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शब्द संधान संधि / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

संधि एक ऐसा शब्द है जिसकी गूँज हमें जीवन के लगभग हर क्षेत्र में सुनाई देती है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में, विधि और अदालत में, आर्थिक जगत में, सामाजिक जीवन में, शारीरिक बनावट में, यहाँ तक कि हिन्दी और संस्कृत भाषा के व्याकरण तक में संधि का दबदबा है। वस्तुत: जहां भी टकराहट है, वहां सन्धि के लिए गुंजाइश है।

संधि मूलत: संस्कृत का शब्द है जिसे हिन्दी में भी अपना लिया है। इसका अर्थ समझौता या करार है। संधि दो पक्षों के बीच मेल-मिलाप है, सुलह है, ‘ट्रीटी’,है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में दो विवादित मुद्दों पर अंतत: एक ‘संधि’ कायम हो जाना आम बात है, प्राय: इसे मोटे तौर पर ‘संविदा’ कहा गया है। राष्ट्र के अन्दर भी जब कोई दो पक्ष अपने अपने दावे प्रस्तुत करते हैं उनके बीच संधि असंभव नहीं है। उदाहरण के लिए दो प्रदेशों के बीच जल-संधि इसका एक उदाहरण है। अक्सर अदालत के बाहर दो पक्षों के बीच जो ‘स्वतन्त्र रूप से एक सहमति’ बन जाती है, उसे मान्यता प्रदान कर अदालत उस संधि पर अपनी मुहर लगा देती है, और दावे वापस ले लिए जाते हैं। आर्थिक और सामाजिक जीवन में तो कदम कदम पर समझौते करने ही पड़ते हैं अन्यथा हमेशा संघर्ष की स्थितियां बनी रहें। राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक समझौते कभी लम्बे समय तक कायम रहते हैं तो कभी जल्दी ही टूट जाते हैं| समझौते देर-सबेर नई संधियों को जगह देते हुए शायद टूटने के लिए ही होते हैं। संधि प्राय: एक द्वंद्वात्मक प्रक्रिया होती है। धारणा- प्रतिधारणा –समन्वय; और समन्वय में क्योंकि धारणा और प्रतिधारणा के विरोधी तत्व बने रहते हैं इस लिए समन्वय से नए विरोधी तत्व बनाते है और एक नई संधि होती है।

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लेकिन संधि का अर्थ केवल समझौता या करार ही नहीं हैं। इसका एक अर्थ जोड़ या मिलन से भी होता है। हमारे शरीर में भी न जाने कितने ‘जोड़’ है। इसकी सही गणना तो शरीरशास्त्री ही बता सकते हैं, लेकिन इनसे साबका तो व्यक्ति का ही पड़ता है। ये जोड़ अधिकतर हमारी हड्डियों के बीच संधिस्थल हैं। हमारी कोहनी, हमारे घुटने आदि ऐसे ही संधि स्थल हैं जो यदि ज़रा से भी विचलित हो जावें तो दर्द बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाते है। ‘संधि शोध’ जोड़ों में सूजन और उसे होने वाले दर्द को कहते हैं ।

शारीरिक बनावट में तो तमाम संधियाँ हैं ही संस्कृत और हिन्दी भाषा के व्याकरण में भी तरह तरह की संधियाँ देखी जा सकती हैं। व्याकरण में संधि दो अक्षरों या वर्णों के परस्पर मेल से उत्पन्न विकार को कहा गया है। यह दो अक्षरों के निकट या मिल जाने से होने वाला वर्ण विकार है। ‘संधि’ स्वयं ही एक मेल है –सम (म हलंत) + धि। इसी तरह देवेन्द्र – देव+ इंद्र। व्याकरण में संधि ३ प्रकार की बताई गई है – (१) स्वर संधि (दो स्वरों के मेल से होने वाला परिवर्तन ) (२) व्यंजन संधि (व्यंजन में किसी स्वर या व्यंजन के मेल से उत्पन्न विकार,) (३) विसर्ग संधि ( विसर्ग के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में विकार)। संधि है तो ‘संधि विच्छेद’ भी है। यह व्याकरण के संधिगत शब्दों को अलग अलग करना है। किसी सामाजिक-राजनैतिक समझौते का टूटना भी संधि विच्छेद ही है।

कई बार चोर-उचक्के घरों की दीवाल में सेंध लगाकर घर में घुस आते हैं। सेंध वह छेद है जो दीवार में किया जाता है। इसे संधि भी कहते हैं। हो सकता है संधि से ही सेंध और सेंधना (सेंध लगाना) शब्द बनें हो। संधि चोर या संधि हारक सेंध लगाकर चोरी करने वाला व्यक्ति है। सुरंग भी संधि ही है।

संधिवेला सांध्यकाल है। प्रात:काल जब सूर्य उगता है और रात ढलती है, और इसी प्रकार सायंकाल जब सूर्य ढलता है और रात आने को होती है – ये दोनों ही संधिवेलाएं हैं। भारत में एक यह परम्परा है कि इस समय हम ईश्वर का स्मरण करते हैं। इस स्मरण को भी संद्श्या करना कहा जाता है।

संधि के बिलकुल पड़ोस में एक शब्द है, संधान। संधि और संधान दोनों का अर्थ भी बहुत कुछ एक सा ही है। मिलाना जोड़ना मिश्रण करना। लेकिन संधान लक्ष्य या दिशा के लिए भी इस्तेमाल होता है –“एक पंथ औ’ एक संधाना”। किसी वस्तु को सड़ाकर खमीर उठाना भी संधान है। शराब का आसमन भी संधान ही कहलाता है।

- -डा, सुरेन्द्र वर्मा (मो.०६२१२२२७७८) १०, एच आई जी , १, सर्कुलर रोड, / इलाहाबाद २११००१

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