सोमवार, 16 जनवरी 2017

शब्द संधान / मन की मनमानी / डा. सुरेन्द्र वर्मा

हमारा मन बड़ी ‘मनमानी करता है’। मन है कि कहीं ‘टिकता’ ही नहीं । भाषा में ही वह न जाने कितने कितने काम कर लेता है । मन ‘भटकता है’, मन कभी कभी कहीं ‘अटक’ भी जाता है । पर अधिकतर ‘डोलता रहता’ है । मन ‘उलझता’ है । जिससे मन ‘मिलता’ है उस पर अक्सर ‘आ’ भी जाता है । पर जल्दी ही मन ‘भर जाता है’। ‘उखड़ जाता’ है । मन ‘‘मानता नहीं’। मन उड़ाने भरता है । लेकिन ज़रूरत पड़ने पर ‘टिका’ भी रहता है । मन अपनी मनमानी से चलता है । उस पर काबू पाना सचमुच बहुत कठिन है । ज़ाहिर है मन के ये सारे काम भाषाई काम हैं, और हिन्दी भाषा में ही होते हैं । वैसे हिन्दी में मन, अन्य अनेक शब्दों की तरह, संस्कृत से आया है । लेकिन अपने ये तमान काम वह संस्कृत में नहीं हिन्दी में ही करता है । मन संबंधी ये सारी अभिव्यक्तियाँ ठेठ हिन्दी भाषा की अभिव्यक्तियाँ हैं ।

भारत की पुराकथाओं के अनुसार “मनु” ब्रह्मा का मानस पुत्र है । उसे किसी ने पैदा नहीं किया है । वह स्वायम्भुव है । पर हम सब उसी की औलाद हैं ; हम सब मनुज इसीलिए कहलाते हैं , और मनु, मनु इसलिए है कि उसके पास एक मन है । मन से ही मनुष्य शब्द आया है । मनुष्य अपने मन से, वचन से और कर्म से जाना जाता है – मनसा, वाचा और कर्मणा । इसमे मन सर्वोपरि है । मन मुख्यत: मनीषा है – बुद्धि है । मनीषी वह है जो बुद्धिमान हो, जो अपनी बुद्धि का सही उपयोग कर सके । मनीषिका, मनोषित (मन से चाहागया) भी मन से ही जुड़े शब्द हैं ।

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मन को जोड़ कर ही मन-गढ़ंत, मन-वांछित, मन-भाया, मन-भावन, मन-माना, मन-मोदक, मनहर अदि शब्द बने हैं । मन:कान्त, मन:काम, मन:ताप, मन:तुष्टि, मन:तृप्ति, आदि शब्द भी इसी प्रकार के हैं ।

कामदेव को ‘मनोज’ कहा गया है। ‘मनोभव’, ‘मनोभू’, ‘मनोमथन’, ‘मनोयोनि’, ‘मनमय’ आदि शब्द भी कामदेव के लिए उपयोग में लाए जाते हैं । आखिर कामदेव (प्रेम / वासना) का निवास तो मन में ही होता है । विष्णु को मनश्रेष्ठ और मन पर राज करने वाला ‘मन:पति’ कहा गया है ।

अरबी भाषा में कम से कम ऐसे दो शब्द तो बड़ी आसानी से मिल जाते हैं जो मन के बेहद नज़दीक हैं । ये हैं –‘मनशा’ और ‘मनसूबा’ । सामान्य बोलचाल की देशज हिन्दुस्तानी में इन्हें ‘मंशा’ और ‘मंसूबा’ भी कहा जाता है । मनसा इरादे को, इच्छा को, कहते हैं । मन भी तो संकल्प-विकल्प का ही माध्यम है । इसी प्रकार ‘मनसूबा’ भी है । मंसूबा योजना या युक्ति है । योजना बनाना भी मन का ही एक काम तो है । एक और शब्द है, ‘मनहूस’ । उदासी से भरा अशुभ व्यक्ति मनहूस कहलाता है । यह उदासी भी तो मन की ही उपज है ।

मन एक तौल का पैमाना भी है । चालीस सेर का एक ‘मन’ हुआ करता था । अब तो यह तौल पुरानी पड़ गई है और इसे अब इस्तेमाल नहीं किया जाता । अब तो जब हम कभी यह भी कहते हैं कि हमारा मन आज ‘भारी’ है तो भी इस भारीपन को चालीस सेर वाले मन से तोला नहीं जा सकता । वस्तुत: मन की तौल अभी तक बनी ही नहीं है ।

मन की एक मनोव्यथा यह भी है कि उसे आजतक निर्णायक रूप से परिभाषित ही नहीं किया जा सका है । भारतीय दर्शन में उसे नाक,आँख, कान आदि की तरह की एक इन्द्रिय मान लिया गया गया है । ( यह भी एक मनमानी बात ही लगती है) ।बस यह एक बाह्य इन्द्रिय न होकर एक आतंरिक इन्द्रिय है जो हमारे ज्ञान, संवेदन, संकल्प-विकल्प का साधन है । भारतीय मनोविज्ञान इसी ‘मन’ का विधिवत अध्ययन है । किन्तु मुश्किल यह है कि आतंरिक होने के नाते इस ‘मन’ का वस्तुनिष्ठ अध्ययन किया तो किया कैसे जाए ? इसके अतिरिक्त कम से कम हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में मन और आत्मा समानार्थक हैं – हम यदि कहें, हमारा मन गवाही नहीं देता या कि कहें, हमारी आत्मा गवाही नहीं देती- बात एक ही है । आज भी दर्शनशास्त्र में शरीर और मन के सम्बन्ध की तलाश देह और आत्मा के सम्बन्ध की तलाश ही है जो अभी तक किसी निर्णायक बिंदु तक पहुँच ही नहीं सकी है । पाश्चात्य मनोविज्ञान ने इसीलिए आत्मा और मन को अस्वीकार कर ‘व्यवहार’ को अपने अध्ययन का विषय बनाया है । व्यवहार का जो हमारे मन की गतिविधियों की ओर ही संकेत करता है, वस्तुनिष्ठ अध्ययन बेशक संभव है ।

अंग्रजी में मन के लिए माइंड (mind) शब्द का इस्तेमाल हुआ है । दोनों म-कार होने के नाते कहीं न कहीं सम्बंधित तो लगते ही हैं ।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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