसे अधिक दृष्टव्य भी। वे चार चारित्रिक लक्षण इस प्रकार हैं (1) ऑथर का प्रकार्य उस न्यायिक और संस्थागत प्रणाली से संबद्ध है, जो कि, आख्यानों के विश्व को घेरता है, निर्धारित करता है, और समन्वित करता है। (2) यह सारे आख्यानों को, एक ही समय में और सारे प्रकार की सभ्यताओं में, एक ही समान व्यवहार नहीं करता है। (3) यह आख्यान के सृष्टा के आकस्मिक आरोपण से नहीं, बल्कि, विशिष्ट और जटिल प्रक्रियाओं की शृंखला के द्वारा परिभाषित है। (4) यह शुद्ध्तः और सहज ही किसी व्यक्ति को सन्दर्भित नहीं करता हैै, क्योंकि यह एक साथ बहुतेरे ‘आत्म’ और बहुतेरे विषयों को उपजा नहीं सकता है।

इस बिन्दु तक मैंने अपना विषय कुछ ज्यादा ही सीमित रखा। निश्चित रूप से चित्रकला, संगीत, और दूसरे अन्य कलाओं के ऑथर के प्रकार्य पर भी जिरह की जाना चाहिए, परंतु, अगर हम यह मानकर भी चलें कि हम आख्यानों के जगत तक ही सीमित रहें, जैसा कि मैं करना चाहता हूँ, तो भी ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने ”ऑथर” को बहुत संकीर्ण अर्थ प्रदान किया है। मैंने ऑथर को, जिसे एक पाठ, एक पुस्तक या रचना से वैधता के साथ जोड़ा जा सके, उस सीमित अर्थ में विवेचित किया है। यह देखना अत्यंत सरल है कि आख्यान के दायरे में, व्यक्ति पुस्तकों के अलावा और भी कई वस्तुओं का ऑथर हो सकता है-कोई किसी सिद्धांत का, किसी परंपरा का, या किसी अनुशासन का ऑथर हो सकता है, जिसमें दूसरी कई किताबें और नतीजतन अपनी जगह बना सकें। ये ऑथर उस स्थिति में हैं, जिसे हम तर्कातीत कह सकते हैं। निश्चिंत रूप से यह ऑथर हमारी सभ्यता जितना पुराना है। होमर, अरस्तू, या चर्च के पादरी, और साथ ही साथ, पहले गणितज्ञ और हिप्पोक्रेटिक परंपरा के प्रवर्तक, इन सबने यह भूमिका निभाई है।

इसके अलावा, उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान, योरप में, एक दूसरे, अधिक अभिनव प्रकार के ऑथर का उदय हुआ, जिसे हमें न तो ‘महान‘ साहित्यिक ऑथर से भ्रमित किया जाना चाहिए, और न ही धार्मिक पाठों के ऑथरों से, और न ही विज्ञान के प्रतिष्ठापकों से। कुछ ऐच्छिक रूप में हम, इस आखरी समूह में आने वाले लोगों को, हम ‘तर्कमूलकता के प्रतिष्ठापक‘ कह सकते हैं। यह समूह इस प्रकार से अनोखा है कि, इस समूह के लोग, न केवल अपनी कृतियों के ऑथर हैं, बल्कि उन्होंने कुछ और उत्पन्न किया है, वह है, दूसरे अन्य पाठों की निर्मिति की ‘संभावनाएं और नियम‘ उत्पन्न किए हैं। इस अर्थ में, वे बहुत भिन्न हैं, जैसे उदाहरण के लिए, किसी उपन्यासकार से, जो कि सिर्फ अपनी कृति का ऑथर होने के अलावा कुछ और नहीं है। फ्रायड, सिर्फ The Interpretation वि äeams या Jokes and Their Relation to the Unconscious ही ऑथर ही नहीं हैं, मार्क्स, सिर्फ Communist Manifesto या Das Kapital ही ऑथर नहीं हैं बल्कि, इन दोनों ने, आख्यानों की एक अनंत संभावना को स्थापित किया है।

जाहिर है, आपत्ति उठाना आसान है। कोई यह कह सकता है कि यह सच नहीं है कि एक उपन्यास का ऑथर, सिर्फ उसके लिखे हुए पाठ का ही ऑथर है, एक अर्थ में वह, बशर्ते कि वह कुछ ‘महत्त्व’ हासिल कर ले, उससे कहीं अधिक नियमित और आदेशित करता है। अगर हम एक सरल उदाहरण लें, हम यह कह सकते हैं कि, एन रेडक्लिफ ने The Csatle fo Athlin and Dunbayne और अन्य उपन्यास ही नहीं लिखे, बल्कि, उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में गौथिक हॉरर उपन्यासों के सृजन को संभव बनाया। उस संदर्भ में, उनका ऑथर का प्रकार्य उनके स्वयं के काम से कहीं अधिक है। परंतु, मेरे सोचने में इस आपत्ति का एक उत्तर है। उन ‘तर्कमूलकता के प्रतिष्ठापकों’ (मैंने यहाँ फ्रायड और मार्क्स का उदाहरण दिया है, क्योंकि मैं उन्हें, दोनों, सबसे पहले और सबसे महत्त्वपूर्ण प्रसंग मानता हूँ) ने ऐसा कुछ सर्वथा भिन्न संभव बनाया, उससे, जो कि एक उपन्यासकार संभव बनाता है। एन रेडक्लिफ के पाठों ने, एक प्रकार की, उस साम्य और अनुरूपता के लिए रास्ता खोला, जिनका आदर्श या सिद्धान्त उनके लेखन में था। जबकि फ्रायड और मार्क्स का काम उन विलक्षण संकेतों, रूपों, संबंध और ढाँचे समाहित किए हुए है जो कि अन्य ऑथर अपनी रचना में पुनः प्रयोग में ला सकते हैं। यानि, दूसरे शब्दों में, यह कहना कि एन रेडक्लिफ ने गौथिक हॉरर उपन्यास की नींव डाली, इसका अर्थ होगा कि उन्नीसवीं शताब्दी के गौथिक उपन्यास में, हमें वह सब मिलेगा, जैसा कि हमें एन रेडक्लिफ के उपन्यास में मिलता है, यानि कि अपनी अबोधता के पाश में फँसी हुई नायिका, गुप्त किला, और एक विषादी, अभिशप्त नायक, जो कि उसकी साथ की गई बुराइयों का जगत के द्वारा क्षतिपूर्ति कराने के लिए समर्पित है, और ऐसा ही बाकी सारा तामझाम।

वहीं दूसरी ओर, जब मैं मार्क्स या फ्रायड के बारे में ‘तर्कमूलकता के प्रतिष्ठापकों’ के रूप में बात करता हूँ, तो मेरा यह अर्थ होता है कि उन्होंने न केवल कुछेक अनुरूपताएँ संभव बनाईं, बल्कि (और उतनी ही महत्त्वपूर्ण), कुछ अंतरों को भी संभव बनाया। उन्होंने ‘कुछ ऐसे’ की संभावना बनाई जो कि उनके अपने आख्यानों के अलावा है, फिर भी, उनके द्वारा स्थापित किए से संबद्ध है। यह कहना कि फ्रायड ने मनोविश्लेषण की नींव डाली, इसका अर्थ (सिर्फ) यह नहीं है कि, हम काम-लिप्सा की संकल्पना या स्वप्न विश्लेषण की तकनीक कार्ल अब्राहम या मेलनी क्लाईन के काम में पाते हैं। इसका मतलब यह है कि, फ्रायड ने -स्वयं के पाठों, संकल्पनाओं और प्रकल्पनाओं के संदर्भ में- कुछेक विस्तारों को, जो कि मनोविश्लेषणात्मक आख्यान से उदित होती हैं, उन्हें संभव बनाया।

यह, हालाँकि, एक नई कठिनाई खड़ी करता है। उपरोक्त जो कहा गया है, क्या वह, आखिरकार, विज्ञान के किसी भी प्रतिष्ठापक या ऐसा कोई भी ऑथर जिसने कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन विज्ञान में प्रस्तावित किया हो, उस पर खरा नहीं उतरता? आखिरकार, गेलैलियो ने, न केवल वे आख्यान संभव बनाए थे, जो उनके द्वारा सूत्रबद्ध किए हुए नियमों को दुहराते थे, परंतु, वे वक्तव्य भी संभव बनाए थे, जो उनके स्वयं के कहे से बहुत भिन्न थे। अगर क्यूविए, जीव विज्ञान के प्रतिष्ठापक हैं, या सास्यूर, भाषा विज्ञान के प्रतिष्ठापक हैं, तो वे इसलिए नहीं हैं क्योंकि उनका अनुकरण हुआ, और न इसलिए क्योंकि लोगों ने तब के बाद से जीव या संकेतों की अवधारणा स्वीकार कर ली है, यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि, क्यूविए ने, एक सीमा तक, अपने स्थिरत्व के ठीक विपरीत, उद्भव का एक सिद्धान्त संभव बनाया, क्योंकि, सास्यूर ने, अपने ढांचागत विश्लेषण से मौलिक रूप से भिन्न, एक उपजाऊ व्याकरण को संभव बनाया। सतही तौर पर तब, तर्कमूलक व्यवहार की दीक्षा किसी भी वैज्ञानिक उद्यम के प्रतिष्ठापन के समान दिखती है।

फिर भी, कुछ विशिष्ट भिन्नता है। विज्ञान के प्रसंग में, वह कृत्य जो उसे स्थापित करता है, अपने भविष्य के रूपांतरणों के साथ समान आधार पर है। यह कृत्य, एक प्रकार से संशोधनों के उस दल का भाग बन जाता है जो उसे संभव बनाते हैं। निस्संदेह, यह संबद्धता बहुतेरे रूप ले सकती है। विज्ञान के भविष्य के विकास में, प्रतिष्ठापन का कृत्य, किसी अधिक सामान्य सूत्र जो कि स्वयं को इस प्रक्रिया में उजागर करता है, के विशिष्ट दृष्टांत से थोड़ा अधिक भर दिख सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि, यह पूर्वाभास और अनुभवजन्य पूर्वाग्रह के कारण भंग हो जाए तब उसे कुछेक पूरक सैद्धान्तिक प्रक्रियाओं की वस्तु बना कर, पुनर्सूत्रबद्ध करना होगा, ताकि वे उसे कठोरता से स्थापित कर सकें। अंत में, यह एक त्वरित सामान्यीकरण लग सकता है, जो कि बहुत सीमित होना चाहिए, और जिसके सीमित क्षेत्र की वैधानिकता का पुनरानुसरण किया जाना चाहिए। यानि, दूसरे शब्दों में, विज्ञान के प्रतिष्ठापन के कृत्य सर्वदा उन रूपांतरणों के यंत्रों के भीतर पुनः प्रवेश किया जा सकता है, जो उससे व्युत्पन्न होते हैं।

इसके विरोधाभास में, किसी विमर्शात्मक चेष्टा की शुरुआत, अपने आगामी रूपांतरों के प्रति विजातीय है। किसी प्रकार की विमर्शता का विस्तार करना, जैसे कि फ्रायड द्वारा स्थापित मनोविश्लेषण का, उसे एक औपचारिक समानता जिसकी उसे आरंभ से अनुमति नहीं होती, वह देना नहीं है, बल्कि उसे कुछेक संभावित अनुप्रयोगों के लिए खोलना है। मनोविश्लेषण को एक प्रकार की विमर्शात्मकता के रूप में, सीमित करना, यथार्थ में, ऐसा है जैसे कि उसके प्रतिष्ठापन के कृत्य में एक सीमित संख्या में प्रस्तावक कथन या वक्तव्यों का पृथककरण करना ताकि उन्हें और केवल उन्हें प्रतिष्ठापन का मूल्य दिया जा सके और जिसके संबंध में, फ्रायड द्वारा स्वीकृत की हुई कुछ संकल्पनाएँ और सिद्धांतों को व्युत्पन्न, दोयम, और अनुषंगी माना जा सके। इसके अलावा, इन प्रतिष्ठापकों के काम में हम कुछ प्रस्तावक-कथनों को मिथ्या घोषित नहीं कर सकते। इसके बदले, प्रतिष्ठापन के कृत्य को पकड़ने की कोशिश में, उन वक्तव्यों को दरकिनार कर दिया जाता है, जो कि प्रासंगिक नहीं हैं, क्योंकि वे अनावश्यक हैं या फिर, वे ”प्रागैतिहासिक“ समझ लिए जाते हैं, और किसी दूसरी प्रकार की विमर्शात्मकता से व्युत्पन्न होते हैं। यानि, दूसरे शब्दों में, विज्ञान की प्रतिष्ठापना से भिन्न, किसी विमर्शात्मक व्यवहार का प्रारम्भ उसके बाद के रूपांतरणों में भागीदारी नहीं रखता।

इसके फलस्वरूप, किसी प्रस्तावना की सिद्धांतपरक वैधानिकता, उसके प्रतिष्ठापकों के काम के संबंध में परिभाषित होती है- जबकि, न्यूटन और गेलैलियो के प्रसंग में, उन महानुभावों के द्वारा रखे गए किसी प्रस्तावना की वैधानिकता की स्वीकृति, भौतिकी या खगोल विज्ञान क्या है (अपने आंतरिक संरचना और ”नियामकता“ में) इस संबंध में होता है। अगर इसे सुसंगत रखें तो विमर्शात्मकता के प्रवर्तकों का काम उस दिक में अवस्थित नहीं है, जिसे विज्ञान परिभाषित करता है बल्कि, यह विज्ञान या विमर्शात्मकता है जो कि उनके काम को पुनसंर्दर्भित करती है।

 

इस प्रकार से हम, इन विमर्शात्मकता के क्षेत्र के भीतर ”उत्पत्ति की और पुनरागमन“ करने की अवश्यंभावी आवश्यकता को समझ सकते हैं। यह पुनरागमन, जो कि स्वयं इस विमर्शात्मक क्षेत्र का भाग है, उसे कभी संशोधित करना बंद नहीं करता। यह पुनरागमन, एक ऐतिहासिक पूरक नहीं है। जो कि विमर्शात्मकता में जोड़ा जाएगा, या महज एक आभूषण भी नहीं है बल्कि इसके विपरीत, यह विमर्शात्मक व्यवहार को रूपांतरित करने का एक प्रभावी और आवश्यक कार्य संगठित करता है। गेलैलियो के पाठों का पुनरान्वेषण, संभवतः हमारे यांत्रिकी के इतिहास में परिवर्तन कर दे, परंतु, वह, यांत्रिकी स्वयं में परिवर्तन नहीं कर सकेगा। वहीं, दूसरी ओर, फ्रायड के पाठों का पुनरान्वेषण, स्वयं मनोविश्लेषण को संशोधित कर देगा, ठीक वैसे ही जैसे मार्क्स के पाठों का पुनरान्वेषण मार्क्सवाद को संशोधित कर देगा।

विमर्शात्मक व्यवहारों के आरंभ के संदर्भ में मैंने अभी जो रेखांकित किया, वह निस्संदेह काफी ढांचागत है यह, विमर्शात्मक दीक्षा और वैज्ञानिक प्रतिष्ठापन के विरोधाभासों को चित्रित करने में, विशेष रूप से, सत्य है। इन दोनों को विलग करना सर्वदा सरल नहीं होता, इसके साथ ही साथ, ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह प्रामाणित करता हो कि दोनों परस्पर असम्मिलित प्रक्रियाएँ हैं। मैंने इस अंतर का प्रयास सिर्फ एक कारण से किया है लेखक का प्रकार्य, जो वैसे ही जटिल है जब उसे किसी पुस्तक या पाठ शृंखला जो कि एक दिया हुआ हस्ताक्षर अपने साथ लेकर चलती हैं, उनके स्तर पर स्थित करने का प्रयास किया जाता है, तब अगर वृहद इकाइयों में जैसे कि कृतियों के समूह या समूचे अनुशासनों, में उसके विश्लेषण का प्रयास होता है तो वह और भी कई अधिक निरूपण करने वाले कारकों को सम्मिलित करता है।

समापन के लिए, मैं उन कारणों की समीक्षा करना चाहूँगा जिनके कारण मैं अपने कहे को महत्त्व देता हूँ।

पहला, कई सैद्धान्तिक कारण हैं। जो दिशा मैंने रेखांकित की है, उस दिशा में विश्लेषण, किसी आख्यान के वर्गीकरण के लिए दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है, कम से कम प्रथम दृष्टि में, कि ऐसा वर्गीकरण सिर्फ वैयाकरणिक वैशिष्टय्, औपचारिक संरचनाओं और आख्यानों की वस्तुओं भर से निर्मित नहीं किया जा सकता। बल्कि संभवतः ऐसे गुणधर्म या संबंध अस्तित्व में हैं (जो व्याकरण और तर्क के नियमों में विघटित करने योग्य नहीं हैं), आख्यान के विशेषक हैं, और उन्हें प्रयोग में लाकर ही आख्यानों की प्रधान श्रेणियों में भेद किया जा सकता है। ऑथर के साथ संबंध (या असंबंध), और कई विभिन्न रूप जो यह संबंध लेते हैं, काफी दृष्टिगोचर हैं । इनमें विमर्शात्मक गुण-धर्मों में से किसी एक को ऑथर से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है।

वहीं दूसरी ओर,यहाँ पर हमें आख्यानों के ऐतिहासिक विश्लेषण का परिचय भी मिल सकता है। शायद, अब आख्यानों को न केवल उनके अभिव्यक्तात्मक मूल्य या औपचारिक रूपांतरणों की परिभाषा में, बल्कि उनके अस्तित्व की रीति के अनुरूप अध्ययन करने का समय आ गया है। आख्यानों के प्रचलन, मूल्यवर्धन, आरोपण और विनियोग की रीतियाँ, हर संस्कृति के साथ बदलती हैं और हर संस्कृति के भीतर संशोधित भी होती हैं। जिस प्रकार से वे सामाजिक सम्बन्धों के अनुरूप स्पष्ट होते हैं, मैं समझता हूँ, वह बहुत सरलता से समझा जा सकता है, ऑथर के प्रकार्य की गतिविधि और उसमें हुए संशोधनों से, बजाए आख्यानों के द्वारा प्रचलित किए गए विषयों और अवधारणाओं के।

इससे ऐसा लगता है कि, इस प्रकार के विश्लेषणों से प्रारम्भ करके, विषय के विशेषाधिकारों का भी पुनरानवीक्षण किया जा सकता है। मैं यह समझता हूँ कि, किसी कृति (भले ही वह साहित्यिक पाठ, दार्शनिक व्यवस्था, या वैज्ञानिक कृति हो) के आंतरिक और स्थापत्य-विषयक विश्लेषण का उत्तरदायित्व उठाना, जीवनात्मक और मनोवैज्ञानिक संदर्भों को दरकिनार करते हुए, हमने विषय के प्रतिष्ठापन की भूमिका और सम्पूर्ण चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगा दिये हैं। फिर भी, शायद हमें इस प्रश्न पर पुनः लौटना चाहिए, किसी जन्मना वस्तु के विषय को पुनस्र्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि, विषय की प्रविष्टि के द्वारों, कार्यप्रणाली के प्रकार, और निर्भरताओं की व्यवस्था पर अपनी पकड़ सुदृढ़ करने के लिए। ऐसा करने का अर्थ है, पारंपरिक समस्या को उलटना और उन प्रश्नों को नहीं उठाना जैसे कि कोई स्वतंत्र विषय कैसे वस्तुओं के सार-तत्व का भेदन कर सकता है और उन्हें अर्थ प्रदान कर सकता है? वह कैसे भाषा के नियमों को भीतर से सक्रिय कर सकता है और उन परिकल्पनाओं का उदय कर सकता है जो कि यथोचित रूप से उसकी अपनी हैं? इसके बदले, ये प्रश्न उठाए जाएंगे किसी व्याख्यान के क्रम में, विषय जैसा कुछ, किन परिस्थितियों में और किन रूपों में, कैसे प्रकट होगा? संक्षेप में, यह विषय को उसके व्युत्पक की भूमिका से वंचित करने का प्रसंग है और विषय का आख्यान के एक परिवर्तनशील और एक जटिल कृत्य के रूप में विश्लेषण करने का मसला है।

दूसरा, ऑथर के ”विचारधारात्मक“ प्रतिष्ठा से व्यवहार करने के कई कारण हैं। तब प्रश्न यह उठता है कि कोई कैसे उस अति जोखिम को, कम कर सकता है, जिससे गद्य हमारे जगत को धमकाता है? इसका उत्तर है। इसे ऑथर के साथ घटाया जा सकता है। ऑथर, अभिप्रायों के खतरनाक और कैंसर कारक बहु-प्रसार का उस जगत में सीमाओं की अनुमति देता है, जो पहले से ही, न केवल अपने संसाधनों और संपन्नता के साथ मितव्ययी हैं, बल्कि, अपने आख्यानों और उनके अभिप्रायों के साथ भी मितव्ययी हैं। इसके परिणामस्वरूप, हमें ऑथर का पारंपरिक विचार, पूर्णतः उलटना होगा। हम यह कहने के आदी हैं, जैसा कि हमने पहले देखा, कि ऑथर कृति का आल्हादित सृष्टा है, जिसमें वह, एक अनंत पूंजी और उदारता के साथ, अभिप्रायों का एक असीम विश्व जमा करता है। हम यह सोचने के आदी हैं कि ऑथर दूसरे मनुष्यों से भिन्न है और सारी भाषाओं के संदर्भ में इतना अनुभवातीत है कि जैसे ही वह बोलता है, अर्थ स्वतः ही प्रसारित होना प्रारम्भ हो जाते हैं, सतत् प्रसारित होने के लिए।

सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। ऑथर, किसी कृति को पूरित करने वाली व्यंजकता का एक अनंत स्रोत नहीं है। ऑथर कृतियों को अग्रगामी नहीं करता, वह एक प्रकार का कार्यान्वयन का सिद्धान्त है, जिसे हमारी संस्कृति में, सीमित किया जाता है, बहिष्कृत किया जाता है, और चयन किया जाता है, संक्षेप में, जिसके द्वारा गद्य के स्वतंत्र प्रचलन को, स्वतंत्र रद्दोबदल को, स्वतंत्र संयोजन को, विसंयोजन को, और पुनरसंयोजन को, बाधित किया जाता है। दरअस्ल, हम ऑथर को एक जीनियस के रूप में, एक आविष्कार के सतत फैलाव के रूप में, प्रस्तुत करने के आदी हैं, क्योंकि, यथार्थ में, हम उसे ठीक विपरीत रूप में कार्य करने देते हैं। यह कहा जा सकता है कि ऑथर एक विचारधारात्मक उत्पाद है, क्योंकि, हम उसका, उसके ऐतिहासिक रूप से वास्तविक कार्य के विपरीत प्रतिनिधित्व करते हैं। (जब ऐतिहासिक रूप से दिया गया कार्यभार का उस रूप में प्रतिनिधित्व होता है जो कि उसे उलटाता है, तब विचारधारात्मक उत्पादन होता है।) ऑथर, इसलिए वह विचारधारात्मक आकृति है, जिससे काम करने का वह तरीका चिह्नित होता है जिसमें हम अर्थ के प्रसारण से भयभीत होते हैं।

यह कहने में, ऐसा लगता है कि, मैं, संस्कृति के उस रूप की दरकार कर रहा हूँ जिसमें, गद्य, ऑथर की छवि के द्वारा सीमित नहीं होगा। हालाँकि, ऐसी संस्कृति की कल्पना करना जिसमें गद्य निरंकुश स्वतंत्र अवस्था में कार्य करे, जिसमें गद्य सबके निर्धारण पर हो और जो किसी आवश्यक या संतुलनात्मक जैसे कुछ रूप से गुजरे हुए बिना कल्पनाजन्य, शुद्ध रूमानीवाद होगा। हालाँकि, अठारहवीं शताब्दी से, ऑथर ने गद्य के नियंत्रक की भूमिका निभाई है, वह भूमिका जो कि हमारी औद्योगिक और बुर्जुआजी समाज के समय का, व्यक्तिवाद और निजी संपत्ति का, निरा लक्षण है फिर भी, ऐतिहासिक संशोधन जो कि घट रहे हैं, उनके चलते, ऐसा आवश्यक नहीं लगता कि ऑथर का प्रकार्य, अपने रूप, जटिलता, और यहाँ तक कि अपने अस्तित्व में सतत् रहे। मैं सोचता हूँ कि, जैसे हमारा समाज परिवर्तन के दौर से गुजरता है, ठीक उसी क्षण में जब वह परिवर्तन की प्रक्रिया में होता है, ऑथर का प्रकार्य विलोपित हो जाएगा, और इस प्रकार से विलोपित होगा कि, गद्य और उसके अर्थ-बहुल पाठ, पुनः एक बार एक दूसरे प्रकार के मुताबिक कार्य करेंगे, परंतु फिर भी, परिसीमाओं के एक तंत्र के साथ- वह जो कि ऑथर नहीं होगा, परंतु, जिसे निर्धारित या शायद अनुभव करना होगा।

सारे आख्यान, जो भी उनकी प्रतिष्ठा, या मूल्य, या रूप, हो और जिस भी व्यवहार के वे सामने किए जाएंगे, तब वे एक गुनगुनाहट की अनामता विकसित कर लेंगे। तब हमें वे प्रश्न नहीं सुनाई पड़ेंगे, जो काफी अरसे से पुनर्प्रचलित किए जा रहे हैं ‘वास्तव में कौन बोला?’ क्या सचमुच में वह था और कोई और तो न था? किस प्रामाणिक मौलिकता से? और अपने गहनतम स्वत्व के किस भाग को उन्होंने अपने आख्यानों में अभिव्यक्त किया? बजाए इनके, दूसरे प्रश्न होंगे, जैसे कि इस आख्यान के अस्तित्व के कौन से प्रकार हैं? यह कहाँ प्रयोग में लाया जा चुका है, यह कैसे प्रचालन में आ सकता है, और कौन इसे स्वयं के लिए युक्तियुक्त कर सकता है? इसमें ऐसी कौन सी जगहें हैं, जहाँ संभावित विषयों के लिए जगह हो सकती है? कौन इन विभिन्न विषय कार्यभारों का भार उठा सकता है? और इन सारे प्रश्नों के पीछे, हम एक विरक्ति की एक थरथराहट के अलावा शायद ही कुछ और सुन पाएँ।

क्या फर्क पड़ता है कि कौन बोल रहा है?

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