शनिवार, 14 जनवरी 2017

प्राची - दिसंबर 2016 - कहानी / दर्द / अर्चना चतुर्वेदी

कहानी

दर्द

अर्चना चतुर्वेदी

ब से आंटी के घर से वापिस आई थी, किसी काम में मन नहीं लग रहा था. दिल उदास हो गया था. हमेशा खिली-खिली सी मुस्कुराती हुई आंटी की आंखों में छिपे दर्द और उदासी की हकीकत जानने के बाद मेरा दिल मानो फूट-फूटकर रोने को कर रहा था.

हम लोग इस कॉलोनी में नए-नए आये थे. आंटी हमारे पड़ोस वाले घर में ही थी, सो उनसे बातचीत का सिलसिला पहले दिन से ही शुरू हो गया था. धीरे-धीरे हम एक दूसरे के बारे में जानने लगे थे. आंटी कश्मीरी पंडित थीं और अंकल की तस्वीर देख कर अंदाजा लग चुका था कि वे अब इस दुनिया में नहीं थे. क्या हुआ? कैसे हुआ? जैसे प्रश्न कर उनके घाव कुरेदना मैंने उचित नहीं समझा. आंटी की एक बेटी और एक बेटा था, जिनकी शादी वे कर चुकी थी. बेटी-दूसरे शहर में रहती थी और बेटा-बहू दोनों नौकरी पर जाते थे, सो दिन भर अकेली होती थीु और पतिदेव को ऑफिस और बच्चों को स्कूल भेजकर घर के काम निबटा कर मैं भी फ्री होकर बालकनी में आंटी से गप्पेु लगाने बैठ जाती. आंटी भले ही मुझसे उम्र में बड़ी थीं पर हम दोनों मित्र जैसी हो गयीं. अपनी हर बात एक-दूसरे से कर लेते. मैं अक्सर महसूस करती थी कि आंटी बातें करते करते अक्सर उदास हो जाती थीं, किसी प्रौढ़ जोड़े को देखकर उनकी आंखों में आंसू छलछला उठते थे. मेरे मन में बहुत से प्रश्न ऐसे थे, जो मैं उनसे पूछना चाहती थी- जैसे अंकल को क्या हुआ था? या उन्होंने कश्मीर कब और क्यों छोड़ा? पर मैं चाहकर भी कुछ पूछ नहीं पाती थी. मैं ऐसा कोई भी प्रश्न करने से डरती थी जो उनके दिल को दुखाये, क्योंकि मैं इतना तो जान ही चुकी थी कि अंकल के जाने को वे आज भी नहीं भुला पाईं थीं.

ऐसे ही एक दिन आंटी मेरे घर आईं. मैं टीवी पर कोई कार्यक्रम देख रही थी, जिसमें कश्मीर की वादियां और वहां की खूब-सूरती दिखाई जा रही थी. आंटी भी गुमसुम हो देखने लगीं. मैंने अचानक चहक कर पूछ लिया- ‘‘आंटी आपका घर भी तो कश्मीर में ही था, बहुत याद आता होगा ना!’’ पूछते ही मुझे अहसास हुआ कि मैंने गलत किया है. मुझे नहीं पूछना चाहिए था पर अब क्या किया जा सकता था...मैंने सॉरी भी कहा.

पर आंटी तो मानो इस दुनिया से कहीं दूर जा चुकी थीं, अपने अतीत की दुनिया में. धीरे से बोलीं- ‘‘स्वर्ग में था और मेरा घर भी स्वर्ग ही था, पर सब खत्म हो गया. इस कश्मीर ने ही सब कुछ छीन लिया हमारा सबकुछ. हम लोगों का बसा-बसाया घर एक रात में उजाड़ दिया गया. हम अपने ही देश में शरणार्थी बन गए. महलों जैसे घर में रहने वाले टेंटों में बस गए या एक-एक कमरे में सिमट कर रह गए.’’

‘‘आंटी कौन-कौन थे आपके परिवार में?’’

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‘‘बहुत प्यारा परिवार था. मेरे सास-ससुर, दो देवर, एक ननद और घर के बड़े बेटे की जिम्मेदारी निभाते पति और हमारे दो बच्चे. घर का माहौल बहुत ही खुशनुमा था. वैसे भी हम कश्मीरियों में दहेज और सास बहु वाले झगड़े नहीं होते. मेरा मायका भी पास ही था, सो मां-बाप और भाई बहनों से भी जब मर्जी मिल लेती थी. देवर-ननद पढ़ रहे थे और हम दोनों पति-पत्नी नौकरी करते थे. ससुरजी की घर के बाहर ही दुकान थी. मैं जल्दी उठकर सुबह के सारे काम निपटा कर खाना बना कर ऑफिस जाती, घर के बाकी सब काम सासु मां और ननद संभालती. दोनों बच्चों को भी वही रखती. शाम को आकर कपड़े बदलकर मैं दुबारा रसोई में जुट जाती, पर उस प्यार भरे माहौल में थकान छूती भी ना थी. पति का स्वभाव तो सबसे अच्छा था. सब कुछ बहुत अच्छे से चल रहा था अचानक कश्मीर के हालत खराब होने लगे. कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए कहा जाने लगा. 1990 में स्थितियां बद से बदतर होने लगीं. हमारी सरकारों के पास कोई विकल्प नहीं बचा या वो कुछ करना नहीं चाहते थे पता नहीं. आतंकवादी रोज लोगों को मार रहे थे. बहु-बेटियों की इज्जत लूट रहे थे. हमें रातों-रात कश्मीर छोड़कर भागने का हुक्म मिला. मेरी सास अपना घर छोड़कर कहीं जाने को तैयार नहीं थीं. बहुत मुश्किल से उन्हें मनाया जान बचना जरूरी था. बस हम लोग जो जरूरी सामान और पैसे वगैरह थे वही ले पाए. ज्यादा वजन कैसे उठाते और इतने सालों की बसी-बसाई गृहस्थी क्या एक बैग या अटैची में समेटी जा सकती थी?’’

कहकर आंटी रोने लगीं. उनकी बात सुनकर मेरी मानो रूह कांपने लगी थी. मैंने आंटी को पानी दिया. उन्हें चुप कराया और कहा- ‘‘रहने दीजिये आंटी और नहीं सुनना, प्लीज!’’

पर आंटी बोलने लगीं, ‘‘सुनो ना! मेरे मेरे सीने में वर्षों से दबा है सब. शायद कुछ बोझ ही कम हो जाए तुमसे कहकर.’’

मैं चुप-बैठकर सुनने लगी.

आंटी फिर बोलने लगीं, ‘‘उस रात हमें निकाल कर जम्मू पहुंचाया गया. वहां बहुत बुरे हालात थे. टेंट लगे हुए थे जिनमें कोई व्यवस्था नहीं थी. बहुत कम लोग ऐसे थे, जिनके रिश्तेदार अन्य शहरों में थे, क्योंकि कश्मीरी तो उस स्वर्ग में रहते थे और वही आपस में रिश्ते करते थे. जिन लोगों के रिश्तेदार बाहर थे, वे उनके पास चले गए. जो सक्षम थे उन्होंने किराये के घर खोजने शुरू किये. हमें भी बड़ी मुश्किल से दो कमरे किराये के मिले, जिसके एक कमरे में मेरे ससुराल के नौ लोग रहे और दूसरे में मां बाप और बहन भाई. हम लोगों को उम्मीद थी कि सरकार कुछ करेगी. कश्मीर तो हमारे देश में ही है. हो सकता है, हालात सुधरने पर हम अपने घर वापिस जा सकें. खैर हम जम्मू में ही अपनी थोड़ी बहुत जरूरत का सामान लेकर रहने लगे. हमारे दफ्तर बंद थे. पैसे भी खत्म होने को थे. कोई हमें कुछ भी जवाब नहीं दे रहा था. सरकार से कोई मदद नहीं मिल रही थी अपने देश में ही शरणार्थी बन गए थे.

‘‘एक दिन मेरे पति ने अपने माता-पिता को बोला, ‘सोच रहा हूं एक बार घर देख आऊं, अब तो वहां सेना भी आ गयी है.’ सबने लाख समझाया पर उन्होंने एक ना सुनी और कश्मीर चले गए. वहां से दो दिन में ही लौट आये, पर जिस हालत में लौटे वो बयां नहीं हो सकती. उनकी उम्मीद टूटी थी. दो दिन तक तो बोलने की हालत में नहीं थे. कुछ खा-पी नहीं रहे थे, जैसे गहरा सदमा लगा हो. आंखें फटी सी रहतीं. बस हम लुट गए, बर्बाद हो गए, इतना ही कहते.

फिर एक-दिन टूटे फूटे वाक्यों में बताया कि घर पर आतंकवादियों का कब्जा हो चुका है. जो लोग अपने घर छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए, उनको जिन्दा जला दिया गया, उनकी बहू बेटियों को उनके सामने बेइज्जत किया जा रहा है. कहीं वे मार रहे हैं तो कहीं अपनी इज्जत बचाने को औरतें आत्महत्या कर रही हैं. उन सब हालातों को देखकर सदमे में थे और कुछ ही दिनों में ऐसे ही रोते कलपते हम सबको छोड़ कर चले गए.

छः महीनों के अन्दर ये दूसरा आघात था, जो हम सबको तोड़ गया. हम पूरी तरह लुटे-पिटे थे. अब सबकी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर थी. बच्चे भी छोटे थे. सास अपना मानसिक संतुलन खो बैठी थीं तो मेरी मां अपने बोलने और सुनने की शक्ति. इस सदमे ने सबको तोड़ डाला. मेरा दुःख सुनने और समझने वाला भी ना बचा. सरकारी नौकरी थी सो पोस्टिंग दूसरे शहर में मिल गयी और हम सब सरकारी क्वार्टर में शिफ्ट हो गए. पति के दफ्तर से भी रुपये मिले, जिनसे ननद की शादी की और धीरे-धीरे गृहस्थी की गाड़ी खींचने लगी. कुछ समय बाद मंझले देवर की भी नौकरी लग गयी और वह अपना घर बसाकर रहने लगा. छोटे देवर और मां को साथ ले गया. साथ में रह गए ससुर और बच्चे. ससुरजी ने साफ इनकार कर दिया था, मुझे यूं अकेले छोड़कर जाने के लिए. दोनों बच्चे स्कूल जाते. मुझे तसल्ली थी कि कम से कम मेरी बढ़ती बच्ची की देखभाल के लिए उसके दादा जी तो हैं, पर शायद भगवान को कुछ और ही मंजूर था. एक दिन बच्चों और ससुर जी के साथ मंदिर जा रही थी होली पूजन के लिए, अचानक सड़क पर ही ससुरजी को अटैक आया और खत्म हो गए. मैं तो समझ भी नहीं पायी. फौरन लोगों की मदद से अस्पताल लेकर भागी, पर सब खत्म.’’

आंटी फिर रोने लगी थीं. ये सब सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे. मेरी आंखें भी बरसने लगी थीं. पर मानो आंटी अपना हर दर्द आज मुझसे साझा करना चाहती थीं, फिर से बताने लगी, ‘‘मैं एक बार फिर बेसहारा थी. कोई नहीं था मेरे पास. मेरे बच्चों के पास. रिश्तेदार सब अपनी अपनी लड़ाइयां लड़ रहे थे. सभी तो बेघर हुए थे. मुझे दोनों बच्चों के भविष्य की चिंता खा रही थी. नौकरी करना मेरी मजबूरी थी और बच्चों को अकेले छोड़ना भी. मैं काम दफ्तर में करती पर दिल घर में ही रहता. पर इन सब परिस्थितियों का ये असर हुआ कि मेरी 13 साल की बेटी अचानक बहुत बड़ी और समझदार हो गयी थी. वो मुझे घर को और भाई को सबको संभालने लगी. भगवान ने हमेशा मेरा इतना साथ जरूर दिया कि मुझे पड़ोसी हमेशा अच्छे दिए, जो हमारा साथ देते, बच्चों का ख्याल रखते. बस इसलिए मेरे दोनों बच्चे अच्छे से पढ़ लिख गए और अच्छी नौकरियों पर लग गए वरना सारा दिन अकेले रहने वाले बच्चे जाने किस दिशा में भटक जाते.

‘‘हां आंटी, भगवान पहले ही बहुत दुःख दे चुके थे. कुछ तो अच्छा करते आपके लिए!’’ मैंने उदास होकर कहा. फिर मैंने पूछा, ‘‘आंटी आपकी उम्र अभी रिटायमर्ेंट की तो नहीं लगती, फिर नौकरी छोड़ दी क्या?’’

‘‘नहीं रे! ये तेरा भाई है ना. इसकी नौकरी लगते ही जिद पर अड़ गया. कहने लगा, ‘अब आपको क्या जरूरत है नौकरी करने की. अब आराम करो.’

‘‘बस बहन की भी शादी हो गयी, सो इसके साथ यहां दिल्ली ही आ गयी और घर खरीद लिया. अब तो बस ये लोग खुश रहें. अब सब कुछ बन गया है, पर एक टीस सी उठती है मन में. मैं और तुम्हारे अंकल हमेशा सपना देखते थे बच्चों के बड़े होने का. पोते पोती संग खेलने का, एक-दूसरे के साथ रिटायमर्ेंट एन्जॉय करने का. पर मेरे सारे सपने चकनाचूर हो गए. थक गयी हूं इतने साल से ये मशीनी सा जीवन जी कर. आज मेरा अकेलापन बांटने को मेरा जीवन-साथी नहीं है. इस गन्दी राजनीति और गलत नीतियों ने हमारे जैसे कितने परिवारों की खुशियां छीन ली हैं. मेरा बेटा आज भी भगवान तक को नहीं मानता.

‘‘सरकार ने आज तक हमारे लिए कुछ नहीं किया, ना कोई मुआवजा ना ही जमीन. कुछ नहीं मिला. मिला तो सिर्फ तमगा ‘‘कश्मीरी विस्थापित’’ का.’’

आंटी फूट-फूट कर रोने लगी थीं और मेरे आंसू भी अविरल बहने लगे. कितना दर्द कितनी तकलीफ सही उन्होंने. लेकिन ये सिर्फ उनका दर्द नहीं. हर उस परिवार का दर्द था, जिसे अपना बसा-बसाया घर छोड़ना पड़ा. अपने ही देश में परायों सा व्यवहार सहना पड़ा. पर इस देश की गन्दी राजनीति की वजह से ना तो कश्मीर के हालत सुधरे हैं ना कभी सुधरने की उम्मीद है.

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