शनिवार, 14 जनवरी 2017

प्राची - दिसंबर 2017 - महावीर प्रसाद द्विवेदी : एक पुनर्दृष्टि / भारत यायावर

महावीर प्रसाद द्विवेदी : एक पुनर्दृष्टि

भारत यायावर

भारत यायावर

प्राध्यापक, हिन्दी विभाग,

विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग

आवास : यशवंत नगर,

मार्खम कॉलेज के निकट,

हजारीबाग-825 301 (झारखण्ड)

 

 

लेखन

विविध लेखन कार्य में संलिप्त

खोज-कार्यः हिन्दी के महान् लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं फणीश्वरनाथ रेणु की दुर्लभ रचनाओं का खोज-कार्य. इन दोनों लेखकों की लगभग पच्चीस पुस्तकों का संकलन-संपादन. ‘रेणु-रचनावली’ (1994) एवं ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली’ (1996) का संपादन.

अन्य संपादित पुस्तकेंः ‘कवि केदारनाथ सिंह’ (1990), ‘आलोचना के रचना-पुरुष : नामवर सिंह’ (2003) एवं ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी का महत्त्व’ (2004).

पुरस्कार

नागार्जुन पुरस्कार (1988) बेनीपुरी पुरस्कार (1993) राधाकृःण पुरस्कार (1996) पुश्किन पुरस्कार (1997) मास्को

हावीर प्रसाद द्विवेदी एक ऐसे साहित्यकार थे, जो बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे. उन्होंने ‘सरस्वती’ का अठारह वर्षों तक संपादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान कीर्तिमान स्थापित किया था. वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने समालोचना की कई पुस्तकें लिखी थीं. वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे. आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी. वे भाषाशास्त्री थे, अनुवादक थे, वैय्याकरणिक थे, इतिहासज्ञ थे, अर्थशास्त्री थे तथा विज्ञान में भी गहरी रुचि रखने वाले थे. अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे. वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव-जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे.

महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी के पहले साहित्यकार थे, जिनको ‘आचार्य’ की उपाधि मिली थी. इसके पूर्व संस्कृत में आचार्यों की एक परम्परा थी. मई, 1933 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा ने उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में एक बड़ा साहित्यिक आयोजन कर द्विवेदी का अभिनन्दन किया था एवं उनके सम्मान में ‘द्विवेदी अभिनन्दन ग्रंथ’ का प्रकाशन कर, उन्हें समर्पित किया था. इस अवसर पर द्विवेदी जी ने जो अपना वक्तव्य दिया था, वह ‘आत्म-निवेदन’ नाम से प्रकाशित हुआ था. इस ‘आत्म-निवेदन’ में वे कहते हैं- ‘‘मुझे आचार्य की पदवी मिली है. क्यों मिली है, मालूम नहीं. कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं. मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा- इस पदवी से विभूषित किया जाता हूं. शंकराचार्य, माधवाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता. बनारस के संस्कृत कॉलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रखा. फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया?’’

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महावीर प्रसाद द्विवेदी ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी. तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे. उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये- वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना. द्विवेदीजी ने लिखा है- ‘‘पहले तीन सिद्धांतों के अनुकूल आचरण करना तो सहज था; पर चौथे के अनुकूल सचेत रहना कठिन था. तथापि सतत् अभ्यास से उसमें भी सफलता होती गई. तारबाबू होकर भी, टिकट बाबू, मालबाबू, स्टेशन मास्टर, यहां तक कि रेल पटरियां बिछाने और उसकी सड़क की निगरानी करने वाले प्लेट-लेयर ;च्मतउंदमदज ूंल प्देचमबजवतद्ध तक का भी काम मैंने सीख लिया. फल अच्छा ही हुआ. अफसरों की नजर मुझ पर पड़ी. मेरी तरक्की होती गई. वह इस तरह कि एक दफे छोड़कर मुझे तरक्की के लिए दरख्वास्त नहीं देनी पड़ी.’’ द्विवेदी जी 15 रु. मासिक पर रेलवे में बहाल हुए थे और जब उन्होंने 1904 ई. में नौकरी छोड़ी उस वक्त उन्हें 150 रु. मूल वेतन एवं 50 रु. भत्ता मिलता था, यानी कुल 200 रु. उस जमाने में यह एक बहुत बड़ी राशि थी. वे 18 वर्ष की उम्र में रेलवे में बहाल हुए थे. उनका जन्म 6 मई, 1864 ई. में हुआ था और 1882 ई. से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी. नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झांसी शहरों में रहे. इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अभ्यास किया. उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई. में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपांतर है. इसका प्रकाशन 1889 में हुआ. इसमें द्विवेदी जी ने सभी पद्यरचनाओं का भावार्थ खड़ी बोली गद्य में भी किया है. उन्होंने इसकी भूमिका में लिखा है- ‘‘इस कार्य में हुशंगाबादस्थ बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ का जो साम्प्रत मध्यप्रदेश राजधानी नागपुर में विराजमान हैं, मैं परम कृतज्ञ हूं.’’ अपने ‘आत्म-निवेदन’ में उन्होंने लिखा है- ‘‘बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था. फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे. हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कवि वचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी. वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा. फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा. मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा.’’ 1889 से 1892 र्ई. तक द्विवेदी जी की इस प्रकार की कई पुस्तकें प्रकाशित हुई- विनय-विनोद, विहार-वाटिका, स्नेहमाला, ऋतु तरंगिनी, देवी स्तुति शतक, श्री गंगालहरी आदि. 1896 ई. में इन्होंने लॉर्ड बेकन के निबन्धों का हिन्दी में भावार्थमूलक रूपान्तर किया, जो ‘बेकन-विचार-रत्नावली’ पुस्तक में संकलित हैं. 1898 ई. में इन्होंने ‘हिन्दी कालिदास की आलोचना’ लिखी, जो हिन्दी की पहली आलोचनात्मक पुस्तक है. 1899 ई. में श्रीहर्ष के नैषधीयचरितम् पर इन्होंने ‘नैषष-चरित-चर्चा’ नामक आलोचनात्मक एवं गवेषणात्मक पुस्तक लिखी. यह सिलसिला जो शुरू हुआ, वह 1930-31 ई. तक चला और द्विवेदी जी की कुल पचासी पुस्तकें प्रकाशित हुईं.

जनवरी, 1903 ई. से दिसम्बर, 1920 ई. तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है. अपने प्रकाण्ड पांडित्य के कारण इन्हें ‘आचार्य’ कहा जाने लगा. उनके व्यक्तित्व के बारे में आचार्य किशोरी दास वाजपेयी ने लिखा है- ‘‘उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूं.’’ द्विवेदी जी का मानना था कि ‘‘ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है.’’ द्विवेदी जी स्वयं तो एक ‘महान ज्ञान-राशि’ थे ही उनका सम्पूर्ण वांगमय भी संचित ज्ञानराशि है, जिससे होकर गुजरना अपनी जातीय परम्परा को आत्मसात करते हुए विश्वचिंतन के समक्ष भी होना है. डॉ. रामविलास शर्मा ने द्विवेदी जी के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा है- ‘‘द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया. उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है. अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियां लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएं लांघ जाती हैं. इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएं हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे. राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया. इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहां आगे बढ़े हुए हैं और कहां पिछड़े हैं. इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी. परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए.’’

ऐसे महान ज्ञान-राशि के पुंज थे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी. किन्तु रामविलास शर्मा के पूर्व जितने भी आलोचक हुए, उन्होंने द्विवेदी जी का उचित मूल्यांकन तो नहीं ही किया, अपितु उनका अवमूल्यन ही किया. इन महान आलोचकों में रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी एवं हजारीप्रसाद द्विवेदी प्रमुख हैं.

रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में द्विवेदीजी पर जो टिप्पणी की है, उस पर एक नजर डालेंः ‘‘द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई. में ‘सरस्वती’ के संपादन का भार लिया. तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया. लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायं. कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे. पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है. भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं. स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं. पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते. ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं. पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई हैं.’’

इसी प्रसंग में रामचन्द्र शुक्ल आगे लिखते हैं- ‘‘कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएंगे. पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचार पद्धति पर दौड़ पड़े. शुद्ध विचारात्मक निबंधों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहां एक पैराग्राफ में विचार दबा-दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों. द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है.’’

अब आप देखें कि महावीर प्रसाद द्विवेदी के लेखन के प्रति रामचन्द्र शुक्ल की ये टिप्पणी पढ़कर हिन्दी का कोई भी पाठक उससे विरक्त होगा या आसक्त. रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास को हिन्दी के विद्यार्थी वर्षों से आप्त वचनों की तरह याद करते आ रहे हैं. ऐसे में मूल पाठ से उनके आप्त वाक्यों का यदि मिलान कर परीक्षण न किया जाए, तो अनर्थ होगा ही.

रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के सबसे बड़े समालोचक, सबसे बड़े साहित्येतिहास-लेखक. इसी इतिहास में वे महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक योगदान को सिर्फ भाषा-परिष्कारकर्त्ता के रूप में स्वीकार करते हैं. उनके शब्द हैं ‘‘यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गंभीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया. यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटांग भाषा चारों ओर दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती. उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया.’’ अब पाठक स्वयं रामचन्द्र शुक्ल की उपरोक्त पंक्तियों को देखें. क्या यहां एक पैराग्राफ में विचार दबा-दबा कर कसे गये हैं? क्या यहां ‘बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर नहीं कही गई हैं’? क्या शुक्लजी ‘मोटी अक्ल के पाठकों के लिए’ ही ये सब लिख रहे हैं? दरअसल शुक्ल जी जिस आलोचना-पद्धत्ति का सहारा लेकर उक्त बातें लिख रहे थे, उसे अंग्रेजी में श्रनकपबपंस ब्तपजपबपेउ और हिन्दी में निर्णयात्मक आलोचना कहते हैं और इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि इसने आलोचना के क्षेत्र में आलोचकों का ध्यान ऐतिहासिक युग, वातावरण एवं जीवन से हटाकर अधिकांशतः कलापक्ष तक ही सीमित कर दिया है. कलापक्ष की ओर ध्यान देने वाले आलोचकों का कहना है कि युगीन परिस्थितियां, युगीन चेतना और युग सत्य निरंतर परिवर्तनशील है अतएव इन्हें आधार नहीं बनाया जा सकता. उनकी परिवर्तनशीलता के कारण इन्हें साहित्य का स्थायी मानदण्ड नहीं स्वीकार किया जा सकता. लेकिन इसी के साथ यह भी सत्य है कि ऐसी दशा में निर्णयात्मक आलोचना का कोई मूल्य नहीं रहेगा. इसका मुख्य कारण है ऐसे आलोचक का रचनाकार और रचना पर फतवे जारी करना.

रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में ऐसे फतवे जगह-जगह भरे पड़े हैं. उन्होंने कृतियों के महत्त्व को उनके कलापक्ष के कारण स्वीकार किया. उनका कलावादी दृष्टिकोण ‘रस-मीमांसा’ के काव्यशास्त्रीय आधार से निर्मित हुआ था. यही कारण है कि उन्होंने द्विवेदी जी के विचारों को, उनके संचित ज्ञान-राशि पर ध्यान नहीं दिया और उनकी भाषा पर विचार किया. ‘मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर’- यह अभिव्यक्ति की प्रणाली पर बात की जा रही है, जो निस्संदेह भाषा है. जब द्विवेदी जी मूर्ख या मोटे दिमाग वालों के लिए लिखते थे और मोटी तरह से लिखते थे तो उन्होंने भाषा का परिष्कार कैसे किया? जिस लेखक की भाषा की सतही समझ होगी, वह दूसरे लेखकों की भाषा को दुरुस्त कैसे करेगा? पुनः रामचन्द्र शुक्ल की बातों पर विचार करें- महावीर प्रसाद द्विवेदी ने शाश्वत साहित्य या स्थायी साहित्य नहीं लिखा. उनका महत्त्व भाषा-सुधार में है और उनकी भाषा कैसी है- मोटी अक्लवालों के लिए है. इस तरह की असंगत बातों से आचार्य शुक्ल का इतिहास भरा हुआ है. किसी आलोचक ने इसकी अब तक ढंग से समीक्षा भी नहीं लिखी है और यह हिन्दी साहित्य का अब तक श्रेष्ठ इतिहास बना हुआ है. हिन्दी के पाठक इसमें दिये हुए फतवों को आप्त वचनों की तरह याद करते रहते हैं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा लिखते हुए लिखा है- ‘‘इस तरह की बातें किसी इतिहासकार के ग्रंथ में यदि पाई जायं तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता. इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए. उसे बेतुकी बातें न हांकनी चाहिए. अतिशयोक्तियां लिखना इतिहासकार का काम नहीं. उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे.’’

सन् 1933 ई. में आचार्य द्विवेदी को नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा अभिनन्दन ग्रंथ भेंट किया गया. इसकी प्रस्तावना श्यामसुन्दर दास एवं राय कृष्णदास के नाम से प्रकाशित हुई, किन्तु यह लिखा गया था नन्ददुलारे वाजपेयी के द्वारा. इसलिए यह 1940 ई. में प्रकाशित वाजपेयी जी की पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी’ में संकलित है. इसमें यह विचार किया गया है कि स्थायी या शाश्वत साहित्य में द्विवेदी जी का साहित्य परिगणित हो सकता है या नहीं. इस दृष्टिकोण से महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित सम्पूर्ण साहित्य को अयोग्य ठहरा दिया गया. सिर्फ उनके द्वारा सम्पादित ‘सरस्वती’ के अंकों को ही महत्त्व दिया गया.

1952 ई. में हजारीप्रसाद द्विवेदी की ‘हिन्दी साहित्य : उद्भव और विकास’ नामक पुस्तक छपी. इसमें एक जगह वे लिखते हैं- ‘‘पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुंचाई.’’ अब सवाल यह उठता है कि यदि महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबन्ध गम्भीर नहीं हैं तो उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में सहायता कैसे पहुंचाई?

ये तमाम बातें महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक योगदान पर धूल डालने की कोशिश थी. किन्तु, ऐसे रचनाकार भी थे जो द्विवेदीजी के महत्त्व को रेखांकित कर रहे थे, उनमें प्रमुख थे- प्रेमचंद, निराला और पंत. मैथिलीशरण गुप्त तो उनके शिष्य थे ही. पंत ने 1931-32 में द्विवेदी जी पर दो कविताएं लिखीं. सुमित्रानंदन पंत की कविता की चार पंक्तियां देखें-

आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर

भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर,

दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर

उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर

1933 ई. में प्रेमचंद ने ‘हंस’ का द्विवेदी जी पर विशेषांक निकाला. वह भी अप्रैल एवं मई के दो अंकों में. अप्रैल, 1933 के ‘हंस’ की सम्पादकीय में प्रेमचंद लिखते हैं- ‘‘आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं के बनाए हुए हैं. यदि पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती- समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता. उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया.’’

यह था आचार्य द्विवेदी का ऐतिहासिक योगदान. इसी क्रम में आगे प्रेमचंद द्विवेदी जी का शब्द-चित्र इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं- ‘‘द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है. मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्त्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है. उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूंछें, रसभरी गंभीर आंखें और जलद-गंभीर वाणी- उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है- जो सब तरह से हमारा ही है. हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी. किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने. वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये. जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई. हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया. हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है.’’

मई, 1933 के ‘हंस’ की सम्पादकीय पुनः प्रेमचंद ने आचार्य द्विवेदी पर लिखा एवं उनके महत्त्व को सही ढंग से प्रतिपादित किया. वे कहते हैं- ‘‘द्विवेदी जी का जीवन- साहित्य, साधना और तप का जीवन है. साहित्य की लगन का कितना ऊंचा आदर्श है. कहां से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है. जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा. जहां कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कर्त्तव्य था. वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी. ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियां देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है. ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएं तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएंगे. और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गांव की एकांत कुटिया में होता था. साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी.’’

‘सरस्वती’ पत्रिका इलाहाबाद के इंडियन प्रेस से छपती थी, किन्तु द्विवेदी जी कानपुर के निकट के एक गांव जूही में रहकर उसका सम्पादन करते थे. वे खपड़ैल के एक मकान में रहते थे. प्रेमचन्द ने जिस कुटिया का उल्लेख किया है, वह यही है. अब जूही कानपुर शहर का एक मुहल्ला हो गया है. प्रेमचन्द ने द्विवेदी जी के महत्त्व को सही रूप में प्रतिपादित किया है. उनका महत्त्व ज्ञान-विज्ञान का प्रसार कर हिन्दी जनता में जागृति लाने को लेकर था. बाद में रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ नामक पुस्तक लिखकर द्विवेदी जी के ऐतिहासिक योगदान को उसी रूप में व्याख्यायित किया, जिसे प्रेमचन्द उसी वक्त पहचान रहे थे. वे शाश्वत साहित्य या कलात्मक साहित्य की दृष्टि से द्विवेदी जी के साहित्य को नहीं देख रहे थे.

मई, 1933 ई. में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से इलाहाबाद के लेखकों ने इलाहाबाद में ‘द्विवेदी-मेला’ का आयोजन किया था. इसमें महावीर प्रसाद द्विवेदी को सम्मानित करने पूरा हिन्दी जगत उमड़ पड़ा था. कहते हैं, इतना बड़ा लेखकों का जमावड़ा पहली बार इस अवसर पर हुआ. इसके केन्द्र में द्विवेदी जी थे. वे हिन्दी लेखकों के परम आदरणीय ऐतिहासिक पुरुष की तरह उपस्थित थे. निराला ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में ‘आचार्य अमर हों!’ नामक टिप्पणी में उनका जो शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है, वह बेहद जीवंत और यथार्थ है- ‘‘उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए उमड़ पड़े थे. वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा! सहस्रों साहित्य सेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे. वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं. हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं. हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया. वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं. विधाता हैं. सर्वस्व हैं. वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं. उन्हें लोग आचार्य कहते हैं- वह सचमुच आचार्य हैं. आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है. वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है. दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं. हम दोनों ही के उपासक हैं. राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं. वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं. वह इतने ऊंचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है. वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं- कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते. वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं. हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है. आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं. वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है.’’

कहना न होगा कि रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी और हजारीप्रसाद द्विवेदी के विचारों के बरक्स प्रेमचंद एवं निराला ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के ऐतिहासिक योगदान को, उनके अमर व्यक्तित्व की अमिट छाप को सही रूप में समझा और मूल्यांकित किया.

महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी के पहले लेखक थे, जिन्होंने अपनी जातीय परम्परा का गहन अध्ययन ही सिर्फ नहीं किया था, उसे आलोचनात्मक दृष्टि से भी देखा था. उन्होंने वेदों से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक के संस्कृत-साहित्य की निरन्तर प्रवाहमान धारा का अवगाहन किया था एवं उपयोगिता तथा कलात्मक योगदान के प्रति एक वैज्ञानिक नजरिया अपनाया था. जब द्विवेदी जी देखते हैं कि वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा बढ़ रही है, लोग वेदों का अध्ययन न कर इसे ईश्वरकृत मान सिर्फ पूजन-आराधन कर रहे हैं, तो वे क्षुब्ध होते हैं. उनके शब्द देखिए- ‘‘वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान ही बना डाला है. हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं अमुक शहर में ‘वेद भगवान’ की सवारी निकली. अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ.’’

उस समय क्या आज भी यह मान्यता बहुतेरे लोगों में मिलेगी कि ‘‘वैदिक ऋषि मंत्र-द्रष्टा थे. उन्होंने योगबल से ईश्वर से प्रत्यादेश की तरह वैदिक मंत्र प्राप्त किये हैं.’’ द्विवेदी जी इस मान्यता का खण्डन करते हुए आगे लिखते हैं- ‘‘यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुएं में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथ्वी आदि की स्तुति कर रहा है. कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए. कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए. कोई बहुत-सी गायें मांग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र. कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है. कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं. कहीं मांस का उल्लेख है, कहीं सुरा का. कहीं द्यूत का. ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है. सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है. ये सब तो वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं. ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही मांगने की कोई जरूरत नहीं. यह ऋग्वेद की बात हुई. यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है. सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं. रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है. स्त्रियों को वश करने और जुए में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं. न ईश्वर जुआ खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है. ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है.’’

यह था उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उन्मेष, जो हिन्दी-साहित्य में पहले-पहल महावीर प्रसाद द्विवेदी के चिन्तन एवं लेखन के द्वारा प्रस्फुटित हुआ था. पाठक द्विवेदीजी के उपरोक्त मंतव्य से यह न समझें कि वे वेदों को निरर्थक समझते थे. उनका स्पष्ट मत था कि वेद पूजा-पाठ करने की चीज नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक महत्त्व के ग्रंथ हैं. वेदों का अध्ययन हमें अवश्य करना चाहिए और इस दृष्टिकोण से कि ‘‘वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहां रहते थे, क्या किया करते थे- इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है.’’

इस प्रकार द्विवेदी जी वेदों से संस्कृत-साहित्य की जो परंपरा या इतिहास है, उस पर गवेषणात्मक, विवेचनात्मक एवं आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करते हैं. वे संस्कृत-साहित्य के महत्त्व पर विस्तार से विचार करते हुए बताते हैं कि संस्कृत-साहित्य विस्तृत एवं विविध आयामी है. 1891 ई. तक कोई चालीस हजार संस्कृत-ग्रंथों की नामावली तैयार हो चुकी थी. फिर भी कितने ही ग्रंथों के नाम तो उसमें शामिल ही नहीं हो पाये थे. इस विपुल साहित्य के शोध और अवगाहन के फलस्वरूप ही प्राचीन भारत का इतिहास-लेखन संभव हो सका. किन्तु यह कार्य विदेशी विद्वानों ने किया था. भारत के संस्कृतज्ञ इन ग्रंथों के प्रति अगाध श्रद्धा-भक्ति रखते थे. वे देव-स्वरूप हो गये थे. वेदों को तो ईश्वरकृत माना ही जाता था, रामायण, महाभारत, पुराण तो श्रद्धेय ग्रंथ थे ही, कालिदास, अश्वघोष, भारवि, श्रीहर्ष, दण्डी, बाणभट्ट आदि के ग्रंथों के प्रति भी यही भक्तिपरक अवधारणा थी. द्विवेदी जी ने इनकी ऐतिहासिकता को दृष्टि में रखकर तटस्थ विवेचन किया है और इनकी असंगतियों को भी दर्शाया है. बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हमारे देश में इस तरह के विचारकों का अभाव था. हिन्दी में सिर्फ पांडेय रामावतार शर्मा ही ऐसे विचारक थे जो द्विवेदी जी के समानधर्मा थे. उन्होंने लिखा है- ‘‘इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं. स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें.’’

द्विवेदी जी ने 1899 ई. में श्रीहर्ष के महाकाव्य ‘नैषधीयचरितम्’ पर अपनी पहली आलोचनात्मक पुस्तक लिखी- ‘नैषध-चरित-चर्चा’. यह हिन्दी में लिखी संस्कृत साहित्य पर पहली आलोचना-पुस्तक है. इसमें उन्होंने श्रीहर्ष के समय आदि का निरूपण करते हुए उनकी कविता का यथार्थ विवेचन किया है. इस विवेचन में श्रीहर्ष की काव्य-प्रतिभा का विश्लेषण करते हुए उन्होंने उनकी कमजोरियों पर भी ऊंगली रखी है. इस पुस्तक पर कई संस्कृतज्ञ विज्ञानों ने प्रत्यालोचना लिखी. इनमें प्रमुख थे- माधव प्रसाद मिश्र. ये उस समय काशी से प्रकाशित ‘सुदर्शन’ मासिक पत्रिका के संपादक थे. इन्होंने जून, 1900 ई. के ‘सुदर्शन’ में ‘नैषध-चरित-चर्चा’ की लम्बी समीक्षा लिखी और महावीर प्रसाद द्विवेदी पर बहुत सारे आरोप लगाये. द्विवेदी जी ने उनके आरोपों के उत्तर एक लम्बा लेख लिखकर दिया, जो अक्टूबर, 1900 ई. की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ. द्विवेदी जी का यह लेख संस्कृत-साहित्य के उनके गहन अध्ययन एवं संस्कृत-साहित्य के देशी-विदेशी विद्वानों के शोध-पूर्ण कार्यों का ब्यौरा देने वाला है. फिर उन्होंने लगातार संस्कृत-साहित्य का अन्वेषण, विवेचन और मूल्यांकन किया. उन्होंने संस्कृत के कुछ महान महाकाव्यों का औपन्यासिक रूप में हिन्दी में रूपान्तर भी किया, जिनमें रघुवंश, कुमार संभव, मेघदूत, किरातार्जुनीय प्रमुख हैं. श्रीहर्ष ने ‘नैषधीय-चरितम्’ में कुछ दिक्पालों और कलियुग को पात्र बनाया है. उन्हें कलियुग के वर्णन में कई दिलचस्प प्रसंग दिखाई पड़े, जिसे उन्होंने ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में वर्णन किया है. द्विवेदी जी श्रीहर्ष के कलियुग-प्रसंग के द्वारा वैदिक रीति-रिवाज या मान्यताओं को कलियुग यानी आज के पूंजीवादी चरित्र के बरक्स खड़ा करते हैं. दोनों में वाद-विवाद, तर्क-वितर्क होते हैं. द्विवेदी जी लिखते हैं- ‘‘इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है. वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है. वे रूढ़ियां उस समय रायज थीं. जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था. आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं. इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं. पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे. श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय.’’

द्विवेदी जी वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियां दर्शाने के लिए ही कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना करते हैं. कलियुग के एक प्रतिनिधि के कुछ आक्षेप वैदिक देवताओं के समक्ष इस प्रकार रखे जाते हैं- ‘‘आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है. जरा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है. वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली? आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं. वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो?’’ फिर अगला तर्क है जाति-शुद्धि एवं कुल की निष्कलंकता-विषयक. फिर उसी संदर्भ में आगे का तर्क- ‘‘स्त्री-संसर्ग को भारी पाप समझा जाता है. तुम इन्द्र को अहल्या की याद दिला देना. जिस काम में तुम्हारे राजा का इतना उत्साह उससे तुम्हारी इतनी घृणा! तुम पूरे राज-विद्रोही हो. पीनलकोड में राज-विद्रोहियों के लिए कितनी कड़ी सज़ा का विधान है, यह बात किसी वकील से तो पूछ लेते.’’ फिर अगला तर्क सुनिए- ‘‘तुम्हारे वेद कहते हैं, पाप करने से अगले जन्म में ताप और पुण्य करने से सुख होता है. पर इस जन्म में उसका उलटा प्रत्यक्ष देख पड़ता है. अगम्यागमन से सुख होता है या नहीं? अरे, फिर क्यों प्रत्यक्ष प्रमाण को न मानकर जन्म-जन्मान्तर की न देखी हुई कपोल कल्पित बातों पर विश्वास करते हो? इसका कहीं ठिकाना है कि मरकर फिर जन्म होगा. यज्ञों में हिंसा क्यों करते हो. हिंसा से पाप होता है या नहीं? वैदिक हिंसा से पाप नहीं होता, यह विचार क्या संदेह से खाली नहीं है?’’ फिर अगला आक्षेप- ‘‘जिस तरह हो सके सुख-प्राप्ति की चेष्टा करो. श्राद्ध में ब्राह्मण-भोजन से मृत प्राणी की तृप्ति होती है- ये सब धूर्तों की बातें हैं. उनकी प्रताड़ना के फंदे में पड़कर अपना सर्वनाश न करो. फूल को अगर तोड़ना ही है तो तोड़कर अपने सिर पर रखो- अपने ही ऊपर चढ़ाओ. पत्थरों पर क्यों उन्हें चढ़ाते फिरते हो? वाह री तुम्हारी मूर्तिपूजा! अरे मूर्खों, वेदों में और अधिक क्या रखा हुआ है? फिर उन पर इतनी श्रद्धा क्यों? तुम लोग तो पशुओं से भी गये-बीते जान पड़ते हो, क्योंकि ब्रह्मा आदि देवताओं और व्यास आदि द्विजों के बनाये ग्रंथों पर तुम आंख मूंदकर विश्वास करते हो. उन्होंने लिख दिया है- ‘गो प्रणमेत्’ अर्थात् गाय को नमस्कार करना चाहिए. बस, तुम लगे पशुओं के सामने हाथ जोड़ने. अरे क्या तुम गाय, भैंस से भी तुच्छ हो जो किसी के कहने मात्र से उनको नमस्कार करने दौड़ते हो? क्यों तुम व्यर्थ दान देते फिरते हो? दान देने से लक्ष्मी प्रसन्न नहीं होती. बलि ने सर्वस्व दान देकर क्या पाया? केवल बंधन! क्या तुम भी यही चाहते हो?’’ इस प्रकरण के अंत में यह संदेशः इन सब ढकोसलों को छोड़ो. ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ का अंतिम प्रसंग कलियुग का निषध देश के भ्रमण का है, जहां वह वैदिक कर्मकाण्ड के नाम पर ऐसे-ऐसे घृणित और कुत्सित कर्म होते हुए देखता है कि उसके मन में यह विचार उठता है- यह क्रिया-काण्ड तो भांड़ों का अकांडतांडव है. अश्वमेध-यज्ञ में, यजमान की पत्नी को, अश्व के प्रजोत्पादक अंग से, अपने अवयव-विशेष का संस्पर्श कराना पड़ता है. जिन वेदों में इस तरह की बातें हैं उनका कर्ता ईश्वर कदापि नहीं हो सकता. हां, किसी भांड़ ने उन्हें बनाया हो सकता है.

द्विवेदीजी श्रीहर्ष के कलियुग-प्रसंग का वर्णन कर वही अपनी पुरानी धारणा को दुहरा रहे थे- वेद ईश्वर निर्मित नहीं हैं. उनमें जो धर्म-कर्म, रीति-रिवाज, यज्ञ, देवी-देवता का चित्रण है, वह मात्र ऐतिहासिक दृष्टि से जानने-समझने के लिए- आचरण करने के लिए नहीं. जो लोग सनातन-धर्म की दुहाई वेदों को लेकर किया करते हैं, उन्हें वेदों के संबंध में द्विवेदी जी के किये गये विचारों को गहराई से समझना चाहिए. उनके इस तरह के क्रांतिकारी विचारों के कारण ही उन्हें नास्तिक कहा जाता था. अपने समय के संस्कृतज्ञ विद्वानों के इस आक्षेप का उत्तर वे ‘कथऽहम् नास्तिक’ शीर्षक संस्कृत भाषा में लिखी कविता में दे चुके थे. इसी संदर्भ में उनकी ‘विधि-विडम्बना’ कविता को भी पढ़ना चाहिए. वे तथाकथित देव-वाणी ही नहीं, ईश्वर की भी आलोचना करते हैं और अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हैं. ‘विधि-विडम्बना’ कविता ‘सरस्वती’ के मई 1901 ई. में प्रकाशित हुई थी. यह कविता ब्रह्मा या विधाता की आलोचना बड़े ही तीखे स्वर में करती है. इसके प्रारम्भ की ये पंक्तियां-

अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार

क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार।

आगे उन्होंने विधाता की विडम्बनाओं का मजाक उड़ाते हुए सृष्टि-रचना में हुई गड़बड़ियों को विनोद के लहजे में प्रस्तुत किया है-

नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं,

सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं?

घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक?

चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक.

दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है,

कुत्सित-कर्म्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है.

मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार!

तेरी चतुराई को ब्रह्मा! बार बार धिक्कार!!

शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार,

लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार!

इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है. जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं. अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं. अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता. धनी लोग मूर्ख और विद्वान लोग निर्धन होते हैं. ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार!

द्विवेदी जी को इसीलिए नास्तिक कहा जाता था और वह भी उनके प्रांरभिक साहित्यिक जीवन के समय ही. द्विवेदी जी की कविताओं में भी एक तीखा आलोचनात्मक स्वर जगह-जगह दिखलाई पड़ता है. उनकी अगस्त, 1901 ई. की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में उस समय के लेखकों का भरपूर मजाक उड़ाया गया है-

शब्द-शास्त्र है किसका नाम?

इस झगड़े से जिसे न काम,

नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है.

इधर-उधर से जोड़-बटोर,

लिखते हैं जो तोड़-मरोड़,

इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं.

अपनी पुस्तक की सानन्द

स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द,

अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं

निज मुख से जो गुण विस्तार

करते सदा पुकार-पुकार,

ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं.

किसी समालोचक के द्वार

सिर घिस-घिसकर बारम्बार

निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं.

द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं. उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं. वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं. वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं.

ऐसा अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था. और इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया. आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा. उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान रचना-कार्य किया. प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिलीशरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी.

द्विवेदी जी अपने अन्य समकालीन कवियों की तरह प्रारम्भ में ब्रजभाषा में कविताएं लिखते थे. जिस ब्रजभाषा में शृंगार और भक्ति की कविताओं की एक समृद्ध परम्परा रही है, उसमें उन्होंने पहले-पहल यथार्थवादी कविताएं लिखीं. ‘भारत-दुर्भिक्ष’ (1897) एवं ‘त्राहि! नाथ!! त्राहि!!!’ (1897) ऐसी ही कविताएं हैं. इन कविताओं में जीवन-यथार्थ का दारुण चित्रण हुआ है-

गली-गली कंगाल पेट पर हाथ दोऊ धरि धावैं,

अन्न अन्न पानी पानी कहि शोर प्रचण्ड मचावैं.

बालक, युवा, जरठ, नारी, नर भूख-भूख कहि गावैं,

अविरल अश्रुधार आंखिन ते बारंबार बहावैं.

अब इस तरह के चित्रण का निराला की ‘भिक्षुक’ आदि कविताओं से मिलान कर देखिए. इसी क्रम में आगे की पंक्तियां-

मिलै घास भूसा नहि ढूंढ़े मूसा घर तजि भागे

रुपिया अश्व, अठन्नी महिष, बैल चवन्नी लागे.

द्विवेजी जी की खड़ी बोली हिन्दी में लिखी पहली कविता है- ‘प्लेगस्तवराज’. यह गद्य में लिखी हुई हिन्दी की भी पहली कविता है. यह बेहद आश्चर्य का विषय है कि द्विवेदी जी खड़ी बोली हिन्दी में जो पहली कविता लिखते हैं, वह गद्य में और उसे कविता मानते हुए अपने कविता-संग्रह ‘काव्य-मंजूषा’ में स्थान भी देते हैं. इस कविता को बालमुकुन्द गुप्त ने 19 मार्च, 1900 ई. के ‘भारत मित्र’ में प्रकाशित किया था. गुप्त जी को यह बहुत पसंद भी था. उन्होंने लिखा है- ‘‘जितने लेख आपने ‘भारत मित्र’ में लिखे उन सब में यही हमें पसंद आया और इसी की बाहर से भी प्रशंसा हुई.’’ यानी ‘प्लेगस्तवराज’ कविता को उस समय काफी ख्याति मिली थी. इस कविता का विषय तो शीर्षक से ही स्पष्ट है. अब सवाल यह उठता है कि प्लेग नामक महामारी का स्तवन क्यों किया गया? स्तोत्र-काव्य की संस्कृत में एक लम्बी परम्परा है. स्वयं द्विवेदी जी ने स्तोत्र-काव्य लिखे थे. पर यह किस प्रकार का स्तोत्र-काव्य है? प्लेग की महिमा एवं उसके गुणों का गान करने से भाषा में एक विशेष प्रकार की भंगिमा पैदा हो गयी है, जिसका दर्शन हिन्दी में पहली बार इस कविता में दिखलाई पड़ता है. प्लेग की स्तुति करते हुए कहीं-कहीं अंग्रेजी राज की छवि उजागर होने लगती है, वह क्या अनायास है? ये पंक्तियां देखिए- ‘‘आप रसिकों के शहनशाह हैं. महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है. पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नकीब हैं. डॉक्टर आपके पार्षद हैं. सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है. वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएं किया करते हैं.’’ (यहां अरबी शब्द ‘नकीब’ का प्रयोग द्विवेदी जी ने किया है, जिसका अर्थ है- वह व्यक्ति जो किसी राजा-महाराजा की सवारी के समय आगे-आगे आवाज लगाते चलता है.) यह कविता संस्कृत से शुरू होती है और संस्कृत में ही समाप्त. बीच में हिन्दी रूप है. भारत में अंग्रेजीराज के स्थापित होने के बाद अकाल और महामारी पूरे हिन्दुस्तान में बहुत अधिक बढ़ गया था. इसके फलस्वरूप 19वीं शताब्दी में ही पचास लाख से अधिक भारतीय मर गये थे. द्विवेदी की ‘भारत दुर्भिक्ष,’ ‘त्राहि! नाथ!! त्राहि !!!’ तथा ‘प्लेगस्तवराज’ कविताओं में अकालपीड़ित और महामारी ग्रस्त वैसे ही हिन्दुस्तान का यथार्थ चित्रण है. अंग्रेजी राज में सामान्य भारतीय जनता लगातार भूख और कुपोषण का शिकार हो रही थी. उसकी दरिद्रता के पीछे यह कारण था-

धड़ाधड़ धार रुपयों की बही है

विलायत ओर सीधी जा रही है

ये पंक्तियां ‘स्वदेशी वस्त्र का स्वीकार’ कविता की हैं, जो ‘सरस्वती’ के जुलाई, 1903 ई. के अंक में प्रकाशित हुई थी. इसमें द्विवेदी जी बताते हैं कि असगर, विसेसर और काली जैसे श्रमजीवी इसलिए मर रहे हैं क्योंकि ग्रांट, ग्राहम और राली जैसे अंग्रेज अपना घर भर रहे हैं-

महा अन्याय हा हा हो रहा है!

कहें क्या कुछ नहीं जाता कहा है.

मरें असगर, विसेसर और काली,

भरे घर, ग्रांट, ग्राहम और राली.

द्विवेदी जी की साम्राज्यवादी विरोधी चेतना यहां मुखर रूप में प्रकट हुई है, जबकि ‘प्लेगस्तवराज’ में यह चेतना मौन रूप में विद्यमान है.

द्विवेदी जी ने बाल कविताएं भी लिखी हैं. इन कविताओं की भाषा सहज और सरल है. ऐसी ही एक कविता है- ‘प्यारा वतन’. इसकी कुछ पंक्तियां देखें-

‘‘कच्चा घर जो छोटा सा था

पक्के महलों से अच्छा था

पेड़ नीम का दरवाजे पर,

सायबान से था वह बेहतर

सब्ज खेत जो लहराते थे

दिल को वे कैसे भाते थे

फर्श मखमली जो बिछते हैं

नहीं मुझे अच्छे लगते हैं.’’

प्रायः द्विवेदी-युग की कविताओं को इतिवृत्तात्मक कहकर विद्वानों ने चलता कर दिया है. ऐसे विद्वानों ने यह नहीं गौर किया कि ये आधुनिक युग के प्रारम्भिक चरण की कविताएं हैं और आगे की कविता के प्रायः कई तत्त्व इनमें विद्यमान हैं. डॉ. रामविलास शर्मा ने छायावादी कवियों, और खासकर निराला की कविता के वे स्रोत ढूंढ़ निकाले हैं, जो द्विवेदी जी के यहां मूल रूप से विद्यमान हैं. परवर्ती आलोचकों में डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव भी इस बात को स्थापित करते हुए लिखते हैं- ‘‘साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्विवेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ. इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं. एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है. अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था.’’

द्विवेदी जी की कविताओं का ऐतिहासिक महत्त्व है. बीसवीं शताब्दी की कविता की भित्ति इन कविताओं की नींव पर ही खड़ी हुई है. उनकी कविताओं से उनकी मनःस्थितियां, विचारधारा एवं भावधारा का भी पता चलता है. उन्होंने आधुनिक कविता को न केवल ब्रजभाषा से मुक्त किया, वरन् शृंगार, अलंकार, समस्यापूर्ति और नायिका-भेद की पुरानी परिपाटी को ध्वस्त कर आधुनिक कविता के निर्माण के लिए एक साफ-सुथरे यथार्थवादी एवं प्रगतिशील रास्ते का निर्माण किया.

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आधुनिक भावबोध की कविताएं लिखने के साथ ही अपने वैचारिक निबन्धों के द्वारा आधुनिक युग की कविता के लिए पृष्ठभूमि तैयार की थी. इस सन्दर्भ का उनका पहला वैचारिक निबन्ध ‘कवि-कर्त्तव्य’ जुलाई, 1901 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ. वे इस निबन्ध में कविता के छन्द, भाषा, अर्थ और विषय पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत करते हैं. इस सन्दर्भ में उनका पहला और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विचार यह है कि गद्य और पद्य दोनों में कविता हो सकती है. कविता का लक्षण जहां कहीं पाया जाये, चाहे पद्य में, चाहे गद्य में, वहीं कविता है. फिर वे हिन्दी के कवियों से नये-नये छंदों को अपनाने का आग्रह करते हैं. जिन छंदों में पहले ही विपुल कविताएं हो चुकीं, उनके अलावा संस्कृत और उर्दू में भी कई लोकप्रिय छंद हैं, जिन्हें हिन्दी के कवियों को अपनाना चाहिए. वे हिन्दी कवियों से तुकों के बन्धन को छोड़ने का भी आग्रह करते हैं. वे कविता की भाषा सरल, बोधगम्य और बातचीत के स्तर पर रखने की सलाह देते हैं. वे कहते हैं कि गद्य और पद्य की भाषा भी एक ही होनी चाहिए. तात्पर्य यह कि कविता की भाषा अब ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली होनी चाहिए. वे कविता के भाव या अर्थ के संदर्भ में कहते हैं कि अर्थ-सौरस्य ही कविता का प्राण है. यदि यह है तो छंद-अलंकार के बिना भी कविता की सार्थकता है. वे कविता के दो प्रमुख उद्देश्य स्वीकार करते हैं- मनोरंजन और उपदेश. कविता में कोई न कोई संदेश अवश्य होना चाहिए, जिससे समाज को आवश्यक दिशा-निर्देश मिले एवं उसे पढ़ते हुए आनंद या मनोरंजन भी हो. ‘कवि-कर्त्तव्य’ का दूसरा भाग जनवरी, 1911 ई. की ‘सरस्वती’ में ‘कवि का कर्त्तव्य’ शीर्षक से ‘विद्यानाथ’ छद्मनाम से प्रकाशित हुआ था. इसमें भी वे कहते हैं- ‘‘कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊंचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए. केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है.’’ इस तरह वे ‘कला कला के लिए’ सिद्धांत को खारिज करते हैं. फिर वे कविता को ग्रहण करने के लिए ‘सहृदय’ की बात करते हैं. हिन्दी के कवियों का उल्लेख वे इन शब्दों में करते हैं- ‘‘कवि भी ‘धर्म-संस्थापनार्थाय’ उत्पन्न होते हैं. उनका काम केवल तुक मिलाना या ‘पावस पचासा’ लिखना ही नहीं. तुलसीदास ने कवि होकर वैष्णव धर्म्म की स्थापना की है, मत-मतान्तरों का भेद मिटाया है और ‘ज्ञान के पंथ को कृपाण की धार’ बताया है. प्रायः उसी प्रकार का काम, दूसरे रूप में सूरदास, कबीर और लल्लूलाल ने किया है. हरिश्चन्द्र ने शूरता, स्वदेश-भक्ति और सत्य, प्रेम का धर्म्म चलाया है. हिन्दी के जितने प्रसिद्ध कवि हैं उन्होंने देश, काल, अवस्था और पात्र के अनुसार ही कविता की है.

दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में उनका ‘कविता’ शीर्षक निबन्ध छपा. इसमें वे कविता को और गहराई से समझने का प्रयत्न करते हैं- ‘‘अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है. नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं. वही कविता है. चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक.’’ आगे वे ‘रामचरितमानस’ एवं श्रीधर पाठक के ‘एकांतवासी योगी’ की पंक्तियों का उदाहरण लेकर अपनी बातों को आगे बढ़ाते हैं. वे कहते हैं- ‘‘अन्तःकरण में रस उत्पन्न करके, और थोड़ी देर के लिए और बातों को भुलाकर, उदार विचारों में मन को लीन कर देना ही कविता का सच्चा पर्यवसान है. कविता द्वारा यह भासित होना चाहिए कि जो बात हो गई है वह अभी हो रही है, और जो दूर है वह बहुत निकट दिखलाई देती है.’’ इस लेख के अंत में वे कविता की विशेषताएं बताते हुए कहते हैं कि कविता में विश्रांति मिलती है. वह एक प्रकार का विराम-स्थान है. उससे मनोमालिन्य दूर होता है और थकावट कम हो जाती है. चक्की पीसते समय स्त्रियां, काम करने में मजदूर आदि परिश्रम कम होने के लिए, गीत गाते हैं. जैसे मनुष्यों के लिए गाने की जरूरत है, वैसे ही देश के लिए कविता की जरूरत है. प्रतिदिन नये-नये गीत बनते हैं और सब कहीं गाये जाते हैं. इसी नियमानुसार देश में समय-समय पर नयी-नयी कविताएं हुआ करती हैं.

यहां द्विवेदी जी ‘नयी कविता’ का प्रयोग कर रहे हैं. तात्पर्य यह कि हर समय कविताओं में नवीनता की उद्भावना आवश्यक है. कविता में रूप और वस्तु के स्तर पर परिवर्तन होते रहता है. एक समय की कविता अपनी पूर्ववर्ती कविता से नवीन होती है. यह नवीनता समय और जीवन के बदल जाने की द्योतक होती है. यहां आकर कविता का रूप काफी परिवर्तित हो जाता है. ‘कवि और कविता’ निबन्ध में वे बताते हैं कि कविता-प्रणाली के बिगड़ जाने पर यदि कोई नये तरह की स्वाभाविक कविता करने लगता है तो लोग उसकी निन्दा करते हैं. कुछ नासमझ और नादान आदमी कहते हैं, यह बड़ी भद्दी कविता है. कुछ कहते हैं यह कविता ही नहीं है. कुछ कहते हैं कि यह कविता तो ‘छन्दोदिवाकर’ में दिये गये लक्षणों से च्युत है, अतएव यह निर्दोष नहीं. बात यह है कि जिसे अब तक कविता कहते आये हैं, वहीं उनकी समझ में कविता है और सब कोरी कांव-कांव! इसी लेख में आगे वे स्थापित करते हैं कि कविता और पद्य में अन्तर होता है. ‘‘किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है. जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है. तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं. कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है. उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है. जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है. आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए. जिस कवि में प्राकृतिक दृश्य और प्रकृति के कौशल देखने और समझने का जितना अधिक ज्ञान होता है वह उतना ही बड़ा कवि भी होता है.

द्विवेदी जी ने ‘कविता’ शीर्षक निबन्ध में यह उल्लेख किया है कि देश में जैसे-जैसे सुधार अधिक होता है और विद्या-बुद्धि बढ़ती जाती है, वैसे ही वैसे कविता-शक्ति कम होती जाती है. रामचन्द्र शुक्ल ने इस बात को कुछ शब्द बदल कर रखा है कि सभ्यता के विकास के साथ कवि-कर्म मुश्किल होता जाता है. परन्तु द्विवेदी जी ने आगे चलकर इस मत का संशोधन किया है. उन्होंने कविता पर सबसे महत्त्वपूर्ण विचार ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में प्रस्तुत किया है, जो सितम्बर, 1920 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ था. इस निबन्ध में भारतीय एवं यूरोपीय कविता की परम्परा का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि जीवन की किन परिस्थितियों में एक खास प्रकार की कविता का जन्म होता है. समय के परिवर्तन के साथ कविता के भावों, विचारों और ढांचों में भी अन्तर होता जाता है. भाषा की उन्नति के साथ-साथ कविता की भी उन्नति होती है. विज्ञान के विकास से कला का हृास नहीं, प्रत्युत वृद्धि होती है. परन्तु कविता का सत्य विज्ञान या दर्शन का सत्य नहीं है और न उसमें वह सत्य है, जो किसी धर्म या मत विशेष से स्पष्ट किया जाता है. इसमें सत्य का प्रकाश कुछ दूसरी ही रीति से होता है.

पहले द्विवेदी जी मानते थे कि कविता का उद्देश्य मनोरंजन और शिक्षा देना है. परन्तु इस निबन्ध में वे अपने पुराने मत का संशोधन करते हुए कहते हैं, ‘‘कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है. उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे.’’ यहां द्विवेदी जी मानो भावी स्वच्छंदतावादी या छायावादी कविता की पृष्ठभूमि तैयार करते-से लगते हैं. इस निबन्ध के अंत में वे भावी कविता के स्वरूप पर विचार करते हैं. वे कहते हैं कि जब भावों की वृद्धि होती है तब भाषा में रूपान्तर होता है. जब कोई भाषा भाव ग्रहण करने में असमर्थ होती है, तब उसका अन्त हो जाता है और उसका आसन दूसरी भाषा ले लेती है. यही कारण है कि भाषा एक-सी कभी नहीं रहती.

यहां द्विवेदी जी का आशय भाषा के स्वरूप से है. यानी हर युग की कविता एक नये प्रकार का शब्द-विन्यास, एक नयी अभिव्यंजना या सर्जना, अन्ततः एक नयी भाषा लेकर प्रकट होती है. ‘‘प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं. इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं. इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है. इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है. भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का.’’ यह है कविता की प्राचीन परम्परा. इसके बाद कविता के भावी स्वरूप पर वे प्रकाश डालते हैं. ‘‘बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है. तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है. कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है. संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है. तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है. वह सान्त (स+अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है.’’ यह है छायावादी कविता की विशेषता, जो उस वक्त शुरू ही हुई थी.

इस निबन्ध के अंत में भावी यथार्थवादी एवं प्रगतिशील कविता का सौंदर्यशास्त्र प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं- ‘‘अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था. वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था. परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत का रहस्य सबको विदित होगा. जगत का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है. जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है. इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा.’’ यहां द्विवेदी जी ने ‘साधारण के सौंदर्य’ के उद्घाटन की जो बात कही है, वह उनके समय से बहुत आगे की बात है. द्विवेदी जी की इस स्थापना का श्रोत स्वयं उनका जीवन है. वे जहां एक ओर अपने समय में अपने विचारों के द्वारा एक युगान्तर उपस्थित कर हिन्दी भाषी क्षेत्र की जनता में नवजागरण की शुरुआत कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर किसानों के जीवन से घनिष्ठ रूप में जुड़े हुए थे. ‘सरस्वती’ के सम्पादन से अवकाश लेने के बाद उन्होंने अपने इलाके में ग्राम-पंचायत की स्थापना की थी और उसके सरपंच के रूप में किसानों की समस्याओं से गहराई से जुड़े रहे.

‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में जो स्थापना द्विवेदी जी ने की है, उसी को रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में शब्द बदल कर रखा है. द्विवेदी जी के शब्द हैं - ‘‘क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्चर्य नहीं.’’ अब रामचन्द्र शुक्ल के शब्द देखें- ‘‘देश में मुसलमानों का राज्य स्थापित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव-गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश न रह गया. इतने भारी राजनीतिक उलटफेर के पीछे हिन्दू जनसमुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी सी छाई रही. अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?’’ हालांकि इस स्थापना का खण्डन कई इतिहासकार कर चुके हैं. पर यहां महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह स्थापना द्विवेदी 1920 में कर रहे थे, जिसे 1929 के इतिहास में शुक्ल जी दुहरा रहे थे.

द्विवेदी जी के बहुत सारे विचार और काम आज भले ही अप्रासंगिक लग सकते हैं, परन्तु उनके समय में वे कितने क्रांतिकारी थे, यह हिन्दी साहित्य के इतिहास में गहरे उतरने वाले ही समझ सकते हैं. उनका एक प्रारम्भिक निबन्ध है- ‘नायिका भेद’, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई. के अंक में छपा था. इसमें वे बताते हैं, ‘‘राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं. दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे. दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे. नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे. इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं.’’

द्विवेदी जी के समय की कविता की एक स्थिति तो यह थी, दूसरी समस्यापूर्ति की थी. उनके समय में ही उर्दू वालों की नकल पर कवि-सम्मेलनों की शुरुआत हो चुकी थी, जिससे कविता की पतनशीलता और बढ़ गयी. जनवरी, 1926 ई. में कविकिंकर नाम से महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक एक लेख लिखा. इसके प्रारम्भ में वे महान कवियों की विशेषता बताते हुए कहते हैं, ‘‘प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता? वह रोते हुए को हंसा सकता है, सोते हुए को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है.’’ लेकिन इसके उलट बहुत सारे या बहुतायत में कवि थे जो समस्यापूर्ति, नायिका-भेद एवं शृंगारिकता की धारा बहा रहे थे और ऐसी कविताएं कवि-सम्मेलनों का आधार थीं. द्विवेदी जी कहते हैं, ‘‘अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है.’’

इन कवि-सम्मेलनों में एक प्रवृत्ति और जोर मारती हुए फिर से दिखाई पड़ने लगी थी और वह थी ब्रजभाषा की रीतिवादी कविता की पुनर्स्थापना. वे इस पर प्रहार करते हुए कहते है, ‘‘ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया. उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है. अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी. समय को उसकी चाह नहीं. यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं.’’ द्विवेदी जी के समय में ही कवियों में दलबन्दी शुरू हो गयी थी. ऐसे कवियों पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं, ‘‘कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें. कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े.’’ फिर वे भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं, ‘‘दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है. देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट- सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं. दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं. फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्चर्य?’’ आज हिन्दी के साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों में दलबन्दी की स्थिति चरम पर है. क्या इससे साहित्य और देश का भला हो सकता है? मई, 1927 ई. की ‘सरस्वती’ में द्विवेदी जी का ‘आजकल के हिन्दी-कवि और कविता’ शीर्षक प्रसिद्ध निबन्ध सुकविकिंकर छद्म नाम से छपा था, जिसमें छायावाद के नाम से प्रचलित रहस्यवादी, नकली एवं छद्म कविता की आलोचना है.

द्विवेदी जी ने नाटक-विधा पर विस्तार से चर्चा अपने लम्बे निबन्ध ‘नाट्य-शास्त्र’ में किया है जो स्वतंत्र पुस्तक-रूप में प्रकाशित है. अक्टूबर, 1922 की ‘सरस्वती’ में उनका प्रसिद्ध निबन्ध ‘उपन्यास-रहस्य’ प्रकाशित हुआ. इसके द्वारा वे उस समय रचे जा रहे सस्ते और भद्दे उपन्यासों का तीखे शब्दों में विरोध करते हैं. कारण यह था कि उपन्यासों का विपुल प्रकाशन व्यावसायिक मान्यता की देन था. वे लिखते हैं, ‘‘आजकल हिन्दी-साहित्य में उपन्यास-नामधारिणी पुस्तकों की भरमार हो रही है. जो यह भी नहीं जानता कि मानस-शास्त्र भी कोई शास्त्र है, जो यह भी नहीं जानता कि चरित्र-चित्रण किस चिड़िया का नाम है, जिसे इस बात की रत्ती भर भी परवा नहीं कि उसकी पुस्तक के पाठ से पाठक का चरित्र बिगड़ेगा या बनेगा, वह भी उपन्यास लिख-लिखकर नाम नहीं दाम उपार्जन करने की फ़िक्र में है.’’ आगे वे बताते हैं कि प्रकृत उपन्यास-साहित्य के जनन, उन्नयन और प्रचलन का श्रेय पश्चिमी देशों के लेखकों को है. उन्हीं ने साहित्य के इस अंग को कला की सीमा तक पहुंचा दिया है- उन्हीं ने इसे कला का रूप दिया है. उन्होंने उपन्यास-विधा का विश्लेषण-मूल्यांकन करने वाली यानी आलोचना की पुस्तकें भी लिखी हैं. आगे वे यह स्थापना रखते हैं कि जिन कथाकारों ने पश्चिमी देशों के उपन्यासों एवं इस विधा के विश्लेषणपरक ग्रंथ न पढ़े हैं, वे भी अच्छे उपन्यास लिख सकते हैं. ‘‘जिनको मनुष्य-स्वभाव का ज्ञान है, जो अपने विचार मनोमोहक भाषा द्वारा प्रकट कर सकते हैं, जो यह जानते हैं कि समाज का रुख किस तरफ़ है और किस प्रकार की रचना से उसे लाभ और किस प्रकार की रचना से हानि पहुंच सकती है, वे पश्चिमी पंडितों के (उपन्यास-सम्बन्धी) तत्त्व-निरूपण का ज्ञान प्राप्त किये बिना भी अच्छे उपन्यास लिख सकते हैं.’’ द्विवेदी जी उपन्यास-लेखन में मनोविज्ञान पर बेहद जोर देते हैं.किन्तु उनका मानना था कि, ‘‘घटनावली के निदर्शन और भावों की जड़ में मनोविज्ञान रहे जरूर, पर वह छिपा हुआ रहे. शरीर के भीतर जैसे अस्थिपंजर छिपा रह कह शरीर-संगठन में सहायता देता है वैसे ही मनोविज्ञान के नियमों को भी कथा-भाग के भीतर अलक्षित रखना चाहिए. जो इस खूबी को जानते हैं और जो अपनी रचना में नियमों के पचड़े को गुप्त रखकर चरित्र-चित्रण करते है उन्हीं के उपन्यासों का अधिक आदर होता है.’’ आगे उन्होंने उपन्यास के रहस्य का उद्घाटन करते हुए लेखक में आलोचनात्मक दृष्टि का होना आवश्यक बताया है. ‘‘जिसके मन के मानसिक भावों का विकास करना है उसके संस्कारों की, उसकी तत्कालीन अवस्था की, उसके आसपास की व्यवस्था की- सारांश यह है कि उसकी सम्पूर्ण परिस्थितियों की- आलोचना करना चाहिए.’’ अन्ततः उपन्यास-लेखन मुश्किल काम है. इतनी विघ्न-बाधाओं और कठिनाइयों के होते हुए, अच्छा उपन्यास लिख डालना सबका काम नहीं. उपन्यासकार को कल्पना के बल पर नयी, पर सर्वथा स्वाभाविक, रचना करनी पड़ती है और ‘‘उपन्यास-रचना के सम्बन्ध में, हिन्दी में तो, अभी कूड़े-कचरे ही का जमाना है और, आरम्भ में प्रायः सभी भाषाओं के साहित्य में यह बात होती है.’’ दूसरी ओर ‘‘उपन्यास-रचना अब तो पश्चिमी देशों में कला की सीमा को पहुंच गयी है. जो उपन्यासकार ऐसे उपन्यासों की सृष्टि करता है, जिसके पात्रों के चरित्र चिर काल तक सदुपदेश और समुदार शिक्षा देने की योग्यता रखते हैं वही श्रेष्ठ उपन्यास-लेखक हैं. वह चाहे तो राजा से लेकर रंक तक को और मजदूर से लेकर करोड़पति तक को कुछ का कुछ बना दे. वह चाहे तो बड़े-बड़े दुराचारी और कुसंस्कारों की जड़ें हिला दे. वह चाहे तो देश में अद्भुत जागृति उत्पन्न करके दुःशासन की भुजाओं को बेकार कर दे.’’

महावीर प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक विधाओं पर किये विचार का उद्देश्य नये रचनाकारों के सामने उसके सही स्वरूप की जानकारी प्रस्तुत करना था तथा उनमें आधुनिक विचारों का उन्मेष करना भी. उनके विचार उस वक्त प्रस्तुत किये गये थे, जब हिन्दी में आधुनिक चिंतन शुरू ही हुआ था. यह आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रारम्भिक दौर था, जब आधुनिक कविता, कहानी, उपन्यास आदि विधाएँ प्रारम्भ हो रही थीं. यह वह नींव थी, जिस पर सम्पूर्ण आधुनिक साहित्य का महल खड़ा हुआ आज दिखाई दे रहा है. कलात्मक दृष्टि से भले ही अपने परवर्ती साहित्य से यह कमजोर लगे, परन्तु वैचारिक रूप से यह ज्यादा परिपक्व और प्रगतिशील है. रामविलास शर्मा की यह बात बिल्कुल सही है कि हिन्दी के अनेक लेखक, वे लोग भी जो अपने को बहुत प्रगतिशील समझते हैं, कई बातों में द्विवेदीजी से पीछे हैं, आगे नहीं हैं.

जैसा कि महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में ख्यात है कि उन्होंने हिन्दी भाषा को परिष्कृत, परिमार्जित कर उसे आधुनिक स्वरूप प्रदान किया था. यह उनका एक ऐतिहासिक योगदान था. किन्तु उन्होंने हिन्दी को देशव्यापक भाषा बनाने के लिए संघर्ष भी किया था. उनमें अपनी मातृभाषा के प्रति अदम्य प्रेम था. वे मानते थे कि सुसभ्य, शिक्षित और जागृत देश अपनी

स्वाधीनता ही के सदृश अपनी मातृभाषा की रक्षा, जी-जान से, करते हैं. रक्षा ही नहीं, वे उसकी दैनंदिन उन्नति के लिए भी सदा सचेष्ठ रहते हैं. वे जानते हैं कि स्वाधीनता की रक्षा के लिए स्वभाषा की रक्षा और उन्नत्ति अनिवार्य है. पर अनेक कारणों से यह बात इस देश के निवासियों के ध्यान में बहुत समय तक नहीं आयी. 1907 ई. में उनकी ‘हिन्दी भाषा की उत्पत्ति’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई. इसकी भूमिका के प्रारम्भ में वे लिखते हैं, ‘‘कुछ समय से विचारशील जनों के मन में यह बात आने लगी है कि देश में एक भाषा और एक लिपि होने की बड़ी जरूरत है, और हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि ही इस योग्य हैं.’’ इस पुस्तक के लिखने के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए वे कहते हैं कि हिन्दी को देशव्यापक भाषा के रूप में स्वीकार करने को अहिन्दी-भाषी प्रान्तों के लोगों से कहने के पहले हमें इसका इतिहास सामने रखना जरूरी लगता है. हिन्दी भाषा की उत्पत्ति कहां से है? किन पूर्ववर्त्ती भाषाओं से वह निकली है? वे कब और कहां बोली जाती थीं ? हिन्दी को उसका वर्तमान रूप कब मिला? उर्दू में और उसमें क्या भेद है? इस समय जो और भाषाएं बोली जाती हैं, उनका हिन्दी से क्या सम्बन्ध है ?...हिन्दी-हितैषियों को इन सब बातों का जानना जरूरी है...और प्रान्तवालों की इन बातों से अभिज्ञ करना हम लोगों का सबसे बड़ा कर्त्तव्य है, क्योंकि जब हम उनसे कहते हैं कि आप अपनी भाषा को प्रधानता न देकर हमारी भाषा को दीजिए, उसी को देशव्यापक भाषा बनाइये, तब उनसे अपनी भाषा का कुछ हाल भी तो बताना चाहिए.

मार्च, 1923 ई. में, कानपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के अवसर पर द्विवेदी जी के वक्तव्य को पुस्तकाकार छपवाकर बंटवाया गया था, जिसे उन्होंने अपनी ‘साहित्यालाप’ नामक पुस्तक में ‘वक्तव्य’ शीर्षक से संकलित किया था. मैंने उसका नाम ‘हिन्दी’ कर दिया है. यह कई परिच्छेदों में है. इसके दो प्रारम्भिक परिच्छेद मातृभाषा पर हैं. वे ‘मातृभाषा की महत्ता’ इन शब्दों में निरूपित करते हैं- ‘‘जो अपनी भाषा का आदर नहीं करता, जो अपनी भाषा से प्रेम नहीं करता, जो अपनी भाषा के साहित्य की पुष्टि नहीं करता, वह अपनी मातृभूमि की उन्नति कदापि नहीं कर सकता. उसके स्वराज्य का स्वप्न, उसके देशोद्धार का संकल्प, उसकी देशभक्ति की दुहाई बहुत कुछ निस्सार है...मातृभाषा की उन्नति करके एकता, जातीयता और राष्ट्रीयता के भावों को जब तक आप विदेश तक में रहने वाले भारतवासियों के हृदय में जागृत न कर देंगे, तब तक आपके राजनीतिक मनोभिलाष पूरी तौर पर कदापि सफल होने के नहीं.’’

यानी मातृभाषा की सेवा, देश-सेवा और मातृभाषा का विकास देश के विकास और स्वाधीनता के सवाल से जुड़ा है. द्विवेदीजी इसका प्रमाण अनेक देश और उनकी भाषाओं का उदाहरण प्रस्तुत कर स्वराज्य और स्वभाषा के घनिष्ठ सम्बन्ध को उजागर करते हैं. उनका मानना है कि यदि अपनी भाषा गयी तो अपनी जातीयता और स्वाधीनता गयी ही समझिए. बिना अपनी भाषा की नींव दृढ़ किये स्वराज्य की नीव दृढ़ नहीं हो सकती. वे अपने समय में यह साफ देख रहे थे कि शिक्षित समुदाय, जिसे अपनी मातृभाषा के स्वराज्य के लिए संघर्ष करना चाहिए था और देशवासियों में जागृति लानी चाहिए थी, वह स्वयं अपनी मातृभाषा की सबसे अधिक अवहेलना करता था और अंगेजीदां होकर अंग्रेजी-राज के चारण की भूमिका अदा करने लग जाता था. कमोबेश यही स्थिति आज भी हमारे देश में है. द्विवेदी जी ऐसे लोगों को समझाते हुए कहते है- ‘‘जिनमें राष्ट्रीयता का भाव जागृत है, जो जातीयता के महत्त्व को समझते हैं, वे प्राण रहते कभी अपनी मातृभाषा का त्याग नहीं करते, कभी उसके पोषण और परिवर्तन के काम से पीछे नहीं हटते, कभी दूसरों की भाषा को अपनी नहीं बनाते. जिंदा देशों में यही होता है. मुर्दा और पराधीन देशों की बात मैं नहीं कहता, उन अभागे देशों में तो ठीक इसका विपरीत ही दृश्य देखा जाता है.’’

वे यह आशंका व्यक्त करते हैं कि स्वराज्य प्राप्ति के बाद भी क्या हिन्दुस्तान में अंग्रेजी की ही तूती बोलेगी? उन्होंने हिन्दी को देशव्यापक भाषा या राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए जो संघर्ष किया था, वह अब भी पूरी तरह फलीभूत नहीं हुआ है और आजाद भारत में अब भी अंग्रेजी की तूती ही बोल रही है, जो पराधीन मानसिकता की देन है. द्विवेदी जी के अलावा उस समय महात्मा गांधी ही एक ऐसे व्यक्ति थे जो देशी भाषाओं के स्वराज्य और राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे. उन्होंने महात्मा

गांधी के इस संघर्ष का ‘सरस्वती’ के द्वारा समर्थन किया था. वे देशवासियों को अपनी भाषा से प्रेम करने एवं उसे विकसित कर गरिमा प्रदान करने के लिए ज्ञान-विज्ञान, इतिहास-पुरातत्त्व एवं अन्याय विषयों तथा साहित्य की तमाम विधाओं को समृद्ध करने का बार-बार आह्वान करते हैं. उनके इस संदर्भ में किये गये विचार ऐतिहासिक सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण तो हैं ही, आज भी उनकी प्रासंगिकता बरकरार है.

हिन्दी भाषा की यह विशेषता रही है कि वह विभिन्न प्रान्तों में अलग-अलग तरह से बोली जाती है, यानी उसमें एकरूपता नहीं है. हर प्रान्तवासी का हिन्दी उच्चारण भी भिन्न तरह का रहा है. यह महावीर प्रसाद द्विवेदी के समय में और भी

अधिक था. उस समय जो हिन्दी लिखी जा रही थी, उसमें भी एकरूपता नहीं थी. हिन्दी के महत्त्वपूर्ण लेखक भी व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध लिखा करते थे. द्विवेदी जी ने हिन्दी भाषा की अनस्थिरता को दूर करने के लिए अपना ऐतिहासिक महत्त्व का निबन्ध ‘भाषा और व्याकरण’ नवम्बर, 1905 की ‘सरस्वती’ में लिखा. इस पर बेहद वाद-विवाद हुए. उस समय के प्रायः सभी लेखकों ने भाषा पर चले इस बहस में हिस्सा लिया और अपनी भाषा के प्रति सजग तथा संवेदनशील हुए तथा सही भाषा लिखने लगे.

महावीर प्रसाद द्विवेदी ‘ज्ञान राशि के संचित कोष’ को साहित्य कहते थे. उनकी ‘साहित्य’ की परिभाषा के अन्तर्गत विज्ञान, इतिहास-पुरातत्त्व, अर्थशास्त्र, भूगोल, समाज-शास्त्र आदि सभी विषय आ जाते थे. उनका मानना था- ‘‘यदि हमें जीवित रहना है और सभ्यता की दौड़ में अन्य जातियों की बराबरी करना है तो हमें श्रमपूर्वक, बड़े उत्साह से, सत्साहित्य का उत्पादन और प्राचीन साहित्य की रक्षा करनी चाहिए.’’ इतिहास की महत्ता वे इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं- ‘‘जो जातियां इतिहास में अपने पूर्व-पुरुषों के गौरव को रक्षित नहीं रखतीं, जो उनके कारनामों को भूल जाती हैं, जो अपने भूतपूर्व बल और विक्रम को विस्मृत कर देती हैं, वे नष्ट हो जाती हैं और नष्ट नहीं भी होतीं तो परावलम्ब के पंक में पड़ी हुई नाना यातनाएं सहा करती हैं...जिस जाति का इतिहास नष्ट नहीं हुआ और जिसमें अपने पुण्य-पुरुषों का आदर बना हुआ है, वही अपनी मातृभूमि के अद्यःपात से विदीर्णहृदय होकर, अनुकुल अवसर आने पर, फिर भी अपना नतमस्तक उन्नत कर सकती है.’’ इसी दृष्टि से उन्होंने इतिहास का अनुसंधान किया है. इतिहास-पुरातत्त्व पर किया गया उनका लेखन नवजागरण का आधार-स्तम्भ है.

द्विवेदीजी ने ‘सरस्वती’ में देशी-विदेशी अनेक साहित्यकारों, वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों, संगीतकारों, दार्शनिकों के जीवन-चरित लिखे थे एवं ‘सरस्वती’ में प्रकाशित किये थे. इस तरह का उनका लेखन भी आज इतिहास का एक अंग बन चुका है. इन जीवन-चरितों में काल के गर्त में पड़े कितने ही जीवन-सत्य और ऐतिहासिक तथ्य हैं, जो पढ़ते ही उजागर हो उठते हैं. ये अतीत के कई प्रसंगों को उजागर कर हमें जागरूक, सचेत और गौरवशाली बनाते हैं. ये एक प्रेरणा-स्तम्भ की तरह हैं जो जीवन-मार्ग में ऊंचे उठते कदमों को गतिशील किये रहते हैं. द्विवेदीजी का मानना था कि साहित्य के जितने अंग हैं उनमें इतिहास प्रायः सबसे श्रेष्ठ समझा जाता है. परन्तु किसी-किसी का मत है कि जीवन-चरित का महत्त्व इतिहास से भी बढ़कर है.

भारतेन्दु-युग के दो महत्त्वपूर्ण साहित्यकार एवं संपादक प्रताप नारायण मिश्र एवं बालकृष्ण भट्ट थे. भारतेन्दु एवं महावीर प्रसाद द्विवेदी के बीच की ये दो महत्त्वपूर्ण कड़ियां हैं. द्विवेदीजी ने विस्तार से प्रताप नारायण मिश्र एवं उनके ‘ब्राह्मण’ पत्र पर लिखा है. इस जीवनी में प्रताप नारायण मिश्र से प्रथम भेंट का बेहद रोचक ढंग से चित्रण किया गया हैं उनका यह शब्द-चित्र देखिए- ‘‘प्रताप नारायण अव्वल दर्जे के काहिल थे. उनके बैठने की जगह तक में कूड़े का ढेर लगा रहता था. अखबार, चिट्ठियां, कागज बिखरे पड़े रहते थे. उनके यहां आने-जाने वाले उनके मित्र, अगर उन्हें उठाकर जगह को साफ कर देते थे, तो कर देते थे. खुद प्रतापनारायण ने शायद ही कभी इनको उठाकर यथास्थान रक्खा हो. लोगों को चिट्ठियों का उत्तर तक वह बहुधा न देते थे...प्रतापनारायण का रंग गोरा था. नाक बहुत लम्बी थी. शरीर दुबला था. कमर जवानी ही में झुक गयी थी. आप सिर के बाल बड़े-बड़े रखते थे...प्रतापनारायण के स्वभाव में स्वच्छन्दता अधिक थी. वह हमेशा अपने ही रंग में मस्त रहते थे. उन्हें किसी की परवा न थी...वह सर्वथा मनमौजी थे. जब कभी कोई उनकी तबियत के खिलाफ कुछ कह देता या कोई काम कर बैठता, तब उसका भी जरा मुलाहजा न करके वह उसकी गोशमाली करने लगते थे. उनकी तबियत में जोश था. इससे कभी-कभी छोटी-छोटी बातों पर भी वह बिगड़ उठते थे. स्वदेशी चीजों और कपड़ों पर उनका अधिक प्रेम था. सादापन उन्हें बहुत पसंद था. वह हमेशा सादे कपड़े पहनते थे...हरिश्चन्द्र पर प्रतापनारायण की अपूर्व भक्ति थी. उनकी ‘कविवचन सुधा’ पढ़ते ही पढ़ते हिन्दी पर वह अनुरागशील हुए थे...प्रतापनारायण स्वतंत्र थे, फक्कड़ थे, हिन्दी और हिन्दुस्तान और कांग्रेस के परम् भक्त थे. अच्छे कवि, लेखक और उत्साही थे.’’

द्विवेदी जी द्वारा लिखित प्रतापनारायण मिश्र की जीवनी का उल्लेखकर डॉ. रामविलास शर्मा ने उनके व्यक्तित्व की तुलना निराला के व्यक्तित्व से सही की है. प्रतापनारायण के व्यक्तित्व की तरह निराला का व्यक्तित्व भी नाटकीय था. उनमें रुचि-विचित्रता थी. बेहद अस्तव्यस्त रहने वाले, बेपरवाह, स्वच्छंद, किन्तु ओजस्वी. इनसे ठीक विपरीत महावीर प्रसाद द्विवेदी का व्यक्तित्व था- सुसंयत, व्यवस्थित, ज्ञान के हर क्षेत्र में दिलचस्पी रखने वाला, अन्वेषी और जागरूक, अपने इतिहास के प्रेरक और गौरवशाली तत्त्वों का अवगाहन करने वाला. महावीर प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व से साम्य रखनेवाला, हिन्दी साहित्य में दूसरा व्यक्तित्व डॉ. रामविलास शर्मा का है. रामविलास जी ने द्विवेदी जी द्वारा लिखित ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा-पद्धत्ति की तुलना अपनी पंत पर लिखित एक समीक्षा से की है. द्विवेदी जी की तरह साहित्य, समालोचना, इतिहास-पुरातत्त्व, विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र में रामविलास जी की भी गहरी दिलचस्पी रही है और उन्होंने इन पर लिखा है. द्विवेदी जी ने अनेक जीवन-चरित लिखकर जिस विधा की शुरुआत की उसे रामविलास जी ने निराला की जीवनी लिखकर विकसित रूप प्रदान किया. द्विवेदी जी की तरह रामविलास जी भी प्रारम्भ में कविताएं लिखते थे. जिस तरह अलग या विपरीत व्यक्तित्व के होने पर भी द्विवेदी जी ने प्रतापनारायण की प्रतिभा का समादर किया, उसी तरह रामविलास जी ने निराला की महान् प्रतिभा का समादर किया.

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1885 ई. से लिखना प्रारम्भ किया था और 1928 ई. तक लगातार लेखन किया. उसके बाद उनका लेखन रुक गया. उनका देहावसान 21 दिसम्बर, 1938 ई. में हुआ. अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष उनके शारीरिक और मानसिक कष्ट में बीते. उनकी पत्नी का देहावसान 1912 ई. में हो गया था. संतानहीन थे. अपनी कारुणिक जीवन गाथा उन्होंने अब तक नहीं रखी थी. किन्तु 1928 ई. में उनके सबसे अभिन्न मित्र चिन्तामणि घोष का देहांत हो गया. उन्होंने सितम्बर, 1928 की ‘सरस्वती’ के ‘श्रद्धांक’ में जो अपना संस्मरण लिखा था, उसमें अपनी पीड़ा को पहली बार अभिव्यक्ति दी- ‘‘आज तक मुझे आत्मीयों की वियोग-जन्य बड़ी ही मर्मकृतन्तक व्यथाएं सहनी पड़ी हैं- एक दफे नहीं, कई दफे. यहां तक कि आज तक मेरे सभी कुटुम्बी, एक-एक करके मुझे छोड़ गये. मैं ही अकेला कूलद्रुम बना हुआ अपने अन्तिम श्वासों की राह देख रहा हूं. परन्तु, यह सब होने पर भी, कभी मैंने ‘सरस्वती’ में अपना रोना नहीं रोया, कभी दुखजनित विलाप नहीं किया, अदृष्ट ने मुझ पर कैसे-कैसे प्रहार किये, इस पर भी कभी कुछ नहीं लिखा. बात यह थी कि मेरी उस कष्ट-कथा से ‘सरस्वती’ का कुछ भी सम्बन्ध न था...परन्तु, आज, मुझे एक ऐसे पुरुष की निधन-वार्ता का उल्लेख करना ही पड़ेगा जो मित्र होकर भी मुझसे अभिन्न थे, पर-जन होकर भी मेरे स्वजन थे, अन्य-कुटुम्ब-भुक्त होकर भी कुटुम्बी-से थे. वह इसलिए भी करना पड़ेगा, क्योंकि उनका सम्बन्ध ‘सरस्वती’ से था. वही उसके जनक, वही उसके पालक और वही उसके उन्नायक थे. हतोत्साह किये जाने पर भी, हजारों रुपये का घाटा उठाने पर भी, और समय-समय पर, अनेक विध्न-बाधाओं का अविर्भाव होने पर भी उन्होंने ‘सरस्वती’ को जीवित ही नहीं रक्खा, उन्होंने उसे दिन पर दिन अधिकाधिक उन्नत करके औरों के लिए वह आदर्श उपस्थित कर दिया, जिसे देखकर इस समय हिन्दी साहित्य में और भी कितने ही अच्छी-अच्छी मासिक पुस्तकें अपने प्रकाश का प्रसरण कर रही हैं.’’

द्विवेदी जी और चिन्तामणि घोष में कई बातों की समानता थी. दोनों समय के पाबन्द, अध्यवसायी और सत्य पर अडिग रहने वाले थे. दोनों ने प्रारम्भिक दौर में रेलवे की नौकरी की थी. दोनों का सम्बन्ध प्रकाशक एवं सम्पादक के रूप में ‘सरस्वती’ से था और दोनों की मृत्यु भी 74 वर्ष की अवस्था में हुई. द्विवेदी जी के सबसे अभिन्न, पारिवारिक और आत्मीय चिन्तामणि घोष थे. उनकी मृत्यु के बाद उन्होंने लेखन से प्रायः विराम ही ले लिया.

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