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शब्द संघात / धोखे का लेन –देन / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने कभी न कभी धोखा न खाया हो। यह सिर्फ एक मुहावरा है अन्यथा धोखा कोई “खाने की चीज़” नहीं है। इसी तरह धोखा ‘दिया जाना’ भी है। धोखा कोई वस्तु नहीं है जिसे लिया-दिया जा सके। यह वस्तुत: वस्तुस्थिति को छिपाकर दूसरों को भ्रम में डालने का व्यापार है। आश्वासन देकर भी अन्यथा आचरण करने की क्रिया है। यह वंचना है, विश्वासघात है, दगा है। भ्रम में डालना या भुलावा देना है। सत्य न होकर सत्य की प्रतीति है। रावण ने ब्राह्मण का वेश धारण कर सीता को धोखा दिया था। मारीच ने स्वर्ण-मृग बनकर धोखा दिया था। हमारे कलयुग में तो सभी एक दूसरे को धोखा देने में चतुर हैं।

संस्कृत में एक शब्द है, ‘धौर्त्य’। इसका अर्थ मूर्खता है। हिन्दी के धूर्त और धूर्तता जैसे शब्द संभवत: ‘धौर्त्य’ से ही निकले हैं। हो सकता है धोखा शब्द की व्युत्पत्ति भी संस्कृत के इसी ‘धौर्त्य’ से हुई हो। आखिर मूर्खता, धूर्तता और धोखा जैसे शब्दों में अर्थ की दृष्टि से एक पारिवारिक समानता तो है ही।

एक मजेदार बात यह है कि जहां हिन्दी में धोखा देना भ्रम में डालना है वहीं मराठी में धोखा खतरे के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बिजली की पूर्ती के लिए सडकों पर जो छोटे छोटे आपूर्ति- गृह होते हैं उनपर धोखा की पट्टी लगी रहती है जो खतरे का संकेत देती है। वैसे हिन्दी में भी अब खतरे के लिए धोखा शब्द इस्तेमाल होने लगा है। एक फिल्मी गाने में कहां गया है , “बाबूजी धीरे चलना प्यार में ----बड़े धोखे हैं इस राह में “ यहाँ स्पष्ट ही ‘धोखा भुलावा और खतरा दोनों ही अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। अंदेशा और संदेह के लिए भी प्राय: धोखा शब्द का उपयोग देखने में आता है।

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खेतों में चिड़ियों आदि को भगाने में डराने के लिए और इस प्रकार खेतों की रक्षा करने के लिए पुतला,बिजूका, बना दिया जाता है। इसे भी कई जगह ‘धोखा’ ही कहा गया है। ये पुतले चिड़ियों /पशुओं को भ्रम में दाल देते हैं की कोई किसान या बागबान उनपर नज़र रखे है। इस प्रकार पशु/पक्षी धोखा खा जाते हैं और खेतीबाडी की रक्षा हो जाती है।

धोखा है तो ‘धोखेबाज़’ (विश्वासघाती) भी हैं। ‘धोखेबाज़ी’ (छलावा,कपट) भी है। ‘धोखाधडी’ (कूट-युक्ति) भी है। ठगों को धोखादेह कहा जाता है तो धोखादेही ठगी है। धोखे से सम्बंधित मुहावरे भी हैं। धोखा खाना और धोखा देना ही नहीं सोचे हुए का उलटा हो जाना - धोखे में ‘पड़ना’ है। त्रुटी या कोई कसर रह जाना धोखा ‘लगना’,’लगाना’ या ‘लाना’ है। जिसकी आड़ में एक शिकारी किसी जानवर को मारता है उसे “धोखे की टट्टी” कहते हैं। धोखे की टट्टी इस प्रकार सामान्य रूप से झूठ- मूठ में फंसाने के लिए जाल के अर्थ में ही प्रयुक्त होने लग गया है। ‘धोखे का काम’ वह काम है जिसमें कोई न कोई जोखिम बना रहता है

एक और शब्द है ‘धोक’। लेकिन धोक में कोई धोखा नहीं है। जब हम आराम कुरसी या मसनद पर धोक लगा कर बैठते है तो इससे आराम मिलता है, इसमें कोई धोखा या अंदेशा नहीं है। धोक का एक अर्थ और भी है। प्रणाम करना या नत-मस्तक होना या झुककर सलामी देना, अपने आराध्य को ‘धोक’ देना है।

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-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी /१, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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