शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

उपन्यास अंश – काशी का अस्सी - काशीनाथ सिंह

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काशीनाथ सिंह पिछले दिनों अस्सी के हो गए. रचनाकार की ओर से उन्हें दीर्घायु होने की शुभकामनाएँ. इस अवसर पर प्रस्तुत है उनके बहुचर्चित उपन्यास काशी का अस्सी के कुछ अंश.

काशीनाष सिंह

मित्रो, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते कि अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है! **

जिन्दगी और जिन्दादिली से भरा एक अलग किस्म का उपन्यास । उपन्यास के परम्परित मान्य ढाँचों के

आगे प्रश्नचिह्न । 'अस्सी' काशीनाथ की भी पहचान रहा है और बनारस की भी । जब इस उपन्यास के कुछ अंश व कथा रिपोर्ताज' के नाम से पत्रिकाओं में छपे थे तो पाठकों और लेखकों में हलचल-सी हुई थी । छोटे शहरों और कस्बों में उन अंक विशेषों के लिए जैसे लूट-सी मची थी, फोटोस्टेट तक हुए थे, स्वयं पात्रों ने बावेला मचाया था और मारपीट से लेकर कोर्ट-कचहरी की धमकियाँ तक दी थीं ।

अब यह मुकम्मल उपन्यास आपके सामने है जिसमें पाँच कथाएँ हैं और उन सभी कथाओं का केन्द्र भी अस्सी है। हर कथा में स्थान भी वही, पात्र भी वे ही-अपने असली और वास्तविक नामों के साथ, अपनी बोली-बानी और लहजों के साथ। हर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दे पर इन पात्रों की बेमुर्वत और लटूठमार टिप्पणियाँ काशी की उस देशज और लोकपरंपरा की याद दिलाती हैं जिसके वारिस कबीर और भारतेन्दु थे !

उपन्यास की भाषा उसकी जान है--भदेसपन और व्यंग्य- विनोद में सराबोर। साहित्य की 'मधुर मनोहर अतीव सुंदर! वाणी शायद कहीं दिख जाय !

उपन्यास अंश -

“... वोट के लिए आँचल पसार रही है, भीख माँग रही है, नेहरूजी, इन्दिराजी, राजीव जी--इनको जब भी हवन, पूजन, यज्ञ कराना होता था, श्राद्धकर्म की जरूरत पड़ती थी--काशी से ही ब्राह्मण बुलाया जाता था। आप ही लोग जाते थे, यह मुझे कहने की जरूरत नहीं है। आप ही के आशीर्वाद से उन्होंने इतने साल राज-काज किया और आज मुँह फेर रहे हो आप। याद कीजिए वह दिन, जब सत्ताच्युत होने पर इन्दिराजी बाबा का दर्शन करने और आशीर्वाद लेने आई थीं। आज नमकहलाली का मौका आया है तो आप ब्राह्मण सभा कर रहे हो। भूल गए वो दिन जब राजीव के राजतिलक के लिए यहीं से गंगाजल गया था ?

और साहब, ब्राह्मण सभा दो फाड हो गई। जो चौबीस कैरेट के बाभन थे वे रत्नाकर के साथ हो गए और जो चौदह कैरेट के बाभन थे, वे वाजपेयी के साथ । क्यों ?

क्योंकि वाजपेयी लहसुन-प्याज खाता है, अंडा खाता है, दारू पीता है। वह कब का बाभन ?

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'बस ! बस, अब बस करो और मेरी सुनो..... महाकवि कौशिक को चेतना आई और वे दोनों हाथ उठाकर चिल्लाए-- ब्राह्मण समाज पर भारी ग्रह आया है। कांसीरमवा तो पीछे पड़ा ही है। ललुआ और मुलैमा भी घास नहीं डाल रहे हैं। बड़ी बुरी ग्रह दशा चल रही है बन्धुओं । इसे मैं देख रहा हूँ लेकिन जिन्हें देखना चाहिए, वही नहीं देख रहे हैं। तुमने विधवा ब्राह्मणी की बात की, मैं अस्सी साल के कुँवारे ब्राह्मण की बात कर रहा हूँ, पगलाया हुआ है। बौड्रियाया हुआ पूरे देश में चिल्लाता हुआ नाच रहा है-- बनाओ, प्रधानमन्त्री बनाओ ।' ये भजपैया भोंसडी के उसे नचा-नचा कर मार डालेंगे, चूतिया बना रहे हैं उसे | पहले राष्ट्रधर्म के नाम पर शादी नहीं करने दी, अब प्रधानमन्त्री बना रहे हैं। चाहते हैं कि इसी तरह ड्रांग-ड्रांग चिल्लाता हुआ मर जाए तो छुट्टी मिले। कौन समझाए उसे कि दुनिया की राजनीति ही मत देखो, इन सबों की तिकड्म भी समझो । ये तुम्हें बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। हटाना चाहते हैं रास्ते से |

' 'लेकिन कौशिकजी एक बात बताइए । वीरेन्द्र ने टोका--''क्या सत्यनारायण की कथा सुनने के लिए पति का पत्नी के साथ बैठना जरूरी है ?"

विधान तो यही कहता है।''

''अगर पत्नी न हो तो ?"

''तो ऐसा आदमी कथा नहीं सुन सकता ।'

खिल गए वीरेन्द्र ''सुन लिया भाई ? जो आदमी सत्यनारायण की कथा नहीं सुन सकता, वह देश का प्रधानमन्त्री कैसे हो सकता है ?"

लाजवाब तर्क !

"हर-हर महादेव।' दड्डबा ठहाकों के साथ इस गगनभेदी नारे से गूँज गया।

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“...जब बहुत समझाने पर सरोज नहीं समझे, तो खीज कर रामजी राय बोले – जो अहिर समझावै, ऊ बावन वीर कहावै। छोड्रिए बकलंड को |'

इस बकलंड अहिर ने उस दिन इसी दुकान में एक किस्सा सुनाया था इन्हीं भाजपाइयों को जिस दिन कल्याण सिंह ने मायावती के समर्थन से मुख्यमन्त्री पद की शपथ ली थी--'मैं परसों रामनगर से आ रहा था मौका-मुआइना देखकर कि चौराहे पर भीड में घिरा एक हाथी देखा । पहुँचा तो देखा कि शराब के नशे में धुत एक आदी हाथी की पूँछ पकडकर झूल रहा है और चिल्ला रहा है--देखो, देखो, मैंने पकड ली है। अब हाथी मेरे बस में है। वह बेहद खुश । इसी बीच हाथी पादा--पोंऽ और वह आदमी धड्डाम से नीचे आ गिरा... ।

लोगों ने दौडकर उसे उठाया और देखा तो उसने अपना नाम 'कल्याण' बताया।

तो जिस समय कवि बैठने की जगह की खोज में लगे थे, उसी समय दडबा एक गम्भीर समस्या से तपना शुरू हुआ। किसी ने छेड्र दिया था कि जब चुनाव-खर्च की निर्धारित राशि पाँच लाख थी, तो जगह-जगह छोटी-बडी सभाएँ होती थीं, वैनर लगते थे, पोस्टर छपते थे, पर्चे बाँटे जाते थे, होर्डिंग और कट-आउट लगते थे, रात-दिन लाउडस्पीकर बजते थे। हर शाम जुलूस निकलते थे, वाल राइटिंग होती थी, कारें और जीपें दौडती रहती थीं और अब ? अब जब पन्द्रह लाख कर दिया गया, तब कहीं कुछ नहीं। पता ही नहीं चल रहा है कि दो दिन बाद चुनाव है...

'क्यों ? हम बताएँ क्यों ?" भीड में से गरदन घुसेडकर सरोज बोले--''इसलिए कि प्रचार की जरूरतै नहीं है, रत्नाकर पांडे को बाभनों के बीच जाने की जरूरत नहीं है, अवधेश राय भूमिहारों के बीच क्यों जाएँगे ? वे यह मानकर चल रहे हैं कि ये उन्हीं के वोट हैं। जाएँ-न जाएँ--झक मारकर देंगे और जहाँ जाएँगे यह मानकर जाएँगे कि जाना न जाना बराबर है। यादव बाभन को क्यों देगा या बाभन यादव को क्यों देगा ?

तो क्या कह रहा था मैं ''

सरोज भूल गए और इसका लाभ उठाया मिश्राजी ने--'"चूतिया नहीं तो। वही घिसी-पिटी बातें, जा रहे हैं इक्कीसवीं सदी में और सिर पर वही बमपुलिस |'

"'हाँ, हाँ, याद आया। ऊँची आवाज में फिर बोले सरोज, 'समस्या राजाराम यादव कक्सिकी है। रामजी-खीकी भी हो सकती है। अब राजाराम यादव पुराने कांग्रेसी । घर पर कांग्रेस का झंडा टाँग रखा है, बिल्ला भी है। तीस साल से चुनाव में एजेंट भी होते रहे हैं कांग्रेस के । पार्टी से खड्डे हैं रत्नाकर पांडे। तो समस्या आज की राजनीति ने यह खडी कर दी है कि वे मोर्चा उम्मीदवार दीनानाथ यादव के साथ जाएँ या पांड्रे के साथ। पांडे को खुद राजाराम पर विश्वास न होगा।'

''बक चुके न ? तो अब मेरी सुनो ।' मिश्राजी ने कहना शुरू किया ' त्रिदेव शास्त्री के यहाँ ब्राह्मण सभा हुई । निर्णय हुआ कि अब की वोट वाजपेयी जाए। भले कनौजिया हो, मगर बाभन तो है...सभा की भनक लग गई रत्नाकार को ....

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