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शब्द संधान / जम जमा जाम जामा / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

हिन्दू मिथक के अनुसार ‘यम’ मृत्यु का देवता है। ‘य’ का उच्चारण ‘ज’ की तरह भी किया गाता है, सो ‘यम’ कहें या ‘जम’, बात एक ही है। यमदूत और यमराज भी जमदूत और जमराज पुकारे जा सकते हैं। यमुना जी जमुना जी कहलाती हैं। जमुना को जमना या जमन भी कहते हैं – “गंगो जमन”।

लेकिन क्या ‘जमघट’ भी ‘यमघट’ है ? हरगिज़ नहीं। जमघट में जो जम है वह ‘यम’ नहीं है। जमघट तो भीड़ है, जमाव है,जमावड़ा है, मजमा है। लेकिन आजकल हिन्दी में भीड़ या जमघट की बजाय, अंग्रेज़ी के प्रभाव में ‘जाम’ शब्द ज्यादह इस्तेमाल होने लगा है। सड़क पर ‘जाम’ लग जाता है। यातायात ‘जाम’ के कारण घंटों रुका रहता है। इस जाम का जम से (जिससे जमघट बना है ) कोई लेना-देना नहीं है। यह तो अंग्रेज़ी के ‘जैम’ (jam) से ‘जाम’ होकर हिन्दी में आया है।

ध्यातव्य है कि ‘जाम’ शराब के प्याले को भी कहते है। किसी की सेहत के लिए पिया जाने वाला प्याला “जाम-सिहत” कहलाता है। कहते हैं कि ईरान का जमशेद नाम का एक बादशाह अपने ‘जाम’ में दुनिया में होने वाली तमाम घटनाएँ देख पाता था। जमशेद को संक्षेप में जम भी कहा जाता है।

अरबी /फारसी में एक शब्द है – जम्हूर। जम्हूर जमात को कहते हैं। समाज या समूह को कहते हैं। इसी से जम्हूरियत बना है। जम्हूरियत सामाजिक एकता की भावना है। डिमोक्रेसी या प्रजा तंत्र के लिए उर्दू का शब्द जम्हूरियत ही है। जम- जम्हूर- जम्हूरियत।

जम शब्द में जब हम ‘ज’ के नीचे नुख्ता लगा देते हैं तो ज़म का अर्थ जम से बिलकुल अलग हो जाता है। ज़म अरबी भाषा में निंदा या बुराई को कहते हैं। यह फुहश (फोश) बकना है। लेकिन हिन्दी ज़म के इस निन्दापरक अर्थ को कभी अपना नहीं पाई। हाँ, ज़म-ज़म नाम नाम हमारी भाषा में खूब जाना-पहचाना है। ज़म-ज़म मुसलामानों के तीर्थ, काबा, के पास एक पाक कुआं है जिसका पानी पवित्र माना गया है। इसे आब-ए-ज़मज़म कहा गया है। ज़म यदि पवित्र है तो ज़म-ज़म बहुत पवित्र है। दो बार पवित्र है।

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‘जमना’ बेशक यमना नदी हो सकती है। लेकिन हिन्दी में ‘जमना’ क्रिया भी है। किसी पतली चीज़ का गाढ़ी या ठोस हो जाना उसका जम जाना है – जैसे दूध का दही हो जाना, पानी का बर्फ बन जाना, क्रमश: दूध और पानी का जम जाना है। वह थोड़ा सा दही जिसे दूध में डालकर उसे जमाते हैं शायद “जामन” इसीलिए कहलाता है। हिन्दी में जमना (जम जाना) केवल ठोस या गाढ़ा हो जाने के अर्थ में ही प्रयुक्त नहीं होता। इसके अनेक अन्य प्रयोग हैं। कभी कभी मेंहमान आकर आपके घर “जम” जाते हैं- टिक जाते हैं, देर तक रुके रहते हैं। नई नई दूकान धीरे धीरे “जम” जाती है, चल निकलती है। शुरू शुरू में लेखकों को कोई नहीं पूछता, लेकिन यदि उनमें प्रतिभा है तो धीरे धीरे उनका नाम “जम’ जाता है , शोहरत मिल जाती है। कोई भी काम सीखने में बेशक मुश्किलें आ सकतीं हैं लेकिन अभ्यास से हाथ “जम” जाता है, निपुणता प्राप्त हो जाती है। इतना ही नहीं धाक ‘जम’ जाती है; रोब ‘जम’ जाता है। रंग ‘जम’ जाता है। कभी कभी हम गुस्से में थप्पड़ और गूँसे भी जमा देते हैं। शहद में शकर नीचे “जम’ जाती है, तलहटी में लग जाती है। जमने के और भी उदाहरण जमा किए जा सकते हैं।

‘जमना’ और ‘जमा होना’ इन दोनों में बड़ा अन्तर है। जमा होना इकट्ठा होना है। भीड़ जमा हो जाती है। गणित में जमा जोड़ को कहते हैं। दो जमा तीन, पांच के बराबर होता है। जमा ‘कुल’ या ‘इकट्ठा’ के अर्थ में भी उपयोग किया जाता है। जमा पूंजी, जमा खर्च इत्यादि। धन जमा करना पैसा इकट्ठा करना है। जमा खाता बैंक की पास-बुक है जिसमे आपके जमा-खर्च का हिसाब होता है। हम बेंक में अपना पैसा ‘जमा’ करते हैं। हम किसी संस्था या व्यक्ति के पास पैसा या कोई भी चीज़ अमानत के रूप में भी जमा कर सकते है। जमा है तो जमा-कर्ता भी हैं, जमाखोर भी हैं और जमामार भी हैं। जमाखोर जमा पैसा मारने की फिराक में रहते हैं और अक्सर जमामार बन भी जाते हैं। जमादार सिपाहियों आदि, का मुखिया –हैड कान्सटबल-- होता है। सफाई कर्मचारियों की निगरानी करने वाले को भी जमादार कहा गया है।

जमाना, इसका एक अर्थ व्यवस्थित करना भी है। सजाना भी है। हम घर जमाते हैं, किताबें जमाते हैं –उन्हें सजाते हैं व्यवस्थित करते हैं। लेकिन इसी जमाने के “ज” में यदि नुख्ता लगा दिया जाए तो यह ‘ज़माना’ हो जाता है। ज़माने को जमाया नहीं जा सकता। वह तो बदलता रहता है।

जम, जाम और जमा से अलग ही एक शब्द है, जामा। संस्कृत में जामा बेटी को कहते हैं। इसी से जामाता बना है। जामाता कन्या का पति है। बोलचाल की भाषा में हम जामाता को जमाई भी कहते हैं। लेकिन फारसी में जामा का अर्थ कपडे या पहनावे से है। दूल्हे को जामा, एक प्रकार का अंगरखा, पहनाया जाता है। जिसकी देह पर कपडे खिलते हैं वह जामाज़ेब है। जामा शब्द भी हिन्दी में रच-बस गया है। जामा को लेकर अनेक मुहावरे बन गए हैं। आपे से बाहर होना, अत्यंत क्रोधित हो जाना जामे से बाहर हो जाना है। बहुत खुश होकर इतराना जामे में फूला न समाना है।

डा, सुरेन्द्र वर्मा (मो, ९६२१२२२७७८ ) १०, एच आई जी ; १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद २११००१

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