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क्यों चुनते है हम अपराधिक छवि के नेताओं को? / आइ बी अरोड़ा

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राजनीति में अपराधिक छवि के लोगों का आना हम सब के लिए एक चिंता का विषय होना चाहिए, पर ऐसा है नहीं.

संसद के २०१४ के चुनाव के बाद, एक-तिहाई सदस्य ऐसे हैं जिन के विरुद्ध अपराधिक मामले हैं और इनमें से २१% तो ऐसे सदस्य हैं जिनके विरुद्ध गंभीर मामले हैं.

‘कार्नेगी इंन्डाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के ‘मिलन वैष्णव’ का मानना है कि लोग अपराधिक छवि के नेताओं को इस लिए चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसे नेता उनके लिए कुछ कर पायेंगे, खासकर ऐसे प्रदेशों में जहां सरकारी तन्त्र थोड़ा कमज़ोर  हो चुका है.

मिलन वैष्णव की बात कुछ हद तक सही हो सकती है,  पर मेरा मानना है की हम भारतीयों को इस बात से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता की जिस व्यक्ति को हम चुनकर लोक सभा या विधान सभा या पंचायत वगेरह में भेज रहे हैं उसका चरित्र कैसा है. न्याय की परिभाषा हमारी अपनी ही होती है जो समय और स्थिति के अनुरूप बदलती रहती है. क़ानून और व्यस्था में हमारा अधिक विश्वास नहीं है. दूसरे की सुख सुविधा की चिंता हम कम ही करते हैं.

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हम जब सड़कों पर अपनी गाड़ियां दौड़ाते हैं तो इस बात की बिलकुल परवाह नहीं करते कि हमारे कारण दुर्घटना में किसी की जान भी जा सकती है. कुछ दिन पहले जारी की गयी रिपोर्ट के अनुसार २०१५ में लगभग ५ लाख सड़क दुर्घटनाएं घटी जिन में एक लाख सतहत्तर हज़ार लोगों ने जान गवाई, अर्थात हर एक घंटे में कहीं न कहीं बीस लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई.

यह एक भयावह स्थिति है पर कितने लोग हैं जो इस बात को लेकर चिंतित हैं. हम अब भी वैसे ही सड़कों पर अपनी गाड़ियां दौड़ाते हैं जैसे दौड़ाते आये हैं. अधिकतर लोग तो सड़क पर किसी को रौंद कर या आहत कर पल भर को रुकते भी नहीं और दुर्घटना स्थल से तुरंत भाग जाते हैं. कोई विरला ही वहां रुक कर ज़ख़्मी की सहायता करता है. 

इस देश में सिर्फ २४ लाख लोग ही मानते हैं कि उनकी आय दस लाख से अधिक है. यह एक हास्यास्पद बात ही है. एन सी आर में ही दस लाख रुपये कमाने वालों की संख्या शायद २४ लाख से अधिक हो.  सत्य तो यह है की लाखों-लाखों  लोग आयकर से बचने के लिए आयकर रिटर्न भरते ही नहीं या फिर झूठे और गलत रिटर्न भरते हैं.

अपने आस पास देख लें, आपको सैंकड़ों ऐसे घर दिखाई दे जायेंगे जो नियम-कानून की अवहेलना कर बनाये गए हैं या जिनमें नियमों के विरुद्ध फेर-बदल किये गए हैं.

सरकारी कार्यलयों में आपके कुछ ही लोग दिखेंगे जो अनुशासन का पालन करते हुए पुरी निष्ठा और लगन के साथ अपना काम करते हैं. अधिकतर तो बस समय काटते हैं या अपने पद का दुरूपयोग करते हैं.

ऐसे कितने ही उदाहरण आपको मिल जायेंगे जो दिखलाते हैं कि  नियम, व्यवस्था, अनुशासन को लेकर हमारा व्यवहार बहुत ही लचीला है. इस कारण हम लोगों को इस बात से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता कि जिस व्यक्ति को हम अपना वोट दे रहें हैं वह एक अपराधी है या दल-बदलू है या उसका चरित्र संदेहास्पद है.

अगर ऐसा न होता तो इतनी बड़ी संख्या में अपराधिक छवि के लोग संसद, विधान सभाओं और दूसरी अन्य संस्थाओं के लिए न चुने जाते.  दोष राजनीतिक पार्टियों का उतना नहीं जितना नहीं हमारा है. हम अपने को दोषमुक्त मानने के लिए राजनीतिक दलों को दोषी ठहरा देतें हैं. इस कारण निकट भविष्य में स्थिति में किसी सुधार की आशा करना गलत होगा. 

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