शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

शब्द संधान / मुख सुख और मुँह देखी बात / डा. सुरेन्द्र वर्मा

image

मुख और मुँह, ये दोनों ही शब्द सामान्यत: हमारी उस इन्द्रिय की ओर संकेत करते हैं जिससे हम बोलते और आहार ग्रहण करते हैं लेकिन कभी कभी इन शब्दों का उपयोग चेहरे की केवल एक इन्द्रिय के ही नहीं कि जिसमें यह अवस्थित है, बल्कि पूरे चेहरे के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए जब हम मुख मलीन हो गया जैसे वाक्यांश का प्रयोग करते हैं तो यहाँ मुख से अर्थ चेहरे से, या मुख-मंडल से अथवा मुखाकृति से होता है। और इसी प्रकार जब हम कहते हैं कि मुँह धोलो, तो हमारा आशय पूरे चेहरे को धो लेने से होता है। मुख संस्कृत का शब्द है किन्तु मुँह ठेठ हिन्दी का शब्द है। हो सकता है ‘मुख-सुख’ के लिए हिन्दी में मुख का ‘मुँह’ हो गया हो। मुख की अपेक्षा मुँह आसानी से बोला जा सकता है। बहरहाल जब हम ‘मुख’ या ‘मुँह’ कहते हैं तो संदर्भानुसार चहरे और मुँह दोनों के लिए ही ये शब्द उपयोग में आते हैं।

मुख या मुँह, हमारे चेहरे का द्वार है। इस द्वार से, इस खुली जगह से, हम आहार ग्रहण करते हैं और बोलते भी हैं। इसका सामान्यीकरण करके किसी भी बर्तन आदि के छेद को भी, जिससे कोई चीज़ अन्दर डाली जा सके, उसका मुख या मुंह कहा गया है। मकान आदि के दरवाज़े को भी जो बाहर निकालने / निकलने का रास्ता होता है, मकान का मुख ही माना गया है। मकान या किसी इमारत का मुख्य-द्वार भी उसका मुख-द्वार होता है।

[ads-post]

‘मुख्य’ शब्द, शायद मुख से ही बना हो। इसका अर्थ ‘मुख संबंधी’ तो है ही, प्रधान, से भी है; जो गौड़ न हो वह मुख्य है। गाँव का प्रधान व्यक्ति ‘मुखिया’ होता है। ’मुखनी’ प्रधान स्त्री है। मुख्य स्त्री पात्र को सामान्यत: ‘मुखानी’ भी कहा गया है। जो बहुत बोलता है, अपने भावों को छिपाता नहीं, ’मुखर’ होता है। कभी हम किसी शब्द का सीधा सीधा अर्थ बता देते हैं, कभी हम जो कहते हैं, उसमें अर्थ केवल ‘मुखरित’ होता है, ध्वनित होता है।

मुख से न जाने कितने शब्द बने हैं। मुख-चीरि जीभ को कहते हैं : मुख-दोष जीभ का दोष है। पान खाने से मुँह सज्जित होता है, इसीलिए पान को मुख-भूषण, मुखमंडलक, कहा गया है। लौंग ‘मुख-प्रिय’ है। इसे ‘मुख-शुद्धि’ के लिए खाया जाता है। पान मुख-भूषण है तो प्याज मुखदूषण है, इसे खाने से मुँह में बदबू जो आती है।

मुखाग्र मुँह का अग्र भाग नहीं है। मुख तो स्वयं ही किसी भी चीज़ का अग्रभाग है। मुखाग्र करना कंठस्त करना है ज़बानी याद करना है। हम अक्सर कहते हैं कि अमुख के मुँह पर तो सरस्वती विराजमान है। सरस्वती को ‘मुख-निवासिनी’ जो कहा गया है।

मुख है तो सूर्यमुखी, चन्द्र-मुखी, पूर्वमुखी, बहुमुखी जैसे लोग और वस्तुएं भी है। मुख है तो मुखौटे भी हैं। मुखौटा चेहरे के ऊपर एक नकली चेहरा है। सांकेतिक रूप से इसमें कथनी और करनी का अंतर छिपा है। दो-मुंहे लोग दो-मुंही बात करते हैं। उनपर भला कैसे भरोसा किया जा सकता है ?

मुँह से हम न जाने कितने भाषाई काम करते रहते हैं। हम मुँह-जोरी करते हैं , मूंह-फट बात करते हैं। हम मूं-दर-मूँ बात करते हुए, मुंह-तोड़ जवाब देते हैं। कभी ‘मुँह देखे की बात’ भी करते हैं तो कभी घूंस देकर मूंह-भराई भी करते हैं। हम लोगों को मुँह-लगाते हैं और उनके ‘मुँह का कौर’ छीन लेते हैं। फिर भी लोग हैं कि मुँह-उठाए चले आते हैं। हम ‘मुँह की खाते’ हैं और मुँह- मीठा भी करते हैं। हम मुँह-खोलते हैं , मुँह खुलवाते हैं, मुंह चलाते हैं, मुँह चाटते हैं और मुँह पर ज़रूरत पड़ने पर थूक भी देते है। हम मुँह-फुलाते हैं , यहाँ तक कि मुँह-फेर भी लेते हैं। हम मुँह-ताकते हैं और कभी कभी ताकते ही रह जाते हैं। हम मुँह-लगते हैं, लगाते हैं, पर मुँह मोड़ भी लेते हैं। हम मुंह के बल गिर जाते हैं, मुँह औंधा कर लेट जाते है , फिर भी मुँह-चिढाने से बाज़ नहीं आते। कहाँ कहाँ तक गिनाएं, जितने मुँह उतनी बातें। इसीलिए लोग अक्सर मुंह बंद कर लेते हैं और मुँह पर लगाम लगा लेते हैं। कुछ हैं जो बाज़ नहीं आते और मुंह की खाते हैं। पर कभी कभी हम परसा हुआ खाना तक नहीं खाते, बस मुंह-जुठारते हैं।

यह मुँह और दाल मसूर की। ज़रूर किसी ज़माने में मसूर की दाल बहुत कीमती रही होगी। हर कोई उसे खा नहीं पाता होगा। तभी तो यह कहावत प्रचलित हुई होगी – यह मुँह और दाल मसूर की ! मुँह को लेकर कहावतें तो और भी हैं, जैसे “ दाल भात बहुतेरा, खाने का मुँह टेड़ा। जितने मुँह उतनी बातें --ऐसी कहावतों की पूरी एक सूची बनाई जा सकती है और यह खोज भी की जा सकती है कि आखिर वे किन परिस्थितियों में और कैसे बनी ?

-- डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८) १०/ १ सर्कुलर इलाहाबाद -२११००१

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------