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शब्द संघान लब / होंठ / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

फारसी का एक शब्द है, ‘लब’। लेकिन अब तो यह हिन्दी में इतना रच-बस गया है कि कहना मुश्किल है कि यह हिन्दी का शब्द नहीं है। उर्दू शायरी तो लब से लबालब है।

लब यानी होंठ। होंठ ठेठ हिन्दी का शब्द है जो हिन्दी में संस्कृत के ओष्ट से आया है। संस्कृत में ओष्ट केवल ऊपर वाले होंठ के लिए प्रयुक्त होता है। नीचे वाले के लिए अधर शब्द है। लेकिन बोलचाल की हिन्दी में इस तरह का कोई सख्त भेद-भाव नहीं बरता गया है। ऊपर और नीचे दोनों के लिए ही होंठ शब्द ही इस्तेमाल किया जाता है। लब और होंठ ये दोनों ही शब्द भाषा की दृष्टि से अलग अलग हैं और इनमें कोई भाषाई समानता नज़र नहीं आती। लेकिन अंग्रेज़ी में ‘लब’ को ‘लिप’ (l-i-p) कहते हैं। लब और लिप दोनों की एक ही राशि है और उच्चारण की दृष्टि से भी ये एक दूसरे के बहुत नज़दीक हैं। इतना ही नहीं, जिस तरह “लब” का एक अर्थ किनारे, तट या कूल से भी है उसी तरह किनारे के लिए अंग्रेज़ी में lip भी इस्तेमाल होता है। इससे इस अनुमान और भी बल मिलता है कि संभवत: अंग्रेज़ी में “लब” का ही “लिप” हो गया होगा। आखिर लब कहें या लिप, दांतों के सामने का मांसल किनारा तो हमारे होंठ हैं ही ! लबे सड़क का अर्थ सड़क के किनारे से ही है इसी तरह अंग्रेज़ी में भी किसी भी वस्तु के किनारे या उसकी धार के लिए आमतौर पर ‘लिप’ शब्द का ही इस्तेमाल होता है।

अरबी फारसी के माध्यम से उर्दू में अनेक शब्द ‘लब’ आधारित हैं। लब-कुशा बात करने वाला है तो लब-कुशाई बात करने के लिए होंठ खोलना है। लब-चबा वह चना-चबेना, मेवा आदि, है जो हम बात करते समय चबाते रहते हैं। इसी तरह स्वाद के लिए हम जो चीज़ चाखते हैं उसे लव-चश कहा गया है। ऊपर तक भरी हुई चीज़ लबरेज़ या लबालब कहलाती है। होठों के ऊपर होंठ ‘लब-ब-लब’ हैं। प्याला जो शराब से ऊपर तक भरा है ‘लबरेज़े-मय’ है। लबे-खुश्क भी हो सकते हैं तो लबे-तर भी देखे जा सकते हैं। लबे-जू, लबे-आब, या लबे-दरिया नदी के किनारे को कहते है। हर इंसान के बात करने का ढंग – लबो-लहजा – अलग अलग होता है। किसी की बातें कड़वी लगतीं हैं तो महबूबा की कही कड़वी बात भी मीठी लगती है। होंठ जिनसे रस टपकता हो –लबे-शीरीं- हर किसी के नहीं होते। ग़ालिब कहते हैं –

कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब – गालियाँ खाके बेमजा न हुआ

आपको तमाम लोग ऐसे मिल जावेंगे जो सेवा और प्रेम आदि की बात तो खूब करेंगे लेकिन सिर्फ ‘लबों के हिलाने’ से यह संभव नही है। अंग्रेज़ी में ऐसी सेवा को “लिप-सर्विस’ कहा गया है। यह सिर्फ दिखावटी प्रेम या ठाकुर सुहाती है। ऐसा प्रेम केवल लबों तक ही सीमित रहता है। कई बार हम किसी अपनी भावना के दबाव में आकर अपनी बात कह नहीं पाते लेकिन हमारे लबों की जुबान, उनका थरथराना, असली बात अभिव्यक्त कर ही देता है। हमारी “देह-भाषा” में हमारे ‘लबों की जुबां’ भी सम्मिलित रहती है। शकील बदायूंनी का एक शेर है –

कल रात ज़िंदगी से मुलाक़ात हो गई - लब थरथरा रहे थे मगर बात हो गई

बोलते या बात करते हुए होंठ ‘लबे-गोया’ कहलाते हैं। लेकिन कोई अगर चाहे तो अपने लब बंद भी रख सकता है। लबों का बंद रखना मौन धारण करना है।

अंग्रजी में जिसे प्यार कहते हैं वह ‘लव’ है, उर्दू का लब नहीं है। लेकिन हम चूमते अपने लबों से ही हैं। इस तरह लव और लब में एक घनिष्ट सम्बन्ध देखा जा सकता है। लेकिन ज़ाहिर है इस सम्बन्ध का भाषा से कोई लेना-देना नहीं है।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी , सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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