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प्राची - दिसंबर 2016 - कश्मीर : कसक और कशिश / डॉ. रचना बिमल

 

संस्मरण

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कश्मीर : कसक और कशिश

डॉ. रचना बिमल

र्यावर्त का मुकुट हिमालय भारतीय सभ्यता और संस्कृति का आज भी उज्ज्वल ललाम है. इसी मस्तक की शोभा बढ़ाने वाली मणि का नाम है- कश्मीर! ऋषि कश्यप की कर्मस्थली, आदि शंकराचार्य की तपस्थली, कालिदास के यक्ष की अपूर्व सुंदर नगरी जो ‘‘मेघदूत’’ के द्वारा साहित्य में वर्णित होकर अमर हो गई, जिसे देखकर मुगलों ने कहा- अगर इस जमीन पर कहीं जन्नत है तो वह यहीं है, बस यहीं है, वही आज का खंडित कश्मीर है. सन् 1947 के विभाजन ने भारतीय भूभाग को तीन बड़े टुकड़ों में बांटकर रख दिया. करोड़ों लोगों ने विस्थापन का दर्द झेला, लेकिन जो कसक पाकिस्तान द्वारा कश्मीर के एक हिस्से को हथियाने से मिली, उसकी पीड़ा आज भी भारतीय जनमानस को उद्वेलित कर देती है. कारण- कश्मीर भारत के लिए भूमि का टुकड़ा मात्र नहीं, आध्यात्मिक चेतना की भाव स्थली है. इस अनुभूति को वही शख्स महसूस कर सकता है जो जीवन में कम से कम एक बार कश्मीर अवश्य गया हो. मैं स्वयं के जीवन से यादों की पोटली को टटोलकर सन् 1985 को निकालती हूं तो ‘‘घुल्लूघारा’’ के आतंक से लड़कर सपरिवार मित्रों के साथ कश्मीर की सुंदर वादियों में स्वयं को पाती हूं. मानो 31 वर्ष बीत जाने के बावजूद पंजाब से निकलते ही चश्मों और नहरों के किनारे हरी-भरी छोटी-छोटी पहाड़ियों के बीच कश्मीर राज्य का प्रवेश द्वार नजर आता है. दिल्ली में जून माह की झुलसा देने वाली गर्मी के उपरांत पंजाब की तपती जमीं को बार-बार पुलिस चैकिंग के उपरांत (आतंकवादियों द्वारा हर मंदिर साहिब में आपरेशन ब्लूस्टार के बाद घोषित घुल्लूघारा आंदोलन के कारण) जब जम्मू प्रवेश के नाके पर पहुंचे तो अंतर्मन को सुकून देने वाली मीठी ठंडक से भरी हवा ने सभी के हृदय को आतंक से सहमी मानसिकता से मुक्ति प्रदान कर दी. पास की दुकान पर चाय-पकौड़ी का लुत्फ उठाकर मन में कश्मीर का साक्षात्कार कर लेने की खुशी संजोए गाते-गुनगुनाते ऊधमपुर के पास पहुंचने पर धूसर सी पहाड़ियों को देखकर हमारा पूरा दल चकित सा रह गया. मेरी छोटी बहन गुड़िया (ऋचा) ने कहा- दीदी देखो नमक का पहाड़! हम सभी बस की खिड़की से बाहर झांकने लगे. अरे यहां नमक के पहाड़ हैं! कहीं गुलाबी, कहीं भूरे, ठीक लाहौरी साबुत नमक के समान. बाल-सुलभ वर्णन अभी आगे बढ़ता कि इस बीच एक अंकल बोल उठे- दिल्ली के बच्चे बड़ के पेड़ और पीपल के पेड़ का अंतर तो नहीं जानते पर आज पता चला कि बर्फ के पहाड़ को भी नमक का पहाड़ समझ लेते हैं. उनके मजाक के साथ जीवन में पहली बार ‘‘हिमालय’’ यानी ‘‘हिम के घर’’ का साक्षात्कार हुआ.

हमारी बस जैसे-जैसे सर्पीले रास्ते से आगे बढ़ने लगी वैसे-वैसे ऊंची पहाड़ियों पर थोड़ी किंतु सफेद बर्फ दिखाई देने लगी. बड़े गहन वृक्ष तो कभी का साथ छोड़ चले थे. नुकीले शंकुदार वृक्ष सामने आने लगे थे. दिल्ली वालों के सामने यक्ष प्रश्न तो यही था कि हम उनके नाम तक नहीं जानते! बस हवा में घुलती उन वनस्पतियों की खुशबू खुमारी बनकर मन-मस्तिष्क पर छा रही थी लेकिन आंखें पलकें भी झपकाना नहीं चाहती थीं. जवाहर सुरंग पार करते ही सौंदर्य अंधकार की कोख से बाहर आकर सर्वत्र बिखर गया था.

श्रीनगर पहुंचकर हमारी बस नवनिर्मित सरकारी गेस्ट हाउस के बाहर रुक गई. गेस्ट हाउस के बड़े से बगीचे में लाल-नीले-पीले ही नहीं, इन रंगों के अलग-अलग मेल से रंजित एक से बढ़कर एक अनदेखे फूल खिले हुए थे, जिन पर झुंड के झुंड तितली और भौंरे मंड़रा रहे थे. सामान कमरों में रखकर हम सभी जल्दी से बगीचे में आ गए. सूर्यास्त का नयनाभिराम सिंदूरी रंग अलग छटा बिखेर रहा था. हवा में ठंडक गहरा गई थी. पापा ने कहा- अभी एक हफ्ता तुम जी भरकर इन दृश्यों का आनन्द लेना. फिलहाल अंदर चलो, वरना बीमार पड़ जाओगे. फिर भी ग्रुप के सभी बच्चे कमरों से बाहर ही मोर्चा संभाले थे, लेकिन दादी मां की एक डांट ने सबको भीतर भेज दिया. थके हारे जिस्म कब निद्रा की गोद में जाकर, चिड़ियों की चहचहाहट से फिर जाग गए, पता ही नहीं चला.

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मुझे याद है, वो सारा दिन शालीमार और निशात बागों की सैर में बीता. कश्मीरी पोशाक पहनकर खिंचवाई गई फोटो में हम दोनों बहनें खुद को किसी अप्सरा से कम कहां समझ रही थीं. किशोर वय और तरुणाई की संधि की यही तो पहचान है. मन उन सुंदर बागों से लौटने का हो ही नहीं रहा था, लेकिन नीचे डल झील का भी तो आनन्द लेना था. नाना जी की शिकारे में बैठकर खिंचवाई गई फोटो बचपन से देखते आए थे, तो भला हम कैसे चूक जाते. शिकारे में बैठकर चार-चिनार तक जाना भला किसी फिल्मी सफर से कम थोड़े था. मन ही मन ‘‘ये चांद सा रोशन चेहरा, जुल्फों का रंग सुनहरा’’ गाना बजता रहा. शिकारों पर फूलों के साथ-साथ सब्जियां भी बिकती देखकर आश्चर्य हुआ. चार-चिनार पहुंचे तो एक बार फिर आशा पारिख और राजेश खन्ना पर फिल्माया गया गाना आंखों में तैर गया ‘‘अच्छा तो अब चलते हैं...’’ उफ चित्रहार का वह पसंदीदा गीत क्या यहां फिल्माया गया था? उस कौतुहल को इकलौते दूरदर्शन की साक्षी पीढ़ी ने कैसे जांचा होगा, इसकी कल्पना सैकड़ों टी.वी. चैनलों के बीच जन्मी पीढ़ी कभी नहीं जान पाएगी. दिन फिर ढलने लगा. साथ ही साथ मन भी झुंझलाया...समय यहां इतनी जल्दी क्यों बीत रहा है? काश कोई इन्हीं तारों के बीच रात बिताने की अनुमति दे दे. मैं, मीनल, आशू , गुड़िया, और पूनम दीदी मन मसोसकर सभी के साथ वापस लौट आए. लेकिन रास्ते में गोल गप्पों और गर्म टिक्की का स्वाद उस गम को कम कर गया.

शायद वो रविवार का दिन था. उस दिन पापा और उनके मित्रों से सपरिवार मिलने के लिए कौल अंकल अपनी पत्नी के साथ आए थे. दिल्ली के दिल्ली गेट टेलिफोन एक्सचेंज से अपने गृहनगर श्रीनगर में उन्होंने बहुत भागदौड़ के पश्चात 1980 में बदली करवाई थी. अपने गृहनगर लौटने में उन्हें दस-बारह साल का समय लगा. लेकिन ये क्या...बात करते-करते पति-पत्नी की आंखों में पानी भर आया. रुंधे गले से बोले- दोस्त मैंने अपने जीवन में सबसे बड़ी गलती कर दी. अब लाख सिर पटकूं तो भी दिल्ली ट्रांसफर नहीं होगा. ये कश्मीर अब हमारा कश्मीर नहीं है. पाकिस्तान यहां अपने पांव बहुत लम्बे पसार रहा है. दिल्ली सब जानती है, पर कुछ खास नहीं कर रही. उसका ध्यान तो पंजाब पर है. देख लेना पंजाब तो संभल जाएगा, पर कश्मीर के हालात दिन पर दिन बिगड़ते जाएंगे. कश्मीर अभी नहीं संभाला तो यहां काबू रखना मुश्किल हो जाएगा. नए बच्चे मां-बाप के भी काबू में नहीं हैं.

वो शब्द आज फिर कानों में बज रहे हैं. लगता है कोई भविष्यवक्ता उनके रूप में कश्मीर का भविष्य बांच रहा था. भले ही अखबार रोज पढ़ती थी लेकिन तब कहां ये राजनैतिक उठा-पटक समझ आती थी. आज भी उनकी आंखों का खौफ बंद आंखों में रुका हुआ है. श्रीनगर में तब कोई नई सरकारी मार्किट बनी थी. हम वहां लकड़ी का सामान, शालें आदि देख रहे थे. सामने ही सूखे मेवों का बाजार था. जब हम वहां जाने लगे तो अंकल ने रोक दिया. औरतें और बच्चियां वहां नहीं जाएंगी. तुम लोग यहीं सरकारी मार्किट में रुको. वो जगह तुम लोगों के लिए सेफ (सुरक्षित) नहीं है.

उस क्षण पहली बार जीवन में लड़की होने का डर और गहरा हो गया था. उसके बाद जहां भी गई युवा लड़कों की दृष्टि अपनी ओर उठी देखकर आंतें तक सिकुड़ जाती थीं. पहली बार प्राकृतिक सौंदर्य से आंनदित मन असामाजिक तत्वों की कुलिशता का शिकार हुआ. उस शाम लगा सूर्य ढलने से पूर्व गेस्ट हाउस लौटना ठीक रहेगा.

युवा मन तर्क और वितर्क के झूले पर खूब झूलता है. अगले दिन का सूर्योदय मानो विगत के डर को कहीं फटकार आया. एक बार फिर हम श्रीनगर की सैर पर निकल पड़े. आज हम आदि शंकराचार्य के शंकर मंदिर जा रहे थे. ऊंची पहाड़ी पर बने उस मंदिर में जाने का सुख और एक अर्वाचीन दिव्यता की अनुभूति ने घंटों चुपचाप अपने आगोश में घेरे रखा. हृदय पास की घास भरी भूमि पर सोने का कर रहा था. मां से कहा- मम्मा थोड़ी देर सो जाऊं, तुम देखती रहना. आंखें तो थकान से मुंद रही थीं, तन सुवासित वायु से तंद्रा में जा रहा था, पर मन-अवचेतन में आतंक से डरा हुआ था. कहीं अंकल की बात सच हो गई तो? कई वर्ष बाद अंकल की आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी. उनकी पत्नी और परिवार पर क्या गुजरी इसकी जानकारी दिल्ली वाले दोस्तों को भी नहीं मिल पाई. शायद किसी ने गहराई से जानने की कोशिश भी नहीं की होगी. यही मानव स्वभाव है. लेकिन मेरा मन आज भी लेह से लेकर कन्याकुमारी तक घूमने के बावजूद श्रीनगर की उस सुवासित वायु को ढूंढ़ता है जो जीवन में पुनः नहीं मिली. उस निद्रा के बाद मन ने झटका लिया और कहा ये आतंकवाद वगैरह वास्तविक नहीं है. हमें तो कहीं आतंकवादी नहीं मिले. अंकल तो लड़कियों को डरा रहे थे. समाज तो यूं ही लड़कियों के पीछे पड़ा रहता है. परिणामस्वरूप आगे की कश्मीर यात्रा आनंदित ही रही. यूं भी अगले दिन हम गुलमर्ग-खिलनमर्ग चले गए थे. सभी को गुलमर्ग बहुत पसंद आया लेकिन मेरे मन में आज भी खिलनमर्ग का जंगल और हल्की बरसात में भीगते हुए ऊपर की चढाई याद है. जब हम खिलनमर्ग के शिखर पर पहुंचे तो वहां गाइड ने सामने की पहाड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा- वो सामने पाकिस्तानी चौकी है. मन और तन जितना उचक सकता था, उतना उचक कर पाकिस्तानियों को देखने के लिए तत्पर था. मानों वे इस धरती के नहीं किसी दूसरे ग्रह के निवासी हों. आज अपने उस बचपने पर मुस्कुराहट आ रही है, किंतु तब की सच्चाई तो यही थी.

लौटते हुए रास्ते में एक प्रौढ़ कश्मीरी बाबा की दुकान पर तवे जितने बड़े, घी में तले आलू के खस्ता परांठों का स्वाद मानो जीभ पर आज भी टिका है. नाम तो अब याद नहीं पर उनका चेहरा आंखों में बसा है. कितने स्नेह से उन कश्मीरी बाबा ने कहा था- अच्छा हुआ बाबू साहेब जो आप लोग कश्मीर घूमने आ गए, वरना ये सीजन तो बिल्कुल खाली जा रहा है. पंजाब के दहशतगर्दों ने कश्मीर का सीजन खत्म कर दिया. इनको तो पैसा पता नहीं कौन देता है पर ये दहशतगर्द नहीं सोचते कि कश्मीर का घोड़ेवाला, चायवाला, सैलानी नहीं आएगा तो कहां से खाएगा? सत्य तो यह है ग्यारवीं, बारहवीं का पढ़ा अर्थशास्त्र पहली बार उन कश्मीरी बाबा की बातों से ही समझ आया था. तब से लेकर आज तक झेलम और चेनाब में कितना पानी बह गया है. दहशतगर्दी भी पंजाब से निकलकर कश्मीर में फैल गई है पर सन् 85 का कश्मीर उसकी जकड़ से दूर था.

नदी का कलकल स्वर मन मोहने के स्थान पर डरा भी सकता है यदि जानना हो तो चेनाब के पुल पर खड़े होकर जानिएगा. भयावह अथाह जल निरन्तर गर्जन करते हुए बह रहा था. आज क्या स्थिति है? नहीं जानती...पर तब ऐसा ही था.

उस पूरी रात हमने यात्रा की और सुबह हमारी बस पहलगांव पहुंच गई. मन को सुकून मिला- चलो आज दिन के एक-एक क्षण का आनंद लिया जाएगा. जीवन में पहली बार लकड़ी के बने होटल में रुके थे. सामने ही लिद्दर नदी कल-कल बह रही थी. होटल वाले ने कहा- पहलगांव में यूं तो जहां मर्जी घूमना, पर ‘‘बॉबी हाउस’’ देखना मत भूलिएगा. ‘‘हम तुम एक कमरे में बंद हो और चॉबी खो जाए’’ गाना यहीं शूट हुआ था. फिर क्या था, सभी लोग उस गेस्ट हाउस को देखने चले दिए; लेकिन मैं, गुड़िया, आशू, मीनल वहीं नदी के पत्थरों पर बैठकर अत्यांक्षरी खेलने लगे. गाने खत्म किए तो शर्लक होम्स की जासूसी कहानियों से लेकर दूसरे ग्रहों पर रहने वाले काल्पनिक जीवों की कहानियां तक एक दूसरे को सुनाई गईं.

पहलगांव में ही मैंने पहली बार जीवन की बड़ी और महंगी खरीददारी करी, जब मां के लिए कश्मीरी सिल्क की दो डिजाईनर सांड़ियां खरीदी थीं. वर्षों तक उन साड़ियों पर जब भी हाथ फेरा कश्मीर यात्रा याद आ जाती थी. इसीलिए उन साड़ियों के फट जाने पर भी उन्हें बालो में बांधने के स्कार्फ के रूप में ना केवल संजोया गया बल्कि तीन चार सखियों को वे स्कार्फ बांटे भी गए. पहलगांव में जिद्द करके हमने पहली बार मम्मी-पापा की एक साथ फोटो भी खींची. क्या आज की पीढ़ी इस बात को समझ सकेंगी? शायद नहीं, क्योंकि महानगरों में जन्मी युवा पीढ़ी अब शर्माना, लज्जाना जानती ही नहीं हैं तो भला दादा-दादी, नाना-नानी का दौर कैसे समझेगी?

डिनर के बाद फिर तारों और चन्द्रमा के प्रकाश में महफिल जम गई. अब बच्चों के साथ बड़े भी आनन्द लेने लगे. आखिर वे भी कब तक मन मार कर बड़े बने रहते.

अगले दिन दोपहर बाद हमारा कारवां सोनमर्ग पहुंचा. होटल में रुककर तय हुआ कि क्यों ना बाबा अमरनाथ के दर्शन कर लिए जाएं. किसी ने बताया बालटाल का रास्ता तो इतना छोटा है कि एक ही दिन में जाकर लौटा जा सकता है. फिर क्या था, उत्साही दल रात में ही चढ़ाई कर, सुबह लौटने की योजना बना कर चल दिया. दल की सबसे युवा मंडली के सदस्य 15 से 20 वर्ष की आयु के थे. सबसे बड़ी पूनम दीदी, आशू, मैं, मीनल और गुड़िया यानि मेरी बहन ऋचा.

रात के साढ़े 10:30 बजे थे. पूर्णिमा का चांद खिला था. बादलों में उसकी आंख मिचौली, तारों की टिमटिमाहट, भीनी-भीनी ठंडी हवा, झरनों की आवाजें हमें पुकार रही थीं. दल के मुखिया सेना से सेवानिवृत रामचंद्र अंकल थे. उन्होंने कहा- इन पत्थरों से आगे का रास्ता अमरनाथ जाता है. पता नहीं हम पांचों के आगे बढ़ते पांव कब सबसे आगे निकल गए, जान ही नहीं पाए.

कुछ मिनटों में पत्थरों की जगह काली सड़क ने ले ली और हम आश्वस्त हो गए. हमने आपस में कहा- सड़क पर चलना तो बहुत आसान है. इस रास्ते पर चलते हुए कितनी बार हमने ‘‘नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले’’ गीत अपने स्वरों में गाया याद नहीं पड़ता. क्या सुंदर दृश्य था. हमारे बाईं ओर एक दम घुप्प अंधेरा था तो दाईं ओर घाटी के किनारों पर बर्फ से ढके पहाड़ मानों चांदी के पर्वतों में तब्दील हो गए थे. कहीं ऊंचाई से झरने गिर रहे थे तो कहीं कोई जलधारा बीच में ही जम सी गई थी. धीरे-धीरे सांस फूलने लगी. ठंड मानों हड्डियों में घुसने लगी. आलम यह था कि एक-एक पांव उठाना मुश्किल हो रहा था. आराम करने के लिए 5-5 मिनट फिर 10-10 मिनट सड़क पर ही लेटकर विश्राम करने लगे.

सोचा अब तो इतना धीरे चल रहे हैं, बाकी लोग हमारे तक क्यों नहीं पहुंच रहे. चलो रुक जाते हैं. आधे घंटे बाद भी पीछे से कोई हलचल, कोई स्वर नहीं आया तो आशू को बाईं ओर की चट्टान पर चढ़ाया गया. हमारे पास मात्र एक पेंसिल टार्च थी. उसकी रोशनी बार-बार फेंकी गई. 10 मिनट बाद पीछे से एक लाइट चमकी और फिर रामचंन्द्र अंकल की आवाज सुनाई दी- पूनम, रचना, आशू मीनल वापस आओ. ये शब्द चारों ओर घाटियों में गूंज गए. तब जाकर अहसास हुआ कि हम गलत रास्ते पर थे. घड़ी देखी रात के दो बज रहे थे. हांफते-दौड़ते, डरते हुए वापसी शुरू की. जब वापस सेना की चैक पोस्ट पर पहुंचे तो पौ फटने लगी थी.

लगभग पांच बजे का समय था. हमारे दल को अपने माता-पिता से जो डांट पड़ी वो कभी भुलाई नहीं जा सकती. पापा का पसीने-पसीने चेहरा देखकर सारा आनंद कपूर की भांति उड़ गया.

तभी वहां एक सेनाधिकारी पहुंचे. उन्होंने पूछा- तुम लोगों ने वापसी कितने बजे शुरू की थी. हमने कहा- दो बजे. रोबदार स्वर में उन्होंने कहा- बस, अब कोई इन बच्चों से कुछ नहीं कहेगा. आप लोग सोच भी नहीं सकते- ये कारगिल, द्रास मार्ग पर पैदल ही कितना आगे चले गए थे. जवान खून है इसलिए इतना चल लिए. शुक्र करो कि ये सड़क पर ही चलते रहे, कहीं पर्वत फांदने की कोशिश करते तो पाकिस्तान पहुंच जाते.

हम पांचों तो यह सुनकर उस आशंका मात्र से जड़ हो गए. तब सेनाधिकारी ने कहा- अब डरने की कोई बात नहीं तुम लोग अपने ही देश में हो. जवान! बच्चों को गर्म-गर्म चाय के साथ बिस्कुट दो. जवान के ‘‘जनाब’’ उत्तर के साथ सैल्यूट लेकर फरिश्ते जैसे सैन्य अधिकारी वहां से चले गए.

लेकिन उनके जाते ही डर की गंगा रुदन के साथ फूट पड़ी. मां-बाप तो मां-बाप होते हैं. कुछ क्षण पूर्व तक जो हमें डांट रहे थे वो ही अब हमें सीने से लगाए ढांढ़स दे रहे थे. उनकी आंखों से झरते आंसू अपने बच्चों को सुरक्षित पा लेने के अहसास से भरे थे. थोड़ी देर के मान-मनुहार और माफीनामे के साथ सब सहज हो गया. मैंने पापा से डरते-डरते पूछा- पापा क्या अब हम अमरनाथ नहीं जा सकते. पापा ने शून्य में देखते हुए कहा- बेटा अमरनाथ बाबा का बर्फीला रास्ता तुम्हारे सामने है. इतना चलने के बाद तुम लोग अब ये चढ़ाई नहीं कर सकते. घोड़ेवाले मिल जाएं तो चलेंगे. वैसे घोड़े की चढ़ाई भी मुश्किल है क्योंकि सेना ने भी अभी यह मार्ग खोला नहीं है. दो-तीन घोड़ेवाले आए भी लेकिन 15-20 सवारी देखकर चले गए.

उधर हम नदी के साथ साथ जंगल में गए. मन में आशा की किरण फूट रही थी काश कहीं से घोड़ेवाले आ जाएं और हम भी अमरनाथ जी के दर्शन कर लें. अपनी आंखों से देखें कि प्रकृति कैसे शिवलिंग का निर्माण करती है. इस ठंड में कबूतर-कबूतरी का जोड़ा कैसे जीवित रहता है! परीलोक की कथाओं के समान हम उन कल्पनाओं से साक्षात्कार करना चाहते थे लेकिन तभी ना जाने कहां से एक बहुत बड़ा कौआ हमारे आस-पास मंड़राने लगा. उसके स्वर में कांव-कांव के स्थान पर भाग-भाग सुनाई पड़ा. हमने आश्चर्यचकित होकर एक दूसरे को देखा और हम स्तब्ध हो गए जब पता चला कि सभी को वही शब्द सुनाई दिया था. हम समझ गए कि बाबा अमरनाथ हमें दर्शन नहीं देंगे. बुझे मन से हम सोनमार्ग लौट आए जहां शाम को दल के शेष सदस्य अमरनाथ जी के दर्शन उपरांत लौटने वाले थे.

सोनमार्ग में हमारा आठ वर्षीय नाराज छोटा भाई कपिल मुंह फुलाए मिला, जिसे हम छोटा समझकर दादी मां के पास छोड़ गए थे. उसे जब पता चला कि हम भी अमरनाथ जी नहीं जा पाए तो उसकी खुशी देखते ही बनती थी. फिर भी उसने शाम तक मनुहार करवाया. दूसरी ओर सिंधु नदी के किनारे बैठकर गायी मां का जाप हमें अलैकिक सुख दे रहा था. तभी आर्यसमाजी अशोक अंकल ने सिंधु नदी के किनारे वेद मं॑त्रों की रचना, बत्रा अंकल ने पाकिस्तान के तीर्थ स्थलों की जानकारी दी. मन ने पंख पसारे. सोचने लगे- काश हम भी पंछी होते तो इन चोटियों के पार उन्मुक्त भाव से जा सकते थे. नगपति हिमालय का विस्तृत सौंदर्य देख पाते. एक गहरी उदासी धीरे-

धीरे अवचेतन पर छाने लगी. अगले दिन दिल्ली की ओर प्रस्थान जो करना था. मन ही मन सोचा कोई बात नहीं जीवन में कुछ करना है, बड़ा बनना है और बार-बार कश्मीर आना है. यहीं कहीं नदी किनारे हिमालय के सामने एक छोटा सा घर बनाना है. मन का सोचा, सदा कहां होता है?

जीवन की आपा-धापी में कितने साल गुजर गए हैं. आज दिल्ली में घर है, अच्छी नौकरी है लेकिन 1987 के बाद से आतंक के डैनों में दुबके कश्मीर में जाने की हिम्मत नहीं होती. लगता है पहले के समान उन्मुक्त भाव से कश्मीर को नहीं देख पाऊंगी. बंदूकों के साए सेना के हो या आतंकवादियों के, खौफ ही पैदा करते हैं. कश्मीर को फिर से देखने की कसक आज भी है इसलिए जो भी फिल्म कश्मीर पर बनी चाहे वो मिशन कश्मीर हो या लम्हे, लक्ष्य हो या फिर हैदर जरूर देखती हूं. डिस्कवरी और यू ट्यूब पर कश्मीर के वृत्तचित्र भी खूब देखती हूं. इन्हीं से कश्मीर का साक्षात्कार करती हूं.

फिल्मों में अहसास की खुशबू नहीं, कश्मीर समस्या पर विभिन्न दृष्टिकोणों का चित्रण है. सोचती हूं काश एक बार फिर केसर घुली वादियों में, चिड़ियों की चहचहाहट के साथ, सूर्योदय का, सिंधुजल से अभिषेक कर सकूं. काश कोई इस कसक भरी कशिश का निदान दे सके और मैं भी कह सकूं- अगर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, बस यहीं है.

सम्पर्कः 79, भागीरथी अपार्टमेंट्स,

सेक्टर-9, रोहिणी, दिल्ली-110085

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