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हास्य-व्यंग्य / बॉस चले परदेश / दामोदर दत्त दीक्षित

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बिग बॉस एक सेमिनार में न्यूयार्क जा रहे थे। विदेशी सेमिनार अवध के नवाबों के मुर्गे की तरह होते हैं जिन्हें हजम कर पाना सबके बस की बात नहीं। उन्हें आधुनिक नवाब यानी बिग बॉस ही हजम कर सकते हैं। साफ-सुथरे, धुले-पुछे बिग बॉस के न्यूयार्क अभियान में आतरिक स्थिति साफ-सुथरी, धुली-पुछी नहीं थी। विषकुंभपयोमुख जैसी स्थिति।

कई खम, कई पेच, कई लटके।

सेमिनार तकनीकी था, बीस गैर-तकनीकी, 'सिर्फ बीए.'। उन्होंने तकनीकी बनाने का चोर रास्ता अपनाया था। तकनीकी व्यक्ति के कंधे पर उचककर बैठ गए, बन गए तकनीकी। कंधे पर बैठे बेटे का सिर जब बाप के सिर से ऊंचा हो जाता है तो वह तालियां बजाकर चिल्ला उठता है 'मैं तो पापा से भी ऊंचा हो गया !' बॉस सेमिनार में एक आदर्श श्रोता की हैसियत से शामिल होंगे और अनौपचारिक वार्ताओं में 'दिस वे' दैट थिंग' 'आई मीन' 'मे बी' 'मे नॉट वी' 'यू अपियर टु बी करेक्ट' 'इट इज नॉट सो इन इंडिया' आदि से काम चलाएंगे। इसी तकनीकी विचार-विमर्श की पूंजी और ऊर्जा के बल पर वे लौटकर बताएंगे कि भारत की डूबती नाक उन्होंने कैसे बचाई। कुछ समय बाद वे दूसरे विभाग में चले जाएंगे। उद्योग विभाग उनके सेमिनार अनुभव का लाभ भले ही न उठाए, शिक्षा विभाग तो उठाएगा. 'शिक्षा भी तो एक उद्योग है।' आर्थिक कोण भी था। सरकार उनके विदेशगमन पर एक लाख खर्च कर रही थी। वह इतनी ही धनराशि की वस्तुएं सीमा शल्क बचाकर अपने साथ लाएंगे।

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बॉस की कार हवाई अड्डे पर पहुंचते ही अधीनस्थ अधिकारियों में होड़ लग गई कि कार का दरवाजा कौन खोलेगा। सरमा आगे बड़े तो बरमा ने प्रारंभिक विद्यालय के प्रारंभिक दांव लत्ती से प्रारंभ किया। सरमा मुख के बल धराशाही। बरमा आगे बड़े तो मलखानी ने उसकी पेंट खींच ली। वे बचपन में इसी तकनीक से दौड़ में विजयी होते थे। मोटी तोंद ने सहयोग देने से इंकार कर दिया और पैंट सबेल्ट नीचे सरक गई। बरमा के लिए दरवाजा खोलने से आवश्यक पैंट बंद करना हो गया। तीर की तरह अग्रसर मलखानी पर कोहनी रूपी रायफल से प्रहार किया अल्फ्रेड रायफल .ने। ससुरा बॉस से देर आने की शिकायत करता रहता था। रायफल के मुंह पर मुक्का मारा मुंहतांक ने। कुल मिलाकर दरवाजा खोलो अभियान में कई अधिकारी धराशायी हुए, कई घायल। हां, शहादत किसी को भी नहीं मिली।

रद्दी भाई का हाथ हैंडिल तक पहुंचा, पर सातपती ने उनके पेट में गुदगुदा दिया। साम-दाम-दंड-भेद सब चल रहा था। सातपती हैंडिल खोलते कि चीफ टेक्नीकल एडवाइजर लंगोटिया ने उनके हाथ में चिकोटी काटी और हैंडिल खोल दिया। एवरेस्ट पर उनका झंडा फहर गया। दरवाजा खोलना उनकी आवश्यकता थी और आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। अगर वह असफल रहते तो बॉस सोचता, 'यह सुकटमुंहा जरूर खुन्नस खाए है कि मैं उसके हक को मारकर विदेश यात्रा पर जा रहा हूं।'

दरवाजा भले ही लंगोटिया ने खोला हो, पर बॉस को प्रथम अभिवादन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तीरखा को जिसने कार के अगले दरवाजे से दोनों हाथ भीतर कर, चपरासी की ग्रीवा चालक की ओर धकियाकर, हाथ जोड़ दिए।

'शुभ यात्रा', 'बोन वायेज' विश यू ए हैप्पी एंड प्लेजेंट जर्नी' जैसी रसमय फुहारों को ओढते-बिछाते, छिगनी, कृशर काया को गुब्बारे की भांति फुलाते हुए, बौड़म बॉस लाउंज की ओर चले। यद्यपि वह नरपशु थे, पर उनकी चाल में अनोखा देवत्व था। हुजूम से घिरे बॉस की छवि वैसी ही थी जैसी रेल देखने के बहाने स्टेशन पर धर धमकने वाली ग्रामीण महिलाओं से घिरी ससुरालगामिनी की छवि।

अधिकारीगण बॉस को उपहार देने लगे। वह ओठों को हौले से हिलाकर 'क्यू ध्वनि प्रस्युटित करते और उपहार समीपस्थ चपरासी को हस्तांतरित कर देते। तभी कटारिया-तलवार में व्यवस्था के प्रश्न को लेकर फुसफुस संवाद छिड़ गया।

' 'बॉस का विदेशगमन जन्मदिन या मुंडन तो है नहीं जो उपहार दिया जाए।''

' 'बॉस को उपहार देने के लिए न तो संस्कार की बाट जोही जाती है, न ही मुहूर्त निकलवाना पड़ता है। उपहार पहले दो, सोचो बाद में। बॉस ने दाढ़ी बढ़ा ली, नया सूट पहना, उनकी बीवी को जुकाम हुआ, मुन्ने की चालीसवीं पोजीशन आई, कुतिया गर्भवती हुई, उनकी नई, जो नवेली भी है, स्टेनो आई, तो यही घटनाएं उपहार देने के लिए पर्याप्त हैं।''

' 'तो यार क्या भेंट दे दूं ?' '

'न हो कुछ तो एक बुके ही दे दो।''

कटारिया बुक स्टाल से लोकप्रिय दूरदर्शन शृंखला यानी 'महाभारत' उठा लाया। मैंने कहा बुके और तुम ले आए बुक-वह भी महाभारत। बॉस अभी, इसी वक्त तुम्हारी रेगिस्तानी खोपड़ी पर 'महाभारत' पटक मारेंगे। तुम विदेश में उनकी महाभारत कराना चाहते हो ?' ' तलवार धीमे-से चीखा।

' 'यार, बुके क्या होता है ?' '

'वही डंडी जैसी चीज जिसमें फूल-पत्तियां लगी होती हैं। वह देखो निजलिंगप्पा हाथ में लिए खड़ा है।' '

कटारिया दौड़ता हुआ बुके विक्रेता के पास गया, पर तब तक सभी बुके बिक चुके थे। चौरे ने कुछ समय पूर्व उसके सारे बुके खरीद लिए थे, जिससे अन्य लोग बुके भेंट करने से वंचित रह गए।

कटारिया ने बुक स्टाल से एक पुस्तक लाकर बॉस के हाथ में धर दी। इस भागमभाग में वह तीन बार लाउंज की चिकनी फर्श पर गिरा, गिरकर उठा। 'एवरीथिंग एबाउट न्यूयार्क कालगर्ल्स एंड होर्स्स नामक पुस्तक देखकर बॉस ने दो इंच मुस्कान फेंकी, तीन बार 'क्यू कहा और चार अनगढ़ मैले दांत प्रदर्शित किए।

चपरासी उपहार वस्तुओं को दो सूटकेसों में भरकर कार में रखने चला जिसे दो अधिकारियों ने बलात छीन लिया।

सहसा बॉस चीखे, ' 'रुको, रुको।' '

सूटकेस वाहक अश्मीभूत हो गए। बॉस ने कहा, ' 'रास्ते में पढ़ने के लिए भी तो कुछ चाहिए। वह पुस्तक निकाल दो, वही न्यूयार्क वाली।''

पुस्तक निकाली गई। अधिकारियों में काफी देर तक इस बात को लेकर छीना-झपटी होती रही कि कौन अपने कर-काष्ठ से बॉस के करकमल में पुस्तक मधु धरेगा।

अधिकारियों ने न्यूयार्क को लाउंज के इस छोटे कोने में उतार दिया। मेरे चचेरे चाचा ने पिछले दिनों लिखा था कि 'एम्पायर स्टेट बिल्डिंग' से न्यूयार्क दिन में धुंध में डूबा और रात में तारोंभरे आकाश जैसा दीखता है। मेरे बड़े बाबा दो सौ रुपए लेकर न्यूयार्क गए थे। उनके लड़के यानी गोलू चाचा अब करोड़ों में खेलते हैं। लारीन आटी ने परसों टेलीफोन पर बताया था कि आजकल न्यूयार्क में माफिया गैंगों का राज चल रहा है.। यूएनओ. में डेपुटेशन झटकने से न्यूयार्क में दीर्घप्रवास का जुगाड़ लग सकता है। बॉस के चेहरे पर प्रच्छन्न तनाव समय की सुइयों के साथ बढ़ता जा रहा था। आखिर वह असह्य कचोट के साथ कराह उठे, ' 'मिस बीनापानी नहीं दीख रही है।' '

' 'सर, वह तो बिना पानी की हैं। क्यों आएंगी?'' कालिया ने परिहास किया।

गोरे ने ढाढ़स बंधाया, ' 'हो सकता है, टैक्सी बिगड़ गई हो। क्या जाने 'ब्यूटी पार्लर' में देर हो गई हो? बस, आ ही रही होंगी, सर।' '

ये बातें बीस में आशावाद का प्रादुर्भाव नहीं कर सकीं। उन्होंने सोचा इस नई लौंडिया को अपनी खूबसूरती और स्मार्टनेस का कुछ ज्यादा ही नशा है। इसे कसना पड़ेगा। 'सेक्योरिटी चेक अप' की उद्‌घोषणा हुई। बॉस की दंडवत-पालागन शुरू। सारी अंग्रेजियत हवा, भारतीयपन फूट निकला।

कई अधिकारी सोचते थे कि वे नरसिंह राव की मुद्रा में विमान के पास खड़े होकर येल्तसिन की मुद्रा में विमानारूढ़ बॉस को बॉय, टाटा करेंगे। सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोका। वे बिफर पड़े। आखिर सुरक्षाकर्मियों ने आड़ी लाठी लगाकर उन्हें प्रदर्शनकारियों की तरह पीछे धकेला। कई अधिकारी अपने चिकने अंगों के बल चिकनी फर्श पर गिर गए। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। वे हवाई पट्टी की दिशा में जो भी दरवाजा देखते, उसी में घुस जाते। ऐसा हड़कंप मचा कि लगा हवाई अड्डे पर आक्रमण हो गया हो।

अत्यंत कठिनाई से सुरक्षाकर्मियों ने इस हुजूम को दुमंजिले के लाउंज की ओर खदेड़ा। वहां से उन्होंने बॉस के साथ 'हाथ हिलाई हिलावा’ कार्यक्रम संपन्न किया। विमान के उड़ान भरने के बाद वापस चल दिए। उनके चेहरों पर खुशामदी ललक थी। वे बॉस के 'रिसीविंग वेलकम' की रणनीति के बारे में अभी से सोचने लगे थे।

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(साभार - हिंदी हास्य व्यंग्य संकलन, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत)

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