मंगलवार, 24 जनवरी 2017

जयपुर लिटरेचर (फेस्ट) और सनसनी / सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी

सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी

 

लिटरेचर और सनसनी
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मैं लगातार चार बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल गया हूं, न तो मुझे साहित्‍य की समझ है, न टेस्‍ट और न ही कोई साहित्यिक अकांक्षा, फिर भी लगातार चार साल तक वहां जाने का कोई तो कारण रहा होगा।

मेरे लिए यह कारण बहुत बड़ा था कि जयपुर के डिग्‍गी हाउस में बड़े नाम वाले साहित्‍यकार, कलाकार और दूसरे सेलिब्रिटी लोगों के बीच ऐसे ही घूमते और बातचीत करते रहते हैं जैसे आम लोग। लोकतंत्र की इस सुगंध के वशीभूत मैं उस ओर स्‍वाभाविक रूप से खिंच गया। सभी एक धरातल पर कैसे दिखते होंगे, खास लोगों में क्‍या खास होता होगा, यह सब देखने के लिए वहां पहुंचता रहा।

आखिरी बार तीन साल पहले गया था, वह आखिरी बार मेरे लिए कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सिलसिलेवार विकर्षण का परिणाम था। पहली बार गया तो मुगल टैंट से लेकर दरबार हॉल तक सभी मंच छाने। पांच दिन तक जयपुर में ही जमा रहा और सुबह से शाम तक वहां टिका रहता।

शायद तीसरी बार की बात है, फेस्टिवल अपना रंग खो रहा था और भीड़ बहुत कम हो गई थी, आमतौर पर सेलिब्रिटीज को देखने के लिए भीड़ आती है, उस साल खास भीड़ नहीं थी, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों के मीडिया संपर्क ठीक ठाक हैं और स्‍पांसर्स भी अच्‍छे खासे हैं। ऐसे में आज तक के संबंधों को भुनाया गया।

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मुद्दा बनाया गया से‍टेनिक वर्सेज के पाठ का, हालांकि कार्यक्रम में वह पहले से था, लेकिन तब तक मुद्दा नहीं बना था, लेकिन आज तक के कुछ वरिष्‍ठ लोग मौके पर पहुंच चुके थे और उन्‍होंने आकलन कर लिया था कि इस मुद्दे को खासा भुनाया जा सकता है, कुछ लोगों को बुलाया गया डिग्‍गी हाउस के बाहर। इधर हाउस के भीतर उन लोगों ने सेटेनिक वर्सेज के कुछ अंशों का पाठ शुरू किया और उधर बाहर पंद्रह बीस लोग हाय हाय के नारे लगाने लगे। मीडिया हाउस की दो टीमों ने कुशलता से दोनों को कवर किया और बवाल खड़ा कर दिया।

मौके पर हकीकत यह थी कि डिग्‍गी हाउस में मौजूद पांच हजार से अधिक लोगों में से मात्र साठ सत्‍तर लोग सेटेनिक वर्सेज वाले सत्र में मौजूद थे और बाकी लोगों को उससे कोई मतलब भी नहीं था। जाहिर तौर पर मुझे भी मतलब नहीं था। मेरे पास फोन आया कि तूं वहां क्‍या कर रहा है, वहां तो बड़ा बखेड़ा हो गया है।

बखेड़ा ??!!

डिग्‍गी हाउस में पत्‍ते तक नहीं हिले थे, लेकिन मीडिया में तूफान आया हुआ था। बाकी मीडिया की टीमें भी मौके पर दनादन पहुंच रही थी। मौके से अर्थ है डिग्‍गी हाउस के बाहर घनघोर ट्रेफिक के किनारे फुटपाथ जैसी जगह पर पंद्रह बीस लोग हांय हांय किए हुए थे, कैमरों को उन्‍हीं लोगों के बीच फोकस किया गया था। अब ओबी वैन और कुछ वैसे ही तामझाम देखकर कुछ तमाशबीन भी एकत्रित हो गए थे।

संभवत: तीसरा दिन रहा होगा, शाम की कसरत ऐसा रंग लाई कि चौथे दिन डिग्‍गी हाउस में सुबह इतनी भीड़ हो गई कि मैं होटल से मौके पर पहुंचा तो वहां सड़क तक लाइन लगी हुई थी। फेस्टिवल को विवाद से खासा लाभ हुआ, मीडिया खुश कि उन्‍हें कवर करने के लिए मसाला मिला, आयोजक खुश कि भीड़ लौट आई, स्‍पांसर खुश कि पैसा बर्बाद नहीं हुआ और फेस्टिवल में रंग आ गया।

फिर तो हर साल फेस्टिवल को लेकर कोई न कोई विवाद लगातार देख ही रहा हूं। इस बार शूर्णपंखा को लेकर नाट‍क किया जा रहा है। हकीकत यह है कि सो कॉल्‍ड साहित्‍यकारों की 300 प्रति भी नहीं बिकती, अगर कोई सफल सेटिंगबाज हो तो 1000 या 5000 कॉपी तक पहुंच जाता है। बाकी किताबें उम्र धूल ही फांकती रही है।

इन्‍हें सीरियस लेने की कतई जरूरत नहीं है। एक नंबर के ढकोसलेबाज और नौंटकियों का जमावड़ा है। मीडिया की भूमिका भांड की तरह इनके साथ नाचने भर की है...

इन साहित्‍यकारों से अधिक पाठक फेसबुक लेखकों को रोजाना की पोस्‍ट में मिल जाते हैं, उन्‍हें ध्यानपूर्वक पढ़ें तो सार्थकता है।

{सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी के फ़ेसबुक पृष्ठ से साभार}

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