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शबनम शर्मा की कविताएँ

श्रीकांत आप्टे की कलाकृति

बंधन
हम कब, कैसे बंध
जाते हैं
रिश्तों की डोर में
पता ही नहीं चलता,
रिश्ते नहीं टूटते,
हम हो जाते ज़ार-ज़ार,
टुकड़े-टुकड़े,
बस दिखता है हमें
सिर्फ वो लम्हा, जब
पहली बार बंधे थे हम
उस डोर से,
डोर, कब कच्ची हुई,
कब धागे अलग-अलग हो गये,
खिसक गई हमारे
पाँव के नीचे की ज़मीन,
चूर-चूर हो गया हमारा
अस्तित्व और मिल गये
हम मिट्टी में।


गरीब
आज बिलख रहा ग़रीब,
तड़प रहा ग़रीब,
रोटी ग़रीब की तो पहले
ही महंगी थी,
अब सोने की क्यों हो गई?
लम्बी-लम्बी कतारों में खड़ा
वो 90 वर्ष का बुजुर्ग,
जिसे सिर्फ अपने अंगूठे
पर मान था,
खिलाई थी उसने
कुटुंब को रोटियाँ,
आज उसकी रोटी क्यूँ उसका
नसीब हो गई,
रखे थे छन्नो ताई ने कुछ नेग
छिपाकर, लाड़ली के लिये,
आज उसकी झोली क्यों ग़रीब
हो गई,
लगानी चाही कीमत हीरों की,
कुँदन चाचा की चाँदी क्यों
लोहा हो गई।

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वो चूल्हा
घर में दूध की ज़रूरत
रात का समय
सोचा घूम भी आऊँ
व जुम्मन काका के
घर से ले आऊँ लोटा भर दूध,
पहुँची वहाँ, खटखटाया बाहर
का दरवाज़ा,
छोटी बालिका ने खोला,
लिवा गई मुझे अन्दर
बड़े से आँगन में,
देख मुझे जुम्मन काका खड़े हुए
कारण पूछ आने का, कर
इशारा बेगम को मेरे पास
बैठ गये
हैरान थी मैं देख,
सब बैठे थे चूल्हे के इर्द-गिर्द,
बच्चे चबा रहे थे दाने,
भून रहे थे आलू,
बुजुर्ग सेंक रहे थे आग,
पर सब खुश,
बतिया रहे थे,
कि इक ख्याल ने मुझे
झकझोर दिया,
कितनी ताकत है इस
चूल्हे में,
इसने जोड़ा है मुन्नी
से दादा तक इक ही
डोर में सबको।


मैं बदल गई हूँ
लोग कहते हैं,
मैं बदल गई हूँ,
क्या ये सच है?
नहीं, कभी नहीं,
बदला है मेरा वक्त,
बदली है मेरे चहुँ
ओर की हवा,
बदल नहीं, पर दिये हैं
ज़ख्म उन सबने,
जिन्हें समझा था
अपनों से भी अपना।
मेरा दिल, अब दिल
की बात भी नहीं मानता
मेरी क्या सुनेगा
क्या सवालों में घिर
जाती हूँ मैं,
जिस पर विश्वास किया
उसी ने हिला दी
मेरे विश्वास की नींव
कभी-कभी तो खुद पर भी
विश्वास नहीं होता,
लगता है मैं खुद को ही
धोखा दे रही
तो किसी और का क्या?
नहीं, मुझे ऐसा मत
कहो, मैं बदली नहीं
मेरा वक्त बदला है।


कतार
कल शाम मुट्ठी भर
सामान लेकर
घर में घुसा
तो सबकी प्रश्नवाचक
नज़रें उस पर टिक गई।
    न कह पाया एक भी शब्द,
    उसका बटुआ खाली हो गया था।
    बटोर कर बूढ़ी साँसें,
    टटोल कर अपना खिस्सा,
    चंद सिक्के रखे थे
    उसने सिरहाने के नीचे।
    आवाज लगाई थी बबुआ की दादी को
    माँगी थी अपनी पासबुक
सुबह सबसे पहले वह उठेगा,
जायेगा बैंक,
लायेगा पैसे, खरीदेगा ढ़ेरों सामान
देखेगा खुशी अपने परिवार के चेहरे पर
    लगा अलार्म सो गया,
    पता भी न चला, वह कब उठा व
    पहुँच गया, बैंक के सामने, कतार का
    मुखिया बन कर।
सोचा निबट जायेगा, सबसे पहले
व जायेगा घर, खायेगा नाश्ता सब संग,
    छः घंटे बीत गये, तख्ती लटका दी गई,
    ‘‘पैसे नहीं हैं’’ गिर गया वह, वहीं, कभी
    न उठने के लिये।
मच गया कोहराम, उसके घर में,
2 दिन सांत्वना दे सब चुप हो जायेंगे,
पर क्या वो जगह कोई भर पायेगा,
जो खाली हुई, बाबा की, भाई की, बापू की?

 

अत्याचार
जब तक पीर अपनी न हो,
तो महसूस नहीं होती,
    महलों में रहने वाले,
    क्या महसूस कर पायेंगे,
    छबिया की झोंपड़ी का दर्द,
    उसके बच्चों की शून्य
    में ताकती आँखें,
    आजकल तो उसे कोई भीख
    भी न दे रहा,
    चला रहे सब उन सिक्कों
    से काम, जो कभी भटकते
    थे कभी इधर, कभी उधर।
उस माँ की पीड़ा,
उस पत्नी का दर्द,
जिनका, बेटा, पति बैंक तक
पैसे लेने गया व सफेद
कफ़न ओढे आ गया।
और पैसे ही न थे घर में
उनके अन्तिम संस्कार हेतु।
    नहीं, कोई नहीं समझेगा,
    सब बातें कहानियाँ बन जायेंगी
    रोयेंगी तो सिर्फ वो आँखें,
    जिनको दर्द दे गये, वो जाने वाले
    क्योंकि अत्याचारी अपने
    अत्याचार को न महसूस कर
    रहे न कबूल।

--

शबनम शर्मा

माजरा, तह. पांवटा साहिब,

जिला सिरमौर, हि.प्र.

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