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विज्ञान-कथा / कुछ उलझे से रिश्ते / कल्पना कुलश्रेष्ठ

अपने वातानुकूलित घर के ऑफिसनुमा कक्षा में बैठा हुआ मैं कंप्यूटर पर केस स्टडी कर रहा था। कुछ मामले ऐसे थे जिन्होंने मेरी बुद्धि को चुनौती दे रखी थी। सोचते सोचते मेरे सिर मं दर्द होने लगा। मुझे चाय की जरूरत महसूस होने लगी थी।

‘‘पता नहीं कितने बज गए?’’ मैं बुदबुदाया।

‘‘शाम के सात बजकर पंद्रह मिनट हुए हैं सर! वेलकम सर!’’ मेरी कलाई घड़ी से आवाज आई। उसकी मीठी और खनकदार आवाज सुनने के लिए मैं यों ही कई बार समय पूछ लिया करता था। बैटरी थोड़ी अधिक खर्च होती थी, पर कानों में अमृत-सा घुल जाता था।

‘‘रूबी, एक कप गर्म चाय तो पिलाना’’ मैंने आवाज लगाई और शवसान की मुद्रा मं आराम से लेट गया। आज बाईसवीं सदी की हमारी दिनचर्या में योगासनों का बड़ा महत्व है, तभी तो शारीरिक श्रम न करने के बावजूद हम चुस्त-दुरुस्त बने हुए हैं।

थोड़ी देर बाद ही चाय लिए हुए रूबी का सुन्दर चेहरा मुझे दरवाजे पर नजर आया। मैं उठकर बैठ गया। रूबी ने निकट आकर चाय का प्याला मेरे मुँह से लगा दिया। गर्म चाय से मेरे होंठ जल गए। मैं बौखला उठा। निर्देश देने में मुझसे थोड़ी चूक हो गयी थी। ‘चाय देना’ के स्थान पर ‘चाय पिलाना’ जो कह दिया था। रूबी ठहरी रोबोट, वह मनुष्य की भाँति शब्दों की ओट में छिपा मेरा मंतव्य नहीं समझ सकती थी।

‘‘काश, तुम रोबोट हम मनुष्यों की तरह बुद्धिमान हो सकते’’ मैंने चाय का कप उसके हाथ से लेते हुए कहा।

‘‘फिर हम आपके गुलाम नहीं हो सकते थे सर!’’ रूबी ने तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया।

‘‘यू नॉटी!’’ मैंने उसके गुलाबी गालों में चुटकी भर ली।

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‘‘बिहेव योरसेल्फ सर! दूर से बात कीजिए’’ रूबी ने उत्तर में नाराजगी थी। में गहरी साँस लेकर रह गया। न जाने किस खूसट ने उसकी प्रोग्रामिंग की थी। कमबख्त को छू भी लो तो...। और जवाब तो ऐसे देती थी कि सामने वाले का लाजवाब कर दे। चाय पीकर तरोताजा हो मैं फिर कंप्यूटर के पास आ गया और विनय बनाम मनोरमा केस की फाइल निकाल ली। इक्कीसवीं सदी की तुलना में आज मानव-मन और समाज बड़ा जटिल हो गया है। एक समाजशास्त्री होने के नाते ऐसी घटनाओं को जानने में मेरी रुचि रहती है जो समाज की दिशा और दशा का अध्ययन करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होती हैं। विज्ञान और तकनीक ने मनुष्य के जीवन की सरलता और नियति में विश्वास जैसी धारणाओं पर कड़ा प्रहार किया है। अब मानव नियति को स्वीकार कर चुप नहीं बैठ जाता, वरन् उसे अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास करता है, भले ही इसका परिणाम शुभ हो अथवा अशुभ। विनय और मनोरमा का जीवन इसी का सटीक उदाहरण है। उगते सूर्य की किरणों जैसी रंगत वाली मनोरमा का सौंदर्य इतना मोहक था कि कवियों और लेखकों की सारी उपमाएँ उसके आगे मौन थीं। उनके व्यक्तित्व में ऐसा चुंबकीय आकर्षण था कि कोई उसके जादू से बच नहीं सकता था। विनय और मनोरमा का प्रेम-विवाह हुआ था। एक-दूसरे के प्रति ऐसा अटूट प्रेम, निष्ठा और समर्पण की भावना उनमें थी, जो विरले ही देखने को मिलती है। जैसे धूप के बिना सूरज और सूरज के बिना धूप की कल्पना नहीं की जा सकती वैसे ही वे एक दूसरे के बिना अपूर्ण थे। परंतु साथ जीने-मरने के वचन के बावजूद होनी ने कुछ और रच रखा था। विवाह के दो वर्ष बाद ही वह अशुभ घड़ी आ पहुँची। वर्षा का मौसम था। कई दिनों की वारिश के बाद उस दिन आसमान साफ हो गया था।

‘‘उठिए विनय, मॉनिंग वाक के लिए चलें’’ सुबह छह बजे मनोरमा ने विनय को जगाया।

‘‘सुबह-सुबह नींद मत खराब करो मनु! कल चलेंगे’’ विनय ने करवट बदलकर आँखें बंद कर लीं।

‘‘ठीक है तो मैं अकेली ही जा रही हूँ आधे घंटे में वापस आ जाऊँगी’’ कहकर मनोरमा चली गई।...और फिर आधे घण्टे के बाद मनोरमा नहीं वरन् उसके घायल होने की सूचना अस्पताल से आई हड़बड़ाया हुआ विनय जल्दी से अस्पताल पहुँचा तो वह मरणासन्न अवस्था में थी। कोई अज्ञात वाहन उसे टक्कर मारकर भाग गया था।

‘‘हमारा साथ इतना ही था विनय!’’ मनोरमा का स्पष्ट और संयत स्वर बुझते दीपक की अन्तिम ज्योति जैसा था।

‘‘ऐसा नहीं होगा। तुम ठीक हो जाओगी। हम हमेशा साथ रहेंगे’’ विनय ने उसका हाथ अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया।

‘‘अब यह असंभव है। तुम स्वयं को सँभालो विनय!

मेरे बिना भी जीवन तो आगे बढ़ेगा ही’’ अटकती साँसों से मनोरमा ने कहा। सहसा वनय के मस्तिष्क में बिजली-सी कौंध गई।‘‘ यह संभव हो सकता है मनु! इस शरीर में न सही, दूसरे शरीर में तुम फिर मेरे पास आओगी।’’

‘‘कैसे?’’ मनोरमा की आँखों में प्रश्न तैर उठा।

‘‘अपने क्लोन के रूप में।’’

‘‘परन्तु यह किस प्रकार संभव है मानव-क्लोन -निर्माण पर तो इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में प्रतिबंध लगाया जा चुका है। अब इसे कौन कर सकेगा?’’ मनोरमा ने निराशा भाव से कहा।

‘‘विज्ञान के बढ़ते कदम ऐसे प्रतिगामी निर्णयों से रोके नहीं जा सकते’’ विनय ने धीरे से कहा। इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में पृथ्वी के सभी देशों की सरकारें मानव-क्लोनिंग संबंधी अनुसंधान पर प्रतिबंध लगा चुकी थीं, परंतु गुप्त रूप से कुछ संस्थान इसमें लगे और सफलता प्राप्त कर ली। इसमें मानव-क्लोन-निर्माण संस्थान ‘हू-ब-हू’ भी था, जिससे विनय वित्तीय सलाहकार के रूप में जुड़ा हुआ था।

‘‘मेरे विचार से ऐसा करना उचित नहीं होगा विनय! आगे चलकर इससे न जाने कैसी समस्याएँ उठ खड़ी हों। कानून के उल्लंघन करने पर तुम्हें सजा भी हो सकती है’’ मनोरमा ने विरोध किया।

‘‘यह बात गोपनीय रखी जाएगी और कोई भी समस्या हमारे-तुम्हारे मिलन से महत्वपूर्ण नहीं हो सकती’’ दृढ़ स्वर से कहकर विनय से बात समाप्त कर दी।

मनोरमा को उसके परिजनों की देख-रेख में छोड़कर विनय यथोचित प्रबंध में लग गया। ‘हू-ब-हू’ से संपर्क स्थापित करते हुए तुरंत उनके विशेषज्ञ अस्पताल पहुँच गए और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के बाद उन्होंने मरणोन्मुख मनोरमा के शरीर से कायिक कोशिकाएँ निकाल लीं। आगे की प्रक्रिया उनकी अत्याधुनिक प्रयोगशाला में होती थी। कार्य समाप्त होते ही मनोरमा ने अंतिम हिचकी ली और इस दुनिया को अलविदा कहकर चली गई।

क्लोन-निर्माण हेतु मनोरमा की माँ का सहयोग अपरिहार्य था, परंतु न जाने क्या सोचकर उन्होंने विनय के आगे यह विवित्र-सी शर्त रख दी थी कि जन्म से लेकर अठारह वर्ष की आयु तक मनोरमा उन्हीं के संरक्षण में रहेगी और इस अवधि में विनय उससे मिल नहीं सकेगा। सहमत न होने के अतिरिक्त विनय के पास कोई चारा नहीं था, क्योंकि इस कार्य में अन्य किसी की सहायता लेने पर बात खुल जाने का भय था। प्रयोगशाला में मनोरमा के शरीर की कोशिका, जो कि प्रजनन कोशिका नहीं थी, को एक डिश में रखकर उसमें विशेष प्रकार के पोषक तत्व डाले गए, जिससे यह विकसित होने लगी। तत्पश्चात् उन तत्वों की मात्रा इतनी कम कर दी गई कि एक सप्ताह बाद कोशिका का विकास रुक गया और उसके जीन निष्क्रिय हो गए। सुप्तावस्था में पहुँची इस कोशिका में जब नियंत्रित ढंग से कार्य करवाया जा सकता था। अगले चरण में मनोरमा की पैंतालिस वर्षीय माँ शांतिप्रभा को आवश्यक हारमोन देकर उनके शरीर से अनिषेचित अंडाणु निकाला और उसका केन्द्रक हटा दिया गया। सुप्त कोशिका को केंद्रक-रहित अंडाणु के साथ रखकर उस पर हल्की विद्युत तरंगों को बौछार की गई, फलस्वरूप अंडाणु ने निष्क्रिय कोशिका के केंद्रक को स्वयं में समाहित कर लिया। इस प्रकार बनी कोशिका में विभाजन आरंभ हो गया और एक सप्ताह में भ्रूण का निर्माण हो गया, जिसकी जीन संरचना हू-ब-हू मनोरमा जैसी थी। अब इस भ्रूण को मनोरमा की माँ के गर्भाशय में स्थापित कर दिया गया। पूरी प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न की जा चुकी थी। अब नौ माह बाद अपनी माँ के गर्भ से मनोरमा पुनः जन्म लेने वाली थी। अठारह वर्ष के लंबा अंतराल...... सोते जागते विनय का ध्यान किसी योगी की भांति मनोरमा की ओर लगा रहता। और आज उसकी प्रतीक्षा का अंत होने वाला था। शाम को मनोरमा के अठारहवें जन्मदिन की पार्टी में उसकी माँ ने विनय को इस संदेश के साथ आमंत्रित किया था कि वह आकर अपनी अमानत ले जाए। विनय की प्रसन्नता की सीमा न थी। दिल बिल्कुल वैसे ही शरारती ढंग से ताल देकर धड़क रहा था जैसा मनोरमा से विवाह के समय धड़क रहा था। मनोरमा की मृत्यु के बाद आज वह ढंग से सजा-सँवरा था। वियोग का लंबा समय बिताने के बाद आने वाले मिलन के क्षण उसे उत्कंठित किए जा रहे थे। रात के साढ़े ग्यारह बजे थे। पार्टी का हंगामा समाप्त हो गया था। मेहमान जा चुके थे। मनोरमा कपड़े बदलकर कमरे में आकर लेट गई उसके गुलाबी मुखड़े पर थकान के चिह्न स्पष्ट थे। उसे लेटे हुए कुछ क्षण हुए थे कि दरवाजे पर आहट हुए। उसने मुड़कर देखा तो माँ थी।

‘‘उठकर तैयार हो जाओ मनोरमा, अब तुम्हें अपने पति के साथ जाना है’’ उन्होंने विनय के हाथ में मनेारमा का हाथ देते हुए कहा। वही दुर्लभ विस्मृत स्पर्श अनुभूति के अतिरेक में विनय ने आँखें बंद कर लीं। अब यह उसका है सदैव के लिए। ‘‘तुम्हें क्या हो गया है माँ? कैसी विचित्र बातें कर रही हो?’’ मनोरमा ने अचकचाकर अपना हाथ खींच लिया।

‘‘मैं ठीक कह रही हूँ बेटी’’ मनोरमा की माँ ने उसे सारी बातें संक्षेप में समझाई। मनोरमा के मुख पर न जाने कितने रंग आए और चले गए।

‘‘माँ जी से किए समझौते के अनुसार आज मैं तुम्हें लेने आया हूँ मनु! अठारह वर्ष के बाद आज मेरी तपस्या का अंत हुआ’’ विनय का स्वर छलक उठा।

‘‘परन्तु मैंने तो आपसे कोई समझौता नहीं किया था न?’’ मनोरमा ने उत्तेजित होकर कहा।

‘‘तुम्हारी सहमति से ही तुम्हारा क्लोन बनवाया गया था, ताकि हम तुम्हारी मृत्यु के बाद भी साथ रह सकें। इसके लिए मैंने अपनी सारी संपत्ति स्वाहा कर दी। अठारह वर्ष का लंबा समय तुम्हारी प्राप्ति की आशा में सुलग-सुलग कर बिताया, क्योंकि तुम्हारे साथ से अधिक महत्वपूर्ण मेरे लिए कुछ भी नहीं था।’’

‘‘मुझे आपसे सहानुभूति है। पर आपकी पत्नी और मैं दो भिन्न-भिन्न अस्तित्व हैं, भले ही हम क्लोन हों। हमारे मस्तिष्क की बनावट एक होगी, परंतु सोच एक नहीं है। क्योंकि समय और परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। आपके लिए बीता हुआ समय भले ही सबसे बड़ा सत्य हो, पर मेरे मन में उस सत्य की परछाई भी नही हैं मैं स्वयं को आपकी पत्नी नहीं समझती और न ही आपके साथ आ सकती हूँ’’ मनोरमा ने स्पष्ट इनकार कर दिया। अचरज और अविश्वास से विनय की आँखें फैल गई। मनोरमा का एक-एक शब्द उसे वज्र-प्रहार की भाँति प्रतीत हो रहा था। निराशा की काली स्याही उसके मन पर तेजी से फैलती जा रही थी, जिसमें सारे रंग छिपे जा रहे थे।

‘‘अब ऐसा क्या शेष रह गया है मनु, जो मैं तुम्हारे लिए कर सकता हूँ? तुम्हारी ‘ना’ मेरी जिजीविषा को हरा देगी’’

याचना की प्रतिमूर्ति बने विनय ने गिड़गिड़ाकर कहा। मनोरमा द्रवित हो उठी, ‘‘आपका प्रेम अद्भुत है। अपने पहले रूप में मैं भाग्यशालिनी थी कि आपका प्रेम प्राप्त कर सकी। परंतु अब मैं विवश हूँ, आपके प्रेम का प्रतिदान नहीं दे सकती। समय ने हम दोनों में बहुत परिवर्तन और दूरियाँ ला दी हैं। उसने हाथ पकड़कर विनय को दर्पण के सामने खड़ा कर दिया। विनय ने अनमना होकर स्वयं को निहारा बालों में सफेदी झलकने लगी थी। समय की मार से दुर्बल हुए कंधे थोड़े झुक गए थे। जीवन के पचास वर्ष झुर्रियाँ बनकर उसके मुख पर ठहर गए थे और मनोरमा लावण्यमयी, चंचल-चपल विद्युत सी दिखाई दे रही थी। गहरी साँस लेकर विनय वहाँ से हट गया।

‘‘मेरे कुँवारे मन में भावी जीवन के बसंत की छवि है, विगत जीवन का पतझड़ स्वीकार करना मेरे लिए असंभव है। आप भी इस सत्य को स्वीकार कर लीजिए’’ मनोरमा ने ऊबे स्वर में कहा।

‘‘आप मनु को समझाइए न माँ’’ निरुपाय होकर विनय ने मनोरमा की माँ से प्रार्थना की। वह चुपचाप खड़ी सारा वार्तालाप सुन रही थीं।

‘‘मुझे ऐसी ही किसी बात की अशंका थी। मैं जानती थी कि समय के साथ सब कुछ पहले जैसा नहीं रहेगा। इसीलिए मैंने अठारह वर्ष से पूर्व तुम्हारे मनोरमा से न मिलने की शर्त रखी थी। मेरा अनुमान था कि तुम धीरे-धीरे सब कुछ भूलकर किसी अन्य युवती की ओर आकृष्ट हो जाओगे, क्योंकि समय बड़े से बड़ा घाव भर देता है। पर तुम्हारे लिए जैसे समय वहीं ठहरकर रह गया है’’ मनोरमा की माँ ने लाचारी भरे स्वर में कहा।

‘‘यदि ऐसा था तो आपने मुझे उसका क्लोन बनवाने से रोका क्यों नहीं?’’ विनय ने क्रोध-भरे स्वर में कहा।

‘‘उस समय मेरे समझाने पर तुम पर कोई प्रभाव नहीं होने वाला था और इसमें मेरा स्वार्थ भी था। मैं अपनी बेटी को पुनः प्राप्त करना चाहती थी। परंतु अब उसकी इच्छा के विरुद्ध में उसे तुम्हारे साथ नहीं भेज सकती।’’

‘‘मेरी अठारह वर्ष की तपस्या व्यर्थ नहीं जा सकती। मनोरमा को पाने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ। वह मेरी पत्नी है और रहेगी। आप अधिक समय तक मुझे रोक नहीं पाएँगी’’ अंगारे बरसाता विनय बाहर निकल गया। माँ और बेटी हतप्रभ-सी बैठी रह गइर्ं। वे जानती थीं कि विनय ने जो कुछ कहा उसे वह अवश्य कर दिखाएगा। इस स्थिति में सिर्फ कानूनी बाधा ही उसे रोक सकती थी। सोच-विचार कर उन्होंने विनय पर मुकदमा दायर करने का निर्णय ले लिया। अदालती कार्यवाह का दूसरा दिन था। कटघरे में खड़ा विनय सामने बैठी मनोरमा को निरंतर निहारे जा रहा था। मनोरमा ने आँखों में जितनी ऊब थी विनय की आँखों में उतना ही लगाव। न्यायाधीश महोदय बड़े ध्यान से वकीलों के तर्क-वितर्क सुन रहे थे। क्लोन वाली बात न्यायालय के संज्ञान में लाई जा चुकी थी।

‘‘महोदय, मनोरमा वर्मा को अपने साथ रखने का पूरा अधिकार मेरे मुवक्किल विनय शर्मा को है, क्योंकि वह उनकी विधिवत् विवाहित पत्नी है’’ विनय के वकील ने तर्क दिया।

‘‘मैं इस पर आपत्ति करता हूँ महोदय, उनका विवाह पहली मनोरमा से हुआ था, दूसरी से नहीं। इसलिए यह उनकी पत्नी नहीं कही जा सकती मनोरमा के वकील ने कहा।

‘‘दूसरी मनोरमा पहली वाली की क्लोन है। उनकी शक्ल-सूरत, जीन-संरचना और फिंगर-प्रिंट बिल्कुल समान हैं। किसी भी दशा में दो भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के फिंगर-प्रिंट एक से नहीं हो सकते। इस आधार पर उन्हें एक ही व्यक्तित्व और व्यक्ति माना जायेगा और जो अधिकार पहली पर था, वही दूसरी पर भी रहेगा बचाव पक्ष के वकील बड़ी चतुराई से अपनी चालें चल रहा था।

‘‘मानव-जाति के अब तक ज्ञात इतिहास में एक व्यक्ति के दो शरीर नहीं हुए, पर लगता है, आज वकील साहब देा शरीरों को एक ही व्यक्ति का सिद्ध करके इतिहास अवश्य रचेंगे मनोरमा के वकील ने चुटकी ली। निर्णय अगले दिन के लिए स्थगित कर दिया गया। अगले दिन न्यायालय में भीड़ बढ़ गई थी। सार्वजनिक रूप से पहली बार प्रतिबंधित मानव-क्लोनिंग का मामला सामने आया था लोग न्यायाधीश महोदय का निर्णय सुनने के लिए उत्सुक थे, जिसमें मैं भी एक था। कार्यवाही के सजीव प्रसारण की व्यवस्था की गई थी। निश्चित समय पर न्यायाधीश महोदय उपस्थित हो गए। कई पृष्ठों के अपने निर्णय में उन्होंने इस केस के सभी पक्षों की व्याख्या की थी।

‘‘यह केस कई मायनों में अनोखा है और इसीलिए इस पर निर्णय देना मेरे लिए कठिन था। यह केस इस बात की मिसाल है कि प्रकृति के कार्यों में किया गया हस्तक्षेप किस प्रकार मानव-जीवन को दुःखमयी बना देता है। उलझे हुए मानवीय संबंध इससे और अधिक उलझ जाते हैं।’’

‘‘यदि किसी व्यक्ति के क्लोन को अलग अस्तित्व माना जाय तो वर्तमान कानून की धाराओं के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा कि फिंगर प्रिंट्स और जीन-संयोजन एक होने पर भी वे व्यक्ति देा क्यों माने जाएँ?

‘‘वहीं दूसरी ओर उन्हें एक अस्तित्व मानने में भी अड़चनें हैं। यदि किसी व्यक्ति की जानकारी में आए बिना उसका क्लोन बनावा लिया जाए और वह उसकी तमाम सम्पत्ति पर बराबर का अधिकार जताए तो क्या यह अधिकार उसे दिया जाना चाहिए? इसी प्रकार कोई अपराध करने पर दोनों में सें किसी एक को दंड देना तार्किक रूप से सही होगा, परंतु यह न्याय की मूल भावना के विपरीत होगा। सारे तर्कों पर विचार करने के बाद मैंने यह निर्णय लिया है कि उन्हें भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के रूप में मान्यता देना उचित होगा, तभी रिश्तों को उलझने से बचाया जा सकता है। इस आधार पर मनोरमा, विनय वर्मा की पत्नी नहीं समझी जाएगी और उसके साथ रहने को बाध्य नहीं होगी। यदि विनय शर्मा ऐसी कोई चेष्टा करेगा, तो दंड का पात्र होगा, साथ ही मानव-क्लोनिंग-संबंधी कानून का उल्लंघन करने के कारण विनय शर्मा को सात वर्ष और उनका सहयोग करने के कारण मनोरमा की माँ श्रीमती शांतिप्रभा को पांच वर्ष की साधारण कैद की सजा सुनाई जाती है। मनोरमा वर्मा किसी भी अन्य नागरिक के समान स्वतंत्र अस्तित्व रखती हैं और अपनी इच्छा से कहीं भी विवाह कर सकती हैं।’’ अपना निर्णय सुनाकर  न्यायाधीश महोदय उठ खड़े हुए। विनय पर जैसे बिजली गिर पड़ी। उसका मस्तिष्क सुन्न हो गया। सारे स्वप्न चूर-चूर हो चुके थे। अब जीवन में कुछ शेष नहीं रह गया था। इतने वर्षों तक तपते मरुस्थल में चलने के बाद नखलिस्तान की आशा मात्र मृग-मरीचिका सिद्ध हुई थी। प्रचंड क्रोध और निराशा की भावना के वशीभूत हो वह कभी चीखता, कभी रोता तो कभी हँसने लगता। उसके इस विचित्र व्यवहार की परिणति यह हुई कि उसे मानसिक आरोग्यशाला ले जाया गया। अब वही अंतिम आश्रय था। प्राकृतिक निर्णय में हस्तक्षेप उसे बहुत महंगा पड़ा था। अभी मैं इस विश्लेषण में लगा ही हुआ था कि रूबी ने किसी के आने की सूचना दी। मैं उठकर ड्राइंगरूम में आया तो देखा कि लगभग पच्चीस वर्षीय एक सजीला नौजवान चिंतातुर मुद्रा में बैठा था। अभिवादन के पश्चात बिना किसी भूमिका के उसे कहना आरंभ कर दिया।

‘‘मेरा नाम रमन मेहरा है। मेरी माँ मेरा विवाह करना चाहती हैं, पर मुझे कोई लड़की पसंद नही आती कहते-कहते वह रुका।

‘‘मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ?’’ मैंने विस्मित होकर पूछा। ‘‘रूप, गुण और बुद्धि में मेरी माँ की तुलना पृथ्वी की किसी स्त्री से नहीं की जा सकती। वह अद्वितीय है और में ऐसी लड़की चाहता हूँ जो बिल्कुल मेरी माँ जैसी हो, परंतु मुझे आज तक नहीं मिली और शायद मिलेगी

भी नहीं। उसने झिझकते हुए कहा। मैं समझ गया। वह व्यर्थ ही अपराध-भावना से ग्रस्त हो रहा था। वह अपनी मां से भावनात्मक रूप से बहुत अधिक जुड़ा हुआ था। उनका व्यक्तित्व उस पर इस प्रकार हावी था कि उसके आगे हर लड़की हीन लगती थी।

यह अत्यंत स्वाभाविक है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जीवन-साथी ढूंढते समय लड़के अपनी संगिनी मां का प्रतिरूप तलाश करते हैं और लड़कियां पति के रूप में उसे पसंद करती हैं जो उनके पिता की प्रतिच्छाया हो’’ मैंने उसे समझाया।

‘‘तो क्या मैं अपनी माँ के क्लोन से विवाह कर सकता हूँ? न्यायालय के निर्णय के अनुसार क्लोन को सर्वथा भिन्न अस्तित्व के रूप में स्वीकार किया गया हैं इस आधार पर मेरी माँ का क्लोन मेरी माँ नही मानी जा सकती, अतः मेरे लिए वरणीय है’’ उसने धमाका सा किया। मैं स्तब्ध रह गया। मानव-मन न जाने क्या-क्या करने को तैयार हो जाता है कोई भी सीमा उसे बांध नही सकती। ‘‘क्या तुम्हारी मां इसके लिए तैयार हैं? और फिर उम्र का इतना अधिक अंतर.... मैंने स्वयं को संभालते हुए पूछा।

‘‘माँ मेरी इस इच्छा के विषय में कुछ नहीं जानती। सोलह वर्ष पूर्व किसी कारणवश उसका क्लोन बनवाया गया था, अतः इस विवाह में उम्र का अधिक अंतर नहीं होगा। मैं आपसे बस यही जानने आया हूँ कि कानूनी रूप से सही होने के बावजूद क्या यह नैतिक व सामाजिक रूप से उचित होगा? मेरे वैवाहिक जीवन पर इसका विपरीत प्रभाव नहीं पडेंगे़? समाजशास्त्री होने के नाते आप इस अच्छी तरह विवेचना कर सकते हैं उसने धीरे से कहा।

‘‘इन प्रश्नों का उत्तर इतना सरल नहीं। मैं तुम्हें बाद में मिलूँगा’’ मैंने कहा तो वह विदा लेकर चला गया। मेरी बुद्धि चकरा गई। माँ जैसी पत्नी के स्थान पर माँ ही पत्नी....परन्तु, वह माँ कहाँ? यह तो क्लोन है । निःसंदेह समाज इसे आसानी से स्वीकार करने वाला नहीं। तूफान खड़ा होने की पूरी आशंका थी। उसकी ही नहीं वरन् उसके माता-पिता की मानसिकता पर भी इसका प्रभाव आवश्यक पड़ना था। भावी जोड़े का दांपत्य जीवन या तो अत्यंत सफल हो सकता था या फिर अत्यधिक दुःखद और अपराध भावना से भरा हुआ भी। तो क्या इस आधुनिक समाज में रिश्तों की सदियों पूर्व बनाई गई परिभाषाएँ ही बदलनी होंगी, जो मानव की बदलती भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकूं? आज जो इच्छा एक के मन में जागी है वही कल अनेक के मन में उत्पन्न हो सकती है। अधिक समय तक समाज इस प्रवृत्ति को अनदेखा या उपेक्षित नहीं कर सकेगा। मानसिक द्वंद्व ने मुझे उलझा दिया था। भांति-भांति के विचार मेरे मस्तिष्क पर आक्रमण कर रहे थे। मैं थक चुका था। मेरी मनोदशा भांपकर रूबी ने कक्ष का प्रकाश हल्का कर दिया। प्राकृतिक ध्वनियों के संगीत का रिकार्ड लगाकर वह धीरे-धीरे मेरे सिर दबाने लगी। बुद्धिमान रोबोट होने के कारण मैं रूबी को अपने केस के विषय में बहुधा विचार-विमर्श करता रहता था।

‘‘रमन मेहरा के केस के विषय में तुम्हारी क्या राय है रूबी?’’ मैंने पूछा।

‘‘आप मनुष्यों की भावनाएँ कितनी जटिल होती हैं सर! शुक्र है, मैं रोबोट हूँ। मुझे नींद आने लगी थी।

(विज्ञान कथा - जनवरी - मार्च 2017 से साभार)

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