सोमवार, 16 जनवरी 2017

हास्य-व्यंग्य / देश-सेवा के अखाड़े में / सूर्य बाला

यह खबर चारों तरफ आग की तरह फैल गई कि मैं देश-सेवा के लिए उतरने वाला हूं । उसने सुना, भागा आया और मेरे निर्णय की दाद दी । बधाई-संदेशों का तांता लग गया- ''सुना, आप देश-सेवा पर उतर रहे हैं, ईश्वर देश का भला करें !''

प्रस्ताव-पर-प्रस्ताव आने लगे कि बाइ द वे, शुरुआत कहां से कर रहे हैं? कौन-सा एरिया चुन रहे हैं? हमारे अंचल से करिए न! बहुत स्कोप है । हेलीपैड बनकर विकसित होने लायक इफरात जमीन पड़ी है । आबोहवा भी स्वास्थ्यप्रद हे । ईश्वर की दया से गरीबी, भुखमरी ओर अशिक्षा आदि किसी बात की कमी नहीं । लोग भी सीधे-सादे नादान किस्म के हैं-आखें मूंदकर माई-बाप का रिश्ता जोड़ लेने वाले । अगले दस सालों तक तो बहकने की कोई गुंजाईश नहीं । वर्षों सुख-शांति, अमन-चैन से गुजार सकेंगे, आप 'माई-बाप', इन देश के लालों के साथ । ये हमेशा रोटी के लाले पड़े रहने पर भी कभी शिकवे-शिकायत नहीं करते । हर हाल में मुंह सिलकर रहने की जबरदस्त ट्रेनिंग मिली है इन्हें ।

मैंने सोचा, जगहें तो सारी एक-सी हैं; ऐसे स्कोप कहा नहीं है! लेकिन जब कहा जा रहा है, आफर मिला है तो उन्हीं के एरिया से शुरुआत हो जाए । मेरा निश्चय सुनते ही प्रेस वाले दौड़े आए और आग की तरह फैलती इस खबर में घी डाल गए ।

शाम को उस एरिया का सबसे बड़ा कांट्रेक्टर आया और सलाम करके बोला - 

' 'बंगला कहां छवेगा

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मैं हैरान । कैसा बंगला? अभी देश-सेवा तो हुई नहीं कुछ, उससे पहले बंगला छवाने आ गया!

उसने उसी अदब भरी मुस्तैदी से कहा, ''वही तो, जब तक बंगला नहीं छवेगा, देश-सेवा-जनहित जैसे महान काम कहां बैठकर करेंगे आप? लोक-सेवक लोग आकर कहां ठहरेंगे? मुलाकाती कहां लाइन लगाएंगे? संतरी कहां सिडकेगा उन्हें?... फूस की छत या टिन के शैड के नीचे मुलाकाती नहीं इकट्ठे होते । कोई बेवकूफ थोड़े है । सीधी-सी बात है, जो अपने सिर पर छत नहीं खड़ी कर पाया, वह उनके सिरों पर साया कहां से करेगा? अपना नहीं तो कम-से-कम अपने दुःख-दर्द सुनाने आने वालों का तो ख्याल कीजिए ।''

मैंने कहा, ' 'तब फिर छवा दीजिए, जहां ठीक समझिए ।''

वह खुश हो गया । वहीं-का-वहीं बैठकर नक्शा वगैरह खींचकर वह बोला, 'गेराज एक रहेगा या दो ?' '

मैंने कहा, ' 'अरे यार! पहले कार तो हो।

उसने कहा, ' 'आपकी न सही, मुलाकातियों की तो होगी! और फिर यों समझ लीजिए कि बप्पा साहव को देशहित के पैवेलियन में कुल छ: महीने ही गुजरे हैं और आलरेडी दोनों बेटों के ट्रकों और स्टेशन-वैगनों के लिए जगह की कमी पड़ रही है ।''

मैंने आज्ञाकारी बच्चे की तरह कहा, ' 'तब जैसा आप लोग उचित समझिए ।''

कांट्रेक्टर खुश हो गया, ' 'ऐसा करते हैं, एक गेराज बना देते हैं और दो की जगह छोड़ देते हैं पोर्च पोर्टिको आलीशान बनाएंगे, नहीं तो संतरी टुटपुंजिए मुलाकातियों को रुआब से दुतकारेगा कैसे? संतरी जितना कटखना होता है, आदमी उतना ही पहुंच वाला माना जाता है । अच्छा मैं चलता हूं । बंगले का आहाता, लान सींचने, साग-सजी फूल-पत्तों की क्यारी संवारने के लिए मेरा एक आदमी है, बड़ा नेक और विश्वासपात्र । इस काम के लिए उसी को रखिएगा, जनहित जैसे काम करने जा रहे हैं तो इस एरिया के नक्कालों से सावधान रहने की जरूरत है ।' '

शाम को उस एरिया के व्यापारी-संगठन का प्रमुख आया और आजिजी से बोला ' 'देश-सेवियों का भोजन तो अत्यंत संतुलित और नियमित होता है । साहब तो अनाज को हाथ नहीं लगाते थे और देख लीजिए काठी ऐसी है कि सत्तर की उम्र में सत्ताईस वालों को बगल में दबाकर घूमे । अखाड़ेबाजों-सा सधा और तना हुआ शरीर सिर्फ मीनू की बदौलत ही तो! बाइ द वे आपका मीनू?' '

मैंने झेंपकर कहा, ' 'अभी बनाया नहीं... ।' '

उसने ताकीद की, ' 'तो झटपट बना डालिए-खानपान की दुरुस्ती पहले । आप जानो रूखी-सूखी वाले महात्मा को कौन पूछता है? मेरा तो आज तक किसी नमक-रोटी खाने वाली महान आत्मा से साबका पड़ा नहीं । मेरे देखते-देखते कितने ही जनसेवी नमक, रोटी, प्याज से शुरू होकर फल, दूध और सूखे मेवों वाले मीनू पर स्थानांतरित हो आज तक स्वास्थ्य-लाभ कर रहे हैं ।' '

मैंने संकोच से कहा, ' 'सूखे मेवे तो गरिष्ठ होंगे । सोचता हूं शुरू-शुरू में रोटी-दाल ही ठीक रहेगा ।'

उसने फौरन टोककर कहा, ' देखिए, आप दाल-रोटी खाइए या नमक-रोटी, लेकिन एक बात समझ लीजिए-इधर भड़काने वाले बहुत हैं-घर-घर यह बात पहुंच जाएगी कि जो खुद नमक-रोटी खाता है वह हमें मालपुए कहां से खिलाएगा? -और इस एरिया के लोग भोले-भाले, नादान हैं ।' '

. मैंने कहा ' आपकी बात ठीक है लेकिन मेवे बहुत महंगे भी तो हैं ।''

वह बेतकल्लुफी से बोला, ' क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं आप? आप इस एरिया के जनसेवक होकर आ रहे हैं और खरीदकर मेवे खाएंगे ' लानत नहीं होगी इस जमीन के बाशिंदों के . लिए? आखिर हम किस मर्ज की दवा हैं? आज ही सूखे मेवों का एक टोकरा भेजे देते मैंने जल्दी से कहा, ' नही-नहीं, आपके मेवे...

उन्होंने बात काटकर कहा, ' .उन्हें मेरे मेवे नहीं, देश-सेवा के मेवे समझकर खाइएगा, बस! बसे भी आप चखकर देखिएगा तब समझिएगा कि खरीदकर खाए मेवों में वो स्वाद और लज्जत कहां जो देश-सेवा से प्राप्त मेवे में होती है! पैसों की चिंता मत कीजिएगा ' मुझे आप पर भरोसा है; मेरे पैसे कहीं नहीं जाएंगे । सब वसूल हो जाएंगे ।''

अगले दिन उस एरिया का नामी-गिरामी दर्जी आया और बड़े प्यार से मुझे अपने फीते में जकड़ते हुए बोला, ' 'आप फिक्र न कीजिए । मुझे सब अंदाज है । यथा साहब से मैंने पहली बार नाप लेते वक्त ही कह दिया था कि अगली अचकन और पाजामे के लिए कम-से-कम पौना-पीना मीटर कपड़ा ज्यादा लाइएगा । और वही हुआ! वैसे ही आप भी करिएगा लिवास तो यही रखेंगे न! रखना भी चाहिए । शुम्र, स्वच्छ बकुल-पंखी-अर्थात् बगुले की तरह सफेद शक्काफ । हर मौके और हर जगह के लिए पूरी तरह दुरुस्त । जमाने की हवा सर्द हो या गर्म, ये वस्त्र पूरी तरह वातानुकूलित रहते हैं । समझ लीजिए, लिफाफे हैं जो अपना मजमून बदलते रहते हैं । कोई बाहर से इनके अंदर का मजमून भांप नहीं सकता । और इधर तो इस लिबास की महिमा और बढ़ गई है । इतिहास बताता है कि पहले इस लिबास को महान लोग पहनते थे, अब इसे जो पहन लेता है तुरत-फुरत महान हो जाता है ।''

अगले दिन सुबह-सुबह तेल-पिलाई लाठी और घुल-बकरी सीने वाला एक मुच्छड् आया और सलाम ठोंककर बोला, ' 'मैं संतरी हूं सिर्फ देश-सेवियों के पोर्टिकों और पोर्चों के लिए समर्पित । अब तक की सारी जिंदगी, समझ लीजिए, देश-सेवी फाटकों ओर पोर्चों पर ही कुर्बान की है । खिदमत में कोई कोरकसर नहीं रहेगी, इसका भरोसा रखें । बप्पा साहब ने तो पूरी हक-हुकूमत दे रखी थी । जिसे चाहता अंदर जाने देता, जिसे चाहता चार धक्के दे, कालर पकड़, बाहर कर देता । बप्पा साहब कभी दखल न देते थे ।

अहा, क्या आदमी थे! कभी पूछा-पैरवी की ही नहीं । मेरी वजह से कभी टुटपुंजिए, फटेहाल मुलाकती उनके पास फटक ही नहीं पाए । समझ लीजिए, वे तो नाम के मंतरी ये । असली मंतरी तो मैं यानी उनका संतरी ही हुआ करता था । अब आपको क्या बताना, समझ लीजिए एक तरह से पूरे देश की बागडोर संतरियों के हाथ में ही होती है.. अच्छा चलता हूं । फाटक, पोर्टिको तैयार हो जाए तो बुलवा लीजिएगा । ये रहा मेरा विजिटिंग कार्ड । मेरे सिवा कोई और यहां संतरी न होने पाए, इसका ख्याल रखिएगा । यह ओहदा जिस-तिस को सौंपने लायक नहीं । बड़ी जिम्मेदारी, बड़े जोखम का काम है । हां, सांझ को इस इलाके के कुछ और नामी-गिरामी, तावेदार लोग आपसे दुआ-सलाम किया चाहते हे जिससे आपको पूरा इत्मीनान हो सके ।''

शाम को, सर पे टोपी लाल, गले में रेशम का रूमाल बांधे वे लोग भी आए और मुझे पूरा भरोसा दिला गए कि 'हमारे रहते इस पूरे इलाकेभर में किसी की हिम्मत नहीं जो आपके काम में दखल दे । न आपकी तरफ कोई आंख उठा सकता हे, न कोई इन्क्वायरी बैठ सकती है । हम जो हैं! आप तो बस खाइए और चेन से सोते हुए देश की खुशहाली का सपना देखिए । किसी की मजाल नहीं जो कोई रोड़ा अटकाए! अटकाए तो हमें तलब कीजिएगा । इसी तरह हमें पूरा भरोसा है कि आपके रहते हम पर आँच न आने पाएगी । है कि नहीं? न हमारा काम रुके, न आपका । बप्पा साहब जब तक रहे अपनी बात रखी, हम निर्द्वंद्व घूमते रहे । अब यह जिम्मेदारी आप पर । आप अपना हाथ हमारे सर पे रख दें तो हमें भी इत्मीनान हो जाए ।' '

मैंने ससंकोच उन्हें समझाने की कोशिश की, ' 'लगता है आप लोगों को कुछ गलतफहमी हो गई है-मैं तो यहां देश-सेवा के इरादे से आया हूं ।' '

उन्होंने फौरन कहा, ' 'लीजिए, तो हम कौन-से देश के बाहर हैं? हम भी तो उसी देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है, प्रदूषण की । हमें कोई गलतफहमी नहीं है! और एक बात आपको भी याद दिला दें कि आप भी किसी गलतफहमी में न पड़िएगा, यह इलाका जितना आपका है उतना ही हमारा भी । इतना ध्यान रखिएगा, देश-सेवा के क्षेत्र में रहकर हमारे जैसे देशवासियों से द्रोह न मोल लीजिएगा! बाकी जिम्मेदारी हमारी । न वोट की कमी होने देंगे न नोट की । आप चैन से सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र के पिछड़े हुए तमाम काम कीजिए, चाहे काम तमाम कीजिए ।'

इस प्रकार धमकी भरे आश्वासन और आश्वासन-भरी धमकियां देते हुए भूतपूर्व मंतरी के संतरी और उसके बिरादरों ने अपने-अपने क्षेत्रों को गमन किया और उस विचारोत्तेजक धमकी से प्रेरित हुआ मैं, ओ मेरे क्षेत्रवासियों, आपके नाम यह संदेशनुमा धमकी जारी करता हूं कि चूंकि मुझे अब कुछ भरोसेमंद साथी मिल गए हैं, अत: मैं बेखौफ, बेहिचक आपके क्षेत्र की सेवा के अखाड़े में कूदने वाला हूं । सावधान!

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(हिन्दी हास्य व्यंग्य संकलन, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से साभार)

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