सोमवार, 23 जनवरी 2017

हास्य-व्यंग्य : अमरीकन जांघिया / नरेन्द्र कोहली

माथुर साहब खुली छत पर खड़े थे। सारा शरीर नंगा था। हनुमान जी के लंगोट के बराबर, छोटा-सा लाल रंग का जांघिया पहन रखा था।

मैं संकुचित हो गया, जैसे पेटीकोट में घर से गली में निकल आई किसी औरत को देखकर सकुचा जाता हूं। ऐसी स्थिति में मेरी दृष्टि उन पर नहीं पड़नी चाहिए थी। शायद वे बाथरूम से निकले थे, अभी भीतर जाकर कपड़े पहन लेंगे। पर, वे अपनी छत का मध्य भाग छोड़ आगे आ गए, ताकि गली में जिन कोनों से वे देखे नहीं जा सकते थे, वहां भी देखे जा सकें।

मेरे पोंगापंथी मन को बुरा लगा। मैं एक भले आदमी को, भरे मुहल्ले में, इस प्रकार नंग-धड़ंग खड़ा नहीं देख सका। आंखें झुका लीं, और चाल तेज कर दी।

अजी कोहली साहब! नजरें चुराए कहां आगे जा रहे हैं?'' वे सीढ़ियां उतर कर गली में आ गए।

मैंने अपने मन को डाटा, ''अबे नंगा यह है और शरमा तू रहा है। मर्द बन।'' ''आपसे कौन आंखें मिला सकता है माथुर साहब।'

''क्यों जी! ऐसी क्या बात है? ० उन्होंने अपने लाल जांघिए पर प्यार का हाथ फिराया। ''नंगे से तो खुदा भी घबराता है। हम तो फिर आपके मुहल्ले के एक आदमी भर हैं।''

उन्होंने अपने भद्दे, गुलगुल शरीर पर गर्वभरी एक दृष्टि डाली, अजी वह तो यूं ही जरा गर्मी लग रही थी, इसलिए बाहरी कपड़े उतार दिए।''

''हां साहब! आप लोगों को अधिकार है, जब चाहें, अमरीकनों के समान बीच चौराहे अपने कपड़े उतार दें।''

''आप तो मजाक कर रहे हैं।'' वे मेरे मजाक पर हंस पड़े, ''वैसे यह आपको मानना पड़ेगा, आजकल गर्मी बहुत पड़ रही है।''

''जब आप अमरीकन एम्बैसी में नहीं थे, तब तो आप सारी गर्मियां धोती-बंडी में ही काट देते थे।''

उनके चेहरे पर मलाल आ गया। अपने उन दिनों की चर्चा शायद उन्हें अच्छी नहीं लगी थी।

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''तब की बात और थी साहब! पर अब गर्मी सचमुच ही अधिक हो गई है।''

हां, हो तो गई है।'' मैंने कहा, ''अमरीका ठंडा देश जो ठहरा।''

वे हंस कर मुझे ऐसे टाल गए, जैसे कोई हाथ हिलाकर मक्खी उड़ा देता है।

अब तक मैं कुछ धृष्ट हो गया था। पूछा, ''इम्पोर्टेड है ''क्या ?''

और फिर मेरा तात्पर्य समझ, उन्होंने अपने लाल जांघिए को बड़े प्यार से सहलाया, ''हां! हमारी एम्बैसी के मिस्टर किथकिन अमरीका लौट रहे थे। अपना सामान वे ले जाना चाहते नहीं थे। उन्होंने अपनी चीजों की नीलामी की। उसी में से ले लिया है। ''

''काफी ऊंची बोली दी होगी।०

उनके स्वर में आकस्मिक आवेश भर उठा, अजी साहब! पूछिए मत। बोली तो यूं

ऊपर चढ़ रही थी, जैसे दिल्ली में जमीन के भाव चढ़े हैं। लोग टूटे पड़ रहे थे। मैं तो एकदम निराश हो गया था। पर लगता है, ग्रह अच्छे थे। भगवान ने सहायता की। हायेस्ट बिड मेरी ही रही।''

''न मिलता, तो आपको काफी तकलीफ होती।''

''हां। मन को समझा लेते कि अपनी किस्मत में ही नहीं था। पर मिल ही गया।''

वे अत्यंत प्रसन्न थे।

''फिटिंग बढ़िया है। मैंने मुग्ध दृष्टि से जांघिए को देखा।

''हां! काफी कंफोर्टेबल है।''

''कोई हिंदुस्तानी दर्जी तो ऐसी चीज क्या बनाएगा।

अजी राम का नाम लो।'' उन्होंने मुंह बनाया, ''यहां किस साले को कपड़े सीने

का शऊर है। पता नहीं क्यों करते हैं; लोग घास छीलते-छीलते कपड़े सीने लगते हैं।''

वे फिर जांघिए को निहारने लगे थे।

''इसी समस्या के मारे मैं धोती बांधता हूं। फिटिंग की तो समस्या नहीं है न।''

''हां। दर्जियों की जहालत से तो आप बच जाते हैं, पर सच पूछा जाए तो धोती कोई ड्रेस नहीं है। उसमें आदमी नंगा होता रहता है।०

'हां साहब! जांघिए की और ही शान है। और वह भी अमरीकन जांघिया। मैंने हथियार डाल दिए।

वे ऐसी मुग्ध दृष्टि से जांधिए को पी रहे थे, जैसे कोई नया प्रेमी अपनी प्रेमिका के

रूप को पीता है।

ऐसा शेड आपको भारत में नहीं मिलेगा।' मैंने फिर चर्चा आरंभ की।

''मैंने एक-एक दुकान छान मारी है।'' वे तुरंत मुझसे सहमत हो गए, ''ऐसा रंग तो दूर, इसके आसपास का भी कोई रंग नहीं मिला। खास अमरीकन फार्मूले पर बना हुआ है। अपने देसी रंग तो इसके पासंग भी नहीं हैं।''

''इसकी चमक लाजवाब है।''

अजी दो पतलूनों में भी इसकी चमक नहीं छिपती। नीचे पहनकर दफ्तर जाता हूं तो पतलून के भीतर से अपना रंग दिखाता है। बिना बताए ही सब लोग जान जाते हैं कि इम्पोर्टेड है।''

''पता नहीं हिंदुस्तानी लोग कपड़े में ऐसी चमक क्यों नहीं ला सकते। मैंने आह भर कर कहा।

अजी। ऐसी चमक लाने के लिए बड़ी डेवलप्ड इंडस्ट्री होनी चाहिए। अपना देश अभी बहुत पिछड़ा हुआ है।'' सहसा उन्होंने आवाज दबाकर भेदभरे स्वर में कहा, ''बिना ईमानदारी और कठिन परिश्रम के इंडस्ट्री आगे नहीं बढ़ सकती 1 और अपने यहां ईमानदारी तो ईमानदारी, कैरेक्टर ही सिरे से गायब है। आपसे क्या छिपाना... आप अपने ही आदमी हैं। मेरे सैक्शन में छ: अमरीकन हैं और हम दो हिंदुस्तानी। पर ऊपरी आमदनी केवल हम दोनों की ही है...।''

मैंने बड़ी करुण दृष्टि से उसे देखा, वह आदमी अपने अमरीकन जांघिए की प्रशंसा में अपने-आपको नंगा करता जा रहा था।

''आप इस जांघिए को पहनकर सोते भी हैं, या केवल गली में खडे होते समय ही इसे पहनते हैं? '' मैंने पूछ लिया।

''कभी-कभी पहन कर सो भी जाता हूं।'' वे आश्वस्त होकर मुस्कराए, ''सोने में एकदम तकलीफदेह नहीं है।''

''पर ऐसी शानदार चीज पहनकर सोने से क्या लाभ? '' मैंने टीका, 'जल्दी घिस जाएगा। इसे तो आपको केवल विशेष अवसरों के लिए संभालकर रखना चाहिए। ऐसे जांघिए कौन से रोज मिल जाते हैं।''

''आप कहते तो ठीक हैं कोहली साहब !'' वे मुझसे सहमत हो गए, ''पर इम्पोर्टेड चीज लेने का लाभ तो तभी है, जब उसका पूरा उपयोग किया जाए। मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो इम्पोर्टेड कपड़े वार्डरोब में टांगकर अपनी शान बढ़ाते हैं। मैं तो उनसे कसकर काम लेने के पक्ष में हूं...।''

''फिर भी, पहनकर सोने...।'' मेरा स्वर काफी पीड़ित था।

''बात यह है भाई जान।'' वे बोले, ''कि यह जांघिया मल्टीपर्पज है। इसे नाइट सूट के समान भी पहना जा सकता है, यह ईवनिंग सूट का काम भी देता है, इसे आप सूट के नीचे पहनकर दफ्तर भी जा सकते हैं। यानी जहां जैसे जो सूट करे।''

''तो यह अमरीकन पालिसी के अनुसार ही बनाया गया है।''

बिलकुल बिलकुल! !''

फिर इसे पहनकर सोने से आपको मच्छर नहीं काटते ?.

वे बड़प्पन से मुस्काए, ''अब देखिए फारेन ड्रेस पहनने से अपने देश की क्लाइमेट में कुछ-न-कुछ तकलीफ तो उठानी ही पड़ती है। मच्छर तो काटते ही हैं।''

''हां जी। ये एशियाई कीड़े-मकोड़े अमरीकनों का एकदम लिहाज नहीं करते। अब देखिए, वियतनामियों ने अमरीका की क्या गत बना रखी है। ''

वह तो पालिटिक्स की बात है। '' वे बोले।

अर्थात वह उनके जांघिए की बात नहीं थी। अत: उसमें उन्हें रुचि नहीं थी। ''भाभी के लिए आपने कोई अमरीकन ड्रेस नहीं खरीदा? आखिर उन्हें भी तो गर्मी लगती होगी। मैंने पूछा।

हें हैं। '' वे हंस पड़े, ''वे भी मुझसे इसी बात को लेकर नाराज हैं। पर कैसे खरीदता। मिस्टर किथकिन तो कुंवारे ही है। वैसे मैं सोच रहा हूं किसी को लिखकर सीधे वहीं से मंगवा लूं। ''

''जरूर-जरूर। '' मैंने सलाह दी, ''सीधे अमरीकन प्रेसिडेंट को ही लिखिए। वे तो कब से इस कोशिश में हैं कि सारे देश उनके जांघिए पहनने के लिए नंगे हो जाएं।''

''आपकी बड़ी आर्थोडाक्स थिंकिंग है। इसे आप नंगा होना कहते हैं। वे मेरी नादानी पर हंस दिए।

''नहीं। नंगा तो मैं हूं। आंखें उठाकर पूरी तरह आपकी ओर देख भी नहीं सकता।'' उन्होंने मेरी बात का एकदम बुरा नहीं माना। परोपकार की भावना से प्रेरित होकर तुरंत बोले, ''आपको पसंद हो तो आपके लिए भी कोई जुगाड़ लगाऊं। कुछ जांघिए रफू होने के लिए दर्जी के पास गए हुए थे। तब नहीं बिके थे, अब बिकेंगे। ''

'भगवान ऐसी मुसीबत की घड़ी न लाए। इतनी गर्मी का लगना राष्ट्रीय हित में नहीं है। ''

''आप तो बात को फिर पोलिटिकल लेवल पर ले गए।'' वे बोले, ''मैं तो दोस्ताना बात कह रहा था।''

''आपकी दोस्ती के पालिटिक्स को भी लोग समझने लगे हैं। ''

वे पहली बार पूरी तरह उदास हो गए। उनके चेहरे पर निक्सन की निराशा और क्षोभ था। एक काला देश, उनकी सहायता के प्रस्ताव को ठुकरा रहा था।

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(साभार - हिंदी हास्य व्यंग्य संकलन - राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत)

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