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हास्य व्यंग्य / चंदनवुड चिल्ड्रन स्कूल...! / के. पी. सक्सेना

आख मुलमुल. .गाल गुलगुल... बदन थुलथुल, मगर आवाज बुलबुल! वे मात्र बन पीस तहमद में लिपटे, स्टूल पर उकडूं बैठे, बीड़ी का टोटा सार्थक कर रहे थे! रह-रहकर अंगुलियों पर कुछ गिन लेते और बीड़ी का सूंटा फेफड़ों तक खींच डालते थे! जहां वे बैठे थे वहां कच्ची पीली ईंट का टिन से ढका भैंसों का एक तवेला था! न कोई खिड़की न रौशनदान! शायद उन्हें डर था कि भैंसें कहीं रौशनदान के रास्ते खिसक न जाएं! सुबहसवेरे का टाइम था और भैंसें शायद नाश्तोपरांत टहलने जा चुकी थीं! तवेला खाली पड़ा था! उन्होंने मुझे भर आंख देखा भी नहीं और बीड़ी चूसते हुए अंगुलियों पर अपना अंतहीन केल्क्यूलेशन जोड़ते रहे!...

मैंने उनसे संदलवुड चिल्ड्रन स्कूल का रास्ता पूछा तो उनकी आखों और बीड़ी में एक नन्ही सी चमक उभरी!... धीरे-से अंगुली आकाश की ओर उठा दी गोया नया चिल्ड्रन स्कूल कहीं अंतरिक्ष में खुला हो । मगर मैं उनका संकेत समझ गया! नजर ऊपर उठाई तो तवेले की टिन के ऊपर एक तख्ती नजर आई, जिस पर गोराशाही अंग्रेजी में कोयले से लिखा था-दि संदलवुड चिल्ड्रन स्कूल!... प्रवेश चालू! इंगलिश मीडियम से कक्षा 6 तक मजबूत पढ़ाई! प्रिंसिपल से मिलें!.. .' तख्ती पढ़कर मैं दंग रह गया!... यही है चंदन लकड़ी स्कूल?... चंदन दरकिनार, कहीं तारपीन या कोलतार तक की बू नहीं थी! मेरी मजबूरी अपनी जगह थी! मुहल्ले के गनेशीलाल के पोते के दाखले की जिम्मेदारी मुझ पर थी! खुद गनेशीलाल उम्रभर पढ़ाई-लिखाई की इल्लत से पाक रहे और अपने बेटे को भी पाक रखा! सिर्फ गुड़ की किस्में जान लीं और खानदानी कारोबार चलाते रहे! मगर पोता ज्यों ही नेकर में पांव डालने की उम्र को पहुंचा, उनकी पतोहू ने जिद पकड़ ली कि छुटकन्ना पड़िहैं जरूर, और वह भी निखालिस इंगलिश मीडियम से!... उसकी नजर में हिन्दी मीडियम से पढ़ने से बेहतर है कि गुड़ बेच ले! पतोहू ने अपने मैके में देखा कि अंग्रेजी मीडियम से पड़े छोकरे कैसे फट-फट आपस में इंगलिश में गाली-गलोज करते हैं! एक स्मार्टनेस सी रहती है!... चुनांचे गनेशीलाल मेरे पीछे पड़ गए कि छोकरे को कहीं अंग्रेजी मीडियम में डलवा ही दूं!... उधर जुलाई-अगस्त की झड़ी लगते ही चिल्ड्रन स्कूलों में वह किच-किच होती है कि आदमी अपना मरा हुआ बाप भले ही दोबारा हासिल कर ले, मगर बच्चे को स्कूल में नहीं ढूंस सकता! अंग्रेजी के 'डोनेशन' और हिन्दी के 'अनुदान' का फर्क इसी वक्त समझ में आता है आदमी को! अनुदान के बीस रुपयों में बच्चा हिन्दी मीडियम में धंस जाता है, मगर डोनेशन तीन अंकों से' नीचे होता ही नहीं! . अंग्रेजी की ग्रेटनेस का पता यहीं पर चलता है! खैर...!

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शिक्षा संदर्भ में यह एक अच्छी बात है कि बारिश में फूली लकड़ी पर उगे कुकुरमुत्तों की तरह, जुलाई-अगस्त में चिल्ड्रन स्कूल भी दनादन उग आते हैं! हर गली-मुहल्ले में भूतपूर्व लकड़ी की टालों और हलवाइयों की दुकानों पर नर्सरी मोंटेसरी स्कूलों के बोर्ड टैग जाते हैं! हर साइनबोर्ड का यही दावा होता है कि हमारे यहां बच्चा मां की गोद जैसा सुरक्षित रहेगा और आगे चलकर बेहद नाम कमाएगा!... ऐसे ही दुर्लभ तथा नए उगे स्कूलों में ' संदलवुड चिल्ड्रन स्कूल' का नाम भी मेरे कानों में पड़ा था! नाम में ही चंदन-सी महक और हाली-वुड जैसी चहक थी!... और अब मैं टिन जड़ित, रोशनदान रहित उसी स्कूल के सामने खड़ा था!... बीड़ी तहमद वाले थुलथुल सज्जन ने आखिरी कश खींचकर बीड़ी को सद्‌गति तक पहुंचाया, और तहमद के स्वतंत्र कोने से मुंह पोंछकर आखों-ही-आखों में पूछा कि क्या चाहिए?... मैंने दोनों हाथों से बच्चे का साइज बताया और धीरे-से पूछा कि प्रिंसपल कहां हैं... कब उपलब्ध होंगे? वे भड़क गए! गुर्रा कर बोले, ''हम आपको क्या नजर आवे हैं? टाई-कमीज अंदर टंगी है तो हम प्रिंसिपल नहीं रहे? जरा बदन को हवा दे रहे थे! आप बच्चा और फीस उठा लाइए! भर्ती कर लेंगे। मैं सटपटा गया और इस बार उन्हें इस ढंग से अभिवादन पेश किया जिस ढंग से अद्यन अंग्रेजी मीडियम में होता है! यह पूछने पर कि बाकी टीचिंग स्टाफ कहां हैं, उन्होंने बताया कि बाकी का स्टाफ भी वे खुद ही हैं! क्लास थी स्टाफ भी, और क्लास फोर (झाडू पोंछा, सफाई) भी! ... दो अदद लेडी टीचर भी हैं, जिनमें से एक उनकी मौजूदा पत्नी हैं और दूसरी भूतपूर्व! फिलहाल दोनों घर में लड़ाई-झगड़े में मसरूफ हैं! चट से टीचिंग सेशन शुरू होते ही आ जाएगी!... अभी कुल तेईस बच्चे नामजद हुए हैं! पच्चीस पूरा होते ही ब्लैकबोर्ड मंगवा लेंगे और पढ़ाई जो है उसे शुरू करवा देंगे!... मुझे तसल्ली हुई! डरते-डरते छा, ' खिड़कियां, रौशनदानों, पंखों और बेंचों वगैरा की झंझट आपने क्यों नहीं रखी ?'' ... वे दूरदर्शी हो गए!... आप चाहते हैं कि बच्चों को अभी से आरामतलब बना दें?

ग्लासगो कभी गए हैं आप? वहां के सन् चालीस के पैटर्न पर हमने स्कूल शुरू किया है! बच्चों को, उसे क्या कहते हैं... हां... हार्डशिप की आदत डालनी होगी!... फिर धीरे-धीरे सब कुछ हो जईहें अगले साल रौशनदान खुलवा देंगे... फिर अगले साल पंखों वगैरा की देखी जाएगी!... पईसा चाहिए, कि नाहीं चाहिए?... पच्चीस बच्चों की फीस लईके शुरू में ही आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी खोल दें का?... टाइम पास होते-होते सब कुछ हुई जइहैं!. बच्चा ले आवो दो ही सीटें बची है । हैं गी!.. ।''

सो साहब, संदलवुड चिल्ड्रन स्कूल के प्रधानाचार्य के श्रीवचन सुनकर मैं काफी से भी अधिक प्रभावित हुआ! सारी हिम्मत बटोरकर एक अंतिम प्रश्न पूछा,' 'मास्साब! वैसे तो अपने इंडिया में चारे-भूले की कमी चाहे भले ही हो, मगर बच्चों का टोटा नहीं है! फिर भी अगर दो बच्चे और न हाथ लगें तो क्या आप स्कूल डिजॉल्व कर देंगे''? वे पुन: भड़क गए!.. आए गए सुबे-सुबे नहसूत फैलाने!... जिस भगवान ने तेईस बच्चे दिए, वह दो और नाहीं भेजिहें का? डिजाल्व कर भी दें तो कौन-सी भुस में लाठी लग जई?? . पहले इस टिन में पक्के कोयला का गुदाम रहा!... सोचा कि इस्कूल डाल लें! डाल लिया! इन्ते पढ़े-लिखे हैंगे कि कक्षा 6 तक पढ़ाए ले जावें नाहीं चल पईहैं इस्कूल तो कोयले का लैसंस कोई खारिज हुई गवा है का?... वो लपक के बच्चा ले आवो !

मैं लपककर चल पड़ा रास्ते भर प्रधानाचार्य की उस अंग्रेजी से प्रभावित रहा जो एक फिल्मी गाने “आकाशमें पंछी गाइंग भौंरा बगियन में गाइंग'' जैसी थी! मास्साब दूर तक टकटकी बांधे मुझे उम्मीदवार नजरों से देख रहे थे, गोया कह रहे हों-बच्चा लइहैं जरूर! जइहैं कहां? इधर मैं यह सोच रहा था कि गनेशीलाल के पोते के भविष्य के लिए गुड़ बेचना मुनासिब रहेगा या संदलवुड चिल्ड्रन स्कूल में अंग्रेजी मीडियम से शिक्षा अर्जित करना?

(नोट-यदि किसी स्कूल का नाम यही हो, तो अन्यथा न लें! नाम काल्पनिक है !)

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(हिन्दी हास्य व्यंग्य संकलन - राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से साभार)

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