मंगलवार, 31 जनवरी 2017

रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 - मिशेल फूको विशेषांक : मिशेल फूको का जीवन

क्लेर ओ’ फेरेल

मिशेल फूको और उत्तर आधुनिकतावाद : सिडनी पेपर्स

(अनुवाद - पुनर्वसु जोशी)

सर्वप्रथम तो मैं श्री जेरार्ड हेंडरसन को धन्यवाद देना चाहूंगी, जिन्होंने मुझे सिडनी इंस्टिटय्ूट में उद्बोधन के लिए आमंत्रित किया। बहरहाल, जो शोधपत्र यहां मैं पढ़ने जा रही हूँ, वह मुख्यतः प्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक मिशेल फूको और उनकी जिरहों के साथ ही उनकी उपलब्धियों तथा उनके अवदान के आसपास केंद्रित है। मिशेल फूको जो सन 1926 में जन्मे और सन 1984 में जिन्होंने इस संसार से विदा ली, वे बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक प्रभावशाली दार्शनिक और चिंतक हैं। उनके विचार, सामाजिक विज्ञान, मानविकी तथा व्यावसायिक अनुशासन, जैसे कि शिक्षा, प्रबंधन अध्ययन और स्वास्थ्य की समूची परिधियों तक व्यापक रूप से प्रयुक्त हुए हैं। उनका काम, विस्मयजनक रूप से ध्रुवीकृत प्रतिक्रियाओं की तरफ ध्यान खींचने की चेष्टा करता है। मिशेल फूको का एक ओर जहाँ अत्यंत उत्साह के साथ प्रतिमा पूजन हुआ, वहीं दूसरी ओर उन्हें पर्याप्त निंदा के साथ निरस्त भी किया गया। मैं उनके ओजस्वी स्वागत के विषय में तो यथा आवश्यक दृष्टिपात करूंगी ही, लेकिन साथ ही साथ, उनके उस व्यक्तित्व पर भी दृष्टि डालूंगी, जो इतनी प्रबल प्रतिक्रिया और मताभिव्यक्ति को जन्म देता है।

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मिशेल फूको का नाम, अक्सर उत्तर आधुनिकता के इर्द-गिर्द होने वाले विमर्शों में प्रकट होता है। बावजूद इस तथ्य के कि उन्होंने कभी भी इस ‘विचार’ से संबंधित आंदोलन से जुड़े होने का दावा नहीं किया। इस ‘ज्ञात-संबंध’ की रोशनी में, मैं हाल ही में जनमाध्यम में उत्तर आधुनिकतावाद तथा उसके घातक प्रभावों को लेकर हुई ताजा बहस पर, अपनी कुछ टिप्पणियों के साथ, बात करूंगी, जिनका असर आमतौर पर, साहित्यिक हलकों पर तथा खास तौर पर स्कूलों में पढ़ाए जा रहे पर, हुआ है। यहाँ तक कि अंग्रेजी, इतिहास और इतिहास के शिक्षण पर तथाकथित उत्तर आधुनिकतावाद के नकारात्मक प्रभाव को लेकर प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने भी इन बहसों को परखने के बाद टिप्पणी की, जो व्यापक रुप से पढ़ी-सुनी गई। वैसे यह अभी भी पूर्णतः स्पष्ट नहीं है कि इन बहसों में योगदान देने वाले वास्तविक रूप से, उत्तर आधुनिकतावाद से क्या अर्थ रखते हैं। परंतु सामान्यतः कहने के लिए यह शब्द, उस एक किस्म की भंगिमा को प्रकट करता है, जो अवेध्य ‘जार्गन’ और ‘पॉलिटिकल करेक्ट्नेस’ को परस्पर मिलाता है। जिसके चलते, लोकप्रिय संस्कृति के उत्पाद की तरफ अकारण ही ध्यान आकर्षित करता है, साथ ही वस्तुगत सत्य और तथ्य के प्रति, असावधान सम्मान पैदा करता है।

तर्क कुछ यूं जाता है कि स्कूल के छात्रों को, फ्रेंच और जर्मन दार्शनिकों (जिसमें मिशेल फूको का नाम अक्सर प्रमुखता के साथ लिया जाता है।) से प्राप्त यह ‘दुरूह सिद्धांतिकी’ और ‘पॉलिटिकल करेक्ट्नेस’ की यह खुराक, जबर्दस्ती पिलाई जा रही है, बजाय उन्हें प्राथमिक कौशल, जैसे ‘सही उच्चारण कैसे करें, या सही वर्तनी कैसे लिखें’ सिखाने के, या बजाय उन्हें संस्कृति, इतिहास, और ऐतिहासिक कालक्रम के मूलभूत तथ्यों के पढ़ाने के।

और तो और, तर्क यह भी दिए जा रहे हैं कि ‘ग्रेट वाइट योरपीय पुरुषों’ के ‘अमर’ शास्त्रों को, जिनको कि हर स्कूली बालक को याद करवाया जाना चाहिए, वह, लोकप्रिय संस्कृति के क्षणभंगुर ‘ज्ञान’ पर अनुचित जोर देने से अपदस्थ हो रहा है। बहरहाल, 20 अप्रैल, सन 2000 को ए.बी.सी. से प्रसारित अपने प्रसारण में, प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने, उनके उद्धरण के अनुसार, कहा कि, ‘इस तथाकथित उत्तर आधुनिकतावाद के बारे में कई लोगों के दृष्टिकोण’ से, वे पूर्णतः सहमत हैं। उन्होंने आगे जोड़ा, ‘हम यह समझते हैं कि एक तरफ तो जहाँ उच्च स्तरीय साहित्य है, वहीं दूसरे ओर निरा कूड़ा भी है। दरअसल, हमें ऐसे पाठय्क्रम की आवश्यकता है, जो उत्कृष्ट साहित्य की समझ को बढ़ावा दें, बजाय ‘निरे कूड़े’ के।’

निश्चित रूप से, यह समझने बात है कि प्रधानमंत्री की ऐसी टिप्पणी ने ध्यान आकर्षित करते हुए, मीडिया और शैक्षणिक वृत्तों में एक बहस को भी जन्म दिया है और साथ ही साथ ‘द ऑस्ट्रेलियन’ (सन 1964 से प्रकाशित होने वाला ऑस्ट्रेलिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार-अनु.) के द्वारा ‘उत्तराधुनिकता’ और ‘आलोचनात्मक-साक्षरता’ की बुराइयों के विरुद्ध चलाए जा रहे एक लंबे अभियान में, आग में घी का काम किया है। यद्यपि, जैसा कि कुछ लोगों ने इंगित किया है कि उन बहसों में बहुतेरे भ्रम और अंतर्विरोध भी प्रकट होते हैं, जबकि दूसरी ओर यह तर्क भी दिया जा रहा है कि, यह उत्तर आधुनिकता, इतनी उच्चस्तरीय सिद्धांतिकी जो कि स्नातकोत्तर विश्वविद्यालयीन कक्षा के विद्यार्थियों के लिए भी दुरूह है, वह स्कूल के स्तर पर पढ़ाई जा रही है। विडंबना यह है कि इस तर्क के साथ, यह तर्क भी जुड़ा हुआ है कि विद्यार्थियों को लोकप्रिय संस्कृति का ‘कूड़ा’ संस्करण पढ़ाया जा रहा है, और इसके फलस्वरूप, अगर हावर्ड के शब्दों में कहें तो, हम अंग्रेजी के पाठय्क्रम के ‘सरलीकरण’ को देख रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘अपर्याप्त’ रूप से समझे गए विचारों को आत्मसात करने से कुछ गंभीर समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, परंतु यह तर्क इतना सशक्त नहीं है कि ‘चमड़े के लिए भैंस’ मार दी जाये।

इस बहस में खास तौर पर एक अतिरेकी अवदान तो जाइल्स ओटी का है, जो उन्होंने हावर्ड द्वारा रेडियो को दिए गए साक्षात्कार के पश्चात, 21 अप्रैल को ‘द ऑस्ट्रेलियन’ प्रकाशित किया। ओटी, मार्क्सवाद और उत्तर आधुनिकतावाद- यह दो विश्वदृष्टियाँ, जो कि एक दूसरे से पर्याप्त रूप से विपरीत होने के रूप में मान्यता प्राप्त हैं- इन दोनों विश्व दृष्टियों को एक दूसरे में मिश्रित कर के अपना तर्क प्रारम्भ करते हैं और फिर उन्हें शिक्षा के ‘वर्तमान, गुप्त रूप से राजनीतिकारण से ग्रसित, और शैक्षणिक रूप से विनाशकारी प्रारूप’ के लिए दोष देते हैं। ओटी के अनुसार, वह व्यक्ति, जो इन दोनों विचारधाराओं का मूर्त रूप है और जो ‘जिस तरह हमारे बच्चे और विश्वविद्यालय के छात्र पढ़ाये जा रहे हैं, उन तरीकों का ‘मरणोपरांत मध्यस्थता’ कर रहा है’ वह और कोई नहीं बल्कि मिशेल फूको हैं, जो कि ओटी के विवरण में, बौद्धिक जगत के ‘ओसामा बिन लादेन’ के समकक्ष उभरते हैं, तथा जो ‘ऑस्ट्रेलियन स्कूलों में हाजिर होने वाले हजारों-हजार बच्चों’ पर अपना पापमय प्रभाव डाल रहे हैं।

ओटी के, मिशेल फूको के ‘व्यक्तिगत’ के इस ‘स्याह’ विवरण को दरकिनार करते हुए, ओटी के द्वारा लिखा गया, यह आलेख इसलिए उल्लेख के योग्य है क्योंकि, यह फूको के विरुद्ध दिये गए, उन घिसे-पिटे और अतिपरिचित आरोपों के कथानक को दोहराता है, जो कि निम्नलिखित हैं।

1. सर्वप्रथम, यह कि फूको ‘वस्तुगत’ सत्य या ‘तथ्यात्मक’ चीजों में विश्वास नहीं रखते, और ‘सब कुछ चलता है’ के उस अतिरेकी उत्तराधुनिक दृष्टिकोण को अंगीकार करते हैं। संक्षेप में, अगर आप किसी वस्तु में विश्वास रखते हैं, तो वह सत्य है। इसके अलावा, ‘सत्य’ जैसा कुछ भी नहीं है, जो है वह सिर्फ ‘सत्ता’ है। जिसे लोग ‘सत्य’ मान कर चलते हैं वह और कुछ नहीं सिर्फ ‘सत्ता के संघषोंर्’ का उत्पाद है।

2. दूसरे, फूको एक अनैतिक नकारवादी हैं- एक अराजकतावादी, जिसकी एकमात्र रुचि सिर्फ आज जो अस्तित्व में है, उस समकालीन व्यवस्था को ढहाना और ध्वस्त करना है, और उस व्यवस्था के स्थान पर कोई अन्य वैकल्पिक प्रस्ताव नहीं देना और उन मूढ़ लोगों के मध्य, जो कि उसके लिखे को पढ़ते हैं, के मध्य सिर्फ एक सामान्य बदहवासी, उदासीनता और राजनीतिक नकारवाद फैलाना भर है।

3. तीसरे, फूको और अन्य जैसे कि, जॉक देरीदा (विखंडनवाद के प्रणेता), ज्याँ फ्रांसवा ल्योतार (‘द पोस्ट मॉडर्न कंडीशन’ के लेखक) और ज्याँ बौदलियार (अपनी इस स्थापना के लिए प्रसिद्ध कि समकालीन संस्कृति, स्वयं के अलावा किसी का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।) दुरूह शब्दों के एक ऐसे शब्दजाल बुनने के लिए जिम्मेदार हैं, जिसका कि कई अकादमिक अनुशासनों में अँग्रेजी की स्पष्ट अभिव्यक्ति और गल्प पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है। यह ‘लक्कड़-जुबान’, जैसा कि यह बहुरंगी फ्रेंच मुहावरा ‘विचारधाराओं की शब्दावलियों’ के बखान के लिए प्रयुक्त होता है, अँग्रेजी और इतिहास के पाठय्क्रमों में, प्रताड़ित करने के लिए, छन कर आ गई है।

 

4. और अंतिम, यह भी कि फूको की व्यक्तिगत नैतिकता अत्यधिक संदिग्ध है।

वास्तव में, यह अत्यधिक ‘बढ़ा-चढ़ा’ हुआ तुच्छ बखान है जो कि कतिपय मीडिया में, ऑस्ट्रेलिया और उसके बाहर, अक्सर मिलता है। इससे अधिक सहानुभूतिपूर्ण और संतुलित विवरण, अमूमन, केवल अकादमिक पुस्तकों या पत्र-पत्रिकाओं में मिलता है, जो वैसे ही सीमित प्रसार में होती है, या फिर पढ़ी-लिखी, अकादमिक जन-समूह को लक्षित करते हुए उन विशिष्ट विषय केन्द्रित माध्यमों में, जैसे कि ‘द बुक शो’ और ‘द फिलोसोफर्स जोन’ (ऑस्ट्रेलियन रेडियो पर प्रसारित होने वाले ये दोनों कार्यक्रम साहित्यिक जनसमूह को केंद्र में रख कर बनाए और प्रसारित किए जाते-अनु०)। अतः, दुर्भाग्यवश, जन साधारण, जिन विचारों के बारे में हम बात कर रहे हैं, उनके बारे में, निरंतर, और इरादतन भ्रमित करने वाले बखान सुनते रहे। बिना किसी विकल्प के, जो कि उन विचारों के लिए प्रतिपक्ष भी रख सके। फूको के काम से संबन्धित इसी प्रकार के ‘बक-वाद’ की सार्वजनिक घटना, अभी हाल ही में फूको के विकिपीडिया पृष्ठ पर देखने में आई, जो कि सन 2006 के अगस्त माह में, एक भीषण, उन्मुक्त ‘सम्पादन युद्ध’ का विषय था। (इन्टरनेट पर उपलब्ध विकिपीडिया पर किसी भी विषय से संबन्धित, किसी भी पृष्ठ को, कोई भी व्यक्ति संपादित कर सकता है-अनु.)। विकिपीडिया, निश्चित रूप से, अधीरता में रहने वालों के लिए, ज्ञान के सर्वस्व का एक सुविधाजनक इंटरनेट फव्वारा है। इस ताजा ‘सम्पादन-युद्ध’, जो कि मिशेल फूको की विकिपीडिया की प्रविष्टि के ‘बहस’ के पृष्ठों पर पूरी तरह दर्ज है, के फलस्वरूप दो प्रविष्टिकर्ता स्थायी रूप से प्रतिबंधित हो चुके हैं और एक अन्य बर्खास्त है। चारों दृष्टिकोण, जो कि पहले उल्लेखित हैं, इस ‘सम्पादन युद्ध’ में उन्हें पर्याप्त तरजीह दी गई।

इस एक दीर्घ प्रस्तावना के उपरांत, मैं अब फूको के काम के प्रभाव के सकारात्मक मूल्यांकन को प्रस्तुत करूंगी। मैं अब मिशेल फूको के कार्य को संदर्भित करने वाली विभिन्न राजनीतिक और ऐतिहासिक घटनाओं पर विशेष बल देना चाहूँगी, क्योंकि अक्सर या तो इन मुद्दों की चर्चा ही नहीं होती या फिर जब पाश्चात्य सभ्यता की वर्तमान अवनति के बारे की जाने वाली उपदेशात्मक भाषणों में, मिशेल फूको का नाम बिना सोचे समझे ले लिया जाता है, तब इन घटनाओं का मात्र सतही विवरण भर दे दिया जाता है।

मिशेल फूको, सन 1926 में एक सुविधा-जीवी मध्यमवर्ग के एक नौकरी पेशा परिवार में जन्मे थे। उनके पिता एक चिकित्सक थे, और चाहते थे कि उनका पुत्र भी परिवार की परंपरा का अनुसरण करे और चिकित्सा-शिक्षा लेकर यशस्वी चिकित्सक बन जाएगा। सन 1946 में उन्होंने पेरिस के प्रतिष्ठित ईकोल नोर्माल सुपीरियर में दाखिला लिया। सन 1845 में स्थापित हुआ, यह संस्थान मूलतः अध्यापकों के लिए शैक्षिक महाविद्यालय था, लेकिन बहुत ही कम समय में उसने फ्रांस के सर्वोत्तम संस्थानों में अपनी जगह बना ली और फ्रांस के शीर्ष बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ और यहां तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता भी दिये। लुई पाश्चर, ज्याँ पाल सार्त्र आदि इसी संस्था के पूर्व छात्र थे। सन 1950 में मिशेल फूको, उस समय के तमाम अन्य स्वाभिमानी, और क्रांतिकारी छात्रों के तरह, ईकोल के स्थानीय साम्यवादी पार्टी के प्रकोष्ठ से जुड़ गए। हालाँकि, उनका साम्यवादी पार्टी से जुड़ने का निर्णय, इण्डो-चाईना में चल रहे युद्ध से जुड़ी घटनाओं से प्रभावित था, परंतु, उनका कार्यकाल अत्यधिक उत्साहजनक नहीं रहा-वे यदा-कदा ही पार्टी की बैठकों में भाग लेते थे और सन 1953 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी, जब सोवियत संघ में कुछ यहूदी डॉक्टर कथित तौर पर राजद्रोह के लिए कारावास में डाल दिये गए। (मिशेल फूको के साम्यवादी पार्टी छोड़ने के इस प्रसंग का विवरण, इसी अंक में दिये गए मिशेल फूको के साक्षात्कार में विस्तार से है-अनु.) दिलचस्प बात यह है कि मिशेल फूको का यहूदियों के प्रति द्वेष, पूर्वाग्रह और भेदभाव की भावना की सीधी अस्वीकृति, उनकी जीवन यात्रा में, काफी बाद में सामने आई। सन 1982 में, पेरिस में, एक प्रसिद्ध यहूदी रेस्तरां पर एक गंभीर आतंकवादी हमले के पश्चात, जिसमें कि कई लोग घायल हुये और कई मारे गए, फूको, आतंकवाद के विरोध में, एक संकेत के रूप में, जितना हो सकता था, उतना वहाँ जाते थे और खाना खाते थे। परंतु, चलिये, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के, फ्रांस के राजनीतिक और बौद्धिक परिवेश की ओर पुनः लौटते हैं। दक्षिण पंथी विचार धाराएँ, जिन्होंने मातृभूमि से लगाव, पारंपरिक कुटुंबीय मूल्यों और सत्ता और सेना के सम्मान की बात की थी, वे जर्मन आधिपत्य और उसके पश्चात, वृद्ध होते प्रथम विश्व युद्ध के नायक मार्शल पितां के नेतृत्व में बैठाई गई कठपुतली सरकार के कार्यों के कारण, निर्ममता से लज्जित की गई थी। दक्षिण पंथी राजनीतिक दर्शन के ढहने से उत्पन्न शून्य को, प्रारम्भ में विभिन्न प्रकार के वाम पंथी, मार्क्सवादी, कैथोलिक और अस्तित्ववाद के नास्तिकतावादी संस्करणों ने भरने की कोशिश की। साम्यवादी पार्टी ने, जिसने कि (थोड़े विलंबे से ही सही) प्रतिरोध में अपना योगदान दिया, उस योगदान के फलस्वरूप जन साधारण की दृष्टि में एक यशस्वी और शानदार छाप स्थापित कर ली थी। दक्षिण पंथी राजनीतिक दर्शन के अवशेष, हालाँकि, फिर भी, विशेष तौर पर, चार्ल्स द गएल की नीतियों और सिद्धांतों में जीवित थे। ये सारे भिन्न-भिन्न आंदोलन, ‘मानवतावाद’ के एक विस्तृत छत्र में समूहबद्ध कर दिये गए थे। इस दर्शन की मुख्य धारणा यह थी कि, ‘मानवीय प्रकृति’ जैसा कुछ ही यह निर्धारित करता है कि जनता किस प्रकार विश्व में रहे और जिये। ‘मानवीय प्रकृति अपने अपने दृष्टिकोण के अनुसार, या तो ईश्वर-प्रदत्त थी, या एक प्रकार का प्राकृतिक जैविक साँचा थी, जो कि पूरे इतिहास में सतत् थी, और जिसे कि शनैः शनैः उद्घाटित किया जा सकता था और जिसे मानवीय और भौतिक विज्ञानों के प्रयासों द्वारा, या अगर कोई साहित्यिक या दार्शनिक रुझान का हो तो, कलात्मक और दार्शनिक आत्म- निरीक्षण की प्रक्रिया के द्वारा, परिभाषित भी किया जा सकता था।

हालाँकि, 1950 के दशक के अंत में, फ्रांस और फ्रांस के बाहर की कई घटनाओं, जैसे कि ख्रुश्चेव रपट, जिसने कि स्टालिन की नीतियों और सिद्धांतों की निंदा की थी, अल्जीरिया का युद्ध, और हंगेरियन क्रान्ति का साम्यवादी दमन, ने बुद्धिजीवियों के हलकों के बीच, एक व्यापक मोह-भंग को जन्म दे दिया था जिसके परिणामस्वरूप, कइयों ने प्रत्यक्ष राजनीतिक मुद्दों से अपना मुँह मोड़ लिया और उन ‘वैज्ञानिक’ क्षेत्रों की छान-बीन करने लगे, जो कि विचारधारात्मक रूप से तटस्थ थे और जो तात्कालिक प्रसंग थे। इन युवा बुद्धिजीवियों ने, मानवतावादी दृष्टिकोण, जो कि उन्हें राजनीतिक रूप से समझौतावादी और प्रचलन से बाहर लगता था, उसे रद्द कर दिया। इस नए आंदोलन के एक सदस्य थे, मिशेल फूको, जो इस काल खण्ड के संबंध में टिप्पणी करते हैं :

”युद्ध के अनुभव ने हमें एक ऐसे समाज की अविलंब आवश्यकता दर्शाई थी, जो कि जिस समाज में हम रह रहे हैं-वह समाज जिसने कि नाजीवाद को अनुमति दी थी, उससे पूर्णतः भिन्न हो... फ्रांसीसी युवा के एक बहुत बड़े हिस्से की उस सबके प्रति घृणा की प्रतिक्रिया थी।“

इस नए आंदोलन को अखबारों ने ‘संरचनावाद’ का नाम दिया था।

आम तौर पर कहा जाये तो, ‘संरचनावाद’ इस विचार को रद्द करता है कि ‘सार्वभौमिक मानवीय प्रकृति’ जैसा कुछ है, जो कि सारे इतिहास और अस्तित्व की व्याख्या कर सकता है। ‘संरचनावादियों’ का यह तर्क था कि, ‘अर्थ’ का निर्धारण, वस्तुओं के अंतरसबंध से होता है- वह स्वयं ‘वस्तुओं’ में स्थित नहीं है। बजाय यह खोजने की कोशिश करने के कि ‘मनुष्य’ का वास्तव में अपना ‘सार’ क्या है, ‘संरचनावादियों’ की रुचि, ज्ञान, संस्कृति, समाज और भाषा की आधारभूत ‘संरचनाओं’ को समझने में थी। तो, उदाहरण के लिए, रोलां बार्थ, यह तर्क देते हैं कि ‘लेखक’ सिर्फ भाषा का ‘वाहक’ है, वह भाषा जिसकी कि पहले से ही, जब लेखक ने लिखना भी प्रारम्भ नहीं किया था, तब से ही अर्थ और संरचनाएँ हैं। मार्क्सवादी चिंतक, लुई अल्थुसर ने यह सुझाव दिया कि इतिहास महज एक प्रक्रिया है जिसे लोग क्रियान्वित करते हैं- वे एक व्यक्तिगत स्तर पर उसके प्रभारी नहीं हैं।

मिशेल फूको का काम, विचार के इस आंदोलन में बिलकुल ठीक बैठता था। अगर हम उनके काम को उसकी विषयों के रूप में देखें तो वह इस प्रकार होगा : सन 1950 और 1960 के दशक में, फूको का प्रारम्भ का काम, विज्ञान के इतिहास और विज्ञान के दर्शन के व्यापक क्षेत्रों में रहा है। सन 1970 के दशक में, उन्होंने अपना ध्यान प्रत्यक्ष रूप से संस्थानों और ‘राज्य’ के इतिहास पर एकाग्र किया। फिर सन 1980 के दशक में, वे नैतिक तंत्रों के इतिहास की जांच-पड़ताल में जुट गए। उन्होंने, साहित्य और कला, हिस्टोरियोग्राफी (इतिहास के लेखन और लिखे हुए इतिहास का अध्ययन-अनु.), समसामयिक विषयों और राजनीति पर भी लिखा। मूल, ध्यान देने योग्य शब्द यहाँ ‘इतिहास’ है। कहना न होगा कि फूको, उतने ही इतिहासकार भी थे, जितने की वे दार्शनिक। वे, ज्ञान की ऐतिहासिक प्रणालियों में, प्रतिमानों की व्यवस्था को, बिना अस्पष्ट श्रेणियों, जैसे ‘जीनियस’, ‘प्रगति’, ‘तर्क-संगतता’, ‘कारण’, और ‘प्रभाव’ में आयोजन के सहारे पहचानने के लिए उत्सुक थे। व्यवस्था के ये प्रतिमान, उनके तर्क के अनुसार, ‘काल’ और ‘स्थान’ के प्रति पूर्णरूपेण विशिष्ट हैं, हालाँकि, उनका प्रयोग, ‘कल क्या होगा?’ यह जानने में नहीं किया जा सकता, परंतु, ये उस ‘आधार’ को समझने के लिए उपयुक्त हैं जिन पर हमारे आज के ‘समाज’ टिके हुए हैं और उन रास्तों को सचेत ढंग से खोलने के लिए भी, जो संभाव्य परिवर्तन की दिशा में जाते हैं। परंतु, हम यहाँ पर संभवतः अमूर्तता की तरफ भटक रहे हैं, और यह एक उपयुक्त बिन्दु होगा जहाँ से हम फूको के काम के वास्तविक और ठोस कथ्य की ओर देखना प्रारम्भ करें।

फूको ने अपना पहला काम, सन 1954 में, मनोविज्ञान पर प्रकाशित किया था, परंतु उन्होंने व्यापक ध्यानाकर्षण, अपनी पुस्तक ‘मैडनेस एंड सिविलाइजेशन’ के प्रकाशन से, सन 1961 में किया। 700 पृष्ठों के इस वृहद खण्ड का अँग्रेजी में अनुवाद, अभी सन 2006 में जा कर ही हुआ है। इस कृति में, फूको, तेरहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक के कालखण्ड में, पाश्चात्य जगत ने किस तरह ‘पागलपन’ का सामना किया, इस इतिहास का अनुसंधान करते हैं। उनका कार्य, अनुशासनों के एक व्यापक दायरे को जिसका विस्तार एक तरफ कला और साहित्य से लेकर, विज्ञान, औषधि-विज्ञान, और अर्थशास्त्र तक को सम्मिलित करता है। फूको, जो ‘पागल’ कहे जाते हैं उनकी दुर्दशा के प्रति सहानुभूति रखते हैं, और उन्होंने यह तर्क दिया कि ‘मनोरोग’ के रूप में ‘पागलपन’ की आधुनिक वैज्ञानिक परिभाषा, निश्चित तौर, मानव इतिहास में आवश्यक रूप से एक स्पष्ट प्रगति नहीं है। अगर उनकी इस पुस्तक ने प्रारम्भ में, लोगों पर कोई खास प्रभाव नहीं डाला, लेकिन सन 1960 के दशक में उसकी बिक्री कई गुना बढ़ गई, विशेषकर जब फूको की नई पुस्तक ‘द ऑर्डर ऑफ़ थिंग्स’ प्रकाशित हुई और अत्यधिक चर्चित हुई, और इसके साथ ही साथ, हाशिये पर डाल दिये गए समूहों और उनके अनुभवों के बारे में, लोगों की उत्सुकता जागृत हुई। सन 1969 में, फ्रांस में, परंपरागत मनोचिकित्सकों के एक समूह ने तो इस पुस्तक और उसमें वर्णित मानसिक रोगों की चिकित्सा की, कुछ हद तक संशयग्रस्त उत्पत्ति की, अप्रसन्न करने वाले वर्णन की निंदा के लिए, एक समूचे सम्मेलन का ही आयोजन कर डाला। मनश्चिकित्सा विरोधी आन्दोलन ने तो इस पुस्तक को अपने से चिपटा ही लिया, और मनश्चिकित्सा विरोधी डेविड कूपर ने तो इसके, सन 1967 में छपे अंग्रेजी अनुवाद के संस्करण की प्रस्तावना भी लिखी। भले ही फूको उस आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखते थे, परंतु उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि उनका काम, वास्तव में, इस आंदोलन की सीमाओं के भीतर ठीक-ठीक नहीं बैठता है। यह अंतर इस बात में था कि, जहाँ मनश्चिकित्सा विरोधी यह दावा करते थे कि ‘पागलपन’, सामाजिक बहिष्कार के फलस्वरूप उपजता है, फूको का यह मानना था कि उस व्यवहार को जिसको कि हम ‘पागलपन’ या मनोरोग के संकेतों के रूप में ले सकते हैं, का एक ठोस जैविक आधार है।

यह एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। फूको के काम से संबन्धित एक भ्रांत अवधारणा यह है कि वे तथाकथित आख्यान के एवज में ठोस यथार्थ की अनदेखी कर देते हैं। इस भ्रांत धारणा के अनुसार, वस्तुएँ, वास्तविकता का अधिग्रहण, या तो वे सामाजिक अभ्यासों के फलस्वरूप करते हैं, या फिर तब, जब उनके बारे में चर्चा की जाये। फूको की, इसके ठीक विपरीत, धारणा यह है कि दरअस्ल, एक दुःसाध्य भौतिक यथार्थ है- परंतु, जिस तरह हम उसका वर्णन करते हैं, उस पर परस्पर प्रभाव डालते हैं, और जिस तरह उस पर स्वयं को एकाग्र करते हैं, यह सब अपने आप में परिवर्तनशील है और किसी भी प्रकार से स्थिर नहीं है। और इस प्राकृतिक स्तर को पकड़ने का सिर्फ एक ही रास्ता है, और वह है उन जटिल संस्कृतिक और वैचारिक युक्तियों और साधनों के समूह को प्रयोग में लाना, जो कि ऐतिहासिक कालखंड और संस्कृति के अनुसार व्यापक रूप से भिन्न हैं। फूको, यह तर्क रखते हैं कि, जिस प्रकार से हम शब्दों और विचारों को जोड़ते हैं, वह अपने आप में प्रकट नहीं है, और ऐसा कोई भी सरल तरीका नहीं है, उन सारी कड़ियों को सर्वथा के लिए प्रकट करने का, जो कि हम शब्दों (या ज्ञान) और विचारों के बीच जोड़ते हैं। अगर निश्चितता का अभाव किसी को निराश कर देता है, तो वहीं दूसरी ओर फूको, इसे आशावाद की एक वजह के रूप में देखते हैं। वे विचार और अभ्यास, जो लोगों पर दमनात्मक और अनुचित प्रभाव डालते हैं, और ज्ञान और विज्ञान के अंतर्गत सीमित प्रभाव डालते हैं, हमेशा बदले जा सकते हैं। किसी कृत्रिम सत्य-भले ही वह वैज्ञानिक, धार्मिक या राजनतिक हो, के नाम पर हम, जन संख्या के वृहद समूहों को, जीवन भर की दुर्गति के लिए नहीं अभिशापित कर सकते। फूको लिखते हैं“ रू ”यह मेरा एक लक्ष्य है, लोगों को यह दिखाना कि बहुत सारी वस्तुएँ, जिनके बारे में लोग सोचते हैं कि वे सार्वभौमिक हैं, और जो कि उनके परिदृश्य का भाग हैं, वे बहुत सटीक ऐतिहासिक परिवर्तनों के फलस्वरूप हैं। मेरे सारे विश्लेषण, मानवीय अस्तित्व में सार्वभौमिक आवश्यकताओं के विचार के विरुद्ध हैं।“

यहाँ यह तर्क नहीं है कि ‘सत्य’ जैसा कुछ नहीं है। फूको, यह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे, ‘सारे सत्यापित किए जा सकने वाले सत्यों को संशयात्मक या सापेक्षतावादी रूप से नकारने में नहीं लगे हैं’। बल्कि, उनकी रुचि इसमें है कि, वे कतिपय उन विशिष्ट सांस्कृतिक और ऐतिहासिक नियमों की जांच-पड़ताल करें जो यह नियंत्रित करते हैं कि किस तरह लोग ‘सत्य’ तक पहुँच सकते हैं और किस तरह ‘सत्य’ किसी सामाजिक निकाय में वितरित होता है। उदाहरण के लिए, हम यह देख सकते हैं कि समाज में, कौन-कौन (पुरोहित, वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, पत्रकार, हर प्रकार के चिकित्सक) सत्य बोलने के लिए अधिकृत हैं। हम उन पद्धतियों की, जिनका उन कथनों (वैज्ञानिक शोध, ऐतिहासिक शोध, चिकित्सकीय या धार्मिक आत्मनिरीक्षण) को, जिन्हें कि हम ‘सत्य’ के रूप में मान्यता देते हैं, के उत्पादन और संयोजन की वैधानिकता स्वीकृत है, का विश्लेषण भी कर सकते हैं। तीसरे, हम उन संस्थानों (विद्यालय, मंदिर, राजनीतिक पार्टियां, विशेषज्ञों के विद्यालय, अकादमिक पत्र-पत्रिकाएँ, संचार माध्यम) को केंद्र-बिन्दु बना सकते हैं जो कि सत्य के विपणन के लिए सामाजिक रूप से अधिकृत हैं।

यह एक समयानुकूल बिन्दु है जहां हम उस विचार का परिचय दे सकते हैं जो कि पक्के तौर पर फूको के नाम के साथ सम्बद्ध है, वह विचार है ‘सत्ता या अधिकार’ का। फूको, ‘अधिकार’ की परिभाषा कुछ इस प्रकार देते हैं। वे क्रियाओं की एक ‘संरचना’ द्वारा, क्रियाओं की एक दूसरी ‘संरचना’ को, रूपांतरित करने की क्षमता को ‘अधिकार या सत्ता’ कहते हैं। यह ऐसा कुछ नहीं है कि जिस पर स्वामित्व पाया जा सके, बल्कि, यह अस्तित्व में तभी आता है, जब इसका प्रयोग किया जाये। फूको के मतानुसार, ‘सत्य’ का उत्पादन और परिनियोजन, ‘अधिकार’ के प्रयोग से, आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है। सामान्यतः, प्लेटो के समय से यह विचार चला आ रहा है कि ‘सत्ता या अधिकार’ और ‘सत्य’, एक वर्णक्रम के दो विपरीत ध्रुव हैं। परंतु, इस तर्क के विरोध के लिए हमारे लिए, शोध के लिए दिये जाने वित्तीय अनुदान की राजनीति पर एक फौरी दृष्टि डालना ही पर्याप्त रहेगा। स्पष्टतः, चिकित्सा-विज्ञान का एक शोधार्थी, जो कैंसर जैसे प्रचलित विषय पर शोध कर रहा है, और समुचित रूप से वित्तीय अनुदानों के द्वारा पोषित है, ‘सत्य’ जैसे कुछ को अत्यधिक प्रकट कर पाएगा, बजाय एक शोधार्थी के, जिसके पास उतने वित्तीय अनुदान नहीं हैं और जो फाइब्रोमाएल्जिया, जैसे ‘अनाकर्षक’ और अप्रचलित विषय पर शोध कर रहा है। फूको, 1963 की अपनी पुस्तक, ‘द बर्थ ऑफ़ द क्लीनिक’ में, फ्रांस में सन 1769 से 1825 के मध्य हुए, आधुनिक लाक्षणिक चिकित्सा के उत्थान के संदर्भ में, यही मुद्दा उठाते हैं, और औषधि-विज्ञान के विज्ञान के रूप में गठन को, अपने समय के जटिल राजनीतिक, आर्थिक, और सामाजिक कारकों से जोड़ते हैं। फूको सतर्कता बरतते हुए, इस ओर इंगित करते हैं कि, इन तत्वों की भागीदारी, विज्ञान के आंतरिक वैचारिक प्रविधि या व्यवस्थित ज्ञान के अन्य रूपों को, अमान्य नहीं करती है। संक्षेप में, ज्ञान और विज्ञान, भौतिक और बाह्य जगत के संबंध में, फिर भी, परिचालित रहते हैं।

फूको की अगली पुस्तक, ‘द ऑर्डर ऑफ़ थिंग्स’, जो कि सन 1966 में प्रकाशित हुई, तुरंत ही सर्वाधिक बिक्री वाली सिद्ध हुई। उस पुस्तक के आते ही उसका स्वागत, नव संरचनावादी आंदोलन के घोषणा पत्र की तरह हुआ- भले ही बहुतेरे लोगों ने, जिन्होंने वह पुस्तक खरीद ली हो लेकिन वे उसके पहले पृष्ठ से आगे भी न बढ़े हों- और एक वाजिब वजह के कारण। फूको, की यह संभवतः, सबसे कठिन और विचार वैशिष्टय् की पुस्तक है, जो अर्थशास्त्र, जीव-विज्ञान और भाषा-विज्ञान के इतिहासों के बारे में बात करती है। पत्रकारों ने उसके विशिष्ट कथ्य को नजरअंदाज किया और फूको के उन उकसाने वाले कथनों पर स्वयं को एकाग्र किया, जैसे कि मार्क्सवाद, बच्चों के पैर छपछ्पाने वाले तरण-ताल में उठने वाले छोटे से तूफान से अधिक कुछ नहीं था, और यह कि वह ‘मानव’, जो मानवतावादियों का श्रद्धेय था, अगर पूरी तरह मर नहीं चुका था तो, मरने के निकट था। इस तरह के कथनों ने, दोनों खेमों, संरचनावादी और मानवतावादी, में विवाद के लिए पर्याप्त उर्वर भूमि प्रदान की।

इस पुस्तक के प्रकाशन के दो वर्ष पश्चात, सन 1968 में, पूरे विश्व में छात्र आंदोलन, प्रस्फुटित हो गए। प्रसंग से इतर, जिस तरह हम अमेरिकी संस्कृति की बढ़ती हुई व्यापकता देख रहे हैं, उसी तरह अभी हाल ही तक, सन 1968 में पेरिस में हुई घटना को ‘प्रतिष्ठित’ माना जाता था, अब अमेरिका, विश्व मंच पर, और साथ ही साथ अन्य कई सांस्कृतिक और ऐतिहासिक क्षेत्रों में, अपनी उपस्थिति दर्शाने के लिए धक्कामुक्की कर रहा है। बहरहाल, पुनः फूको पर लौटें। फूको उस समय टय्ूनीसिया में रह रहे थे, और छात्रों के साथ जो हुआ- मारपीट, प्रताड़ना, और राजनीतिक प्रणालियों में महज बाधा उत्पन्न करने के लिए वर्षों का कारावास- उससे वे अत्यधिक व्यथित हुए। उन्होंने स्वयम ने भी जोखिम उठाया- उन्होंने अपने घर में छात्रों द्वारा संचालित एक प्रेस को जगह दी- यह एक ऐसा काम था कि अगर वे पकड़े जाते तो उन्हें इसके गंभीर परणाम भुगतने पड़ते। वे सन 1968 के अंत में, एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता बनने और भागीदारी करने के दृढ़निश्चय के साथ, फ्रांस लौट आए। ऐसा करने में वे अकेले नहीं थे, सन 1968 ने सिर्फ बुद्धिजीवियों ही नहीं, बल्कि छात्र, सामाजिक रूप से वंचित कई दूसरे समूहों के कार्यकर्ताओं, का राजनीतिकरण देखा और सामान्य सामाजिक अशांति और प्रतिवाद के एक दशक की शुरुआत की।

सन 1970 के दशक के दौरान, सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करती हुई, बौद्धिक और अतिवादी, दोनों तरह की गतिविधियों में, फूको सबसे आगे पाये जाते थे। प्रदर्शनों में भाग लिया, समितियों की अध्यक्षता की, असंख्य याचिकाओं पर अपने हस्ताक्षर किए, और कई समूहों, जो की बंदियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, और अप्रवासियों की सहायता करते थे, में भागीदारी की और कईयों की स्थापना भी की। आश्चर्यजनक रूप से, फ्रांस में कोई वामपंथी आतंकवादी समूह उत्पन्न नहीं हुआ, हालाँकि, जैसा कि सन 1970 के दशक में इटली और जर्मनी के परिदृश्य में प्रकट हुआ। उस समय ऐसे कुछ प्रस्ताव जरूर थे, कि ऐसा फूको और दूसरे बुद्धिजीवियों, जिन्होंने फ्रांस के उन मसलों की हालत में योगदान दिया, के शांत और संयमित प्रभाव के कारण हुआ। सन 1975 में, कारागारों की स्थिति के बारे में उनकी सक्रियता के चलते, फूको ने सन 1757 से लेकर सन 1838 में, फ्रांस में, कारागारों की आपराधिक दण्ड के रूप में सार्वभौमिक स्वीकृति का इतिहास प्रकाशित किया। इस पुस्तक का शीर्षक था ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’। यह निस्संदेह फूको का सबसे ख्यात और सबसे प्रभावशाली काम है। कारागार को उदाहरण की तरह प्रस्तुत करते हुए वे, उस समाज के उद्भव का खाका खींचते हैं, जिसे वे ‘अनुशासनात्मक समाज’ कहते हैं, जिसमें कि आबादी के वृहद समूहों को, उस तरह से कार्य करने के लिये प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे कि वे सरलता से प्रबंधित किए जा सके। संस्थान जैसे कि, विद्यालय, कारागार, सैनिकों के लिए बने बैरक, कारखाने, और अस्पताल, ये सारे संस्थान, अपने स्थापत्य, दैनंदिन, और शारीरिक हाव-भाव और गतिविधियों के अनुशासन से, इस प्रकार के प्रशिक्षण के लिए एक वाहिका की तरह कार्य करते हैं। अनुपालन की आश्वस्ति, निगरानी की जटिल प्रणालियों के द्वारा आश्वस्त की जाती है।

सन 1976 में, फूको ने ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्स्युआलिटी’ का पहला खंड प्रकाशित किया। यह पुस्तक, यह तर्क रखती है कि, बजाय यौनिकता के दमन के, आधुनिक योरपीय विचार- उससे निपटने के लिए, वैज्ञानिक और संस्थागत श्रेणियों की तादाद में बढ़ोतरी करते हुए, अनवरत उसकी चर्चा करता रहता है। वे, उन विचारों की रूपरेखा रखते हैं, जो यह बताते हैं कि किस तरह किसी सामाजिक निकाय या संस्था में, ‘अधिकारों का प्रयोग और प्रतिरोध’ होता है, और इस प्रकार वे, ‘बायोपावर’ की अवधारणा, जिसने कि हाल ही के वर्षों में टीकाकारों के कार्यों में यथेष्ट प्रतिष्ठा अर्जित की है, को प्रस्तुत करते हैं। ‘बायोपावर’ से फूको का अभिप्राय है, आधुनिक ‘राज्य’ के द्वारा जन संख्या में होने वाले जन्म, मृत्यु, प्रजनन, और बीमारियों के प्रबंधन का। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में फूको ने ‘गवर्नमेंटालिटी’ की प्रस्तावना की, यह शब्द अँग्रेजी के दो शब्दों ‘गवर्नमेंट’ यानि सरकार और ‘रेशनालिटी’ यानि तर्क-संगतता के युग्म से बना है। फूको ने इस शब्द का प्रयोग प्रारम्भ में, आधुनिक योरपीय इतिहास में, ‘राज्य’ की अवधारणा के उदय के संदर्भ में, जनसमूहों पर शासन के विशिष्ट तरीकों के वर्णन करने में किया था। बाद में उन्होंने इस शब्द की परिभाषा में विस्तार करते हुए, उन तकनीकों के वर्णन को भी शामिल कर लिया जो कि लोगों के दैनंदिन के कार्यकलापों और हर सामाजिक स्तर पर उपलब्ध स्वतंत्रताओं को दिशा देती हैं। यह विचार बहुत प्रचलित हुआ है, और इसने पूरे विश्व में एक उद्योग को जन्म दिया जो कि इस विचार को अधिकारी-वर्ग के पेशे और संचालन के विकास पर लागू करता है।

सन 1980 के दशक में, फूको ने अपना ध्यान, पश्चिम में नैतिक व्यवस्थाओं के इतिहास पर केन्द्रित किया और उन्होंने प्राचीन ग्रीक और रोमन दर्शनिकों के कार्य की जाँच-पड़ताल की। अब तक, हमेशा से, उनके चुनाव का ऐतिहासिक कालखण्ड, योरप में सत्रहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी रहा है। पुनः, उनका यह कार्य भी अत्यधिक प्रभावी रहा, इस कार्य ने टीकाकारों को इस बारे में चिंतन के लिए ऐतिहासिक उपकरण उपलब्ध कराये, कि किस तरह मानव जाति स्वयं को उस ‘सत्ता’ की तरह, जो कि चयन कर सकती है कि हम अपने बाह्य परिवेश और एक दूसरे के साथ पारस्परिक कैसे कार्य करें, आकार देती है। सन 1984 में, मृत्यु के एक महीने पहले उन्होंने ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्स्युआलिटी’ के दो और खंड प्रकाशित किए। इन खंडों में उन्होंने, यौनिकता के प्रति प्राचीन ग्रीक और रोमन रवैयों और नीति-शास्त्रों को, जो कि दर्शन के कई ग्रन्थों में उल्लेखित हैं, की विवेचना की।

तो, इस सबसे हम, उस प्रकार की टिप्पणियों के संदर्भ में जिनकी रूपरेखा मैंने इस आलेख के प्रारम्भ मे रखी थी, क्या निष्कर्ष निकालें? फूको के काम को गंभीरता से क्यों लिए जाते रहना चाहिए? इसमें कोई संदेह नहीं कि फूको का काम कठिन है। वे स्वयं ही यह स्वीकारते हैं कि उनकी लेखन शैली जटिल है, परंतु, उसके साथ ही साथ यह तथ्य भी है कि, इस प्रकार का लेखन जो कि विचार के संयोजन के परंपरागत तरीकों को चुनौती देता है, निश्चित रूप से पाठक की ओर से भी श्रम की आकांक्षा करेगा। फूको निश्चित रूप से एक पढ़े-लिखे और निस्संदेह विशिष्ट पाठक के लिए लिख रहे थे, और बिना इस पृष्ठभूमि के उनके कुछ कार्यों को समझना कठिन है। इसके साथ, उनके काम को अँग्रेजी में पढ़ना, दोनों, भाषा और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुवाद में आने वाली कठिनाइयों से जूझने की आवश्यकता पर भी बल देता है। यह जटिलता, फूको के काम को भ्रांतियों और उसके त्रुटिपूर्ण निरूपण की ओर भी ले गई हैं। फूको ने स्वयं इसके बारे में शिकायत की है, उनकी पुस्तकों के ‘आप्त वाक्यों और नारों’ में विघटन के बारे में बात करते हुए, और इस बारे में भी बात करते हुए कि लोगों ने उनके काम के बारे में अपनी धारणा, दूसरे दर्जे के साहित्य को पढ़ कर बनाई है, बनिस्बत उसके मूल पाठ को पढ़ने के।

फूको के व्यक्तिगत जीवन और उसके उनके कार्य से संबंध के बारे में प्रश्न, अत्यधिक जटिल और दीर्घकाल से दुहराये हुए, उन प्रश्नों को उठाते हैं, जो कि किसी लेखक और उसके कार्य के संबंध में उठाए जा सकते हैं और साथ ही साथ, समकालीन समाज में समलैंगिकता के प्रति समाज के रवैये के बारे में उठाए जा सकते हैं। उनके व्यवहार के बारे में लगाए गए अत्यधिक निंदनीय अभियोग, किसी भी प्रकार के साक्ष्यों और प्रमाणों द्वारा समर्थित नहीं हैं, और इसके साथ ही साथ यह भी स्पष्ट नहीं है कि यथार्थ में उनके कार्य के विषय-वस्तु में कोई निहितार्थ रहा हो। किसी भी लेखक के कार्य को ‘एड होमिनम’ तर्कों से रद्द करना, वाग्मिता की एक प्राचीन और संदिग्ध गुण वाली युक्ति रही है। कलात्मक और बौद्धिक उत्पाद, का उत्थान और पतन उनकी स्वयं की ही शतोंर् पर होना आवश्यक है और सामान्यतः यह किसी भी रचना-कर्म के लिए एक ऐतिहासिक परीक्षण होता है।

लोग फूको के दृष्टिकोण से इतने व्यथित क्यों हो जाते हैं और उनका निरूपण एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करने लगते हैं, जो सत्य को कदापि सम्मान न देता हो? मूलतः बात यह है कि, जो भी पारंपरिक रूप से ‘सत्य’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसे उसके अंकित मूल्य पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। ना ही वे इस बात के लिए तैयार थे कि वे लोगों को बताएं कि ‘क्या करना चाहिए और क्या नहीं’, जैसा कि दार्शनिकों के आचरण के लिए एक प्रारूप रखा जाता है। उनका दृष्टिकोण यह था कि कई ‘तथा-कथित’ सत्य जो कि स्वयं-सिद्ध स्वीकार लिए जाते हैं, उनके सटीक ऐतिहासिक मूल हैं, और उन ‘सत्यों’ को, किसी भी सामाजिक निकाय में ‘सत्ता’ के उन विशिष्ट विभाजन के हितों की रक्षा के लिए बनाए रखा जाता है। उनका रचना-कर्म इन्हीं प्रक्रियाओं की चौकस ऐतिहासिक जाँच-पड़ताल और खँगालने का था। इससे कई सारे टीकाकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि फूको उस सब को ध्वस्त करने के लिए निकल पड़े थे, जिसे कि अच्छे सोच वाले लोग, निर्विवाद रूप से ‘सत्य’ मानके चलते हैं, और ऐसा करने के लिए फूको किसी भी सीमा तक जाने को तैयार थे, भले ही इसके लिए उन्हें पूर्ण ‘गल्प’ ही क्यों न ईजाद करना पड़े। यह सच्चाई कि, फूको के विचारों का, विकृत प्रयोग, अक्सर इस बिन्दु की ओर बढ़ जाता है, निश्चित रूप से सहायक नहीं होती है। परंतु, फूको के मूल रचना कर्म की महज फौरी जाँच-पड़ताल ही इस बात का खंडन करने में सहायक होती है। तकनीकी स्तर पर, फूको का रचना-कर्म, ऐतिहासिक पुरालेख संबंधी अन्वेषण की दृढ़ प्रणालियों और तुलना, सत्यापन और उद्धरण के विश्लेषणात्मक पद्धतियों के साथ, अनुभवजन्य शोध पर टिका हुआ है। फूको, पेरिस के राष्ट्रीय ग्रंथालय के परिचित व्यक्ति थे, और कई लोगों ने उन्हें दिन-रात उस ग्रंथालय के ‘रीडिंग-रूम’ में पढ़ते देखने का जिक्र किया है। तो, प्रश्न यह उठता है कि, फिर भी यह उन लोगों को विश्वास दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है, जो यह कहते हैं कि फूको का ‘सब-कुछ’ मनगढ़ंत है? इसका एक कारण यह है कि फूको, उस अनुभवजन्य सामाग्री के साथ काम करते हैं जिसकी कि अक्सर दूसरों के द्वारा अवहेलना कर दी जाती है, और उस सामग्री को नए और अनपेक्षित तरीकों में क्रमबद्ध करते हैं। एक दूसरा कारण, फूको कहते हैं, यह भी है कि, यह अनुभावजन्य सामाग्री, पहले ही एक व्याख्या है, जो कि पहले से ही विशिष्ट तरीकों से चुनी गई, संकलित और व्यवस्थित की गई है। इस विचार कि शोध का ‘कच्चा माल’ अगर ‘नया’ नहीं है, तो अपने आप में तटस्थ भी नहीं है, अक्सर सुविधापूर्ण ढंग से उपेक्षा की जाती है, क्योंकि यह विचार दूसरे शोधार्थियों और विश्लेषकों के प्रयासों पर भी प्रश्न उठाता है, क्योंकि वे इस विचार से, उनके स्वयं के काम की नींव को क्षीण होता हुआ पाते हैं।

परंतु, कोई भी इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि, फूको यह दावा कर रहे हैं कि कुछ भी ‘सत्य’ नहीं है और जो कुछ भी ‘सत्य’ जैसा निर्दिष्ट किया गया है, वह सिर्फ ‘सत्ता’ के हितों की सेवा करता है, और जो कि दूसरों के व्यवहार को सर्वदा हानिकारक दिखाने का प्रयास करता है। बल्कि, इसके बजाय, फूको यह प्रस्ताव दे रहे हैं कि, हमें अत्यधिक सतर्कता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है- दोनों ही स्तरों, ज्ञान के स्तर पर या सामाजिक संयोजन के स्तर पर, यथास्थिति की एक सरल स्वीकृति, मिथक, अन्याय और सामाजिक निकाय में यथोचित स्वतंत्रताओं के बंधन की स्वीकृति और स्थायीकरण का कारण बन सकती है।

फूको के रचना-कर्म ने उस कठोर और सख्त हो चुके दृष्टिकोण को मुक्त करने में सहायता दी है, और कइयों को अपने विचारों के पुनर्मूल्यांकन के लिए, बहसों के प्रारम्भ के लिए, और फूको के रचना-कर्म को आधार बना कर दूसरे अनुशासनों के व्यापक दायरे में शोध करने के लिए उकसाया भी है।

फूको मूलरूप से एक आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। किसी भी क्षेत्र में ‘वस्तुस्थिति’ पत्थर की लकीर नहीं है, बल्कि, कई लोगों द्वारा, समय के एक लंबे अंतराल में की गई क्रियाओं और लिए गए निर्णयों के समूह का उत्पाद है। इसका अभिप्राय यह है कि वस्तु-स्थिति बदली जा सकती है। वर्तमान में, इस तरह के आशावाद की आपूर्ति न्यूनतम है और मेरे विचार से, यही बिन्दु फूको के रचना-कर्म को पढ़ते रहने का मुख्य कारण है।

 

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जीवन

पुनर्वसु जोशी

मिशेल फूको : एक त्रासद जीवन का हासिल

मिशेल फूको, बीसवीं शताब्दी के ऐसे चिंतकों में से हैं जिन्होंने सदी के उत्तरार्ध्द में अपनी अवधारणाओं और उनसे उपजे विमर्शों से, ‘आधुनिकता’ के स्वीकृत तर्कों को अपदस्थ कर दिया। ‘आधुनिकतावाद’ ने, जिस तरह से ‘पश्चिम के ज्ञानोदय’ से, अपनी शक्ति अर्जित करके, विचारों और तर्कों का, जो भव्य-भवन खड़ा किया था, उसमें सेंध लगा कर, उसे भग्नावशेष में बदलने का काम जिन चिंतकों ने किया, वे कहलाये उत्तर-आधुनिकता के सिद्धान्तकार जिनकी लम्बी फेहरिस्त में, एक नाम मिशेल फूको का भी लिया जाता है। इन्होंने, यह प्रमाणित करने में, कतई

कोई कसर शेष नहीं रहने दी कि, ‘ज्ञानोदय’ के उस युग में ही, उसके ‘नाश की नागरिकता‘ भी मौजूद थी। लेकिन, वह एक लम्बे समय तक, अ-मुखर ही बनी रही। लेकिन, सदी के उत्तरार्ध्द में, नई दार्शनिक अवधारणाओं का उदय हुआ, और उसने ‘ज्ञानोदय’ काल के ‘समग्रतावाद’ को खण्ड-खण्ड किया और उसकी दरारों से, निरन्तर नए-नए प्रश्न निकल कर आने लगे। उन्होंने ‘समग्र’ को ही संकटग्रस्त कर दिया। लगने लगा, ‘ज्ञान’ के उस ‘आततायी’ से लगने वाले युग का यह विदा का समय है।

 

नतीज़तन, सामाजिक वर्चस्वों के तमाम केन्द्रों में, उथल-पुथल मच गई। विचारों की दुनिया के लिए इसे ‘भयाक्रांत’ समय बताया जाने लगा। इसे ‘कल्चरल मेलन्कली’ भी कहा गया। क्योंकि, अवधारणाएँ, जो अभी तक अपने वर्चस्व के शिखर पर थीं, वे आहिस्ता-आहिस्ता ढहने लगी थीं। इस कारण, विचारों की दुनिया में एक नितान्त नए अवसाद ने जन्म लिया। ‘अविश्वसनीयता’ मूल-भाव की जगह लेने लगी। ‘समग्रतावाद’ के दुर्ग में ध्वंस शुरू हो चुका था। केंद्रीकृत विश्व, तिरोहित होने की तरफ़ कूच करने लगा। सत्ता विकेंद्रित होती दिखाई देने लगी। ‘ट्राईसेक्शन ऑफ़ पावर’ की वकालत की जाने लगी। ‘ज्ञान’, ’पूँजी’, और ‘हिंसा’ के बाद, अब सत्ता ‘देह’ में खोजी जाने लगी। ‘सत्ता, मनुष्य की कामना का ठोस और मूर्त उत्पाद है’--यह विचार एक सार्वदेशीय विचार बनने लगा। कहना न होगा कि मिशेल फूको, एक दार्शनिक की तरह, इसी हलचल से भरे क्षितिज पर उदय हुए, और ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्सुयालिटी’, ‘डिसिप्लिन एण्ड पनिश’, ‘मेडनेस एण्ड सिविलाइजेशन’, ‘बॉयोपावर’ आदि पुस्तकों ने उन्हें महत्त्वपूर्ण चिंतक के रूप में, एक विशिष्ट पहचान दी।

उन्होंने ‘ज्ञान’, ’दण्ड’, ’औषधि’, और ’यौनिकता’ जैसे विषयों पर स्वयं को एकाग्र करते हुए जो कुछ लिखा, उसने अमेरिका और ब्रिटेन की युवा पीढ़ी को पर्याप्त प्रभावित किया और वे मादक-द्रव्यों के सेवन तथा यौन-स्वछन्दता को, जीवन की एक नई शैली की तरह अपनाने के लिए तैयार होने लगे। वे निषेध में प्रवेश के लिए, नैतिकता को अवरोध की तरह देखने लगे। मिशेल फूको, दूसरे अन्य दार्शनिकों के साथ, इन सबके पीछे, एक अवेध्य-सी दार्शनिक पृष्ठभूमि के स्थापत्यकार की तरह अवतरित हुए थे। उनके विचारों से, वहाँ के केवल अकादमिक जगत में ही हलचल नहीं मची, बल्कि, कई आन्दोलनकर्ता समूहों ने भी, फूको से जुड़ कर, उनकी अवधारणाओं को चतुर्दिक स्वीकार्य बनाने की पूर्व-पीठिका बनाई। निश्चय ही, इस तरह की अवधारणाओं को आविष्कृत कर लेने के पीछे, फूको के व्यक्तिगत जीवन और उसमें फैली हुई अराजकता की भी, बहुत महत्त्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका मानी जाती है।

आरम्भिक वर्षों में, मिशेल फूको के व्यक्तिगत जीवन के बारे में, उनके पाठकों को, बहुत ही न्यूनतम जानकारी थी। उन्होंने स्वयं भी, अपने निजी जीवन के बारे में कहीं ज़्यादा कुछ लिखा ही नहीं, लेकिन मृत्यु के बाद, उनके साहचर्य में रहे कुछेक लोगों की लिखी किताबों से, थोड़ी बहुत बातें बाहर आयी हैं।

पॉल मिशेल फूको का जन्म 1926 के अक्टोबर माह की 15वीं तारीख को हुआ था। वे पश्चिमी फ्रांस के प्वातिए शहर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की तीन संतानों में, दूसरे क्रम पर जन्मे बालक थे। पिता चिकित्सक थे और पारिवारिक परम्परा के अनुसार, उनका नाम पॉल फूको रखा गया। लेकिन, उनकी माँ के भावनात्मक आग्रह के चलते, उनके नाम में मिशेल शब्द जोड़ दिया गया। पिता, स्वभाव से एक क्रुद्ध व्यक्ति थे, नतीज़तन, उनके क्रोध से बचने के लिए, पॉल ने दो वर्ष पूर्व ही स्कूल जाना शुरू कर दिया था। स्कूल, उनके लिए, पिता के क्रोध से सुरक्षा की गारण्टी बन गया था। जहाँ वे स्कूल के पुस्तकालय में हर समय बरामद किये जा सकते थे। उन्होंने 1930 से 1936 तक पढ़ाई की और ख़ासकर, भाषा में उनकी कुशाग्रता के चलते, उन्होंने फ्रेंच और ग्रीक में उत्कृष्टता अर्जित कर ली, लेकिन दुर्भाग्यवश गणित में वे हमेशा फिसड्डी ही बने रहे। क्योंकि, इस विषय के उनके अध्यापक, स्वभाव से बहुत रूखे और चिड़चिड़े थे।

 

जब वे किशोर वय में ही थे कि 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया और फ्रांस पर जर्मन नात्जियों का कब्ज़ा हो गया जो 1945 तक बना रहा। हालाँकि, उनके पिता और परिवार ने, इसका विरोध तो किया, लेकिन उन्होंने इसके प्रतिरोध के लिये होने वाले किसी आन्दोलन में, कोई सक्रिय भागीदारी नहीं की। अलबत्ता वे इस तरह के आन्दोलन से दूर ही रहे।

ज्याँ हिप्पोलाइट और लुई अल्थुसर के प्रभाव में आने के बाद युवा मिशेल का झुकाव दर्शनशास्त्र की तरफ़ हो गया और उसे नीत्शे के दार्शनिक विचार खींचने लगे। वे जीवन भर नीत्शे के दार्शनिक वर्चस्व से बाहर नहीं आए। वे फ्रेडरिक नीत्शे को, अनहोली-घोस्ट कहा करते थे। सन् 1966 से 1968 तक उन्होंने टय्ूनीसिया के एक विश्वविद्यालय में पढ़ाया और वहाँ से लौटने के पहले ही, वे पेरिस के एक प्रयोगात्मक विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष हो गए। सन् 1970 में, वे कॉलेज ऑफ़ फ्राँस से सम्बद्ध हुए और यह सदस्यता, उन्होंने मृत्यु तक बरक़रार रखी। हालाँकि, कई वर्षों तक वे विदेशों में सांस्कृतिक राजनयिक के पद पर भी रहे, और वहीं से लौट कर, उन्होंने अपनी सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तकें, ‘बर्थ ऑफ़ क्लीनिक’, ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्स्युआलिटी’, और ’मेडनेस एण्ड सिविलाइजेशन’ पूरी की जिसने दुनिया भर के चिंतकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। वे कई वामपंथी समूहों से भी जुड़े रहे जो ‘नस्लवाद’ और ‘फासिज़्म’ के िख़लाफ़ थे। वैसे, नीत्शे के दर्शन से प्रभावित होने के कारण, फूको को भी परम्परागत वामपंथियों ने फासिस्ट भी कहा, लेकिन जब उनकी ‘आर्कियोलॉज़ी ऑफ़ नएलेज’ तथा उनकी ‘बॉयो-पावर’ जैसी किताबें सामने आयीं तो उन्हें उत्तर-आधुनिकतावादी विचार की प्रतिष्ठा मिलने लगी। यहाँ तक कि नव-वामपंथियों ने भी उन्हें अहमियत देनी शुरू की और उन्हें चतुर्दिक प्रतिष्ठा मिलने लगी। उन्होंने ‘ज्ञान’ और ‘सत्ता’ के गठजोड़ से, सामाजिक नियंत्रण के सांस्थानिक गढ़न्त पर, एक गहरे सामाजिक सिद्धान्तकार की तरह हस्तक्षेप किया। इसमें उनको, हेगेल के अध्ययन की विशेषज्ञता से पर्याप्त मदद मिली और उन्होंने अस्तित्ववाद और मार्क्स-हेगेल के ‘द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त’ को नाथ कर, नए निष्कर्ष निकाले। उन्होंने मार्क्सवाद को, ‘आत्मनिष्ठता’ (सब्जेक्टिविटी) से जोड़ा तो लोगों ने कहा कि वे मार्क्सवाद को बेदख़ल करना चाहते हैं जबकि वे फ्रेंच कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे। सन् 1953 में अन्ततः उन्होंने पार्टी छोड़ दी, लेकिन वे अल्थुसर के हमेशा पक्षधर बने।

उनका पूरा जीवन एक विचित्र त्रासदी से भरा रहा। इसके चलते 1948 में जब वे फ्राँस के सबसे ख्यात विश्वविद्यालय ईकोल नोर्माल के छात्र थे तब उन्होंने आत्महत्या की एक असफल कोशिश भी की थी। डॉक्टरों ने बाद में इसका कारण उनके समलैंगिक समूहों के साथ रह कर, मादक द्रव्यों के सेवन को जिम्मेदार बताया था। तब पिता ने राजधानी के सर्वोत्कृष्ट अस्पताल में उनका यथेचित उपचार भी कराया था लेकिन बाद इसके, मृत्यु को लेकर उनके अवचेतन में एक स्थाई गाँठ-सी पड़ गई थी।

फूको के विचारों से फ्राँस के बौद्धिकजगत में एक अपूर्व बौद्धिक चेतना बनी रही। एक अतिक्राम्य बुद्धिजीवी की तरह वे फ्रेंच बुद्धिजीवी बिरादरी के बीच स्वीकारे जाते रहे और राजनीतिक क्षेत्र में, हस्तक्षेपकारी भूमिका रखने वाले लोगों में वाल्टेयर, ईमाइल जोला से लगा कर ज्याँ पॉल सार्त्र तक आते हैं, ठीक इनके बाद मिशेल फूको का ही नाम आता है। नीत्शे को सबसे पहले, जब 1953 में फूको ने पढ़ा, तबसे ही वे ईसाइयत और ‘पवित्रतावाद’ के विरुद्ध निरन्तर लिखते रहे।

 

उनका कहना था कि जब किसी के लिए ‘ईश्वर मर चुका हो, तब उसके लिए उस धर्म तथा उसके पवित्रतावाद द्वारा निर्धारित, नैतिक-प्रतिमानों की भला क्या प्रासंगिकता हो सकती है?’ उन्हें लगने लगा था कि मादक द्रव्यों के सेवन, समलैंगिक सम्बन्धों और आत्महत्या की कोशिशों को लेकर, कोई अपराधबोध अनुभव करने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने ‘ज्ञान की सत्ता’ को भी अतिक्राम्य माना और ‘पागलपन’ तथा ’समाज के द्वैधों’ पर मुखरता से लिखने और बोलने लगे।

उन्होंने अपनी पुस्तक में बन्दीगृहों को, मनुष्यता के विरुद्ध, सत्ता का आतताई विचार मान कर, उनको ख़त्म किये जाने की वकालत की। उन्होंने ‘सत्ता’ के गहरे दार्शनिक विमर्श पैदा किए और राजनीति जो कि आपातमस्तक स्वयं के नियंत्रण में रहने के साथ ही, वह सब को भी नियंत्रित करती है। बन्दीगृह और पागलख़ाने, सत्ता के उस विमर्श के उत्पाद हैं, जिसमें मनुष्य को मात्र प्रबन्धन के केंद्र में एक ‘वस्तु’ की तरह देखा जाता है, वह हरेक का ‘ऑब्जेक्टीफिकेशन’ अर्थात् ‘वस्तुकरण’ करती है। उसकी प्रपंचकारी भूमिका, दोनों स्तरों पर चलती है, अर्थात् प्रकट और अप्रकट। वह अपने विमर्शों की शृंखला में, ‘जैव-सत्ता’ के निकट पहुँच कर, मनुष्य को भी प्राणी जगत के एक जीव की तरह देखते हैं। वहाँ, ‘देह’ का भी वस्तुकरण हो जाता है। सत्ता द्वारा, ‘कामना’, ‘इच्छा’, और ‘मांग’ में वर्गीकृत होती मानव चेतना, अपने कर्ता का ऐसा विषयीकरण करती है कि वह समस्याग्रस्त हो जाता है। वे ‘ज्ञान’ और ‘सत्ता’ के समीकरण में, विषय (कर्ता) के विलोपन की ओर संकेत करते हैं। दरअस्ल, उनका सबसे सूक्ष्म बौद्धिक आकलन तो, उनकी मृत्यु के बाद आरम्भ हुआ।

अपनी मृत्यु के बाद तो मिशेल फूको पर, अकेले अमेरिका में ही लगभग, सौ बड़े चर्चित लेखकों और चिन्तकों की पुस्तकें प्रकाशन में आईं, और उनके विचारों को आधुनिकता के ‘संश्लिष्ट पाठ’ की तरह देखा गया। उनके विचारों में ‘व्यक्ति’ सत्ता की अमानविक कार्यवाहियों का अप्रकट शिकार होता है, और वह इस बात को जान ही नहीं पाता। इसलिए एक उदार जनतंत्र की संरचना ज़रूरी है। ‘द पैशन ऑफ़ मिशेल फूको’ शीर्षक से आई पुस्तक में, जेम्स मिलर ने यह प्रतिपादित करनी की चेष्टा की है कि किस तरह से वे अपने जीवन को ही, एक कला-चेष्टा में बदलने का यत्न करते रहे। वे व्यक्ति की निजता के निरन्तर होते चले जाने वाले ‘विलोपन’ को लेकर बहुत चिन्तित थे। हमें अपनी मूल्य-मीमांसा के साथ, जीवन में जीना और कार्य करना चाहिए। इसलिए, ताकि हम स्वयं के प्रति सच्चे और विश्वसनीय रहें। फूको ने, सामान्य से अतिक्रमित होते हुए, तमाम निषेधों को लाँघकर, नीत्शे के चिंतन के सत्य में, स्वयं की खोज की। मार्की दु साद के ‘पोर्नोग्राफिक’ रचनाओं को भी, उन्होंने गहरे सजग पाठक की तरह पढ़ा और उदार जनतान्त्रिक दृष्टि में जाकर, उनका विवेचन किया।

अपनी जीवन शैली की वजह से फूको को बहुत आसानी से ख़ारिज किया जा सकता था। ‘पापियों से मैत्री करो’ और उन लोगों के मिथ्या दम्भ को तोड़ो जो स्वयं को पुण्यवान् प्रतिपादित करते हैं। हमें सिर्फ, पवित्र गन्थ के प्रति विश्वसनीय रहना चाहिए क्योंकि वह पाप के लिए पश्चाताप प्रकट करने पर क्षमा कर देता है। सलीब पर चढ़ा दिये गए देवता के मूर्खतापूर्ण संदेश का कोई अर्थ नहीं रह गया है। इसलिए, व्यक्ति को बुद्धिमानी के साथ दुनियादार समझ भी चाहिए। सम्वेदना के वैयक्तिक धरातलों पर जिस तरह उन्होंने अपने तर्कों के स्थापत्य से, अपनी विचारधारा का भवन खड़ा किया, वह धर्माश्रित दृष्टि को लाक्षागृह की तरह लगा और उन्होंने युवाओं को निरन्तर उपदेश दिया कि उस भवन में प्रवेश घातक है, लेकिन पिछले दशकों में जिस तरह उनके विचारों का वर्चस्व बढ़ा, वह हत्प्रभ करता है। बेशक उन्होंने अपने विचारों और जीवन-शैली से, एक प्रति-संस्कृति को जन्म दिया।

अपने जीवन के आख़िर के वर्षों में, वे कई अप्रकट व्याधियों से जूझते हुए, थक से गए थे, लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी अभिव्यक्तियों को आत्मदया के दायरे से पूरी तरह बाहर ही रखा। हालाँकि उन्हें कभी-कभी अवैध इच्छाओं के काले नरक में भटकते हुए, ईश्वर की भूख लगती थी। इसलिए जब फूको को हम, उनकी समग्रता में आलचाल करते हैं तो लगता है कि वह कोई एक अभिशप्त व्यक्ति था, और जो नीत्शे के ईश्वर रहित संसार में घिर आए शून्य को भरने का बौद्धिक उपक्रम करते हुए चुपचाप मारा गया। वे हमेशा ‘कर्ता’ को हाशिये पर रख कर, ‘विषय’ के भीतर प्रवेश की माँग करते थे। अन्त में, मुझे यह याद आता है कि, मिशेल फूको, आत्महत्या की चेष्टा भी करते हैं और जीवन को जीने की ज़िद में मुब्तिला भी रहे।

एस असाध्य रोग की भयावहता से जूझने के बीच, मृत्यु के इस अधिवक्ता ने जीवन की दारुणता से मुक्ति की कामना, अर्थात् मृत्यु की इच्छा, किसी भी मित्र या व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत नहीं की। शायद, सब कुछ नष्ट होने के बीच भी, मनुष्य के भीतर वह आद्य जिजीविषा मरती नहीं है। मुझे एक लातिनी कवि की एक बात याद आती है- मनुष्य की आद्य-वृत्ति को जब-जब सामने के दरवाजे से बाहर फेंक दिया गया, वह पिछले दरवाजे से फिर प्रवेश कर गई है। मुझे लगता है कि एक अर्ध मृत और अर्ध जीवित कामना, मनुष्य के भीतर से सदा से ही उसे पुकारती रहती है।

 

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पुनर्वसु जोशी

डॉ. पुनर्वसु जोशी की प्रारम्भिक शिक्षा इंदौर में हुई। अपनी विद्यालयीन शिक्षा के पूर्ण होने के पश्चात उन्होंने सन् 2001 में, एरिज़ोना, यू.एस.ए. की एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी (ASU) में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के बी.एस.ई. की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया और वहाँ से सन 2005 में डिग्री हासिल की। बी.एस.ई. करने के दौरान, अपनी पढ़ाई के दूसरे वर्ष में वे, सेंटर फॉर सॉलिड स्टेट इलेक्ट्रोनिक रिसर्च के निदेशक और क्वान्टम इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रोफेसर, डॉ. ट्रेवर थोर्ण्टन, जिन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय, ब्रिटेन से भौतिकी में पीएच-डी की और उसके पश्चात अमेरिका की बेल लैब्स में शोध किया, के संपर्क में आए और उनके लिए अंडरग्रेजुएट शोधार्थी के रूप में काम करने लगे। सन 2005 में अपनी बी.एस.ई. डिग्री के अंतिम सेमेस्टर में, डॉ. थोर्ण्टन के आग्रह, अनुशंसा और रिसर्च सेंटर द्वारा प्रदत्त छात्रवृति की सहायता से, पुनर्वसु को सीधे पीएच-डी में दाखिला दिया गया। डॉ. थोर्ण्टन, उस समय, नैनो-टेक्नोलोजी के डी.एन.ए. सीक्वेंसिंग के क्षेत्र के अंतर्गत शोध कर रहे थे, और उन्होंने पुनर्वसु को भी उसी विषय पर शोध करने के लिए प्रोत्साहित किया। अपने शोध के दौरान पुनर्वसु ने कई अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में शोध-पत्र प्रकाशित किए। पुनर्वसु जोशी को सन 2011 में पीएच-डी प्रदान की गई।

पुनर्वसु अपनी पीएच-डी की पढ़ाई के दौरान, सन् 2007 में, ASU के, सेंटर फॉर नैनो-टेक्नालजी इन सोसायटी द्वारा आयोजित, एक पंद्रह दिवसीय यात्रा के लिए विश्वविद्यालय से चुने गए, जो कि विज्ञान और इंजीनियरिंग के चुनिन्दा छात्रों को अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी.सी. ले जाती है, और सत्ता और विज्ञान, विज्ञान का इतिहास, राजनीति और विज्ञान, कानून और विज्ञान, जैसे विज्ञान और दर्शन से जुड़े कई मुद्दों पर न केवल विचार-विमर्श में भाग लेने का अवसर उपलब्ध कराती है, बल्कि, इन विषयों से जुड़े संस्थानों जैसे, नेशनल साइंस फाउंडेशन, नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ़ हेल्थ, केपिटल हिल, वाईट हाउस के अंतर्गत आनेवाला ऑफ़िस ऑफ़ साइंस एण्ड टेक्नालजी पॉलिसी आदि का दौरा भी करवाती है। सन 2010 में, पुनर्वसु ने इसी तरह की दूसरे प्रवास में आयोजक की तरह भागीदारी की।

सन् 2008 की यात्रा के पश्चात, पुनर्वसु ने सेंटर फॉर नैनो-टेक्नालजी इन सोसायटी के विमर्शों में भाग लेना प्रारम्भ किया। सन् 2008 में उन्होंने विश्वविद्यालय की ओर से, अमेरिका की नेशनल अकेडमी ऑफ़ साइंस में आयोजित, विज्ञान और राजनीति से संबन्धित एक आठ दिवसीय वर्कशॉप में भाग लिया। इसके अतिरिक्त, सामाजिक विज्ञानों, कला, और साहित्यिक विषयों में अपनी गहरी आसक्ति के चलते, पुनर्वसु को अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों जैसे हार्वर्ड, स्टेनफोर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिलवेनिया, हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल आदि, में लोगों से मिलने और मैत्री का अवसर भी मिला। इसके अतिरिक्त अमेरिका के कई कला दीर्घाओं और संग्रहालयों जैसे, न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम, गुग्गनहाईम म्यूज़ियम, विटनी म्यूज़ियम, म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, वाशिंगटन डी.सी. की नेशनल गैलारी ऑफ़ आर्ट, सिएटल आर्ट म्यूज़ियम आदि देखने का अवसर भी मिला। अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात, पुनर्वसु ने तीन वर्षों तक नैनोटेक्नोलोजी संबन्धित एक कंपनी में भी काम किया। सन 2014 में पुनर्वसु पुनः भारत लौट आए।

पता : द्वारा प्रभु जोशी, 303, गुलमोहर निकेतन,

प्लॉट-सी, ड.प् बसंत विहार, शांति निकेतन के पास,

इन्दौर-462010

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