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शब्द संधान / अंग अंगी / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

अंग अंगी

किसी भी जीवित प्राणी या संस्थान (organism) के अपने अंग या अवयव होते हैं। अंगी एक संगटित शरीर रचना है क्योंकि उसके सारे अंग एक व्यवस्था का निर्माण करते हैं और ये अंग उस व्यवस्था या संस्थान के अधीन होते हैं। अगर व्यवस्था में कोई भी गड़बड़ होती है तो उसका असर उसके अंगों पर भी पड़ता है। इसी तरह यदि कोई भी अंग (संस्थान का कोई भी भाग) गड़बड़ा जाता है तो उसका प्रभाव संस्थान पर पड़ता है। दोनों ही एक दूसरे पर निर्भर हैं।

‘अंग’ का अर्थ बेशक अंगी के भाग या अंश से है। लेकिन इसे हम केवल अंगी के आश्रित के रूप में न लेकर प्राणी की पूरी देह के अर्थ में भी लेते हैं। माताओं की अक्सर शिकायत रहती है कि वे अपने बच्चे को अच्छे से अच्छा खाना खिलाती हैं लेकिन खाना उसके अंग ही नहीं लगता ! देह की पुष्टि ही नहीं करता। वैसे ‘अंग लगना’, यह मुहावरा एक अन्य अर्थ में भी इस्तेमाल होता है। किसी के लिपटना भी अंग लगना ही है। अंग लगाना आलिंगन करना है। अंग मोड़ना, या अंग सिकोड़ना मुहावरों में भी अंग का अर्थ पूरे शरीर से ही ही है, शरीर के किसी एक अंग से नहीं है। जो शरीर से पैदा हुआ हो वह ‘अंगज’ है। अंगजाई पुत्री है तो अंगजाता पुत्र है।

यह एक बड़ी रोचक बात है की कामदेव को “अनंग” कहा गया है। वे अंगहीन हैं। अंगहीन भी उन्हीं की एक उपाधि या नाम है।

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अंगीकार करना अपनाना है। जिस तरह हम अपने शरीर और उसके अंगों को अपनाए हुए हैं उसी तरह हम किसी दूसरे को या किसी अन्य चीज़ को ‘अपना’ सकते हैं। अपना बना सकते हैं।

हिन्दी भाषा में अंग से कई स्वतन्त्र शब्दों का भी निर्माण हुआ है। जैसे अंग से ‘अंगना’। अंगना संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है, सुन्दर अंगों वाली स्त्री। हिन्दी में भी इसका प्रयोग मिल ही जाता है। कहते हैं अशोक वृक्ष पर जब कोई सुन्दर स्त्री पदाघात करती है तभी उसमें फूल आते हैं। शायद इसी दन्तकथा को ध्यान में रखकर अशोक वृक्ष का एक नाम ‘अंगना-प्रिय’ भी है। आपने वह प्रसिद्द गीत तो ज़रूर सुना होगा जिसे एक फिल्म में भी फिल्माया गया है – मेरे ‘अंगने’ में तुम्हारा क्या काम है ! इसमें अंगना शब्द सुन्दर स्त्री के लिए नहीं बल्कि ‘आँगन’ के लिए इस्तेमाल हुआ है किन्तु इस अंगने या आँगन का ‘अंग’ से कोई लेना-देना नहीं है।

मर्द यदि अपना शरीर (अंग) ढांकने के लिए “अंगरखा” (वह जो अंग की रक्षा करे –अंग+रक्षा ?) पहनते हैं, तो स्त्रियाँ अपने स्तन ढांकने के लिए ‘अंगिया’ का इस्तेमाल करती हैं। किसी दर्जी के पास जाइए, वह आपको अंगिया के अनेक अंगों के बारे में विस्तार से बताएगा कि अंगिया का वह भाग जो स्तन पर पड़ता है अंगिया की कटोरी कहलाता है, अंगिया की कटोरियों के बीच की सीवन अंगिया की ‘चिड़िया’ कहलाती है, अंगिया का कंठा गले के नीचे का खुला भाग है, अंगिया के पछुए और बंद पीठ की ओर की वो डोरियाँ हैं जिनसे अंगिया कसी जाती है, इत्यादि|

अंगारा या अंगार अग्नि का ही एक अंग है, अग्निखंड है। यह अग्नि में, अग्नि का, दहकता हुआ कोयला है। लेकिन क्या अंगार शब्द सचमुच ‘अंग’ से ही निकला है, इस पर मत-भेद संभव है। इसी तरह एक और शब्द है, ’अंगोछा’। देह पोंछने का यह कपड़ा अंग-पोंछा का ही सरल, संक्षिप्त रूप होना चाहिए।

किसी भी अवयवी के अनेक अंग हो सकते हैं। अंगों की संख्या के अनुरूप भी अंग से अनेक शब्द बने है, जैसे, पंचांग। पांच अंगों वाला पंचांग है। पौधे के पांच अंग –जड़, छाल, पत्ता, फूल, और फल। पंचांग-प्रणाम उसे कहते हैं जिसमें घुटना, सिर, हाथ, तथा छाती को पृथ्वी से सटा कर देवता के चरणों की और झुका जाता है। ज्योतिष में तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण इन पांच घटकों से मिलकर “पंचांग” बनता है। ज्योतिष में ये ‘पंचांग’ लगभग रूढ़ हो गया है। पंचांग की ही तरह अंगों की एक संख्या “अष्टांग” भी है। पांच अंगों वाला ‘अष्टांग’ होता है। जैसे, “अष्टांग-योग”। पंचांग जैसे ज्योतिष के लिए रूढ़ हो गया है वैसे ही पातंजल-योग के लिए “अष्टांग” है - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि। बुद्ध ने भी ‘अष्टांग मार्ग’ का विधान किया है। ऐसे ‘पंचांग’ या ‘अष्टांग’ वाले अवयवी, ज़ाहिर है, अनेक हो सकते हैं।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.९६२१२२२७७८) १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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