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लघु व्यंग्य कथाएँ

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शशिकांत सिंह शशि

पालतु कौए

बी के को आजकल एक ही सपना बार-बार आ रहा है कि वह मर गया है। नंगा फुटपाथ पर पड़ा है और कौए उसके शरीर पर मंडरा रहे हैं। कोर मीटिंग के बाद से ही उसे ऐसे सपने आ रहे हैं जिसमें मैनेजर ने कहा था-

-’’ हां तो मैं कह रहा था कि जैन साहब का आदेश है कल दिन भर इसी चित्र को न्यूज में फोकस करना है। गौर से देख लीजिये आपलोग तो ड्रामेटाईजेशन में सुविधा होगी।’’

सारे एंकर , रीडर, गौर से चित्र को देखने लगे। एक आदमी के हाथ में नोटों को एक बंडल था। वह ’केतन चैहान के साथ खड़ा था।  बी के ने पूछ लिया-

-’’ सर, यह दूसरा आदमी चैहान साहब के पास क्यों खड़ा है ?’’

मीडिया मैनेजर हंसे। बोले-’’ यह प्रश्न आपके लिए जरूरी नहीं है। जरूरी है कि आपको बोलना क्या है ? आपको चीख-चीखकर जनता को बताना है कि चैहान इस आदमी से रिश्वत लेते देखा गया। स्टींग अप्रेशन की गई थी।’’ बी के संदेही जीव था फिर पूछ बैठा-’’ सर, चित्र में रिश्वत लेते हुये तो चैहान साहब दिख ही नहीं रहे।’’ दूसरे प्रश्न के बाद माहौल तनावूपर्ण हो गया। बी के मित्रों ने इशारे से शांत रहने के लिए कहा लेकिन विनाशकाले विपरीत बुद्धि।

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मैनेजर ने गहरी सांस ली और बोला-’’ आप पड़ताल मत कीजिये। बार-बार एक ही बात आपलोग कहेंगे तो शाम तक जनता को भी लगने लगेगा कि चैहान रिश्वत ले रहा था। फोटा की एक क्लिप दिखाकर हटा लेना है। यही जैन साहब का आदेश है।’’

बी के फिर मुंह खोली-’’ पर सर...........।’’ मैनेजर ने उसे घूरा और हाॅल से बाहर निकल गया। मीेटिंग के बाद कुमार साहब ने पहला पैग लेने के बाद बी के को बताया-’’ अरे, सब रंडुए हैं साले, चैहान को बदनाम करने के आदेश हैं। जैन को माल मिला है। उसे क्या ? वह तो अपनी मां-बहन भी दे दे।’’

बी के चुप।

दूसरे पैग के कुमार साहब ने बताया-’’ यह जो पहला आदमी है यह तो मैनेजर का साला हैं। कल एक फंक्शन में चैहान साहब के पास चला गया और मजाक में बोला-’’ सर, गड्डी में पांच नोट नकली है। आप देखकर बता सकते हैं कि वे नकली नोट कौन से हैं ?’’ चोहान ने सोचा कि बंदे ने ज्यादा चढ़ा ली है तो हंसता हुआ चला गया। उसी समय इनके कैमरामैन ने फोटा ले ली। हमंे क्या ? कल दिन चीखेंगे। हम तो पालतु कौए हैं।

बस तब से बी के यही सपना देख रहा है।

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विनोद दवे

· इंसानियत मरी नहीं

सिटी बस अपनी रफ्तार में थी। सवारियों के लिए इतनी मारामारी कि चढ़ने या उतरने के लिए केवल एक ब्रेक लगता, उस पर भी दरवाजे पर लटका कंडक्टर चढ़ती सवारियों को अंदर खींच लेता और उतरते यात्रियों के लिए तो एक धक्का काफ़ी था। इसी भागमभाग में कोई एक चौराहे पर उतरने के चक्कर में गिर गया। पीछे से आती कार उसे कुचलती हुई निकल गई।

ड्राईवर ने डरकर बस रोक दी। कंडक्टर चिल्लाया, “गाड़ी भगा बे। अभी इंसानियत मरी नहीं। कोई न कोई इसे हॉस्पिटल पहुंचा ही देगा।“

और सिटी बस ने फिर से अपनी गति पकड़ ली।

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