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विज्ञान-कथा / उस सदी की बात / कल्पना कुलश्रेष्ठ

प्लास्टिक के घनाकार टुकड़ों से बना यह अध्ययन-कक्ष था, जिसकी आकृति व आकार इच्छानुसार बदले जा सकते थे। खिड़कियों पर चढ़े काँच तापमान व प्रकाश की मात्रा को आवश्यकतानुसार नियंत्रित कर रहे थे। दीवार में लगी स्क्रीन पर जनवरी, 2595 की 21वीं तारीख रह-रहकर चक रही थी। कक्षा में रखे अत्याधुनिक कंप्यूटर के समक्ष बैठी सत्या प्राचीन सभ्यता व संस्कृति पर अपने शोध से संबंधित किसी सामग्री का अध्ययन कर रही थी। उसका बड़ा-सा सिर और दुर्बल शरीर 21वीं शताब्दी के मानव की तुलना में कुछ अजीब-सा लगता है। मस्तिष्क के अधिकाधिक और शरीर के न्यूनतम प्रयोग ने आज मानव-शरीर का अनुपात बदल दिया था।

आज विज्ञान उत्तरोत्तर उन्नति के ओर अग्रसर था, साथ ही मानव की जीवन शैली भी आद्योपांत बदल चुकी थी। राष्ट्र, धर्म और नस्ल की बनावटी सीमाएँ त्याग दी गई थीं। मानव मात्र मानव था और टुकड़ों में न बँटकर आज संपूर्ण पृथ्वी मानव का आवास बन गई थी। केंद्रीय सत्ता एक अत्यंत क्षमतावान कंप्यूटर ‘नियामक’ को सौंपी गई थी। व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए आज के समय की आवश्यकतानुसार मानव ने सर्वसहमति के आधार पर कुछ नियम-कानून बनाए थे, जिन्हें ‘नियामक’ में फीड कर दिया गया था। आवश्यकता पड़ने पर ‘नियामक’ मानव को दिशा-निर्देश जारी करता था और मानव अपनी भलाई के लिए तदनुकूल आचरण करता था। सहसा पिक-पिक की ध्वनि हुई तो सत्या चौंकी। सामने लगी स्क्रीन पर उसके घरेलू सहायक ‘रीबो’ का त्रिआयामी चित्र उभर रहा था।

‘‘नमस्कार सत्या जी, रात्रि के भोजन का समय हो गया है। कृपया भोजन-कक्ष मे आइए। आपके पति भी वहां उपस्थित हैं’

‘‘धन्यवाद रीबो, मैं अभी आती हूँ’’ कहकर सत्या उठ गई।

रीबो वस्तुतः घरेलू कार्यों के लिए पूर्णतया प्रशिक्षित एक रोबोट था। वैसे तो रीबोट बीसवीं शताब्दी से ही बनने प्रारंभ हो गए थे, पर तब वे भारी-भरकम, बेडौल और देखने में मशीन जैसे प्रतीत होते थे। आज ‘नियामक’ के निर्देशानुसार मानव चाहता था कि पृथ्वी पर उसके उपयोग में आने वाली प्रत्येक वस्तु सुंदर और सुघड़ हो, अतः आजकल के रोबोट सुंदर और सक्षम बनाए जाते थे। भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य करने के लिए उनमें विशेष सर्किट लगाए जाते थे, जिससे वे उस कार्य को पूर्ण कुशलता के साथ संपन्न कर सकते थे। वे डॉक्टर, माली या नर्स कुछ भी हो सकते थे सीमित कृत्रिम बुद्धि के कारण वे मानव के पूर्ण नियंत्रण में थे। सत्या भोजन-कक्ष में आई तो देखा, नवीन उसकी प्रतीक्षा में बैठा था। मेज पर लगी गोल कचौरियाँ और हलवा देखकर सत्या मुस्कराई। रीबो अब ये व्यंजन बनाना भली भाँति सीख गया था। प्राचीनकाल में भारत में बनाए जाने वाले व्यंजन सत्या ने ही उसे सिखाए थे। अपने शोध के दौरान उसे इन प्राचीन व्यंजनों की पाक विधियाँ हाथ लगीं थीं।

यों आजकल मानव प्रोटीन, वसा और विटामिनों से बने कैप्सूल खाकर अपने शरीर की ऊर्जा की आवश्यकता पूरी कर लेता था। जीवन इतना तीव्र और यांत्रिक हो चुका था कि भोजन करने के लिए मानव के पास न समय था और न ही इच्छा। सत्या और नवीन को उनके परिचित बहुधा इसी बात पर पिछड़ी और पुरातनपंथी विचाराधारा होने का ताना दिया करते थे, परंतु सत्या को क्रोध की अपेक्षा उन पर हँसी आती थी जो जिह्वा द्वारा स्वाद का अनुभव करना वे भूलते जा रहे थे।

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फलतः आज का मानव अपने पूर्वजों की भाँति सभी प्रकार के स्वाद अनुभव करने में सक्षम नहीं रह गया था।

‘‘तुम्हारे शोध का सबसे सुखद और स्वादिष्ट परिणाम यही रहा सत्या!’’ नवीन ने हलवा मुँह में रखते हुए चुटकी ली।

‘‘जानती हूँ, अभी मानव स्वाद के मोह से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सका है।’’ सत्या ने मुस्कराकर उत्तर दिया।

सहसा नवीन गंभीर हो गया।

‘‘सच कहना सत्या, प्राचीन सभ्यता का अध्ययन करने से तुम ऊबती नहीं क्या? पुरानी कब्रें उखाड़कर मुरदे देखना किसी को कैसा अच्छा लग सकता है।’’

‘‘नहीं नवीन, मनुष्य के लिए सदैव वही रोचक होता है जो अनजाना और अबूझ है। वर्तमान की चिर-परिचय दुनिया से परे अतीत की रहस्यमयी गहराई में झाँकना बहुत रोमांचक लगता है। 21वीं शताब्दी के परमाणु जैविक युद्ध से नष्टप्राय हुई सभ्यता के अवशेष समेटना और उन्हें एक सूत्र में पिरोना मुझे किसी सृजन से कम नहीं लगता’’ बोलते-बोलते सत्या कहीं खो-सी गई।

‘‘तुम्हें आज नहीं वरन् 21वीं शताब्दी में पैदा होना चाहिए था सत्या!’’ नवीन ने मुँह बनाते हुए कटाक्ष किया। सत्या चुप हो गई। नवीन उसको समझने में असमर्थ था। आज के युग का मानव था जो आगे ही आगे बढ़ता जा रहा था। पीछे मुड़कर देखने का उसे न चाव था और न ही अवकाश।

रात्रि नौ बजे सत्या व नवीन अध्ययन-कक्ष में अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे। सत्या आज संग्रहालय से प्राचीनकाल में पाए जाने वाले भिन्न-भिन्न देशों में बनने वाली फिल्म के कुछ अति दुर्लभ कैसेट लाई थी। इनका अवलोकन करती वह सोच रही थी कि प्राचीन मानव संगीत, नृत्य और कला आदि में कैसे आनंद व मनोरंजन खोज पाता था? आज के अति व्यस्त जीवन में यह सब बातें व्यर्थ समझी जाती थीं। मानव का साम्राज्य अन्य ग्रहों में स्थापित करना, आकाशीय प्राणियों के हमलों से पृथ्वी को बचाना और प्रगति की चरम सीमा छू लेने की चेष्टा करने में ही मानव का सारा समय व्यतीत होता था। मानव-जीवन में भावनाओं और व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए कोई स्थान नहीं रह गया था।

अचानक कक्ष में लगी स्क्रीन से पिक-पिक की ध्वनि आने लगी और रीबो का चित्र दिखाई दिया।

‘‘कृपया अपने कंप्यूटर को पृथ्वी के संचारी नेटवर्क से जोड़ें। महान् ‘नियामक’ आपको संबोधित करना चाहते हैं।’’ नवीन ने उठकर कंप्यूटर की ट्यूनिंग बदली। अब वह पृथ्वी के सभी कंप्यूटरों से संपर्क स्थापित कर संवाद प्रेषित कर सकता था। तुरंत स्क्रीन पर जलती-बुझती रोशनियां के मध्य ‘नियामक’ की मशीनी आवाज सुनाई देने लगी।

‘‘हमारी गणना के अनुसार अब आप दोनों को अपना परिवार बढ़ाने का निर्देश दिया जाता है। अपनी इच्छानुसार शिशु में अपेक्षित उच्च गुणों व लक्षणों का एक विवरण तैयार कीजिए और तद्नुसार जीन बैंक में भ्रूण बनवाकर मानव-जाति की नस्ल के उत्तरोत्तर सुधार के अभियान में हमारे भागीदार बनिए धन्यवाद।’’ इसके साथ ही ‘नियामक’ अदृश्य हो गया। नवीन उत्साहित हो उठा, ‘‘सुना तुमने सत्या, अब शीघ्र ही निर्णय करो कि तुम्हें कैसा शिशु चाहिए। मेरी राय में तो उसे अत्यंत सुंदर और बुद्धिमान होना चाहिए।’’

‘‘सुंदर तो 21वीं शताब्दी का मानव होता था, आदर्श आनुपातिक गठन वाला। आजकल जैसी बड़ी खोपड़ी और बेडौल शरीर वाला नहीं’’ सत्या ने टोका।

यों ही परस्पर वाद-विवाद करते हुए कंप्यूटर की सहायता से उन्होंने भावी शिशु का खाका तैयार कर लिया। वह सुंदर, कुशाग्रबुद्धि, धैर्यवान और खगोल वैज्ञानिक होना चाहिए। अगले दिन वे कार में बैठे जीन बैंक की ओर जा रहे थे। सडक़ पर वाहनों की बहुत भीड़ थी। आजकल के कप्ंयूटर-चालित वाहन सड़क पर लगभग एक इंच ऊपर चलते थे। सड़क और वाहन दोनों के स्पर्श होने वाले भाग, चुंबक के समान ध्रुवों की भाँति कार्य करते थे, अतः वे एक-दूसरे को विकर्षित कर देते थे। परस्पर रगड़ न खाने के कारण घर्षण बल बहुत कम हो गया था। फलस्वरूप वाहनों की गति तीव्र हो जाने के साथ-साथ पहियों की आवश्यकता भी समाप्त हो गई थी।

भावी शिशु के विषय मं बात करते-करते उन्हें पता ही न लगा कि कितना समय बीत गया और जब उनका ध्यान भंग हुआ तो कार जीन बैंक की इमारत के सामने रुक चुकी थी। कई सौ फीट ऊँची विशाल और भव्य इमारत थी। कंप्यूटर-संचार-व्यवस्था द्वारा यह पृथ्वी के सभी आवासीय

भागों से जुड़ी थी। मुख्य इमारतों में प्रवेश करने से पूर्व उन्हें कीटाणुनाशक कक्ष से गुजारा गया और इसके बाद शरीर को ढंकने वाली कीटाणुरहित पोशाक पहनाई गई। अंदर अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में मानव-गुणसूत्रों पर प्रयोग किए जा रहे थे। भिन्न-भिन्न गुणों के लक्षण प्रदर्शित करने वाले सभी जीनों को आज पहचाना जा चुका था, अतः दंपती मनचाहे गुणों, व्यवहार और व्यवसाय वाली संतान का भ्रूण बनवा सकते थे। मस्तिष्क का कौन-सा भाग किस प्रवृत्ति को उत्प्रेरित कर सकता है, यह भी अधिकांशतया जाना जा चुका था। परंतु फिर भी सदैव की भाँति बहुत कुछ शेष था जो अभी मानव को समझ से परे था।

प्रबंधक से परामर्श करने के बाद सत्या और नवीन ने जीन कंप्यूटर द्वारा पूर्व निर्धारित गुणों का भू्रण तैयार करवाया। सत्या का डिंबाणु और नवीन का शुक्राणु लेकर कृत्रिम रूप से उनका निषेचन किया गया और उसकी जीन संरचना में इच्छित परिवर्तन व सुधार किए गए, ताकि उससे उत्पन्न होने वाले शिशु में तदनुकूल गुण व व्यवहार प्रकट हो सकें। इसके पश्चात् तुरंत ही उसे कृत्रिम गर्भाशय में विकास हेतु स्थापित कर दिया गया।

चौबीसवीं शताब्दी से ही मानव-शरीर द्वारा गर्भ धारण करने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई थी। यह कार्य अब शरीर से बाहर बखूबी संपन्न हो कसता था। छब्बीसवीं शताब्दी आते-आते स्त्री-शरीर में गर्भाशय की कोई उपयोगिता न हरने के कारण वह छोटा और अशक्त होकर धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा था और गर्भधारण के योग्य नहीं रह गया था। अब नौ माह तक शिशु का बोझ शरीर में वहन करने हेतु मानव-शरीर सक्षम नहीं था। शिशु के जन्म लेते ही रोबोट उसकी देखभाल करने लगते थे। माँ और पिता जैसे शब्दों के अर्थ अत्यंत सीमित हो चुके थे।

शिशु के विकास में लगने वाला समय धीरे-धीरे व्यतीत जोता जा रहा था। सत्या इस बीच अपने शोध में व्यस्त थी। शिशु के जन्म और देख-रेख से संबंधित सभी प्राचीन और समकालीन जानकारियाँ उसने प्राप्त कर ली थीं। वह यह जानकार हैरान रह गई थी कि प्राचीन काल में शिशु माँ के शरीर के अंदर विकसित होकर पीड़ादायक प्रसव द्वारा जन्म लेता था और उसे स्तनपान भी कराया जाता था। सत्या नहीं समझ सकी कि इतना धैर्य और इच्छाशक्ति मानव के पास कहाँ से से आ जाती थी। प्रेम और समर्पण की जो भावनाएँ मानव को बड़े से बड़ा कष्ट सहने के लिए प्रेरित करती थीं, उनके विषय में जानकारी तो उसे थी, परंतु उनकी वास्तविक अनुभूति से वह अनजान थी।

और आज शाम सात बजे से शिशु लेने के लिए जीन बैंक में उपस्थिति थे। थोड़ी देर बाद उन्हें प्रसव-कक्ष में पहुँचा दिया गया, जहाँ रोबोट डॉक्टर ने कृत्रिम गर्भाशय में स्थित शिशु को यंत्रों की सहायता से धीरे-धीरे बाहर निकाला। सत्या और नवीन अपनी इच्छाओं की साकार परिणति देखने के लिए उत्कंठित हो उठे। डॉक्टर ने शिशु के ऊपर लगी पोषक झिल्ली को काटकर अलग कर दिया। वे शिशु पर झुक गए....और.. आश्चर्यमिश्रित भय से उनकी पुतलियाँ फैल गईं। यह एक असाधारण और अनहोनी घटना थी।..... शिशु विकलांग पैदा हुआ था। जीन बैंक के कर्मचारियों में हलचल मच गई। सभी शिशु के पास स्तब्ध से खड़े थे।

‘‘संभवतः यह एक प्राकृतिक उत्परिवर्तन है’’ डॉक्टर ने मौन तोड़ा।

‘‘या मानव की कोई बड़ी भूल-चूक’’ नवीन ने ठंडे स्वर से कहा।

घटना की पूरी तरह जाँच करने पर पता चला कि कंप्यूटर वायरस से संक्रमित होने के कारण जीन कंप्यूटर ने यह भयंकर भूल कर दी थी, परंतु अब क्या किया जा सकता था? इस भूल का परिणाम तो नवजात शिशु की विकलांगता के रूप में सामने आ चुका था। अब अवांछित शिशु का क्या किया जाए? निर्देश लेने के लिए ‘नियामक’ से संपर्क स्थापित किया जा रहा था। विचलित-सी खड़ी सत्या समझ नहीं पा रही थी कि क्या करें? शिशु के विषय में पढ़ी गई पुरातन जानकारियाँ उसके मस्तिष्क में घूम रही थीं। किसी अज्ञात भावना के वशीभूत हो उसने शिशु को गोद में उठा लिया। छूते ही उसके चिकने व कोमल स्पर्श से वह सिहर उठी। सहज जिज्ञासावश उसने शिशु को अपने स्तन से लगाया और उसके क्षुधातुर अधरों का व्यग्र स्पर्श उसे रोमांचित कर गया। अनजानी-सी आदिम भावनाएँ उसके मन में जागने लगीं। दूध में रिक्त स्तनों को चुसुर-चुसुर चूसता शिशु उसे भावनाओं के तीव्र भँवर में खींचे लिए जा रहा था और वह इस अनोखी अनुभूति के उद्दाम वेग को रोकने में स्वयं को असमर्थ पा रही थी।

‘‘ओह नवीन, यही है प्रेम की वह अद्भुत भावना, जो प्राचीन मानव की प्रेरणा बनती थी यह शिशु मेरे हृदय और शरीर का एक अटूट भाग है, जिसके बिना मैं अपूर्ण हूँ। मातृत्व की यह भावना कितनी आनंददायक और अनन्त अनुभव दे रही है!’’ भावोद्वेग से सत्या को कंठ अवरुद्ध हो गया।

‘‘यह कैसी मूर्खतापूर्ण बातें कर रही हो सत्या? हम इस शिशु को वापस कर जीन बैंक से हर्जाना वसूल करेंगे’’ नवीन बोला। ‘नियामक’ से संपर्क स्थापित हो चुका था। स्क्रीन पर उसके स्पष्ट आदेश गूँज रहे थे।

‘‘मैंने तुम्हारी बातें सुनी हैं सत्या! ध्यान रहे, आज विज्ञान का लक्ष्य मानव की नस्ल में निरंतर उन्नति करना है, अवनति नहीं। इस सदी के बुद्धिमान, स्वस्थ और सामर्थ्यवान मानव-समाज में यह विकलांग शिशु अनुपयुक्त है। कुरूपता और विरूपता पृथ्वी से सदैव के लिए समाप्त की जा चुकी है। अतः इस शिशु के लिए कहीं कोई स्थान नहीं....’’ कहते-कहते ‘नियामक’ रुका। सत्या साँस रोके सुन रही थी। आशंका से उसका दिल डूबा जा रहा था।

‘‘भावनाएँ मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देतीं, अतः इन्हे मन से पूरी तरह समाप्त कर दो और मानव-जाति के हित के महान वैज्ञानिक लक्ष्य को पूरा करने के लिए व्यक्तिगत इच्दा त्याग, सामूहिक चेतना के अनुसार कार्य करो। तुम्हें आदेश दिया जाता है कि इस शिशु को नष्ट कर दो। जीन बैंक पुनः तुम्हारी इच्छानुसार भ्रूण विकसित करेगा’’ इतना कहकर ‘नियामक’ अदृश्य हो गया। सत्या हतप्रभ-सी खड़ी रह गई। क्या सचमुच उसकी व्यक्तिगत इच्छा और भावना मानव-जाति के हित के प्रतिकूल है? विज्ञान तो सदैव सत्य का पक्षधर होता है, वह अनुचित निर्णय कैसे कर सकता है? फिर वह क्या करे? ‘नियामक’ का आदेश मान ले या अपने मन की बात सुने जा अब शिशु से अलग नहीं होना चाहता?

‘‘क्या सोच रही हो सत्या? चलो, इसे शीघ्र नष्ट कर दे’’ नवीन ने उसकी तंद्रा भंग की।

उसके साथ चलते-चलते सत्या को लगा कि विज्ञान से कहीं कोई चूक अवश्य हुई है। उसने मानव की नस्ल नहीं सुधारी, वरन् उसे हाड़-मांस का बुद्धिमान रोबोट बना डाला। क्या अंतर है दोनों में? दोनों ही तो भावनाशून्य हैं। अवसाद, भय और निराशा की गहन अनुभूतियों ने उसे घेर लिया।

‘‘इसे नष्ट करो सत्या!’’ वे लेजर टैंक के सामने पहुँच चुके थे जो कि व्यर्थ और त्याज्य पदार्थों को नष्ट करने में काम आता था। सत्या ने एक दृष्टि अपनी गोद में लेटे शिशु पर डाली। उसके स्तन से लगा हुआ वह सो गया। गहन तृप्ति की भावना उसके सरल, निर्दोष मुख पर झलक रही थी। इस बात से अनजान कि अभी विज्ञान के लक्ष्य की राह पर उसे बलि चढ़ना है, वह माँ की गोद में पूर्ण निश्चिंत हो मीठी नींद में खोया था।

यकायक सत्या आगे बढ़ी और शिशु को गोद में लिए हुए उसने लेजर टैंक में छलाँग दी। कुछ देर बाद सब कुछ यथापूर्व हो गया, परंतु पृथ्वी से मानव के अस्तित्व का अंतिम चिह्न भी आज समाप्त हो चुका था! बचे थे, तो हाड़-मांस के भावनाशून्य रोबोट।

 

(विज्ञान कथा - जनवरी - मार्च 2017 से साभार)

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