रविवार, 15 जनवरी 2017

कहानी / नक़ाब / मंजरी शुक्ला

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चाँद को क्या मालूम...कि उसे कुछ ही घंटों बाद चांदनी से जुदा होना पड़ेगा या फिर नादान काली बदली भला कहाँ जानती हैं कि बहती हवा के साथ कितनी बूँदें बरसाकर अपना आँचल खाली कर देने के बाद भी वो मुस्कुराते हुए अपनी तन्हाई किसी पर ज़ाहिर नहीं होने देगी ..मासूम रातों में टिमटिमाता दिया अपने मद्धम प्रकाश के साथ कब तक डटा खड़ा रहेगा ये ना उसने जाना और ना ही कभी जानेगा .... और शायद उसी तरह मैं भी..अपने हृदय की वेदना की वेग को अपनी आँखों के कोरो से बहने से नहीं रोक पाता ..अंधियारी हो या उजियारी..तारों भरी या सूनी ..काटनी तो है ही .. कैसे बीतेगी...बीतेगी या फ़िर किसी पुरानी सुनी हुई कहानी की तरह केवल स्मृतियों में ही रह जाएगी, उन परी कथाओं की अद्भुत कहानियों की तरह,जिन के पात्र हमारे साथ हँसे ,खेलें और फिर नानी की कहानी खत्म होते ही वापस उनकी संदूकची में बंद हो गए। कितना खोजा उन्हें ,हर जगह, जहाँ तिल रखने की भी जगह ना थी, ऐसी मारामारी वाली भीड़ में ,जहाँ हृदय के स्पंदन को भी सुना जा सके ऐसे हर वीराने में, लरजती गरजती नदियों की कल कल से पहाड़ों की ऊंचाइयों तक केवल कल्पना ही जीवंत हो हंसती बोलती रही जिन पात्रों के साथ सारा बचपन बिता दिया वे ना जाने कहाँ गुम हो गए थे जिन्हें मैं चाह कर भी वापस ना बुला सका। अफसोस होता रहा कि क्यों नहीं उस संदूकची में मैं भी चला गया, उन्हीं राजा, वज़ीर ,विक्रम,वेताल,और ढेर सारे बौनों के देश में ,जहाँ पर हमेशा एक सुनहरे बालों वाली राजकुमारी किसी राजकुमार की प्रतीक्षा में खिड़की से बाहर देखती हुई उदास नीली आँखों से आँसूं गिरा रही होती जो ज़मीन पर गिर कर सफ़ेद चमचमाते मोती बन कर बिखर जाते थे या फ़िर चमकते सितारें रातरानी और मालती के गुच्छे बनकर लता के सहारे सारे जंगल में अपनी भीनी ख़ुश्बू का इंद्रजाल फैलाते हुए सभी को मदहोश सा कर देते।

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अब ना-नानी रहीं , ना ही वो कहानियाँ और ना ही उनकी वो जादुई सुनहरी संदूकची ,जिसको बस एक नज़र देखने के लिए हम नानी के सभी काम सर के बल करने के लिए तैयार खड़े रहते थे। फ़िर चाहे उनका चाँदी का नक्काशीदार पीकदान उठाकर लाना हो या फ़िर उनकी सफ़ेद मुलायम फ़र वाली चप्पलें जो वह बड़े गर्व से बताती थी कि किसी गोरी अंग्रेजन मेम ने उनकी सुंदरता पर फ़िदा हो कर दी थी।

सारी बातें सदियों पुरानी एक कहानी की तरह है। लगता है ये रात मुझे अपने आगोश में लेकर कुछ खुश हो जाएगी और अंधेरों से निकालेगी कुछ अनकही बातें, कुछ अनसुनी कहानियाँ जिन्हें सोचते हुए पता नहीं ये पल कब बीत जाएंगे जैसे कभी थे ही नहीं। कल फिर उस से सामना होगा ..उसी से ..और ये सोच कर मैं ज़ोरों से हँस पड़ा।

ऐसा लगा जैसे पूरे कमरे में जैसे सुगंधा के सुनहरे बाल है और मैं उनका झूला बनाकर उस पर झूलते हुए उससे बातें करने लगा। ना जाने कब खिड़की से आती ठंडी हवा के झोंकों ने मुझे सुला दिया, मैं जान ही नहीं सका। सुबह उठते ही हमेशा की तरह सबसे पहले मैंने भगवान से प्रार्थना की कि मुझे आज सुगंधा का चेहरा जरूर दिखा देना,वरना इस तरह से तो दिन रात घुटते हुए मैं मर जाऊंगा।

मैं हर पल की मौत नहीं मर सकता। पर मैं कर ही क्या सकता हूँ ? क्या किसी को जबरदस्ती अपनी ओर खींच लूँ। इस बात की कल्पना ने ही मेरे रोंगटे खड़े कर दिए और मैंने पास पड़ी चादर से अपने माथे का पसीना पोंछ लिया।

तभी माँ कमरे में आई हमेशा की तरह एक हाथ में बेलन और एक हाथ में भिंडी लिए हुए।

मुझे देख कर मुस्कुराते हुए बोली क्या देख रहा है तेरी बीवी भी एक दिन इसी हाल में दिखेगी ।

सुबह-सुबह ये सुन कर मैं शरमा दिया।

माँ बोली -"चल अब जल्दी से नाश्ता कर ले तेरी पसंद की भिंडी की सब्जी बना रही हूँ। "

मैं झटपट तैयार होकर डाइनिंग टेबल पर पहुंचा तो मां बोली -" तेरा ही रास्ता देख रही थी अब गरम-गरम कुरकुरे पराठें बना कर तुझे खिलाती हूं।"

मैंने कहा अरे माँ, क्यों परेशान हो रही हो दो सेंक कर रख देती वैसे भी मैं कहाँ ज्यादा खाता हूँ मैं ?

माँ ने धीरे से अपनी ज़ुबान को काटा और बोली -" पगले, क्या कोई भी माँ कभी अपने बच्चों को गिनकर खिलाती है। मैं माँ से लिपट गया। वो हंसते हुए बोली -"प्यार से तेरे बालों में हाथ भी नहीं फ़ेर सकती हूँ , वरना इस आटे को कोई भी शैंपू हटा नहीं पाएगा। कॉलेज जाने लगा है, कितना बड़ा घोड़ा हो गया है और दुलार ऐसे कर रहा है मानो नर्सरी का बच्चा होI"

मैंने मुस्कुराते हुए परांठे और भिंडी के साथ चाय का घूंट लिया, खाना क्या था.. आंखों के सामने बस सुगंधा की ही तस्वीर घूम रही थी गरम गरम पराठें में पिघला हुआ सफेद मक्खन देखकर मैं खुशी से चीखा -

अरे वाह, सफेद मक्खन।

हाँ , तुझे बहुत पसंद है ना भिंडी के साथ।

माँ ने मुझे तिरछी नजरों से देखते हुए कहा और हँसते हुए बोली -"चल अब जल्दी से बता दे क्या कहना है। "

मैंने चाय का घूंट अंदर करते ही सर नीचे कर लिया।

माँ ने मेरी खिंचाई करते हुए पूछा -"क्या कॉलेज कोई लड़की पसंद आ गई है?"

मैं शरमा गया और मैंने हाँ में सर हिला दिया।

माँ मुस्कुराई -"कोई बात नहीं मुझे भी तो तेरे पापा ने कॉलेज में ही पसंद किया था , उसे घर ले आना।

मैंने धीरे से कहा -" माँ , मैंने आज तक उसका चेहरा नहीं देखा।

माँ ने ये सुनते ही गैस बंद कर दी और मेरे पास आकर बैठ गई।

वो कुछ बोलना चाह रही थी पर कुछ कह नहीं पाई।

उन्होंने दो-तीन बार कुछ बोलने की कोशिश की, फ़िर चुप हो गई।

पल्लू से रगड़ रगड़ कर उन्होंने अपना चेहरा मिनटों में ही लाल कर लिया था।

मेरी बाँह खींचते हुए वो थोड़े गुस्से से बोली -" साफ़ साफ़ बता ,मैं समझी नहीं।"

वो मेरी आगे की सीट पर बैठती है। उसके सुनहरे और घुंघराले बाल हैं। मैंने केवल उसके हाथ देखे हैं गोरे पतले , बेहद खूबसूरत ..माँ वो इतनी गोरी है इतनी गोरी है ..।

माँ अब हँस पड़ी।

मुझे हमेशा अपनी मां की ये बात बहुत अच्छी लगती है।

वो किसी भी बात को ज्यादा नहीं खींचती ओर ना टेंशन लेती है ,बस मुस्कुरा कर हँस देती है।

उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा-"कितनी गोरी मुझसे भी ज्यादा गोरी ?"

मां ने मुझे देखा उनकी काली गहरी आंखों में मुझे ढेर सारा वात्सल्य नजर आ रहा था।

मैंने कहा -"ना .. तुझसे ज्यादा गोरा तो कोई हो ही नहीं सकता।

माँ ने तुरंत अगला प्रश्न दागा -" तुझे कैसे पता चला कि वह तुझसे प्यार करती है और तू उसे बिना देखे बिना जाने कैसे प्यार करता है।

मैंने धीरे से कहा -" वो क्लास में मेरे आगे की सीट पर ही बैठती है। यह पांचवा साल है और वो आगे हमेशा पहले से ही आकर बैठ जाती है ताकि कोई और उस जगह ना बैठ जाए। जब मुझे लेक्चर नहीं सुनाई देता है और मैं अपने बगल वाले से पूछता हूँ तो वो सबसे पहले मुझे तुरंत पीछे मुड़कर अपनी कॉपी पकड़ा देती है। मां ,उसने कई बार मुझे अपना टिफिन भी दिया है। तुम मुझसे पूछती हो ना कि मैंने क्या खाया अगर मैं कभी खाना घर पर भूल जाता हूं । मेरे सारे दोस्त बाहर कैंटीन में खाते हैं पर तुझे मेरा कैंटीन में खाना पसंद नहीं है इस वजह से मैं कई बार नहीं खाता हूँ , तो मां, वो हमेशा दो टिफ़िन लेकर आती है एक खुद खाती है और दूसरा मुझे दे देती है।"

मां अब थोड़ा गुस्से से चिल्लाई -" मुझे लगता है कि मैं पागल हो जाऊंगी। ये क्या पागलपन है आगे से पीछे टिफिन देती है आगे से पीछे कागज पकड़ाती है। तो तूने पांच साल में एक बार भी उसका मुंह कैसे नहीं देखा ?"

"मैं कैसे देखूंगा,वो बुर्का पहनकर जो आती है।"

माँ का चेहरा ये सुनते ही फ़क पड़ गया।

बुरका भला वो क्यों..माँ ने हकलाते हुए पूछा।

वो बता रही थी कि उसके घरवाले बहुत ही दकियानूसी ख़्यालों के लोग है और क़ानून की पढ़ाई कोई लड़की करे ये बात उनके तमाम रिश्तेदारों को गंवारा नहीं, इसलिए वो उसकी जिद के आगे झुककर चुपचाप उसे लॉ की डिग्री दिलवा रहे है।"

ओहो..माँ ने राहत की साँस लेते हुए कहा और बोली-" लेकर आ उसे जल्दी ही किसी दिन, बोलना मैंने बुलाया है मिलने को।

ठीक है माँ ...कहता हुआ में कॉलेज के लिए निकल पड़ा। माँ से बात करने के बाद मैंने सुगंधा से बात करने का निश्चय किया ,पर उसके सामने जाते ही जैसे जुबान पर किसी नामी गिरामी कंपनी का ताला लग जाता था जो बहुत कोशिशों के बाद भी कभी नहीं खुल पाता।

तमाम रातें अपना तकिया उसकी यादों से भिगोने के बाद मैंने उससे बात करने का निश्चय किया उधर माँ मेरी हालत देखकर बहुत परेशान हो रही थी। एक दिन उन्होंने मुझे अपने पास बैठाया और मेरी आंखों में देखते हुए कहा-" लड़की है चुड़ैल या पिशाचिनी नहीं जो तेरा खून पी जाएगी या फ़िर तेरी पीठ पर तुरंत सवार होकर बैठ जाएगी।

मां की बात सुनते ही सुगंधा का मेरे पीठ पर बैठकर घर तक आने के दृश्य को सोच-सोचकर मैं खूब हँसा और मैंने कहा -" मां अगर तुमने मुझे कोएड स्कूल में डाला होता तो आज मेरी यह दुर्दशा नहीं हुई होती। कम-से-कम लड़कियों से बात करने की हिम्मत तो हुई होती। "

माँ हंसते हुए बोली -"अच्छा हुआ नहीं डाला वरना यहां लड़कियों का तांता बंधा रहता और वे सब मिलकर मुझ बुढ़िया को घर से बाहर निकाल देती। "

मैंने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देखा तो बाइक की चाभी मेरे हाथ में देते हुए वे बोली-" आज खटारा बस के धक्के खाते ना जाना और बाइक पर ले कर आना उसे वरना आज ही तुझे घर के बाहर कर दूंगी।"

मैंने मां की ओर देखा तो वो मुस्कुराते हुए रसोईघर में चली गई।

मुझे माँ का वाक् चातुर्य और बड़ी से बड़ी बात को मजाकिया लहज़े में कहने का ढंग बहुत पसंद है।

मैं कॉलेज जाने की तैयारी करने लगा।

क्लास में जाते ही सुगंधा को देखकर में आश्चर्यचकित रह गया।

ओफ्फो, क्या आज भी सुबह 5 बजे से आकर यहां बैठ गई है ,मैं सुगंधा को पहले से वहां बैठा देखकर बुदबुदाया।

आज मैं भी समय से बहुत पहले पहुंच गया था , इसलिए मुझे सुगंधा से बात करने का मौका मिल गया मैंने गले पर हाथ फेरकर , थूक निकलते हुए पीछे की सीट से ही धीरे से कहा-" माँ,तुमसे मिलना चाहती है।"

"क्यों?"  एक शांत किंतु सधे हुए शब्दों में जवाब आया।

वो, वो ..मैंने तुरंत सोचा कि अपने जन्मदिन का बहाना बना दूँ या फिर घर में कोई फंक्शन के लिए कह दूँ, पर अमूमन झूठ बोलने की कभी आदत ही नहीं रही इसलिए चुप हो गया ।

"ठीक है.." सुगंधा ने मेरी चुप्पी का जवाब अपनी हाँ में देते हुए कहा।

मैं तो खुशी से जैसे बावला हो गया।

एक के बाद एक करके बाकी के स्टूडेंट्स क्लास में कब आए ,कब लेक्चर शुरू हुआ और कब खत्म,  कब सर चले गए कुछ पता ही नहीं चला।

सपनों के सफ़ेद गुब्बारों में बैठकर मैं सुनंदा के साथ आराम से बातें कर रहा हूं। उसके सुंदर गोरे मुखडे की ओर ताकते हुए अपने सुनहरे सपनों को साकार करने की हामी भर रहा हूं।

तभी सुगंधा की आवाज मेरे कानों में पड़ी और भी जैसे नींद से जागा।

वो पूछ रही थी- "घर चलें तुम्हारे?"

मैंने कहना चाहा-"तुम्हारे नहीं सुगंधा हमारे ..अब से वो तुम्हारा घर भी तो है। पर चाभी और बैग हाथ में उठाकर सिर्फ़ इतना ही कह सका -"चलो"।

जो कॉलेज रोज ना जाने कितना दूर लगता था, उसके दूरी मानों आज सिमट गई थी।

ऐसा लगा जैसे कॉलेज का दरवाजा खोलते ही घर का दरवाजा आ गया। अपने किसी प्रिय का साथ क्या सचमुच हर दूरी को इतना ही छोटा बना देता है। प्रिय शब्द को सोचता हुआ मैं मुस्कुराया जैसे ही घर पहुंचा मां दरवाजे पर ही खड़ी होकर हमारी बाट जो रही थी। हमें देख कर खुशी से ऐसे चीख पड़ी जैसे हम दोनों ब्याह के बाद पहली बार उनका आशीर्वाद लेने आए हो। मां के प्रति मेरे मन में सम्मान और प्रेम के भाव एक बार फिर उठ गए।

तभी माँ हड़बड़ाई सी बोली -"अरे, वहीँ बाहर धूप में ही खड़े रहोगे या अंदर भी आओगे ?"

ये सुनकर सुगंधा थोड़ा सा मेरे पीछे हो गई मुझे लगा कि मां को यह बात पसंद नहीं आएगी माँ मुस्कुरा दी, शायद उसे सुगंधा का दौड़ते हुए घर में आना पसंद ना आता।

जब हम दोनों घर पहुंचे तो मां बोली "बैठो मैं तुम लोगों के लिए चाय लाती हूं।"

"रहने दीजिए आंटी" सुगंधा ने सकुचाते हुए धीरे से कहा।

क्यों रहने दूँ,पहली बार आई हो तुम यहां माँ मनुहार करते हुए बोली।

तभी जैसे अचानक उन्हें जैसी कुछ याद आया और वो सुगंधा के पास जाकर बड़े प्यार से बोली-" तुम्हें तो पता ही है, मैंने तुम्हें क्यों बुलाया है ,पागलों की तरह प्यार करता है तुम्हें मेरा बेटा और उसकी खुशी में ही मेरी खुशी है।"

"पर आंटी ,आपने तो मुझे अभी देखा भी नहीं है "

मां की आँखें सब देख लेती है ,जानती हूं चांद का टुकड़ा नहीं बल्कि पूरा का पूरा चांद है तू।

चल अब जल्दी से यह बुरका हटा।

मां के इतना कहने पर मैं भी एकटक सुगंधा की तरफ़ टकटकी लगाए देखने लगा आखिर मैंने भी तो उसे आज तक नहीं देखा था।

सपनों की राजकुमारी को देखने की आस लिए मैंने यह पांच साल कैसे काटे थे मैं ही जानता था।

सुगंधा ने धीरे से अपना बुर्का उठा दिया मैं उसे देखकर जैसे सुन्न हो गया और माँ तो ज़मीन पर धम्म से बैठ गई।

सुगंधा का दायाँ गाल बुरी तरह से जला हुआ था। कमरे में ऐसे सन्नाटा छाया हुआ था जैसे किसी की मौत हो गई हो।

सुगंधा बोली -" मैं जानती थी कि मेरा चेहरा देखने के बाद ऐसा ही होगा इसलिए इन से बेइंतहा प्यार करने के बाद भी मैं आज तक कोई हामी नहीं भरी ।

ज़मीन जायदाद की दुश्मनी को लेकर कुछ लोगों ने मेरे माता पिता को ट्रक से रौंद कर एक्सीडेंट का नाम दे दिया और मेरे मुहँ पर एसिड फेंक दिया तबसे मैं अकेली ही रहकर कानून की पढाई कर रही हूँ ताकि अपने माता-पिता को न्याय दिलवा सकूं। पल भर रुकने के बाद वो बोली -" अब मैं चलती हूँ।"

ना उसकी आँखों में एक भी आँसूं था और ना चेहरे पर कोई दुख की लकीर।

मैं उसकी हिम्मत देखकर दंग था। माँ अभी तक ज़मीन पर पालथी मारे अपना सर पकड़े बैठी थी। उनके पास पहुँचकर सुगंधा ने उन्हें सहारा देकर खड़ा करते हुए कहा-" चलती हूँ आंटी।" और वो तेज कदमों से दरवाजे की तरफ़ चल दी। उसका बाहर जाता हुआ एक-एक कदम जैसे मुझे मौत के मुंह की तरफ धकेल रहा था। मैं कैसे रहूंगा उसके बिना.. पर उसका चेहरा ..और वो सोचते ही मैंने आंखें बंद कर ली। तभी मां की आवाज सुनाई पड़ी-" रुक जा बेटी "और सुगंधा के बढ़ते कदम वहीं रुक गए। उसने पलट कर मां की ओर देखा।

इस बार उसकी लाल आंखों से आंसू बह रहे थे।

माँ अपने हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाती हुई बोली -"क्या तेरी जगह मेरी बेटी होती तो मैं बिना इलाज कराए उसे ऐसे ही छोड़ देती ?"

सुगंधा अपना मुंह ढांप कर वही खड़ी हो गई पर उसकी सिसकियों की आवाज़ पूरे कमरे में सुनाई दे रही थी और मैं….. मैं माँ के गले लग हिलक हिलक के रो रहा था। .

डॉ. मंजरी शुक्ला

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