सोमवार, 30 जनवरी 2017

लौट आओ सुकून देने वाले बसंत / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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लौट आओ सुकून देने वाले बसंत
० बसंत भी हारा प्रदूषण से
प्रकृति द्वारा प्रदत्त छह ऋतुओं में बसंत ऋतु का एक अलग ही आनन्द और महत्व रहा है। मन का प्रफुल्लित होना, हरियाली का खिलखिला उठना, शब्दों का कविता में बंध जाना, पुष्पों की महक हवा में समा जाना और हर तरह से मानवीय शरीर सहित अन्य प्राणियों के शरीर में उल्लास का भर आना ही बसंत है। बसंत ऋतु का आगमन फरवरी माह में प्रकृति के सौंदर्य के साथ हमारे जीवन में भी रस घोल  जाता है। यही कारण है कि इसे मधुमास के नाम से भी जाना जाता है। मनुष्य के दिलों पर राज करने वाला बसंत भौरों और तितलियों के जीवन में भी उल्लास का संचार कर जाता है। ग्रीष्म, वर्षा , शरद, शिशिर, हेमन्त ऋतुओं से अलग बसंत ऋतु हर उम्र वर्ग के लिए अपना महत्व सिद्ध करता रहा है। किसी के लिए यह स्वागत की ऋतु होती है तो किसी के लिए यादों का खजाना। कोई इस ऋतु के इंतजार में बैठा होता है तो कोई अपने पुराने दिनों की तार-झंकार को याद कर प्रसन्न हो उठता है। सभी वर्ग में अपना अलग बसंत होने का एहसास भी युवक-युवतियों के संस्मरणों में समाया होता है। नव चेतना का संचार करने वाली इस ऋतु में प्रेम की नई कोंपलें फूटना ओर मन को नई दिशाएं मिलना प्रकृति की अनुपम भेट कही जा सकती है।

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पतझड़ में बसंत का आनन्द- युवा मन का नई नवेली दुल्हन मिल जाना या युवती के जीवन में उसके जीवन साथी का प्रवेश होना भी किसी बसंत से कम नहीं कहा जा सकता है। यही युवा मन और युवावस्था की मस्ती जीवन के एक पड़ाव में अधेड़ और वृद्धावस्था तक जा पहुंचती है। ऐसी पतझड़ वाली ढलान भरी उम्र में भीबसंत ऋतु का आगमन वही दशकों पुरानी कुलाचे मारने लगता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो पांच दशक पूर्व की यादें और युवा मन की सोच को फिर से नये पर मिल गये है। मन उड़ना चाहता है। सुनहरे दिन और आनंदमयी रातों में खो जाना चाहता है। सब कुछ भूलकर मन की झंकार वही तान छेड़ना चाहती है जो कभी हमसफर के साथ राग-तंरगियां छेड़ा करती थी। ऐसे बसंत का स्वागत भला कौन नहीं करना चाहेगा, जो मन में दबी-कुचली कलुयता को सदैव के लिए खत्म करे आनंद विभोर कर दे। अपने दूर गये पिया की याद भी विरह की पीड़ा को कम कर जाए तो ऐसे बसंत को भला कौन न जीनाचाहे। यह एक ऐसी ऋतु है जो हर उम्र दराज के जीवन में रंगों का संचार कर जाती है। जिसे शब्दों के जादूगर ने इन लफ्डरों में कहा है-


बैठे दो क्षण बांध लें फिर हाथों में हाथ
जाने कब झड़ जायेंगे, ये पियराने पात।।
कस कर चिपके डाल से, सुनकर पियरे पात
आयेंगे ऋ तु राज कल, लेकर स्वर्ण प्रभात।।


आनंद और खुशियों का पर्याय-बसंत ऋतु ही ऐसा मौसम है जो प्रत्येक प्राणी के जीवन में आनंद और खुशियों की बाहर लेकर आता है। न तो अधिक सर्द राते होती है और न ही तपाने वाली सूर्य की तपन। इस ऋतु काल में दिन और रात लगभग बराबर होते हैं। इस ऋतु का सौंदर्य ही हमोर स्वास्थ्य को पोषण देता है। इस लुभावने मौसम में हम सभी दुःखों को भूल जाते है। हमारा हृदय उत्साहित होता है। प्रकृति हरि चादर ओढ़े हमें खुशियों की सौगात प्रदान करती दिखाई पड़ती है। प्रत्येक ऋतु की तरह बसंत ऋतु भी तीन माह की होती हे किंतु इसकी खुशियां और वातावरण के सुकुन से यह कब विदा हो गयी यह पता ही नहीं चल पाता। पक्षियों की मधुर आवाज इसी ऋतु के आगमन की सूचक होती है। बसंत ऋतु का वातावरण और सामान्य तापमान बिना थके लोगों को अधिक कार्य करने की हिम्मत और प्रेरणा दे जाता है। केवल कवि की कल्पना अथवा वर्णन में ही बसंत की रमणियता नहीं पायी जाती। सचमुच ही बसंत के आगमन से प्रकृति का रूप अत्यंत मनोहर और नयन तृप्तकर हो उठता है। बसंत की उत्सवधर्मिता, मदन धर्मिता है। हम सबके अंदर एक सम्मोहन है। बिना आकर्षण के न तो जीवन है ओर न ही गति।

 

एक अनूठी आकर्षक ऋतु है बसंत की,
न सिर्फ बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी का
आशीर्वाद लेने की
अपितु स्वयं के मन के मौसम को
परख लेने की,
रिश्तों को, नवसंस्कार, नव-प्रमाण देने की,
संगीत की, हल्की-हल्की शत की,
नर्म-गर्म प्रीत की।।



अब नहीं रहा, पहले जैसा बसंत- बसत ऋतु का सीधा संबंध प्रकृति से है। पेड़ों, पहाड़ों, नदियों और झीलों से बसंत का सीधा संबंध रहा है। आज की शहरी संस्कृति में बसंत पुराने समय जैसा उत्साह लेकर नहीं आता। प्राकृतिक वनस्पति का अभाव और प्रदूषित वातावरण ने बसंत ऋतु का आनंद कम कर दिया है। दौड़ती-भागती आपाधापी वलो जीवन चक्र ने बसंत की शोभा देखने तक का समय नहीं दिया है। बसंत कब आता है और कब चला जाता है, पता ही नहीं चलता। पेड़ों के पत्ते कब झ़डे, बय नयी कोपले फूटी और कब कलियों ने अपना जादू चलाया, कब तितलियां और भौरों ने इनका रसास्वादन किया कुछ भी आनंद की विभूति में शामिल नहीं हो पा रहा है। आज प्रकृति से दूर होता जा रहा मनुष्य अपनी मिट्टी की खुशबु नहीं पहचान पा रहा है। इन सबके बावजूद बसंत अपनी छठा तो बिखेरता ही है। शहरीकरण के चलते बाग-बगीचों की दुनिया भी बे-रंग हो गयी है। हरियाली को संजोकर रखने वाली परंपरा अब दूर-दूर तक दिखायी नहीं पड़ रही है। बसंत की हरियाली के लिए आज की पीढ़ी क्या कुछ कर रही है यह भी हम बखूबी जान रहे है। अब घरों में प्राकृतिक फूल पौधों का स्थान मानव निर्मित आकर्षक पौधों ने ले लिया है। प्लास्टिक की दुनिया ने भी बसंत की बहार को कम करने में अहम भूमि निभायी है।
लुप्त हो रही बसंत की परंपराएं-बसंत ऋतु का महत्व बसंत पंचमी पर्व के रूप में सामने आता रहा है। इसी दिन विद्या की देवी सरस्वती का ब्रम्हा के मानस से अवतरण हुआ। बसंत पंचमी के दिन जगह-जगह मां शारदा की पूजा अर्चना की जाती थी। स्कूलों में बच्चों की पट्टी में मां शारदा का चित्र बनाकर शिक्षकों द्वारा पूजा अर्चना करायी जाती थी। मां शारदा की कृपा से प्राप्त ज्ञान व कला के समावेश से मनुष्य जीवन में सुख व सौभाग्य प्राप्त करने का अवसर अब कम ही मिल पा रहा है। किताब और कलम की पूजा की परंपरा भी अब विलुप्ति पर है। इसी दिन दाम्पत्य जीवन में सुख की कामना से कामदेव औरउनकी पत्नी रति की पूजा भी की जाती है। बसंत ऋतु और वसंत पंचमी पर विद्यालयों में होने वाले संगीत, वाद-विवाद, खेलकूद एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी अब बीता इतिहास हो चुका है। मां सरस्वती की पूजा हर राशि वाले अलग पुष्प से कर सकते है। मेष और वृश्चिक राशि के छात्र लाल पुष्प, वृष और तुला राशि वाले श्वेत पुष्प, मिथुन और कन्या राशि वाले कमल पुष्प, सिंह राशि वाले लाल गुड्हल, धनु और मीन वाले पीले पुष्प, मकर और कुंभ राशि वाले नीले पुष्प से मां की अराधना कर फल प्राप्त कर सकते हैं।

 

                               
                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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