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कायस्थों के बारे में रोचक जानकारियां डा.राधेश्याम द्विवेदी

आधे भारत पर कायस्थ वंशियों का राज :-
कायस्थ, एक 'उच्च' श्रेणी की जाति है हिन्दुस्तान में रहने वाले सवर्ण हिन्दू चित्रगुप्त वंशी क्षत्रियो को ही कायस्थ कहा जाता है। एक समय था जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था। कश्मीर में दुर्लभ बर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश तथा मध्य भारत में सतवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं। अतः सब राजवंशों की संतानें हैं, सब बाबू बनने के लिए नहीं, हिन्दुस्तान पर प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिए पैदा हुए हैं जिन्होंने जन्म दिया है। पुराणो और इतिहास मे कायस्थों को प्रजापीडक और शूद्र की कोटी मे स्थान दिया गया है।परंतु शिक्षा और आर्थिक स्थिति सही होने के कारण आधुनिक भारत मे इन्हे सामान्य कोटी मे रखा गया है।इन्हे अर्थिक और राजसेवक के रूप मे अत्यंत ख्याति प्राप्त हुई। यही वह ऐतिहासिक वर्ग है जो श्रीचित्रगुप्तजी का वंशज है। इसी वर्ग कि चर्चा सबसे पुराने पुराण और वेद करते हैं।
यह वर्ग 12 उप-वर्गो में विभजित किया गया है, यह 12 वर्ग श्रीचित्रगुप्तजी की पत्नियो देवी शोभावति और देवी नन्दिनी के 12 सुपुत्रो के वंश के आधार पर है। कायस्थो के इस वर्ग की उपस्थिती वर्ण व्यवस्था में उच्चतम है। प्रायः कायस्थ शब्द का प्रयोग अन्य कायस्थ वर्गों के लिये होने के कारण भ्रम की स्थिति हो जाती है, ऐसे समय इस बात का ज्ञान कर लेना चाहिये कि क्या बात "चैत्रवंशी' या चित्रगुप्तवंशी कायस्थ" की हो रही है या अन्य किसी वर्ग की।

ब्रह्माजी की काया से उत्पन्न क्षत्रिय:-
कहा जाता है कि ब्रह्मा ने चार वर्ण बनाये (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शूद्र) तब यमराज ने उनसे मानवों का विव्रण रखने मे सहायता मांगी। फिर ब्रह्मा 11,000 वर्षों के लिये ध्यानसाधना मे लीन हो गये और जब उन्होने आँखे खोली तो एक सावालावण पुरुष को अपने सामने कलम, दवात-स्याही, पुस्तक तथा कमर मे तलवार बाँधे पाया। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि "हे पुरुष! क्योकि तुम मेरी पूरी काया से उत्पन्न हुए हो, इसलिये तुम्हारी संतानो को कायस्थ कहा जाएगा। और जैसा कि तुम मेरे चि-त (शरीर) मे गुप्तरूप से (विलीन) आये इसलिये तुम्हे चित्र श्री चित्रगुप्त जी को महाशक्तिमान क्षत्रीय के नाम से सम्बोधित किया गया है।” श्री चित्रगुप्त जी को महाशक्तिमान क्षत्रिय के नाम से सम्बोधित किया गया है गरुण पुराण में इन्हें चित्रगुप्त कहा गया है।
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श्री चित्रगुप्त भगवान का वंशवृक्ष:-
पद्म पुराण के अनुसार श्री चित्रगुप्तजी महाराज का परिवार इस तरह उल्लेखित है। श्री चित्रगुप्त जी के दो विवाह हुये, पहली पत्नी सूर्यदक्षिणा / नंदिनी जो सूर्य के पुत्र श्राद्धदेव की कन्या थी, इनसे 4 पुत्र हुए। दूसरी पत्नी ऐरावती / शोभावति धर्मशर्मा (नागवन्शी क्षत्रिय) की कन्या थी, इनसे ८ पुत्र हुए। अत: कायस्थ की 12 शाखाएं हैं – श्रीवास्तव, सूर्यध्वज, वाल्मीक, अष्ठाना, माथुर, गौड़, भटनागर, सक्सेना, अम्बष्ठ, निगम, कर्ण, कुलश्रेष्ठ। जिसका उल्लेख अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों में भी दिया गया है।श्री चित्रगुप्तजी महाराज के बारह पुत्रों का विवाह नागराज बासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ, जिससे कि कायस्थों की ननिहाल नागवंश मानी जाती है और नागपंचमी के दिन नाग पूजा की जाती है।  माता नंदिनी के चार पुत्र काश्मीर के आस -पास जाकर बसे तथा ऐरावती / शोभावति के आठ पुत्र गौड़ देश के आसपास बिहार, उड़ीसा, तथा बंगाल में जा बसे | बंगाल उस समय गौड़ देश कहलाता था, पदम पुराण में इसका उल्लेख किया गया है। वर्तमान में कायस्थ मुख्य रूप से श्रीवास्तव, सक्सेना, निगम, माथुर, भटनागर, लाभ, लाल, कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, कर्ण, वर्मा, खरे, राय, सुरजध्वज, विश्वास, सरकार, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, श्रेष्ठ, प्रभु, ठाकरे, आडवाणी, नाग, गुप्त, रक्षित, बक्शी, मुंशी, दत्ता, देशमुख, पटनायक, नायडू, सोम, पाल, राव, रेड्डी, मेहता आदि उपनामों से जाने जाते हैं। वर्तमान में कायस्थों ने राजनीति और कला के साथ विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में सफलतापूर्वक विद्यमान हैं।

कवि हरिवंशराय बच्चन ने उपनाम की व्यर्थतता बताई :-
_ हिंदी के लोकप्रिय कवि हरिवंशराय ‘बच्चन’ लिखते हैं -” कायस्थ अपनी शुद्रवत स्थिति को बहुत समय तक स्वीकार करते रहे। भारतीय पुनर्जागरण के साथ, विशेषकर पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव में, विद्या बुद्धि के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का सबूत देने पर उन्हें अपनी शुद्र वाली स्थिति खलने लगी। उन्होंने अपनी व्युत्पत्ति, इतिहास आदि की खोज की, कई पुस्तकें लिखी गईं, किसी में उन्हें ब्राह्मण और किसी में उन्हें क्षत्रिय साबित करने का प्रयास किया गया। कुछ लोगों ने अपने नाम के आगे सिंह लगाना शुरू कर दिया, कुछ लोगों ने ‘वर्मा’—हिंदी लेखकों में बहुत से वर्मा प्रसिद्ध हुए—वृंदावनलाल वर्मा, रामकुमार वर्मा, महादेवी वर्मा—इनके पिताओं के नाम के साथ शायद ही वर्मा जुड़ता रहा हो। अपने विद्यार्थी जीवन में मैंने भी कुछ समय तक अपने नाम के साथ ‘वर्मा’ जोड़ा था, पर सौभाग्य से जाति-उपजाति की व्यर्थता और उसे नाम के साथ जोडऩे की निरर्थकता मुझ पर जल्द ही स्पष्ट हो गई।” -(क्या भूलूं क्या याद करूं पृ. 14)
अमोढ़ा (बस्ती) ग्राम के पांडेय और डोम राजा के संघर्ष से सम्बद्ध:- हरिवंशराय ‘बच्चन’ की आत्मकथा का आरंभ ही डोम राजा से होता है। वह कहते हैं, आज से लगभग पांच-छह सौ बरस पहले की बात है, उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अमोढ़ा नामक ग्राम में पांडेय उपजाति का एक बड़ा ही तपोनिष्ठ और तेजस्वी ब्राह्मण रहता था। उसके एक कन्या थी जो अत्यंत रूपवती थी, और जिसके सौंदर्य की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। उन्हीं दिनों अमोढ़ा से कुछ मील के फासले पर डोमिन दुर्ग नामक एक स्थान था जिसका राजा उग्रसेन जाति का डोम था। बस्ती जिले में आज भी एक स्थान डोमीनियन बुर्ज कहलाता है। हो सकता है, इस नाम में डोमिन दुर्ग की ही कोई यादगार अटकी रह गई हो। डोम राजा ने जब ब्राह्मण कन्या के अनिंद्य रूप-सौंदर्य की चर्चा सुनी तब उसने ब्राह्मण के पास यह संदेश भेजा कि वह अपनी बेटी का ब्याह उसके साथ कर दे। ब्राह्मण के सामने बड़ा भारी धर्म-संकट उपस्थित हो गया।
‘ धीरज धर्म मित्र अरु नारि। आपत काल परखिए चारि।’
उसने परिणाम की कुछ भी परवाह किए बिना डोम राजा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इस पर डोम राजा ने दल-बल के साथ अमोढ़ा पर चढ़ाई कर दी और ब्राह्मण के पूरे परिवार को पकड़कर बंदीगृह में डाल दिया। -(क्या भूलूं क्या याद करूं, पृ. 11) । ब्राह्मण-कन्या ने अपना और अपने परिवार का मान रखने के लिए षडय़ंत्रपूर्वक विवाह के लिए एक शर्त के साथ स्वीकृति दी कि उसके परिवार को चाहे कारागृह में ही सही, सुरक्षित रखा जाए और वह विवाह के पूर्व अयोध्या तीर्थाटन पर जाना चाहती है। राजा ने शर्त मान ली और ब्राह्मण-कन्या अयोध्या तीर्थ के बहाने वहां के सूबेदार राय जगतसिंह के समक्ष उपस्थित हुई। जगतसिंह कायस्थ थे। उन्होंने डोम राजा को हराकर ब्राह्मण-कन्या के परिवार को स्वतंत्र किया। जाति किस तरह से ब्राह्मणों की चेरी थी इसका भी प्रमाण वह देते है –”राय साहब के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए उस निर्धन और असहाय ब्राह्मण के पास कुछ भी नहीं था। उसने अचानक अपने यज्ञोपवीत की ओर देखा और उसे उतारकर राय साहब के कंधे पर डाल दिया, बोला, ”इसके द्वारा मैं अपना ‘पांडेय’ आस्पद आपको प्रदान करता हूं, और आपको ब्राह्मण बनाकर अपनी ब्राह्मण कन्या आपको समर्पित करता हूं।” ब्राह्मण ने इसी अवसर पर राय साहब से यह वचन लिया कि उनके वंश में कोई मदिरा-पान नहीं करेगा और यदि करेगा तो कोढ़ी हो जाएगा। जगतसिंह के वंशज ‘अमोढ़ा के पांडे’ के नाम से प्रसिद्ध हुए और दो-तीन शताब्दियों तक अमोढ़ा के ही निवासी रहे।”- (क्या भूलूं क्या याद करूं पृ. 12) । ज्ञान विज्ञान तथा बुद्धि कौशल में अग्रणी रहे कायस्थ तभी से एक संस्कारित वर्ग में सम्मलित मान लिये गये तथा सभी वर्णों एवं जातियों में समादृत हो गये। आज के जमाने में सभी वर्णों में इनके रिश्ते और शादियां होने लगी है। इनके खानपान तथा आचार विचार में सात्विकता देखी जा सकती है। ज्ञान विज्ञान, शासन प्रशासन तथा साहित्य आदि हर क्षेत्र में इनके योगदान को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता है। आदरणीय बच्चन जी ने अपने कुल जाति के इतिहास का बहुत गहन अध्ययन खोज तथा अनुसंधानकर इस तथ्य को उद्घाटित किया है। अभी आजादी के बाद तक भू आलेख के रख रखाव की सारी जिम्मेदारियां यही वर्ग करता आ रहा है। इन्हें पूर्वांचल के इस क्षेत्र में ‘लाला’ तथा ‘भइया’ जैसा आत्मीयपूर्ण उपाधि से सम्मानित भी किया जाता रहा है।
बच्चनजी ने मधुशाला में अपना परिचय इस प्रकार दिया है-

“मै कायस्थ कुल उद्भव , मेरे पुरखो ने इतना ढाला।
मेरे तन के लहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला।
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर।
मेरे दादों -परदादो के हाथ बिकी थी मधुशाला ।।
मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला।
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला।
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते।
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला।।
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