बुधवार, 25 जनवरी 2017

बाल कविताएँ - शैलेन्‍द्र सरस्‍वती

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रसगुल्‍ले

 

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गोल-मटोल,उजले-उजले,

पोटली रस की रसगुल्‍ले।

 

रस के सागर में डूबे,

कौन इन्‍हें न देख के झूमे।

 

जन्‍मदिन या उत्‍सव आये,

रसगुल्‍ले जी रंग जमाये।

 

रूठो को तत्‍काल मनाये,

रसगुल्‍ला जो उन्‍हें खिलाये।

 

बन कर मीठे रसगुल्‍ले से,

हम भी जग का दिल जीते।

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किताबों में सच का मीठा....

 

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किताबों में ज्ञान-विज्ञान,

भागे जिससे सब अज्ञान।

 

किताबों में परिकथायें,

कल्‍पना की भरे उड़ान।

 

किताबों में है इतिहास,

गर्व अतीत का करवाये।

 

किताबों में हैं कवितायें,

बात जो मन की कह जायें।

 

किताबों से देश-विदेश का,

हम सफ़र कर सकते हैं।

 

किताबों में जंगल-जंगल,

पर्वत-मरूधर हंसते हैं।

 

किताबों में महापुरूषों की,

कितनी अच्‍छी हैं गाथायें।

 

किताबों में सब धर्मों की,

एक सी ही है परिभाषायें।

 

किताबों में सच का मीठा,

सागर बहता जाता है।

 

सच का प्‍यासा शब्‍द-शब्‍द से,

अपनी प्‍यास बुझाता है।

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मेला

 

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दिल्‍ली के बाजार में,

लगा ण्‍क जो मेला।

 

आये उसे सभी देखने,

चोर-पुलिस,गुरू-चेला।

 

बीनू-मीनू ने खाये,

जी भर कर रसगुल्‍ले।

 

लब्‍बू-डब्‍बू बैठ साथ में,

पहिये वाला झूला झूले।

 

ण्‍क खरीदी पायल ने,

नाचने वाली गुडि़या।

 

जिसे देख कर हंस पडी,

बिन दांतों वाली बुढिया।

 

खूब हंसाया जोकर ने,

बंदर हिरो बन नाचा।

 

लगी जो ठोकर बंदरिया को,

उसने जडा तमाचा।

 

बैठ बिल्‍ली की पीठ पे चूहा,

घूमा इधर-उधर।

 

खत्‍म हुआ शाम को मेला,

लौट गये सब अपने घर।

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पंछी आलस कभी न करते

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पंछी आलस कभी न करते,

पौ फटते ही हैं जग जाते।

 

तिनकों के वे घर में अपने,

गाना चहक-चहक कर गाते।

 

उतर के वे फिर डाली-डाली,

अपना आस-पड़ोस जगाते।

 

दिन निकला है जागो भी अब,

सब को यह संदेश सुनाते।

 

निकल के नभ में दूर-दूर वे,

दाना-पानी तलाशने जाते।

 

जो मिल जाये मौज से खा ले,

मेहनत से न हैं कतराते।

 

पंछी आलस कभी न करते,

करे जो आलस वे घबराते।

 

काम-काज अपना पहाड़ सा,

देख-देख फिर हैं पछताते।

 

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शैलेन्‍द्र सरस्‍वती

नारायणी निवास,मोबाइल टावर के सामने,धरनीधर कॉलोनी,उस्‍ता बारी के बाहर,बीकानेर-334001(राज)

Shailendra5saraswati@gmail.com

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