मंगलवार, 31 जनवरी 2017

रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 - मिशेल फूको विशेषांक : फूको की स्वतंत्रता की अवधारणा / टॉड मे

टॉड मे

फूको की स्वतंत्रता की अवधारणा

(अनुवाद - पुनर्वसु जोशी)

‘स्वतंत्रता’ शब्द रूसो के ‘सामाजिक अनुबंध’ के बाद से, विचारों की दुनिया का सर्वाधिक प्रीतिकर शब्द है जिससे मनुष्य का ‘होना’ परिभाषित होता है। क्योंकि, इसकी मांग और इसकी उपस्थिति-अनुपस्थिति को लेकर ही, सारा सभ्यता-विमर्श खड़ा होता है। हालाँकि, सभ्यता के केंद्र में कई और घटक और कारक भी हैं, लेकिन वे अंततः ‘स्वतंत्रता’ के निकट पहुँच कर, अपनी अर्थवत्ता प्राप्त करते हैं।वैसे, स्वतंत्रता को वर्गीकरण की भूल-भुलैया में ले जाकर, उसकी किस्में भी तय की गईं और इसके चलते, राजनीतिक स्वतंत्रता, नैतिक स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता आदि आदि। इसमें ‘इच्छा’ और ‘कामना’ के द्वैत को भी परिभाषित करते हुए, ‘मेटाफिजिकल प्रॉब्लम ऑफ़ फ्री विल’ को भी विमर्शों की परिधि में रखा गया।लेकिन, मार्क्सवाद के विचारधारात्मक वर्चस्व के बीच, ‘स्वतंत्रता’ को लेकर जितनी तीखी बहसें हुईं, उनसे अर्थ की पर्त-दर-पर्त खुली और स्वतंत्रता को ‘विचारधारा और सांस्थानिकता’ की रौशनी में विवेचित किया गया। इसमें ‘व्यक्ति-स्वातंत्र्य’ सबसे पहले निशाने पर आया। उसे पूंजीवादी अवघारणा मान कर, बहुत आक्रामक विचार आए और इसके परिणामस्वरूप, सामूहिकता के पक्ष और हित में नृशंसता ने जन्म लिया। बीसवीं शताब्दी में तो आइन्स्टाइन की ‘सापेक्षिकता के सिद्धान्त’ ने सब अर्थ उलट डाले। बहरहाल, उत्तर-आधुनिकता के विमर्शों में फिर हमें स्वतंत्रता की परिभाषाएँ तय करते हुए वैचारिक मुठभेड़ें दिखाई देती हैं। फूको ने हालाँकि प्रकट रूप से इस विषय पर कुछ नहीं लिखा है, लेकिन ये प्रश्न उनके चिंतन में परोक्ष रूप से रहे हैं। प्रस्तुत है, फूको के एक चर्चित अध्येता द्वारा की गई फूको की ‘स्वतंत्रता’ संबंधी अवधारणा की एक संक्षिप्त मीमांसा। -अनुवादक

रचना समय

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अगर हम दर्शन में, एक सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में,‘स्वतंत्रता’ की अवधारणा को देखें तो वह भ्रांतिजनक है। यह अवधारणा, दर्शन की समस्याओं में से, कम से कम दो, बहुत भिन्न समूहों के केंद्र में स्थित है। पहला सवाल तो मनुष्य की आध्यात्मिक स्थिति का सवाल है और दूसरे, उसके राजनीतिक स्थिति का प्रश्न है। इन मुद्दों को और अधिक जटिल बनाने के लिए, ‘स्वतंत्रता’ पर मिशेल फूको के नजरिए को खंगालें तो वह दोनों ही समूहों से पूरी तरह बाहर हैं। फूको के विचार, हालांकि, उन दोनों समूहों के साथ मुठभेड़ करके, उन्हें अतिरिक्त जटिल भी बना देते हैं। मेरा प्रस्ताव यह है कि फूको के ‘स्वतंत्रता’ के प्रति दृष्टिकोण को, सिलसिलेवार, तीन चरणों में समझा जाए तो कहीं ज्यादा उचित होगा। पहले मैं, ‘स्वतंत्रता’ की उन दो अवधारणाओं को विवेचित करना चाहूँगा जो कि ‘पारंपरिक दर्शन’ में प्रचलित हैं। फिर मैं फूको की ‘स्वतंत्रता’ की अवधारणा पर चर्चा करूँगा, यह दर्शाते हुए कि वे किस तरह, ‘पारंपरिक दर्शन’ की अवधारणाओं के बरअक्स ठहरती हैं। और अंत में, मैं इन सबको समेटते हुए, फूको के विचारों की तुलना एक और दार्शनिक मौरीस मर्लो-पॉन्टी के विचारों के साथ करना चाहूँगा।

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हम स्वतंत्रता की उन दो परंपरागत अवधारणाओं को, ‘आध्यात्मिक’ और ‘राजनीतिक’ कह सकते हैं। ‘आध्यात्मिक‘ शब्द अपने आप में कुछ गूढ़ है, अतः विमर्श में आगे बढ़ने से पहले, यही बेहतर होगा कि हम पहले से ही, यह बात ठीक से स्पष्ट कर लें कि हम इस ‘शब्द’ का क्या अभिप्राय लेते हैं। ‘आध्यात्मिकता‘, मूलतः प्रकृति के मूलभूत यथार्थ से संबद्ध है। मसलन, ‘यह क्या है?’ या ‘अस्तित्व के मूलभूत सिद्धान्त क्या हैं?’ जैसे प्रश्नों को उठाती है। इस अभिप्राय में हम, इसे ‘ऑण्टोलॉजी’ भी कह सकते हैं। मस्तिष्क और देह का अंतर-संबंध, तत्त्वमीमांसा का एक केन्द्रीय पहलू है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि, यथार्थ, अगर सिर्फ दो चीजों से बना है--पहली मानसिक वस्तुएँ (चेतना) और दूसरी भौतिक वस्तुएँ (देह) तो फिर इनके अंतरसंबंध का प्रश्न, एक केन्द्रीय प्रश्न बन जाता है, और ऐसा है भी, आज से नहीं, देकार्त के समय से। नतीजतन, मस्तिष्क और देह के अंतरसंबंध से जुड़े हुए, बहुतेरे सवालों के बीच, यह सवाल भी खड़ा होता है कि ‘क्या मस्तिष्क, देह का संचालन कर सकता है या नहीं?’ यह प्रश्न अपने दूसरे स्वरूप में ‘स्वतंत्र इच्छा’ (फ्री-विल) के प्रश्न में बदल जाता है जिसके बारे में हम आगे बात करेंगे।

‘आध्यात्मिकता’ का गूढ़ चरित्र, बीसवीं शताब्दी के दौरान, मार्टिन हाइडेगर के विचारों के प्रभाव में उभरा। हाइडेगर के लिए सम्पूर्ण पाश्चात्य दर्शन ही, ‘आध्यात्मिकता’ का पर्याय है। हाइडेगर के लिए, चिंतन के केंद्र में ‘परम-प्रश्न’, अस्तित्व का प्रश्न है। हाइडेगर के नजरिये में, समस्या यह है कि पाश्चात्य दर्शन में, आद्योपान्त अस्तित्व की व्याख्या, व्यक्ति के होने से की गयी है। अतः, जब हम यथार्थ के स्वरूप के बारे में प्रश्न करते हैं, और जब हम यह पूछते हैं ‘क्या है?’, तब, हम दरअस्ल यह पूछ रहे होते हैं कि ‘कितने तरह के व्यक्ति हैं?’ यह दृष्टिकोण अस्तित्व के प्रश्न की अवहेलना करता है। इसलिए हाइडेगर, जब ‘आध्यात्मिकता’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो वे दर्शन के उस दृष्टिकोण की बात कर रहे होते हैं जो दर्शन के परम प्रश्न, अस्तित्व के प्रश्न को भूल कर व्यक्ति के प्रश्नों की बात करता है।

यह हम सब जानते हैं कि हाइडेगर का ‘आध्यात्मिकता’ शब्द का इस्तेमाल काफी प्रभावशाली रहा है, खासकर हाल ही में फ्रेंच दार्शनिक जैक देरीदा और उनके अनुयायियों के बीच। हालांकि, इस निबंध के लिए, हम यह मुद्दा संप्रति यहीं छोड़ देते हैं। ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’  शब्द का जो अभिप्राय हम लगाते हैं, उसका संबंध ना तो ‘अस्तित्व’ से है और न ही ‘व्यक्ति’ से। दरअसल, उसका मूल संबंध ‘स्वतंत्र इच्छा’ से है।

तब, सहज ही यह प्रश्न जन्म लेता है, तो फिर, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता क्या है?’ यह ऐसा कुछ है, जो मनुष्यों के पास हो सकता है या नहीं भी हो सकता है। जो लोग ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के विचार का समर्थन करते हैं, उनका उस ‘स्वतंत्रता’ से प्राथमिक आशय क्या है, इस बारे में भी बहुत अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। परंतु, इस पर सब सहमत हैं, कि ‘वह जो भी है’, उस में हमारे ‘होने’ की नियति का प्रतिरोध समाहित है। फिर हमें, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ को ठीक से समझने के लिए, ‘नियतिवाद’ का सिद्धान्त भी समझना जरूरी होगा। तो, फिर, ‘नियतिवाद क्या है?’ यानि यह दृष्टिकोण कि मनुष्य का, अपने ‘विचारों’ और ‘कमोंर्’ पर नियंत्रण नहीं है। हम, जो भी करते हैं, उसका स्रोत, हमारी चेतना के नियंत्रण से सर्वथा बाहर है। नियतिवाद के बहुतेरे प्रकार होते हैं। कैल्विनवादी दृष्टिकोण रखने वाले विमर्शकार, ‘पूर्वनियति’ के एक धार्मिक दृष्टिकोण को अपनाते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, ईश्वर ने ‘जो कुछ होने वाला है’ उसे पहले से ही निर्धारित कर रखा है और मानव जीवन केवल, उस पूर्वरचित पटकथा को दुहरा भर रहा है। ‘जेनेटिक’ नियतिवादी यह मानते हैं कि जो कुछ भी हम होंगे और विभिन्न परिस्थितियों में, जो भी हमारी प्रतिक्रिया होगी, वह सब हमारे ‘जीन्स’ में कूटबद्ध है। जबकि दूसरी ओर, व्यवहारवादियों का मत है कि हमारा परिवेश ही, हमें पूर्ण रूप से गढ़ता है। हम हमारे ‘नकारात्मक’ और ‘सकारात्मक’ संबलनों के उत्पाद के अलावा कुछ नहीं हैं। इन तमाम दृष्टिकोणों में, यह विचार समान है कि लोग अपने जीवन के, किसी भी पहलू के नियंत्रण में नहीं हैं। वे उन शक्तियों के उत्पाद हैं, जो उनके प्रभाव से दूर और बाहर हैं।

इसके विपरीत, जो यह विश्वास करते हैं कि ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ है, वे इस बात को स्पष्टतः नकारते हैं कि मानव जीवन पूर्णरूपेण नियत है। यहाँ पर भी अलग-अलग दृष्टिकोण हैं, न केवल इसमें कि ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ में क्या समाहित है, बल्कि इसमें भी कि हमें दरअस्ल कितनी स्वतंत्रता उपलब्ध है। कुछ, हालांकि बहुत थोड़े, दर्शनिकों का मानना है कि हम अपने तमाम निर्णयों में पूर्णरूपेण स्वतंत्र हैं। जबकि अधिकांश दार्शनिक, कुछ कम रूढ़िवादी सिद्धान्त मानते हैं। इस तरह से देखा जाये तो ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के इन सारे दृष्टिकोणों को, जो विशिष्ट बनाता है, वह है, इस बात का खण्डन कि हम पूर्णरूपेण नियतिबद्ध हैं। मनुष्य का, अगर वह मानसिक रूप से विक्षिप्त नहीं है तो, अपने विचारों और अपने आचरण पर, कुछ सचेतन नियंत्रण अनिवार्यतः रहता ही है।

हम सामान्यतः यह जानते ही हैं कि ‘राजनीतिक स्वतंत्रता’, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ से एकदम भिन्न है। राजनीतिक स्वतंत्रता का संबंध, उन स्वछंदताओं से है, जो हमें किसी समाज के सदस्य होने पर उपलब्ध हों या ना उपलब्ध हों। उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट्स में ‘अभिव्यक्ति’ की राजनीतिक स्वतंत्रता है, मगर म्यांमार के लोगों के पास यह नहीं है। राजनीतिक स्वतंत्रता, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ की तरह, मानव स्वभाव का सिद्धान्त नहीं है। इसके बदले, यह किसी समाज के विशिष्ट घटकों का चरित्र चित्रण है।

यहाँ, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक स्वतंत्रता और ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’, ‘अवधारणात्मक’ रूप से भिन्न-भिन्न हैं। लोगों के पास, एक प्रकार की स्वतंत्रता के होने और दूसरी तरह की स्वतंत्रता न होने की कल्पना की जा सकती है। एक तरफ, कोई राजनीतिक स्वतंत्रता के अभाव में भी, ‘आध्यात्मिक’ रूप से मुक्त हो सकता है। उदाहरण के लिए, चलिये मान लें कि लोग पूर्णरूपेण अपने व्यवहार में नियतिबद्ध नहीं हैं। इसके तहत कोई ऐसा व्यक्ति, जो कि ‘राजनीतिक बंदी’ की तरह है, ‘आध्यात्मिक’ रूप से स्वतंत्र है, परंतु राजनीतिक रूप से नहीं। वहीं दूसरी ओर, अगर हम यह मान लें कि लोग पूर्णरूपेण, अपने व्यवहार में नियतिबद्ध हैं, तो उस समाज में, जहाँ प्रचुर राजनीतिक स्वतंत्रताएँ उपलब्ध हैं, वे राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होंगे परंतु ‘आध्यात्मिक’ रूप से नहीं।

ज़ाहिर है कि यह वैचारिक भेद, दर्शन की परंपरा का लक्षण है। शायद, फिर भी, अपेक्षया यह काफी हद तक सुलझा हुआ है। शायद, यह विचारों को स्पष्ट करने के बदले, उन्हें और धुंधला कर देता है। आखिरकार, उदाहरण के लिए, क्या हम यह कल्पना नहीं कर सकते कि किसी समाज में, जिसमें ‘राजनीतिक स्वतंत्रता’ अबाधित रूप से अनुपलब्ध रही है, वहाँ लोगों की गतिविधियां सीमित रहेंगी, भले ही वे अचानक स्वतंत्र हो जाएँ। व्यवहारवादियों का तर्क है कि, हम पूर्णरूपेण, अपने परिवेश के द्वारा नियतिबद्ध हैं। हमें यह पहचानने के लिए उतनी दूर जाने की जरूरत नहीं है कि जिसे हम, अपनी ‘आध्यात्मिक स्वतन्त्रता’ कहते हैं, वह शायद परिवेशगत कारणों से सीमित हो, जिनमें राजनीतिक स्वतंत्रता भी शामिल है। अंततः, हमने पिछले कई दशकों में देखा ही है कि पीढ़ियों तक राजनीतिक अधीनता में रहने के बाद किस तरह लोगों को अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता का उपभोग करने में कठिनाई का सामना करना पड़ा है। ऐसे उदाहरण कई अल्प विकसित समाजों में ही नहीं, बल्कि, उपनिवेशरहित समाजों में भी मिल ही जाएंगे।

‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के सिद्धांतकार, यह तर्क दे सकते हैं कि राजनीतिक स्वतन्त्रता की अनुपलब्धि, ’आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के अस्तित्व से समझौता नहीं कर सकती। उनका यह दावा रहेगा कि ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’, सारे मनुष्यों के पास उपलब्ध है। जो लोग राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हैं, उससे उनकी ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ में न तो कोई अभिवृद्धि होती है, न ही कोई घटोतरी। वे सिर्फ अपनी इस ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ को नवोपार्जित राजनीतिक स्वतंत्रता की सेवा में न लगा पाने की अज्ञानता दर्शा रहे हैं।

हालाँकि, मुझे लगता है कि इस उत्तर में, ऐसा कुछ है, जो छूट रहा है। अगर हम यह जानना चाहते हैं कि लोगों का जीवन कैसा है? वे क्या और क्या नहीं कर सकते? तब, शायद यह कहा जाना बहुत हद तक, सहायक सिद्ध नहीं होगा कि भले ही उनकी परिस्थिति कैसी भी हो, वे ‘आध्यात्मिक’ रूप से स्वतंत्र हैं। ज्यादातर लोगों की रुचि, यह जानने में नहीं है कि वे, किसी अप्रकट ढंग से लाचार हैं, या कहें कि वायवी-लाचारी है, उनकी। बल्कि उनकी रुचि यह जानने में हैं कि उनके पास, कौन से ठोस विकल्प उपलब्ध हैं। यानी, अगर लोगों को, किसी एक तरीके से रहने के लिए बाध्य कर किया गया है, तो यह दावा कि ‘वे ऐसे रहने के लिए बाध्य नहीं हैं’ खोखला साबित होगा। अगर, इस सबका अभिप्राय यही निकले, कि मनुष्य ‘होने’ में ऐसा कुछ है, जो पूरी तरह, उन परिस्थितियों के अधीन नहीं है। उन लोगों की दिलचस्पी, उन परिस्थितियों के चरित्र चित्रण को जानने में ज्यादा होगी। साथ ही, उनकी दिलचस्पी यह जानने में भी होगी, कि कैसे वे परिस्थितियाँ,जो वे हैं और जो वे करते हैं, उसमें दखल डालती हैं और वे कैसे अपने आप को, उन परिस्थितियों से पूरी ‘स्वतंत्र’ कर सकते हैं।

 

ऐसे में, ऐन ठीक इसी बिन्दु पर, मिशेल फूको के, स्वतंत्रता के बारे में विचार अत्यंत प्रासंगिक हो उठते हैं। फूको, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के किसी भी रूप का बचाव नहीं करते हैं। न ही वे, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ को अस्वीकार करते हैं। बल्कि, इसके विपरीत, वे उन असंख्य बाधाओं को गिनाते हुए मिलते हैं, जिन्होंने हमें बाध्य कर रखा है। हालाँकि, जिन बाधाओं का विवरण, वे करते हैं, और जैसा कि वे जोर दे कर कहते हैं, वे बाधाएँ ‘आध्यात्मिक’ बाधाएँ नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से मनुष्य पर लाद दी गयी बाधाएँ हैं। नतीजतन, वे ऐसी बाधाएँ हैं, जिनसे निश्चय ही पार पाया जा सकता है। और उन बाधाओं से पार पाना, न तो ‘आध्यात्मिक’ चेष्टा होगी, और न ही दार्शनिक। बल्कि, यह एक राजनीतिक अभ्यास है। अगर दूसरी तरह से कहें तो, फूको, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ का न तो बचाव करते हैं और न ही खण्डन। वे ऐसा कुछ राजनीतिक प्रतिरोध के होने के लिए मान लेते हैं। हालाँकि, उनकी रुचि वहाँ नहीं है, बल्कि उनकी रुचि, उन विशिष्ट बाधाओं को जानने के प्रश्न में निहित है, जो कि हमारे ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हैं। वे जानना चाहते हैं कि, वो बाधाएँ क्या हैं, वे अपने उस रूप में कैसे आईं, और उनके क्या प्रभाव हैं? और इन प्रश्नों के उत्तर जानने के बाद ही हम, अपने आप को उन बाधाओं से मुक्त कर सकते हैं। जैसा कि वे, अपनी अंतिम प्रकाशित कृति में लिखते हैं, ’आखिरकार, ज्ञान के लिए, वो जुनून ही क्या, जिसकी परिणति सिर्फ कुछ मात्रा की सुविज्ञता में हो, न कि, एक या दूसरे रूप में और जहाँ तक संभव हो सके, ज्ञाता के खुद से ही विषय से भटकने में । (फूको 1990 बी 8)

यह सर्वविदित है कि फूको ने, ‘स्वतंत्रता’ पर स्वतन्त्र रूप से कोई भी पुस्तक प्रकाशित नहीं की। और न ही उनकी, स्वतंत्रता, चाहे वह ‘आध्यात्मिक’ हो या राजनीतिक’, पर कोई निरंतर चलने वाली टिप्पणी है। जब भी वे ‘स्वतंत्रता’ शब्द या ‘स्वतंत्रता के विचार’ का उल्लेख भी करते हैं, तो वह हमेशा ही किसी दूसरे ही संदर्भ या किसी दूसरे ही मसले की बहस में होता है। फिर भी, हम यह कह सकते हैं कि अपने कार्यकाल के, एक छोर से दूसरे छोर तक, ‘स्वतंत्रता का प्रश्न’, उनके काम को निरंतर प्रेरित करता रहा। उनके लिए चुनौती के रूप में, प्रश्न यह नहीं कि ’क्या हम स्वतंत्र हैं?’, बल्कि, प्रश्न यह है कि, ’हम कैसे ऐतिहासिक रूप से बाध्य हैं और हम उसके बारे में अपने तईं क्या कर सकते हैं?’ हालाँकि, फूको के पास इस प्रश्न के दूसरे भाग के बारे में कहने के लिए बहुत कम उपलब्ध था, परंतु वे, इस प्रश्न के पहले भाग के बारे में, और उस विचार के संदर्भ में, अपनी भूमिका के बारे में काफी स्पष्ट थे। उनकी भूमिका, हमें यह बताने की नहीं थी कि ‘हम क्या करें’, बल्कि, बाधाओं के एक नए समूह को प्रस्तुत करने की थी। इसके साथ यह भी कि उन विशिष्ट ऐतिहासिक बाधाओं को समझने में, हमारी और स्वयं की मदद करने के अभीष्ट में था, और यह समझाने में भी था कि, वे बाधाएँ ऐतिहासिक बाधाओं से ज्यादा कुछ नहीं हैं। इसी प्रवृत्ति में उन्होंने एक बार लिखा था :

‘चीजें, इससे बेहतर नहीं हो सकतीं, ऐसा कहने में एक निराशावाद है, जबकि मेरा केन्द्रीय आशावाद यह कहने में निहित है कि बहुतेरी चीजें बदली जा सकती हैं, जो वैसे ही कमजोर हैं, जो परिस्थितियों से ज्यादा बंधी हुई हैं, बनिस्बत आवश्यकताओं के, जो ज्यादा मनमानी हैं, बनिस्बत स्वयं-सिद्ध होने के, और ज्यादा जटिल, अस्थायी ऐतिहासिक परिस्थितियों के मसले बजाय अवश्यंभावी मानव-विज्ञानी शाश्वतताओं के।‘ (1990 डी, 156)

 

इस बिंदु तक हम, बहुत ही सामान्य तौर पर ‘स्वतंत्रता’ शब्द के अभिप्राय के बारे में बात कर रहे हैं। तथापि, अगर फूको का दृष्टिकोण उपयोगी है, तो हमें ‘स्वतंत्रता’ पर व्यापक दार्शनिक टिप्पणियों से अलग हट कर, अपनी विशिष्ट परिस्थिति का स्थापित, ऐतिहासिक विश्लेषण करना होगा। और कहना न होगा कि यही, जाहिर तौर पर फूको का लेखन कर रहा है। इन कृतियों में, स्वतंत्रता की अंतर्निहित भूमिका देखने के लिए, चलिये हम संक्षेप में, इस एक उदाहरण पर विचार करें। ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ फूको द्वारा लिखित फ्रांस में, जेलों के उदय का इतिहास है। यह यातना से लेकर पुनर्वास तक के परिवर्तन काल का बखान करता है। उस दौर से गुजरते हुए, यहाँ दोनों अवस्थाओं का दखल है। यातना काल के दौरान, अपराध कभी-कभी ही लेकिन गम्भीरता से दण्डित होते थे। हर एक अपराध, शासक के विरुद्ध माना जाता था, और उस दोष को पूर्णरूपेण अक्षरशः शासक की सत्तानीति के ढाँचे के खिलाफ, एक हमला माना जाता था। इस अपराध का दमन, अपराधी के शरीर के प्रति अत्यधिक नृशंस दण्ड से किया जाता था, ताकि शासक की सत्ता और प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की जा सके।

कहना न होगा कि, यातना कई मानों में, दण्ड की एक निरर्थक विधि थी। यह असामान्य रूप से लागू की जाने वाली, महंगी विधि थी और अक्सर, अपराधी के लिए सहानुभूति उत्पन्न करती थी। पूंजीवाद के उदय और उसके साथ बढ़ते हुए, भूमि सम्बन्धी अपराधों पर ध्यान अधिक केन्द्रित किए जाने के कारण, दण्ड की, एक कुशल प्रणाली की आवश्यकता उत्पन्न हुई। फूको, इस समस्या से निपटने के एकमेव समाधान के रूप में, जेल के उदय की, एक जटिल गाथा बताते हैं। हमारे उद्देश्य के लिए, इस गाथा में, प्रासंगिक यह है कि इस व्यवस्था के केंद्र का परिवर्तन, शनैः शनैः अपराध से, अपराधी की तरफ हो गया। इससे एक ऐसा तंत्र उभरा, जो अपराधों को दण्डित करने के बदले, अपराधों को, आपराधिकता की अभिव्यक्ति मानने लगा। अतः, इस धारणा के कारण, जिसे ठीक किए जाने की जरूरत थी, वह अपराध के पीछे का अपराधी था। इसके लिए हस्तक्षेप और निगरानी की उन्नत तकनीकों की आवश्यकता पड़ी, जो पहले से ही दण्ड प्रणाली से अलग मठों, अस्पतालों, और सेना में विकसित हो रही थीं। इन तकनीकों को, जेल के सीमित परिवेश के साथ मिला दिया गया, जहाँ कैदी पर सतत निगरानी रखी जा सकती थी और हस्तक्षेप किया जा सकता था। कारावास, वे जगहें थीं, जिन्हें फूको, ‘आज्ञापरायण निकाय’ कहते हैं। निकाय, जो काम करने में कुशल और सत्ता के आज्ञाकारी, दोनों थे।

कुल मिलाकर, उन करावासों में, जो गढ़ा गया वह, वही नहीं रहा। निगरानी और व्यक्ति की निजता में हस्तक्षेप की तकनीकें, पूरे समाज में फैल गईं। पूरे लन्दन में, निगरानी कैमरों और संयुक्त राज्य अमेरिका में, वायरटेप्पिंग की निगरानी की तकनीकों के उद्भव से, निगरानी की खबरें आजकल अखबारों में ज्यादा हैं। निजता में अप्रकट हस्तक्षेप की तकनीकें, गुप्त रूप से फैली हैं और उतनी ही प्रभावी हैं।‘परिवार’ और ‘व्यक्ति’, हर बड़े और मँझले आकार के कार्पोरेशन में के मानव संसाधन विभागों से लेकर, स्कूल काउंसिलरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बहुलता के चलते, अपने आपकीे, मनोवैज्ञानिक निगरानी के लिए अधीन कर दिये गए हैं, जो यह प्रामाणित या सिद्ध करने के लिए कटिबद्ध हैं कि हम अपना उपयुक्त सामाजिक दायित्व निभा रहे हैं।

 

‘निगरानी’ और ‘हस्तक्षेप’ की इस प्रणाली, जिसे फूको अनुशासन का नाम देते हैं, की मौजूदा स्थिति पर काफी चर्चा हुई है। कुछ ने, खासकर दार्शनिक जील द्लूज ने तर्क दिया है कि हम एक नई ‘उत्तर-अनुशासनात्मक’ अवस्था में प्रवेश कर गए हैं (द्लूज 1995)। हमारी चिंता, हालांकि, इस प्रश्न के साथ है कि इस ऐतिहासिक अध्ययन में, ‘स्वतंत्रता’ को कहाँ उलझा दिया गया है। यह देखने के लिए, हमें यह पहचानना जरूरी होगा कि फूको, ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ में जो बखानते हैं, वह दरअस्ल लोगों के व्यवहार पर, ऐतिहासिक बाधाओं के समूह का उदय है। बाधाएँ, ऐसे तरीकों से काम करती हैं, अमूमन जिन्हें परंपरागत राजनीतिक दर्शनों में, नजरअंदाज कर दिया जाता है। वे ऐसे काम नहीं करती हैं कि वे लोगों को, वो कुछ करने से रोकें, जो वे अन्यथा करने के लिए प्रवृत्त हो सकते हैं। बजाय इसके, वे कुछ अचूक तरीकों से लोगों को गढ़ती हैं, और इस तरह की गढ़न्त में, उन्हें ‘आज्ञा-परायण निकायों’ में बदल देती हैं।

हालाँकि, ठीक इसी विमर्श-बिन्दु पर सत्ता का प्रश्न सहज ही रूप में आ खड़ा होता है लेकिन, सत्ता की अवधारणा की चर्चा काफी गहराई में, दूसरे निबंध में की जाएगी। अभी के लिए, मुझे सिर्फ इतना कहने दीजिये कि फूको, ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ और अपने दूसरे ऐतिहासिक निबंधों में जो समाहित करते हुए प्रस्तुत करते हैं, वह सत्ता का‘नकारात्मक’ के स्थान पर, ‘सकारात्मक’ दृष्टिकोण कहा जा सकता है। इस दृष्टिकोण में सत्ता, निरोध के बदले सृजन से काम करती है। सत्ता हमारी ‘स्वतंत्रता’ को सीमांकित नहीं करती, बल्कि, वह हमें मानवों की एक विश्वसनीय किस्म में बदल देती है। वह ऐसा दो स्तरों पर करती है। पहले, वह हमारे शरीर को, विशेष प्रकार के सामाजिक व्यवहार की तरफ उन्मुख होने के लिए प्रशिक्षित करती है। दूसरे, और शायद यह अधिक महत्त्वपूर्ण है कि वह कतिपय विश्वसनीय तरीकों से, हमें अपने बारे में सोचने के लिए बाध्य करती है। उदाहरण के लिए फूको,‘डिसिप्लिन एंड पनिश’में जिस मनोवैज्ञानिक निगरानी और हस्तक्षेप की बहुलता का बखान करते हैं, वह एक ऐसा समाज बनाती है, जो मनुष्य को मनोवैज्ञानिक जीव के रूप में, खुद के बारे में सोचने के लिए तैयार कर देती है। इसके परिणामस्वरूप, वे अपने दुःखों को मनोविज्ञानजन्य मानते हैं और फिर उसकी समस्याओं का मनोवैज्ञानिक इलाज ढूंढते हैं। बजाय, जिस समाज में वे रहते हैं, उसके चरित्र पर सवाल उठाने के, वे खुद पर सवाल उठाते हैं। अर्थात्, एक सामूहिक चिंतन को, परिस्थिति- मूलकता से नाथ देने के बजाए, समाज निरपेक्ष होकर, मनोगत दिशा की ओर मोड़ देते हैं। कुल मिलाकर, सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन करने के बदले, वे स्वयं में परिवर्तन करते हैं। यह कृत्य, फिर, व्यवस्था की आलोचना को, पुनः उन्हीं लोगों की ओर मोड़ देता है, जो उससे असंतुष्ट हैं और इस प्रकार उसी सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करता है। इस तरह सभी समस्याएँ,़ अपने मूल में सामाजिक या राजनीतिक होने के बदले, मनोवैज्ञानिक हो जाती हैं।

सत्ता, इस मामले में, निरोध के बजाय, जिसे कहा जाए ‘बाधा’ या हस्तक्षेप के जरिए काम करती है। परंतु, निरोध की तरह, बाधा व्यक्ति के विकल्पों को सीमित करने का काम भी करती है।

किसी को मनोवैज्ञानिक जीव बनाने में बाधाएँ, एक विशिष्ट ‘समरूपता’ का सृजन करती हैं और सामाजिक प्रतिरोधों की संभावनाओं या जीने के अन्य रूपों के साथ, प्रयोगों को भोथरा बनाती हैं। इसके अलावा, बाधाएँ, निरोधों की तुलना में, कहीं अधिक प्रभावी होती हैं। जब किसी को रोका जाता है, तो वह निषिद्ध की ‘कामना’ फिर भी करता है। परंतु, जब कोई बाधित है, तो उसे वही इच्छा करने के लिए ढाला जाता है, जो इच्छा सत्ता की दृष्टि में करने के लिए उपयुक्त है। कोई व्यक्ति, न केवल, जो वह चाहता है, उसे प्राप्त करने से अवरुद्ध है, बल्कि वह प्रस्तुत किए गए, सामाजिक विकल्पों के अलावा के अन्य विकल्पों पर विचार ही नहीं करता।

ऐसे में यह प्रश्न उठ सकता है और समाजशास्त्रीय दृष्टि वाले लोग उठाते भी रहे हैं कि इस सबका स्वतंत्रता से क्या लेना देना है? ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ की अवधारणा को याद कीजिये। अगर हम ‘आध्यात्मिक’ रूप से स्वतंत्र हैं तो हम अपने विचारों और या व्यवहार का नियंत्रण, हम स्वयं कर सकते हैं। हम किसी बाहरी शक्ति या व्यक्ति द्वारा नियंत्रित नहीं हैं। फूको जिसका ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ में वर्णन करते हैं, वह एक बाह्य शक्ति है, जो हमारे सोचने, हमारे कार्य करने, और ‘हम जो हैं’, उसको प्रभावित करता है- कम से कम हमारे इतिहास के, इस खास बिन्दु पर।

फूको, जिन शक्तियों के बारे में कहते हैं और जो ताकतें ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ से वास्ता रखती हैं, उनके बीच, अंतर यह है कि फूको की शक्तियाँ, ‘आध्यात्मिक’ होने के बदले, बहुत साफ तौर पर ऐतिहासिक हैं। फूको, मानव के ‘विचार’ और ‘व्यवहार’ को अनिवार्यतः नियंत्रित करने वाली, उन शक्तियों के प्रकार (ईश्वर, परिवेश, जीन्स) का वर्णन नहीं करते हैं। फूको, ऐतिहासिक रूप से, ‘अप्रत्याशितता’ से बने अभ्यासों के समूह को दर्शाते हैं, जो हमारे व्यवहार पर, इस विशिष्ट कालखंड में प्रभावी हैं। इसके कारण, यह मानने का कोई आधार नहीं है कि अगर हम हमारी ऐतिहासिक विरासत समझें, तो हम उसे बदल नहीं सकते। अर्थात, वे दृष्टि में ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को बहुत निर्णायक मानते हैं।

इसीलिए, फूको उपर्युक्त कथन में कहते हैं कि ‘कई चीजें बदली जा सकती हैं।’ उनका यह मत, जो उन्होंने ज्ञानोदय के युग से विरासत में पाया है, और जिसे बहुतेरे लोग, उन्हें उसे यह कह कर खारिज करते हुए कहते हैं-- ‘अगर हम हमारी स्थिति को समझते हैं तो हमारे पास इसे बदलने का मौका है।’

यह परिप्रेक्ष्य अंतर्निहित रूप से, ‘आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ के विचार को अंगीकार करता है, यद्यपि यह न तो उसके पक्ष में तर्क प्रस्तुत करता है, और न ही इसके विशिष्ट चरित्र या सीमाओं को स्थापित करता है। हम इस विचार को देख सकते हैं, जब फूको लिखते हैं :

‘हमें यह जरूर देखना चाहिए कि अगर जनता स्वतंत्र नहीं है तो सत्ता के संबंध नहीं हो सकते। इन दोनों में से कोई भी, अगर पूर्णतः दूसरे के नियंत्रण में है और उसके अधीनस्थ है, वह कर्ता बन गया है, जिस पर वह अनंत और अपरिमित हिंसा कर सकता है, तो सत्ता के संबंध नहीं होंगे। अतः सत्ता के संबंधों का उपभोग करने के लिए दोनों तरफ किसी भी किस्म की स्वतंत्रता जरूरी है। (1994/12)

बहरहाल, प्रस्तुत पाठ को विवेचित करते हुए, जैसा कि सहज ही देखा जा सकता है, फूको का स्वतंत्रता के प्रति यह दृष्टिकोण कि ‘स्वतंत्रता’, वह कुछ है, जिसका हमारे वर्तमान को परिवर्तित करने से संबंध है, एक सुनिश्चित राजनीतिक रुझान लिए हुए है। फिर यह प्रश्न उठता है कि इस विचार का राजनीतिक स्वतंत्रता से क्या संबंध है? राजनीतिक स्वतंत्रता, अगर हम याद करें, तो उन स्वच्छंदताओं का मुद्दा है, जो हमें किसी ‘समाज-विशेष’ या सामाजिक व्यवस्था विशेष में उपलब्ध हैं। पहली नजर में, यह कहा जा सकता है कि फूको उन तरीकों का वर्णन कर रहे हैं, जिनसे समाज विशेष और सामाजिक व्यवस्थाएँ, स्वच्छंदताओं का अतिक्रमण करती हैं तो यह कहना पूरी तरह गलत नहीं होगा। फूको, उन तरीकों का भी वर्णन करते हैं, जिनसे जीवन जीने के वैकल्पिक तरीके बाधित हैं। जिन तरीकों से हमें बनाया जाता है और जैसे हमें अपने बारे में सोचने के लिए बाध्य किया जाता है। हालाँकि, इस तरह चीजों को प्रस्तुत करना भ्रामक है। यह सत्ता और स्वतंत्रता के प्रारूप का पूर्वानुमान करता हुआ, पूर्व-प्रस्तावित जान पड़ता है। परंतु यह फूको का प्रारूप नहीं है। यह देखने के लिए हमें थोड़ा समय, उस प्रारूप के विवेचन में लगेगा।

पारंपरिक उदार राजनीतिक सिद्धान्त में, ‘राज्य की सत्ता’ और ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता’ के बीच एक द्वंद्व है, जिसे संतुलित किया जाना चाहिए। अगर ‘राज्य’ के पास बहुत ज्यादा अधिकार हैं तो वह व्यक्ति के अपने जीवन को ‘जैसा वह चाहे वैसा’ बनाने के अधिकार की अनुचित रूप से कटौत्री करता है, अर्थात् वांछित जीवन शैली के चयन को खारिज करता है। वहीं दूसरी ओर, अगर स्वतंत्रता अपरिबद्ध है, तो लोग ‘खुद अपनी चुनी हुई जीवन-शैली’ की खोज के, एक दूसरे के अधिकार में, हस्तक्षेप कर सकते हैं। इसीलिए, उदार राजनीतिक सिद्धान्त की भूमिका, ‘राज्य सत्ता’ और ‘स्वतंत्रता’ के बीच, सही संतुलन बनाने की है, और वही संतुलन बेहतर होगा, जो इन दोनों अतियों से बच कर रहे। (उदार राजनीतिक सिद्धान्त की बहुतेरी जिम्मेदारियाँ और भी हैं, परन्तु हम यहाँ सिर्फ उसकी ‘राजनीतिक स्वतंत्रता’ में भूमिका को देख रहे हैं।) इस दृष्टिकोण पर कि ‘राज्य सत्ता’ व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर थोपा गया एक बाहरी निरोध है। अब प्रश्न यह है कि इसे कितना और कहाँ पर लागू किया जाना चाहिए?

यह सत्ता का नकारात्मक, निरोधक नजरिया है। जैसा कि हमने पहले देखा है, फूको का सत्ता का‘डिसिप्लिन एंड पनिश’और अन्यत्र विवेचन सत्ता के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण नहीं है। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि फूको नकारात्मक सत्ता के अस्तित्व को नहीं नकारते हैं, विशेषकर राज्य के स्तर पर। हालाँकि, उनके विचार में, जिस तरीके से सत्ता काम करती है, वह राज्य और उसके विविध दमनकारी तंत्रों के स्तर के बदले, उसे यथार्थ के निकट लाती है। वह हमारे दैनंदिन के जीवन में बसती है, हमें विशिष्ट प्रकार के आज्ञाकारी व्यक्तियों में ढाल देती है।

जिस हद तक फूको का लेखन, सत्ता की कार्यप्रणाली को पकड़ता है, हमें स्वतंत्रता के पारंपरिक उदार दृष्टिकोण में संशोधन करना होगा। यह सिर्फ किन क्रियाओं पर कितना निषेध लगाये जाने का मुद्दा नहीं हो सकता। मुद्दा यह भी है कि हम ‘जो हैं’ वह हम कैसे बनें और हम उसके बारे में, क्या कर सकते हैं। इसलिए, राजनीतिक स्वतंत्रता, सिर्फ हमें अपनी स्वेच्छानुसार करने के लिए छोड़ दिये जाने का मुद्दा ही नहीं है। इस के साथ ही, और अधिक सूक्ष्म रूप में, मुद्दा यह समझने का भी है कि हम किस तरह ढाले गए हैं ताकि हमें कुछ चीजें पसंद आएँ और कुछ बिलकुल ही नापसंद। और इसके अलावा, मुद्दा यह समझने का भी है कि ‘हमें क्या उपलब्ध है?’ हम इस सब को, यह कह कर एक स्पष्ट रूपरेखा में डाल सकते हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता, इसी बात से सरोकार नहीं रखती है कि हम ‘किससे स्वतंत्र हैं’, किंतु ज्यादा सार्थक रूप में, इससे सरोकार रखती है कि मौजूदा बाधाओं के साथ, हम किसके लिए स्वतंत्र हैं।

 

फूको इस विचार को निम्नलिखित उल्लेख में पकड़ते हैं। यह उद्धरण, हमें फूको की स्वतन्त्रता की अवधारणा को गहराई में समझने में मदद करेगा :

‘मैं वर्तमान की प्रकृति के विषय में किसी भी निदान के दायित्वों के बारे में कुछ कहना चाहूँगा। यह ‘हम क्या हैं’ के सरल चित्रण में निहित नहीं है, बजाय इसके- वर्तमान में परिलक्षित भंगुरता की सीमा रेखाओं का अनुसरण करते हुए- यह समझने की कोशिश करते हुए कि ‘क्यों और कैसे’ कि- ‘जो-है’, वह, अब और ‘जो-है’ नहीं रह सकता। इस अभिप्राय में, कोई भी विवरण हमेशा, इस प्रकार की अप्रत्यक्ष दरारों के अनुरूप किए जाने चाहिए जो कि मूर्त स्वतंत्रता की जगह बनाती हैं यानी कि संभावित परिवर्तन के लिए एक अनाक्रमित ‘स्पेस’। (1990/36)

हम यहाँ पर, उन विषय वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, जो हमने फूको के स्वतंत्रता के प्रति दृष्टिकोण में से अलग की हैं, ऐतिहासिक विषयों के रूप में बाधाएँ, उन बाधाओं की आकस्मिकता, और अमूर्त के बजाय मूर्त स्वतंत्रता। इसके अलावा, इस वाक्य ‘संभावित परिवर्तन की एक जगह’ के इस्तेमाल में, फूको इस विचार को पकड़ते हैं कि स्वतंत्रता, सिर्फ अकेले छोड़ दिये जाने भर का विषय नहीं है, बल्कि यह हम ‘जो होना चाहते हैं’, उसमें ‘आत्म’ के ‘पुनर्गठन’ का विषय भी है, किसी के लिए स्वतंत्रता, न सिर्फ किसी से स्वतंत्रता। इसी उल्लेख के आधार पर, हम फूको की ‘स्वतंत्रता’ की अवधारणा को, जो हम विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थिति के मापदंडों के भीतर, स्वयं के गठन के लिए कर सकते हैं, के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।

अगर हम स्वतंत्रता को, इस तरह परिभाषित करते हैं, तो हमें स्वतंत्रता की इस परिभाषा को सही तरीके से समझने के लिए पर्याप्त चेतस रहना होगा। पहले, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि किसी विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थिति में, पहले से दी गई चीजों का एक समूह है, जो हम ‘आत्म की निर्मिति’ के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि यहाँ ऐसा कुछ है, जिसे हम, जो हम बनते हैं उसका ‘सत्य’ कह सकते हैं, और जब एक बार हम अपनी ऐतिहासिक परिस्थिति को समझ जाते हैं, तब हम उस सत्य को खोज सकते हैं। इस तरह का दृष्टिकोण, फूको के स्वयं के उन पहलुओं के ऐतिहासिकीकरण की परियोजना का उल्लंघन करेगा, जिन्हें हम अपरिवर्तनीय या स्थायी मानते हैं। यह हमारी संभावनाओं को मूर्त रूप में देखेगा जो कि यथार्थ में एक अस्थायी ऐतिहासिक परिस्थिति है।

दूसरे, और इससे सम्बद्ध, हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि हम हमारी ऐतिहासिक परिस्थिति को पूर्णरूपेण समझ सकते हैं। अगर, ‘जो हम हैं’ वह अभ्यासों की जटिल परस्परिक क्रियाओं का उत्पाद है, तब कम से कम, जो शक्तियाँ हमें रूप देती हैं, उनके आयाम संभवतः, हमारी समझ से परे हैं। ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’, उदाहरण के लिए, ‘हम जो हैं’ उसकी समग्रता का लेखा नहीं है। यह ‘हम जो हैं’ उसके सिर्फ एक पहलू का विवरण है। ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्सुआलिटी’ का पहला खंड दूसरा पहलू है, और शासनात्मकता पर फूको ने, जो व्याख्यान शृंखला दी थी, वह तीसरा पहलू। साथ ही साथ, ‘जो हम हैं’, वह हमारी अभ्यासों की निरंतरता के साथ बदलता रहता है। इसलिए, किसी एक क्षण में, ‘हम जो हैं’ यह पकड़ना और भी कठिन हो जाता है। हम हमेशा, ‘हम जो अभी थे’ को समझने के जोखिम में रहते हैं, बजाय ‘जो हम अभी हैं’, अर्थात् ‘वयमबोध’ की वर्तमान अवस्थिति।

 

इसका निष्कर्ष यह है कि, फूको के लिए, ‘स्वतंत्रता’ एक प्रकार से प्रयोग का विषय है। ‘मूर्त स्वतंत्रता की जगह’का आशय यह अंदाज लगाना नहीं है कि ‘हम क्या हो सकते हैं’ और फिर उस लक्ष्य की तरफ अग्रसर होना। वस्तुतः उसका अभिप्राय तो है, हमारे जीवन के लिए बहुतेरी अलग अलग संभावनाओं को, कई विभिन्न ‘संभावित परिवर्तनों’ को, यह देखने के लिए खंगालना कि वे हमें कहाँ ले जाते हैं। स्वतंत्र जीना यानी स्वयं के साथ प्रयोग करना है, और हमेशा, इस स्थिति से नितांत अनभिज्ञ रहते हुए कि चाहे ‘हम’ अपने को गढ़ने वाली शक्तियों से मुक्त हुए हों या नहीं, और न ही (और हम कुछ क्षणों में इस पर वापस आयेंगे) उन स्वतंत्र जीवन के प्रयोगों के प्रभावों के बारे में सुनिश्चित होना। यह एक अनिश्चितता की जगह से, ‘कैसे होने के लिए’ गढ़े जाने के, सीमित या अल्पज्ञान के साथ जीवन बनाये जाने की कोशिश है।

तो कुल मिलाकर हमारी स्थिति फिर यह है कि अगर हम इतिवृत्तांतों की निर्मिति करते हैं जैसा कि फूको ने किया, और महा आख्यानों की निर्मिति करते हैं, जो हमें, उन शक्तियों के विभिन्न पहलुओं का लेखा देते हैं, जिन्होंने हमारे ‘बन चुकने’ पर अपना प्रभाव डाला है, तब हमें ‘हम ऐसे कैसे बने’ इसका मात्र आंशिक ज्ञान होता है। यहाँ से, हम यह निर्णय ले सकते हैं कि उन शक्तियों में से, कौन सी वे शक्तियाँ हैं,जो हमें स्वीकार्य हैं, और कौन सी, अगर फूको की शब्दावली का इस्तेमाल करें तो, जो असह्य या अस्वीकार्य हैं। (फूको के इतिवृत्तांत सिर्फ अस्वीकार्य शक्तियों का लेखा ही देते हैं, क्योंकि सबसे अधिक परिवर्तित हो जाने की संभावना हम उन्हीं की रखते हैं।) इन अस्वीकार्य शक्तियों से पार पाने की कोशिश में, हमें ‘हम क्या बन जाएँ’ के साथ प्रयोग करना होगा, इसको समग्रता में न जानते हुए कि वास्तव में हम उन शक्तियों से पलायन कर रहे हैं या नहीं। यह हम सिर्फ अपने प्रयोगों के व्यवहार में समाहित हो जाने के बाद ही जान सकते हैं। हम तब, ‘अपने को गढ़ने वाली शक्तियों’ के समक्ष न तो बेबस हैं और न ही निश्चित कि हम इसके बारे ‘क्या और कैसे’ में कर सकते हैं। हम कहीं बीच में हैं। उसी में हमारी स्वतंत्रता निहित है और वास्तव में वही हमारी ‘स्वतंत्र’ स्थिति भी है।

चूँकि हम अपने प्रयोगों के परिणामों के बारे में अनिश्चितता से भरे हैं, इसलिए, हमें हमेशा सतर्क रहना होगा। चूँकि हम, यह पहले से नहीं जानते कि हमारे प्रयोग, हमें कहाँ और किस दिशा में ले जाएँगे। बहुत संभव है, हम या तो उन असह्य शक्तियों का पुनर्सृजन कर बैठें या नई शक्तियाँ खड़ी कर लें। इसलिए, हम इस तरह के इतिवृत्तान्तों से पीछे नहीं हट सकते, जिस प्रकार के इतिवृत्तान्तों में फूको संलग्न हैं, और न ही हम फूको के इतिवृत्तान्तों से संतुष्ट रह सकते हैं। हमारे ‘होने का’ इतिवृत्तान्त एक असमाप्त परियोजना है। दूसरे शब्दों में कहें तो, हमारी ‘स्वतंत्रता’ के परिणाम उतने ही अनिश्चित हैं, जितनी कि हमारी स्वतंत्रता खुद। हमें कभी भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि ‘संभावित परिवर्तन की जगह’ का हमारा इस्तेमाल, हमें हमेशा बेहतर स्थिति में ही ले जाएगा। स्वतंत्रता अपनी आत्यन्तिकता में भी मुक्ति का पर्याय कतई नहीं है। हमारी स्वतंत्रता, हमें मुक्त कर देने वाली है या नहीं इसका आश्वासन हमें नहीं दिया गया है। वहाँ सिर्फ प्रयोगों और इतिहास-सजग चिंतन के द्वारा ही वहाँ पहुँचा जा सकता है।

आइए अब जरा, फूको की स्वतंत्रता की अवधारणा को बेहतर समझने के लिए फूको के विचारों को, फूको की पूर्ववर्ती पीढ़ी के एक फ्रांसीसी दार्शनिक के विचारों के बरक्स रख कर देखें। मुमकिन है कि यह देखना सहायक हो सकता है। मौरीस मर्लो-पॉन्टी की भी ‘स्थापित स्वतंत्रता’ के बारे में अपनी अवधारणा है, जिसमें हम ‘स्वतंत्र’ हैं, पर पूर्णरूपेण स्वतंत्र कतई नहीं हैं। इन दो अवधारणाओं के बीच के अंतर्विरोधों को देख कर, हम फूको के दृष्टिकोण पर अपनी पकड़ को काफी मजबूत कर सकते हैं।

मर्लो-पॉन्टी अपनी ‘स्वतंत्रता’ की अवधारणा, अपने समकालीन विचारक ज्यां पॉल सार्त्र के विपरीत खड़ी करते हैं। सार्त्र का ‘स्वतंत्रता’ के प्रति दृष्टिकोण सर्वविदित ही है कि हम मूलतः आध्यात्मिक अर्थों में स्वतंत्र हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो हमारे निर्णय के सामर्थ्य से बाहर है। सार्त्र, अपने शुरू के लेखन में, मनोविश्लेषणात्मक अचेतन या अप्रकट ऐतिहासिक शक्तियाँ, जो हमें गढ़ती हैं, की तमाम धारणाओं को रद्द करते हैं। वे विशुद्ध अस्तित्ववादी रीति में, मानते हैं कि हमारे सारे ‘चयन’ केवल हमारे अपने हैं और हमें उनके लिए, अपने पर पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। मर्लो-पॉन्टी, स्वतंत्रता के इस मौलिक दृष्टिकोण को अंगीकार नहीं करते हैं। मर्लो-पॉन्टी के लिए, एक शक्ति जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है और जो हमें बनाती है, वह है, शरीर। दैहिकता- जिसे समझना मर्लो-पॉन्टी की केन्द्रीय परियोजना है- जो अनुभूति के द्वारा, हमें संसार से हमारे पहले अनुभव और संसार की समझ देती है। जीवित देह, बजाय एक जड़ पदार्थ होने के, जिसमें से संवेदनाएँ गुजरती हों, जगत से हमारे प्राथमिक विनियोजन का स्रोत है। हम उस विनियोजन में रद्दोबदल कर सकते हैं, पर हमारा मूर्त रूप, यह सुनिश्चित करता है कि हमारे जीने के कुछ पहलू होंगे, जिन पर हमारा संपूर्ण नियंत्रण न हो। हमारे जीवन का एक अचेतन आयाम है, जो हमसे अप्रकट रहेगा, वह आयाम, जो जगत से हमारे दैहिक अंतरक्रिया के माध्यम से चलता है। इसके अलावा, जैसा कि मर्लो-पॉन्टी इंगित करते हैं, इस अंतरक्रिया का वर्णन, ‘शरीर जो जगत से अंतरक्रिया करता है’, के रूप में करना ठीक नहीं है। यह इस से कहीं ज्यादा अंतरंग और गूढ़ है। यह अन्तरक्रिया देह जगत संकुल के रूप में बेहतर चित्रित होती है।

यह स्थिति स्वतंत्रता के अपेक्षया एक कम उग्र दृष्टिकोण की ओर लेकर जाती है जो कि सार्त्र के दृष्टिकोण की तुलना में और भी अल्प है। सार्त्र के लिए, देह सिर्फ एक जड़ वस्तु है, जो चेतना के द्वारा संचालित है। अगर चेतना अबाधित है, तो चेतना की स्वतंत्रता असीमित होगी। सार्त्र, बेशक, यह स्वीकारते हैं कि चेतना किसी रूप में देहबद्ध तो है ही, अतः अगर कोई उन्मुक्त हो कर यह निर्णय ले कि ‘वह उड़ना चाहता है’, इसका यह मतलब नहीं कि ‘वह सचमुच ही उड़ सकता है’। परन्तु, यह निर्णय अपने आप में मूल रूप से स्वतंत्र है। मर्लो-पॉन्टी का दैहिकता का विश्लेषण, सार्त्र के मस्तिष्क और शरीर के मूलभूत भेद को मिटा देता है। जैसा कि मर्लो-पॉन्टी दर्शाते हैं, व्यक्ति की ‘देह’ सचेतन चिंतन के पहले ही, बोधात्मक व्याख्या में संलग्न हो जाती है। वे अपनी बात रखने के लिए दृष्टि भ्रमों का उदाहरण देते हैं। उनका कहना है कि दृष्टि भ्रम पहले ही ‘कुछ है’ की तरह दृश्यगोचर होते हैं, और सचेतन चिंतन ही उन्हें बाद में ठीक करने की कोशिश करता है। अगर यह सत्य है, तब कोई मूलभूत स्वतंत्रता नहीं है। देहबद्ध प्राणी अपने देह जगत विनियोजन से बाधित है। इसका यह मतलब नहीं है कि हम उस विनियोजन पर चिंतन नहीं कर सकते। पर, देहबद्ध होने से वह स्वतः ही होता है।

उस चिंतन और व्यक्ति के व्यवहार की स्वतंत्रता, मर्लो-पॉन्टी और जैसा कि फूको के लिए भी, यह एक प्रकार की स्थितिमूलक स्वतंत्रता है :

 

हम अपने जगत को चुनते हैं और जगत हमें चुनता है... स्वतंत्रता हमेशा अंतर और बाह्य का मिलन है... और वह पूर्णरूपेण अदृश्य हुए बिना, हमारे जीवन के दैहिक और संस्थानिक आंकड़ों की अनुमति से कमतर होती हुई, सहिष्णुता के सीधे अनुपात में सीमित होती चली जाती है।(मर्लो-पॉन्टी 1962/454)

हमारी स्वतंत्रता हमारे भीतर है और उन प्रतिबंधनों के चलते, जिन्हें हमारी देह और हमारे जगत ने नियत किया है। वे बाधाएँ कार्य के लिए लघुत्तर या वृहत्तर जगह की अनुमति देती हैं। अर्थात् वृहत्तर या लघुत्तर सहिष्णुता। पर देह और ऐतिहासिक रूप से दिये गए संस्थागत ढांचों के बिना, कोई स्वतंत्रता नहीं होगी, क्योंकि ऐसा कुछ नहीं होगा (यानी देह) जिसके द्वारा, वह अभिनीत हो सके और आस पास कुछ नहीं होगा (यानी जगत) जिससे वह संबंध रख सके।

कुछ विवेच्य कोणों में, मर्लो-पॉन्टी की स्थिति मूलक स्वतंत्रता की अवधारणा फूको की अवधारणा से काफी मिलती जुलती है। दोनों ही देहबद्धता का महत्त्व स्वीकारते हैं और वे देह का जगत और उसके अभ्यासों से खुलाव भी पहचानते हैं। इसके साथ ही, इन दोनों अवधारणाओं में, वह मुक्तता व्यक्ति की स्वतंत्रता के परिसीमन से जुड़ती है। जो इन्हें अलग करता है वह है, सिर्फ विश्लेषण का स्तर, जिन पर ये स्वीकारोक्तियां आश्रित हैं। मर्लो-पॉन्टी की स्थितिमूलक स्वतंत्रता, आध्यात्मिक स्वतंत्रता है। वे मानव देह और जगत के साथ, उसके गूँथने का एक व्यापक दार्शनिक लेखा प्रस्तुत करते हैं। वह लेखा दर्शाता है कि किस तरह मस्तिष्क और देह और साथ ही साथ देह और जगत, एकल समष्टि बनाते हैं। इससे, वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि, सार्त्र के उलट, सारी मानव स्वतंत्रता स्थितिमूलक ही होनी चाहिए। कहीं कोई मूलभूत स्वतंत्रता नहीं है, क्योंकि हमारे होने का ऐसा कोई भी पहलू नहीं है, जो इस जगत की चतुर्दिकता से बाहर हो। सारी स्वतंत्रता, एक देहबद्ध चेतना की स्वतंत्रता है, जो इस जगत और उसके इतिहास में सन्निहित है।

फूको को, इसमें से कुछ भी नकारने की जरूरत नहीं है। और ना ही उन्हें इसे अंगीकार करने की आवश्यकता है। उनकी पहुँच, एक दूसरे रास्ते से आती है। उनका प्रश्न मानवीय स्वतंत्रता की प्रकृति का आध्यात्मिक प्रश्न नहीं है। बल्कि, उनका प्रश्न राजनीतिक है कि विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों, यानी हमारी ऐतिहासिक परिस्थितियों के अंतर्गत, हमें कौन सी स्वतंत्रताएँ उपलब्ध हैं। जिस स्थितिमूलक स्वतंत्रता के बारे में फूको उत्सुक हैं, वह जगत में स्थापित देह की स्वतंत्रता नहीं है, वह हमारी स्थिति की स्वतंत्रता है। उपरोक्त दिये गए उल्लेख में, फूको इस बात पर बल देते हैं कि वर्तमान की प्रकृति का निरूपण, वर्तमान की व्याख्या, इस तरह से करे कि उसकी भंगुरता और उसका ध्वंस गोचर हो। वर्तमान की भंगुरता इसलिए नहीं है, क्योंकि मनुष्यों के पास आध्यात्मिक स्वतंत्रता है, पर, जैसा कि हमने पहले देखा, फूको किसी प्रकार की आध्यात्मिक स्वतंत्रता मान कर चलते हैं। वह इतिहास के अप्रत्याशित से बने ढांचे के कारण है।

इतिहास कभी पहले से दिये हुए या अंतर्जात ढांचे के कारण नहीं घटता है। वह चतुर्दिक फैले हुए अभ्यासों के आपस में प्रभाव और आकस्मिक अन्तरक्रिया का उत्पाद है और वह किसी अंतर्जात प्रतिमान के अनुरूप नहीं होता है। (इसका यह मतलब नहीं है कि इतिहास में प्रतिमान नहीं खोजे जा सकते, इसका मतलब यह है कि हम उन्हें तभी देख सकते हैं, जब उन प्रतिमानों ने अप्रत्याशित से बने अभ्यासों के अंतरसंबंध से, अपना निर्माण कर लिया होता है।) स्थितिमूलक स्वतंत्रता, इतिहास की इसी अप्रत्याशितता से बने होने की उपज है। अतः व्यक्ति की, उसकी स्वतंत्रता ‘कौन सी है’ और उसकी स्वतंत्रता ‘कहाँ है’, का आध्यात्मिक प्रश्न नहीं है, बजाय इसके यह प्रश्न है कि व्यक्ति के विशिष्ट इतिहास ने उसे कहाँ रख छोड़ा है, और किस तरह उस इतिहास में हस्तक्षेप हुआ है? फूको के लिए, संक्षेप में, स्थितिमूलक स्वतंत्रता, आध्यात्मिक होने के बदले, ऐतिहासिक और राजनीतिक अवधारणा है।

स्वतंत्रता के प्रति फूको का दृष्टिकोण, फिर, उनके काम के दूसरे बहुतेरे पहलुओं के मानिंद, एक साथ ‘ऐतिहासिक’ और ‘दार्शनिक’ दोनों है।

फूको का यह दृष्टिकोण, दर्शनोन्मुखी अवधारणा होने के कारण, यह इतिहास को दूसरे इतिहासविदों के सामर्थ्य से बाहर, अपेक्षया, एक अधिक परिष्कृत दिशा में ले जाता है। ऐतिहासिक रुझान वाली अवधारणा होने के कारण, यह पारंपरिक दार्शनिक विश्लेषणों के प्रश्न उठता है। फूको का लेखन, इन दोनों अक्षों के, जो कि एक दूसरे से सतत संवाद में हैं, समानांतर पढ़े जाने की मांग करता है। अगर हम, अपने आप को इस द्विस्तरीय बहस में शामिल होने की अनुमति दें, तो हम न केवल हमारे विशिष्ट दार्शनिक रुझान वाले दृष्टिकोण, जिससे हम दुनिया देखते हैं, के प्रति सजग हो जाएंगे, बल्कि उस दृष्टिकोण के ऐतिहासिक रूप से, जो कि अप्रत्याशित से बना है और जिसकी प्रकृति है, के प्रति भी सजग हो जाएंगे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, कहना होगा कि, हम इसी तरह यह अनुभव करें कि हम, शायद हमारी स्वतंत्रता के आमने सामने आ पहुँचें।

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