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एक शाम अंतर्राष्ट्रीय शायर वसीम बरेलवी के नाम / सीमा असीम सक्सेना

6 मई 2014 शुक्रवार का दिन था। शाम के करीब पाँच बज रहे थे। उत्तर प्रदेश के शहर बरेली में इतनी भयंकर गरमी के बाद भी उस दिन काफी खुशगवार मौसम हो रहा था और होता भी क्यों न, आखिर मैं अपने शहर की पहचान के साथ अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर जाना पहचाना नाम, शायर वसीम बरेलवी जी से मिलने जो गयी थी। मैंने उनके प्रति जो छवि मन में बना रखी थी, वह उनसे मिलने के बाद पल भर में ही न जाने कहाँ गायब हो गयी कि पता ही न चला।

मैं वरिष्ठ साहित्कार र्निमला जी के साथ उनके घर गयी। कुछ संकरे और घुमावदार रास्ते से गुजर कर हम उनके घर के बडे से दरवाजे पर पहुँचे, हालाँकि उन्होनें हमें शाम छः बजे का समय दिया था, परन्तु उनसे मिलने की तमन्ना ने हमें अपने घर से जल्द ही निकलने को मजबूर कर दिया और हम उनके दिये समय से करीब आधा घण्टा पहले ही पहुँच गये। डोर वेल बजाई, तकरीबन दो मिनट के इंतजार के बाद एक तीस पैंतीस बर्षीय लडकी ने दरवाजा खोला और उसने हमें ड्राइंग रूम में ले जाकर बिठा दिया। काफी बडा सा रूम था, दो सोफे, एक मेज, साइड में लगी एक कार्नर टबिल, एक सैटी खूब बडा सा शोकेस। इसके साथ ही, दीवारों पर लगी, वसीम जी की पेंटिंग्स, कोलाज फैमिली चित्र सबकुछ इतना शानदार और भव्य।

दीवारों पर सजी वसीम जी की सारी पेंटिग्स, जो उनके चाहने वालों के द्वारा बना कर दी गयी थीं, उनमें एक पेंटिग तो बहुत ही खूबसूरत लग रही थी, जो झाडू की सींको द्वारा बनाई गयी थी। (जैसा कि उनकी बेगम साहिबा ने बताया कि, ‘वह पेंटिग उनके किसी चाहने वाले ने बनाकर दी थी ।) इसके साथ ही पूरे कमरे में अवार्ड, मोमेंटों आदि जो करीने से शोकेस, कार्नर टेबिल व सैटी के बीच के हिस्से में सजे हुए थे और दीवारो पर उनके चित्रों और पेंटिंग्स के अलावा उन्हें मिले हुए पुरस्कारों के छाया चित्रों से भरी हुई थीं, वावजूद इसके सब कुछ इतने करीने और सलीके से सजा हुआ था कि कहीं कोई बिखराव नही, कोई अस्त व्यस्तता नहीं। हम लोग जैसे ही जाकर बैठे थे कि वसीम साहब एक मिनट के अन्दर ही हमारे साथ आकर बैठ गये और मैने इस एक मिनट के बीच ही पूरे कमरे का मुआइना करने के साथ ही कई फोटो ग्राफस भी अपने मोबाइल के कैमरे में कैद कर लिए थे। उनके कमरे में आते ही ऐसा लगा मानों कमरे में प्रकाश कुछ ज्यादा हो गया हो। वे साधारण सा सफेद कुरता पायजामा और घरेलू चप्पल पहने हुए थे, आंखों पर गोल्डन चश्मा चढा था लेकिन चेहरे पर इतना तेज।

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उन्होने आते ही हमारी नमस्कार का जबाव बडी गर्मजोशी से दिया था, ‘‘और सीमा कैसी हो‘‘? इस सबाल के साथ बातचीत का सिलसिला भी शुरू कर दिया था। लगा ही नही कि मैं पहली बार उनसे मिलने आई हूं। इस बीच वही लडकी जिसने दरवाजा खोला था , हम लोगों के लिए पानी और वसीम जी के लिए पान, एक प्लेट में लेकर आ गयी थी। उन्होंने उस लड़की का नाम लेते हुए कहा कि ‘‘चाय ले आओ।‘‘

चाय आ गयी थी उन्होंने मुझे कहा, ‘‘सीमा आप इधर सामने वाली सीट पर आकर बैठो‘‘ , अपने हाथों से बिस्किट की प्लेट उठा कर मुझे बिस्किट खाने को कहा , और चाय नाश्ते के साथ ही शुरू हो गया बातचीत करने का सिलसिला। आज की राजनीति, देश के हालात और वर्तमान समस्यायें ।

उनके साधारण और पारिवारिक तरीके से बातचीत शुरू करने के कारण मैं अब तक काफी सहज हो गयी थी, क्योंकि उनको लेकर मैंने अपने मन में एक अलग छवि बना ली थी कि कहीं वे उर्दू या फारसी जवान में न बात करें, लेकिन वे तो ऐसे बातें कर रहे थे, जैसे हम अपने घर में किसी बुजुर्ग से बातें करते हैं । मैंने सबसे पहला सवाल उनसे यह किया!!

प्रश्न - सर, हमारा शहर बरेली बाँस, सुरमा, झुमका के लिए जाना जाता था, लेकिन अब अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर आपके नाम के द्वारा भी जाना जाता है!!

वसीम बरेलवी- देखो सीमा, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे नाम से बरेली की पहचान होगी, बल्कि मैंने स्वयं की पहचान बरेली से कराने के कारण ही अपने नाम के आगे बरेलवी शब्द का प्रयोग किया था और यह मेरा जोश, जनून और कुछ कर गुजरने की लगन ही थी कि मैं कर्म करता गया। फल की कभी इच्छा ही नहीं की, मेरा हमेशा से ही जीवन का उद्देश्य गीता का यह श्लोक , ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन्‘ रहा है।

आज तक कभी भी किसी चीज के पीछे नही भागा, अगर आपके पास काबिलियत है तो शोहरत घर चल के आयेगी। आप बस कर्म करते रहो, क्योंकि सच्ची मेहनत और लगन कभी ब्यर्थ नही जाती।

प्रश्न- पूरी दुनिया में लोग आपको जानते हैं। कैसा लगता है??

वसीम बरेलवी- दुनिया बहुत बडी है, उसके कंपरीजन में बरेली बहुत ही छोटा सा शहर है, फिर भी मुझे पहले पूरी दुनिया ने जाना, उसके बाद अपने शहर ने जाना। अच्छा लगता है, सब इज्जत देते हैं। मैंने पहले भी कहा, सीमा! कि मैं जाने पहचाने जाने के लिए कभी काम नहीं करता, बस एक जनून था, जो काम कराता रहा। कैसी भी परिस्थिति में, मैं बस काम करता ही रहा ।

प्रश्न-पुरस्कार, अवार्ड, सम्मान में कितना विश्वास करते हैं??

वसीम बरेलवी -मुझे कभी भी किसी पुरस्कार का या छपने का मोह नहीं रहा। मैं एम सी पी यू एल का वाइस प्रसीडेंट हॅू। वहाँ अनेकों किताबें छपती हैं, लेकिन मैंने कह रखा है कि मेरी कोई किताब नहीं छपेगी, इसके साथ ही पुरस्कार तो आज पैसों का खेल हो गया है। कुछ लोग आधा पैसा देकर पुरस्कार अपने नाम करवा लेते हैं लेकिन ऐेसे पुरस्कारों का क्या फायदा। बाहर के मुल्कों के कुछ राइटर तो ऐसे है जो पैसा देते हैं पुरस्कार पाने को।

प्रश्न-आज के माहौल में, जब पूरे देश में महिलाओं के प्रति बेहद अमानवीय व्यवहार हो रहा है। आज अखबार बलात्कार के मामलों से भरे रहते हैं। अभी बरेली मण्डल में ही छोटी छोटी बच्चियों के साथ इतने रेप कैसेज हुए हैं। बदायूं मण्डल में दो सगी चचेरी तहेरी दलित बहनों के साथ जो कृत्य हुआ ‘‘ सामूहिक बलात्कार के बाद, हत्या करके पेड पर टाँग दिया था‘‘ उससे पूरी दुनिया भर में छीछालेदर हो रही है इस विषय में आप क्या कहेंगे।

वसीम बरेलवी-आज देश में महिला उत्पीडन जोरों पर है। इसका सबसे पहला कारण तो संस्कार हैं, जिन्हें हमने आज के समय में आधुनिकता का लबादा ओढाकर संस्कारों को लगभग खत्म ही कर दिया है। हमें अपने वही पुराने संस्कार , वही विचार धारायें और वही इंसानियत को वापस लाना होगा, क्योंकि आज पूरे देश में फैली ये अमानवीयता कानून के द्वारा नहीं, संस्कारों से रूकेगी। संस्कारों के ताने बाने को फिर से मजबूत करना होगा। इसके लिए प्रशासन , मीडिया और समाज को मिलकर चोट करनी होगी। अकेले कानून के भरोसे रहकर महिलाओं की अस्मत की हिफाजत नहीं हो सकती। बेसिक रीजन के तौर पर अगर हम तीन चीजों पर अमल करते हैं, तो यकीनन कुछ हद तक तो सुधार अवश्य होगा।

1- आज तक की कोई भी राजनीतिक पार्टी देश की जनसंख्या को रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाई है। जनसंख्या कैसे रोकी जाये इस पर सबसे पहले कठोर कदम उठाये जाने चाहिए। पूरी दुनिया में कहीं भी जनसंख्या की समस्या नहीं है। आज देश की जो स्थितियाँ हैं उसके लिए आबादी बढ़ने का ही नतीजा है।

सब अपनी जगह पाने को बेताब हैं जैसे आपाधापी सी मची है कि किसी तरह वह हटे तो उसकी कुर्सी हथिया लें।

2- शराबखाने जहाँ शाम होते ही भीड़ जुट जाती है फिर कच्ची पक्की शराब पीने के बाद बेटी बहन का संबंध ही नजर नहीं आता। आज बाप बेटी को भी औरत की नजर से देखने लगा है। यह सब कुछ शराब पीने के ही तो नतीजा है अतः शराबखाने, भट्टीखाने बंद कराये जाने चाहिए।

3-फोन, टीवी, इण्टर नेट इन सबके खिलाफ जंग होनी चाहिए। क्या परोस रही हैं आज टीवी और फिल्में ? इंटर नेट चलाते हुए आज के बच्चे क्या देख रहे हैं ? इसके लिए माँ बाप का सतर्क रहना बेहद जरूरी है। छोटे-छोटे बच्चे आज हर समय कानों में मोबाइल लगाये दिख जायेंगे, जो कि खतरे की घण्टी है।

कमेटियाँ बनना चाहिए जिन्हें तहसील से लेकर ग्राम स्तर तक बढाये जाने की जरूरत है। खराब करने वाली चीजें , आबादी के प्रति जागरूकता व शराब खाने बंद होना बहुत ही जरूरी है। हमारा संवेदनशील देश भारत को , हमारी संस्कृति को फिर से जीवित करना होगा । आज माँ बाप के पास समय नहीं है कि वे अपने बच्चों को समय और संस्कार दे पायें । अपनी बात को इस शेर के माध्यम से समझाने की कोशिश करते हुए कहा--

घरों की तबीयत क्या आ गयी टी वी के हाथों में ,

कोई बच्चा अब बाप पर नहीं जाता!!

हम इतने गंभीर मुद्दे पर बात चीत कर रहे थे कि उनकी बेगम साहिबा आ गयीं कि डी आई जी साहब आये हैं और हमारी बातों के तारतम्य को तोडते हुए वे बाहर चले गये। हम दूसरे कमरे में आ गये। जहाँ पर उनकी पत्नि से वसीम जी के बारे में बहुत, सारी बातें की उन्होंने ही हमें बताया, कि कल सुबह की सउदी अरब की फ्लाइट है और रात तीन बजे के करीब वसीम साहब को घर से निकलना है। हम लोग वापस चलने वाले ही थे लेकिन मेरी ख्वाहिश थी कि अपनी किताब देते हुए एक क्लिक तो होनी ही चाहिए । ये बात उन तक पहुचाई गयी और वे उठकर आ गये, फिर एक नहीं, कई फोटो खिंचवाये। और हमें बाहर तक छोड़ने आते समय उन्होंने कहा कि ‘‘सीमा तुमसे हुई अधूरी बातचीत अवश्य ही पूरी होगी , हम सउदी अरब से वापस आकर तुमसे फिर से बात करेंगे।

मैं रास्ते भर यही सोचते हुए आयी कि धरती से और सभ्यता से जुडा इंसान हमेशा फलदार वृक्ष की तरह ही होता है।

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सीमा असीम सक्सेना, बरेली

09458606469

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