शनिवार, 14 जनवरी 2017

प्राची - दिसंबर 2016 - कहानी - जल प्रलय / डॉ. तनूजा चौधरी

कहानी

जल प्रलय

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डॉ. तनूजा चौधरी

परिचय : प्राध्यापक

प्रकाशन : 8 पुस्तकें प्रकाशित,

आकाशवाणी के लिए लेखन

कई सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त.

संपर्कः 2ए.पी. कॉलोनी, पचमेढ़ी, जबलपुर

मो. 09425387990

काश्मीर धरती का स्वर्ग है पर स्वर्ग का आभास कराने वाले इसी काश्मीर में आये पानी के सैलाब ने सबको आतंकित कर दिया था. सुंदर बाग-बगीचे, झीलों पर तैरती नावें, और मनोहारी प्राकृतिक दृश्य विलीन होने लगे थे. चारों तरफ जान बचाने की दौड़भाग मच गयी थी. छुट्टी मनाने आये पर्यटकों में भी हड़बड़ी थी. किसी का सामान बह गया था तो किसी के घर का सदस्य नहीं मिल रहा था. खुशी रुदन में बदल गयी थी. प्रलय सा पानी सब तरफ से बढ़ता जा रहा था. रहवासियों के घर डूब रहे थे.

इस जलप्रलय में फंसा एक परिवार नफीसा का भी है. बेवा नफीसा अपने बूढ़े ससुर और दो बच्चों के साथ मजदूरी करके परिवार को पाल रही है. नफीसा ने अब्बा को चाय का कटोरा पकड़ाते हुये कहा- ‘‘अब्बा चाय पी लीजिये. मैं बाहर जा कर कुछ खाने का इंतजाम करती हूं. बच्चे रात से भूखे हैं.’’

‘‘पानी का क्या आलम है?’’

‘‘वो तो बढ़ता जा रहा है. किसी की नाव के जरिये जाकर कुछ तलाश करूंगी.’’

‘‘या अल्लाह रहम कर!’’ बूढ़े ने कहा- ‘‘मैं लाचार घर के लिए कुछ नहीं कर पाता हूं.’’

‘‘फिकर न कीजिये अब्बा, कुछ न कुछ रास्ता निकल आयेगा.’’

सैलाब ने सारा काम-काज ठप्प कर दिया था. एक समय नफीसा का शौहर हैदर जंगल में रोजनदारी से मजदूरी करता था और नफीसा सेब के बगीचे में रखवाली का काम करती थी. अब्बा की आंखों में रोशनी न के बराबर थी पर नफीसा के बच्चों को संभाल लेते थे. आमदनी ठीक-ठाक थी, इसलिए घर की गाड़ी आराम से चल रही थी.

काश्मीर के हालात बदल गये थे, इसलिए पर्यटकों का आना-जाना बढ़ रहा था. कामगारों को अधिक काम मिलने लगा था. नफीसा भी एक हाउसबोट में रात में खाना बनाने का काम पा गयी थी. पैसे ज्यादा आने लगे तो जीवन पहले से अधिक अच्छा और परिवार खुशहाल हो गया था. नफीसा के बच्चे स्कूल जाने लगे. फटे कपड़ों की जगह साबुत फिरन ने ले ली थी. रात को जब सब एक साथ दस्तरखान (खाना खाने) पर बैठते तो अब्बा अल्लाह का सौ बार शुक्रिया अदा करते और बच्चों के लिए दुआयें पढ़ते.

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पर नफीसा के परिवार के अच्छे दिनों को किसी की नजर लग गयी. वो दिन कहर का दिन बनकर सामने आया जब यह खबर मिली की जंगल में हैदर को गोली लग गयी है. खबर मिलते ही बदहवास नफीसा भागती हुयी वहां पहुंची पर तब तक हैदर का इंतकाल हो चुका था. साथ के मजदूर कुछ बता नहीं पा रहे थे कि गोली कहां से आयी और कैसे लगी. पर एक ने उड़ती-उड़ती खबर नफीसा के कान में डाली कि शायद सेना के जवान की गलती से चली गोली का शिकार हैदर बन गया है. हालांकि कोई प्रमाण नहीं था पर नफीसा का दुःखी बेवा मन इसी को सच मान बैठा, क्योंकि सेना की एक टुकड़ी पास में ही अभ्यास कर रही थी.

सीने पर दुहत्थड़ मारती नफीसा सेना को कोस रही थी. उनके बच्चों को बद्दुआयें दे रही थी. सेना के एक अफसर को पता चला तो उन्होंने आकर नफीसा को समझाया कि वो लोग केवल कवायद कर रहे थे. पर नफीसा नहीं मानी. समय के साथ नफीसा का रोना तो कम हो गया पर सेना को वो अपना दुश्मन समझने लगी थी.

हैदर के जाने से घर के हालात बिगड़ने लगे. उसके साथ काम करने वाले अब्बा के पास आते और तरह-तरह की सलाह देते. उनमें से एक उस्मान भी था. वो जब भी आता अब्बा के हाथ में कुछ रुपये रख जाता. अब्बा के एतराज करने पर कहता ‘‘चचा हैदर मेरे भाई जैसा था. ज्यादा तो नहीं पर थोड़ी मदद तो कर ही सकता हूं.’’

धीरे-धीरे उस्मान का परिवार में आना-जाना बढ़ गया. नफीसा हरदम सोचती कि मजदूरी करने वाला उस्मान कैसे इतने पैसा बचा पाता है कि उसके अब्बा को दे सके. एक दिन इस राज का खुलासा हुआ. उस्मान ने कहा- ‘‘भाभी जान पैसा कमाने का एक दूसरा रास्ता आपको बताऊं.’’

‘‘बताइये?’’ नफीसा तो जानना ही चाहती थी. ‘‘ये सेना हम मुसलमानों की दुश्मन है. यह हमें पाकिस्तान से मिलने नहीं दे रही है. हम अपना अलग मुल्क नहीं बना पा रहे हैं. काश्मीरियों पर जुल्म हो रहा है. आप जंगल में जाती हैं तो सेना की टुकड़ी कहां है और जवान क्या कर रहे हैं. उसे देखकर मुझे बता दिया कीजिए. मैं उन्हें बताऊंगा जो मुसलमानों का हक दिलाने के लिए लड़ रहे हैं. उन्हें सेना वाले आतंकवादी मानते हैं पर वो हम मुसलमानों के भाई हैं. अगर आप खबर देंगी तो उसके एवज में वो आपको हजारों रुपये देंगे और फिर हमारे हैदर को भी तो उन्होंने ही गोली मारी थी. यह सवाब का काम है मजहब का काम है...’’ और इसी तरह की न जाने कितनी बातें उस्मान ने नफीसा के मन में भर दी.

अब नफीसा जंगल में कभी शौच के बहाने तो कभी जड़ीबूटी लाने के बहाने भटकती रहती और सेना के ठिकानों की खबर देती. जिससे उस्मान उसे चुपचाप नोटों के बंडल दे जाता. एक दिन अब्बा को शक हो गया और नफीसा को सबकुछ बताना पड़ा. वो गुस्से से भर गये. उन्होंने नफीसा को यह काम न करने की सख्त ताकीद की. कहा- ‘‘बेटी जो देश से गद्दारी करता है वो दोजख की आग में जलता है. मैं अपाहिज बूढ़ा कुछ नहीं कर सकता पर भूखे मर सकता हूं. खबरदार अब न तो इस घर में उस्मान आयेगा और न वो पैसा.’’

तभी यह पानी के सैलाब का कहर आ गया. इलाके के घर डूब रहे थे. घर में खाने का सामान खत्म होने लगा. निचले घरों के सामान तैरकर बाहर बहने लगे. वर्षों से जोड़ी गृहस्थी तबाह हो रही थी. जिंदगी बचाने के लिए लोग घरों के ऊपर चढ़ रहे थे. पानी बढ़ता जा रहा था. अब्बा नफीसा और बच्चों को समझाते- ‘‘यह आजमाइश का दौर है. यह भी गुजर जायेगा. पर कभी भी अल्लाह के हुक्म के खिलाफ नहीं जाना चाहिए.’’ अब्बा नसीहतों से उनका हौसला बढ़ाते थे.

छत पर कई दिन बिताने पड़े. सेना के जवान नावों से आकर खाना और पानी बांटते थे. पर वह पूरा नहीं पड़ता था. नफीसा को लगता था कि अब इस पानी में ही दफ्न होना पड़ेगा. लोगों का सामान बह रहा था, कमजोर घर ढह रहे थे. चारों तरफ पानी में डूबने और सड़ने का माहौल था. कई नीचे घरों को पानी निगल चुका था. नफीसा अपने परिवार के साथ छत पर बैठी हुयी दुआ पढ़ती रहती थी. बूढ़े अशक्त अब्बा को कहीं और ले जाना उसके बस में नहीं था.

दो दिन पहले मंत्री जी का हेलीकॉप्टर उन्हें मुआयना कराने लाया था. भूखे प्यासे लोग जीवन की आशा छोड़ रहे थे. सेना के जवान खाने के पैकेट, डबलरोटी और पीने का पानी बांटते थे पर ऐसे मौकों पर लूट मच जाती थी. कमजोर लोग हरदम छूट जाते थे. निराशा के इस दौर में सैनिकों ने नाव से आकर लोगों को घरों से सुरक्षित कैम्पों में पहुंचाने का काम शुरू किया. नफीसा दो मंजिलें पर परिवार के साथ बैठी थी क्योंकि यहां निचली मंजिल पानी से भर चुकी थी. ऐसे घरों के लिए सेना ने हेलीकॉप्टर से ‘रेस्क्यू ऑपरेशन’ शुरू किया था. पहले बुजुर्गों, बच्चों फिर औरतों को निकाला. बूढ़े अब्बा भूख से और कमजोर हो गये थे. सेना के जवानों ने बड़े एहतियात से उन्हें उठाकर रस्सी के जरिये ऊपर हेलीकॉप्टर से खींचा फिर नफीसा और बच्चों को. उन्हें सुरक्षित कैम्पों में छोड़ा गया. अब्बा को दवा और ग्लूकोज मिला तो बेजान शरीर में हरकत हुयी. बच्चे खाने पर टूट पड़े.

नफीसा का दिल सेना के प्रति किये अपने कामों के लिए शर्मिंदगी से भर गया. उसकी गलतफहमी के कारण देश के दुश्मन आतंकवादियों ने न जाने कितने भारतीय सैनिकों और उनके ठिकानों को अपना निशाना बनाया था. आज उसी सेना के जवानों ने फरिश्ता बन कर उसके परिवार को मौत के मुंह से निकला है. उसकी आंखों से ग्लानि के आंसू बह निकले. वो रो-रोकर अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगने लगी. ‘ऐ मेरे मालिक मैं तौबा करती हूं. मुझे गुनहगार को बख्श देना. मैंने जो किया वो मेरी नादानी थी. मेरे परिवार पर रहम करना...’’

उसे पहली बार लगा कि सेना हम सबकी दोस्त है और हमारी रक्षा के लिए है. इसलिए उसके काम में बाधा न डालना भी देशभक्त है.

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