रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

माह की कविताएँ : गणतंत्र दिवस विशेष कवि-सम्मेलन

रमेश शर्मा


दोहे गणतंत्र दिवस पर

कहलाता गणतंत्र का, दिवस राष्ट्रीय पर्व !
होता है इस बात का , हमें हमेशा  गर्व !!

रचें सियासी बेशरम  ,जब-जब भी  षड्यंत्र !
आँखें  मूँद खड़ा विवश, दिखा मुझे  गणतंत्र !!

हुआ पतन गणतंत्र का, बिगड़ा सकल हिसाब !
अपराधी नेता हुए, ……..सिस्टम हुआ खराब !!

राजनीतिक  के लाभ का, ..जिसने पाया भोग  !
उसे सियासी जाति का, लगा समझ लो रोग !!

यूँ करते हैं आजकल, राजनीति में लोग !
लोकतंत्र की आड़ में, सत्ता का उपभोग !!

भूखे को रोटी मिले,मिले हाथ को काम !
समझेगी गणतंत्र का, अर्थ तभी आवाम !!

[ads-post]


000000000000

अमरपाल सिंह ‘ आयुष्कर ’

 

1 - संसार में उसको आने दो ..........
संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो
हर दौर गुजरकर देखेगी
खुद फ़ौलादी बन जाएगी
संस्कृति सरिता -सी बन पावन 
दो कुल मान बढ़ाएगी
आधी दुनिया की खुशबू भी
अपने आँगन में छाने दो
संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो

तुम वसुंधरा दे दो मन की
खुद का आकाश बनाएगी
इतिहास रचा देगी पल –पल
बस थोड़ा प्यार जो पाएगी
हर बोझ को हल्का कर देगी
उसको मल्हार - सा गाने दो
संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो


उसका आना उत्सव होगा
जीवन – बगिया  मुस्काएगी
मन की  घनघोर निराशा को 
उसकी हर किलक भगाएगी
चंदामामा की प्याली में
उसे पुए पूर के खाने दो
संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो

जाग्रत देवी के मंदिर- सा
हर कोना , घर का कर देगी
श्रध्दा के पावन भाव लिए
कुछ तर्क इड़ा - से गढ़  लेगी
अब  तोड़ रूढ़ियों के ताले
बढ़ खोल सभी दरवाजे दो

संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो |

 

2- भैया !

भैया अम्मा से कहना
जिद थोड़ी  पापा से करना
मन  की बाबा से बाँच
डांट, दादी की खा लेना
मुझको बुला ले ना !
मुझको बुला ले ना !

रक्खे हैं मैंने, ढेरों खिलौने
सपनों के गुल्लक ,तुझको  हैं  देने
घर मैं आऊँगी  ,बन के दिठोने
नेह  मन में जगा लेना
मुझको बुला ले ना !
कोख में  गुम हुई ,
फिर  कहाँ   आऊँगी 
दूज ,  राखी के पल 
जी  नही   पाऊँगी
छाँव थोड़ी बिछा देना
मुझको बुला ले ना !
 

ईश वरदान हैं,बेटियां हैं दुआ
डूबती सांझ का ,दीप जलता हुआ ,
इक  नए युग सूरज,
सबके भीतर उगा देना
मुझको बुला ले ना !
मुझको बुला ले ना !

3  - बेटियाँ  मेरे  गाँव की .....

बेटियाँ मेरे गाँव की.....
किताबों से कर लेतीं बतकही
घास के गट्ठरों में खोज लेंतीं
अपनीं शक्ति का विस्तार
मेहँदी के पत्तों को पीस सिल-बट्टे पर
चख लेंतीं जीवन का भाव
सोहर ,कजरी तो कभी बिआहू  ,ठुमरी की तानों में
खोज लेतीं आत्मा का उद्गम
भरी दोपहरी में  , आहट होतीं छाँव की
बेटियाँ , मेरे गाँव की..........................

द्वार के दीप से ,चूल्हे की आंच तक
रोशनी की आस जगातीं
पकाती रोटियाँ, कपड़े सुखातीं  ,
उपले थाप मुस्कुरातीं
जनम ,मरण ,कथा ,ब्याह 
हो आतीं सबके द्वार ,
बढ़ा आतीं रंगत मेहँदी, महावर से
विदा होती दुल्हनों के पाँव की
बेटियाँ मेरे गाँव की ...........................

किसके घर हुए ,दो द्वार
इस साल  पीले होंगे , कितने  हाथ
रोग -दोख ,हाट - बाज़ार 
सूंघ  आतीं ,क्या उगा चैत ,फागुन , क्वार
थोड़ा दुःख निचोड़ ,मन हलकातीं ,
समेटते हुए घर के सारे काज
रखती हैं खबर,  हर ठांव की
बेटियाँ मेरे गाँव की ................................
जानतीं - विदा हो जायेंगी एक दिन
नैहर रह लेगा तब भी , उनके बिन
धीरे –धीरे भूल जातें हैं सारे ,
रीत है इस गाँव के बयार की
फिर भी बार - बार बखानतीं
झूठ – सच  बड़ाई जंवार की
चली आती हैं पैदल भी
बाँधने दूर से ,डोरी प्यार की
भीग जातीं ,सावन के  दूब –सी
जब मायके से आता  बुलावा
भतीजे के मुंडन , भतीजी की शादी ,
गाँव के ज्योनार, तीज ,त्यौहार की
भुला सारी नीम - सी बातें
बिना सोये गुजारतीं ,कितनी रातें
ससुराल के दुखों को निथारतीं
मायके की राह , लम्बे डगों नापतीं
चौरस्ता ,खेत –खलिहान ,ताकतीं
बाबा ,काकी ,अम्मा, बाबू की बटोर आशीष
पनिहायी आँखों , सुख-दुःख बांटतीं
कालीमाई थान पर घूमती हुई फेरे
सारे गाँव की कुसल - खेम मांगतीं
भोली , तुतली दीवारों के बीच नाचतीं
समोती  अपलक उन्हें ,बार –बार पुचकारतीं
देखकर चमक जातीं,  छलकी  आँखे
फलता- फूलता  ,बाबुल का संसार
दो मुट्ठी  अक्षत ,गुड़ ,हल्दी, कुएं की दूब से
भर आँचल अपना , चारों ओर  पसारतीं
बारी –बारी पूरा गाँव  अंकवारती
मुड़ - मुड़ छूटती राह निहारतीं
बलैया ले , नज़र उतारतीं
सच कहूं ...................................
दुआएं उनकी ,पतवार हैं नाव की
बेटियाँ मेरे गाँव की .....................\
--.
परिचय -
जन्म :    1  मार्च 
ग्राम- खेमीपुर, अशोकपुर , नवाबगंज जिला गोंडा , उत्तर - प्रदेश           
दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान ,कादम्बनी,वागर्थ ,बया ,इरावती ,प्रतिलिपि, सिताबदियारा ,पुरवाई ,हमरंग आदि में  रचनाएँ प्रकाशित
2001   में   बालकन जी बारी संस्था  द्वारा राष्ट्रीय  युवा कवि पुरस्कार 
2003   में   बालकन जी बारी -युवा प्रतिभा सम्मान
आकाशवाणी इलाहाबाद  से कविता , कहानी  प्रसारित
‘ परिनिर्णय ’  कविता शलभ  संस्था इलाहाबाद  द्वारा चयनित
मोबाईल न. 8826957462     mail-  singh.amarpal101@gmail.com

00000000000000

मेराज रज़ा


कविता
सैनिक धर्म
भारत माँ के शेर हम
नहीं किसी से डरते हैं
सीमा पर खड़े बंदूक तान
वतन की हिफाजत करते हैं ।
होली हो या दिवाली
ईद हो या मुहर्रम
रात-दिन सीमा पर होते
निभाते अपना सैनिक धर्म ।
रात भर जागते हम
तब सारा देश सोता है
साथी कोई शहीद होता जब
दिल अपना खूब रोता है।
हम रहें या न रहें
तिरंगा सदा लहरायेगा
हमें आंख दिखाने वाला
नक्शे से मिट जायेगा।
--
कविता
बेटी
बेटी है तो रौनक है,
खुशी है, बहार है
बेटी नहीं जिस घर में
वह घर बेकार है।
बेटियों से ही होती
हर घर में नूर
रौशन करती पूरी दुनिया
खुशियाँ लाती भरपूर।
बेटियां ही बनती हैं
एक दिन माँ
पालती-पोसती हमें
दिखाती यह जहां।
फिर बेटियों से क्यूँ
नफरत हम करते हैं
बेटी के जन्म पर
मन उदास करते हैं।
बेटियों को ही सींचो
बेटों की तरह
खूब पढ़ाओ-लिखाओ
बनाओ साक्षी की तरह।


कविता
इतिहास में अमर कहानी बन जा

कब तक शर्मसार होगी तू
कब तक बनेगी तू निर्भया
कब तक लुटेगीं तेरी इज्जत
कब सम्मान देगी यह दुनिया?

कलयुग की तू नारी है
सब पर तू भारी है
दिखा दे अपनी नारीशक्ति
किस बात की लाचारी है?

भूल गई है तू शायद
लक्ष्मीबाई भी नारी थी
कांपती थी अंग्रेजी हुकूमत
अकेली अंग्रेजों पर भारी थी ।

तू भी एक चिंगारी बन जा
लक्ष्मीबाई झांसी की रानी बन जा
दुष्टों-पापियों का कर दे अन्त
इतिहास में अमर कहानी बन जा।
---
ग़ज़ल
1
स्याही में कलम डूबा रहा हूं
शब्द से शब्द मिला रहा हूं

टूट न जाऊं शीशे की तरह
गम अपने आंसू में बहा रहा हूं

अच्छे दिन भले हो एक सपना
सपनों में ही सपने सजा रहा हूं

घूप अंधेरा है इस जहां में
छोटा एक दिया जला रहा हूं

बिक जाती है हर चीज़ यहां
इसलिए खुद को बचा रहा हूं
2
बहके आपके जजबात क्यूं है
धूप में भी बरसात क्यूं है

वे कहते हैं सब ठीक है
इतने बुरे हालात क्यूं है

जला खुद को की रोशनी
फिर काली रात क्यूं है

हम सब हैं जब एक समान
लिखा कागज पे जात क्यूं है
------.
कविता
नये साल में

नये साल में
नयी उम्मीदें
नया उमंग
नया उल्लास
दुआ करें
खुशियो की बारिश में
नित्य नहाये सब
ना हो कोई उदास।

नये साल में
नयी राहें
नयी मंजिले
नयी इबारत
दुआ करें
चांद- तारों से भी आगे
तरक्की के बांध धागे
चमके भारत।

नये साल में
नये आयाम
नये सोपान
नित्य गढे हम
और साथ ही
कालाधन बाद में
पहले सफेद कर लें
अपना काला मन।

सम्पर्क सूत्र:-

ईमेल - merajraja.bazidpur@gmail.com


मेराज रज़ा
ग्राम+पोस्ट-बाजिदपुर,
थाना-विद्यापतिनगर,
जिला-समस्तीपुर,
बिहार-848503


0000000000000

डाँ. शोभा श्रीवास्तव


ये आजकल जमाने भर में चर्चा बहुत है।
आदमी अच्छा है मगर सोचता बहुत है।
समय के आईने से अब छँटने लगी है धूल,
चेहरा जो उसमें उभरा है वो भाता बहुत है।
छोड़ो, अब कहाँ ढूँढोगे अमराईयों की छाँव,
वैशाख में तो बरगद का साया बहुत है।
जिस शख़्स की परवाह कभी की नहीं मैंने,
अक्सर मुसीबतों में वही मिलता बहुत है
उनका नसीब, जिनको मंजिलें नज़र हुईं,
मेहनत से जो मिला हमें वो 'शोभा' बहुत है॥
रचनाकार में प्रकाशनार्थ।
                        
                        राजनाँदगाँव, छत्तीसगढ़

00000000000000

सुशील शर्मा


माँ तेरे बेटे ने वक्षस्थल पर गोली खाई है
(एक शहीद का अंतिम पत्र )


अपने शोणित से माँ ये अंतिम पत्र तुझे अर्पित है।
माँ भारती के चरणों में माँ ये शीश समर्पित है।
माँ रणभूमि में पुत्र ये तेरा आज खड़ा है।
शत्रु के सीने पर पैर जमा ये खूब लड़ा है।
कहा था एकदिन  माँ तू पीठ पे गोली मत खाना।
शत्रु दमन से पहले घर वापस मत आ जाना।
सौ शत्रुओं के सीने में मैंने गोली आज उतारी है।
माँ तेरे बेटे ने की शत्रु सिंहों की सवारी है।
भारत माँ की रक्षा कर तेरे दूध की लाज बचाई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

मातृभूमि की धूल लपेटे तेरा पुत्र शत्रु पर भारी है।
रक्त की होली खेल शत्रु की पूरी सेना मारी है।
वक्षस्थल मेरा छलनी है लहू लुहां में लेटा हूँ।
गर्व मुझे है माँ तुझ पर मैं सिंहनी का बेटा हूँ।
मत रोना तू मौत पे मेरी तू शेर की माई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।


पिता आज गर्वित होंगें अपने बेटे की गाथा पर।
रक्त तिलक जब देखेंगे वो अपने बेटे के माथे पर।
उनसे कहना मौत पे मेरी आँखें नम न हो पाएं।
स्मृत करके पुत्र की यादें आंसू पलक न ढलकाएं।
अब भी उनके चरणों में हूँ महज शरीर की विदाई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

उससे कहना धैर्य न खोये है नहीं अभागन वो ।
दे सिन्दूर माँ भारती को बनी है सदा सुहागन वो।
कहना उससे अश्रुसिंचित कर न आँख भिगोये वो।
अगले जनम में फिर मिलेंगें मेरी बाट संजोये वो।
श्रृंगारों के सावन में मिलेंगें जहाँ अमराई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

स्मृतियों के पदचाप अनुज मेरे अंतर में अंकित हैं।
स्नेहशिक्त तेरा चेहरा क्या देखूंगा मन शंकित है।
ह्रदय भले ही बिंधा है मेरा रुधिर मगर ये तेरा है।
अगले जनम तू होगा सहोदर पक्का वादा मेरा है।
तुम न रहोगे साथ में मेरे कैसी ये तन्हाई है।
माँ से कहना मैंने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

बहिन नहीं तू बेटी मेरी अब किस को राखी बांधेगी।
भैया भैया चिल्लाकर कैसे तू अब नाचेगी।
सोचा था काँधे पर डोली रख तेरी विदा कराऊंगा।
माथे तिलक लगा इस सावन राखी बँधवाऊंगा।
बहना तू बिलकुल मत रोना तू मेरे ह्रदय समाई है।
माँ से कहना मैंने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

पापा पापा कह कर जो मेरे काँधे चढ़ जाती थी।
प्यार भरी लोरी सुन कर वो गोदी में सो जाती थी।
कल जब तिरंगें में उसके पापा लिपटे आएंगे।
कहना उससे उसको पापा परियों के देश घुमाएंगे।
उसको सदा खुश रखना वो मेरी परछांई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

माँ भारती के भाल पर रक्त तिलक चढ़ाता हूँ।
अंतिम प्रणाम अब सबको महाप्रयाण पर जाता हूँ।
तेरी कोख से फिर जन्मूंगा ये अंतिम नहीं विदाई है।
माँ तेरे बेटे ने अपने वक्षस्थल पर गोली खाई है।

(सभी शहीदों को समर्पित )
---.
*सुनो कश्मीर फिर लौट आओ*

 

सुनो कश्मीर तुम तो ऐसी न थीं।
तुम तो अमित सौंदर्य की देवी थीं

पर्वतों पर हिमश्रृंगार करती थीं
अप्सरा बन कर जमीं पर उतरतीं थीं

उतुंग शिखरों पर सूरज की सुनहरी किरण थीं।
जैसे दुल्हन की चांदबिन्दी मनहरण थीं।

चिनार के पत्तों से ढका आँचल तुम्हारा था।
डल झील के बीच में एक प्यारा शिकारा था।

तुम्हारे पास गुलमर्ग के लंबे कोनिफर थे।
सोनमर्ग के पाइन और पहलगाम के देवदार थे

श्रीनगर की पश्मीना शॉल थी तुम
जम्मू में वैष्णो देवी की ढाल थी तुम

अनंत नाग के घने जंगल कहाँ खो गए।
कश्मीरी केसर कैसे जहर हो गए।

किसने छोटे बच्चों के स्कूलों को जलाया है।
किसने कश्मीरी जवानी को फुसलाया है।

किसने सुरीले संगीत को विस्फोटों में बदला है।
किसने भूखे बच्चे के दूध को बमों से निगला है।

किसने संविधान की सीमाओं को ललकारा है।
किसने कश्मीर की अस्मिता को दुत्कारा है।

सुनो कश्मीर तुम्हे किसी की नज़र लगी है।
खून से लथपथ तुम्हारी हर गली है।

किताबों की जगह हाथों में तुम्हारे पत्थर हैं।
तुम्हारी क्यारियों में फूलों की जगह नस्तर हैं।

जहाँ अजानों और भजनों की आशनाई थी।
जहाँ हरदम बजती सुरीली शहनाई थी।

आज वहां नफरत का मंजर है।
सभी के हाथों में खूँरेज खंजर है।

आतंक के मंसूबे बुने जा रहे हैं।
भारत विरोधी स्वर सुने जा रहे हैं।

हर पत्थर तुम्हे लहूलुहान कर रहा है।
तुम्हारा ही खून तुम्हे श्मशान कर रहा है।

सुनो कश्मीर बच सको तो बचो इस बहशी बबंडर से।
सुनो कश्मीर लौट आओ इस खूनी समंदर से।

फिर से क्यारियों में केसर महकने दो।
दो फूल मुहब्बत के इस धरती पे खिलने दो।

पढ़ने दो पाठ बच्चों को इंसानियत के।
मत बनो खिलौने फिर से हैवानियत के।

एक बार फिर भारत का मुकुट बन जाओ।
सुनो मेरी कश्मीर अब दिल न दुखाओ।
सुनो प्यारी कश्मीर अब लौट आओ।

--.
मुझे पढ़ना है ऐसी रचना


कोई रचना ऐसी लिखना जिसमें
मैं माँ से रूठ कर मुँह फुला कर बैठा होऊं।
कोई रचना लिखना जिसमें माँ
आँगन के चूल्हे पर ज़्वार की हाथ की रोटी बना रही हो।
कोई रचना बताना जिसमें चिड़िया
चोंच में दाना रख कर चूजे को चुगाती हो।
कोई रचना लिखना जिसमें मजदूर की
फटी बनियान से पसीने  बदबू की कहानी हो।


कोई रचना जिसमें नीले आसमान के नीचे
खेत में फसलों बीच मेरा दौड़ना हो।
कोई ऐसी रचना लिखना जिसमें अम्मा
पड़ोसन फातिमा से लड़ रही हो और
फातिमा की गोद में बैठा मैं रोटी का खा रहा हूँ।
कोई सी रचना जिसमें दादाजी खाट पर लेटे हों
और बाबूजी उनके पैर दबाते हों।


दादी अम्मा को चिल्लाती हों और
अम्मा घूँघट डाले मुस्कुरातीं हों।
एक रचना लिखना जिसमें कुहासे में
शाल में लिपटी दो नीली आँखें
किसी का इन्तजार करती हों।
कोई रचना हो तो बताना जिसमें खबर हो
की सीमा पर माँ के बेटे ने सीने पर गोली खाई है।
कोई रचना लिखना जिसमें डल्लू
फटी कमीज पहने फटा बस्ता लटकाये
सरकारी स्कूल की फटी फट्टी पर बैठा है।
कोई रचना हो तो बताना जिसमें
बचपन पेट के लिए कप प्लेट धो रहा हो।
एक रचना मुझे लिखना है जिसमें
पड़पड़ाती बारिश में नदी में कूदता मेरा बचपन हो।


एक रचना लिखना है जिसमें साईकिल
चलाता मैं और मेरे पीछे भागता मेरा भाई हो।
रचना रच सको तो रचना जिसमें
शहर के कोलाहल से भरा बियावान हो।
जिसमें गांव की आकर्षक निःस्तब्धता हो
जिसमें खलिहान में बनती दाल बाटियों हों।
कोई रचना लिखना जिसमें
अबोध बालक सी मासूमियत हो।
दुःख की सिलबिलाहट हो।
जिसमें सुख की लबलबाहट हो।


एक रचना जिसमें नदी के
लुटे किनारों की कथा हो।
जिसमें सत्ता में शुचिता की व्यथा हो।
कोई रचना लिखो जिसमें
शहर के अजनबी होते चेहरे हों
जिसमें भविष्य के स्वप्न सुनहरे हों।
एक रचना  जो साहित्य के व्याकरण से अबोली हो ।


जिसमें गांव की गोरी की ठेठ बोली हो।
कोई रचना जिसमें आम आदमी के बड़े काम हों।
जिसमें सत्ता की जगह श्रमिकों के नाम हों।
जिसमें माँ बाबूजी के चरणों पर मेरा सिर हो।
जिसमें संस्कारों का किस्सा अमर हो।
एक रचना जिसमें शब्दकोषों से दूर सृजन हो
जिसमें भावों से भरा भजन हो।
एक रचना जिसमें स्वयं से मुलाकात हो
एक रचना जिसमें जिसमें बिना बोले बात हो।


एक रचना जिसमें लाइन में खड़ा गरीब हो।
जिसमें गुलाबी नोट लहराता अमीर हो।
एक रचना लिखना जिसमें मैं अकेला
और तुम तन्हा तारों के  पास बैठे हों।
एक रचना जिसमें मुस्कुराहटें दर्द समेटें हों।
रचना का कोई ऐसा संसार हो तो बताना
जिसमें साहित्य का न हो व्यापार तो बताना।

---.
ताँका-15
नव वर्ष

नए आयाम
नए कर्तव्य पथ
नया मुकाम
दूर होगी मुश्किल
सामने है मंजिल।

शांति स्थापना
चहुमुँखीं विकास
प्रेम भावना
सत्य समाहित हो
मन न आहत हो।

सत्य को लिखो
आचरण में दिखो
प्रेम को चखो
स्वर विनम्र रखो
मन से नम्र दिखो।

नव सन्देश
सरस्वती साधना
नित्य रचित
रचना की कामना
साहित्य आराधना


तांका-16
एक लड़की
बर्तन थी मांजती
गिद्ध निगाहें
आशंकित मन
थरथराता तन।

प्रेम अपार
जीवन का आधार
पिया का संग
तन भरे उमंग
मन है सतरंग

दर्द के पल
रोती मुस्कुराहटें
घायल शब्द
दशमलव मन
बौना होता अस्तित्व।

देह देहरी
भौतिक अनुभूति
आत्म संकल्प
प्रेम की उपासना
आध्यत्मिक साधना

 

*तांका*-17
रुको सुबह
भूख से लड़कर
गरीब बच्चा
झोपडी में सोया है
रात भर रोया है।

एक चिड़िया
खेलती थी गुड़िया
सहमे स्पर्श
निषिद्ध सी गलियां
फूल बनी कलियां।

निखरे चित्र
बिखरे से चरित्र
यादों की बस्ती
रिश्ते टिके आसो पे
रिश्ते है लिबासों से।

समूचा चाँद
चांदनी सा पिघला
सर्द सी रातें
कलकल बहती
रिश्तों की इबारत

बहता जाये
समय का दरिया
उम्र को बांधे
रेत सा फिसलता
मुट्ठी से निकलता।


--
हाइकु-61
*विभिन्न रंगों के बिम्ब*


ढलती साँझ
अलसाया आसमां
रक्तिम सूर्य।

कोरी चूनर
रंग गई फ़ाग में
लाल गुलाल।

दर्द का रंग
टूटा और आहत
लगे बेरंग।

हरी कोंपल
उम्मीद का दामन
आशा का रंग।

लाल रंग
चैतन्य का स्वरुप
देवी का रूप।

नील लोहित
समंदर विशाल
समय काल।

रंगा यौवन
गाल पर गुलाल
ओंठ पलाश।

रंग बसंती
आज़ादी की बहार
देश से प्यार।

चेहरे जर्द
मन पुती कालिख
इंसानी रंग।

गोरी के अंग
साजन सतरंग
हिना के संग।

रोटी का रंग
कितना बदरंग
गरीब तंग।
हाइकु-58


ओस की बूंदें
चमकती मोती सी
घास पे सोतीं।

कोहरा घना
ठण्ड में सिकुड़ता
वो अनमना।

ठंडी चादर
कोहरे का लिबास
ओढ़े सुबह।

जले अलाव
गांव के आँगन में
लगी चौपाल।

पूस की रात
ठिठुरती झोपडी
सिकुड़े तन।

प्यारी सुबह
कोहरे की रजाई
ओढ़ के आई।

एक तपन
अलाव अलगाव
एक चुभन।

हिम का पात
शीत कालीन छुट्टी
सैलानी मस्त।

जाड़े से लदी
कुहरे का आँचल
ठिठुरी नदी।

रश्मि किरण
ओस बिंदु पे पड़ी
मोती की लड़ी।


हाइकु-60
*मृगतृष्णा*

मृगतृष्णा सी
कितनी भटकन
तेरी चाहत।

शब्द संगीत
थिरकती कविता
लय का नृत्य।

चाँद समूचा
दरिया सा बहता
रूप में तेरे।

रूप तुम्हारा
तुलसी का विरबा
मन को प्यारा।

थकी सी नींद
महकती धूप में
आँखों पे सोई।

फिर निकला
भागता सा सूरज
सहमी ओस।

आँसू की बूँद
बनी है समंदर
डूबता मन।

0000000000000

कुमार करण मस्ताना


देश बचाओ


धू-धू जलती आग बुझाओ,
हे कर्णधारों! देश बचाओ!

चोर ख़जाना लूट रहा
घर जर्ज़र हो टूट रहा
रिसता गागर लो संज्ञान
समृद्धि होती निष्प्राण
आँखें खोलो जाग भी जाओ,
हे कर्णधारों! देश बचाओ!

विविध जाति-धर्म के कीड़े
बाँट रहे हैं बस्ती-नीड़े
यही षड्यंत्र हो रही आज
डालो फूट और करो राज
इनके झांसे में ना आओ,
हे कर्णधारों! देश बचाओ!

 

दीप हुई है तम से त्रस्त
उम्मीद की किरणें होती अस्त
साहस किसमें,मुँह खोले कौन
सबने साध रखा है मौन
नवक्रांति की दीप जलाओ,
हे कर्णधारों! देश बचाओ!

सिसकी यह जन-जन की सुन
चूस रहे अपने ही खून
घोर घटा संकट की छाई
अपनी इज्ज़त दांव पे आई
पुनः खोई गरिमा लौटाओ,
हे कर्णधारों! देश बचाओ!

लुटेरों का बढ़ता शासन
डोल रहा है राजसिंहासन
अपाहिजों के वश में सत्ता
देश बना है सूखा पत्ता
उपवन की हरियाली लाओ,
हे कर्णधारों! देश बचाओ!


कल तक था जो स्वर्ग समान
धूमिल होती उसकी पहचान
                        जो एक सपूत करता है सदा
        कर मातृभूमि का कर्ज़ अदा
        आओ हाथों से हाथ मिलाओ,
        हे कर्णधारों! देश बचाओ!

                                                                             Kumar karan mastana
0000000000000

महेन्द्र देवांगन "माटी"


तीन रंगों का प्यारा झंडा
*********************
तीन रंगों का प्यारा झंडा, शान से हम लहरायेंगे ।
कभी नहीं हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे ।
कोई दुश्मन आंख उठाये, उनसे न घबरायेंगे ।
जान की बाजी खेलकर अपनी, हम तो इसे बचायेंगे ।
भारत मां के बेटे हैं हम , गीत प्यार के गायेंगे 
कभी नहीं हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे 
आंधी आये तूफां आये , रुक नहीं हम पायेंगे ।
दुश्मन की सीना को चीरकर, आगे आगे बढ़ते जायेंगे ।
है अपना ये प्यारा झंडा , चोटी पर लहरायेंगे ।
कभी नहीं हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे ।
भारत माता सबकी माता, सुंदर इसे बनायेंगे ।
भेदभाव हम नहीं करेंगे, सबको हम अपनायेंगे।
शांति का संदेश लिये हम , नये तराने गायेंगे ।
कभी नहीं हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे
तीन रंगों का प्यारा झंडा, शान से हम लहरायेंगे।
कभी नहीं हम झुकने देंगे, आगे बढ़ते जायेंगे ।
****************


गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला -- कबीरधाम  (छ ग )
पिन - 491559
मो नं -- 8602407353
Email - mahendradewanganmati@gmail.com
0000000000000

शशांक मिश्र भारती


हाइकु
 
01:-
प्रेम का रस
अमोलक सुधा
विरले पाते।
02:-
डूब करके
नीली आंखों में प्रेमी,
खोजें किनारा।
03:-
श्रृंगार का है
अवलम्‍बन नारी,
यदि दर्शाता।
04:-
पा सकते हैं
गहरे समुद्र में,
सीप या मोती।
05:-
श्रम का फल
समुद्र सी गहृर
रेत पे नहीं।
06:-
मेरी आंखों से
मिलते नयन न,
बिछुड़ी रातें।
07:-
भाग्यशाली ही
प्रेमानुभूति करे
निष्‍ठुर नहीं।
08:-
मेरी प्रतीक्षा
समाप्‍त नहीं होती,
आये तो कोई।
09:-
उसने देखा
था न मैं न अस्‍तित्‍व,
आज वो नहीं।


10:-
अज्ञानी जन
ज्ञान उपजाकर
पाते ईश्वर।
11:-
काबा न काशी
तीर्थ, व्रत न उवासी,
हृदय खोलो।
12:-
जन-मन में
दरिद्र नारायण,
न कंगूरों में।
13:-
ईमानदारी
आज भी मिलजाती,
गरीब में है।
14:-
विष विटप
मिटाये न मिटता,
जड़ रहती।
15:-
मधुर फल
मधुरता से होते,
कटुता से नहीं।
16:-
नाम करेला,
सानिध्‍य नीम सा,
सोचिए स्‍वाद।
17 ः-
बिकता सब
स्‍वार्थ की भेंट,
न सद्‌ज्ञान।
18:-
प्रदूषण से
उठती धूल-धुंआं,
कांपती धरा।
19:-
स्‍वर्ग-नरक
हमसे उपजता,
न कोई अन्‍य।
20:-
गीता कहती
कर्मेण्‍वाधिकारेस्‍तु,
देखो न फल।

 

21:-
जो खोजते हैं,
अर्न्‍तचक्षुओं द्वारा,
पाते उद्‌देश्य।
22:-
चहुंओर है
संघर्ष ही संघर्ष,
अहं के हित।
23:-
प्रभुत्‍व चाहा
प्रत्‍येक जन ने है,
सदा धरा का।
24:-
प्रतिस्‍पर्धाएं
गीत को लेकर हैं,
उठाती मन।
25:
तन हो मन
मिटते संघर्ष में
तीव्र गति के।
26:-
श्रृंगार का ही
युगों से आलम्‍बन,
सुघड़नारी।


शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्‍दी सदन बड़ागांव षाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी ः-

 

0000000000000

शर्मिला कुमारी  


और  कह नहीं सकती
जिनके साथ बनता है मेरा संसार.                  
वही क्यों इतना बदलते हैं.                                                                                      

धुंधलके के साथ.                                                                                                                                

मन में उतरता है भय.                                                                                                                              

ज्ञात और अज्ञात दोनों तरफ से.                                                                                                               

धीरे धीरे और बढ़ता है.                                                                                                                   

आखिर क्यों                                                                                                                                       

बदल जाती है क्या दुनिया अंधेरों में
या कि ऐसा हमारा मन बना है                                       
संसार के बितान और मेरे बीच                                                                                                               

ऐसा क्या तना है....क्या भूत.                                                                                                      

  कि जिस को सूरज तोड़ नहीं सकता                                                                                                

कि जीवन छोड़ नहीं सकता
और अब तो खुल रहे हैं राज
बदल रही हैं परिभाषाएँ,मान्यताएँ गढ़ी
पता चलता है कि अंधेरा ही ज्यादा है
और अस्तित्व उस पर ही टिका है
कि पदार्थ तो अविनाशी है
परिवर्तित होते है मात्र
मर जाती है इसपर टिकी प्रतिक्रियएँ
आत्मा मर जाती है
अब तो नया एकदम नया है सत्य
यह ज्ञान की सीमा में एक खेल है भावनाओं का
कि कल्पनाएँ खोजती रहती है इस चोर को
वस्तुनिष्ठा और आत्मनिष्ठा की गली में
और अब हम देख सकते हैं नये संध्या और भोर को
भ्रम और यथार्थ को हम ढ़ाँप सकते हैं
नवजीवन,प्रेम का उल्लास या लज्जा से
उषा की लालिमा से बाँधते इस डोर से
और आशा को आकर्षित कर सकते हैं                                                                                             
कल्पना के रंग बिरंगी चादरों से ढ़ंक दुखों को
एक नये संसार की रचना संभव है
जिसमें वर्तमान नहीं भविष्य सच होगा
जैसा स्वर्ग की ,की थी हमने कल्पनाएँ
वैसा ही नया जीवन रचा होगा
एक नये काल्पनिक यथार्थ की दुनिया
हलाँकि कह नहीं सकती कैसी होगी यह
अनिश्चित कल्पनामय यात्रा. यह
और कितना भंयकर है यह डर   भीतर
कि ऐसा हमारा मन बना है

        आगे क्या करना है
और जब मैं वहाँ पहुंचीं
विज्ञान बहुत बड़ा हो चुका था
तकीनक का अद्भुत विकास था
पर धर्म कुछ सीखने के प्रयास में न था
सत्य भौंचक देखता पीछे पीछे चलता रहा
तेजी से हो रहे परिवर्तनों को
थककर पीपल के नीचे बैठ गया था कुपोषित ज्ञान
कल्पनाएँ प्रचण्ड ,भावनाएँ उच्छृंखल
आदमी देवताओं का इन्तजार करने लगा था
इसी कठिन समय में विष्णु से गये थे
और शिव समाधि से बाहर नहीं आये थे
चारों तरफ भूत पिशाचों का राज
कवि गुफाओं में लौट गये थे
मैंने मार्कण्डेय से पूछा , आगे क्या करना है

       आगे की आप बतलाईये
कुछ मूर्तियाँ जो अपने समय में दो पैसे की थी
उपयोग खो कर मिट्टी में दब गयी थी
खोदकर निकाली गयी और मन्दिरों में रखी जा रही है
पुरानी मूर्तियों के राज खुल रहे थे
और लोगों को संतोष के लिए चाहिए थे कुछ
हालाँकि गढ़े गये बहुत से देव पर वे वैसे न साबित हुए
आस्था कायम रख बदलना था आस्था के  केन्द्र
भजन के बोल नये भजन से
मन्दिरों को भी अत्याधुनिक बनाया गया है
बन रहे हैं नये कानून कि कहाँ झुकना कहाँ बैठना है
किनसे ज्ञान किनसे आशीर्वाद लेना है
और अखबारों को मुख्यपृष्ठ पर छापने को मिला
कौन मन्दिर कितना कमाता है
विशिष्ट लोगों ने कितना बड़ा दान दिया
फिर नये शंकराचार्य और मठाधीश बनाये जा रहे हैं
और नये नये दर्शन और इतिहास  और मीमांसा
अभी तो यह जारी है
असर का क्या कहें
हाँ बहुत कुछ बदल रहा है
और यह अब आप पर है कि
ये बदलते हैं कि आप बदलते हो

        यह तो वही बात हुई
मेरा तो जिन्दगी से ही सिर्फ नाता है
वही कुछ कुछ किया करती है हरदम
आज तो हालात है यह
कि इस कड़ाके ठंड़ में भी
जब मैं रोटी पकाने उठती हूँ
राजनीति एटीएम तक खींच के ले जाती है मुझे
बाजार की बेरौनकी से दुख होता है
पर मन में सान्तव्ना है कि जल्दी दुख खतम होगें।
कि वातावरण साफ सुथरा होगा
पर अर्थशास्त्त्रियों को मेरा इतना भी सुख सहन नहीं होता
वे बार बार घड़बड़ाये से कुछ बताते हैं
वैज्ञानिक पर्यावरण के लिए चिन्तित हैं
इससे डर लगता है मुझे भविष्य के लिए
और बुरे बुरे स्वप्न आते है
मैं अपनों को बचाना चाहती हूँ
लोग कहते हैं कि कविता को राजनीति से दूर रखो
यह तो वही बात हुई कि स्वास्थ्य के लिए भूखे रहो
आप कहिए मैं जिन्दगी की इस बेटी को लेकर कहाँ जाऊँ
मैं उसी के साथ
एक लहर जो लौट गयी / आकर किनारे
बस थोडी गीला. कर गयी/ भीतर हमारे
एक बीज अंकुरित कर गयी
एक नया सपना धर गयी
और अब बेचैन करती धूप में
तिलतिलाते हैं मेरे अरमान सारे
और अब मैं देखती इतिहास अपना
टुकड़े टुकड़ों में बटा अस्पष्ट था जो
दिखते हैं मेघ वे सुदूर जाते
और ये हहकारता विशाल सागर
एक लहर जो लौट गयी आकर किनारे
मैं उसी के साथ आयी थी यहाँ तक

       बहुत प्रयास से बनाया गया
एक बहुत व्यवस्था के साथ बनाया शहर
उसमें यह बड़ा बाजार उपलब्ध सब कुछ जहाँ
मैं अचम्भे में हूँ कि आ गयी कहाँ
पर इधर आकर दिखा यह क्या
यह तो जानवरों का बाजार है
और इस कोने में आदमियों की भरमार है
ये बिकने आये हैं यहाँ
घर बनाने वाले ,खेत में काम करने वाले
उद्योगों के लायक,ये सवारी वाले
दवा में काम के, खिलौने हैं ये
ये हैं मनोरंजन के लिए.....
अंग प्रत्यरोपण के काम के ,ये भोजनवाले ,
तरह तरह के औरत मर्द बच्चे हैं यहाँ
खानों में बटी जगह कुछ माँए खड़ी है
अपने बच्चों को बेचने के लिए लेकर
समय बहुत धीरे धीरे गुजरता है
हर समय बहुत भीड़ रहती है यहाँ
और यहाँ घूमते हैं रोबोट कई जातियों के
अपने नौकरों को साथ लिए
ये मशीन नहीं हैं बस संवेदनहीन हैं ये
हैं ये आदमी की विकसित अगली पीढ़ी
और खरीददार हैं ये इस बाजार के लिए
और खरीददार ही आज सब कुछ हैं
एक झुरझुरी सी उठी मेरे भीतर
डर में एक प्रश्न कौंधा है
क्या मैं भी बिकने के लिए हूँ बाजार में
और मुझे पता तक नहीं
मैं अचम्भे में हूँ कि कैसे आ गयी हूँ यहाँ
यह दुःस्वप्न है या सच्चाई है .
                     द्वारा - उमेश्वर दयाल
      सरस्वती नगर,चास,बोकारो  827013
  sharmila kumari c/o umeshwar dayal
  Sarswati Nagar,Chas,Bokaro     827013
000000000000

जसबीर चावला

 

क्यों नहीं उड़ते तोते
———————

हाथों के तोते नहीं उड़ते
उड़ें कैसे
आँख में पानी हो
आत्मग्लानि हो
संवेदना हो तो उड़ते हैं तोते

पँख नोंच दिये
अब मौतों की कतार हो या क़तार में मौत
नहीं उड़ते तोते
अब नहीं उड़ेंगे तोते
**

न्युरेम्बर्ग में हिटलर
——-————

अगर ज़िंदा पकड़ा जाता हिटलर
पेश होता न्युरेम्बर्ग ट्रायल में
क्या सिर झुकाए आरोप सुन लेता
मांगता माफी गुनाहों की
मुँह में तृण रख लेता
नफरत नहीं है अब विश्व के यहूदियों से
यहूदी उसके भाई हैं
बदल गये हैं उसके विचार
या तनकर बैठता
सुनता कम / मुक्के पीटता / चीखता
अवैध है न्युरेम्बर्ग जाँच ट्रायल
तुम सब दफा हो
नहीं मानता तुम्हारी संप्रभूता / अधिकारिता
ग़लीज़ यहूदी हैं इसी काबिल
सही हैं गेस्टापो / गोयेबल्स
मेरे यातना चेंबर / यहुदी निर्वासन
अपनी नस्ल की श्रेष्ठता
निभाया है मैंने राजधर्म
ग़लत हैं मुक़दमे मुझ पर
नहीं बदलेगा अपने विचार / चिंतन /आस्था
क्यों करे कोई घोषणा कि वह बदल चुका है
राजनीति वक्त के दबाव से
वह जीयेगा इन्हीं संग
मरेगा इन्हीं संग
**

फोटू हो जाना
—————

कितना आसान है एक क्षण में मर जाना
मर कर फोटू हो जाना
मँहगी फ्रेम के चोखटे में जड़ होकर जड़ जाना
चंदन का हार डल जाना
किसी उदास दीवार पर टंग जाना
*
कितना मुश्किल है
फोटू से संवाद करना
फोटू से आँख मिलाना
फोटू से आंख चुराना
**

भरी सभा में सवाल करती द्रोपदी
———————————

कुंती से जो द्रोपदी पूछती
मै मिठाई थी बराबर बँटी भाईयों में
खेती की जमीन जिसे बोना था सबने
हाड़ माँस की थी मैं
सवाल करती पाँचो पाँडव से
अर्जुन चित्रागँदा उलूपी सुभद्रा तुम्हारी पत्नियाँ हैं
युधिष्ठिर पौरवी तुम्हारी
भीम तुमने ब्याहा हिडिंबा बलन्धरा को
तुमने करेणुमति को नकुल
सहदेव तुमने विजया को
तो मैं क्या थी ?
तन मन से बंटी एक औरत !
सबकी पत्नियों की चेरी
तुमसे भी शिकायत है कृष्ण
मुझे सखि माना
मन पढ़ते कि मैंने तुम्हे क्या माना
चौसर में दाँव पर लगी थी मैं
स्तब्ध हुई काँप उठी मैं
कैसा था निर्लज्ज क्षण
तुम जुए में राजपाट हारे
बिना खेले सर्वस्व हारी मैं
अस्तित्व खोकर स्त्री से चल संपत्ती बनी
औरत की अस्मिता दाँव लगी
निरूत्तर थे पाँडव
सभा में मौन सन्नाटा होगा

महाभारत की रचना कुछ अलग ही होती
वेदव्यास ने द्रोपदी पर केन्द्रित की होती
**

ऊँची कुर्सियाँ
————–

कुर्सियों के कान नहीं होते
कुर्सियाँ बहरी होती हैं
कुर्सियों की आँख नहीं होती
कुर्सियाँ अँधी होती हैं
कुर्सियों में स्पंदन नहीं होता
कुर्सियाँ ठिठकती नहीं
कुर्सियों में चेतना नहीं होती
कुर्सियाँ संवेदना शून्य होती हैं
सबसे ऊँची कुर्सियाँ
पूर्ण दिव्याँग होती है
**

☘ जसबीर चावला


00000000000000

अखिलेश कुमार भारती


आत्मबोध की परिकल्पना
 
दीप जलाते हुए उसे नदी किनारे देखा
तारो में परछाई लिए उसे नीले आसमानों में देखा |
तपतपाती धूप में उसे ऱास्ते किनारे पत्थर तोड़ते देखा
खेतों खलिहानों में सुबह -शाम काम करते देखा |
मेहनत करते हुए बदन पे पसीना बहाते देखा
सपनों को संजोये हुए हर गली मोहल्ले में देखा |   
मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों एवं गुरुद्धारों में सफाई करते देखा
शोषित समाज में जागृति जागते देखा |
ना पहले हमने कभी ऐसा देखा
सचमुच नजदीक से एक ख़ुदा रूपी इंसान को देखा ||
AKHILESH KUMAR BHARTI (09826767096)
ASSISTANT MANAGER (MPPKVVCL, JABALPUR)
000000000000000000000

 

राम कृष्ण खुराना


हाय प्यारी लगती है

तुम्हारा नाम क्या ?
उल्लू-बाटा !
खाते क्या ?
घी और आटा !
सोते कहाँ ?
जंगल में !
डर नहीं लगता ?
प्रभु की कृपा !
तुम्हारी बीवी कहाँ ?
मायके !
लाते क्यों नहीं ?
लड़ती है !
दो डंडे मारो !
हाय, प्यारी लगती है !
राम कृष्ण खुराना
--.
मैडम मोरी मैं नहीं कोयला खायो
Madam mori main nahi koyla khayo


मैडम मोरी मैं नहीं कोयला खायो !
विपक्षी दल सब बैर पडे हैं, बरबस मुख लिपटायो !
चिट्ठी-विट्ठी इन बैरिन ने लिखी, मोहे विदेस पठायो !
मैं बालक बुद्धि को छोटो, मोहें अपनों ने ही फसायो !
हम तो कुछ बोलत ही नाहीं, सदा मौन रह जायो !
इसीलिए मन मोहन सिंह से मौन सिंह कहलायो !
लूट विपक्षी बैंक भर दीने, कालिख हमरे माथे लगायो !
हम तो कठपुतली हैं तुम्हरी, अंडर एचीवर कहलायो !
मैडम भोली बातें सुन मुस्काई, मनमोहन खींच गले लगायो !

मैडम मोरी मैं नहीं कोयला खायो !

 

 

00000000000000

वकील सिंह कुशवाहा


  कचहरी न जाना
भले डॉट घर में तू बीबी की खाना,
भले जैसे-तैसे गृहस्थी चलाना,
भले जंगल में जा के धूनी रमाना,
मगर मेरे बेटे,कचहरी न जाना।
कचहरी न जाना,कचहरी न जाना।
                कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है,
                कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है,
               अकलमंद से भी मेरी यारी नहीं है,
                तिवारी था पहले तिवारी नहीं है।
कचहरी की महिमा निराली है बेटे,
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे,
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे,
यहां पैरवी अब दलाली है बेटे।
             


कचहरी ही गुण्डों की खेती है बेटे,
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे,
खुलेआम कातिल यहां घूमते हैं।
सिपाही दरोगा चरण चूमते हैं।
                                          कचहरी में सच की बडी दुर्दशा है,
                                          भला आदमी किस तरह से फंसा है,
                                           यहां झूठ की ही कमाई है बेटे,
                                            यहां झूठ का रेट हाई है बेटे।
कचहरी का मारा कचहरी भागे,            
कचहरी में सोये कचहरी में जागे,
मरा जा रहा है गवाही  में ऐसे  ,                
है ताँबे का हाण्डा सुराही में जैसे।

                                             लगाते बुझाते सिखाते मिलेंगें,
                                             हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे,
                                            कचहरी तो बेवा का मन देखती है,
                                           कहां से खुलेगा बटन देखती है।
कचहरी     शरीफों     के     खातिर     नहीं है,                                      
उसी की कसम  लो  हाजिर  नहीं  है,
              है बासी मुँह घर से बुलाती कचहरी,
              बुलाकर के दिनभर रूलाती कचहरी।
मुकदमे की फाईल दबाती कचहरी,
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी,
कचहरी का पानी जहर से भरा है,
कचहरी के नल पर मुवक्किल खडा है।
               
                                                                                                                                        
              मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे,
              मेरे जैसे कैसे निभाता है बेटे,
              दलालों ने घेरा सुझाया बुझाया,
              वकीलों ने हाकिम से सटकर दिखाया।
धनुष हो गया हूँ पर टूटा नहीं हूँ,
ये मुठ्ठी हूँ केवल अँगूठा नहीं हूँ,
नहीं कर सका मैं मुकदमे का सौदा,
जहाँ था घरौंदा वही है करौंदा।
              कचहरी का पानी कचहरी का दाना,
              तुम्हें लग न जाए तू बचना बचाना,
               भले और कोई मुसीबत बुलाना,
              कचहरी की नौबत कभी घर न लाना।

कभी भूलकर भी न आँखें उठाना,
न आँखें उठाना न गर्दन फसाना,
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी,
वही कौरवों को सरग है कचहरी।
             भले डांट घर में तू बीवी की खाना,
                                       भले जैसे-तैसे गृहस्थी चलाना,
                                       भले जंगल में जा के धू नी रमाना,
                                       मगर मेरे बेटे,कचहरी न जाना।
                                       कचहरी न जाना,कचहरी न जाना।

----
                                         
               संपर्क
वकिल सिंह कुशवाहा
जसदेवपुर,भांवरकोल,गाजीपुर
उत्तर प्रदेश 233231
   

 
  0000000000000000000

अमित भटोरे

संस्कारों का गान तुम्ही हो, माँ रेवा
जन जन का अभिमान तुम्ही हो, माँ रेवा
निश्छल निर्मल कल कल बहती
नित सूरज के ताप को सहती
पूजा भक्ति ध्यान तुम्ही हो माँ रेवा…
अमरकंटक से हो के प्रवाहित
सारी सभ्यता खुद में समाहित
मध्य प्रदेश का मान तुम्ही हो माँ रेवा…
कंकर कंकर में शिव दर्शन
सौम्य स्वरूपा शांत प्रदर्शन
सरगम की हर तान तुम्ही हो माँ रेवा…
विंध्य - सतपुड़ा का है आँचल
तुझमें मिलती नदियाँ चंचल
मेकल का बखान तुम्ही हो माँ रेवा…
--
खरगोन (मध्य प्रदेश)


00000000000

सागर यादव 'जख्मी'


1.
कहीँ पे राँझा बिकता है कहीँ पे हीर बिकती है

कि पैसे के लिए नारी की अक्सर चीर बिकती है

ये कुदरत का करिश्मा है या वेश्या की अदाकारी

सुना है उसके कोठे पे हृदय की पीर बिकती है

2.गली सब देख डाली पर शहर पूरा नहीँ देखा

मुहब्बत के मुसाफिर ने कभी सहरा नहीँ देखा

कि जिस भाई के खातिर मैंने अपनी किडनी बेची थी

वही भाई कई दिन से मेरा चेहरा नहीँ देखा

3.
हकीकत मानने से मैं भला इनकार क्योँ करता

तुम्हारे प्यार के खातिर किसी से प्यार क्योँ करता

निवाला मुँह का देकर जिसने मेरी परवरिश की थी

जरा सी बात पर उस माँ से मैं तकरार क्योँ करता

4.
मिली जो भी खबर मुझको तुम्हेँ बतला रहा हूँ मैं

यकीँ मानो उसी विधवा से मिलकर आ रहा हूँ मैं

न देवोँ की कृपा मुझ पर न तेरा ही सहारा है

ये मेरी माँ की महिमा है कि गजलेँ गा रहा हूँ मैं

5.
मेरे कदमोँ की आहट को सदा पहचान जाती है

वो गहरी नीँद मेँ होती भी है तो जाग जाती है

मेरी गजलेँ मेरे मुक्तक उसी माँ को समर्पित हैँ

कि जिसके त्याग के आगे ये दुनिया हार जाती है

6.
सफर करते हुए नभ की,ये धरती याद आती है

लुटेरोँ को अभी भी मेरी बस्ती याद आती है

हमेँ मालूम है 'सागर ' इसी को प्यार कहते हैँ

मैं जब भी तनहा होता हूँ वो लड़की याद आती है

7.किसी के खून से मैं हाथ अपने धो नहीँ सकता

मैं अपनी राह मेँ काँटे कभी भी बो नहीँ सकता

तू मुझसे प्यार करती है मगर सच बात तो ये है

तू मेरी हो नहीँ सकती मैं तेरा हो नहीँ सकता

8.
किसी के इश्क मेँ तुम जिँदगी अपनी कभी बर्बाद मत करना

कि अपने स्वर्ग से घर को कभी वीरान मत करना

कमाओ ढेर सारे जर मगर इतनी खबर रखना

कभी तुम अपनी दौलत पर तनिक अभिमान मत करना

9.
धूप मेँ भी चाँद का दीदार होना चाहिए

आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए

माँ-बहन भाई को माना प्यार है तुमसे बहुत

हाँ मगर कुछ मेरा भी अधिकार होना चाहिए

10.चमकते चाँद को बीमार मत समझो

सँपोलोँ को किसी का यार मत समझो

मैं शायर हूँ मेरे प्रेमी हजारों हैँ

मुझे तुम एक गले का हार मत समझो

11.किसी दिल को मिले जब गम तो कोई बात होती है

किसी गम से मिलेँ जब हम तो कोई बात होती है

बिछड़ कर तुमसे मैं एक पल भी 'सागर' जी नहीँ सकता

यही सोचो अगर हमदम तो कोई बात होती है

12.कोई जब जिस्म का सौदा लगाते हैँ तो हंगामा

हया सब छोड़ के पैसा कमाते हैँ तो हंगामा

वफा की राह पे हमको कोई चलने नहीँ देता

कलम को छोड़ कर खंजर उठाते हैँ तो हंगामा

--
नरायनपुर, बदलापुर, जौनपुर ,उत्तर प्रदेश-222125

000000000000000

आमिर 'विद्यार्थी'


[ कुँआरी बहना  ]

मेरी बहना कर चुकी है आज
अपने जीवन के चालीस वर्ष पूर्ण
जिसके चेहरे पर असंख्य झुर्रियों ने
बदनुमा जाल बुन लिया है
और उसके होंठों पर पपड़ी जम गयी है
उम्र के इस पड़ाव पर
जब लड़कियाँ बन जाती हैं माँ
वह अब तक कुँआरी है

यदा-कदा उसकी सहेलियाँ
शन्नो ,शालू ,बिनती
आती हैं उससे मिलने
लेकिन अब वह नहीं मिलती
उनसे उस तरह
जैसे मिलती थी
कभी जिस तरह

इस सब के बावजूद
वह आज भी पहनती है
रंग-बिरंगे फ़ूलों से गुथे कपड़े
और मेरी बूढ़ी माँ अब भी
वक़्त-बेवक़्त टोकती रहती है उसे
रखने को सिर पर पल्लू

बहना रहती अब बिलकुल शांत
अपने अकेलेपन का लिबास ओढ़े

और जब आधी-रात गए
गली के मुहाने खड़ंजे पर
स्ट्रीट लाइट के लपझपाते बल्ब के नीचे
भौंकते हैं असंख्य कुत्ते
तब अधखुले जंगले से
आता है बहना के कमरे में
चंद्रमा का मद्धिम-प्रकाश
जिसकी खामोशी में
बदलती है कुँआरी बहना
रात भर इधर से उधर करवटें

प्रात: बिस्तर पर केंचुओं की तरह
रेंगती हुई प्रतीत होती सलवटें
यहीं बयाँ करती हैं कि
यह कुँआरा-पन
बिन बुलाए मेहमान की भाँति
आ घेरता है अभी भी
बहना की देह को
जिससे उसकी देह
हो जाती है उफान पर
और वह लौट जाती है फिर से
उम्र के उस पड़ाव पर
जिसे समाज की नज़रों में कहा जाता है
'बाली उमर'


शब्दार्थ:-

खड़ंजा- ईटों से बनी सड़क
जंगला- खिड़की।

0000000000000

सीताराम पटेल


संगीत
चूँ चूँ करके आई चिड़िया
घर आँगन चहकाई चिड़िया
बच्चों को खूब भायी चिड़िया
गीत खुशी की गाई चिड़िया

पिक गाई छुप आमों की डाली
बहार आई हो गई मतवाली
पपीहा पी कहाँ पी कहाँ खोजे
बगुला ध्यान मग्न मीन खोजे

काग चोंच से पर अपना नोचे
बुलबुल गीत गाने को सोचे
कबूतर गूटर गूँ गूटर गूँ करे
फाख्ता तिलपुरी की रट करे

झींगूर बजा रहा शहनाई
गिलहरी को टिमकिड़ी भायी
कटफोड़वा करे खट खट
बिल्ली पीये दूध गटगट

शुक तपत कुरु तपत कुरु करे
सारिका चना खाने का मन करे
चातक स्वाति बूँद को चाहता
चकोर अँगार खाने को मरता

उल्लू चिहूँक चिहूँक चिल्लाती
टेंहा का टें टें से गला भर आई
बुलबुल मीठी गीत सुनाए
मोर पैंको पैंको गाना गाए

जब सावन में बादल छाए
मोर मोरनी को नाच दिखाए
मोरनी को उसका नाच सुहाए
वो भी गीत खुशी के गाए

प्रकृति ने विभिन्न स्वर बनाए
जिससे जंगल में मंगल आए
सारस जब आकाश में उड़े
बड़ी रस्सी सा वो दिख पड़े

मूक मैना भी बोलने लगती
जब माँ तेरी कृपा बरसती
मैना भी बोलने लगे अंग्रेजी
बच्चे बढ़ने लगे अब तेजी

अपनी माँ पर हाथ उठाते
पर की माँ को घर में लाते
मानव अति सुख साधन जुटाते
शान शौकत में वैभव लुटाते

माँ बाप को दे दिए वनवास
कुत्ते पालना आई अब रास
बच्चे कुछ भी नहीं  कमाते
माँ बाप का पैसे खूब उड़ाते

माँ बन गई है नौकरानी
पत्नी बनी अब दिल की रानी
ये कैसा कलयुग है आया
घर घर में मातम है छाया

कोई नहीं सुने पक्षियों का गाना
सबको सुहाए पॉप का गाना
वसुंधरा को करना चाहते खाली
भविष्य की कौन करे रखवाली

गीत बना है माँ बहन की गाली
नारी को समझते हैं अपनी साली
गली गली में आज गँवार बैठे
जिसका जुआ शराब तक पैठे

यहाँ अब किसको कौन  समझाए
अँधा बाँटे रबड़ी बाँट बाँट कर खाए
चलो हम प्रकृति की ओर लौट चलें
धरती को सब मिलकर स्वर्ग बनाएँ


000000000000

भरत कुमार "तरभ"


डोर खुशियों का कागज उड़ाये,
हवा की आशिया में पंछी ने पूछा,
देखो उड़ता कितना ,
सुनहरा कागज का पन्ना।
रंगों की सतरंगी खुशियों के संग ।
हैं ! अद्भुत , हैं! अनोखा।
जो छूने की कोशिश करता आशिया को,
पतंग की यही अनोखी चाल,
बच्चों को लुभाती।
खुशियों की डोर ,
भाईचारे का संदेश देती।
                           - ,सांथू, जालौर, राजस्थान

0000000000000

मुकेश भगत


चाँद बुलाये री ।

चाँद बुलाये री ।
अरमान बुलाये री।
मन इस तन का
अमन गगन का
चाँद और चांदनी का
एहसान बुलाये री।
चाँद...

तुम थे कल 'पर' पर
आकर आँगन घर
स्नेहल बरखा, बरसा कर
मुक्त मगन मन हर्षाकर, हो कहाँ
तुम्हें घर की सोपान बुलाये री।
चाँद...

रहते हो पास मन के
बन कर एहसास जीवन के
मन से मन का तार, जो
हो कर जार-जार व मेरी
अधरों का भार बुलाये री
चाँद.....

तुम जो होते हो यहाँ
जी भर जीते हैं
जाने स्नेह- सरोवर में
खुद के, कितने ही गोते हैं, सुन
तुम्हें सासों की आवाज बुलाये री
चाँद...

करूँ उन आँखों में गुजारा
चाहूँ बस मैं प्यार तुम्हारा
रहूँ चरणों में, ना फिरूँ मारा-मारा
कब से कितना, बस तुम्हें गुहारा, मेरी हर
क्रन्दन करती गुहार बुलाये री
चाँद...

कौन चित्रकार है इस
उत्सुक,प्रेमातुर छवि का
कौन है जननी इस
उन्मत, उन्मुक्त कवी का,कवि की
वंदन करती गीत बुलाये री
चाँद ...

ऐ स्नेह-लता में कसने वाली
रूपों की लीला रचने वाली
आ ,रच फिर वही प्रेम धुन
हो मुग्ध मगन मन जिसको सुन,आ
उसी प्रीत की संगीत बुलाये री
चाँद...

जानूँ , तू क्यूँ है दूर
है जो पनाहों में मजबूर
आना ना , मत आना
आकर, मेरा भरमाना, औऱ
मेरी बेबस प्रीत बुलाये री
चाँद बुलाये री।


मुकेश भगत
0000000000000

विनय कुमार शुक्ल


कोई ग़र प्यार से बोले,
कलम ये प्यार बन जाये
कोई ग़र बेरुखा बोले,
कलम में धार बन जाये
अगर कोई कलम वाले पे
करता है कभी हमला
कलम बन्दुक बन जाये
कलम तलवार बन जाये
                                        
                                       ग्राम-टिकरी,पोस्ट-मझगवा(गगहा)
                                               गोरखपुर (उ. प्र)
0000000000000000000

महेन्द्र देवांगन "माटी"


गोल - गोल
*************
चूड़ी गोल बिंदी गोल
दीदी की बाली है गोल
तवा गोल रोटी गोल
मामी बोले मीठी बोल |
तबला गोल ढोलक गोल
ढोल के अंदर पोल है गोल
झांझ गोल मंजीरा गोल
कोयल बोले मीठी बोल |
चक्का गोल टायर गोल
मोटर की पहिया है गोल
बेलन गोल बर्तन गोल
दादी बोले मीठी बोल |
आम गोल जाम गोल
नीबू और संतरा है गोल
तरबूज गोल खरबूज गोल
नानी बोले मीठी बोल |
पेड़ा गोल जलेबी गोल
रसगुल्ला और लड्डू गोल
चांद गोल तारे गोल
दादा बोले पृथ्वी गोल |
----------------
लेख
महेन्द्र देवांगन "माटी"
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला -- कबीरधाम  (छ ग )
पिन - 491559
मो नं -- 8602407353
Email - mahendradewanganmati@gmail.com
00000000000000000.

दीपक यादव


“जगत जननी”
हंस-हंस कर रोज सपनों में आती .
रुला कर मुझको न जाने कहाँ चली जाती .
जब भी आती, बातें बनाती.
न जाने वो कौन थी ?
जब भी आती, रुला कर जाती|
बड़े भावुक होकर खड़ी-खोटी सुनाती.
कोई तो समझाओ इस निर्दयी समाज को.
बेटे कि हठ लगाये.
दिन-दहाड़े करते कन्या हत्या.
कोई तो बताओ, कोई तो समझाओ.
आज कि कन्या नहीं किसी से पीछे.
हथियार थामे सरहद पर करती रक्षा.
पी.टी. उषा, सानिया मिर्ज़ा, या हो साइना नेहवाल.
सभी ने बढाया भारत का सम्मान.
श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने भी थामी थी, भारत की कमान,
इसके आगे और क्या कहना ?
हर घर में पैदा होऊँगी.
कहलाऊँगी जगत जननी.
मैं माँ हूँ, बेटी हूँ, बहन हूँ,
फिर भी शर्म नहीं आती करते हो कन्या हत्या,
हंस-हंस कर रोज सपनों में आती थी,
रुला कर मुझको न जाने कहाँ चली जाती थी,
जब भी आती, रुला कर जाती|
--
मधेपुरा,बिहार
000000000000000

दीप्ति सक्सेना


एक अनुत्तरित प्रश्न
आज तुम मुझसे ही
मेरा साक्षात्कार करा दो,
अस्तित्व हीन नहीं मैं भी
आज यह एहसास करा दो ।।
अगर सीता मान पूजते हो मुझे
तो फिर क्यों हूँ तिरस्कृत मैं,
बरसों से अनुत्तरित प्रश्न का
आज उत्तर दिला दो ।।
अपनी कोख को पीड़ा देकर
सजाया तुम्हें मैंने है,
तुम्हारा अस्तित्व मुझसे हैं
पर मेरा कहाँ है ?
मुझको आज उसका पता दो ।।
आवरण त्याग की देवी का
पहना मुझे सदियों से,
खूब ठगा तुमने
कुछ त्याग आज मुझे
खुद अपना भी बता दो ।।
स्वार्थ में डूबे
हवस के पुजारी,
ए मौका परस्त
हैवान पुरुष,
अब बस
जरा अपना असली रूप
आज सबको तुम दिखाओ ।।
--
जयपुर

0000000000000

दिनेश कुमार डीजे


नव वर्ष  आया  है,
हर्ष लाया है।
दुःख-चिंता का पतन कर,
सुख-समृद्धि का उत्कर्ष लाया है।

प्रेम-बंधुत्व की गठरी में ,
पर्व समेटे भांति-भांति,
ईद,दिवाली,क्रिसमस,वैशाखी,
ओणम,ईस्टर और सक्रांति। 
सब धर्मो के पर्व मनाना,
ये संदेशा  लाया  है।
नव वर्ष  आया  है,
हर्ष लाया है।

वर्ष बढ़ा है, उम्र बढ़ी  है,
अब सोच बढ़ानी होगी,
बड़ी सोच से बड़ा  नतीजा,
ये बात बतानी होगी।
सब धर्मो से बड़ा धर्म,
दिनेश ने  मानवता  को  पाया  है,
नव वर्ष  आया  है,
हर्ष लाया है।

वर्ष पुरातन से अनुभव पाया,
नूतन वर्ष  में इसे लगाना है,
नए  वर्ष  में  नयी  आशाएं                    
और नयी  उपलब्धि पाना  है।
शांति,सफलता और स्नेह  को,
नया  वर्ष  ले  आया  है।

नव वर्ष  आया  है,
हर्ष लाया है,
दुःख-चिंता का पतन कर,
सुख-समृद्धि का उत्कर्ष लाया है।

 

---


देख मधुर छवि तोहारी गिरधर,
मोरा बढ़ता जाता प्रेम निरंतर।

हृदय स्पंदन संगीत प्रेम का,
मम स्वास बनी तोहारा मन्त्र।

तुम भी प्रेमी और मैं भी प्रेमी,
कहो क्या हमरे मध्य अंतर?

तू ही अब आस जीवन की,
तू मेरा मस्ज़िद, तू मेरा मंदर।

राधा प्रेम तुम्हरो यदि ताल,
तो माधव मोरा प्रेम समंदर।

तोरा मधुर नाम मम वाणी में,
मधुर नाम मोरे हृदय अंदर।

हे कान्हा! मैं कछु नहीं मांग्यो,
दो प्रेम वही जो मम हृदय अंदर।


कवि परिचय
नाम-दिनेश कुमार 'डीजे'
जन्म तिथि -10.07.1987
सम्प्रति- 1. भारतीय वायु सेना से नॉन-कमिशंड ऑफीसर के पद से सेवानिवृत्त
2. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रूडकी में शोध अध्येता के रूप में सेवारत.
3. संस्थापक एवं संयोजक- मिशन दोस्त- ए-जहान
शिक्षा-  १. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा कनिष्ठ शोध छात्रवृत्ति एवं राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण      २. समाज कार्य में स्नातकोत्तर एवं स्नातक उपाधि
३. योग में स्नातकोत्तर उपाधिपत्र
पता-   हिसार (हरियाणा)- 125001
ब्लॉग -  goo.gl/AuW1E3
वीडियो चैनल-  goo.gl/2UplL2
प्रकाशित पुस्तकें- दास्तान-ए-ताऊ, कवि की कीर्ति ( goo.gl/GBNciV ) एवं  प्रेम की पोथी ( goo.gl/9WWUOQ )

_____________________________________________________
Dinesh Kumar 'DJ'
Research Fellow, Indian Institute of Technology Roorkee
Founder and Convenor- Mission Dost-e-Jahan
Former Non-Commissioned Officer, Indian Air Force
Joint Secretary, Mahrishi Dayanand Yog Samiti, India
Blog- goo.gl/AuW1E3
Video Channel- goo.gl/2UplL2
Author of Books- Daastan E Taau, Kavi Ki Kirti ( goo.gl/GBNciV ) and Prem Ki Pothi ( goo.gl/1jsv1C  )


0000000000000

रीझे यादव


*चिंता*
झूठ कहते हैं लोग
पक्षी स्वच्छंद होते हैं!
मैं तो उनको रोज देखता हूँ
किसी दिहाडी मजदूर सा
घोसला और परिवार छोड़कर
सवेरे सवेरे साथियों के संग
पारिवारिक दायित्वों से दबा
चहचहाते-बतियाते-घबराते
उजड़ते जंगल पर;ठूंठ होते पेड़ पर
बच्चों की फिक्र,आदमी के ऐंठ पर
पर शाम ढलते-ढलते
थोडे से दाने और खीझ के साथ
लौट आता है नीड़ पर
बिल्कुल मेरी तरह
आशा की बीज लेकर
*रीझे-टेंगनाबासा(छुरा)
000000000000

प्रिया देवांगन "प्रियू"


काश मैं एक पंछी होती,
मस्त गगन में उड़ जाती ।
ताजा ताजा फल खाती,
सबको मीठी गीत सुनाती ।


जग की पूरी सैर करती,
नये नये दोस्त बनाती ।
नदी झील की पानी पीती,
वन उपवन में घूम आती ।


सुबह से उठ कर मैं चहचहाती,
मीठी नींद से सबको जगाती ।
सबके मन में जगह बनाती,
जीवन में खुशियाँ मैं लाती ।


उड़ कर अपनी मंजिल पाती,
हर मंजिल मैं उड़कर जाती ।
फल फूल मैं खूब खाती,
बच्चों के पास आ जाती ।


काश मैं एक पंछी होती,
मस्त गगन में उड़ पाती ।
***********************
 
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला -- कबीरधाम  ( छ ग )
0000000000000

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाकार में छपे सभी कवि मित्रों को बहुत बहुत बधाई । सभी की रचनाएँ बहुत अच्छी है ।
संपादक महोदय का ह्रदय से आभार जो प्रकाशित करके उत्साह वर्धन कर रहे हैं ।

महेन्द्र देवांगन माटी

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget