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शब्द सन्धान / मय मद्य मधु मदिरा / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

फ़िराक का एक शेर है –

आए थे हंसते खेलते मयखाने में ‘फ़िराक’ जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए

ज़ाहिर है मय शराब को ही कहते हैं, और फ़िराक भले ही कहें की शराब आदमी को संजीदा बनाती है लेकिन शब्दार्थ से भी शराब फसाद ही पैदा करती है। शब्द, शराब, जिन दो पदों से मिलकर बना है, वे हैं –शर और आब। ‘शर’ या ‘शर्र’ एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है उपद्रव या फसाद; और ‘आब’ पानी को कहते हैं। शराब इस प्रकार वह पानी है जिसे पीकर लोग झगड़े-फसाद पर उतर आते हैं। पर बात तो ‘मय’ की हो रही है। अरबी-फारसी में ही नहीं हिन्दी-उर्दू में भी ‘मय’ शब्द अब शराब के अर्थ में ही इस्तेमाल होता है ।

संस्कृत में शराब के लिए शब्द ‘मय’ न होकर ‘मद्य’ है। मद्य में “म” और “य” बीच में यदि ‘द’ (हलंत) को नज़र-अंदाज़ कर दिया जाए तो यह भी “मय” ही हो जाता है। क्या पता ऐसा ही हुआ हो और “मद्य” टहलता टहलता अरब और फारस में पहुँच गया हो तथा वहां उसने ही ‘मय’ का रूप धारण कर लिया हो ! लेकिन संस्कृत में भी ’मय’ अनुपस्थित नहीं है। संस्कृत में ‘मय’ (य -हलन्त) का अर्थ ‘शीघ्र जाने’ से है। शायद इसीलिए ऊंट, खच्चर घोड़ा आदि को मय कहा गया है। ‘मय’ का एक अर्थ संस्कृत में आराम या चैन से भी है। ( क्या इसलिए कि चैन भी टिकता कहाँ है, जल्दी ही चला जाता है !)

पुरा-कथाओं के अनुसार ‘मय’ दानवों का दानव था। जिस तरह विश्वकर्मा ने हमारे विश्व की रचना की है उसी तरह ‘मय’ ने असुरों की दुनिया बसाई। उसे मायासुर भी कहा गया है। कहते हैं ‘मय’ की पुत्री मंदोदरी थी। किन्तु मंदोदरी को पहचान मय-तनया के रूप में इतनी नहीं मिली है जितनी रावण की पत्नी के रूप में है।

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संस्कृत में मय जिस शब्द के साथ जुड़ जाता है उसका अर्थ, उससे युक्त या,सहित या भरेहुए से होता है, जैसे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय इत्यादि। जल से भरा हुआ कहें या जलमय, बात एक ही है। दया से युक्त कहें या दयामय –कोई अंतर नहीं है। मज़े की बात यह है कि ‘मय’ अरबी भाषा में भी सहित के अर्थ में प्रयोग होता है जिसे हिन्दी-उर्दू में भी अपना लिया गया है। कौन नहीं जानता कि आतंकवादी ‘मय दलबल के’ आते हैं और हमला कर देते हैं।

मैक्सिको के आदिवासी ‘मय’ कहलाते हैं। ‘मय’ थाईलेंड का एक प्रसिद्ध मार्शल आर्ट भी है।

फारसी के ‘मय’ को शराब के अर्थ में हिन्दी/उर्दू में ज्यों का त्यों अपना लिया गया है। इतना ही नहीं, ‘मय’ से जुड़कर अनेक शब्द बन गए हैं। मयखाना तो है ही, ‘मयकदा’ भी मयखाना ही है। मयकशी मदिरापान है तो मयकश शराब पीनेवाला है। इसी तरह शराबी के लिए मयख्वार, मयनोश और मयपरस्त शब्द भी बन गए हैं। मय-फरोश शराब बेंचने वाले को कहते हैं। ये सारे शब्द उर्दू में खूब इस्तेमाल होते हैं। हिन्दी को भी इनसे कोई परहेज़ नहीं है।

जिस तरह मय से अनेक शब्द बने हैं वैसे ही हिन्दी में मद्य से भी अनेक पदों का निर्माण हुआ है। मद्यशाला, मद्य कुम्भ, मद्य-घट, मद्यपान, मद्य-भाजन, मद्य-पात्र,मद्य-पायी, मद्यासक्त, इत्यादि।

मधु यों तो सामान्यत: शहद को कहते हैं, किन्तु मद्य के लिए भी इसका प्रचलन कम नहीं है। आप मधुघट कहें या मद्यघट, मधुपान कहें या मद्यपान, मधुकुम्भ कहें या मद्यकुम्भ, मधुभाजन कहें या मद्यभाजन, मधुपात्र कहें या मद्यपात्र, मधुपायी कहें या मद्यपायी,मद्यासक्त कहें या मधु-आसक्त बात एक ही है।

हरिवंश राय ‘बच्चन’ ने तो हिन्दी साहित्य को पूरी की पूरी एक मधुशाला ही रच कर दे दी है। मधुशाला ‘मदिरा’ को प्रतीक बनाकर एक मूल्याधारित जीवन दर्शन ही प्रस्तुत करती है।

जी हाँ, मय, मद्य और मधु के नज़दीक ही एक शब्द “मदिरा” भी है जिसका अर्थ हिन्दी और संस्कृत दोनों में ही शराब से ही है। मदिरागृह शराब घर है। मदिरालय भी शराबखाना ही है। मदिरा तो मदिर होती ही है हर वस्तु जो मदमस्त करती है मदिर है। मदिराक्षी मस्त मदभरी आंखोंवाली है तो मदिरायतनयन बड़े बड़े और मदभरे नयनोंवाला कहलाता है।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.९६२१२२२७७८)

१०,एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद – २११००१

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