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व्यंग्य - कतार में देश - राजशेखर चौबे

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कतार में देश

पता नहीं ‘रिमोट कंट्रोल‘ की खोज किसने की है पिछली सरकार को रिमोट कंट्रोल‘ से चलाने का आरोप लगता रहा है । पहले वाले -मन की बात‘ क्‍या कोई भी बात नहीं करते थे । अभी वाले पता नहीं कितनी बार मन की बात‘ कर चुके हैं परन्‍तु जो बताना था वही नहीं बताया । खैर आजकल कपिल शर्मा और कृष्‍णा से अधिक न्‍यूज चैनलों की डिमान्‍ड हैं । मैं भी न्‍यूज चैनल देख रहा हूँ । आम-आदमी खास-पत्रकार को अपना साक्षात्‍कार दे रहा है और में रिमोट कंट्रोल ढूंढ रहा हूं ः-

-कब से खड़े हैं कतार में

-सुबह पांच बजे से ।

-पहली बार लाईन में लगे है ।

-नहीं रोज लाईन में खड़ा होता हूँ ।

-कितनी बार पैसा मिला ?

-सिर्फ पांच बार ।

-करते क्‍या हैं ।

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-फिलहाल तो लाईन में खड़ा होने का काम कर रहा हॅूं ।

-पहले क्‍या करते थे ।

-कोई भी काम जैसे कुछ सामान लाना पहुंचाना, बिजली बिल टेलीफोन बिल पटाना, गैस, सिनेमा, टिकट आदि लाना ।

-जैसे फ्रीलांस पत्रकार होता है वैसे ही मैं फ्रीलांस मजदूर था । काम की कोई कमी नहीं थी । अब तो एक ही काम है - लाईन में लगे रहो । कितना पैसा मिल जाता है ।

-पैसा निकला तो 200 रूपया अन्‍यथा 100 रूपया ।

-एडवांस चाहिए तो पुराना 500 या 1000 का नोट ही मिलेगा ।

-क्‍या तुम्‍हारे सामने लाईन में किसी की मौत हुई ।

-हां, कई लोगों की ।

-फिर भी लाईन में खड़े हैं । घर में और कौन-कौन यही काम कर रहें हैं ।

-सभी लोग मैं, मेरी पत्‍नी और बेटा इससे ही हमारे घर का खर्चा चल रहा हैं । एक दिन में 400 तक मिल जाता है ।

-तब तो नोटबंदी का तुम्‍हें फायदा हुआ है ।

-अरे साहब बिलकुल नहीं । पहले मैं और मेरी पत्‍नी मिलकर एक दिन में 800 तक कमा लेते थे ।

-क्‍या काम करते थे ।

-बताया था साहब फ्रीलांस मजदूर ।

-नोटबंदी पर आपकी क्‍या राय है ।

-यह गरीब, किसान और मजदूर पर अब तक का सबसे करारा प्रहार है । इससे उबरने में उन्‍हें वर्षों लगेंगे ।

-सरकार का दावा है कि नोटबंदी गरीबों के कल्‍याण के लिए ही लाया गया है ।

-नोटबंदी से गरीब को ही सबसे अधिक तकलीफ पहुंची है । उसे ही रोजी-रोटी कमाने की दिक्‍कत हो रही है । वहीं बैंक की लाईन में भी खड़ा है । क्‍या आपने किसी सूट-बूट वाले को लाईन में खड़ा देखा है ।

-अंत में आप क्‍या कहना चाहेगें ।

-भगवान हमारे नेताओं को सद्‌बुद्धि और आम आदमी को शक्‍ति प्रदान करें ताकि इस प्रहार को झेल सकें । मेरा रिमोट कंट्रोल मिल गया है । साक्षात्‍कार अभी-अभी प्रारंभ हुआ है ।

-बैंक की लाईन में कैसा लग रहा है ।

-एकदम बिंदास, कोई तकलीफ नहीं ।

-कितना समय हो गया ।

-दो घंटे ।

-पैरों में दर्द तो नहीं

-बिलकुल नहीं

-देश के विकास के लिए यह मामूली तकलीफ है । हम सब इसके लिए तैयार हैं ।

-नोटबंदी पर आपकी राय ।

-इससे देश में भ्रष्‍टाचार, कालाबाजारी, बेरोजगारी, गरीबी, आंतकवाद आदि का खात्‍मा होगा पहली बार किसी सरकार ने सही कदम उठाया है ।

आपको कोई तकलीफ नहीं है ।

-कैसी तकलीफ । चोरी, लूट,डकैती, ठगी सब कुछ बंद है ।

-ऐसा क्‍यों ।

-सभी चोर, लुटेरे ठग और डकैत पुराने नोट खपाने में लगे हैं ।

-और क्‍या फायदा हुआ है ।

-प्रत्‍येक सामान सस्‍ता हो गया है । 50 दिन बाद सबके पास पैसा भी आ जाएगा और लोग इन्‍हें खरीद भी सकेगें ।

-नये व पुराने नोटों की इतनी धर-पकड़ हो रही है । उस पर आपकी राय क्‍या है ? यह सब मिली भगत हो नहीं है ।

-विपक्ष के पास कोई मुद्‌दा नहीं है । ये कुछ बैंक कर्मियों के साथ मिलकर नोटबंदी की हवा निकालने में लगे है । आखिर ये लोग हैं कौन ?

- ये लोग जब छोटे थे किसी बर्थ डे‘ पार्टी में जाकर फुग्‍गा-2 चिल्‍लाकर गुब्‍बारा मांगते थे । और मिल जाने पर उसे फोड़कर फिर से फुग्‍गा-फुग्‍गा चिल्‍लाने लगते थे । ये अब बड़े जरूर हो गए हैं, परन्‍तु -मेच्‍यूरिटी‘ आने में अभी वक्‍त लगेगा ।

-तब क्‍या नोटबंदी से किसी को कोई तकलीफ नहीं है ।

-नोटबंदी से आम-आदमी को कोई तकलीफ नहीं है ।

पिज्‍जा और पापकार्न के लिए जब लाईन लगाई जा सकती है तो इस ‘नोबल काज‘ के लिए

क्‍यों नहीं । तकलीफ केवल कालेधन वालों को ही है ।

-नोटबंदी से आपको व्‍यक्‍तिगत रूप में क्‍या लाभ हुआ है । जब मैं ए.टी.एम. या बैंक की

लाईन में खड़ा होता हूँ, मुझे गर्व की अनुभूति होती है और मुझे लगता है कि में भी सेना के

जवान की तरह सीमा पर डंटा हुआ एक जवान हूँ । ‘नोटबंदी ने देश के‘ आम-आदमी को

देशभक्‍ति का यह सौभाग्‍य प्रदान किया है ।

-मैंने किसी भी नेता, सेठ या अधिकारी को बैंक की लाईन पर नहीं देखा है ।

-उनके लिए भी आम आदमी ही लाईन पर खड़ा है और ये सभी लोग इस गर्व की अनुभूति

से वंचित हैं । यही उनका दुर्भाग्‍य भी है ।

- अंत में आप क्‍या कहना चाहेंगे ।

-वंदे मातरम्‌

आखिर दोनों आम-आदमी और पत्रकार में क्‍या अंतर है । सिर्फ चैनल का ही फर्क है और शायद दोनों ही सही है । एक मुद्‌दे पर समाज या देश की दो राय होना विभाजन नहीं है । बल्‍कि विरोध को स्‍वीकार न करना विभाजन का कारक हो सकता है । इसमें एक को गद्‌दार और एक को देशभक्‍त कहना उचित नहीं होगा । पक्ष एवं विपक्ष कहना अधिक सही होगा । अन्‍यथा समाज के बंटवारे के लिए हम सभी जिम्‍मेदार होगें ।

राजशेखर चौबे

रायपुर

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