मंगलवार, 17 जनवरी 2017

हास्य-व्यंग्य / आदमी की पूंछ / राम कृष्ण खुराना

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जब से मैने सुना है कि कलकत्ता के राम कृष्ण मिशन अस्पताल में एक पूंछ वाले बच्चे ने जन्म लिया है तब से मैं बहुत खुश हूं। हमारे पूर्वजों की भी पूंछ हुआ करती थी। डाक्टरों का कहना है कि जब एक-डेढ महीने का भ्रूण पेट में होता है तो उसकी भी पूंछ होती है। और नौ महीने बीतते-बीतते वह पूंछ समाप्त हो जाती है। परंतु इस बच्चे ने पुराने संस्कार त्यागने से इंकार कर दिया। और पूंछ सहित पैदा हो गया। इस हिसाब से यह बच्चा हमारे पूर्वजों का लघु-संस्करण है। अतः पूज्यनीय है। यह मेरा दुर्भाग्य है कि पूज्यनीय पूर्वज का जन्म कलकत्ता में हुआ। मैं ठहरा एक अदना सा व्यंगकार, इतना किराया खर्च करके उस महान आत्मा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करने में असमर्थ हूं। अतः यहीं बैठे-बैठे ही मैं उस महापुरुष को साष्टांग प्रणाम करता हूं।

कह्ते हैं कि हमारे पूर्वजों की भी एक प्यारी-सी, छोटी-सी पूंछ हुआ करती थी। परंतु मनुष्य तो जन्म से ही इर्ष्यालु है। जानवरों की लम्बी पून्छ उसे फूटी आंख न भाई। बस, मनुष्य ने भगवान की व्यवस्था के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया। नारे लगने लगे। रैलियां निकलने लगीं क्रमिक भूख-हडताल से लेकर आमरण अनशन तक रखे जाने लगे। चारों ओर हाहाकार, लूटमार मच गई। भगवान के (यम) दूतों ने मनुष्य को बहुत समझाया। परंतु मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। मनुष्यों की मांग थी कि हमारी पूंछ को बडा करो। कुछ लोगों ने तो जानवरों की पूंछ को विदेशी नागरिकों की संज्ञा दी और उसे काटने की मांग करने लगे। भगवान भी परेशान। लोग भूख ह्डताल व यमदूतों के गदा प्रहारों से धडाधड़ मरने लगे। न नर्क में जगह बची न स्वर्ग में। गुस्से से भरकर भगवान ने नर्क व स्वर्ग की तालाबन्दी कर दी। और आदमी की पूंछ जड़ से ही काट कर आदमी को जमीन पर धक्का दे दिया। तब से मनुष्य पूंछ के बिना लुटा-लुटा सा घूम रहा है।

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यदि मैं यहां पूंछ के गुणों का बखान करने लगूं तो एक महाकाव्य ही तैयार हो जाय। आपको याद होगा कि एक बार जब श्री राम चन्द्र जी की धर्मपत्नि “ श्रीमति राम “ का विपक्षी दल के नेता रावण ने अपहरण कर लिया था तो उस समय हनुमान जी ने अपनी पूंछ से ही सारी लंका जला दी थी। सांप भी मर गया और लाठी भी बच गई। आज मैं सोचता हूं कि अगर हनुमान जी की पूंछ न होती तो श्रीमति राम का क्या होता ?

जिस प्रकार से मनुष्यों में इज्जत की निशानी मूंछ होती है उसी प्रकार से जानवर भी अपनी पूंछ की बेईज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकते। एक सिर फिरे आदमी ने एक कुत्ते की घनी व लच्छेदार टेढी पूंछ को सीधा करने का प्रयास किया था। कहते हैं कि 12 साल बाद भी कुत्ते ने अपने जाति-स्वभाव को नहीं छोड़ा। और उसकी पूंछ टेढ़ी ही रही।

जब मेरी मूंछें फूटनी शुरु ही हुई थी तो मेरे दिल में मूंछ पर एक कविता लिखने की सनक सवार हो गई। उस कविता में मूंछ की तुक पूंछ से भिडाते समय मेरे दिल में अचानक यह ख्याल आया कि आदमी की पूंछ क्यों नहीं होती ? मैंने अपनी पीठ पर रीढ की हड्डी के नीचले सिरे तक हाथ फिरा कर देखा और पून्छ को नदारद पाकर मुझे बहुत दुख हुआ। बस मैं कागज़ कलम वहीं पर पटक कर दौडा-दौडा अपने पिता जी के पास गया और उन से आदमी की पूंछ न होने की शिकायत की। पिता जी ने दूसरे ही दिन मेरी शादी कर दी। यानि बाकायदा मेरी पूंछ मेरे पीछे चिपक गई। अब यह पूंछ इतनी लम्बी हो गई है कि मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। और घर में केवल पूंछ ही पूंछ दिखाई देती है। अब मैं इस बढी हूई पूंछ से इतना परेशान हूं कि इसको काटने के तरह-तरह के उपाय सोचता रहता हूं परंतु यह बढ़ती ही जाती है। सोचता हूं बिना पूंछ के ही ठीक था।

राम कृष्ण खुराना
99889 27450
#Ram_Krishna_Khurana

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