रविवार, 29 जनवरी 2017

राम कृष्ण खुराना की लघुकथाएँ

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गुरू महिमा
Guru Mahima

 

कुछ समय पहले की बात है कि एक बार एक युवक अपने गांव से शहर की ओर जा रहा था। मार्ग में एक छोटा सा तालाब पड़ता था। उस युवक ने देखा कि एक बगुला मछली को पकड कर ऊपर हवा में उछाल देता था तथा जब मछली हवा में तैरती हुई नीचे आती थी तो बगुला उसको अपनी चोंच में लपक कर खा जाता था। वह युवक बहुत देर तक उस बगुले का यह करतब देखता रहा। उसके देखते-देखते बगुले ने कई मछलियों को यों ही ऊपर की ओर उछाला और मुंह में लपक लिया। उस बगुले का निशाना इतना अचूक था कि मछली ठीक उसके मुंह में आकर ही गिरती थी।

युवक उससे बहुत प्रभावित हुआ। वह प्रतिदिन वहां आकर घंटों बगुले को इसी प्रकार से देखता रहता। उसके दिल में भी उसी प्रकार से अभ्यास करने की इच्छा हुई।

दूसरे दिन वह बाज़ार से मीठी गोलियां अपने साथ ले गया तथा एकलव्य की भांति अपने दिल में बगुले को अपना गुरु मानकर वहीं अभ्यास करने लगा। वह गोलियों को ऊपर हवा में उछाल देता और उनको मुंह में लपकने की कोशिश करता। कई बार तो गोली उसके मुंह में आ जाती परंतु कई बार नीचे गिर जाती।
“करत-करत अभ्यास के जड मति होत सुजान” के अनुसार उसका निशाना
अभ्यास करने से ठीक होता गया। एक दिन अचानक उसने फल काटते समय चाकू को ऊपर हवा में उछाल दिया और अपने दांतों से लपक लिया। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसने मन ही मन अपने गुरु बगुले को प्रणाम किया। अब उसने गोलियों को छोड़ दिया। तथा एक तलवार को लेकर दस-बारह फुट ऊपर हवा में उछाल कर दांतों से लपक लिया। वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसके तो मानो पैर ही ज़मीन पर नहीं पडते थे। उसकी खुशी छिपाए नहीं छिपती थी। अब वह नित्य प्रातः आकर अपने गुरु बगुले को प्रणाम करके अभ्यास करने लगा।

धीरे-धीरे वह अपना यह करतब अपने मित्रों तथा सम्बंधियों को भी दिखाने लगा। सभी हैरान होते व उसकी बहुत तारीफ करते। वह अपनी तारीफ सुनकर बहुत प्रसन्न होता।

एक बार की बात है कि उसने यह करतब दस-पन्द्र्ह लोगों के बीच दिखाया उसी प्रकार से उसने तलवार को हवा में उछाल दिया और दांतों से पकड़ लिया। उसको एक खरोंच तक न आई। सबने उसकी बहुत पीठ ठोंकी।
उनमें से एक बुजुर्ग ने वैसे ही पूछ लिया। “भाई, इस करतब को सिखाने वाला तुम्हारा गुरु कौन है ?”

युवक ने अपने गुरु के रूप में बगुले का नाम लेने में अपना अपमान समझा अतः उसने इसकी सफलता का राज़ अपनी सतत साधना ही बताया। उसने कहा कि मैंने यह सब अपनी साधना से ही सीखा है।

“अच्छा।” बुजुर्ग बहुत हैरान हुआ।

सभी ने फिर उसकी बहुत तारीफ की।

“अच्छा तो एक बार फिर से करके दिखाना ज़रा।” उसी बुजुर्ग ने शांत स्वर में कहा।

युवक ने तत्काल तलवार को हवा में उछाला और उसी प्रकार दांतों से पकड़ने का प्रयास किया। परंतु यह क्या ? अबकी बार उसका निशाना चूक गया और तलवार उसके गालों को चीरती हुई निकल गई। खून का फव्वारा फूट निकला।
गुरु के प्रति निरादर का भाव उसकी दोष भावना को छूता हुआ उसे असंतुलित कर गया।

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राजनितिज्ञ

(RAJNITIGYA)

 

प्राचीन काल में एक जंगल में एक शेर राज्य किया करता था। उसके तीन मंत्री थे। बन्दर, भालू और खरगोश। दरबार लगा हुआ था। तीनों मंत्री राजा के इर्द-गिर्द बैठे हुए थे। अचानक शेर ने जुमहाई लेने के लिए मुंह खोला तो उसके पास ही बैठा भालू बोल पडा – ‘ जहांपनाह, आप रोज़ सुबह उठ कर टूथ-पेस्ट अवश्य किया करें। आपके मुंह से बदबू आती है।

शेर का पारा सांतवें आसमान पर चढ़ गया। वह गरज कर बोला – ‘ यू ब्लडी। तेरी यह मज़ाल ?’ शेर ने एक झपटा मारा और भालू को खा गया।
दूसरे दिन जब शेर दरबार में आया तो उसने बन्दर से पूछा – “मंत्री जी, बताईये हमारे मुंह से कैसी गन्ध आ रही है ?”

बन्दर ने भालू का अंत अपनी नंगी आंखों से देखा था। वह हाथ जोड़ कर बोला – वल्लाह जहांपनाह। क्या बात है ? आप हंसते हैं तो फूल गिरते हैं। जब आप बोलते हैं तो मोती झड़ते हैं। आपके मुंह से इलायची की खुशबू आती……!”

“शट-अप।” शेर ने बन्दर को अपनी बात पूरी करने का अवसर भी न दिया। वह बोला-
”हम जंगल के राजा हैं। रोज़ कई जानवरों को मार कर खाते हैं। हमारे मुंह से इलायची की खुशबू कैसे आ सकती है ? तुम झूठ बोलते हो।” इतना कहकर शेर बन्दर को भी हज़म कर गया।

तीसरे दिन शेर ने अपने तीसरे मंत्री खरगोश से भी वही सवाल किया।
खरगोश दोनों का हश्र देख चुका था। वह हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। एक कदम पीछे हट कर, सिर झुका कर बोला – “गुस्ताखी माफ हो सरकार। मुझे आजकल जुकाम लगा हुआ है। जिसके कारण मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे पाने में असमर्थ हूं।” शेर कुछ नहीं बोला।

खरगोश राजनितिज्ञ था।

 

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राम कृष्ण खुराना

Ram Krishna Khurana

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