रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

हास्य-व्यंग्य / सुअर के बच्चे और आदमी के / ज्ञान चतुर्वेदी

साझा करें:

झोपड़पट्टी की उस बेतरतीब बस्ती के पास रेंगता एक नाला है। सुअर के तीन बच्चे प्राय: उस नाले में किलोल करते पाए जाते हैं। एक किंचित बड़ा बच्चा...

झोपड़पट्टी की उस बेतरतीब बस्ती के पास रेंगता एक नाला है। सुअर के तीन बच्चे प्राय: उस नाले में किलोल करते पाए जाते हैं। एक किंचित बड़ा बच्चा है, शेष पिद्दीनुमा । वयस्क तथा बूढ़े सुअर भी उसी नाले में लोटते हैं अथवा किनारे की घास पर पड़े हुए अपने सुअर होने की नियति पर परिचर्चा आयोजित करते हैं। कीचड़ में लथपथ तीनों बच्चे, जब सुअर सा मुंह उठाए नाले में एक-दूसरे को ठेलते, गुरगुराते इस छोर से उस छोर तक छप-छप करते भागते हैं तब किनारे बैठे बूढ़े सुअर वात्सल्य रस में नहा जाते हैं (सुअर भी नहाते हैं) । ये बूढ़े सुअर प्राय: दार्शनिक मुद्रा में बैठकर यह सोचा करते हैं कि इन नादान बच्चों को कोई यह बताए कि सुअर के बच्चों तथा उल्लू के पट्टो, किस बात पर इतना किलोल कर रहे हो? नाले में ही कट जानी है तुम्हारी यह नश्वर जिंदगी । इन झोपडपट्टी के आदमियों जैसी हो गई है तुम्हारी जिंदगी--बूढ़े सुअर बस्ती की तरफ थूथन घुमाकर सोचते हैं। 'नादान तथा बेवकूफ नई पीढी . . : वे सोचते हैं और थूथन पर एक भद्दी मुस्कान लिए नाले के किनारे-किनारे टहलने निकल जाते हैं।

झोपडपट्टी के नाले वाले सिरे के पास से ही ऊंचे, भव्य तथा सुंदर मकानों और बंगलों का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। नाले और इन मकानों के बीच तीन-चार कूडे-कचरे के डिब्बे हैं। बंगलों का कचरा तथा जूठा इन डिब्बों में और उसके आसपास फेंका जाता है। घूरे का एक ढेर बन गया है वहां।

सुअर के इन तीन बच्चों का नाश्ता, लंच इत्यादि इन्हीं ढेरों पर होता है । भूख लगती है तो नाले से निकलकर वे इस ठसके से इन ढेरों की तरफ जाते हैं मानो बाथरूम से डाइनिंग लाबी में प्रवेश कर रहे हों । भरपेट कचरा खाकर कुदक्कडें लगाते वे पुन: नाले में गुलाटियां मारने लगते हैं। "अहा सुअर जीवन भी क्या है . . ." इन्हें देखकर ही किसी कवि ने ये पंक्तियां उचित कही हैं, या कह दी होती यदि कवि भी सुअर होता, अथवा सुअरों में भी दुर्भाग्य से यदि कोई कवि होता तो कह डालता यद्यपि अभी सौभाग्य से उनके बीच ऐसा नहीं होता है और ठीक ही नहीं होता है, वरना सुअरों की जिंदगी सुअर से भी बद्तर हो जाती।

[ads-post]

तात्पर्य यह है कि सुअर के इन बच्चों की अच्छी कट रही थी। अच्छी कट रही थी उनकी । | गंदे नाले से कचरे के डिब्बे तक सीमित सुअर-जीवन, जिसमें संत्रास तथा कुंठा गली के कत्तों द्वारा खदेड़ने पर पैदा होती और बेईमानी कचरे के डिब्बे के आसपास । प्रगतिवाद _ जहां नाले से डस्टबिन तक की यात्रा थी और प्रतिक्रियावाद कचरे में भोजन की तलाश को लेकर सिर फुटव्वल । जहां सुअर अपने बच्चों को नाले में छोडकर सुबह से गलियों में भटकने निकल जाते थे और सुअरनियां किसी पतिव्रता के ठसके से सुअरपति के पीछू-पीछू | सुबह से शाम, सुअरों की टोलियां इस झोपड़पट्टी की बस्ती में यहां-वहां डोलकर भोजन तलाशतीं और बस्ती के आदमी शहर की गलियों में रोजी तलाशते घूमते । सुअर और आदमी, दोनों भटक रहे थे । अच्छी कट रही थी पट्टों की। न भी कट रही हो, पर शहर में आम राय रही थी कि अच्छी कट रही है। खैर बात सुअर के उन तीन बच्चों की चल रही थी । उनकी निश्चित ही अच्छी कट रही थी और आगे भी कटती रहती यदि आदमी के तीन बच्चे उनके जीवन में नहीं आते । आदमी के जीवन में तो हजारों सुअर आते रहते हैं और उस पर विशेष प्रभाव नहीं पैदा करते, पर सुअर के बच्चों का आदमी के बच्चों से यह सीधा साक्षात्कार उनके जीवन के कीचड में हलचल पैदा कर गया। हुआ यूं कि एक दिन सुअर के ये तीन बच्चे.जब घूमते-घामते घूरे पर पहुंचे तो उन्होंने पाया कि आदमी के तीन बच्चे उस घूरे पर पहले से ही जमे हुए हैं। शुरू में तो, दूर से देखकर उन्हें यही लगा कि जैसे सुअर के ही तीन बच्चे हों, परंतु पास पहुंचने पर उन्होंने पाया कि वे बच्चे सुअरों से भी अधिक गंदे और किसी भी आम सुअर के बच्चे से अधिक दुबले-पतले थे। तब वे समझ गए कि हो न हो, ये बच्चे आदमी के हों। आदमी के बच्चे कचरे के ढेर को उलट-पुलटकर कुछ खोज रहे थे । सुअर की छोटी-सी खुपडिया--उन्होंने सोचा कि यूं ही कचरे से खेल रहे होंगे। हां भई, वरना आदमी के बच्चे का घूरे पर क्या काम? कोई सुअर है क्या कि लगा है घूरे पर! ऐसा सोचकर तीनों सुअर घूरे की तरफ बढ़े।

तभी वे एकदम से रुक गए। उनका दिल धक्क रह गया । जो दृश्य उन्होंने देखा उसे वे अपने संपूर्ण सुअर जीवन में नहीं भुला सकते थे। उनके खाली पेट से खाली दिमाग तक में एक बेचैन ऐंठन दौड गई। क्या देख रहे हैं वे? जो अपेक्षाकृत बड़ा किशोर सुअर का बच्चा था, उसने दोनों छोटे सुअरों को पूंछ के इशारे से अपने पीछे आ जाने को कहा । दोनों छुटके, बंटानी सुअर सीनियरे ; हिलायी के पीछे घुस गए और उसकी पिछली टांगों के बीच से भयभीत नजरों से देखने लगे। सुअर ने आंखें मिचमिचाकर देखा, फिर थूथन को घास पर रगइकर आंखें साफ की।

नहीं, यह सपना शुरू नहीं था। वह सही-सही देख रहा था।

उसने देखा कि आदमी के तीन बच्चे कचरे में से बीन-बीनकर कुछ खा रहे हैं। यह क्या मजाक हो रहा है सुअरों के साथ? यदि आदमी ही कचरा खाने लगेगा, तो हम सुअरों का क्या होगा? आदमी कब से सुअर हो गया? आदमी को यह क्या हो गया है--वह अपनें अधिकारों के लिए न लड़कर हम सुअरों के अधिकारों पर अतिक्रमण कर रहा है? "दुनिया के सुअर एक हो!" "जो हमसे टकराएगा, नाली में घुस जाएगा।" "सुअर का बच्चा जिंदाबाद, आदमी मुर्दाबाद।" "सुअर-सुअर भाई-भाई, आदमी तेरे खेलों को देख लिया और देखेंगे। नाले-नाले लोटेंगे, सुअर के बच्चे जीतेंगे।' "सुअर के बच्चे-जिंदाबाद" "हर कीचड़ नाले-कचरे में, संघर्ष हमारा नारा है।" ''जात से न बात से, सुअर लडेगा लात से" ऐसे नारे और हजारों अन्य नारे, जो किशोर सुअर ने चुनाव के दिनों में गंदे नाले की टट्टी पुलिया पर से गुजरती जीपों से उछलते सुने थे, आज उसके दिमाग में गूंज उठे। उसे लगा जैसे वह भी एक नेता हो गया है जिसके कुछ कर्तव्य हैं। उसने पीछे की तरफ घूमकर नारा उछाला-"सुअर के बच्चे . . .

किसी ने जिंदाबाद नहीं कहा।

बल्कि उसके दो अनुयायी उसकी टांगों के बीच डरकर और दुबक गए। उसे याद आया कि इन मासूमों ने तो चुनाव, नारेबाजी का वह माहौल देखा ही नहीं है। जब ये पैदा हुए थे तब अंतिम चुनाव इस देश में हो चुके थे। उसे लोकतांत्रिक देश में पैदा हुए उन सुअरों पर तरस आया जिन्हें लोकतंत्र की रक्षा में नारेबाजी तथा हुल्लड़ का महत्व ज्ञात नहीं था। उसने एक संक्षिप्त वक्तव्य प्रसारित किया कि सुअरों का लोकतंत्र खतरे में है। आज आदमी कचरे पर अधिकार जता रहा है, कल वह हमें नाले से खदेड़ देगा। उसने नारेबाजी का अर्थ बताते हुए अंत में जयहिंद से पूर्व कहा कि वह नारे लगाता कचरे के ढेर की तरफ बढेगा, वे नारे का जवाब नारे से देते पीछे-पीछे आएं।

"सुअर के बच्चे . . ."

"जिंदाबाद।"

तीनों सुअरों का पिद्दी जुलूस घूरे की तरफ चल

"जिंदाबाद-जिंदाबाद . . ."

"मुर बुर ... चींचीं ..

सुअर के बच्चों की टोली शोर मचाती डस्टबिन की तरफ चली । चीं-चीं या घुर-घुर के शोर से बस्ती गूंज उठी।

"अबे देख बे, सुअर के बच्चे . . ." शोर सुनकर कचरा बीनते आदमी के बच्चों में से एक ने कहा । तीनों बच्चे कचरा बीनना छोड़कर खड़े हो गए और सुअरों की तरफ देखने लगे। सुअर के बच्चों की टोली डरकर ठिठक गई । नारेबाजी बंद हो गई । 3.… अब एक तरफ सुअर के बच्चे खड्डे थे और दूसरी तरफ आदमी के \ | «भाग स्साले . . ." आदमी के एक बच्चे ने कचरे से एक ढेला उठाकर मारा।

"यह क्या बदतमीजी है . . ." बड़ा सुअर भागता हुआ चिंचियाया । छोटे सुअर काफी दूर तक भाग निकले । बड़े सुअर के सुअरत्व तथा नेतागिरी ने जोर मारी | वह रुक गया। अनुयायियों को पीछे छोड़कर वह तेज चाल से पुन: घूरे की तरफ आया।

"बड़ा ढीठ है यह सुअर . . ."

"लगा स्साले के एक जूता . . ."

बच्चे बोले । आदमी के एक बच्चे ने खाली हाथ से ही ठेला मारने की एक्टिंग की । बड़ा सुअर डरकर तीन-चार कदम पीछे भागा और रुक गया । आदमी के बच्चे सुअर को बेवकूफ बनाकर हंसने लगे । यहां तक कि आदमियों के इस मजाक पर पीछे खड्डे दोनों छोटे सुअर तक चीं-चीं करते हंस पड़े।

बड़ा सुअर अपने साथियों की अप्रतिबद्धता पर दुखी हुआ।

वह क्रोधित होकर चिंचियाता हुआ घूरे की तरफ दौड़ा, "क्या तमाशा मचा रखा है यह?" उसने आदमियों के बच्चों के ऐन सामने पहुंचकर थूथन ऊंची करके पूछा।

"देख तो रे इसकी हिम्मत . . ."

"हां है मेरे में हिम्मत । मैं आदमियों की तरह कायर नहीं?" उसने जवाब दिया।

"अब चिंचियाए जा रहा है . . ."

"हां, चीख-चीखकर सारे जमाने के सामने चिंचिआऊंगा । तुम लोगों की तरह अन्याय नहीं सहूंगा । तुम इन बंगलों में न घुसकर हमारे कचरे में भोजन तलाशने घुस सकते हो? कायर कहीं के . . ." सुअर फिर चिंचियाया और आदमी के बच्चों के और करीब पहुंच गया।

"अबे, लगा तो इसको लात, घुसा ही आ रहा है?"

एक लौंडे ने घुमाकर एक लात सुअर के पिछवाडे पर मारी और वह लुढ़कता हुआ 'अपने चिंया अनुयायियों के पास जा गिरा । सारी क्रांति हवा हो गई।

तीनों सुअर बचाओ, बचाओ करते नाले की तरफ भागे।

आदमी के बच्चे हंसते हुए फिर कचरे में से जूठन बीनकर खाने लगे।

उस दिन के बाद सुअर के बच्चे दुखी रहने लगे।

रोज बेचारे नाले से निकलकर छुप-छुपकर कचरे की तरफ जाते और पाते कि कोई-न कोई आदमी या आदमी का बच्चा वहां डटा है। उन्होंने पहचाना--सभी इन झोपडपट्टियों की बस्ती के रहने वाले आदमी थे। शुरू में दो-तीन सप्ताह देखने के बाद उनकी आशा टूट गई और वे भी अपने मां-बाप की तरह गलियों में भटककर कचरा तलाशने लगे। फिर भी कहीं कोई आशा थी, सो दिन में एकाध बार तीनों उन डिब्बों तक चक्कर मार आत्ते।

एक दिन उनमें से एक ने अपने सुअर पिता को आदमी का यह अजीब व्यवहार बताया तो वह हंसने लगा। (सुअरों के पिता आदमी के पिता से भिन्न होते हैं तथा अपने बच्चों से हंसकर भी बात कर लेते हैं)। उसने अपने बच्चे को बताया, "बेटा, खैर मनाओ कि सुअर का जन्म लिया। कचरा मिल जाता है, पेट पल जाता है, अभी छोटे हो, जब बड़े होगे और इस झोपडबस्ती में घूमोगे तो पाओगे कि आदमी कितना दुखी है। दुबले-पतत्ते, मरते अधमरे आदमी के बच्चों को देखकर तुम्हें ज्ञात होगा कि सुअर के बच्चे के रूप में तुमने कितनी ऐश की । न तुमने नन्हें हाथों से पालिश की पेटी ढोई, न हाथ-पांव तुडवाकर भीख मांगी | न तुमने होटल में प्लेटें धोकर मालिक के जूते खाए, न तुम डाक्टर की दुकान के सामने दवाई के अभाव में मरे। न तुम मिलावटी कचरा खाकर बीमार हुए, न ही पैदा होते ही रेलवे स्टेशनों पर सामान ढोने लगे । तुम बहुत अच्छे रहे सुअर के बच्चे कि तुम आदमी के बच्चे नहीं हुए।"

उस बच्चे ने शेष सुअर के बच्चों को बताया कि आदमी का बच्चा होना कितना खतरनाक काम है । उन्हें कुछ संतोष तो हुआ पर कचरे के डिब्बों का स्वादिष्ट जूठन हाथ से निकल जाने का गम सताता रहा।

ऐसे ही दिन गुजरते रहे। कि एक दिन बहुत-सी पुलिस, बुलडोजरों के साथ उस झोपडपट्टी बस्ती में घुस आई। सारे छोटे-बड़े सुअर भागकर नाले के दूसरे किनारे पर आकर दुबक गए। पर आदमी की बड़ी फजीहत हुई। बस्ती में बड्डी मारामारी हुई। पुलिस ने मार-मारकर आदमियों, औरतों तथा बच्चों को बस्ती से खदेड़ दिया । रोत्ते-पीटते आदमियों के झुंड, नाले पर बने टूटे पुल पर से टूटा-फूटा सामान लिए बस्ती में भाग निकले । बुलडोजर ने घूमकर बस्ती साफ कर दी । बरसात होने लगी और सारी बस्ती कचरा बनकर सुअरों के सामने नाले में बहने लगी। सुअरों की सहमी भीड़ भागते आदमियों को देखती रही। सुअर के वे तीन बच्चे भी यह दृश्य देख रहे थे। एक ने अपने उसी बुद्धिमान सुअर पिता से जिज्ञासा की, "यह क्या हो रहा है, पापा?" उन्होंने समझाया, "आदमी सुअर से अलग किस्म का प्राणी है बेटा । सुअर सारे एक जैसे होते हैं, पर आदमी नहीं। आदमी: दो तरह का होता है--अमीर तथा गरीब । गरीब बड़ा गंदा आदमी होता है, ऐसा अमीर मानते हैं। वे गंदी बस्तियां बनाकर शहर की शोभा बिगाड़ते हैं। इसीलिए बीच-बीच में इनकी बस्तियां उजाड़ दी जाती हैं, कुछ इस भागदौड में मरकर छुटकारा पा जाते हैं। जो बच जाते हैं, उनमें गजब की संघर्ष शक्ति होती है। वे पुन: बस्ती बना लेते हैं। फिर बुलडोजर आते हैं। . . . इनके साथ यही चलता रहता है। हम सुअरों से भी असुरक्षित भविष्य है इनका ।" बच्चों को एक बार पुन: प्रसन्नता हुई कि वे सुअर के बच्चे हैं।

तभी उनको आदमियों की भागती भीड़ में आदमी के वे तीन बच्चे भी दिखाई दिए, जिन्होंने इन्हें घूरे से बेघूरा कर दिया था । टूटे डिब्बे, टिन आदि सर पर लादे भयभीत और बीमार-से इन बच्चों को देखकर वे सुअर के बच्चे सहम गए। उन्हें उन पर दया आई। तभी सबसे छोटा सुअर का बच्चा बोल उठा, "अब अच्छा रहेगा, ये बच्चे नहीं रहेंगे तो अपुन कचरे के डिब्बे पर फिर आराम से खा सकेंगे . . ." किशोर सुअर के बच्चे ने घूरकर उसे देखा और डांटा, "शर्म नहीं आती तेरे को? इन बेचारों पर मुसीबत पड़ी है और तुझे अपनी सूझ रही है। आदमी को शर्म और दया न आए, पर हम तो सुअर हैं . . ." सुअरों की भीड़ स्तब्ध खड़ी रही और झोपडबस्ती की जगह बंजर रह गई। आज भी कचरे के वे डिब्बे वहीं हैं। कचरा, जूठन पड़ा रहता पर सुअर के वे तीन बच्चे उस तरफ फटकते भी नहीं । आदमी के उन तीन बच्चों के साथ आदमी ने जो क्रूर व्यवहार किया, उसके विरोध में वे इतना ही कर सकते हैं। उन्हें दु:ख है कि वे सुअर हुए, यदि आदमी होते तो वे इस अन्याय से लड़ते । ¦

परंतु, आदमी होते तो क्या वे सचमुच लड़ते?

--

(हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत से साभार)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
Loading...

-----****-----

-----****-----

---***---

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|नई रचनाएँ_$type=complex$count=8$page=1$va=0$au=0

|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3830,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,335,ईबुक,191,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2770,कहानी,2095,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,485,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,49,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,820,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,307,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1907,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,644,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,685,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,54,साहित्यिक गतिविधियाँ,183,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: हास्य-व्यंग्य / सुअर के बच्चे और आदमी के / ज्ञान चतुर्वेदी
हास्य-व्यंग्य / सुअर के बच्चे और आदमी के / ज्ञान चतुर्वेदी
http://lh5.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/TCGpehit9DI/AAAAAAAAIiM/MMiBPWezq8k/image_thumb.png?imgmax=200
http://lh5.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/TCGpehit9DI/AAAAAAAAIiM/MMiBPWezq8k/s72-c/image_thumb.png?imgmax=200
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2017/01/blog-post_13.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2017/01/blog-post_13.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ