लघु व्यंग्य / चमचा और कुत्ता / शशिकांत सिंह 'शशि'

चमचे ने कुत्ते से कहा-’’ बधाई हो ! तेरे तो भाग्य खुल गये। तेरा नाम कल से शेरू हो जायेगा। ’’

-’’ तो मैं दहाड़ने लगूंगा। मुझे में शिकार करने की ताकत आ जायेगी ? मेरे पंजे नुकीले और मजबूत हो जायेंगे ?’’

कुत्ता खुश हो रहा था। चमचा भी मुदित था।

-’’ सब धीरे-धीरे हो जायेगा। कम से कम नाम तो बदल गया। परिवत्र्तन रोतोरात तो नहीं होते। तू बचपन से ही कुत्ता था,  धीरे-धीरे शेर हो जायेगा।’’

-’’ मुझे क्या करना होगा ?’’

-’’ कुछ नहीं मालिक को देखते ही पूंछ हिलाना। दोनों टांगे हवा में उठाकर उसको सलाम करना। किसी को काटने के लिए हूले-हूले करे तो झपट पड़ना।’’

-’’ चोर को ?’’

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-’’ नहीं रे पागल। मालिक जिसे चोर समझे वह चोर। वे जिसे साधु समझे वह साधु। तुम्हारा काम तो काटना और भौंकना है। बदले में तुझे मस्त भोजन, सोने के लिए रेशमी बोरी, गले में सोने का पट्टा, घुमने के लिए नौकर, तुझे तो नहलाने के लिए भी नौकर होंगे। क्या किस्मत पाई है रे तूने। ’’

कुत्ता धीरे से बोला-’’ मैं पूंछ हिलाना नहीं चाहता। यदि आप कहें तो एक यही काम छोड़ दूं ?’’

-’’ अबे इस एक काम के बदले तो सारी सुविधा मिल रही है। तू यदि चाहता है कि आने वाले दिनों में तू शेर हो जाये , दहाड़े, शिकार करे तो आज ये त्याग करने ही होंगे। ’’

कुत्ता धीरे से कूं कूं करके बोला-’’ तू भी पहले कुत्ता था ?’’

-’’ नहीं मैं तो पहले आदमी

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